Friday, April 16, 2010

क्या सिर्फ़ विरोध के लिए ही विरोध किया जाना चाहिए...???

पिछले दिनों हमारे ब्लॉग पर पोस्ट कुछ लेखों को लेकर 'मज़हब के ठेकेदारों' ने जिस तरह हो-हल्ला किया, उससे हमें बहुत अफ़सोस हुआ... अफ़सोस इस बात का नहीं की उन्होंने हमारा विरोध किया... बल्कि इस बात का कि पढ़े-लिखे लोग भी किस क़द्र जाहिल हैं... उन लोगों ने हमारे एक भी सवाल का जवाब नहीं दिया... क्या सिर्फ़ विरोध के लिए ही विरोध किया जाना चाहिए...???

एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है- फ़िरदौस, जहां तुम्हारा नाम होता है, वहीं विवाद होता है...
ख़ैर, यह कोई नई बात नहीं है, शुरू से हमारे साथ ऐसा ही रहा है...

कई लोगों ने हमें मेल करके बताया कि हमारे ख़िलाफ़ कितना ज़हर उगला जा रहा है... हमें इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता... क्योंकि जब अरब के जंगली कबीलों की अमानवीय कुप्रथाओं के ख़िलाफ़ हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम) ने आवाज़ बुलंद की थी, तब उनका भी विरोध किया गया था... विरोध इस हद तक किया गया कि उन्हें अपना शहर तक छोड़कर जाना पड़ा...

शायद उस वक़्त यह किसी ने तसव्वुर भी नहीं किया होगा... जिस मज़हब की बुनियाद ही अमानवीय कुप्रथाओं के ख़िलाफ़ रखी गई है, आने वाले वक़्त में वही मज़हब दुनियाभर में अपनी कुप्रथाओं के लिए जाना जाएगा... उस आतंकवाद से कौन इनकार कर सकता है, जिसे इस्लाम के अलमबरदार ही खाद-पानी दे रहे हैं... हालत यह है कि यूरोपीय देशों में मुसलमानों को शक की नज़र से देखा जाने लगा है...

इस हालत के लिए मुसलमान ख़ुद ही ज़िम्मेदार हैं...
हमारा मानना है कि सुधार की शुरुआत हमेशा अपने घर से ही करनी चाहिए...
अगर मुसलमान 'कट्टरपंथियों' के ख़िलाफ़ बोलते हैं, तो उनके समाज में ही उन्हें काफ़िर घोषित कर दिया जाता है...
अगर वो ख़ामोश रहते हैं तो उन्हें आतंकवाद का समर्थक मान लिया जाता है...
अब ये मुसलमानों को तय करना है कि उनके लिए क्या सही है और क्या ग़लत...
क्या वो मज़हब के उन ठेकदारों पर आंख मूंदकर भरोसा करना चाहेंगे, जो जेहाद के नाम पर दुनिया को दहशतगर्दी की आग में झोंक देना चाहते हैं... जो दूसरे मज़हब के लोगों से नफ़रत करना सिखाते हैं... या फिर एक सभ्य समाज का निर्माण करना चाहेंगे... जहां ख़ुशहाली हैं, चैन-अमन है, और दूसरे मज़हब के लोगों के लिए स्नेह है...और आदर है...
हमने किस तरह अपनी अम्मी, ख़ाला (मौसी), दादी और नानी का बुर्क़ा पहनना छुड़वाया...
यह अगले लेख में....

25 Comments:

Amitraghat said...

बहुत अच्छी पोस्ट सच कहने वालों का हमशा विरोध होता आया है..."

सुलभ § सतरंगी said...

यही तो दिक्कत है. विरोध करने से पहले, कुछ भी कहने/लिखने से पहले सत्य का तुलनात्मक अध्ययन करना जरुरी नहीं समझते. लोग लेखक के बारे में ज्यादा सोचने लगते हैं. यदि उनकी नियत गलत हो तो खुद बा खुद २-३ पोस्ट से पता चल जाता है. शोर मचाने से कुछ नहीं होगा, बेहतर है सभी लोग सुधार अपने घर से शुरू करें....

भारतीय नागरिक said...

आपकी सोच बड़ी विस्तृत है और आपकी समझदारी काबिले-तारीफ

EJAZ AHMAD IDREESI said...

बुर्क़ा और पर्दा में फर्क होता है, FIRdaus जी.

Shah Nawaz said...

फिरदौस बहन! मैं आपकी भावनाओं की कद्र करता हूँ, परन्तु एक बात अवाश्य कहना चाहता हूँ, कि अगर हमें लगता है कि कोई बात गलत है, तो सबसे पहले हमें उसके बारें पूरी जानकारी हासिल करना चाहिए. इसमें कई बातें सामने आ सकती हैं. जैसे कि:

1. हो सकता है कि जो हम सोच रहे हैं, वह बात बिलकुल वैसी ही निकले.

2. इस बात की भी पूरी संभावना है कि जो हम सोच रहे हैं, बात वैसी नहीं हो.

3. हर बात के अच्छे और बुरे पहलु हो सकते हैं, क्योंकि समय और समझ के हिसाब से हर बात का अलग महत्त्व होता है.

4. ना तो किसी को अपने विरोधियों की बातों से परेशान होना चाहिए और ना ही समर्थन करने वालो की बातों पर भी पूरा विश्वास करना चाहिए. क्योंकि अक्सर विरोधी हमारी अच्छी बातों का भी विरोध करते हैं वहीँ समर्थक हमारी बुरी बातों का भी समर्थन करते हैं.

5. बल्कि सही रास्ता तो यही है, कि विरोधियों और समर्थकों की बातों का पूरी तरह से अध्यन करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए.

Anonymous said...

अगर मुसलमान 'कट्टरपंथियों' के ख़िलाफ़ बोलते हैं, तो उनके समाज में ही उन्हें काफ़िर घोषित कर दिया जाता है...
अगर वो ख़ामोश रहते हैं तो उन्हें आतंकवाद का समर्थक मान लिया जाता है...
अब ये मुसलमानों को तय करना है कि उनके लिए क्या सही है और क्या ग़लत..

मिहिरभोज said...

रुके न तु,थके न तु चले चलो ....बढे चलो...अनवरत्....अनवरत्....पीडित नारियों की आवाज बनकर ....सब आपक की तरफ देख रहें हैं.....

aarya said...

सादर नमस्कार!
लोग कहते हैं की वह गलत कहा रहा है क्योंकि वह अनपढ़ है. ऐसा हो सकता है लेकिन उनका क्या जो पढेलिखे हैं. मुझे लगता है कि हम पढ़े लिखे लोगों में बोलने कि प्रवित्ति ज्यादा है और खोजने कि प्रवित्ति कम, यही कारण है कि यदि कोई सार्थक लेख भी आता है तो हम उसे अपनी बुद्धि और समझ के हिसाब से तौलकर उसकी आलोचना कर देते हैं या उलजुलूल सलाह देने लगते हैं,
सच्चाई को बातों से नहीं दबाया जा सकता और सच बोलने वालों को डराया नहीं जा सकता क्योंकि दुनिया में सबसे बड़ी हिम्मत कि बात है सच बोलना और यह जिसे आता है उसको आप रोक नहीं सकते, और रोकने वालों को कुछ समय तक याद किया जाता है लेकिन सच बोलने वालों को सदियाँ याद रखती हैं.
पुनः इस सार्थक लेख के लिए आभार!
रत्नेश त्रिपाठी

RAJNISH PARIHAR said...

आपकी सोच बड़ी विस्तृत है!समाज को आगे बढ़ने के लिए ऐसी ही आवाज़ की जरूरत है,पर क्या करें ..सब कुछ इतना गड़बड़ है की कुछ तो टाइम लगेगा!मेरी शुभकामनायें आपके साथ है...

zeashan zaidi said...

मज़हब में फैली हुई कुरीतियों (बल्कि किसी भी तरह की कुरीतियों) के खिलाफ विरोध करना बहुत अच्छी बात है. लेकिन उतना ही ज़रूरी है उसका हल पेश करना. अगर पैगम्बर मोहम्मद (स.अ.) ने उस समय समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ आवाज़ उठाई तो इस्लाम के रूप में उसका हल भी पेश किया. अगर आप कहते की यह गलत है, तो सही क्या है और क्यों है, यह भी आप ही सिद्ध करना है. हम कब तक दूसरों पर दोषारोपण करते रहेंगे? यही काम तो आज के नेता भी कर रहे है, सब एक दूसरे को देश की दुर्दशा के लिए ज़िम्मेदार ठहरा रहा है. हल कोई नहीं पेश कर रहा.

"KaushiK" said...

जब से तेरी दुनिया को थोड़ा थोड़ा समझने लगा हूँ मै,
तब से थोड़ा थोड़ा तुझ से जलने लगा हूँ मै ...
मै तो नदी हूँ एक बरसाती, तू सागर है अथाह गहरा,
तुझमे मिलने के लिए मचलने लगा हूँ मै ...

आपकी अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा ....

अनुनाद सिंह said...

दिमाग को गिरवी रखकर मजहब में कही हुई बातों का आंखमूंदकर पालन एक तो स्वयं नहीं करना चाहिये और कहीं ऐसा हो रहा है तो उसका समुचित विरोध होना चाहिये।

संजय भास्कर said...

आपकी सोच बड़ी विस्तृत है!समाज को आगे बढ़ने के लिए ऐसी ही आवाज़ की जरूरत है

संजय बेंगाणी said...

शुभकामनाएं.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

फिरदौस, आप सही हैं और आप को अपने पथ पर अडिग रहना चाहिए। ऐसे ही काफिले बनते हैं।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

फिरदौस आप सही हैं, आप का पथ सही है। उस पर अडिग रहें। ऐसे ही काफिले बनते हैं।

रचना said...

my good wishes and blessings are always with you .

KEEP WRITING

सुलभ § सतरंगी said...

@ Zeeshan Zaidi Ji,

बहुत अच्छी बात कही आपने. हल निकालने की बात, आप जैसे हमारे जैसे और अन्य सुलझे सोच वाले व्यक्ति को चाहिए की समस्यां पर विमर्श करें और हल को लिखें... विभिन्न विकल्पों पर राय शुमारी करवाए. निरंतर चिंतन से ही दिशा बनेगी....

एक पंक्ति यहाँ है... "शायद उस वक़्त यह किसी ने तसव्वुर भी नहीं किया होगा... जिस मज़हब की बुनियाद ही अमानवीय कुप्रथाओं के ख़िलाफ़ रखी गई है, आने वाले वक़्त में ही वही मज़हब दुनियाभर अपनी कुप्रथाओं के लिए जाना जाएगा..." यह चिंतन मांगता है. आप जैसे बुद्धिजीवी निरंतर बदलते युगों का अध्ययन करते हुए, हल ढूंढ सकते हैं. सही हल एक बार में नहीं मिलेंगे... पर निरंतर कार्य करने से अभीष्ट की प्राप्ति जरुर होगी... नफरत की बात सिर्फ असमाजिक तत्व सोचते हैं या वे जो किसी घटना से खार खाए हुए हैं. अधिकाँश लोग अमन की बात, समानता की बात, उचित अधिकार की बात का समर्थन करते हैं.... दकियानूसी सोच और आत्मघाती नियम कायदों से बाहर निकलना होगा... वक़्त लगेगा मगर हल मिलेगा, कुछ ऐसे सामूहिक प्रयास करने की जरुरत है. सबके लिए शुभकामनाएं.

kunwarji's said...

sabke liye sachche dil se shubhkaamnaaye...

kunwar ji,

M VERMA said...

कुप्रथाओ के खिलाफ जिसने भी आवाज उठायी उसे विरोध सहना ही होता है. विरोध ही वह मानक है कि बात का असर हो रहा है. यथारूप बने रहने की सुविधा मोह कारण है.
बुर्का नारी को कैद करने की मोटी जंजीर है

सतीश सक्सेना said...

कुप्रथाए किसी भी मज़हब की हों , उन्हें समाप्त करवाने और उन पर लोगों का ध्यान आकर्षित कराने के लिए समय के साथ लोगों को आगे आना ही चाहिए ! शुभकामनायें फिरदौस !

Arvind Mishra said...

मजहबी मामलों को हम कुछ समय तक मुल्तवी नहीं रख सकते -किसी ने आखिर ठीक ही कहा है की भारत एक सेक्यूलर देश है -यहाँ धार्मिक बैटन को लेकर विद्वेष की कोई वजह नहीं हैं -जो लोग इनमें लिप्त हैं वे देश द्रोही से कम नहीं !

safat alam taimi said...

बहन फिर्दौस खान ! अजीब बात है...आखिर कौन हमारे भारत में तालिबानी ज़ेहन का व्यक्ति बैठा हुआ है..हम दूसरे धर्मों के मानने वालों का सम्मान करते हैं, उनके धार्मिक गुरुओं को बुरा भला नहीं कहते, उनके साथ वही मआमला करते हैं जैसे एक मुसलमान के साथ...परन्तु आस्था में हम उनके हाँ में हाँ नहीं मिला सकते... उनके साथ पूजा पाट के लिए मन्दिर नहीं जा सकते... क्योंकि हमें पता है कि पूजा मात्र ऊपर वाले (अल्लाह, ईश्वर) की होनी चाहिए...यदि हम ऐसा करते हैं तो क्या कट्टरपंथी हैं...बुनयादपरस्त हैं...दहशतगर्द हैं...

मौसम said...

मोहतरमा, आप सही कहती हैं.
इस हालत के लिए मुसलमान ख़ुद ही ज़िम्मेदार हैं...
हमारा मानना है कि सुधार की शुरुआत हमेशा अपने घर से ही करनी चाहिए...
अगर मुसलमान 'कट्टरपंथियों' के ख़िलाफ़ बोलते हैं, तो उनके समाज में ही उन्हें काफ़िर घोषित कर दिया जाता है...
अगर वो ख़ामोश रहते हैं तो उन्हें आतंकवाद का समर्थक मान लिया जाता है...
अब ये मुसलमानों को तय करना है कि उनके लिए क्या सही है और क्या ग़लत...

आपसे सहमत !

तिलक रेलन said...

"फ़िरदौस ख़ान की डायरी" जितनी पढ़ता जाता हूँ उतना पिघलता जाता हूँ, आज कहीं बिलकुल ही न पिघल जाऊ! भारतीय संस्कृति की सीता का हरण करने देखो, साधू वेश में फिर आया रावण! संस्कृति में ही हमारे प्राण है! भारतीय संस्कृति की रक्षा हमारा दायित्व -तिलक

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