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Monday, February 7, 2022

सूफ़ियाना बसंत पंचमी

 

फ़िरदौस ख़ान
बसंत पंचमी को जश्ने बहारा भी कहा जाता है, क्योंकि बसंत पंचमी बहार के मौसम का पैग़ाम लाती है. सूफ़ियों के लिए बंसत पंचमी का दिन बहुत ख़ास होता है. ख़ानकाहों में बसंत पंचमी मनाई जाती है. बसंत का पीला साफ़ा बांधे मुरीद बसंत के गीत गाते हैं. बसंत पंचमी के दिन मज़ारों पर पीली चादरें चढ़ाई जाती हैं. पीले फूलों की भी चादरें चढ़ाई जाती हैं, पीले फूल चढ़ाए जाते हैं. क़व्वाल पीले साफ़े बांधकर हज़रत अमीर ख़ुसरो के गीत गाते हैं.
आज बसंत मना ले सुहागन
आज बसंत मना ले  
अंजन–मंजन कर पिया मोरी
लंबे नेहर लगाए
तू क्या सोवे नींद की माटी
सो जागे तेरे भाग सुहागन
आज बसंत मना ले
ऊंची नार के ऊंचे चितवन
ऐसो दियो है बनाय
शाहे अमीर तोहे देखन को
नैनों से नैना मिलाय
आज बसंत मना ले, सुहागन
आज बसंत मना ले  

कहा जाता है कि ख़ानकाहों में बसंत पंचमी मनाने की यह रिवायत हज़रत अमीर ख़ुसरो ने शुरू की थी. हुआ यूं कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (रहमतुल्लाह) को अपने भांजे हज़रत सैयद नूह के विसाल से बहुत सदमा पहुंचा और वह उदास रहने लगे. हज़रत अमीर ख़ुसरो से अपने मुर्शिद की यह हालत देखी न गई. वे उन्हें ख़ुश करने के जतन करने लगे, लेकिन कामयाब नहीं हो पाए. एक दिन हज़रत अमीर ख़ुसरो अपने साथियों के साथ कहीं जा रहे थे. नीले आसमान पर सूरज दमक रहा था. उसकी सुनहरी किरनें ज़मीन पर पड़ रही थीं. उन्होंने रास्ते में सरसों के खेत देखे. सरसों के पीले फूल बहती हवा से लहलहा रहे थे. उनकी ख़ूबसूरती हज़रत अमीर ख़ुसरो की निगाहों में बस गई और वे वहीं खड़े होकर फूलों को निहारने लगे. तभी उन्होंने देखा कि एक मंदिर के पास कुछ हिन्दू श्रद्धालु हर्षोल्लास से नाच गा रहे हैं. यह देखकर उन्हें बहुत अच्छा लगा. उन्होंने इस बारे में पूछा तो श्रद्धालुओं ने बताया कि आज बसंत पंचमी है और वे लोग देवी सरस्वती पर पीले फूल चढ़ाने जा रहे हैं, ताकि देवी ख़ुश हो जाए.
इस पर हज़रत अमीर ख़ुसरो ने सोचा कि वे भी अपने पीर मुर्शिद, अपने औलिया को पीले फूल देकर ख़ुश करेंगे. फिर क्या था. उन्होंने पीले फूलों के गुलदस्ते बनाए और कुछ पीले फूल अपने साफ़े में भी लगा लिए. फिर वे अपने पीर भाइयों और क़व्वालों को साथ लेकर नाचते-गाते हुए अपने मुर्शिद के पास पहुंच गए. अपने मुरीदों को इस तरह नाचते-गाते देखकर उनके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई. और इस तरह बसंत पंचमी के दिन हज़रत अमीर ख़ुसरो को उनकी मनचाही मुराद मिल गई. तब से हज़रत अमीर ख़ुसरो हर साल बसंत पंचमी मनाने लगे. 
अमीर ख़ुसरो को सरसों के पीले फूल इतने भाये कि उन्होंने इन पर एक गीत लिखा-   
सगन बिन फूल रही सरसों
अम्बवा फूटे, टेसू फूले, कोयल बोले डार-डार
और गोरी करत सिंगार
मलनियां गेंदवा ले आईं कर सों
सगन बिन फूल रही सरसों
तरह तरह के फूल खिलाए
ले गेंदवा हाथन में आए
निज़ामुद्दीन के दरवज़्ज़े पर
आवन कह गए आशिक़ रंग
और बीत गए बरसों
सगन बिन फूल रही सरसों

ग़ौरतलब है कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (रहमतुल्लाह) चिश्ती सिलसिले के औलिया हैं. उनकी ख़ानकाह में बंसत पंचमी की शुरुआत होने के बाद दूसरी दरगाहों और ख़ानकाहों में भी बंसत पंचमी बड़ी धूमधाम से मनाई जाने लगी. इस दिन मुशायरों का भी आयोजन किया जाता है, जिनमें शायर बंसत पंचमी पर अपना कलाम पढ़ते हैं.
हिन्दुस्तान के अलावा पड़ौसी देशों पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी बंसत पंचमी को जश्ने बहारा के तौर पर ख़ूब धूमधाम से मनाया जाता है. 
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं)    

Wednesday, February 14, 2018

वेलेंटाइन डे और आप


कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं, जो हमें बिल्कुल भी पसंद नहीं होतीं... लेकिन हम उन्हें मिटा तो नहीं सकते, उनसे नफ़रत तो नहीं कर सकते... उन्हें बदल तो नहीं सकते... हो सकता है कि वो चीज़ें दूसरों को अच्छी लगती हों...

फ़िलहाल बात वेलेंटाइन डे की है... बहुत से लोगों को ये दिन बिल्कुल भी पसंद नहीं... इस दिन को नापसंद करने के लिए उनकी अपनी दलीलें हैं...
बहुत से लोगों को वेलेंटाइन अच्छा लगता है... वो इसे जज़्बात से जोड़ कर देखते हैं... कुछ लोगों के लिए ये दिन अपनी मुहब्बत के इक़रार करने का दिन है... कुछ लोगों के लिए ये दिन अपने परिवार के साथ कहीं बाहर घूम-फिर कर रोज़मर्रा की दुश्वारियों का तनाव दूर कर लेने का दिन है...

बहरहाल, वेलेंटाइन डे आप मनाएं या न मनाएं, या किस तरह मनाएं... आप अपने महबूब के साथ इसे मनाएं, अपने दोस्तों के साथ मनाएं, अपने वालदेन के साथ मनाएं, अपने भाई-बहनों के साथ मनाएं या फिर अपने बच्चों के साथ मनाएं... ये आपकी अपनी मर्ज़ी है...

Sunday, December 24, 2017

तुम मुझे यूं भुला न पाओगे


फ़िरदौस ख़ान
बहुमुखी संगीत प्रतिभा के धनी मोहम्मद रफ़ी का जन्म 24 दिसम्बर, 1924 को पंजाब के अमृतसर ज़िले के गांव मजीठा में हुआ. संगीत प्रेमियों के लिए यह गांव किसी तीर्थ से कम नहीं है. मोहम्मद रफ़ी के चाहने वाले दुनिया भर में हैं. भले ही मोहम्मद रफ़ी साहब हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ रहती दुनिया तक क़ायम रहेगी. साची प्रकाशन द्वारा प्रकाशित विनोद विप्लव की किताब मोहम्मद रफ़ी की सुर यात्रा मेरी आवाज़ सुनो मोहम्मद रफ़ी साहब के जीवन और उनके गीतों पर केंद्रित है. लेखक का कहना है कि मोहम्मद रफ़ी के विविध आयामी गायन एवं व्यक्तित्व को किसी पुस्तक में समेटना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव है, फिर भी अगर संगीत प्रेमियों को इस पुस्तक को पढ़कर मोहम्मद रफ़ी के बारे में जानने की प्यास थोड़ी-सी भी बुझ जाए तो मैं अपनी मेहनत सफल समझूंगा. इस लिहाज़ से यह एक बेहतरीन किताब कही जा सकती है.

मोहम्मद ऱफी के पिता का नाम हाजी अली मोहम्मद और माता का नाम अल्लारखी था. उनके पिता ख़ानसामा थे. रफ़ी के बड़े भाई मोहम्मद दीन की हजामत की दुकान थी, जहां उनके बचपन का काफ़ी वक़्त गुज़रा. वह जब क़रीब सात साल के थे, तभी उनके बड़े भाई ने इकतारा बजाते और गीत गाते चल रहे एक फ़क़ीर के पीछे-पीछे उन्हें गाते देखा. यह बात जब उनके पिता तक पहुंची तो उन्हें काफ़ी डांट पड़ी. कहा जाता है कि उस फ़क़ीर ने रफ़ी को आशीर्वाद दिया था कि वह आगे चलकर ख़ूब नाम कमाएगा. एक दिन दुकान पर आए कुछ लोगों ने ऱफी को फ़क़ीर के गीत को गाते सुना. वह उस गीत को इस क़दर सधे हुए सुर में गा रहे थे कि वे लोग हैरान रह गए. ऱफी के बड़े भाई ने उनकी प्रतिभा को पहचाना. 1935 में उनके पिता रोज़गार के सिलसिले में लाहौर आ गए. यहां उनके भाई ने उन्हें गायक उस्ताद उस्मान ख़ान अब्दुल वहीद ख़ान की शार्गिदी में सौंप दिया. बाद में रफ़ी ने पंडित जीवन लाल और उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खां जैसे शास्त्रीय संगीत के दिग्गजों से भी संगीत सीखा.

मोहम्मद रफ़ी उस वक़्त के मशहूर गायक और अभिनेता कुंदन लाल सहगल के दीवाने से और उनके जैसा ही बनना चाहते थे. वह छोटे-मोटे जलसों में सहगल के गीत गाते थे. क़रीब 15 साल की उम्र में उनकी मुलाक़ात सहगल से हुई. हुआ यूं कि एक दिन लाहौर के एक समारोह में सहगल गाने वाले थे. रफ़ी भी अपने भाई के साथ वहां पहुंच गए. संयोग से माइक ख़राब हो गया और लोगों ने शोर मचाना शुरू कर दिया. व्यवस्थापक परेशान थे कि लोगों को कैसे ख़ामोश कराया जाए. उसी वक़्त रफ़ी के बड़े भाई व्यवस्थापक के पास गए और उनसे अनुरोध किया कि माइक ठीक होने तक रफ़ी को गाने का मौक़ा दिया जाए. मजबूरन व्यवस्थापक मान गए. रफ़ी ने गाना शुरू किया, लोग शांत हो गए. इतने में सहगल भी वहां पहुंच गए. उन्होंने रफ़ी को आशीर्वाद देते हुए कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि एक दिन तुम्हारी आवाज़ दूर-दूर तक फैलेगी. बाद में रफ़ी को संगीतकार फ़िरोज़ निज़ामी के मार्गदर्शन में लाहौर रेडियो में गाने का मौक़ा मिला. उन्हें कामयाबी मिली और वह लाहौर फ़िल्म उद्योग में अपनी जगह बनाने की कोशिश करने लगे. उस दौरान उनकी रिश्ते में बड़ी बहन लगने वाली बशीरन से उनकी शादी हो गई. उस वक़्त के मशहूर संगीतकार श्याम सुंदर और फ़िल्म निर्माता अभिनेता नासिर ख़ान से रफ़ी की मुलाक़ात हुई. उन्होंने उनके गाने सुने और उन्हें बंबई आने का न्यौता दिया. ऱफी के पिता संगीत को इस्लाम विरोधी मानते थे, इसलिए बड़ी मुश्किल से वह संगीत को पेशा बनाने पर राज़ी हुए. रफ़ी अपने भाई के साथ बंबई पहुंचे. अपने वादे के मुताबिक़ श्याम सुंदर ने रफ़ी को पंजाबी फ़िल्म गुलबलोच में ज़ीनत के साथ गाने का मौक़ा दिया. यह 1944 की बात है. इस तरह रफ़ी ने गुलबलोच के सोनियेनी, हीरिएनी तेरी याद ने बहुत सताया गीत के ज़रिये पार्श्वगायन के क्षेत्र में क़दम रखा. रफ़ी ने नौशाद साहब से भी मुलाक़ात की. नौशाद ने फ़िल्म शाहजहां के एक गीत में उन्हें सहगल के साथ गाने का मौक़ा दिया. रफ़ी को सिर्फ़ दो पंक्तियां गानी थीं-मेरे सपनों की रानी, रूही, रूही रूही. इसके बाद नौशाद ने 1946 में उनसे फ़िल्म अनमोल घड़ी का गीत तेरा खिलौना टूटा बालक, तेरा खिलौना टूटा रिकॉर्ड कराया. फिर 1947 में फ़िरोज़ निज़ामी ने रफ़ी को फ़िल्म जुगनूं का युगल गीत नूरजहां के साथ गाने का मौक़ा दिया. बोल थे- यहां बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है. यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ. इसके बाद नौशाद ने रफ़ी से फ़िल्म मेला का एक गीत ये ज़िंदगी के मेले गवाया. इस फ़िल्म के बाक़ी गीत मुकेश से गवाये गए, लेकिन रफ़ी का गीत अमर हो गया. यह गीत हिंदी सिनेमा के बेहद लोकप्रिय गीतों में से एक है. इस बीच रफ़ी संगीतकारों की पहली जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम के संपर्क में आए. इस जोड़ी ने अपनी शुरुआती फ़िल्मों प्यार की जीत, बड़ी बहन और मीना बाज़ार में रफ़ी की आवाज़ का भरपूर इस्तेमाल किया. इसके बाद तो नौशाद को भी फ़िल्म दिल्लगी में नायक की भूमिका निभा रहे श्याम कुमार के लिए रफ़ी की आवाज़ का ही इस्तेमाल करना पड़ा. इसके बाद फ़िल्म चांदनी रात में भी उन्होंने रफ़ी को मौक़ा दिया. बैजू बावरा संगीत इतिहास की सिरमौर फ़िल्म मानी जाती है. इस फ़िल्म ने रफ़ी को कामयाबी के आसमान तक पहुंचा दिया. इस फ़िल्म में प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खां साहब और डी वी पलुस्कर ने भी गीत गाये थे. फ़िल्म के पोस्टरों में भी इन्हीं गायकों के नाम प्रचारित किए गए, लेकिन जब फिल्म प्रदर्शित हुई तो मोहम्मद रफ़ी के गाये गीत तू गंगा की मौज और ओ दुनिया के रखवाले हर तरफ़ गूंजने लगे. रफ़ी ने अपने समकालीन गायकों तलत महमूद, मुकेश और सहगल के रहते अपने लिए जगह बनाई. रफ़ी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने तक़रीबन 26 हज़ार गाने गाये, लेकिन उनके तक़रीबन पांच हज़ार गानों के प्रमाण मिलते हैं, जिनमें ग़ैर फ़िल्मी गीत भी शामिल हैं. देश विभाजन के बाद जब नूरजहां, फ़िरोज़ निज़ामी और निसार वाज्मी जैसी कई हस्तियां पाकिस्तान चली गईं, लेकिन वह हिंदुस्तान में ही रहे. इतना ही नहीं, उन्होंने सभी गायकों के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा देशप्रेम के गीत गाये. रफ़ी ने जनवरी, 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के एक माह बाद गांधी जी को श्रद्धांजलि देने के लिए हुस्नलाल भगतराम के संगीत निर्देशन में राजेंद्र कृष्ण रचित सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों, बापू की ये अमर कहानी गीत गाया तो पंडित जवाहर लाल नेहरू की आंखों में आंसू आ गए थे. भारत-पाक युद्ध के वक़्त भी रफ़ी ने जोशीले गीत गाये. यह सब पाकिस्तानी सरकार को पसंद नहीं था. शायद इसलिए दुनिया भर में अपने कार्यक्रम करने वाले रफ़ी पाकिस्तान में शो पेश नहीं कर पाए. ऱफी किसी भी तरह के गीत गाने की योग्यता रखते थे. संगीतकार जानते थे कि आवाज़ को तीसरे सप्तक तक उठाने का काम केवल ऱफी ही कर सकते थे. मोहम्मद रफ़ी ने संगीत के उस शिखर को हासिल किया, जहां तक कोई दूसरा गायक नहीं पहुंच पाया. उनकी आवाज़ के आयामों की कोई सीमा नहीं थी. मद्धिम अष्टम स्वर वाले गीत हों या बुलंद आवाज़ वाले याहू शैली के गीत, वह हर तरह के गीत गाने में माहिर थे. उन्होंने भजन, ग़ज़ल, क़व्वाली, दशभक्ति गीत, दर्दभरे तराने, जोशीले गीत, हर उम्र, हर वर्ग और हर रुचि के लोगों को अपनी आवाज़ के जादू में बांधा. उनकी असीमित गायन क्षमता का आलम यह था कि उन्होंने रागिनी, बाग़ी, शहज़ादा और शरारत जैसी फ़िल्मों में अभिनेता-गायक किशोर कुमार पर फ़िल्माये गीत गाये.

वह 1955 से 1965 के दौरान अपने करियर के शिखर पर थे. यह वह व़क्त था, जिसे हिंदी फ़िल्म संगीत का स्वर्ण युग कहा जा सकता है. उनकी आवाज़ के जादू को शब्दों में बयां करना नामुमकिन है. उनकी आवाज़ में सुरों को महसूस किया जा सकता है. उन्होंने अपने 35 साल के फ़िल्म संगीत के करियर में नौशाद, सचिन देव बर्मन, सी रामचंद्र, रोशन, शंकर-जयकिशन, मदन मोहन, ओ पी नैयर, चित्रगुप्त, कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, सलिल चौधरी, रवींद्र जैन, इक़बाल क़ुरैशी, हुस्नलाल, श्याम सुंदर, फ़िरोज़ निज़ामी, हंसलाल, भगतराम, आदि नारायण राव, हंसराज बहल, ग़ुलाम हैदर, बाबुल, जी एस कोहली, वसंत देसाई, एस एन त्रिपाठी, सज्जाद हुसैन, सरदार मलिक, पंडित रविशंकर, उस्ताद अल्ला रखा, ए आर क़ुरैशी, लच्छीराम, दत्ताराम, एन दत्ता, सी अर्जुन, रामलाल, सपन जगमोहन, श्याम जी-घनश्यामजी, गणेश, सोनिक-ओमी, शंभू सेन, पांडुरंग दीक्षित, वनराज भाटिया, जुगलकिशोर-तलक, उषा खन्ना, बप्पी लाह़िडी, राम-लक्ष्मण, रवि, राहुल देव बर्मन और अनु मलिक जैसे संगीतकारों के साथ मिलकर संगीत का जादू बिखेरा.

रफ़ी साहब ने 31 जुलाई, 1980 को आख़िरी सांस ली. उन्हें दिल का दौरा पड़ा था. जिस रोज़ उन्हें जुहू के क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया, उस दिन बारिश भी बहुत हो रही थी. उनके चाहने वालों ने उन्हें नम आंखों से विदाई दी. लग रहा था मानो ऱफी साहब कह रहे हों-
हां, तुम मुझे यूं भुला न पाओगे
जब कभी भी सुनोगे गीते मेरे
संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे…

Friday, December 22, 2017

अवाम की आस हैं राहुल गांधी

फ़िरदौस ख़ान
कहते हैं जब तरक़्क़ी मिलती है, तो उसके साथ ही ज़िम्मेदारियां भी बढ़ जाती हैं. राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए हैं. उन्हें पार्टी का अध्यक्ष पद मिल गया है और इसके साथ ही उन्हें ढेर सारी चुनौतियां भी मिली हैं, जिसका सामना उन्हें क़दम-क़दम पर करना है. राहुल गांधी ऐसे वक़्त में पार्टी के अध्यक्ष बने हैं, जब कांग्रेस देश की सत्ता से बाहर है. ऐसी हालत में उन पर दोहरी ज़िम्मेदारी आन पड़ी है. पहली ज़िम्मेदारी पार्टी संगठन को मज़बूत बनाने की है और दूसरी खोई हुई हुकूमत को फिर से हासिल करने की है. राहुल गांधी पर इससे बड़ी भी एक ज़िम्मेदारी है और वह है देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने की ज़िम्मेदारी, देश में चैन-अमन क़ायम करने की ज़िम्मेदारी. देश में ऐसा माहौल बनाने की ज़िम्मेदारी, जिसमें सभी मज़हबों के लोग चैन-अमन के साथ मिलजुल कर रह सकें. पिछले तीन-चार सालों में देश में जो सांप्रदायिक घटनाएं हुई हैं, उनकी वजह से न सिर्फ़ देश का माहौल ख़राब हुआ है, बल्कि विदेशों में भी भारत की छवि धूमिल हुई है. ऐसी हालत में देश को, अवाम को राहुल गांधी से बहुत उम्मीदें हैं.

देश के कई राज्यों में जहां पहले कांग्रेस की हुकूमत हुआ करती थी, अब वहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार है. लगातार बढ़ती महंगाई, नोटबंदी, जीएसटी और सांप्रदायिक घटनाओं को लेकर लोग भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ नज़र आ रहे हैं. ऐसे में कांग्रेस के पास अच्छा मौक़ा है. वह जन आंदोलन चलाकर भारी जन समर्थन जुटा सकती है, अपना जनाधार बढ़ा सकती है, पार्टी को मज़बूत कर सकती है. इसके लिए राहुल गांधी को देशभर के सभी राज्यों में युवा नेतृत्व को आगे लाना होगा. इसके साथ ही कांग्रेस के शासनकाल में हुए विकास कार्यों को भी जनता के बीच रखना होगा. जनता को बताना होगा कि कांग्रेस और भाजपा के शासन में क्या फ़र्क़ है. कांग्रेस ने मनरेगा, आरटीआई और खाद्य सुरक्षा जैसी अनेक कल्याणकारी योजनाएं दीं, जिनका सीधा फ़ायदा जनता को हुआ. लेकिन कांग्रेस के नेता चुनावों में इनका कोई भी फ़ायदा नहीं ले पाए. यह कांग्रेस की बहुत बड़ी कमी रही, जबकि भारतीय जनता पार्टी जनता से कभी पूरे न होने वाले लुभावने वादे करके सत्ता तक पहुंच गई.

ये कांग्रेस की ख़ासियत है कि वह जन हित की बात करती है, जनता की बात करती है. कांग्रेस एक ऐसी पार्टी है, जो बिना किसी भेदभाव के सभी तबक़ों को साथ लेकर चलती है. कांग्रेस ने देश के लिए बहुत कुछ किया है. जिन्हें आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है, उनमें कांग्रेस के ही नेता सबसे आगे रहे हैं, चाहे वह पंडित जवाहरलाल नेहरू हों या फिर श्रीमती इंदिरा गांधी या उनके बेटे राजीव गांधी. कांग्रेस की अध्यक्ष रहते हुए श्रीमती सोनिया गांधी ने पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया. उन्होंने एक दशक तक देश को मज़बूत और जन हितैषी सरकार दी. अब बारी राहुल गांधी की है. मौजूदा हालात को देखते हुए यह कहना क़तई ग़लत न होगा कि आज देश को राहुल गांधी जैसे ईमानदार नेता की ज़रूरत है, जो मक्कारी और फ़रेब की सियासत नहीं करते. वे बेबाक कहते हैं, 'मैं झूठे वादे नहीं करता. इससे मुझे नुक़सान भी होता है. अगर कोई मुझसे कहे कि आप झूठ बोल कर राजनीति करो, तो मैं यह नहीं कर सकता." राहुल गांधी की यही ईमानदारी उन्हें क़ाबिले-ऐतबार बनाती है, उन्हें लोकप्रिय बनाती है. सनद रहे कि एक सर्वे में विश्वसनीयता के मामले में दुनिया के बड़े नेताओं में राहुल गांधी को तीसरा दर्जा मिला हैं, यानी दुनिया भी उनकी ईमानदारी का लोहा मानती है. उनकी अध्यक्षता में कांग्रेस कामयाबी की बुलंदियों को छुये, ऐसी उम्मीद उनसे की जा सकती है.

राहुल गांधी पर यह भी ज़िम्मेदारी रहेगी कि युवाओं को आगे लाने के साथ-साथ वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को भी साथ लेकर चलें. वरिष्ठ नेताओं के अनुभव की रौशनी में युवा नेताओं का जोश और मेहनत पार्टी को मज़बूती दे सकती है. इसके साथ ही उन्हें अंदरूनी कलह से भी चो-चार होना पड़ेगा. पार्टी का नया संगठन खड़ा होना है, ऐसे में जिन लोगों को उनकी पसंद का पद नहीं मिलेगा, वे पार्टी के लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं. इतना ही नहीं, पार्टी को रणनीति पर भी ख़ास ध्यान देना होगा. एक छोटी-सी ग़लती भी बड़े नुक़सान की वजह बन जाया करती है. मिसाल के तौर पर मणिपुर और गोवा को ही लें, इन दोनों ही राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी से बेहतर प्रदर्शन किया था, लेकिन सियासी रणनीति सही नहीं होने की वजह से कांग्रेस सरकार बनाने में नाकाम रही. इतना ही नहीं, बिहार के विधानसभा चुनाव में जीत के बाद भी कांग्रेस सरकार को संभाल नहीं पाई और सत्ता भारतीय जनता पार्टी ने हथिया ली. यहां भी कांग्रेस को बड़ी नाकामी मिली. इसमें कोई दो राय नहीं है कि कांग्रेस की नैया डुबोने में पार्टी के खेवनहारों ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. राहुल गांधी को इस बात को भी मद्देनज़र रखते हुए आगामी रणनीति बनानी होगी. कांग्रेस के कुछ नेताओं ने पार्टी को अपनी जागीर समझ रखा है और सत्ता के मद में चूर वे कार्यकर्ताओं और जनता से दूर होते चले गए, जिसका ख़ामियाज़ा कांग्रेस को पिछले आम चुनाव और विधानसभा चुनावों में उठाना पड़ा. पार्टी की अंदरूनी कलह, आपसी खींचतान, कार्यकर्ताओं की बात को तरजीह न देना कांग्रेस के लिए नुक़सानदेह साबित हुआ. हालत यह रही कि अगर कोई कार्यकर्ता पार्टी के नेता से मिलना चाहे, तो उसे वक़्त नहीं दिया जाता था. कांग्रेस में सदस्यता अभियान के नाम पर भी सिर्फ़ ख़ानापूर्ति ही की गई. इसके दूसरी तरफ़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में लाने के लिए दिन-रात मेहनत की. भाजपा का जनाधार बढ़ाने पर ख़ासा ज़ोर दिया. संघ और भाजपा ने ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को पार्टी से जोड़ा. केंद्र में सत्ता में आने के बाद भी भाजपा अपना जनाधार बढ़ाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही है. कांग्रेस को भी अपना जनाधार बढ़ाने और उसे मज़बूत करने पर ध्यान देना चाहिए.

राहुल गांधी पिछड़ों और दलितों को पार्टी से जोड़ने का काम कर रहे हैं, इसका उन्हें फ़ायदा होगा. उन्हें अल्पसंख्यकों ख़ासकर मुसलमानों को भी कांग्रेस से जोड़ने के लिए काम शुरू करना चाहिए. वैसे तो मुस्लिम कांग्रेस के कट्टर समर्थक रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ बरसों में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाई है. इससे मुस्लिम वोट का बंटवारा हो गया, जिसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा भारतीय जनता पार्टी को होता है.

साल 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं. इससे पहले आठ राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे, जिनमें कर्नाटक, मेघालय, मिज़ोरम, त्रिपुरा और नगालैंड शामिल हैं. कर्नाटक, मेघालय और मिज़ोरम में कांग्रेस की हुकूमत है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी की सत्ता है. इन राज्यों में कांग्रेस को भारतीय जनता पार्टी से कड़ा मुक़ाबला करना होगा. इसके लिए कांग्रेस को अभी से तैयारी शुरू करनी होगी. गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव नतीजे इन राज्यों को कितना प्रभावित करते हैं, यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा.

बहरहाल, राहुल गांधी को अपनी पार्टी के नेताओं, सांसदों, विधायकों, कार्यकर्ताओं और समर्थकों से ऐसा रिश्ता क़ायम करना होगा, जिसे बड़े से बड़ा लालच भी तोड़ न पाए. इसके लिए उन्हें पार्टी कार्यकर्ताओं से संवाद करना होगा, आम लोगों से मिलना होगा, उनके मन की बात सुननी होगी. राहुल गांधी ने पार्टी संगठन को मज़बूत कर लिया, तो बेहतर नतीजों की उम्मीद की जा सकती है. उन्हें चाहिए कि वे पार्टी के आख़िरी कार्यकर्ता तक से संवाद करें. उनकी पहुंच हर कार्यकर्ता तक हो और कार्यकर्ता की पहुंच राहुल गांधी तक होनी चाहिए. अगर ऐसा हो गया तो कांग्रेस को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक पाएगा और आने वाला वक़्त कांग्रेस का होगा. राहुल गांधी के पास वक़्त है, मौक़ा है, वे चाहें तो इतिहास रच सकते हैं.

Friday, August 25, 2017

निजता पर अवाम की जीत

फ़िरदौस ख़ान
जीवन के हर क्षेत्र में तकनीक के चलन से जहां लोगों को बहुत सी सुविधाएं मिली हैं, वहीं इनकी वजह से कई परेशानियां भी पैदा हो गई हैं.   ये कहना ग़लत न होगा कि तकनीक के इस आधुनिक युग में व्यक्ति की निजता पर लगातार हमले हो रहे हैं. जिस तेज़ी से तकनीक का विकास हो रहा है, उसी तेज़ी से साइबर अपराध भी बढ़ रहे हैं, जो बेहद चिंता की बात है. इस सबके बीच सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला राहत देता नज़र आता है. ये अच्छी ख़बर है कि अब लोगों की निजी जानकारी सार्वजनिक नहीं होगी. सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार को संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार क़रार दिया है. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा है कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीने के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अंतर्भूत हिस्सा है. क़ाबिले-ग़ौर है कि 24 अगस्त को दिए अपने फ़ैसले में पीठ ने शीर्ष अदालत के उन दो पुराने फ़ैसलों को ख़ारिज कर दिया, जिनमें निजता को मौलिक अधिकार नहीं माना गया था. इन फ़ैसलों की वजह से निजता के अधिकार पर असर पड़ता था. एमपी शर्मा मामले में छह जजों ने साल 1954 में और खडग सिंह मामले में आठ जजों ने साल 1962 में ये फ़ैसले सुनाए थे. सर्वोच्च न्यायालय के इस अहम फ़ैसले से सरकार के उस रुख़ को करारा झटका लगा है, जिसके तहत वह निजता के अधिकार को संवैधानिक मौलिक आधार नहीं मानती.

ग़ौरतलब है कि तक़रीबन चार साल पहले उस वक़्त निजता के अधिकार को लेकर सवाल उठने शुरू हुए थे, जब अमेरिका में करोड़ों नागरिकों की निजी जानकारियां ऑन लाइन लीक हो गई थीं.एक अमेरिकी इंटेलीजेंस एजेंसी सीआईए के पूर्व एजेंट एडवर्ड स्नोडन ने सारी जानकारियां ऑनलाइन लीक कर दी थीं. भारत में भी कुछ ऐसा ही हुआ था. जब इस साल मई में आधार कार्ड के लिए इकट्ठी हुईं कई भारतीयों की निजी जानकारियां ऑन लाइन लीक हो गईं. देश में यह मामला इसलिए भी ख़ास है, क्योंकि सरकार ने आधार कार्ड को विभिन्न योजनाओं के लिए अनिवार्य कर दिया है. मसलन आय कर रिटर्न भरने, बैंकों में खाता खोलने, क़र्ज़ लेने, पेंशन पाने और वित्तीय लेन-देन यहां तक कि मत्यु प्रमाण पत्र बनवाने के लिए भी आधार कार्ड को अनिवार्य बना दिया है. याचिकाकर्ता आर चंद्रशेखरने आधार कार्ड को निजता के अधिकार में दख़ल अंदाज़ी बताते हुए इसकी अनिवार्यता ख़त्म करने की मांग की थी. इस पर सरकार ने अदालत में कहा था कि निजता का अधिकार तो है, लेकिन वो संपूर्ण अधिकार नहीं है.भारत के संविधान में कोई भी अधिकार संपूर्ण अधिकार नहीं होता है, हर अधिकार के साथ कुछ शर्तें होती हैं. इसलिए देश में इस पर बहस छिड़ गई कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है या नहीं. मामला की गंभीरता को देखते हुए इसे पहले तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ के पास भेजा गया. उसके बाद सुनवाई के लिए पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ के पास मामला गया. फिर 18 जुलाई को नौ सदस्यीय संविधान पीठ का गठन किया गया. इस पीठ ने नियमित सुनवाई करके पिछले 2 अगस्त को फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था. इस मामले की सुनवाई के दौरान कई अजीबो-ग़रीब दलीलें पेश की गईं, मसलन पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने एक दलील में कहा था कि नागरिक के शरीर पर ख़ुद उसका नहीं, बल्कि राज्य का अधिकार है. यह जुमला सुर्ख़ियों में ख़ूब रहा. इस पर भाजपा सरकार की ख़ासी किरकिरी भी हुई.
बहरहाल, कांग्रेस नेताओं ने सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले का स्वागत करते हुए इसे सरकार की फ़ासीवादी सोच के ख़िलाफ़ व्यक्तिगत अधिकारों की जीत क़रार दिया है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय का निजता का मूलभूत अधिकार के बारे में आया फ़ैसला वैयक्तिक अधिकार, वैयक्तिक स्वतंत्रता व मानवीय गरिमा के एक नये युग का संदेशवाहक है. यह आम आदमी के जीवन में राज्य व उसकी एजेंसियों द्वारा की जा रही निरंकुश घुसपैठ एवं निगरानी के ख़िलाफ़ प्रहार है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी और उसकी सरकारें तथा विपक्षी दल इस अधिकार के पक्ष में इनको सीमित करने के भाजपा सरकार के अहंकारपूर्ण रवैये के ख़िलाफ़ अदालत और संसद में आवाज़ उठा चुके हैं. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले से फ़ासीवादी ताक़तों पर करारा प्रहार हुआ है. निगरानी के ज़रिये दबाने की भाजपा की विचारधारा को मज़बूती से नकारा गया है. उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले का हम स्वागत करते हैं, जिसमें निजता के अधिकार को व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं गरिमा का मूलभूत अंग बताया गया है.
कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम का कहना है कि भाजपा सरकार ने अनुच्छेद-21 का जिस तरह से मतलब निकाला है, उससे निजता के अधिकार का हनन हुआ है.उन्होंने ये भी कहा कि आधार में कोई कमी नहीं है, लेकिन यह सरकार जिस तरह से आधार का इस्तेमाल या ग़लत इस्तेमाल करना चाहती है, गड़बड़ी उसमें है. उन्होंने कहा कि ये एक ऐतिहासिक फ़सला है और भारत के संविधान के अस्तित्व में आने के बाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गये सबसे महत्वपूर्ण फ़ैसलों में शामिल किया जाएगा. सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले के कारण अनुच्छेद-21 को एक नई भव्यता मिली है. निजता वैयक्तिक स्वतंत्रता के मूल में है तथा यह स्वयं जीवन का अविभाज्य अंग है.  उन्होंने ये भी कहा कि यूपीए सरकार द्वारा आधार को एक प्रशासनिक उपाय के रूप में विचारित किया गया था, ताकि लक्षित लोगों तक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचना सुनिश्चत हो सके. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के महासचिव सीताराम येचुरी ने इसे एक दूरगामी फ़ैसला बताते हुए कहा कि दिनोदिन हमारी ज़िन्दगी में तकनीक की भूमिका बढ़ती जा रही है. विदेशी तकनीकी कंपनियों द्वारा डाटा का ग़लत इस्‍तेमाल किया जा रहा है. ऐसे में फ़ैसले से हमारे अधिकारों को सुरक्षित रखने का मार्ग प्रशस्‍त होगा. दूसरी तरह भारती जनता पार्टी के नेता अपनी सरकार का बचाव करते नज़र आ रहे हैं. उनका कहना है कि निजता का अधिकार संभवत: मौलिक अधिकार है, लेकिन कुछ मामलों में इसमें जायज़ पाबंदियां रहेंगी. याचिकाकर्ता आर चंद्रशेखर का कहना है कि पूरी दुनिया डिजिटल युग की तरफ़ बढ़ रही है. ऐसे में नागरिकों के पास सूचना के दुरुपयोग के ख़िलाफ़ ज़रूरी अधिकार होने चाहिए.


बहरहाल, देखना ये है कि निजता के अधिकार पर सरकार सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को कितनी गंभीरता से लेती है, क्योंकि सरकार के पास आधार को लेकर अपनी बहुत सी दलीले हैं.

Friday, June 16, 2017

सियासत

फ़िरदौस ख़ान
सियासत में तीन तरह के लोग हुआ करते हैं... पहले वो, जिन्हें सियासत विरासत में मिलती है... जिन्होंने सियासत में आने के लिए कोई जद्दो-जहद नहीं की... दूसरे वो, जो कार्यकर्ता बनकर आए और अपनी मेहनत और मह्त्वाकांक्षा से उन्होंने अपनी पहचान बनाई... और तीसरे वो लोग, जिन्होंने सारी ज़िन्दगी एक कार्यकर्ता की हैसियत से सियासत में गुज़ार दी... उन्हें न कोई ओहदा मिला, ना कोई नाम मिला और न ही कोई दाम मिला... इसके बावजूद वे अपनी पार्टी के लिए हमेशा वफ़ादार रहे... ऐसे ही लोगों के दम पर सियासी दल अपना वजूद क़ायम किए हुए हैं... 

Tuesday, June 6, 2017

जनवादी पत्रकारिता की बात करें

फ़िरदौस ख़ान
ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है.

आज का अख़बार कल का साहित्य है, इतिहास है. अख़बार दुनिया और समाज का आईना हैं. देश-दुनिया में में जो घट रहा है, वह सब सूचना माध्यमों के ज़रिये जन-जन तक पहुंच रहा है. आज के अख़बार-पत्रिकाएं भविष्य में महत्वपूर्ण दस्तावेज़ साहिब होंगे, क्योंकि इनके ज़रिये ही आने वाली पीढ़ियां आज के हालात के बारे में जान पाएंगी. इसके ज़रिये ही लोगों को समाज की उस सच्चाई का पता चलता है, जिसका अनुभव उसे ख़ुद नहीं हुआ है. साथ ही उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का भी पता चलता है. पत्रकारिता सरकार और जनता के बीच सेतु का काम करती है. अख़बारों के ज़रिये अवाम को सरकार की नीतियों और उसके कार्यों का पता चलता है. ठीक इसी तरह अख़बार जनमानस की बुनियादी ज़रूरतों, समस्याओं और उनकी आवाज़ को सरकार तक पहुंचाने का काम करते हैं.

आज राष्ट्रवादी पत्रकारिता की बात हो रही है. पत्रकारिता तो होती ही राष्ट्रवादी है. ऐसे में राष्ट्रवादी पत्रकारिता की बात समझ से परे है.  हालांकि पत्रकारिता की शुरुआत सूचना देने से हुई थी, लेकिन बदलते वक़्त के साथ इसका दायरा बढ़ता गया. इसमें विचार भी शामिल हो गए. पत्रकारिता के इतिहास पर नज़र डालें, तो ये बात साफ़ हो जाती है. माना जाता है कि पत्रकारिता 131 ईस्वी पूर्व रोम में शुरू हुई. उस वक़्त Acta Diurna नामक दैनिक अख़बार शुरू किया गया. इसमें उस दिन होने वाली घटनाओं का लेखा-जोखा होता था. ख़ास बात यह थी कि यह अख़बार काग़ज़ का न होकर पत्थर या धातु की पट्टी का था. इस पर उस दिन की ख़ास ख़बरें अंकित होती थीं. इन पट्टियों को शहर की ख़ास जगहों पर रखा जाता था, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इन्हें पढ़ सकें. इनके ज़रिये लोगों को आला अफ़सरों की तैनाती, शासन के फ़ैसलों और दूसरी ख़ास ख़बरों की जानकारी मिलती थी. फिर मध्यकाल में यूरोप के कारोबारी केंद्र सूचना-पत्र निकालने लगे, जिनमें कारोबार से जुड़ी ख़बरें होती थीं. इनके ज़रिये व्यापारियों को वस्तुओं, ख़रीद-बिक्री और मुद्रा की क़ीमत में उतार-चढ़ाव की ख़बरें मिल जाती थीं. ये सूचना-पत्र हाथ से लिखे जाते थे. पंद्रहवीं सदी के बीच 1439 में जर्मन के मेंज में रहने वाले योहन गूटनबर्ग ने छपाई मशीन का आविष्कार किया. उन्होंने धातु के अक्षरों का आविष्कार किया. इसके ज़रिये छपाई का काम आसान हो गया. सोलहवीं सदी के आख़िर तक यूरोप के शहर स्त्रास्बुर्ग में सूचना-पत्र मशीन से छपने लगे. उस वक़्त यह काम योहन कारोलूस नाम के एक कारोबारी ने शुरू किया. उसने 1605 में ‘रिलेशन’ नामक समाचार-पत्र का प्रकाशन शुरू किया, जो दुनिया का पहला मुद्रित समाचार-पत्र माना जाता है.
भारत में साल 1674 में छपाई मशीन आई.  लेकिन इसका इस्तेमाल नहीं हुआ. देश का पहला अख़बार शुरू होने में सौ साल से ज़्यादा का वक़्त लगा, यानी साल 1776 में अख़बार का प्रकाशन शुरू हो सका.  ईस्ट इंडिया कंपनी के पूर्व अधिकारी विलियम वोल्ट्स ने अंग्रेज़ी भाषा के अख़बार का प्रकाशन शुरू किया, जिसमें कंपनी और सरकार की ख़बरें होती थीं. यह एक तरह का सूचना-पत्र थी, जिसमें विचार नहीं थे. इसके बाद साल 1780 में जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने ‘बंगाल गज़ट’ नाम का अख़बार शुरू किया, जिसमें ख़बरों के साथ विचार भी थे. हक़ीक़त में यही देश का सबसे पहला अख़बार था. इस अख़बार में ईस्ट इंडिया कंपनी के आला अफ़सरों की ज़िन्दगी पर आधारित लेख प्रकाशित होते थे. मगर जब अख़बार ने गवर्नर की पत्नी के बारे में टिप्पणी की, तो अख़बार के संपादक जेम्स ऑगस्टस हिक्की को चार महीने की क़ैद और 500 रुपये का जुर्माने की सज़ा भुगतनी पड़ी. सज़ा के बावजूद जेम्स ऑगस्टस हिक्की हुकूमत के आगे झुके नहीं और बदस्तूर लिखते रहे.  गवर्नर और सर्वोच्च न्यायाधीश की आलोचना करने पर उन्हें एक साल की क़ैद और पांच हज़ार रुपये जुर्माने की सज़ा दी गई. नतीजतन, अख़बार बंद हो गया. साल 1790 के बाद देश में अंग्रेज़ी भाषा के कई अख़बार शुरू हुए, जिनमें से ज़्यादातर सरकार का गुणगान ही करते थे. मगर इनकी उम्र ज़्यादा नहीं थी. रफ़्ता-रफ़्ता ये बंद हो गए.

साल 1818 में ब्रिटिश व्यापारी जेम्स सिल्क बर्किघम ने ’कलकत्ता जनरल’ प्रकाशन किया. इसमें जनता की ज़रूरत को ध्यान में रखकर प्रकाशन सामग्री प्रकाशित की जाती थी. आधुनिक पत्रकारिता का यह रूप जेम्स सिल्क बर्किघम का ही दिया हुआ है. ग़ौरतलब है कि पहला भारतीय अंग्रेज़ी अख़बार साल 1816 में कलकत्ता में गंगाधर भट्टाचार्य ने शुरू किया. 'बंगाल गज़ट' नाम का यह अख़बार साप्ताहिक था.  साल 1818 में बंगाली भाषा में 'दिग्दर्शन' मासिक पत्रिका और साप्ताहिक समाचार पत्र 'समाचार दर्पण’ का प्रकाशन शुरू हुआ.  साल 1821 में राजा राममोहन राय ने बंगाली भाषा का अख़बार शुरू किया, जिसका नाम था- संवाद कौमुदी’ यानी बुद्धि का चांद. भारतीय भाषा का यह पहला समाचार-पत्र था. उन्होंने साल 1822 में 'समाचार चंद्रिका' भी शुरू की.  उन्होंने साल 1822 में फ़ारसी भाषा में 'मिरातुल' अख़बार और अंग्रेज़ी भाषा में 'ब्राह्मनिकल मैगज़ीन' का प्रकाशन शुरू किया. साल 1822 में गुजराती भाषा का साप्ताहिक ‘मुंबईना समाचार’ प्रकाशन शुरू हुआ, जो आज भी छप रहा है. यह भारतीय भाषा का सबसे पुराना अख़बार है. हिन्दी भाषा का पहला अख़बार ‘उदंत मार्तंड’ साल 1826 में शुरू हुआ, लेकिन माली हालत ठीक न होने की वजह से यह बंद हो गया.  साल 1830 में राजा राममोहन राय ने बंगाली भाषा में 'बंगदूत' का प्रकाशन शुरू किया. साल 1831 में मुंबई में गुजराती भाषा में 'जामे जमशेद' और 1851 में 'रास्त गोफ़्तार' और 'अख़बारे-सौदागार' का प्रकाशन शुरू हुआ.  साल 1846 में राजा शिव प्रसाद ने हिंदी पत्र ‘बनारस अख़बार’ शुरू किया.  साल 1868 में भरतेंदु हरिशचंद्र ने साहित्यिक पत्रिका ‘कविवच सुधा’ शुरू की. साल 1854 में हिंदी का पहला दैनिक ‘समाचार सुधा वर्षण’ का प्रकाशन शुरू हुआ. साल 1868 में मोतीलाल घोष ने आनंद बाज़ार पत्रिका निकाली. इनके अलावा इस दौरान बंगवासी, संजीवनी, हिन्दू, केसरी, बंगाली, भारत मित्र, हिन्दुस्तान, हिन्द-ए-स्थान, बम्बई दर्पण, कविवचन सुधा, हरिश्चन्द्र मैगजीन, हिन्दुस्तान स्टैंडर्ड, ज्ञान प्रदायिनी, हिन्दी प्रदीप, इंडियन रिव्यू, मॉडर्न रिव्यू, इनडिपेंडेस, द ट्रिब्यून, आज, हिन्दुस्तान टाइम्स, प्रताप पत्र, गदर, हिन्दू पैट्रियाट, मद्रास स्टैंडर्ड, कॉमन वील, न्यू इंडिया और सोशलिस्ट आदि अख़बारों का प्रकाशन शुरू हुआ. महात्मा गांधी ने यंग इंडिया, नव जीवन और हरिजन अख़बार शुरू किए.  जवाहरलाल नेहरू ने नेशनल हेराल्ड और अबुल कलाम आज़ाद ने अल बिलाग का प्रकशन शुरू किया. मौलाना मुहम्मद अली ने कामरेड और हमदर्द नाम से अख़बार निकाले.

इन अख़बारों ने अवाम को ख़बरें देने के साथ-साथ सामाजिक उत्थान के लिए काम किया. अख़बारों के ज़रिये समाज में फैली कुरीतियों के प्रति जनमानस को जागरूक करने की कोशिश की गई. देश को आज़ाद कराने में भी इन अख़बारों ने अपना अहम किरदान अदा किया. शुरू से आज तक अख़बार समाज और जीवन के हर क्षेत्र में अपना दात्यित बख़ूबी निभाते आए हैं. विभिन्न संस्कृतियों और और अलग-अलग धर्मों वाले इस देश में अख़बार सबको एकता के सूत्र में पिरोये हुए हैं. गंगा-जमुनी तहज़ीब को बढ़ावा देने में अख़बार भी आगे रहे हैं. पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है. यह स्तंभ बाक़ी तीन स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका और न्‍यायपालिका की कार्यशैली पर भी नज़र रखता है.

अफ़सोस की बात यह है कि जिस तरह पिछले चंद सालों में कुछ मीडिया घरानों ने पत्रकारिता के तमाम क़ायदों को ताख़ पर रखकर ’कारोबारी’ राह अपना ली है, उससे मीडिया के प्रति जनमानस का भरोसा कम हुआ है. ऐसा नहीं है कि सभी अख़बार या ख़बरिया चैनल बिकाऊ हैं. कुछ अपवाद भी हैं. जिस देश का मीडिया बिकाऊ होगा, उस देश के लोगों की ज़िन्दगी आसान नहीं होगी. पिछले कई साल से देश में अराजकता का माहौल बढ़ा है. जिस तरह से सरेआम लोगों पर हमला करके उनकी हत्याएं की जा रही हैं, अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने वाले दलितों, किसानों पर गोलियां बरसाई जा रही हैं, ऐसे में मीडिया की ख़ामोशी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है.

यह बात समझनी होगी कि मीडिया का काम ’सरकार’ या ’वर्ग’ विशेष का गुणगान करना नहीं है. जहां सरकार सही है, वहां सरकार की सराहना की जानी चाहिए, लेकिन जब सत्ताधारी लोग तानाशाही रवैया अपनाते हुए जनता पर क़हर बरपाने लगें, तो उसका पुरज़ोर विरोध होना ही चाहिए.  मीडिया को जनता की आवाज़ बनना चाहिए, न कि सरकार का भोंपू. इसलिए जनवादी पत्रकारिता की बात करें.
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं)

Monday, May 8, 2017

ठंडा पानी और बर्फ़...

सब इंसानों की बुनियादी ज़रूरतें एक जैसी ही हैं... लेकिन सबके पास अपनी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने के साधन नहीं हैं... दुनिया में कितने ही लोग ऐसे हैं, जिनके पास ज़रूरत से ज़्यादा, यहां तक कि बेहिसाब चीज़ें हैं... बहुत से लोग ऐसे हैं, जिनके पास अपनी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने लाय़क भी चीज़ें नहीं हैं... वे महरूम रह जाते हैं... अगर हम एक-दूसरे की मदद करें, इंसान के नाते... ये मानकर कि ये हम पर फ़र्ज़ है, और सामने वाले का ये हक़ है... तो इसमें कोई दो राय नहीं कि इससे जहां हमें दिली सुकून मिलेगा, वहीं सामने वाले की ज़रूरत पूरी हो जाएगी... ऐसा करके हम किसी पर कोई अहसान नहीं करेंगे, बल्कि ये सामने वाला का ही अपनापन होगा कि वो हमारी मदद को क़ुबूल करके हमें ख़ुशी देगा...

बात किसी को रुपये-पैसे की मदद या कोई क़ीमती चीज़ देने की नहीं है... हम अपनी हैसियत के हिसाब से जो कर सकते हैं, वो हमें करना ही चाहिए... मिसाल के तौर पर...

हमारे घर के पास एक सरकारी स्कूल है... अकसर उसका नल ख़राब रहता है... स्कूल में पीने साफ़ पानी का भी कोई इंतज़ाम नहीं है... पानी की जो टंकी है, उसकी भी सफ़ाई नहीं होती... तपती गरमी के मौसम में बच्चों को बहुत परेशानी होती है... हमने अपने घर के आगे सड़क पर एक नल लगवाया... पहले घर के अंदर नल लगा था, लेकिन उसमें रेत आने लगा था, कई बार ठीक कराने के बावजूद जब रेत आना बंद नहीं हुआ, तो उसे बंद करवाकर बाहर नल लगवा लिया... आसपास से बहुत लोग पानी भरने आते थे...  स्कूल के बच्चे भी यहां आने लगे... मगर कुछ वक़्त बाद यह नल भी खराब हो गया... एक दिन अम्मी ने बच्चों को मायूस लौटते देख, उनसे रुकने को कहा और फ़्रिज से ठंडा पानी लाकर उन्हें पिला दिया... अब हर रोज़ बच्चे आने लगे... स्कूल के अलावा सड़कों पर काग़ज़ बीनने वाले बच्चे भी दरवाज़ा खटखटाकर पानी और खाना मांग लेते हैं...

हमारी चार साल की भतीजी भी जब बच्चों को देखती है, तो पानी की बोतल लेकर दौड़ती है... कहते हैं कि बच्चे अपने बड़ों से ही सीखते हैं... हमारी भी एक आदत रही है, कहीं से आते हैं, तो आटो या रिक्शेवाले से पानी को ज़रूर पूछते हैं...

इलाक़े के एक-दो घरों के लोग बर्फ़ भी ले जाते हैं... हालांकि अब घर-घर फ़्रिज हैं, लेकिन अब भी सब लोगों के पास फ़्रिज नहीं हैं... पहले तो ऐसा बहुत होता था कि एक के घर फ़्रिज आया, तो आसपास के लोग बर्फ़ ले जाते थे...
अम्मी जान कई बर्तनों में बर्फ़ जमाती हैं, ताकि किसी को को ख़ाली हाथ न लौटना पड़े... एक रोज़ अम्मी से एक पड़ौसन ने कहा कि हमारे बस का नहीं ये सब... कौन रोज़-रोज़ अपने दरवाज़े पर भीड़ लगाए... हम तो साफ़ मना कर देते हैं... ख़ैर, ये उनकी अपनी सोच है... ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है...

ये सब लिखने का हमारा मक़सद ये है कि अगर हमारे आसपास ऐसे लोग हैं, जिनकी हम किसी भी तरह कोई मदद कर सकते हैं, तो हमें उनकी मदद करनी चाहिए...

Saturday, April 15, 2017

भाषाई मर्यादा की दरकार

फ़िरदौस ख़ान
भाषा का दरख़्त दिल में उगता है और ज़ुबान से फल देता है. यानी जिसके दिल में जो होगा, वह शब्दों के ज़रिये बाहर आ जाएगा. किसी व्यक्ति की भाषा से उसके संस्कारों का, उसके विचारों का, उसके आचरण का पता चलता है. माना लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी है, सबको अपनी बात कहने का पूरा हक़ है. लेकिन कहीं अभिव्यक्ति की इस आज़ादी का, इस हक़ का ग़लत इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा है? यह समझना भी ज़रूरी है. भाषा शैली व्यक्ति के व्यक्तित्व का आईना है, समाज की सभ्यता का पैमाना है. आए दिन जिस तरह के बयान सुनने को मिल रहे हैं, क्या वे एक सभ्य समाज की निशानी कहे जा सकते हैं ? ताज़ा मामला पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सिर काटकर लाने वाले को इनाम देने के ऐलान का है.  

ग़ौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में बीरभूम ज़िले के सिवड़ी में हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ता हनुमान जयंती के मौक़े पर जय श्रीराम के नारे लगाते हुए सड़कों पर उतर आए. चूंकि पुलिस ने उन्हें जुलूस निकालने की इजाज़त नहीं दी थी, इसलिए जुलूस को रोकने की कोशिश की गई. इस बार विवाद इतना बढ़ गया कि हाथापाई होने लगी. पुलिस ने ग़ुस्साये कार्यकर्ताओं को क़ाबू करने के लिए लाठीचार्ज कर दिया. इस घटना के बाद इलाक़े में तनाव का माहौल पैदा हो गया. इसके बाद भारतीय जनता युवा मोर्चा के नेता योगेश वार्ष्णेय ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सिर काटकर लाने वाले को इनाम देने का ऐलान कर दिया. उन्होंने कहा कि वह ख़ुद उसे 11 लाख का इनाम देंगे, जो ममता बनर्जी का स‍िर काटकर लाएगा. उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि ऐसा घिनौना कृत्य किसी इंसान द्वारा किया जा सकता है. यह काम किसी हैवान द्वारा ही किया जा सकता है और हैवान को सज़ा मिलना अति आवश्यक है.
मीडिया में इस बयान के आते ही तृणमूल कांग्रेस के ज़िलाध्यक्ष रामफूल उपाध्याय की शिकायत पर योगेश वार्ष्णेय के ख़िलाफ़ सिविल लाइंस थाने में मुक़दमा दर्ज किया गया. ख़ैर, बात यहीं ख़त्म नहीं हुई. कोलकाता की टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम सैयद मोहम्मद नुरूर रहमान बरकती ने एक क़दम आगे बढ़ते हुए योगेश वार्ष्णेय के सिर की क़ीमत दोगुनी कर दी. उन्होंने ऐलान किया कि योगेश वार्ष्णेय का सिर क़लम करने वाले को 22 लाख रुपये दिए जाएंगे. समाजवादी पार्टी के नेता भी कहां पीछे रहने वाले थे. पार्टी के पूर्व विधायक ज़मीरउल्लाह ने कहा कि ऐसा बयान देने वाले की जीभ काट लेनी चाहिए.
किसी का सिर काटकर लाने पर इनाम देने के ऐलान का यह पहला मामला नहीं है. इससे पहले तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के भारतीय जनता पार्टी के विधायक राजा सिंह ने अपने विवादित बयान में कहा था कि जो लोग राम मंदिर बनाए जाने का विरोध करते हैं, हम उनका सिर काट देंगे. उन्होंने आगे कहा कि उनका यह बयान उन लोगों के लिए है, जो यह कहते हैं कि राम मंदिर का निर्माण हुआ, तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. हम उनके इस बात के कहने का इंतज़ार कर रहे हैं, ताकि हम उनका सिर काट सकें. इसी तरह पिछले माह मध्य प्रदेश के उज्जैन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ महानगर प्रचार प्रमुख डॉ. कुंदन चंद्रावत ने एक विवादित बयान देते हुए कहा था कि कोई हत्यारे केरल के सीएम का सिर काटकर ला दे, वह अपनी एक करोड़ स्र्पये की संपत्ति उसके नाम कर देंगे.

दरअसल, आज सहनशीलता कम हो रही है. लोग अपनी आलोचना ज़रा सी भी बर्दाश्त नहीं कर पाते. जहां कोई ऐसी बात हुई, जो उनके मन मुताबिक़ न हुई, या जो उन्हें पसंद नहीं आई, तो वे आग बबूला हो उठते हैं. सारी मान-मर्यादाएं ताख़ पर रख देते हैं और ऐसे बयान दे डालते हैं. सियासत में चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेता इस मामले में सबसे आगे रहते हैं. ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने ही विवादित बयान दिए हैं. इस मामले में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी आदि के नेता भी पीछे नहीं हैं.

भारतीय संस्कृति में महिलाओं का महत्वपूर्ण स्थान है. नारी को नारायणी कहा गया है, देवी कहा गया है. लेकिन हक़ीक़त में देश और समाज के कर्ताधर्ता महिलाओं के ख़िलाफ़ अपशब्द बोलने से बाज़ नहीं आ रहे हैं. हाल के कुछ सालों में सियासत में भाषाई मर्यादा ख़त्म होने लगी है. देश के प्रधानमंत्री से लेकर कार्यकर्ता तक एक ही तरह की भाषा इस्तेमाल करते मिल जाएंगे. केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार में ऐसे बयानवीरों की लंबी फ़ेहरिस्त है, जिनके बयानों ने देश में हंगामा बरपा किया है. यह बेहद अफ़सोस की बात है कि सत्ता के उच्च पदों पर बैठे लोग भाषाई मर्यादा के मामले में बेहद बौने साबित हो रहे हैं. कहते हैं, पहले तोलो, फिर बोलो, यानी बोलने से पहले सौ बार सोच लेना चाहिए कि क्या बोलना है, किस तरह बोलना है. कहा गया है कि तलवार का ज़ख़्म भर जाता है, लेकिन बात का ज़ख़्म कभी नहीं भरता.

बहरहाल, उच्च पदों पर बैठे वाले लोगों ख़ास कर सामाजिक क्षेत्र में काम करने वालों को इस तरह के बयानों से बचना चाहिए. ऐसे बयानों से समाज में कटुता बढ़ती है. ऐसे बयान देश की एकता और अखंडता के साथ-साथ समाज के चैन-अमन के लिए भी ख़तरनाक हैं. देश और समाज में वैमन्य फैलाने वाले इन बयानों में तेज़ी आई है, तो इसके लिए वरिष्ठ नेता भी ज़िम्मेदार कहे जा सकते हैं, जिन पर अपने कार्यकर्ताओं को भाषा की मर्यादा व देश की संस्कृति सिखाने की ज़िम्मेदारी है. किसी भी पार्टी का कोई नेता अगर भड़काऊ बयानबाज़ी करता है, तो उस पर कार्रवाई तक नहीं की जाती. यही दूसरे नेताओं में भी उत्साह का संचार करती है. देश में भाषाई मर्यादा जिस तरह की जिस तरह से धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, उसे देखते हुए सरकार को ही आगे आना पड़ेगा और ऐसी व्यवस्था बनानी पड़ेगी, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी कहने की आज़ादी किसी को न दे. न तो सार्वजनिक मंचों से और न ही चुनावी रैलियों में. लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए यही बेहतर मार्ग है.

Tuesday, April 4, 2017

लोकतंत्र में बढ़ती हिन्दुत्व विचारधारा

फ़िरदौस ख़ान
उत्तर प्रदेश ने देश की सियासत में एक ऐसी इबारत लिखी है, जिसका आने वाले वक़्त में गहरा असर पड़ेगा. नरेंद्र मोदी ने गुजरात से हिन्दुत्व की जो राजनीति शुरू की थी, वह अब उत्तर प्रदेश से परवान चढ़ेगी. भारतीय जनता पार्टी पहले से ही कहती रही है कि पूर्ण बहुमत मिलने के बाद देश में हिन्दुत्ववादी एजेंडे को लागू किया जाएगा. केंद्र में भी बहुमत की सरकार है और अब उत्तर प्रदेश में भी भाजपा ने बहुमत की सरकार बनाई है. ऐसे में देश-प्रदेश में हिन्दुत्ववादी विचारधारा को ध्यान में रखकर फ़ैसले लिए जाएं, तो हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए.

क़ाबिले-ग़ौर है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा, जबकि अन्य राज्यों में वह क्षेत्रीय नेताओं के नाम पर विधानसभा चुनाव लड़ती है. मध्य प्रदेश में शिवराज चौहान के नाम पर जनता से वोट मांगे जाते हैं. इसी तरह छ्त्तीसगढ़ में रमन सिंह और बिहार में सुशील मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाता है. इन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ से मुख्यमंत्री पद का दावेदार कौन होगा, यह भी पहले से ही तय होता है. फिर उत्तर प्रदेश में ऐसा क्या हो गया कि राज्य में नेताओं की एक बड़ी फ़ौज होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी को मोदी के नाम पर चुनाव लड़ना पड़ा. भारतीय जनता पार्टी के काफ़ी वरिष्ठ नेता उत्तर प्रदेश से ही हैं, जिनमें राजनाथ, कलराज मिश्र, कल्याण सिंह, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती आदि शामिल हैं. इसके बावजूद पार्टी ने इन नेताओं को तरजीह नहीं दी.

विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को उम्मीद से ज़्यादा कामयाबी मिली. अकेले उसके 312 विधायक जीते, जबकि सहयोगियों के साथ यह आंकड़ा 325 है. इसके बावजूद इनमें से कोई मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाया. भाजपा ने सांसद योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाकर सबको चौंका दिया. इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश के सियासी इतिहास में पहली बार बने दो उप-मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा और केशव प्रसाद मौर्य विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं. लोकसभा सांसद केशव मौर्या की भी पहचान एक कट्टर हिन्दुत्ववादी नेता की रही हैं. वह विश्व हिन्दू परिषद से भी जुड़े रहे हैं.

योगी सरकार के इकलौते मुसलमान मंत्री मोहसिन रज़ा भी विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं. वह कुछ वक़्त पहले ही भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए थे. माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग और वक्फ़ बोर्ड समेत कई ऐसे निगम हैं, जिनका अध्यक्ष मुसलमान ही होता है. शायद इसलिए ही रज़ा को यह पद मिल गया, वरना भारतीय जनता 20 करोड़ से ज़्यादा आबादी वाले उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को एक भी मुसलमान ऐसा नहीं मिला था, जिसे वह उम्मीदवार बना पाती. पार्टी के वरिष्ठ नेता शाहनवाज़ ख़ान ने ख़ुद इस बात की तस्दीक की थी.

आख़िर क्या वजह है कि भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में विधायकों को तरजीह देने की बजाय सांसद को मुख्यमंत्री बनाया. जानकारों का मानना है कि इतना बड़ा फ़ैसला भारतीय जनता पार्टी अकेले अपने दम पर नहीं ले सकती. इसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक का एजेंडा काम कर रहा था. ऐसा लगता है कि संघ मोदी का विकल्प तैयार कर रहा है. योगी आदित्यनाथ की छवि कट्टर हिन्दुत्ववादी नेता की रही है. वह गोरखनाथ मंदिर के पूर्व महंत अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी हैं. वह हिन्दू युवाओं के सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी समूह हिन्दू युवा वाहिनी के संस्थापक भी हैं. एक समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ विवादित बयान देने के लिए भी जाने जाते हैं. उनके विवादित बयानों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है. पिछले साल जून में उनके इस बयान पर ख़ूब विवाद हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था, "जब अयोध्या में विवादित ढांचा गिराने से कोई नहीं रोक सका तो मंदिर बनाने से कौन रोकेगा." उससे पहले जून 2015 में योग के विरोध पर उन्होंने कहा था,  "जो लोग योग का विरोध कर रहे हैं उन्‍हें भारत छोड़ देना चाहिए. जो लोग सूर्य नमस्‍कार को नहीं मानते उन्‍हें समुद्र में डूब जाना चाहिए." इसी तरह फ़रवरी 2015 में उनका यह बयान आया, "अगर उन्हें अनुमति मिले तो वो देश के सभी मस्जिदों के अंदर गौरी-गणेश की मूर्ति स्थापित करवा देंगे. आर्यावर्त ने आर्य बनाए, हिंदुस्तान में हम हिंदू बना देंगे. पूरी दुनिया में भगवा झंडा फहरा देंगे. मक्का में ग़ैर मुस्लिम नहीं जा सकता है, वैटिकन में ग़ैर ईसाई नहीं जा सकता है. हमारे यहां हर कोई आ सकता है." प्रदूषण और मुसलमानों की बढ़ती आबादी जैसे मुद्दों पर भी वह कई विवादित बयान दे चुके हैं.

उत्तर प्रदेश के 21वें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ साल 1998 से लगातार भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. चुनाव के दौरान उनके समर्थकों ने 'दिल्ली में मोदी, यूपी में योगी' का नारा दिया था. उत्तर प्रदेश में योगी के मुख्यमंत्री बनने से यह साफ़ है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश के लोकतंत्र में हिन्दुत्ववादी विचारधारा को बढ़ावा दे रहा है. साल 2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के बनने के बाद से देश में सांप्रदायिक घटनाओं में ख़ासी बढ़ोतरी हुई है. उत्तर प्रदेश के दादरी कांड के बाद एक समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ हमले बढ़ गए. गौमांस के नाम पर लोगों का एक झुंड किसी पर भी टूट पड़ता था. इससे एक समुदाय विशेष के मन में असुरक्षा की भावना बढ़ गई. अन्य सियासी दलों ने मुसलमानों के इसी डर का ख़ूब फ़ायदा उठाया. इस तरह की घटनाओं ने वोटों के ध्रुवीकरण का काम किया. भाजपा समर्थित लोगों के वोट इकट्टे हो गए और ग़ैर भाजपाई और मुसलमानों के वोट बंट गए.

मोदी भले ही सबका साथ, सबका विकास का नारा देते रहें, लेकिन सब जानते हैं कि उन्होंने किसका विकास किया और किसे अनदेखा किया. उनके ’जुमले’ तो जगज़ाहिर हैं. संवैधानिक पद पर बैठने के बाद व्यक्ति विशेष की मजबूरी बन जाती है कि उसे सबके हित की बात बोलनी ही पड़ती है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की यह विशेषता रही है कि वे कितने ही बड़े संवैधानिक पद पर क्यों न बैठ जाएं, बात सिर्फ़ अपने मन की ही करते हैं. भले ही इससे किसी को ठेस ही क्यों न पहुंचे.

बहरहाल, उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ योगी का मुख्यमंत्री बनना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बड़ी जीत ज़रूर है, लेकिन यह भारतीय जनता पार्टी की सियासी हार है.

Saturday, August 27, 2016

इंसानियत इसे कहते हैं...

ख़िदमते-ख़ल्क का जज़्बा ही इंसान को इंसान बनाता है... वरना अपने लिए तो जानवर भी जीते हैं... जो दूसरों के दर्द को महसूस करे, उन्हें ख़ुशी देने के लिए ख़ुद को फ़ना करने से भी पीछे न रहे, सही मायनों में वही ’इंसान’ कहलाने लायक़ है... एक ऐसा इंसान जिस पर मालिके-आदम को भी फ़ख़्र हो...

पोलैंड के चक्का फेंक खिलाड़ी पिओत्र मालाचोवस्की ने कैंसर से पीड़ित तीन साल के बच्चे के इलाज के लिए अपना ओलंपिक पदक दान कर दिया... 33 साल के मालाचोवस्की ने रियो में चक्का फेंक मुक़ाबले में रजत पदक जीता था. उनके इस पदक से मिली रक़म से आंख के कैंसर से जूझ रहे बच्चे ओलेक सिमनास्की का इलाज किया जाएगा.

मालाचोवस्की का कहना है कि उन्होंने मेडल नीलाम करने का फ़ैसला तीन साल के कैंसर पीड़ित बच्चे की मां की जानिब से मदद के लिए मिले एक ख़त को पढ़ने के बाद किया... ख़त में बच्चे की मां ने उन्हें लिखा कि उनका बच्चा ओलेक आंख के कैंसर से बीते दो साल से पीड़ित है... साथ ही लिखा कि बच्चे के बचने की आख़िरी उम्मीद उसके न्यूयॉर्क अस्पताल में इलाज पर टिकी हुई है...
मालाचोवस्की का कहना है, "मेरा रजत पदक एक हफ़्ते पहले तक मेरे लिए बहुत मायने रखता था. ओलेक की सेहत के लिए इसकी ज़्यादा ज़रूरत है."

Wednesday, June 22, 2016

’भर दो झोली मेरी या मुहम्मद, लौट कर मैं ना जाऊंगा ख़ाली’

अमजद साबरी साहब !
आप ख़ाली हाथ नहीं गए... अपने साथ बहुत सी दुआएं और मक़बूलियत लेकर गए हैं... आपकी क़व्वालियां हमेशा लोगों की ज़ुबान पर रहेंगी... आपकी मख़मली आवाज़ का जादू उन्हें कभी आपसे जुदा होने नहीं देगा...
आप मरे नहीं, बल्कि अमर हो गए और आपके वहशी क़ातिलों पर हमेशा लानत बरसती रहेगी...

Friday, June 3, 2016

अपनी दुर्दशा के लिए कांग्रेस ख़ुद ज़िम्मेदार है


-फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस जन-जन की पार्टी है. कांग्रेस का एक गौरवशाली इतिहास रहा है. कांग्रेस नेताओं की क़ुर्बानियों को यह देश कभी भुला नहीं पाएगा. कांग्रेस नेताओं ने अपने ख़ून से इस धरा को सींचा है. महात्मा गांधी को भला कौन नहीं जानता. देश को आज़ाद कराने के लिए उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी क़ुर्बान कर दी. पंडित जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने इस देश को संवारा है. कांग्रेस इस देश की माटी में रची-बसी है. जनमानस में कांग्रेस की पैठ है. पीढ़ी-दर-पीढ़ी कांग्रेस की कट्टर समर्थक रही है. इसके बावजूद कांग्रेस ने केंद्र और कई राज्यों की सत्ता गंवाई है. आख़िर क्या वजह है कि कांग्रेस पर मर मिटने वाले लाखों-करोड़ों समर्थकों के बावजूद कांग्रेस सत्ता में वापस नहीं लौट पा रही है?

हालांकि पिछले लोकसभा चुनाव के मुक़ाबले हाल में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का जनाधार बढ़ा है. बाक़ी राज्यों में कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया. आसाम में पिछ्ले लोकसभा चुनाव 29.6 फ़ीसद के मुक़ाबले कांग्रेस को 31.1 फ़ीसद मत मिले. इसी तरह तमिलनाडु में 4.3 के मुक़ाबले 6.6 फ़ीसद, पश्चिम बंगाल में 9.6 के मुक़ाबले 12.1 फ़ीसद और पुडुचेरी में 24.6 फ़ीसद के मुक़ाबले 30.6 फ़ीसद वोट मिले. भारतीय जनता पार्टी की बात करें, तो पिछले लोकसभा चुनाव के मुक़ाबले उसका जनाधार घटा है. हालांकि इसके बावजूद भाजपा आसाम में सरकार बनाने में कामयाब रही है.

भारतीय जनता पार्टी जिसका अपना कोई इतिहास नहीं है, सिवाय इसके कि उसके मातृ संगठन यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कथित कार्यकर्ता ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या की थी. इसके बावजूद भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई. आख़िर ऐसी कौन-सी बात है जो लोकप्रिय पार्टी कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया. इसे समझना बहुत आसान है. जो जनता किसी पार्टी को हुकूमत सौंपती है, वही जनता उससे हुकूमत छीन भी सकती है. कांग्रेस नेताओं को यह बात समझनी होगी.

देश की आज़ादी के बाद कांग्रेस सत्ता में आई और कुछ साल पहले तक कांग्रेस की ही हुकूमत रही है. हालांकि आपातकाल और ऒप्रेशन ब्लू स्टार और की वजह से कांग्रेस को नुक़सान भी हुआ. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसके लिए सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगी और अवाम ने उन्हें माफ़ करके सत्ता सौंप दी. कांग्रेस ने फिर से लगातार दस साल तक हुकूमत की. इस दौरान कांग्रेस ने कुछ ऐसे काम किए, जिनसे विरोधियों को उसके ख़िलाफ़ दुष्प्रचार का मौक़ा मिल गया. मसलन इलेक्ट्रोनिक मीटर, जो तेज़ चलते हैं और बिल ज़्यादा आता है. रसोई गैस के सिलेंडरों की संख्या सीमित कर देना. भाजपा ने इसका जमकर फ़ायदा उठाया. कांग्रेस नेता मामले को संभाल नहीं पाए. हालांकि कांग्रेस ने मनरेगा, आर्टीआई और खाद्य सुरक्षा जैसी अनेक ऐसी कल्याणकारी योजनाएं दीं, जिसका सीधा फ़ायदा आम जनता को हुआ. मगर कांग्रेस नेता चुनाव में इनका कोई फ़ायदा नहीं ले पाए. यह कांग्रेस की बहुत बड़ी कमी रही, जबकि भाजपा जनता से कभी पूरे न होने वाले लुभावने वादे करके सत्ता तक पहुंच गई.

क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि सत्ता के मद में चूर कांग्रेस नेता पार्टी कार्यकर्ताओं और जनता से दूर होते चले गए. कांग्रेस की अंदरूनी कलह,  आपसी खींचतान, कार्यकर्ताओं की बात को तरजीह न देना उसके लिए नुक़सानदेह साबित हुआ. हालत यह थी कि अगर कोई कार्यकर्ता पार्टी नेता से मिलना चाहे, तो उसे वक़्त नहीं दिया जाता था. कांग्रेस में सदस्यता अभियान के नाम पर भी सिर्फ़ ख़ानापूर्ति ही की गई. इसके दूसरी तरफ़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भाजपा को सत्ता में लाने के लिए दिन-रात मेहनत की. मुसलमानों और दलितों के प्रति संघ का नज़रिया चाहे, जो हो, लेकिन उसने भाजपा का जनाधार बढ़ाने पर ख़ासा ज़ोर दिया. संघ और भाजपा ने ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को पार्टी से जोड़ा. अगर कोई सड़क चलता व्यक्ति भी भाजपा कार्यालय चला जाए, तो उससे इस तरह बात की जाती है कि वह ख़ुद को भाजपा का अंग समझने लगता है.

पिछले दिनों उत्तराखंड में ख़ूब तमाशा हुआ. हालत यह हो गई कि अब पश्चिम बंगाल के कांग्रेस विधायकों को अपनी वफ़ादारी का हल्फ़नामा देना पड़ रहा है. पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के विधायको ने 100 रुपये के स्टाम्प पेपर पर लिखकर दस्तख़त किए हैं कि वे कांग्रेस पार्टी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के प्रति निष्ठा रखेंगे और पार्टी के ख़िलाफ़ की जाने वाली किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे. हल्फ़नामे में यह भी कहा गया है कि वे पार्टी के ख़िलाफ़ कोई नकारात्मक बात नहीं कहेंगे. ऐसे किसी काम को करने की ज़रूरत लगने पर वे पहले ही अपने पद से इस्तीफ़ा दे देंगे. इसमें यह भी लिखा है कि वे पार्टी के दिशा-निर्देशों से बंधे हुए हैं. बताया जा रहा है कि विधायकों से दस्तख़त कराने का फ़ैसला चुनाव के बाद हुई एक बैठक में लिया गया था. बैठक में कांग्रेस की राज्य इकाई के अध्यक्ष अधीर चौधरी, निर्वाचित विधायकों और जिलाध्यक्षों ने भाग लिया था. इस बारे में चौधरी का कहना है कि यह कोई बॉंड नहीं है. हमने किसी पर कोई दबाव नहीं डाला है कि अगर वे शर्तों को नहीं मानेंगे, तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी.  सभी ने पार्टी के प्रति वफ़ादारी दिखाने के लिए मर्ज़ी से दस्तख़त किए हैं. बहरहाल, कांग्रेस का यह क़दम उसके लिए फ़ायदेमंद साबित होगा, इसमें शक है.

वफ़ादारी काग़ज़ के टुकड़ों पर तय नहीं होती. यह तो दिल की बात है. कांग्रेस को अपने नेताओं, अपने सांसदों, अपने विधायकों, अपने कार्यकर्ताओं और अपने समर्थकों से ऐसा रिश्ता बनाना चाहिए, जिसे बड़े से बड़ा लालच तोड़ न पाए. इसके लिए कांग्रेस के नेताओं को ज़मीन पर उतरना पड़ेगा. सिर्फ़ सोनिया गांधी, राहुल गांधी या प्रियंका गांधी के कुछ लोगों के बीच चले जाने से कुछ नहीं होने वाला. कांग्रेस के सभी नेताओं को ह्क़ीक़त का सामना करना चाहिए. उन्हें चाहिए कि वे कार्यकर्ताओं की बात सुनें, जो लोग पार्टी के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं, जब तक उनकी बात नहीं सुनी जाएगी, उन्हें तरजीह नहीं दी जाएगी, तब तक कांग्रेस अपना खोया मुक़ाम नहीं पा सकती.

Monday, April 25, 2016

स्वरोज़गार


कहते हैं- दूसरे के सिंहासन से अपनी चटाई अच्छी... क्योंकि किसी की जी हुज़ूरी तो नहीं करनी पड़ती...
आज के युवा अपने स्वरोज़गार को तरजीह दे रहे हैं... वाक़ई यह अच्छी बात है... अपना ख़ुद का काम ही ज़्यादा अच्छा होता है, भले ही परचून की दुकान क्यों न हो...  नौकरी में लगी बंधी तनख़्वाह तो होती है, लेकिन इसकी अपनी परेशानियां हैं... नौकरी प्राइवेट हो, तो और भी मुसीबत... हमेशा एक ही बात याद रखनी होती है- बॊस इस ऒलवेज़ राइट... न जॊब की गारंटी होती है, न काम का वाजिब मेहनताना, न पर्याप्त छुट्टियां...

अपने काम में जो मज़ा है, वो किसी की नौकरी में कहां... स्वरोज़गार अपनाओ और ख़ुश रहो ... :)

मज़हब


सबसे अच्छा मज़हब वही है, जो अपने अनुयायियों को ये सिखाए कि उनकी वजह से किसी का दिल न दुखे, किसी को तकलीफ़ न पहुंचे...और सबसे अच्छी क़ौम वही है, जिसके मानने वाले किसी का दिल न दुखाएं, किसी को तकलीफ़ न पहुंचाएं...
  • दुनिया को इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आपका मज़हब क्या है... दुनिया को इस बात से बहुत फ़र्क़ पड़ता है कि आप कैसे इंसान हैं...


Tuesday, March 29, 2016

दौलत


ग़रीब को कोई चीज़ पसंद आ जाए, और उसे ख़रीदने के लिए उसके पास पैसे न हो, तो कई दिन तक जद्दोजहद करने के बाद उसे अपना मन मार लेना पड़ता है... अमीरों को चीज़ों के लिए मन नहीं मारना पड़ता... उन्हें जो चीज़ पसंद आ जाए, वो उसे ख़रीद सकते हैं... दरअसल, इस वक़्त दौलत दुनिया की सबसे बड़ी नेमत है...
(कोरे आदर्शवादी इसे झुठला सकते हैं, लेकिन हक़ीक़त यही है)

Friday, January 29, 2016

राहुल गांधी ने ज़ियारत की

फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कल रात हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की ज़ियारत की. राहुल गांधी सबसे पहले उर्स महल गए, जहां उन्होंने क़व्वाली सुनी.
उर्स में राहुल गांधी के सिर पर हरे रंग का साफ़ा बांधा गया और गले में गुलाबी रंग का दुपट्टा डाला गया. इसके बाद वह हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर गए. उन्होंने उन्होंने मज़ार पर चादर चढ़ाई और फूल चढ़ाकर दुआ मांगी.
ग़ौरतलब है कि 30 जनवरी तक चलने वाले 712वें उर्स 27 जनवरी शुरू को हुआ था. दुनियाभर से ज़ायरीन उर्स में शिरकत के लिए आते हैं.