आख़िर में भाइयों ने हमारी बात का तर्क के साथ सार्थक जवाब देने के बजाय कुतर्कों के लिए एक औरत को ही आगे कर दिया...
इसी को कहते हैं नारी शक्ति...चलो इतना तो समझ में आया...
जो महिलाएं बुर्क़ा नहीं पहनती, क्या वो वस्त्रहीन हो जाती हैं...???
मज़हब के ठेकेदारों से चंद सवाल
जो महिलाएं बुर्क़ा नहीं पहनती, क्या वो वस्त्रहीन हो जाती हैं...???
मज़हब के ठेकेदारों से चंद सवाल
शरीया क़ानून मर्दों पर लागू क्यों नहीं होता...???
क्या वो मुसलमान नहीं हैं...???
औरतें तो बुर्क़े में रह लेंगी...सदियों से रहती आई हैं...ग़ुलामी उनके खून में बस चुकी है...
क्या मर्द यूं ही दाढ़ी मूंडे फिरेंगे...???
उन पर दाढ़ी रखने का दबाव क्यों नहीं...???
अगर इस मामले में मर्दों के साठ जोर-ज़बरदस्ती नहीं तो औरतों के साथ क्यों...???
क्या शाहबानो को शरीया क़ानून ने इंसाफ़ दिया...???
इमराना के ससुर ने अपनी बेटी समान बहू का रेप किया...इसके बावजूद सज़ा भी इमराना को ही मिली...उस वक़्त शरीया वाले कहां सो रहे थे...???
शर्मनाक बात तो यह भी है कि बलात्कार के मामलों में भी पीड़ित महिलाओं पर अत्याचार करते हुए बलात्कारियों के पक्ष में फ़तवे जारी किए गए. जून 2005 में मुज़फ्फ़रपुर की इमराना को उसके ससुर अली मोहम्मद ने अपनी हवस का पक्ष में फ़तवा दिया था. फ़तवे कहा गया था कि वह अब अपने ससुर को पति मानेगी. इस रिश्ते से उसे अपने पति नूर इलाही को पुत्र मानना होगा. इसी तरह मुज़फ़्फ़रनगर की ही 28 वर्षीय रानी के साथ भी उसके ससुर ने बलात्कार किया था. हरियाणा की भी एक महिला को उसके ससुर ने हवस का शिकार बनाया. इस हादसे के बाद पीड़ित महिला अपने मायके आ गई तो बलात्कारी ससुर उसके पति की हैसियत से उसे लेने तक पहुंच गया.
बेशर्मी की हद...
क्या यही है... मज़हब के ठेकेदारों का इंसाफ़...
जब कल्बे-जव्वाद ने औरतों को बच्चे पैदा करने का सामान करार दिया था... तब मज़हब के ठेकेदारों को क्यों सांप सूंघ गया था...???
आख़िर में औरत जब तक औरत की दुश्मन रहेगी, औरतों की हालत नहीं सुधरेगी...
उसे एक पूरा इंसान होने का दर्जा ही हासिल नहीं होगा...(इस्लाम में एक औरत की गवाही को आधी गवाही माना जाता है)...
विवाह के मामले में तो शायद एक चौथाई ही...वजह बताने की ज़रूरत नहीं...
अब समझ में आया...क्यों विदेशों में मुसलमानों को शक की नज़र से देखा जाता है...वो जिस देश में रहते हैं, जिस देश का खाते हैं, उसी के क़ानून का सम्मान नहीं करते...
@Aslam Qasmi
यहां बात 'क़ुरआन' की नहीं है...'क़ुरआन' में क्या है और क्या नहीं...यह बहस का मुद्दा नहीं है...
बात व्यवस्था की है, उस व्यवस्था की जो मज़हब की आड़ में औरत का मानसिक और शारीरिक शोषण करती है...
सवाल यह है की औरतों को खिलाफ फतवे देने वाले बलात्कारी मर्दों को सज़ा देने के मामले भी क्यों चुप्पी साध जाते हैं...???
आप कठमुल्लाओं से क्यों नहीं कहते कि वो 'क़ुरआन' पढ़ें और इंसाफ़ करें...
क्या इमराना, रानी और हरियाणा की महिला के साथ बलात्कार करने वाले उनके ससुरों (बहुवचन) को मौत की सज़ा सुनाई गई...???
जिस शरीयत का ढोल पीटा जा रहा है...उस शरीयत ने इन मज़लूम औरतों के साथ इंसाफ़ क्यों नहीं किया...???
बलात्कार भी इन्हीं का हुआ और सज़ा भी इन्हें ही मिली...वाह रे कठमुल्लाओं के क़ानून...???
@Smart Indian - स्मार्ट इंडियन
जिस दिन हिन्दुस्तान में 'शरीया पर्सनल ला' के साथ 'शरिया क्रिमिनल ला' भी लागू हो गया तो मज़हब के यही ठेकेदार भागे-भागे फिरेंगे...
हमारे जिस लेख को लेकर हो-हल्ला मचाया जा रह है...वो एक व्यंग्य है...
उसका लेबल भी व्यंग्य ही है...और ब्लोग्वानी पर भी व्यंग्य ही दिखाई दे रहा था...
जो लोग किसी के बयान और व्यंग्य में फ़र्क़ न कर सकें उनसे क्या कहा जाए...???
लेख में हमने औरतों से बुर्क़ा पहनने को कहा है, वस्त्रहीन रहने को नहीं...
ख़ैर, इंसान का जैसा ज़हन होगा, वो वैसा ही सोचेगा...
वैसे भी जो अपनी ही मां, बहन और बेटियों को बेइज्ज़त करने वालों [(कल्बे जव्वाद) और इमराना, रानी और ऐसी ही और औरतों के साथ बलात्कार करने वाले ससुरों)] के हिमायती हों, उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है...???
वैसे भी जो अपनी ही मां, बहन और बेटियों को बेइज्ज़त करने वालों [(कल्बे जव्वाद) और इमराना, रानी और ऐसी ही और औरतों के साथ बलात्कार करने वाले ससुरों)] के हिमायती हों, उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है...???
@संजय बेंगाणी
दिमाग से पैदल कुतर्कियों को क्या कहें?
@सतीश सक्सेना
डॉ अनवर जमाल,
मैंने कुछ बुनियादी बातों पर अपना स्पष्ट विरोध दर्ज करवाया था और दुबारा किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता मैं नहीं समझता हूँ ! कुछ समय से आपकी तकलीफ को, पूरी इज्ज़त देते हुए समझने की कोशिश कर रहा था अतः आपमें दिलचस्पी स्वाभाविक थी ! फिरदौस बहन का लेख मेरे विचार से एक सामान्य व्यंग्य था जिसमें उन्होंने हमारे देश में मुस्लिम लड़कियों के साथ, समाज की कुछ रूढ़िवादिता पर उंगली उठाई थी ! आप जैसे विद्वान् का , एक चटपटा शीर्षक के साथ फिरदौस के शब्दों को तोड़ मरोड़ कर यह कहना कि "वस्त्र बुराई की जड़ हैं " और वह भी फिरदौस की तरफ से , यह मेरे गले नहीं उतर सका और फलस्वरूप आपसे यह शिकायत की !
फिरदौस ने क्या कहा यह एक नादान बच्चा भी उस लेख को पढ़कर समझ जायेगा मगर फिर भी आपने हकीकत नज़रंदाज़ करते हुए,जानबूझ कर भीड़ इकट्ठा करने हेतु, फिरदौस पर आरोप लगाया है जिससे मेरे मन में आपकी छबि यकीनन खराब हुई है ! आपके द्वारा हमारे धर्म के बारे में लिखे कुछ लेख और यह नवीन घटना इस बात का संकेत देती है कि आप मात्र भीड़ इकट्ठा और अपनी तारीफ़ करवाने का शौक रखते हैं !
अनवर भाई! आपने, अपनी काबिले तारीफ़ बुद्धि के साथ, जो स्वयं रचित प्रभामंडल बना लिया है , उसको तोड़कर आपको सही रास्ता दिखाने की कोशिश करना, मेरे जैसे साधारण बुद्धि वाले इंसान के बस की बात नहीं और न ही मैं आपको सुधारने का प्रयत्न करने वाला हूँ !
हाँ आखिरी प्रार्थना अवश्य है कि अपनी विवेचना सिर्फ अपने धर्म के लिए रखें दूसरों की श्रद्धा के बारे में आपको कुछ भी बोलने से परहेज रखना चाहिए ! ऐसी बातों से केवल कडवाहट ही पैदा होती है, चाहे आप अपनी बात कहने में कितने ही ईमानदार क्यों न हों ! यही अपेक्षा मैं आपके विरोधियों से भी रखता हूँ
कृपया आगे कोई प्रश्न ना पूंछे क्योंकि नितांत सुर्ख़ियों में रहना आपके लिए आवश्यक हो सकता है मेरे लिए बिलकुल नहीं , और इस निरर्थक और जहरीली बहस से बचने के लिए, यह आवश्यक भी है !
शुभचिंतकों को हमारा राम-राम और .... को सलाम...
दिमाग से पैदल कुतर्कियों को क्या कहें?
@सतीश सक्सेना
डॉ अनवर जमाल,
मैंने कुछ बुनियादी बातों पर अपना स्पष्ट विरोध दर्ज करवाया था और दुबारा किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता मैं नहीं समझता हूँ ! कुछ समय से आपकी तकलीफ को, पूरी इज्ज़त देते हुए समझने की कोशिश कर रहा था अतः आपमें दिलचस्पी स्वाभाविक थी ! फिरदौस बहन का लेख मेरे विचार से एक सामान्य व्यंग्य था जिसमें उन्होंने हमारे देश में मुस्लिम लड़कियों के साथ, समाज की कुछ रूढ़िवादिता पर उंगली उठाई थी ! आप जैसे विद्वान् का , एक चटपटा शीर्षक के साथ फिरदौस के शब्दों को तोड़ मरोड़ कर यह कहना कि "वस्त्र बुराई की जड़ हैं " और वह भी फिरदौस की तरफ से , यह मेरे गले नहीं उतर सका और फलस्वरूप आपसे यह शिकायत की !
फिरदौस ने क्या कहा यह एक नादान बच्चा भी उस लेख को पढ़कर समझ जायेगा मगर फिर भी आपने हकीकत नज़रंदाज़ करते हुए,जानबूझ कर भीड़ इकट्ठा करने हेतु, फिरदौस पर आरोप लगाया है जिससे मेरे मन में आपकी छबि यकीनन खराब हुई है ! आपके द्वारा हमारे धर्म के बारे में लिखे कुछ लेख और यह नवीन घटना इस बात का संकेत देती है कि आप मात्र भीड़ इकट्ठा और अपनी तारीफ़ करवाने का शौक रखते हैं !
अनवर भाई! आपने, अपनी काबिले तारीफ़ बुद्धि के साथ, जो स्वयं रचित प्रभामंडल बना लिया है , उसको तोड़कर आपको सही रास्ता दिखाने की कोशिश करना, मेरे जैसे साधारण बुद्धि वाले इंसान के बस की बात नहीं और न ही मैं आपको सुधारने का प्रयत्न करने वाला हूँ !
हाँ आखिरी प्रार्थना अवश्य है कि अपनी विवेचना सिर्फ अपने धर्म के लिए रखें दूसरों की श्रद्धा के बारे में आपको कुछ भी बोलने से परहेज रखना चाहिए ! ऐसी बातों से केवल कडवाहट ही पैदा होती है, चाहे आप अपनी बात कहने में कितने ही ईमानदार क्यों न हों ! यही अपेक्षा मैं आपके विरोधियों से भी रखता हूँ
कृपया आगे कोई प्रश्न ना पूंछे क्योंकि नितांत सुर्ख़ियों में रहना आपके लिए आवश्यक हो सकता है मेरे लिए बिलकुल नहीं , और इस निरर्थक और जहरीली बहस से बचने के लिए, यह आवश्यक भी है !
शुभचिंतकों को हमारा राम-राम और .... को सलाम...





29 Comments:
शाबाश....शाबाश.... शाबाश......शाबाश...
pehli baar apka blog padha...bahut marmik vishay chun kar uthaya gaya hai..kafi had tak apki baat se sehmat hu ki jab tak aurat aurat ki dushman hai aurat ki halat nahi sudhar sakti...lekin is aurat k dushman hone me bhi ek baat ye hai ki aadmi apni makkari se apne swarth k liye aurat k kandhe par bandook rakh kar chalata hai..apna matlab sidhh karta hai aur usi ko mohra bana kar aurat ke khilaf khada kar deta hai...aur aurat pyar me andhi galat aur sahi ki pehchan kiye bina apni ankho par aadmi namak fareb ka chashma chadha kar usi ki juban bolti hai aur aurat hi aurat ki dushman ho jati hai.
वक्त आ गया है कुरआन की सही से विवेचना हो . कठ्मुल्लाओ ने अपने हिसाब से पेश की है इसका अर्थ . खुदा के द्वारा तो इतना भेद भाव नही हो सकता अपने ही बनाये आदमी और औरत मे
1 shariat ka qanoon mardo awur orton ke lie barabar he please quraan padhen
2 jese ourat ke lie pada zaroori he (na ki burqa)ease hi mardon ke lie dadhi zaroori he koie mane ia na mane
3 swah bano ko shariat ne to insaf dia he bas aap ki samajh ka pher he aakhir jo pati aap ko chodh raha he yeh aorten us ki poonch se khache ke nam par kion badh kar rahna chahti hen ?
4 pirye firdos ji.,, kia aap ko nin maloom ke balatkari pati ki saza mot hae aor jab balatkari kw mot ki saza dedi ja e to phir kon pati aor kon patni eh viwad kesa?
pleas quraan padhen
MUHAMMAD ASLAM QASMI
बहुत ज्वलंत प्रश्न किसी के भी पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं होगा "
शरियत कानून अरबियन कबीलों के लिए बनाया गया था। ना की पुरे संसार के लिए। धर्म कभी भी देश के संविधान से बड़ा नहीं हो सकता। धर्म समाज को बनता है , धर्म समाज को आपस में जोड़ने की व्यस्था है।
शरिया कानून आज किसी को भी पसंद नहीं है, और आप सही कह रही हैं की शरिया कानून सिर्फ महिलावो पर ही क्यों लागु होते है मर्दों पर क्यों नहीं। क्यों कुछ मुस्लमान मर्द दाढ़ी और मूंछे नहीं रखते, क्यों नहीं शरिया कानून उनको दण्डित करता जो बलात्कार, लूट और चोरी जैसी घटनावो में शामिल रहते हैं।
दिल्ली में एक कहावत है की सावन के महीनो में दिल्ली में चोरी की घटनाये कम हो जाती हैं। क्योंकि लगभग सारे चोर कावंड लेने के बहाने हरिद्वार चले जाते हैं, उसी तरह बहुत से मुष्लिम अपराधी अपराध करने के बाद जमात में चले जाते हैं। उस समय शरिया कानून कंहा होता है।
इसका जबाब किसी भी धार्मिक ब्लोगरो के पास नहीं होगा। उन्हें तो बस हिन्दुस्तानी समाज और हिन्दुस्तानी परंपरा के अन्दर बुराई खोजनी है और वे लोग चाहते हैं की हिंदुस्तान में भी अरबियन समाज के तौर तरीके लागू किये जाय।
फिरदौस जी, आप एक नेक काम कर रही हैं. लगभग तमाम पुरुषों की मानसिकता एक ही जैसी होती है, लेकिन मुस्लिम पुरुष इस्लाम, कुरआन और शरीयत का सहारा लेकर शोषण करने में आगे हैं..
आप के साथ हम सब हैं...
आपकी बात सही है. इसके आलावा, शरिया पर्सनल ला की बात करने वाले लोग शरिया के क्रिमिनल ला की मांग क्यों नहीं करते?
फ़िरदौस जी, आप लाजवाब हैं.
आपके सवालों का किसी के पास कोई जवाब नहीं. आपके सभी लेख पढ़े.
यह भी देखा कि किसी ने भी आपके सवाल का जवाब नहीं दिया.
आश्चर्य तो इस बात का है, जो महिला खुद पर्दा नहीं करती- वो पर्दा-पर्दा चिल्ला रही है.
यहाँ तक कि उसने खुद ने पश्चिमी लिबास पहना है.
क्या इसका मतलब आप खुद पर्दाप्रथा को नहीं मानती???
खुद करो तो ठीक, और कहे तो भी हो-हल्ला!!!
लगता है वह केवल विरोध के लिए ही विरोध कर रही है???
दुःख की बात यह भी है कि उसे शाहबानो और इमराना के खून के आंसू नहीं दिखते.
आपका एक-एक सवाल ज्वलंत है.
औरतें तो बुर्क़े में रह लेंगी...सदियों से रहती आई हैं...ग़ुलामी उनके खून में बस चुकी है...
क्या मर्द यूं ही दाढ़ी मूंडे फिरेंगे...???
उन पर दाढ़ी रखने का दबाव क्यों नहीं...???
अगर इस मामले में मर्दों के साठ जोर-ज़बरदस्ती नहीं तो औरतों के साथ क्यों...???
शुभकामनाओं के साथ
नारी शक्ति जिन्दाबाद
wah ji wah bahut sahikaha aapne aap bilkul 100 aane sach bol rahi hai bata do duniya ki aaj ki raari abla nahi sabla hai
@Aslam Qasmi
यहां बात 'क़ुरआन' की नहीं है...'क़ुरआन' में क्या है और क्या नहीं...यह बहस का मुद्दा नहीं है...
बात व्यवस्था की है, उस व्यवस्था की जो मज़हब की आड़ में औरत का मानसिक और शारीरिक शोषण करती है...
सवाल यह है की औरतों को खिलाफ फतवे देने वाले बलात्कारी मर्दों को सज़ा देने के मामले भी क्यों चुप्पी साध जाते हैं...???
आप कठमुल्लाओं से क्यों नहीं कहते कि वो 'क़ुरआन' पढ़ें और इंसाफ़ करें...
क्या इमराना, रानी और हरियाणा की महिला के साथ बलात्कार करने वाले उनके ससुरों (बहुवचन) को मौत की सज़ा सुनाई गई...???
जिस शरीयत का ढोल पीटा जा रहा है...उस शरीयत ने इन मज़लूम औरतों के साथ इंसाफ़ क्यों नहीं किया...???
बलात्कार भी इन्हीं का हुआ और सज़ा भी इन्हें ही मिली...वाह रे कठमुल्लाओं के क़ानून...???
@Smart Indian - स्मार्ट इंडियन
जिस दिन हिन्दुस्तान में 'शरीया पर्सनल ला' के साथ 'शरिया क्रिमिनल ला' भी लागू हो गया तो मज़हब के यही ठेकेदार भागे-भागे फिरेंगे...
Waah, Firdaus Ji !! Aapki Is Muhim Mein Hum Sab Aapke Saath Hain !! Aap Apne Mission Mein Kaamyaab Ho, Aisi Duaa Karte Hain !! Aapki Lekhni Ki AAg Maine Mahsoos Ki Hai !! Tamaam Shubhkaamnaayen Aapke Saath Hain !!
@ फ़िरदौस ख़ान,
जिस दिन हिन्दुस्तान में 'शरीया पर्सनल ला' के साथ 'शरिया क्रिमिनल ला' भी लागू हो गया तो मज़हब के यही ठेकेदार भागे-भागे फिरेंगे..
नाईस
nice
आप एक्दम सही कह रही हैं और सही सवाल पूछ रहीं हैं। औरतों की हालत तभी सुधरेगी जब वो सवाल करें और चुपचाप अपने ऊपर होते जुल्मों को सहन न करें। हो सकता है कि शुरु शुरु में धर्म के ठेकेदार उन्हें चुप कराने में कामयाब रहें पर फ़िर भी बार बार सवाल करने से एक न एक दिन बदलाव आयेगा। कहते हैं न कि कच्ची मिट्टी का घड़ा भी जिस चट्टान पर रो्ज रखा जाता है वहां ्धीरे धीरे गड्डा पड़ जाता है। खुदा करे कि आप जैसी सवाल करने वाली महिलाओं का कुन्बा और बड़े । आमीन
ठीक कहा फिरदौस आपने,
औरत जब तक औरत की दुश्मन रहेगी, औरतों की हालत नहीं सुधरेगी...
दहेज की राशियां घर की औरतें तय करती हैं... बहुओं को जलाने के लिए सास-ननदें ही माकूल माहौल बनाती हैं... घर के किसी परिचित या रिश्तेदार ने बेटी की इज्जत से खेलने की कोशिश की तो सबसे पहले मां या घर की अन्य औरतें ही बेटी की आवाज दबाने आगे आती हैं।
कुल मिलाकर यह कि औरतों को अपनी गुलाम मानसिकता बदलनी होगी। और जब तक यह नहीं होता, पुरुष उनकी अस्मिता के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे। और मुझे नहीं लगता इसके लिए किसी शरिया का अन्य कानून की जरूरत है। आजादी और गरिमामय जिंदगी पाने का अधिकार सबका है...बस यही एक हथियार है जिसके सहारे आप स्त्रियां शोषण और गुलामी के ख़िलाफ़ लौ जला सकती हैं। इसके लिए स्त्रियों को अपनी मानसिकता से उबरना होगा।
बहुत ही सटीक कहा आपने...
जिस प्रकार मुस्लिम महिलायें उत्पीडित होती हैं और मुस्लिम पुरुष धर्म की आड़ लेकर प्रसन्नमना खुले घुमते हैं,उन्हें सोचने को मजबूर करना मानव मात्र का कर्तब्य है...
इसी की आवश्यकता है, सभी को अपने अपने पर्सनल कानून में सुधार औऱ उसे लागू करने के लिए संघर्ष आरंभ करना चाहिए।
हमारा देश एक धर्मनिरपेक्ष देश है, तो अलग-अलग धर्मों के लिये अलग-अलग पर्सनल ला का क्या मतलब? पूरे देश में एक जैसा कानून लागू होना चाहिये.
फ़िरदौस, मैं आपके साहस की प्रसंशा करती हूँ. हम सभी न्यायप्रिय लोग आपके साथ हैं.
Have Islamic fundamentalists degraded muslim women such severely that they consider their chains their ornaments?
Just like a pet-dog who seeks his leash aggressively every morning so that he can go for a walk.
That's the happiest moment of his day as he runs to his master, tail wagging furiously, the leash in his mouth.
He jumps with joy when he's tied with the leash.
He loves his leash dearly... It's of tremendous value to him.
Does it free him, or bind him?
Only that who has tasted real freedom away from the shackles of a leash know what it means.
Any woman who has tasted that freedom will only have scorn for the burqah and hate for those who strive to hide her behind their archaic and oppressive customs.
Thnak you for being so bold and free in this country where everyone seems so afraid to talk.
बहुत अच्छा और सटीक लिखा आपने
कोई भी व्यवस्था एक तरफ़ा नहीं ही होनी चाहिए।
सहमत हैं आपसे।
बेहद सटीक आलेख....
कुतर्कियों से किसी माकूल जवाब की अपेक्षा करना भी किसी मूर्खता से कम नहीं...बिना यथार्थ को जाने,समझे हर बात में धार्मिक ग्रन्थों की दुहाई देना और जब कोई सवाल उठाए तो उन सवालों से बचने के लिए चुप्पी साध लेना ही इन लोगों को सिखाया गया है...ओर तो ओर "अंजुम शेख" नाम की जिस ब्लागर महिला की वाह! वाह! की जा रही है, उसके विचारों से सहमति दर्शायी जा रही है, उसकी शान में कसीदे पढे जा रहे हैं....दरअसल वो कोई वास्तविक चरित्र न होकर के आपके विचारों का विरोध करने, आपको गलत साबित करने और अपनी कमियों पर पर्दा डालने हेतु ही इन लोगों द्वारा एक काल्पनिक करैक्टर गढा गया है...
बहन फ़िरदौस,
तर्कों की आड़ लेकर लफ़्ज़ों की जंग जीत सकती हैं, बल्कि इस पर आप अग्रसर भी हैं. मेरी शुभकामनाएं आपके साथ. सवाल लेकिन अभी भी वहीँ है "क्या आप सच्चाई को बदल सकती हैं!!!???"
"आख़िर में भाइयों ने हमारी बात का तर्क के साथ सार्थक जवाब देने के बजाय कुतर्कों के लिए एक औरत को ही आगे कर दिया..."
हा-हा-हा फिरदौस जी , अपने इस ब्लॉगजगत के अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ कि इसकी भी कोई गारंटी नहीं है कि वो मोहतरमा ही है , क्योंकि भाई लोगो को परदे के पीछे औरत बनने की महारथ भी हासिल है !
दो प्रश्न !
औरत, दौलत और भोजन को परदे में रखना चाहिए यह बात किस महापुरूष ने कही है ?
और क्यों कही है ?
उत्तर की प्रतीक्षा !111
फ़िरदौस साहिबा, आपके जज़्बे और हिम्मत को हमारा सलाम!
यक़ीनन आने वाली पीढ़ियां आपका नाम फ़क्र से लेंगी और आप युवाओं की आदर्श बनेंगी.....
आपका एक-एक लफ़्ज़ सही है.....
दरअसल, ये जो नए लोग तथाकथित 'पढ़े-लिखे' यही इस्लाम का बेड़ा गर्क करेंगे.....
इस मुहिम में आज बेशक आप अकेली मुस्लिम लड़की हैं, वो दिन दूर नहीं, जब करोड़ों औरतें गुलामी का प्रतीक बुर्क़ा उतार कर फ़ेंक देंगी और आपके साथ खड़ी नज़र आएंगी.....
आपको हमारी दुआएं....अल्लाह आपको आपके नेक काम में कामयाबी बख्शे.....आमीन !!!
जिस दिन हिन्दुस्तान में 'शरीया पर्सनल ला' के साथ 'शरिया क्रिमिनल ला' भी लागू हो गया तो मज़हब के यही ठेकेदार भागे-भागे फिरेंगे...
बहुत सही बात आप्को पढ़ कर ऐसा लग रहा है जैसे खुद को ही पढ़ रहा हूँ कहने का मतलअब सिर्फ ये है कि इस बारे में आपके विचार इस विषय पर मेरे विचारो से काफी मिलते है.
जिस दिन शरिया क्रिमिनल law लागु करने कि घोषणा होगी उस दिन कठमुल्ले भी युनिफोर्म सिविल कोड कि वकालत करने लगेंगे.
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