पर्दा (बुर्क़ा) मेरा हक़ है, लेकिन मैं पहनूंगी पतलून...
'बहन जी' की 'कथनी और करनी' तो यही बयान कर रही है...('बहन जी' की फ़ोटो देखी जा सकती है)
हमारे एक लेख ने 'बहन जी' को लिखने को मजबूर कर दिया.
बक़ौल 'बहन जी' "मैं एक साधारण सी गृहणी हूँ. हिंदुस्तान से बाहर रहती हूँ और आजकल अपने प्यारे वतन आई हुई हूँ. कोई लेखक नहीं हूँ, मगर फिरदौस जी के लेख ने मुझे मजबूर किया यहाँ लिखने के लिए."
'बहन जी' के विचार
सबसे अहम बात 'बहन जी' जिस पर्दे (बुर्क़े) को अपना अधिकार बता रही हैं, उस बुर्क़े को वो ख़ुद नहीं पहनतीं...यानी वो ख़ुद बुर्क़े के खिलाफ हैं...
बहन जी का चेहरा भी ढका हुआ नहीं है...इतना ही नहीं 'बहन जी' तो हिन्दुस्तानी लिबास तक नहीं पहनतीं...
उनके ब्लॉग और हमारी अंजुमन पर लगे फ़ोटो में 'बहन जी' पश्चिमी लिबास 'धारण' किए हुए दिखाई दे रही हैं...
'बहन जी' की जानकारी के लिए... इस्लाम में इस तरह का लिबास पहनने की सख्त मनाही है...'बहन जी' जैसा लिबास पहनने पर शरीया के तहत मुस्लिम औरतों को कोड़े मारे जाते हैं...
मिसाल : पिछले साल जुलाई में उत्तरी सूडान में इस्लामिक क़ानून लागू है और इसके मुताबिक़ महिलाओं का पतलून पहनना ‘अपराध’ है. सूडान के नैरोबी में एक महिला पत्रकार पर सिर्फ़ इसलिए 40 कोड़े बरसाए गए कि उसने उत्तरी सूडान के शरीया की नाफ़रमानी करते हुए पतलून पहनने का ‘अपराध’ किया था. स्तंभकार और सूडान में संयुक्त राष्ट्र की सूचना अधिकारी लुबना अहमद हुसैन को खारतूम से 13 अन्य महिलाओं के साथ गिरफ़्तार किया गया था. लुबना के साथ गिरफ्तार 10 अन्य महिलाओं को 10-10 कोड़े मारे गए. इन महिलाओं ने खुद पर कोड़े बरसाए जाने के दृश्य को देखने के लिए स्थानीय और विदेशी पत्रकारों को आमंत्रित किया था.
बहन जी का कहना है "अल्लाह ने कुरआन में मर्दों और औरतों को अपनी आंख्ने नीची करने, और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करने का हुक्म दिया है. वहीँ औरतों को ऐसे कपडे पेहेन्ने का हुक्म दिया है, जिसे उनका बदन अच्छी तरह से ढका रहे."
हमारा सवाल
क्या साड़ी या सलवार कमीज़ पहनने वाली औरतों का जिस्म ढका हुआ नहीं होता...???
साड़ी का पल्लू और दुपट्टा सर ढकने का काम बखूबी कर सकता है... और करता भी है...
फिर इसके लिए बुर्क़े की ही ज़रूरत क्यों...???
क्या सिर्फ़ यह साबित करने के लिए हम 'मुसलमान' हैं...
हैरानी की बात यह भी है कि 'बहन जी' बुर्क़े के लिए अपनी आखिरी सांस तक क़ानूनी लड़ाई लड़ने का दावा कर रही हैं और अपनी कौम की औरतों की 'बेइज्ज़ती' (क़त्ले-आम, सरेआम कोड़े मारने, उनका बलात्कार ) करने वालों का समर्थन कर रही हैं... क्या बुर्क़ा किसी औरत की आबरू और उसकी जान से भी ऊंचा दर्जा रखता है...???
अब 'बहन जी' की लिखने की मजबूरी के बारे में चंद सवाल
जब इमराना और रानी जैसी महिलाओं के बलात्कारी ससुरों (बहुवचन) के पक्ष में फ़तवे दिए जा रहे थे... और इन मज़लूम औरतों को इंसाफ़ देने के बजाय इन्हें खून के आंसू रुलाया जा रहा था... तब 'बहन जी' लिखने के लिए मजबूर क्यों नहीं हुईं...???
जब इन औरतों को अपने ससुर को 'पति' और पति को 'पुत्र' मानने पर मजबूर किया जा रहा था... तब 'बहन जी' लिखने के लिए मजबूर क्यों नहीं हुईं...???
हमारे लेख से ऐसी कौन-सी क़यामत आ गई थी कि लेख पढ़ते ही 'बहन जी, ने ब्लॉग बना डाला...
इतना ही नहीं उस लेख को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को पढ़वाने के लिए बेचैन हो उठीं...!!!
इसके लिए लेख लिखते ही ब्लोग्वानी और चिट्ठाजगत से भी संपर्क कर डाला...
जब यहां दाल नहीं गली तो (दाल गलने में वक़्त लगता है) ब्लोग्वानी और चिट्ठाजगत से जुड़े ब्लॉग हमारी अंजुमन पर ही लेख पोस्ट कर डाला...
कहीं ऐसा तो नहीं कि दाल में कुछ काला है...वैसे हमें तो पूरी दाल ही काली दिखाई देती है...
'बहन जी'
कहीं ऐसा तो नहीं कि "हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और"
या फिर "ख़ुद मियां फ़ज़ीहत और दूसरों को नसीहत..."
क्योंकि हमने तो नहीं देखा कि मुस्लिम परिवारों की साधारण गृहणियां ऐसा लिबास पहनती हैं...???
साधारण तो किया हमने तो किसी ख़ास परिवार में भी ऎसी 'गृहिणी' नहीं देखी...
क्या किसी ने मुस्लिम परिवार में ऎसी 'साधारण गृहिणी' देखी है...???
अपने इस्लाम विरोधी लिबास के बारे में 'बहन जी' और 'बहन जी' की मंडली वालों का क्या कहना है...???
हम यह लेख लिखना नहीं चाहते थे, लेकिन जब अति हो गई तो जवाब देना भी ज़रूरी था...
अफ़सोस की बात तो यह है कि कुछ भाइयों से जब हमारे सवालों के जवाब नहीं दिए गए तो उन्होंने एक महिला के कंधे पर बंदूक़ रखकर चला दी...
@प्रवीण शाह
यह सब लिखने का हमारा शौक़ नहीं है...
लेकिन यह सब लिखे बगैर जवाब मुकम्मल नहीं होता...
'लिबास' और 'नीयत' और 'वजूद' पर 'बहन जी' ने ही पहले सवाल उठाए हैं...
हो सके तो आप हमारे लेख को फिर से पढ़िए...
'बहन जी' शरीया लिबास की वकालत करती हैं, लेकिन खुद वो लिबास पहनती हैं, जिसकी शरीयत में सख्त मनाही है... यहां तक कि ऐसा लिबास पहनने पर औरतों को कोड़े खाने पड़ते हैं...
विरोधाभास तो 'बहन जी' की कथनी और करनी' में साफ़ दिख रहा है...
'बहन जी' की मंडली के लोग चीख़-चीख़ बुर्क़े से चेहरा ढकने की बात कर रहे हैं...
और अपनी मंडली की वकालत करने के लिखने को मजबूर हुई 'बहन जी' खुद मुंह खोले बैठी हैं...
@zeashan zaidi
हम बुर्क़े के ख़िलाफ़ हैं, सर ढकने के नहीं...
मुसलमान ही नहीं दूसरे मज़हबों की औरतें भी सर ढकती हैं...
लेकिन वो 'बुर्क़ा' नहीं पहनतीं...
आपने 'बहन जी' के लिबास के बारे सफ़ाई दी-
"कौन कहता है की ये पर्दा नहीं है! ये पूरी तरह इस्लामी हिजाब है और ईरानियों व शीयों में परदे का यही तरीका प्रचलन में है."
लेकिन यह बुर्क़ा तो क़तई नहीं है... क्या आपने बुर्क़ा नहीं देखा है...???
या 'बहन जी' की तस्वीर ठीक से नहीं देखी...???
अब रही ईरानियों के परदे की बात... तो आप किस देश के क़ानून का पालन करते हैं...???
या फिर जिस देश का क़ानून अपनी स्वार्थ सिद्धि करे, उसकी पूंछ पकड़ कर बैठ जाओ , और स्वार्थ पूरा न होता हो तो अपने देश के क़ानून को भी ठेंगा दिखा दो (जैसा हिन्दुस्तान में किया जाता है)...
एक सवाल और... 'बहन जी' के लिबास के बारे में आपके क्या विचार हैं...???
क्योंकि 'बहन जी' ने जो लिबास पहना है, वो शरीयत के ख़िलाफ़ है... और इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ ऐसा लिबास पहनने वाली महिलाओं को सरेआम कोड़ों से पीटा जाता है...
है कोई जवाब आपके पास...???
'बहन जी'
कहीं ऐसा तो नहीं कि "हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और"
या फिर "ख़ुद मियां फ़ज़ीहत और दूसरों को नसीहत..."
क्योंकि हमने तो नहीं देखा कि मुस्लिम परिवारों की साधारण गृहणियां ऐसा लिबास पहनती हैं...???
साधारण तो किया हमने तो किसी ख़ास परिवार में भी ऎसी 'गृहिणी' नहीं देखी...
क्या किसी ने मुस्लिम परिवार में ऎसी 'साधारण गृहिणी' देखी है...???
अपने इस्लाम विरोधी लिबास के बारे में 'बहन जी' और 'बहन जी' की मंडली वालों का क्या कहना है...???
हम यह लेख लिखना नहीं चाहते थे, लेकिन जब अति हो गई तो जवाब देना भी ज़रूरी था...
अफ़सोस की बात तो यह है कि कुछ भाइयों से जब हमारे सवालों के जवाब नहीं दिए गए तो उन्होंने एक महिला के कंधे पर बंदूक़ रखकर चला दी...
@प्रवीण शाह
यह सब लिखने का हमारा शौक़ नहीं है...
लेकिन यह सब लिखे बगैर जवाब मुकम्मल नहीं होता...
'लिबास' और 'नीयत' और 'वजूद' पर 'बहन जी' ने ही पहले सवाल उठाए हैं...
हो सके तो आप हमारे लेख को फिर से पढ़िए...
'बहन जी' शरीया लिबास की वकालत करती हैं, लेकिन खुद वो लिबास पहनती हैं, जिसकी शरीयत में सख्त मनाही है... यहां तक कि ऐसा लिबास पहनने पर औरतों को कोड़े खाने पड़ते हैं...
विरोधाभास तो 'बहन जी' की कथनी और करनी' में साफ़ दिख रहा है...
'बहन जी' की मंडली के लोग चीख़-चीख़ बुर्क़े से चेहरा ढकने की बात कर रहे हैं...
और अपनी मंडली की वकालत करने के लिखने को मजबूर हुई 'बहन जी' खुद मुंह खोले बैठी हैं...
@zeashan zaidi
हम बुर्क़े के ख़िलाफ़ हैं, सर ढकने के नहीं...
मुसलमान ही नहीं दूसरे मज़हबों की औरतें भी सर ढकती हैं...
लेकिन वो 'बुर्क़ा' नहीं पहनतीं...
आपने 'बहन जी' के लिबास के बारे सफ़ाई दी-
"कौन कहता है की ये पर्दा नहीं है! ये पूरी तरह इस्लामी हिजाब है और ईरानियों व शीयों में परदे का यही तरीका प्रचलन में है."
लेकिन यह बुर्क़ा तो क़तई नहीं है... क्या आपने बुर्क़ा नहीं देखा है...???
या 'बहन जी' की तस्वीर ठीक से नहीं देखी...???
अब रही ईरानियों के परदे की बात... तो आप किस देश के क़ानून का पालन करते हैं...???
या फिर जिस देश का क़ानून अपनी स्वार्थ सिद्धि करे, उसकी पूंछ पकड़ कर बैठ जाओ , और स्वार्थ पूरा न होता हो तो अपने देश के क़ानून को भी ठेंगा दिखा दो (जैसा हिन्दुस्तान में किया जाता है)...
एक सवाल और... 'बहन जी' के लिबास के बारे में आपके क्या विचार हैं...???
क्योंकि 'बहन जी' ने जो लिबास पहना है, वो शरीयत के ख़िलाफ़ है... और इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ ऐसा लिबास पहनने वाली महिलाओं को सरेआम कोड़ों से पीटा जाता है...
है कोई जवाब आपके पास...???






39 Comments:
पर्दा ही तो वह माध्यम है जिससे औरतो को गुलाम बना के रखा जा सकता है वह चाहे बहनजी हो या कोई और .... यहाँ हिन्दू मुस्लिम भी मायने नहीं रखता.
फ़िरदौस, जहाँ तक ये मानने की बात है कि पर्दा किसी के व्यक्तिगत पसन्द की बात है, तो मैं भी इससे सहमत हूँ. अगर कोई अपने आप सिर या मुँह ढकना चाहता है तो इसमें कोई बुराई नहीं, मैंने "हमारी अंजुमन" पर अपनी टिप्पणी में इस बात का समर्थन भी किया है कि आप अगर पर्दा करना चाहें तो ठीक ये आपकी मर्ज़ी. लेकिन सवाल है कि कितनी औरतें ऐसा चाहती हैं? और जो औरतें पर्दा नहीं करना चाहतीं उनको इस बात का हक कौन दिलायेगा?
और रही बात औरत को आगे करने की, तो इनलोगों की ये हरकत इस बात का उदाहरण है कि हमेशा से पुरुष औरतों को एक-दूसरे के खिलाफ़ इस्तेमाल करते रहे हैं और इल्जाम देते हैं औरतों को कि "औरतें ही औरतों की दुश्मन होती हैं."
ये बहन जी की फोटू टांग कर कोई भाई साहब तो नहीं हैं?
Mujhe to ye Behan ji nahi balki Bhai saheb lagte hain. Photu behan ji ka laga rakha hai.
nice
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आदरणीय फिरदौस जी,
आपके लिखे का प्रशंसक रहा हूँ हमेशा... परंतु अपने इस आलेख में आप केवल आदरणीय अंजुम शेख के लिखे का ही जवाब देती तो अच्छा रहता, उनके लिबास, नीयत और वजूद पर ही सवाल उठा देना ठीक नहीं लग रहा यहाँ पर... हो सकता है आपका मत भिन्न हो मुझसे... पर सोचिये क्या मैं खुद एक नास्तिक होते हुऐ भी सभी को उनके अपने धर्म को मानने की स्वतंत्रता के लिये आवाज नहीं उठा सकता हूँ ?... विचार ही सार होता है बाकी चीजें गौण !
कौन कहता है की ये पर्दा नहीं है! ये पूरी तरह इस्लामी हिजाब है और ईरानियों व शीयों में परदे का यही तरीका प्रचलन में है.
@प्रवीण शाह
यह सब लिखने का हमारा शौक़ नहीं है...
लेकिन यह सब लिखे बगैर जवाब मुकम्मल नहीं होता...
'लिबास' और 'नीयत' और 'वजूद' पर 'बहन जी' ने ही पहले सवाल उठाए हैं...
हो सके तो आप हमारे लेख को फिर से पढ़िए...
'बहन जी' शरीया लिबास की वकालत करती हैं, लेकिन खुद वो लिबास पहनती हैं, जिसकी शरीयत में सख्त मनाही है... यहां तक कि ऐसा लिबास पहनने पर औरतों को कोड़े खाने पड़ते हैं...
विरोधाभास तो 'बहन जी' की कथनी और करनी' में साफ़ दिख रहा है...
'बहन जी' की मंडली के लोग चीख़-चीख़ बुर्क़े से चेहरा ढकने की बात कर रहे हैं...
और अपनी मंडली की वकालत करने के लिखने को मजबूर हुई 'बहन जी' खुद मुंह खोले बैठी हैं...
Very well said Firdaus ji !
@zeashan zaidi
हम बुर्क़े के ख़िलाफ़ हैं, सर ढकने के नहीं...
मुसलमान ही नहीं दूसरे मज़हबों की औरतें भी सर ढकती हैं...
लेकिन वो 'बुर्क़ा' नहीं पहनतीं...
आपने 'बहन जी' के लिबास के बारे सफ़ाई दी-
"कौन कहता है की ये पर्दा नहीं है! ये पूरी तरह इस्लामी हिजाब है और ईरानियों व शीयों में परदे का यही तरीका प्रचलन में है."
लेकिन यह बुर्क़ा तो क़तई नहीं है... क्या आपने बुर्क़ा नहीं देखा है...???
या 'बहन जी' की तस्वीर ठीक से नहीं देखी...???
अब रही ईरानियों के परदे की बात... तो आप किस देश के क़ानून का पालन करते हैं...???
या फिर जिस देश का क़ानून अपनी स्वार्थ सिद्धि करे, उसकी पूंछ पकड़ कर बैठ जाओ , और स्वार्थ पूरा न होता हो तो अपने देश के क़ानून को भी ठेंगा दिखा दो (जैसा हिन्दुस्तान में किया जाता है)...
एक सवाल और... 'बहन जी' के लिबास के बारे में आपके क्या विचार हैं...???
क्योंकि 'बहन जी' ने जो लिबास पहना है, वो शरीयत के ख़िलाफ़ है... और इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ ऐसा लिबास पहनने वाली महिलाओं को सरेआम कोड़ों से पीटा जाता है...
है कोई जवाब आपके पास...???
अरे यो कोई बहन जी नहीं ही बल्कि ये भाईसाहब की करतूत है
"और रही बात औरत को आगे करने की, तो इनलोगों की ये हरकत इस बात का उदाहरण है कि हमेशा से पुरुष औरतों को एक-दूसरे के खिलाफ़ इस्तेमाल करते रहे हैं और इल्जाम देते हैं औरतों को कि "औरतें ही औरतों की दुश्मन होती हैं."
ठीक बात है
आपके हौसले कि जो तारीफ करूं कम है.
यहां पर कुछ दोस्तों की प्रतिक्रिया आई है कि पर्दा/बुर्का मर्जी की बात है, जो चाहे वो करे तो जायज़ है.
लेकिन मेरा इस मामले में जुदा मशवरा है.
अगर कोई व्यक्ति बचपन से गुलाम और बदहाल हो, और अपनी बदहाली से इस कद्र बेफिक्र हो कि उसे वह नज़र ही न आये और वह अपने बचाने वालों की ही विरोध करे, तो भी इंसानियत यह कहती है कि उसे आजाद करना ही चाहिये. क्योंकि इंसाफ तो यही है.
औरतों की कमजोरी होती है कि वह अत्याचार तक को अपना लेती हैं, इसलिये सिंदूर, पर्दा, चूड़ियां, मंगलसूत्र, बिछुये आदी उन्हें कई बार जरूरी लगता है और वो इन सब symbols की symbolic value को नजरअंदाज़ कर देती हैं.
असल में हैं तो यह सब वही असबाब को औरतों को पुरुषों की मिल्कियत बनाता है, या जैसे कल्बे ज़व्वाद समझते हैं, बच्चे पैदा करने का आला.
जो लोग औरतों को बुर्के में रखने कि हवस के शिकार हैं उन्होंने उम्दा पश्चिमी लिबासों में तस्वीरें खिंचा रखी हैं और रोज़ाना ऐसे कई काम करते हैं जो अल्लाह ने शरियत में गुनाह करार दिये.
उनके लिये कोई मनाही नहीं है... लेकिन औरतों के हक की बात के विरोध में कोई नकली मोहतरमा खड़ी कर दीं जातीं है.
यह दोगलापन अब रुकना ही चाहिये.
फिरदौस जी अगर आप मुझसे सवाल कर रही हैं, तो कम से कम जवाब देने का अधिकार तो दीजिये.
मैंने बुरखे की हिमायत तो की ही नहीं है, मैंने तो परदे या हिजाब की हिमायत की है. ना ही मैंने यह कहा कि साड़ी या सलवार कमीज़ पहनने वाली औरतों का जिस्म ढका नहीं होता. हाँ कपडे ढीले-ढाले तथा पारदर्शी नहीं होने चाहिएं और सर ऐसी तरह ढका होना चाहिए कि सर के बाल नज़र ना आएं.
जहाँ तक बात मेरे ब्लॉग पर लगे फोटो के लिबास की है, तो मैंने कल ही किसी को (शायद डॉ. अनवर जमाल के लेख में) जवाब देते हुए बताया था कि यह फोटो मेरी नहीं है. क्योंकि बात हिजाब की चल रही थी, इसलिए मैंने यह फोटो लगाना ही मुनासिब समझा. क्या आप यह सिद्ध कर सकती हैं कि यह लिबास इस्लाम के खिलाफ है? आप कुरान या सहीह हदीस में से किसी एक का भी सहारा लेकर यह सिद्ध कर दीजिये की यह लिबास इस्लाम के हिसाब से गलत है.
इस्लामी कानून किसी देश से बंधा हुआ नहीं होता. क्या आप सिर्फ तालिबानियों के कानूनों को इस्लामी कानून मानती हैं? रही बात अपने देश की तो लखनऊ की मजलिसों में जाकर देखिये वहाँ औरतें इसी तरह के परदे में दिखेंगी. परदे का यह तरीका पूरी तरह इस्लामी है और अगर ऐसा न होता तो अब तक इसके खिलाफ फतवा आ चुका होता.
अब बात करते हैं कपड़ों की, तो इन कपड़ों में ऐसा कुछ नहीं जिसपर एतराज़ किया जाए. शरीयत के बाहर कुछ भी नहीं. यकीन न आये तो मौलाना कल्बे जव्वाद से पूछ लीजिये. (जिनको आप पूरी तरह कट्टर मानती हैं.)
अब आते हैं बुर्के पर. तो बुर्के की परिभाषा अलग अलग जगहों पर अलग अलग है. इस्लाम हिजाब की बात करता है, अब कोई औरत कितना हिजाब मुनासिब समझती है यह उसपर निर्भर है. और परदे पर या बुर्के पर रोक लगाना पूरी तरह एक औरत के मौलिक अधिकारों का हनन है.
KHER MERA PANGA BAHUT KAM PADTA HE PARDE WALO SE
SHKEHAR KUMAWAT
http://kavyawani.blogspot.com/
firdous sahiba. agar HAR KISI se uljhtee rahin to kuch nahin kar payengee. un logon ko apna kam karne diyeye. aap apna kaam karein. HAMARI ANJUMAN kuch logon kee bapoti bankar rah gaya hai. in logon ka kaha AAKHREE SACH hota hai. jaise maine inke haal par chod diya hai, aap bhee chod dein
ek baat kehna bhool gaya. PARDA-PARDA chillane wale logon kee aurton ko meine BE PARDA aur FULL MAKEUP mein shdiyon ayr baazaron mein ghoome dekha hai. in logon ka apne hgar par to bus chalta nahin. dusron ko nasihat dene mein aage rahte hain.
अच्छा है....मेरी भी बुद्धि खुल रही है....
मैं भी कुछ कहना चाह रहा हूं लेकिन अभी यहां के हालात देख कर कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूं.
बहरहाल मैं तो यही कहूंगा कि इस युग में इन बातों को इतना तूल देकर इतना महत्वपूर्ण न बनाया जाये. रही बात फिरदौस जी तो आप तो इन मुद्दों पर क्यों इतना ध्यान दे रही हैं. जहां तक मैं आपको जितना जानता हूं आपके पास विषय अभी और भी हैं.
Today, just reading...
No Comments.
Madam Firdaus, You have exceptional skill of writing, I had gone through the "Hamari Anjuman" also, but you are ultimate, and doing good job for backward Muslim Women, Thanks a lot.
सिर्फ़ इतना ही कि .......करारा लेखन और जबरद्स्त तेवर ..। शुभकामनाएं
अजय कुमार झा
फिरदौस जी, सही लिखने और कहने वालों को लोग पागल कहते हैं. कापरनिकस को जिन्दा जला दिया गया था..
आप ने बेहद अच्छा मुद्दा उठाया है, पीछे कदम मत हटायियेगा, यकीन मानिये कि यह ट्रांजिशन पीरियड है इस्लाम के लिये और आप जैसे ही कुछ खुले दिमाग के भारतीयों के लिये जिसमें महफूज जी, सर्वत जी, फौजिया जी जैसे लोग शामिल हैं...
मैं आपके जज्बे और हौसले को सैल्यूट करता हूं..
यदि दस प्रतिशत मुस्लिम भी आपके जैसे हो जायें तो साम्प्रदायिक झगड़े भी खत्म हो जायें और कट्टरपंथी मौलानाओं की दुकान भी..
शुभकामनायें..
Firdaus ji,
aapke liye meri taraf se ek hi shabd hai...
"SALUTE"
AND I MEAN IT...REALLY...!!
फिरदौस बेहतर है बुर््काबाजी करें या ना, ये छोड़कर, बू््र््का पहनने के मूल समझ, ये तय करें की आज के माहौल में इसकी उपयोगिता है भी या नहीं ..... तथाकथित बुद््धीजीवियों के कमेंट पर न जायें .... ये डरपोक हैं ...सब जानते हुये भी ये मूल पर विचार से कतराते हैं ... डर है कि कहीं उन््हें सो कॉल््ड समझदार वर््ग वेवकूफ समझ बहीष््कृत न कर दे ...
फ़िरदौस साहिबा, आपके जज़्बे और हिम्मत को हमारा सलाम!
यक़ीनन आने वाली पीढ़ियां आपका नाम फ़क्र से लेंगी और आप युवाओं की आदर्श बनेंगी.....
आपका एक-एक लफ़्ज़ सही है.....
दरअसल, ये जो नए लोग तथाकथित 'पढ़े-लिखे' यही इस्लाम का बेड़ा गर्क करेंगे.....
इस मुहिम में आज बेशक आप अकेली मुस्लिम लड़की हैं, वो दिन दूर नहीं, जब करोड़ों औरतें गुलामी का प्रतीक बुर्क़ा उतार कर फ़ेंक देंगी और आपके साथ खड़ी नज़र आएंगी.....
आपको हमारी दुआएं....अल्लाह आपको आपके नेक काम में कामयाबी बख्शे.....आमीन !!!
फिरदौस जी ! आपने बेहद नाज़ुक विषय पर कलम चलाई है ....और हिम्मत से चलाई है ,जो लोग आपको अन्य विषयों पर लिखने या कल्वे जव्वाद से पूछने की सलाह दे रहे हैं वे खुद क्यूँ नही सलाह लेते हैं ?आप इसी तरह लिखती रहें बेखौफ होकर ...जरूरी विषय पर लिखना 'उलझना' नही होता है .
ये तो हम भी चाहते हैं की ज़रूरी विषयों पर बहस होती रहे. इस्लाम ने बहस के लिए कभी मना नहीं किया क्योंकि बहस से सच्चाई सामने आती है. लेकिन दुःख की बात है की इतने मोहतरम और मोहतरमाएं मौसम का मिजाज़ बदलने के लिए आयीं लेकिन कोई यह नहीं बता रहा की पर्दा गुलामी का प्रतीक क्यों है!
मेरे ख्याल हम इंसान को उपरवाले ने सबसे अक्लमंद बनाया है वो इसलिए नहीं कि हम २१ वी सदी में भी प्राचीन सभ्यता में ही जीते रहे बेशक हमारे मजहब के उसूलों का पालन हमें करना चाहिए ....लेकिन अगर इन उसूलों में कोई खामी है तो उन्हें बदलना भी उसी मजहब में लिखा है .....जिसे हम अमल में लाने कि बजाय उसे नज़रअंदाज कर उन उसूलों कि आड़ में अपनी दकियानूसी ख्यालों कि जड़ सींच रहे होते है .....इसलिए आज भी क्रांति लाने कि जरुरत है .
बहुत अच्छे फिरदौस जी
धन्यवाद
मेरे ख्याल हम इंसान को उपरवाले ने सबसे अक्लमंद बनाया है वो इसलिए नहीं कि हम २१ वी सदी में भी प्राचीन सभ्यता में ही जीते रहे बेशक हमारे मजहब के उसूलों का पालन हमें करना चाहिए ....लेकिन अगर इन उसूलों में कोई खामी है तो उन्हें बदलना भी उसी मजहब में लिखा है .....जिसे हम अमल में लाने कि बजाय उसे नज़रअंदाज कर उन उसूलों कि आड़ में अपनी दकियानूसी ख्यालों कि जड़ सींच रहे होते है .....इसलिए आज भी क्रांति लाने कि जरुरत है .
बहुत अच्छे फिरदौस जी
धन्यवाद
मेरे ख्याल हम इंसान को उपरवाले ने सबसे अक्लमंद बनाया है वो इसलिए नहीं कि हम २१ वी सदी में भी प्राचीन सभ्यता में ही जीते रहे बेशक हमारे मजहब के उसूलों का पालन हमें करना चाहिए ....लेकिन अगर इन उसूलों में कोई खामी है तो उन्हें बदलना भी उसी मजहब में लिखा है .....जिसे हम अमल में लाने कि बजाय उसे नज़रअंदाज कर उन उसूलों कि आड़ में अपनी दकियानूसी ख्यालों कि जड़ सींच रहे होते है .....इसलिए आज भी क्रांति लाने कि जरुरत है .
बहुत अच्छे फिरदौस जी
धन्यवाद
jab aurat aatankwadi ban sakati hai aur unkekhilaaf koi fatwa nahi diyaa jaataa hai.kyaa aatankwaad se islaam khate me pad jaataa hai.sirf burkaa n pahin ne se islaam ka bachaao ho jaayegaa.
फिरदोज़ जी बहुत सही जबाब है उनके लिए जो चंद लोग समाज के ठेकेदार बनते है ,,, और जिनके लिए किसी की व्यक्ति गत स्वतंत्रता के कोई मायने नहीं है ,,,, और धर्म जिनके लिए अपनी रोटिंया सेकने का ससक्त माध्यम है,,, वस्त्र कोई भी पहनो मगर उसमे बाध्यता न हो ,,, मै तो इसी का प क्ष धर हूँ ,,,,
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084
ajkal sabka drishtikon alag hai mere khyal se to ek aurat ko azadi honi chahiye ki wo kya pahne ........kyun uski swatantrata par rok lagayi jaye .......aakhir samaj purushvadi hai to har aurat ko ladna hoga apne adhikar ke liye........ye to ek aurat ki ichcha hai ki wo kya pahne , burka pahne ya nahi, parda kare ya nahi ..........har aurat apna achcha bura janati hai aur kabhi bhikoi aisa kaam nahi karna chahti jisse uski maryada par aanch aaye.kya stri ko swatantrata nhi honi chahiye
jaise purush ko hai vaise hi stri ko bhi honi chahiye na.
महोदय,
पिछले कई दशक से हमारे समाज में महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा देने के सम्बन्ध में एक निर्थक सी बहस चल रही है. जिसे कभी महिला वर्ष मना कर तो कभी विभिन्न संगठनो द्वारा नारी मुक्ति मंच बनाकर पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाता रहा है. समय समय पर बिभिन्न राजनैतिक, सामाजिक और यहाँ तक की धार्मिक संगठन भी अपने विवादास्पद बयानों के द्वारा खुद को लाइम लाएट में बनाए रखने के लोभ से कुछ को नहीं बचा पाते. पर इस आन्दोलन के खोखलेपन से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है शायद तभी यह हर साल किसी न किसी विवादास्पद बयान के बाद कुछ दिन के लिए ये मुद्दा गरमा जाता है. और फिर एक आध हफ्ते सुर्खिओं से रह कर अपनी शीत निद्रा ने चला जाता है. हद तो तब हुई जब स्वतंत्र भारत की सब से कमज़ोर सरकार ने बहुत ही पिलपिले ढंग से सदां में महिला विधेयक पेश करने की तथा कथित मर्दानगी दिखाई. नतीजा फिर वही १५ दिन तक तो भूनते हुए मक्का के दानो की तरह सभी राजनैतिक दल खूब उछले पर अब १५ दिन से इस वारे ने कोई भी वयान बाजी सामने नहीं आयी.
क्या यह अपने आप में यह सन्नाटा इस मुद्दे के खोख्लेपर का परिचायक नहीं है?
मैंने भी इस संभंध में काफी विचार किया पर एक दुसरे की टांग खींचते पक्ष और विपक्ष ने मुझे अपने ध्यान को एक स्थान पर केन्द्रित नहीं करने दिया. अतः मैंने अपने समाज में इस मुद्दे को ले कर एक छोटा सा सर्वेक्षण किया जिस में विभिन्न आर्थिक, समाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक और धार्मिक वर्ग के लोगो को शामिल करने का पुरी इमानदारी से प्रयास किया जिस में बहुत की चोकाने वाले तथ्य सामने आये. २-४०० लोगों से बातचीत पर आधारित यह तथ्य सम्पूर्ण समाज का पतिनिधित्व नहीं करसकते फिर भी सोचने के लिए एक नई दिशा तो दे ही सकते हैं. यही सोच कर में अपने संकलित तथ्य आप की अदालत में रखने की अनुमती चाहता हूँ. और आशा करता हूँ की आप सम्बंधित विषय पर अपनी बहुमूल्य राय दे कर मुझे और समाज को सोचने के लिए नई दिशा देने में अपना योगदान देंगे.
http://dixitajayk.blogspot.com/search?updated-min=2010-01-01T00%3A00%3A00-08%3A00&updated-max=2011-01-01T00%3A00%3A00-08%3A00&max-results=6
Regards
Dikshit Ajay K
its quite brilliant.. congratulation.. will come back again to read all the stuff..
thanks
साहसिक लेखन। हर धर्म में आप जैसी लेखिकाओं की जरूरत है।
अजी तेल लेने गाया...पर्दा और फतवा.मर्जी लड़कियों की वों क्या पहनेंगी..क्या पर्दारसी है है क्या नहीं इसका फासला भी वहीँ करेंगी ...कठमुल्ले नहीं...
संजय सर ने आपका नया पोस्ट की लिंक फाके बुक पे सेयर की है सो हम इसे लेट पढ़ रहे हैं और लेट कमेंट्स भी कर रहे हैं...
हम ना हिन्दू हैं ना मुस्लिम ...क्या हैं खुद को भी खबर नहीं अब इस बात पे किसी को हमारी नियत पे सवाल उठाना है तो उठता रहे...bus itna hai hum khud ke khuda hain hamara koi khuda nahi...हमारे घर की औरते क्या पहनेंगी इसका फासला वाही करेंगी ..कोई धर्मग्रन्थ नहीं....
बेहतरीन प्रयास है आपका शुक्रिया......
i m totally agree with Anjule Shyam.
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