Friday, April 13, 2012

औरतों के हक़ में एक फ़तवा




फ़िरदौस ख़ान
शायद पहली बार देश की प्रमुख इस्लामी शिक्षण संस्था दारुल उलूम देवबंद ने मुस्लिम औरतों के हक़ में फ़तवा जारी किया है. ख़ैर, हम तो यही कहेंगे कि देर आयद दुरुस्त आयद… इस  नेक काम के लिए देवबंद की सराहना की जानी चाहिए...

दारुल उलूम देवबंद ने हिन्दुस्तानी मुसलमानों से कहा है कि एक बीवी के ज़िंदा होने की हालत में वे दूसरा निकाह नहीं करें, क्योंकि ऐसा करने से दोनों बीवियों के साथ नाइंसाफ़ी होगी. पहली बीवी के ज़िंदा रहते दूसरी शादी करने की ख्वाहिश ज़ाहिर करने वाले एक व्यक्ति के सवाल पर देवबंद की तरफ़ से दिए गए फ़तवे में कहा गया है- '‘शरीयत एक साथ दो पत्नियों की इजाज़त देती है, लेकिन भारतीय परंपरा में इसकी इजाज़त नहीं है." दारुल उलूम ने यह भी कहा कि दो बीवियां होने की हालत में व्यक्ति दोनों के साथ ज़िम्मेदारियों के लिहाज़ से इंसाफ नहीं कर पाता. इस वजह से पहली बीवी के होते हुए दूसरी शादी करने का ख़्याल ज़हन से निकाल देना चाहिए.’

दूसरी शादी के सवाल में व्यक्ति का कहना था, अपने कॉलेज के समय से मैं एक युवती से प्रेम करता था, लेकिन उसकी शादी नहीं हो सकी थी. अब हम फिर से संपर्क में आए हैं और निकाह करना चाहते हैं.  मेरी बीवी एवं दो बच्चे हैं और ऐसी स्थिति में दूसरी शादी जायज़ रहेगी?’ उसके इसी सवाल के जवाब में देवबंद ने यह फ़तवा दिया है.

दारूल उलूम देवबंद से एक व्यक्ति ने यह भी सवाल किया कि उसकी पत्नी और मां के बीच नहीं बनती और बीवी सास-ससुर के साथ रहने को तैयार नहीं है. ऐसी  हालत में उसे क्या करना चाहिए? इसके जवाब में कहा गया है कि ऐसी हालत में इस्लाम बीवी को तलाक़ देने या  उसे ख़ुद से अलग करने की इजाज़त  नहींदेता. मां-बाप की नाफ़रमानी करना भी ग़लत है. आपको बीवी के लिए दूसरा घर लेना चाहिए और साथ ही अपने मां-बाप की देखभाल करना चाहिए. इस्लामी शिक्षण संस्था दारुल उलूम का कहना है कि पत्नी का हक़ अदा करने के साथ ही मां-बाप की देखभाल करना हर व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है और दोनों जिम्मेदारियों को निभाने की कोशिश करना चाहिए.

दुनिया की क़रीब आधी आबादी महिलाओं की है. इस लिहाज़ से महिलाओं को तमाम क्षेत्रों में बराबरी का हक़ मिलना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं है. कमोबेश दुनियाभर में महिलाओं को आज भी दोयम दर्जे पर रखा जाता है. अमूमन सभी समुदायों में महिलाओं को पुरुषों से कमतर मानने की प्रवृत्ति है. हिंदुस्तान में ख़ासकर मुस्लिम समाज में तो महिलाओं की हालत बेहद बदतर है.  सच्चर समिति की रिपोर्ट के आंकड़े भी इस बात को साबित करते हैं कि अन्य समुदायों के मुक़ाबले मुस्लिम महिलाएं आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से ख़ासी पिछड़ी हुई हैं. यह एक कड़वी सच्चाई है कि मुस्लिम महिलाओं की बदहाली के लिए 'धार्मिक कारण' काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं. इनमें बहुपत्नी विवाह और तलाक़ के मामले ख़ास तौर पर शामिल हैं.

बेशक, दारुल उलूम देवबंद के इस फ़तवे से मुस्लिम औरतों को काफ़ी फ़ायदा होगा. साथ ही इससे धर्मांतरण के ऐसे मामलों में भी कमी आएगी, जिनमें ग़ैर मुस्लिम मर्द क़ानून की सज़ा से बचने के लिए इस्लाम क़ुबूल करके दूसरी शादी कर लेते हैं. सिर्फ़ फ़तवा देने से ही काम नहीं चलेगा. दारुल उलूम देवबंद को मुस्लिम औरतों के हक़ में कुछ और फ़ैसले भी देंगे होंगे, ताकि वे भी एक अच्छी ज़िन्दगी बसर कर सकें...

11 Comments:

shikha varshney said...

अच्छी खबर है ..पर इस फतवे पर अमल भी हो तब बात बने.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

अच्छी खबर है, इस पर अमल हो तो.

प्रवीण पाण्डेय said...

स्तुत्य प्रयास, काश ये स्थायी बने रहें।

रचना दीक्षित said...

यह खबर एक प्रगतिशील मुस्लिम समाज के निर्माण में हमेशा याद रखी जायेगी.

राजन said...

तो देवबंद ने कोई अहसान नहीं किया हैं मुस्लिम महिलाओं पर.वैसे भी भारत में बहुत कम मुस्लिम पुरुष एक बीवी के रहते दूसरी शादी करते हैं.यदि उन्हें औरतों की इतनी ही चिंता हैं तो एक से ज्यादा पत्नी रखने को इस्लाम विरुद्ध ही क्यों नहीं घोषित कर देते जबकि चार शादियों की छूट युद्ध और आपातकाल के समय दी गई थी जब मुस्लिम समाज में पुरुषों की संख्या औरतों से बहुत कम रह गई थी.लेकिन कठ्मुल्लों ने औरतों को दबाने के लिए इस प्रावधान को स्थाई बना डाला.अतः ये नहीं कहा जा सकता कि इस्लाम में चार शादियों की छूट हैं.बल्कि वहाँ तो मुस्लिमों को स्पष्ट निर्देश हैं कि 'एक ही करो'.और वैसे भी एक से ज्यादा पत्नियाँ होने पर सभी के साथ न्याय व्यवहारिक रूप से सम्भव हैं ही नहीं.फिर ऐसी छूट का क्या मतलब.

राजन said...

फिरदौस जी,मेरी टिप्पणी कहीं दिखाई नहीं दे रही?
कृप्या इसे प्रकाशित करें.
धन्यवाद!

राजन said...

फिरदौस जी, मेरी टिप्पणी कहीं दिखाई नहीं दे रही?
कृप्या इसे प्रकाशित करें.

राजन said...

firdaus ji,
कृप्या मेरी टिप्पणी प्रकाशित करें.

राजन said...

कोई अहसान नहीं किया हैं देवबंद ने महिलाओं पर.वैसे भी भारत में बहुत कम मुसलमान एक से ज्यादा शादियाँ करते हैं.चार शादियों की व्यवस्था तो वैसे भी युद्ध और आपातकाल के समय की गई थी जब बेवाओं की संख्या बहुत बढ गई थी और उनकी तुलना में पुरुष बहुत कम रह गए थे.और यह व्यवस्था भी केवल उसी दशा में दी गई थी जब पुरुष अपनी सभी पत्नियों से समान व्यवहार कर सकें अन्यथा इस्लाम में तो पुरुषों को स्पष्ट निर्देश हैं कि तुम बस 'एक ही करो'.परंतु पुरुषों ने अपने स्वार्थ के चलते इस आपातकालीन प्रावधान को स्थाई बना डाला.अत: एक से अधिक शादियाँ तो वैसे भी गैर इस्लामिक हैं.देवबंद को महिलाओं की इतनी ही फिक्र है तो इसे गैर इस्लामी घोषित क्यों नहीं किया ?

राजन said...

फिरदौस जी कृप्या मेरा कमेंट प्रकाशित करें.

राजन said...

आपको शायद मिली न हो,इसीलिए एक बार फिर से टिप्पणी कर रहा हूँ.कृप्या इसे प्रकाशित करें-
कोई अहसान नहीं किया हैं देवबंद ने महिलाओं पर.वैसे भी भारत में बहुत कम मुसलमान एक से ज्यादा शादियाँ करते हैं.चार शादियों की व्यवस्था तो वैसे भी युद्ध और आपातकाल के समय की गई थी जब बेवाओं की संख्या बहुत बढ गई थी और उनकी तुलना में पुरुष बहुत कम रह गए थे.और यह व्यवस्था भी केवल उसी दशा में दी गई थी जब पुरुष अपनी सभी पत्नियों से समान व्यवहार कर सकें अन्यथा इस्लाम में तो पुरुषों को स्पष्ट निर्देश हैं कि तुम बस 'एक ही करो'.परंतु पुरुषों ने अपने स्वार्थ के चलते इस आपातकालीन प्रावधान को स्थाई बना डाला.अत: एक से अधिक शादियाँ तो वैसे भी गैर इस्लामिक हैं.देवबंद को महिलाओं की इतनी ही फिक्र है तो इसे गैर इस्लामी घोषित क्यों नहीं किया ?

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