Showing posts with label पुस्तक समीक्षा. Show all posts
Showing posts with label पुस्तक समीक्षा. Show all posts

Thursday, August 14, 2025

संग्रहणीय पुस्तक है नवगीत कोश

 

फ़िरदौस ख़ान
सुप्रसिद्ध कवि एवं गीतकार डॉ. रामनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ द्वारा लिखित ‘नवगीत कोश’ पढ़ने का मौक़ा मिला। इसे पढ़कर लगा कि अगर इसे पढ़ा नहीं होता, तो कितना कुछ जानने और समझने से रह जाता। कितना कुछ ऐसा छूट जाता, जिसका मलाल रहता। किताबों की भीड़ में बहुत-सी किताबें ऐसी होती हैं, जो सबसे अलग नज़र आती हैं। ये वो किताबें होती हैं, जिनसे सीखने को बहुत कुछ मिलता है, जो किसी शिक्षक की तरह हमें किसी विषय विशेष की विस्तृत जानकारी मुहैया करवाती हैं। ऐसी किताबें संग्रहणीय होती हैं, जो वर्तमान ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी ज्ञान की थाती होती हैं। यह भी एक ऐसी ही किताब है।     

इस ‘नवगीत कोश’ को आगरा के निखिल पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स ने प्रकाशित किया है। इसमें पाँच खंड हैं। प्रथम खंड में प्रस्तावना है, जिसमें गीत, नवगीत की प्रामाणिक भूमिका, इतिहास, संवेदना संसार और शिल्प पर प्रामाणिक चर्चा है। द्वितीय खंड में 700 एकल और 100 समवेत नवगीत संग्रहों का परिचय है। तृतीय खंड में 297 नवगीतकारों का संक्षिप्त परिचय है। इसमें पाँच प्रवासी भी हैं। चतुर्थ खंड में नवगीत के समीक्षा सम्बन्धी 103 प्रकाशित ग्रंथों, 73 अप्रकाशित शोध ग्रंथों और 58 पत्रिकाओं का परिचय है। पंचम खंड में 29 नवगीतकारों और समीक्षकों का साक्षात्कार है, जिनमें स्वयं डॉ. रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ सहित अनूप अशेष, डॉ. आलमगीर अली, डॉ. इन्दीवर, डॉ. ओमप्रकाश सिंह, गणेश गम्भीर, जगदीश ‘पंकज’, देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’, नचिकेता, पारसनाथ गोवर्धन, डॉ. पार्वती जे. गोसाईं, पूर्णिमा वर्मन, भारतेन्दु मिश्र, मधुकर अष्ठाना, मयंक श्रीवास्तव, महेश उपाध्याय, डॉ. योगेन्द्र दत्त शर्मा, रमेश गौतम, राधेश्याम बन्धु, विनोद निगम, वीरेन्द्र आस्तिक, वेद प्रकाश शर्मा ‘अमिताभ’, डॉ. वेद प्रकाश शर्मा ‘वेद’, डॉ. श्रीराम परिहार, संजीव वर्मा ‘सलिल’, सोम ठाकुर, हरिशंकर सक्सेना, हरीश निगम और हृदयेश्वर शामिल हैं। साक्षात्कार में ऐसे सवाल पूछे गए हैं, जो साहित्य प्रेमियों की जिज्ञासा को तृप्त करते हैं। सभी नवगीतकारों ने अपने-अपने अंदाज़ में जवाब दिए हैं। इनसे बहुत कुछ जानने, समझने और सीखने को मिलता है।                             
 
इस ‘नवगीत’ को तैयार करने में डॉ. यायावर ने अपनी ज़िन्दगी के तीन अनमोल साल ख़र्च किए हैं। इसमें उनकी मेहनत, उनकी लगन और उनका समर्पण सबकुछ ही तो झलकता है। उन्होंने गीत के शब्दार्थ, मीमांसा  और परिभाषा का बहुत ही सहजता से वर्णन किया है। जो व्यक्ति साहित्य से सम्बन्ध नहीं रखता या जिसे नवगीत के विषय में बुनियादी जानकारी भी नहीं है, वह भी इसे पढ़कर नवगीत के विषय में जान जाएगा कि नवगीत क्या है। 
    
उनकी भाषा शैली और उनके शब्दों का चयन इतना सुन्दर है कि वह पाठक को ऐसे बहा ले जाता है, जैसे नदी किसी नाव को अपनी अविरल धारा के साथ बहा ले जाती है। पाठक बस उसमें बहता चला जाता है। कहीं रुकने का उसका मन ही नहीं करता। पढ़ते-पढ़ते कब किताब मुकम्मल हो गई, पता ही नहीं चलता। बानगी देखें- गीत हृदय की वर्णमयी झंकार या दूसरे शब्दों में यह हृदय-हिमालय से फूट पड़ने वाली वह अविरल स्रोतास्विनी है, जो भावाच्छ्वास के ताप से पिघलकर अनायास फूट पड़ती है। यह काव्य की आदि विधा है। सृष्टि के जन्म के साथ ही गीत जन्मा, क्योंकि सृष्टा ने प्रकृति के कण-कण में गीत की अस्मिता भर दी है। ऋतुओं का क्रमिक परिवर्तन, सूर्य का निश्चित समय पर उदयास्त, पवन का गतिमय संचालन, कल-कल बढ़ती सरिताओं का गतिमय गायन, झरनों का उद्वेगमय निपतन, दिवा रात्रि का क्रमश: आवागमन, पृथ्वी द्वारा सूर्य का और चन्द्रमा द्वारा पृथ्वी का लययुक्त परिभ्रमण, तरु शिखरों पर पक्षियों का संगीतमय कलरव, कोमल किसलयों की मर्मर ध्वनि, कभी क्रुद्ध प्रकृति द्वारा निर्देशित विध्वंस रचती झंझाओं का भैरव नर्तन, मधुऋतु में पुष्पों की मधुर मुस्कान, उपवन के भ्रमरों की लयबद्ध गुनगुनाहट, पावस की अँधेरी रात में झींगुरों की झंकार, मयूर की केका ध्वनि के साथ किया गया मोहक नृत्य, वर्षा के बादलों की घुमड़न और बरसी बूँदों का शीतल स्पर्श, शिशिर में ओस की बूँदों का मुक्ताभासी सौन्दर्य, पतझड़ में पियराते पत्तों का गिरना, कृषक बाला का अकृत्रिम गायन, शरद पूर्णिमा में चन्द्रमा की निष्कलुष स्वच्छ चाँदनी का अछोर विस्तार और श्रम से सँवरती-बिखरती ज़िन्दगी का स्वेद आदि सबमें एक गीत है। प्रकृति में और जीवन में जहाँ भी लय है, संगीत है गुनगुनाहट है, झंकार है, वहाँ-वहाँ गीत उपस्थित है। गीत अनुभूति और संगीत की लाड़ली सन्तान है। सत्य, शिव और सौन्दर्य का लयबद्ध संयोजन है, जीवन-राग का स्वरबद्ध गायन है। सम्भवत: एक गीत में कहा गया है-
धरती, अम्बर, फूल पाँखुरी
आँसू, पीड़ा, दर्द, बाँसुरी 
मौल, ऋतुगंधा, केसर 
सबके भीतर एक गीत है 

पीपल, बरगद, चीड़ों के वन
सूरज, चन्दा, ऋतु परिवर्तन 
फुनगी पर इतराती चिड़िया 
दूब भरे कोमल तुषार कन 
जलता जेठ भीगता सावन 
सबके भीतर एक गीत है 

रात अकेली चन्दा प्रहरी
अरुणोदय की किरण अकेली 
फैली दूर तलक हरियाली 
उमड़ी हुई घटायें गहरी 
मुखर फूल शरमाती कलियाँ 
मादक ऋतुपति, सूखा पतझर 
सबके भीतर एक गीत है     

                                 
पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला प्रथम गीतकार माने जाते हैं। डॉ. यायावर उनकी परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। नवगीत लेखन के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। वे नवगीतकारों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। उनका मानना है कि नवगीत का भविष्य उज्ज्वल है। नयी, युवा पीढ़ी अपनी ताज़गी भरी रचनाधर्मी ऊर्जा के साथ उससे जुड़ रही है। अब वह अन्तर्जाल के द्वारा भारत के बाहर भी लोकप्रिय हो रहा है। इसलिए जब तक मानव है, उसमें संवेदयें हैं, जीवन में जटिलतायें हैं और मानव में अभिव्यक्ति की ललक है, तब तक नवगीत रहेगा। सम्भव है आने वाला कल किसी और परिवर्तन की आवश्यकता अनुभव करे, तो वह होगा, परन्तु गीत रहेगा। वह मानव का कालजयी सहचर है।

डॉ. यायावर को काव्य की यह पुण्य विधा अपने पिता स्वर्गीय पंडित रामप्रसाद शर्मा से विरासत में मिली है। वे स्वतंत्रता सेनानी और लोकगायक थे। पहले वे भजन और फिर लोक महाकाव्य ढोला के द्वारा जन-जागरण करते रहे। इसलिइ उन्हें बचपन से ही संगीत और लोकसंस्कृति को क़रीब से जानने का मौक़ा मिला। उन्होंने सातवीं कक्षा में ही पहला बालगीत लिख लिया था।

बहरहाल, डॉ. यायावर की यह पुस्तक साहित्य के छात्रों के लिए बहुत उपयोगी है। पुस्तक का आवरण भी आकर्षक है। किताब का मूल्य भी वाजिब है। डॉ. यायावर ने पाठकों की सुविधा के लिए इसका मूल्य कम रखवाया है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा पाठक इसे ख़रीद सकें।       

पुस्तक का नाम : नवगीत कोश 
लेखक : डॉ. रामसनेही लाल शर्मा 
प्रकाशक : निखिल पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, आगरा 
पृष्ठ : 640
मूल्य : 500 रुपये      

Monday, April 11, 2022

ईश प्रीत की छलकन है यह पुस्तक


सूफ़ी-संतों पर आधारित पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ फ़िरदौस ख़ान की ईश प्रीत की छलकन है. ऋषि सत्ताओं की विस्मृत वाणी को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ को कैसे संत व फ़क़ीर जीते हैं, उसी को पुनः स्मृति में लाने का प्रयास है यह पुस्तक.
जैसे श्रीमद्भगवद्गीता पुनः अर्जुन के बहाने संसार को मिल रहा है, जबकि योगेश्वर कहते हैं कि सबसे पहले यह ज्ञान सूर्य को दिया था, जो काल के खेल में विलुप्त हो गया था.
ऋषि सत्ताओं ने धर्म की जगह विशेष के समूह को जीवन जीने का तरीक़ा दिया और ऋषियों, सूफ़ी, संतों व फ़क़ीरों ने उस जीवन जीने के तरीक़ों के उद्देश्य को जिया अर्थात आध्यात्मिक जीवन को प्राप्त होना, अर्थात उस प्रकाश को पाना है जिससे यह कायनात है. अखिल ब्रह्मांड है, भीड़ और समूह सीढ़ियां छोड़ नहीं पाती हैं, जिससे भेद बना रहता है, बसा रहता है. मंज़िल पानी थी, न कि सिर पर सीढ़ियां लादे घूमना था. फ़क़ीरों-संतों का जीवन चीख़-चीख़ कर घोषणा करता है- ढाई आखर प्रेम का, पढ़या सो पंडित होय.
पहुंचना प्रीत सागर में है. सारी की सारी नदियों का गंतब्य क्या है, समुद्र.

गंगा-जमुनी मेल क्या है, संस्कृति क्या है, चलें सागर की ओर, मिलकर. संगम पाकर और विशाल-विस्तृत होकर. विराट मिलन के पूर्व का मिलन उस महामिलन की मौज की मस्ती के स्वाद का पता दे देता है. इसका बड़ा अच्छा उदाहरण लेखिका व आलिमा फ़िरदौस ख़ान ने प्रस्तुत किया है. सूफ़ी हज़रत इब्राहिम बिन अदहम के जीवन से-
-कौन ?
- तेरा परिचित.
-क्या खोज रहे हो?
- ऊंट.
बकवास... इतने ऊपर हमारे महल में ऊंट कैसे आ सकता है? परिचित बोलते हैं कि जब तू राजमहल में मालिक को ढूंढ सकता है, तो यहां हमारा ऊंट क्यों नहीं आ सकता है?
अर्थात राजस में रहकर सात्विक से भी (त्रिगुण मयी माया) पार की ख़बर का नाटक करना ही है. आज के दौर में कितना प्रासंगिक है. राजस जीवन जीकर धर्म की व्याख्या करना, पतन की पराकाष्ठा ही है.
वहीं जब महल को पुनः सराय कहता है परिचित, तब बादशाह की आंख पूरी खुल जाती है. राजस आने जाने वाली फ़ानी बादशाहत छोड़कर फ़क़ीरी जीवन जीने लगते हैं.

और सूफ़ी, संत, फ़क़ीर ही असली बादशाह हैं. मालिक की गोद में बैठकर असली मौज लेते रामकृष्ण परमहंस भी दिखते हैं और माँ के आशीष से सिंचित कर्मयोगी शहनाई वादक बिस्मिल्लाह ख़ान साहेब भी क्या हज़रत इब्राहिम बिन अदहम की तरह फ़क़ीरी में बादशाह नहीं हैं.
चाहे कबीर हों, रसखान हों, दादू हों सभी उस नूर, उस रौशनी की चर्चा अपनी सधुक्कड़ी भाषा में कर रहे हैं. 
लेखिका फ़िरदौस ख़ान उस ईश्वरीय नूर को जी रही हैं और इस तरह ईश प्रीत की उस छलकन की पहली श्रृंखला है यह पुस्तक, जिसे ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह) ने प्रकाशित किया है.

शुभकामनाएं अपार!
नन्दलाल सिंह

लेखक का परिचय 
नन्दलाल सिंह लेखक एवं अनिभेता हैं. वह रंगमंच, हिन्दी फ़ीचर फ़िल्मों के लिए लेखन करते हैं. उनकी कहानियां, लेख, उपन्यास एवं गांधी दर्शन पर अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. वह महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, बनारस में भी नाट्य विभाग में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रहे हैं. वह महात्मा गांधी के विचार एवं दर्शन पर कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देते हैं. 
संपर्क : गोरेगांव (पश्चिम), मुम्बई- 400104 (महाराष्ट्र)
ईमेल : sundharanandlal@gmail.com

Tuesday, July 9, 2019

सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं

हमने पत्रकार, संपादक, मीडिया प्राध्यापक और संस्कृति कर्मी, मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक प्रो. संजय द्विवेदी की किताब 'उर्दू पत्रकारिता का भविष्य' की समीक्षा की है.
सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं 
-फ़िरदौस ख़ान
उर्दू पत्रकारिता की अहमियत से किसी भी सूरत में इंकार नहीं किया जा सकता. पत्रकारिता का इतिहास बहुत पुराना है. या यूं कहें कि जब से इंसानी नस्लों ने एक-दूसरे को समझना और जानना शुरू किया, तभी से पत्रकारिता की शुरुआत हो गई थी. उस वक़्त लोग एक-दूसरे से बातचीत के ज़रिये अपनी बात अपने रिश्तेदारों या जान-पहचान वालों तक पहुंचाते थे. बादशाहों के अपने क़ासिद होते थे, जो ख़बरों को दूर-दराज के मुल्कों के बादशाहों तक पहुंचाते थे. गुप्तचर भी बादशाहों के लिए ख़बरें एकत्रित करने का काम करते थे. बादशाहों के शाही फ़रमानों से अवाम में मुनादी के ज़रिये बात पहुंचाई जाती थी. फ़र्क़ बस इतना था कि ये सूचनाएं विशेष लोगों के लिए ही हुआ करती थीं. वक़्त गुज़रता गया, इसके साथ ही सूचनाओं का दायरा बढ़ता गया और तरीक़ा बदलता गया. कबूतरों ने भी संदेश या ख़बरें एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का काम किया. आज यही काम अख़बार, रेडियो, टेलीविज़न, इंटरनेट और मोबाइल के ज़रिये किया जा रहा है.
हाल में भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के प्रोफ़ेसर संजय द्विवेदी की उर्दू पत्रकारिता पर आधारित एक किताब उर्दू पत्रकारिता का भविष्य प्रकाशित हुई है. इसमें तहसीन मुनव्वर, फ़िरोज़ अशऱफ, डॉ. अख्तर आलम, असद रज़ा, शाहिद सिद्दीक़ी, फ़िरदौस ख़ान, रघु ठाकुर, एहतेशाम अहमद ख़ान, डॉ. ए अज़ीज़ अंकुर, डॉ. मरज़िया आरिफ़, डॉ. हिसामुद्दीन फ़ारूक़ी, डॉ. आरिफ़ अज़ीज़, डॉ. राजेश रैना, शारिक नूर, इशरत सग़ीर, एज़ाज़ुर रहमान, संजय कुमार, डॉ. माजिद हुसैन, आऱिफ ख़ान मंसूरी, डॉ. जीए क़ादरी, मासूम मुरादाबादी और धनंजय चोपड़ा आदि के उर्दू की हालत को बयां करते कई लेख शामिल हैं. उर्दू पत्रकारिता के मुद्दे पर हिंदी में किताब प्रकाशित करना, वाक़ई उर्दू की लोकप्रियता को दर्शाता है.
किताब के संपादक संजय द्विवेदी कहते हैं कि इस किताब के बहाने हमने एक छोटी शुरुआत की है, इस भरोसे के साथ कि उर्दू सहाफ़त के मुस्तक़बिल पर बातचीत किसी अंजाम तक पहुंचेगी ज़रूर. वह कहते हैं कि आज की उर्दू पत्रकारिता के मुद्दे देश की भाषाई पत्रकारिता के मुद्दों से अलग नहीं हैं. समूची भारतीय भाषाओं के सामने आज अंग्रेजी और उसके साम्राज्यवाद का ख़तरा मंडरा रहा है. कई भाषाओं में संवाद करता हिंदुस्तान दुनिया और बाज़ार की ताक़तों को चुभ रहा है. उसकी संस्कृति को नष्ट करने के लिए पूरे हिंदुस्तान को एक भाषा (अंग्रेज़ी) में बोलने के लिए विवश करने के प्रयास चल रहे हैं. अपनी मातृभाषा को भूलकर अंग्रेज़ी में गपियाने वाली जमातें तैयार की जा रही हैं, जिनकी भाषा, सोच और सपने सब विदेशी हैं. अमेरिकी और पश्चिमी देशों की तरफ़ उड़ान भरने को तैयार यह पीढ़ी अपनी जड़ों को भूल रही है. उसे ग़ालिब, रहीम, रसखान, सूर, कबीर, तुलसी, मीरा, मलिक मोहम्मद जायसी की बजाय पश्चिमी धुनों पर थिरकाया जा रहा है. जड़ों से विस्मृत होती इस पीढ़ी को मीडिया की ताक़त से बचाया जा सकता है. अपनी भाषाओं, ज़मीन और संस्कृति से प्यार पैदा करके ही देशप्रेम से भरी पीढ़ी तैयार की जा सकती है. उर्दू पत्रकारिता की बुनियाद भी इन्हीं संस्कारों से जुड़ी है. उर्दू और उसकी पत्रकारिता को बचाना दरअसल एक भाषा भर को बचाने का मामला नहीं है, वह प्रतिरोध है बाज़ारवाद के ख़िलाफ़, प्रतिरोध है उस अधिनायकवादी मानसिकता के ख़िलाफ़ जो विविधताओं को, बहुलताओं को, स्वीकारने और आदर देने के लिए तैयार नहीं है. यह प्रतिरोध हिंदुस्तान की सभी भाषाओं का है, जो मरने के लिए तैयार नहीं हैं. वे अंग्रेज़ी के साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ डटकर खड़ी हैं और खड़ी रहेंगी.
उर्दू के भविष्य को लेकर जहां कुछ लोग फ़िक्रमंद नज़र आते हैं, वहीं ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो उर्दू के मुस्तक़बिल को रौशन मानते हैं. वरिष्ठ पत्रकार और शायर तहसीन मुनव्वर कहते हैं कि फ़िल्में हों या टीवी धारावाहिक सब जगह उर्दू की ज़रूरत है. इसलिए यही कहा जा सकता है कि उर्दू पत्रकारिता का भविष्य रौशन है, मगर सवाल इस बात का है कि जिनके हाथ में यह भविष्य है, वह रौशन ज़ेहन और रौशन क़लम और क़लम के धनी हैं कि नहीं? इसी तरह आकाशवाणी केंद्र भोपाल में संवाददाता शारिक नूर कहते हैं कि यदि उर्दू मीडिया के उजले पक्ष को देखा जाए, तो यह पीत पत्रकारिता से काफ़ी हद तक दूर है. केंद्र सरकार और कुछ अन्य मीडिया समूह उर्दू चैनल्स लाए हैं. उर्दू अख़बारों की बेवसाइट्स और ई-संस्करण हैं. हिंदी के कुछ अख़बार भी उर्दू भाषियों को आकर्षित करने के लिए उर्दू पन्ने प्रकाशित कर रहे हैं. भोपाल से प्रकाशित होने वाला एक हिंदी अख़बार उर्दू अदब नाम से हिंदी का पन्ना प्रकाशित करता है, तो एक अन्य मीडिया समूह रविवार के दिन फ़ारसी लिपि में ही उर्दू का एक पृष्ठ दे रहा है. इससे तो यही संकेत मिलता है कि उर्दू पत्रकारिता के लिए माहौल साज़गार है.
हिंदुस्तान में उर्दू मीडिया का भविष्य बहुत उज्जवल है, बशर्ते इस दिशा में गंभीरता से काम किया जाए. मौजूदा दौर में उर्दू अख़बारों के सामने कई मुश्किलें हैं. इस मुल्क में उर्दू के हज़ारों अख़बार हैं, लेकिन ज़्यादातर अख़बारों की माली हालत अच्छी नहीं है. उर्दू के पाठक कम होने की वजह से अख़बारों की प्रसार संख्या भी सीमित है. उर्दू अख़बारों को साल में गिने-चुने दिनों में ही विज्ञापन मिल पाते हैं. उर्दू अख़बारों को यह भी शिकायत रहती है कि सरकारी विज्ञापन भी उन्हें बहुत कम मिलते हैं. इसके अलावा क़ाग़ज़ की बढ़ती क़ीमतों ने अख़बारों के लिए मुश्किलें ही पैदा की हैं.
उर्दू मूल रूप से तुर्की भाषा का शब्द है. इसका मतलब है-शाही शिविर या ख़ेमा. तुर्कों के साथ यह शब्द भी हिंदुस्तान आया. उर्दू भारतीय संघ की 18 भाषाओं में से एक है. उर्दू के लिए फ़ारसी लिपि का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन कुछ ऐसी पत्रिकाएं भी हैं, जिनकी लिपि फ़ारसी न होकर हिंदी है. फ़िलहाल देश में उर्दू की हालत को बयान करने के लिए यह शेअर काफ़ी है-
सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं
मैं भी इस मुल्क में उर्दू की तरह रहता हूं
बहरहाल, यह किताब उर्दू पत्रकारिता पर आधारित एक बेहतर दस्ताव़ेज है. संजय द्विवेदी कहते हैं कि यह किताब देवनागरी में प्रकाशित की जा रही है, ताकि हिंदी भाषी पाठक भी उर्दू पत्रकारिता के स्वर्णिम अतीत और वर्तमान में उसके संघर्ष का आकलन कर सकें. बेशक, इस बेहतरीन कोशिश के लिए संजय द्विवेदी मुबारकबाद के मुस्तहक़ हैं.

समीक्ष्य कृति : उर्दू पत्रकारिता का भविष्य
संपादक : संजय द्विवेदी
प्रकाशक : यश पब्लिकेशंस, दिल्ली
क़ीमत : 295 रुपये


Friday, January 12, 2018

कविता संग्रह, जो वाक़ई ख़ास है

फ़िरदौस ख़ान
कविता अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम है, जिसके द्वारा मन की भावनाओं को सुंदरता से व्यक्त किया जाता है.  आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में, हृदय की मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं. हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के मतानुसार कविता का लोक प्रचलित अर्थ वह वाक्य है, जिसमें भावावेश हो, कल्पना हो, लालित्य हो, पद हो तथा प्रयोजन की सीमा समाप्त हो चुकी है. दरअसल, कविता में भाव तत्व की प्रधानता होती है. रस को कविता की आत्मा माना जाता है. कविता के अवयवों में आज भी इसकी जगह सबसे अहम है. प्राचीनकाल में कविता में छंद और अलंकारों को महत्वपूर्ण माना गया था, लेकिन आधुनिक काल में कविताएं छंद और अलंकारों से मुक्त हो गईं. कविताओं में छंदों और अलंकारों की अनिवार्यता ख़त्म हो गई और नई कविता का चलन शुरू हुआ. इस तरह मुक्त छंद या छंदहीन कविताओं की नदियां बहने लगीं.  मुक्तछंद कविताओं में पद की ज़रूरत नहीं होती, सिर्फ़ एक भाव प्रधान तत्व रहता है. आज की कविता में मनुष्य के मन में हिलोरें लेने वाली भावनाएं, उसके मस्तिष्क में उठने वाले विचार, कल्पनाएं और अनुभव प्रभावी हो गए और चंछ लुप्त हो गए. हां, इन कविताओं में एक लय होती है, भावों की लय, जो पाठक को बांधे रखती है.

कवि चेतन कश्यप की कविताएं भाव प्रधान कविताएं हैं. पिछले दिनों जयपुर के बोधि प्रकाशन ने उनका
काव्य संग्रह ’ख़ास तुम्हारे लिए’ प्रकाशित किया है. जितना दिलकश काव्य संग्रह का नाम है, इसमें शामिल कविताएं भी उतनी ही दिलकश हैं. 88 पृष्ठों के इस कविता संग्रह में दो खंड है. पहले खंड का नाम ’सफ़र-हमसफ़र है, जिसमें 27 कविताएं हैं. दूसरे खंड का नाम इसी पुस्तक के नाम पर है यानी ’ख़ास तुम्हारे लिए’ और इसमें 42 कविताओं को शामिल किया गया है. इन कविताओं में प्रेम है, वियोग है, मिलन की अभिलाषा है, टूटन है, बिखराव है और दरकते रिश्तों का दर्द है. और इस सबके साथ ही उम्मीद की एक ऐसी किरण भी है, जो ज़िन्दगी के अंधेरे को मिटाने देने के लिए आतुर नज़र आती है. रौशनी की एक ऐसी चाह है, जो हर तरफ़ उजाला बनकर बिखर जाना चाहती है. कविताएं प्रेयसी को संबोधित करती हैं, कवि के हृदय से निकली भावावेश की नदी में प्रेयसी को बहा ले जाना चाहती हैं. ऐसी ही एक कविता है-
साजो-सामन से
सज तो गया है
घर
तुम
आओ
रहो
तो प्राण प्रतिष्ठा भी हो जाए...

काव्य सृजन के मामले में भी काव्य संग्रह उत्कृष्ट है. कविता की भाषा में प्रवाह है, एक लय है. कवि ने कम से कम शब्दों में प्रवाहपूर्ण सारगर्भित बात कही है. कविताओं में शिल्प सौंदर्य है. कवि को अच्छे से मालूम है कि उसे अपनी भावनाओं को किन शब्दों में और किन बिम्बों के माध्यम से प्रकट करना है. और यही बिम्ब विधान पाठक को स्थायित्व प्रदान करते हैं. कविता में चिंतन और विचारों को सहज सौर सरल तरीके से पेश किया गया है, जिससे कविता का अर्थ पाठक को सहजता से समझ आ जाता है. पुस्तक का आवरण भी आकर्षक है. काव्य प्रेमियों के लिए यह एक अच्छा कविता संग्रह है.

समीक्ष्य कृति : ख़ास तुम्हारे लिए
कवि : चेतन कश्यप
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर
पेज : 88
मूल्य : 100 रुपये