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Monday, June 12, 2017

नेशनल हेराल्ड से उम्मीद जगी

फ़िरदौस ख़ान
अख़बारों का काम ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना होता है. सूचनाओं के इसी प्रसार-प्रचार को पत्रकारिता कहा जाता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है.  लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि जिस तरह पिछले चंद सालों में कुछ मीडिया घरानों ने पत्रकारिता के तमाम क़ायदों को ताख़ पर रखकर ’कारोबारी’ राह अपना ली है, उससे मीडिया के प्रति जनमानस का भरोसा कम हुआ है. ऐसा नहीं है कि सभी अख़बार या ख़बरिया चैनल बिकाऊ हैं. कुछ अपवाद भी हैं. जिस देश का मीडिया बिकाऊ होगा, उस देश के लोगों की ज़िन्दगी आसान नहीं होगी. पिछले कई साल से देश में अराजकता का माहौल बढ़ा है. जिस तरह से सरेआम लोगों पर हमला करके उनकी हत्याएं की जा रही हैं, अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने वाले दलितों, किसानों पर गोलियां बरसाई जा रही हैं, ऐसे में मीडिया की ख़ामोशी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है. अराजकता भरे दौर में ऐसे अख़बारों की ज़रूरत महसूस की जा रही है, जो सच्चे हों, जिन पर अवाम भरोसा कर सके, जो चंद सिक्कों के लिए अपना ज़मीर न बेचें, जो जनमानस को गुमराह न करें.

ऐसे में कांग्रेस के अख़बार नेशनल हेराल्ड के प्रकाशन का शुरू होना, ख़ुशनुमा अहसास है. गुज़श्ता 12 जून कोकर्नाटक की राजधानी बंगलुरु में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी में इसके संस्मरणीय संस्करण का लोकार्पण किया गया. यह अख़बार दिल्ली से साप्ताहिक प्रकाशित किया जाएगा.  इस मौक़े पर राहुल गांधी ने कहा कि मौजूदा वक़्त में जो लोग सच्चाई के साथ हैं, उन्हें दरकिनार किया जा रहा है. दलितों को मारा जा रहा है, अल्पसंख्यकों को सताया जा रहा है और मीडिया को धमकाया जा रहा है. उन्होंने कहा कि नेशनल हेराल्ड के एडिटर एक दिन मेरे पास आए. मैंने उनसे कहा, अगर आपको किसी दिन कांग्रेस पार्टी या मेरे ख़िलाफ़ कुछ लिखना हो, तो बिना ख़ौफ़ के लिखें. ये वो चीज़ है, जो हम नेशनल हेराल्ड से चाहते हैं. सच्चाई से डरने की ज़रूरत नहीं है और ना चुप रहने की.

ग़ौरतलब है कि जवाहरलाल नेहरू और स्वतंत्रता सेनानियों ने लखनऊ से 9 सितंबर, 1938 को नेशनल हेराल्ड नाम से एक अख़बार शुरू किया था. उस वक़्त यह अख़बार जनमानस की आवाज़ बना और जंगे-आज़ादी में इसने अहम किरदार अदा किया. शुरुआती दौर में जवाहरलाल नेहरू ही इसके संपादक थे. प्रधानमंत्री बनने तक वे हेराल्ड बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स के चेयरमैन भी रहे. उन्होंने अख़बार के अंतर्राष्ट्रीय संवाददाता के तौर पर भी काम किया. अख़बार लोकप्रिय हुआ. साल 1968 में दिल्ली से इसके संस्करण का प्रकाशन शुरू हो गया.  हिंदी में नवजीवन और उर्दू में क़ौमी आवाज़ के नाम से इसके संस्करण प्रकाशित होने लगे. अख़बार को कई बार बुरे दौर से गुज़रना पड़ा और तीन बार इसका प्रकाशन बंद किया गया. पहली बार यह अंग्रेज़ी शासनकाल में उस वक़्त बंद हुआ, जब अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारतीय अख़बारों के ख़िलाफ़ दमनकारी रवैया अपनाया था. नतीजतन, 1942 से 1945 तक नेशनल हेराल्ड को अपना प्रकाशन बंद करना पड़ा. फिर साल 1945 में अख़बार का प्रकाशन शुरू किया गया. साल 1946 में फ़िरोज़ गांधी को नेशनल हेराल्ड का प्रबंध निदेशक का कार्यभार सौंपा गया. वे 1950 तक उन्होंने इसकी ज़िम्मेदारी संभाली. इस दौरान अख़बार की माली हालत में भी कुछ सुधार हुआ. लेकिन आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी की हार के बाद अख़बार को दो साल के लिए बंद कर दिया गया.  कुछ वक़्त बाद अख़बार शुरू हुआ, लेकिन साल 1986 में एक बार फिर से इस पर संकट के बादल मंडराने लगे, लेकिन राजीव गांधी के दख़ल की वजह से इसका प्रकाशन होता रहा. मगर माली हालत ख़राब होने की वजह से अप्रैल 2008 में इसे बंद कर दिया गया.

क़ाबिले-ग़ौर है कि असोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड कंपनी (एजेएल ) के तहत नेशनल हेराल्ड का प्रकाशन किया जाता था, जो एक सेक्शन-25 कंपनी थी. इस तरह की कंपनियों का मक़सद कला-साहित्य आदि को प्रोत्साहित करना होता है. मुनाफ़ा कमाने के लिए इनका इस्तेमाल नहीं किया जाता. मुनाफ़ा न होने के बावजूद यह कंपनी काफ़ी अरसे तक नुक़सान में चलती रही. कांग्रेस ने असोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड कंपनी को चलाए रखने के लिए कई साल तक बिना ब्याज़ के उसे क़र्ज़  दिया. मार्च 2010 तक कंपनी को दिया गया क़र्ज़ 89.67 करोड़ रुपये हो गया. बताया जाता है कि कंपनी के पास दिल्ली और मुंबई समेत कई शहरों में रीयल एस्टेट संपत्तियां हैं. इसके बावजूद कंपनी ने कांग्रेस का क़र्ज़ नहीं चुकाया. पार्टी के वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा को 22 मार्च 2002 को कंपनी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. इसके कई साल बाद 23 नवंबर 2010 को यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड नाम की सेक्शन-25 कंपनी सामने आई. गांधी परिवार के क़रीबी सुमन दुबे और सैम पित्रोदा जैसे लोग इसके निदेशक थे. अगले महीने 13 दिसंबर 2010 को राहुल गांधी को इस कंपनी का निदेशक बनाया गया. अगले ही साल 22 जनवरी 2011 को सोनिया गांधी भी यंग इंडिया के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में शामिल हो गईं. उनके साथ-साथ  मोतीलाल वोरा और कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य ऑस्कर फ़र्नांडीज भी यंग इंडियन के बोर्ड में शामिल किए गए. इस कंपनी के 38-38 फ़ीसद शेयरों पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी की हिस्सेदारी है, जबकि के 24 फ़ीसद शेयर मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडीज के नाम हैं. दिसंबर 2010 में असोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड कंपनी के प्रबंधकों ने 90 करोड़ रुपये के क़र्ज़ बदले पूरी कंपनी यंग इंडियन के हवाले कर दी. यंग इंडियन ने इस अधिग्रहण के लिए 50 लाख रुपये का भुगतान किया. इस तरह यह कंपनी यंग इंडियन की सहायक कंपनी बन गई.

बहरहाल, कांग्रेस ने नेशनल हेराल्ड शुरू करके सराहनीय काम किया है. पिछले कुछ अरसे से ऐसे ही अख़बार की ज़रूरत महसूस की जा रही थी. आज का अख़बार कल का साहित्य है, इतिहास है. अख़बार दुनिया और समाज का आईना हैं. देश-दुनिया में में जो घट रहा है, वह सब सूचना माध्यमों के ज़रिये जन-जन तक पहुंच रहा है. आज के अख़बार-पत्रिकाएं भविष्य में महत्वपूर्ण दस्तावेज़ साहिब होंगे, क्योंकि इनके ज़रिये ही आने वाली पीढ़ियां आज के हालात के बारे में जान पाएंगी. इसके ज़रिये ही लोगों को समाज की उस सच्चाई का पता चलता है, जिसका अनुभव उसे ख़ुद नहीं हुआ है. साथ ही उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का भी पता चलता है. पत्रकारिता सरकार और जनता के बीच सेतु का काम करती है. अख़बारों के ज़रिये अवाम को सरकार की नीतियों और उसके कार्यों का पता चलता है. ठीक इसी तरह अख़बार जनमानस की बुनियादी ज़रूरतों, समस्याओं और उनकी आवाज़ को सरकार तक पहुंचाने का काम करते हैं.

यह बात समझनी होगी कि मीडिया का काम ’सरकार’ या ’वर्ग’ विशेष का गुणगान करना नहीं है. जहां सरकार सही है, वहां सरकार की सराहना की जानी चाहिए, लेकिन जब सत्ताधारी लोग तानाशाही रवैया अपनाते हुए जनता पर क़हर बरपाने लगें, तो उसका पुरज़ोर विरोध होना ही चाहिए.  मीडिया को जनता की आवाज़ बनना चाहिए, न कि सरकार का भोंपू.
चूंकि, नेशनल हेराल्ड एक सियासी पार्टी का अख़बार है, इसलिए इसे अवाम में अपनी साख बनाए रखने के लिए फूंक-फूंक कर क़दम रखना होगा. इसके हिन्दी, उर्दू व अन्य भाषाओं के संस्करण भी प्रकाशित होने चाहिए.

Sunday, September 20, 2015

रोज़गार


कभी किसी का रोज़गार नहीं छीनना चाहिए, क्योंकि इससे उसका पूरा ख़ानदान मुतासिर होता है... ऐसे करोड़ों लोग हैं, जिनके घरों में चूल्हा तभी जलता है, जब वे मेहनत-मज़दूरी करके कुछ पैसे कमाते हैं...

अफ़सोस, मीडिया में ये बात बहुत आम है, जब कोई संपादक या ऐसे ही किसी अन्य पद पर आता है, तो वह वहां काम कर रहे लोगों को निकालकर अपने लोग रखने लगता है... इससे बहुत से लोग बेरोज़गार हो जाते हैं... इंसान अगर किसी को रोज़गार नहीं दे सकता, तो किसी से उसकी रोज़ी भी नहीं छीननी चाहिए...

Friday, April 25, 2014

मीडिया...


फ़िलहाल हिन्दुस्तानी मीडिया ख़ासकर इलेक्ट्रॊनिक मीडिया का जो चेहरा सामने आया है, उसे देखते हुए यह कहना ग़लत न होगा कि अगर आतंकवादी संगठन भी हिन्दुस्तान में दस करोड़ रुपये ख़र्च कर दें, तो ये देश में उनकी भी लहर बनवा देंगे... हिन्दुस्तानी मीडिया आज देश-दुनिया को यही संदेश दे रहा है...
वाक़ई देश के लिए यह बहुत शर्म की बात है...
  • इस चुनाव के नतीजे जो भी रहें, लेकिन हिन्दुस्तानी मीडिया ख़ासकर इलेक्ट्रॊनिक मीडिया की साख ज़रूर गिर गई है... पहले लोग आंख मूंद कर मीडिया पर भरोसा करते थे, लेकिन अब वह भरोसा ख़त्म हो गया है... 

Thursday, November 21, 2013

मीडिया का स्याह चेहरा...

जिस मीडिया पर समाज को जागृत करने की ज़िम्मेदारी है, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता... उसका भी एक स्याह चेहरा है... वहां भी कई तरह का शोषण है... मीडिया कर्मियों को वक़्त पर तनख़्वाह देने के मामले भी अकसर सामने आते रहते हैं... महिलाओं के शोषण की ख़बरें भी आती हैं, लेकिन इन्हें दबा दिया जाता है...
दूसरी तरफ़ मीडिया में ऐसी ’महान’ लड़कियों की भी कमी नहीं है, जो सिर्फ़ ’टाइम पास’ और ’नाम’ के लिए ही दफ़्तर आती हैं, ताकि पास-पड़ौस और रिश्तेदारों को बता सकें कि फ़लां मीडिया हाऊस में काम करती हैं. ऐसी ’महान’ लड़कियों का दफ़्तर का काम दूसरी लड़कियों को करना पड़ता है. इन 'महान' लड़कियों को दफ़्तर से कई सुविधाएं मिलती हैं, छुट्टी करने पर तनख़्वाह नहीं कटती. इन्हें देर से आकर जल्दी जाने की छूट भी होती है. जब चाहें दस-बीस दिन के लिए अपने घर (दूसरे प्रदेश) जा सकती हैं. तनख़्वाह भी इन्हीं की ज़्यादा बढ़ती है. एक महिला ने हमें बताया कि काम का ज़्यादा बोझ होने से परेशान होकर जब उसने अपने सीनियर से शिकायत की, तो उसके सीनियर ने कहा- दफ़्तर में दस लोग काम करते हैं और दो लड़कियां काम न करने के लिए भी होती हैं.
इन ’महान’ लड़कियों की वजह से भी मीडिया का माहौल ख़राब हो रहा है. इनकी वजह से ही वाहियात लोग हर लड़की को इन्हीं ’महान’ लड़कियों की तरह ट्रीट करना चाहते हैं. ऐसे में अच्छे घरों की लड़कियों के लिए मुश्किलें पैदा हो रही हैं.

Thursday, September 11, 2008

भूतिया फ़िल्मों से ज़्यादा डरावने न्यूज़ चैनल


फ़िरदौस ख़ान
किसी को इतने खौफ़नाक तरीक़े से डराया जाए कि वह जान ही दे दे...,अगर यह सीखना हो तो न्यूज़ चैनल से सीखिए...कल हुए वैज्ञानिक महाप्रयोग से जुड़ी ख़बरों को लेकर न्यूज़ चैनलों ने दुनिया के ख़त्म होने की अफ़वाह को इतनी हवा दी कि मध्यप्रदेश के राजगढ़ ज़िले में एक किशोरी ने कथित तौर पर दुनिया ख़त्म होने की दहशत में परसों रात ज़हर खा लिया. उसकी कल इंदौर के एक अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई.
पुलिस सूत्रों के मुताबिक़ लड़की की पहचान छाया 16 के रूप में हुई है. मृतक के परिजनों ने बताया कि छाया पिछले दो दिन से टीवी पर जिनीवा में बुधवार को हो रहे वैज्ञानिक महाप्रयोग से जुड़ी ख़बरें देख रही थी. वह इन ख़बरों को देखने के बाद इस कद्र घबरा गई कि उसने सल्फास की गोलियां निगल लीं. गौरतलब है कि कुछ न्यूज़ चैनल महाप्रयोग के दौरान दुनिया ख़त्म होने के ख़तरे पर केंद्रित ख़बरों का लगातार प्रसारण कर दर्शकों को डराने की मुहिम में जुटे हुए थे. ख़ास बात यह रही कि बाद में पांसा बदलते हुए न्यूज़ चैनल चीख़ने लगे कि दुनिया ख़त्म नहीं होगी, बस देखते रहिए....न्यूज़ चैनल (यानि उनका न्यूज़ चैनल).
यह कहना क़तई ग़लत न होगा कि न्यूज़ चैनल भूतिया फ़िल्मों से ज़्यादा डरावने और व्यस्क फ़िल्मों से ज़्यादा अश्लील होते जा रहे हैं...
न्यूज़ चैनलों पर सैक्स स्कैंडल, मशहूर लोगों के चुम्बन दृश्यों और हत्या जैसे जघन्य अपराधों को भी मिर्च-मसाला लगाकर दिखाया जा रहा है. भूत-प्रेत और ओझाओं ने भी न्यूज़ चैनलों में अपनी जगह बना ली है. सूचना और प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी ने न्यूज़ चैनलों को फटकार लगाते हुए कहा था कि उन्हें ख़बरें दिखाने के लिए लाइसेंस दिए गए हैं न कि भूत-प्रेत दिखाने के लिए. न्यूज़ चैनलों को मनोरंजन चैनल बनाया जन सरकार बर्दाश्त नहीं करेगी. उन्होंने न्यूज़ चैनलों पर टिप्पणी करते हुए यहां तक कहा था की अब लालू प्रसाद यादव का तम्बाकू खाना भी ब्रेकिंग न्यूज़ हो जाता है. रिचर्ड गेरे द्वारा शिल्पा शेट्टी को चूमे जाने की घटना को सैकड़ों बार चैनलों पर दिखाए जाने पर भी उन्होंने नाराज़गी जताई थी. ख़बरिया चैनलों के संवाददाताओं पर पीड़ितों को आत्महत्या के लिए उकसाने और भीड़ को भड़काकर लोगों को पिटवाने के आरोप भी लगते रहे हैं.
दरअसल, सारा मामला टीआरपी बढ़ाने और फिर इसके ज़रिये ज़्यादा से ज़्यादा विज्ञापन हासिल कर बेतहाशा दौलत बटोरने का है. एक अनुमान के मुताबिक़ एक अरब से ज़्यादा की आबादी वाले भारत में क़रीब 10 करोड़ घरों में टेलीविज़न हैं. इनमें से क़रीब छह करोड़ केबल कनेक्शन धारक हैं. टीआरपी बताने का काम टैम इंडिया मीडिया रिसर्च नामक संस्था करती है. इसके लिए संस्था ने देशभर में चुनिंदा शहरों में सात हज़ार घरों में जनता मीटर लगाए हुए हैं. इन घरों में जिन चैनलों को देखा जाता है, उसके हिसाब से चैनलों के आगे या पीछे रहने की घोषणा की जाती है. जो चैनल जितना ज़्यादा देखा जाता है वह टीआरपी में उतना ही आगे रहता है और विज्ञापनदाता भी उसी आधार पर चैनलों को विज्ञापन देते हैं. ज़्यादा टीआरपी वाले चैनल की विज्ञापन डरें भी ज़्यादा होती हैं. एक अनुमान के मुताबिक़ टेलीविज़न उद्योग का कारोबार 14,800 करोड़ रुपए का है. 10,500 करोड़ रुपए का विज्ञापन का बाज़ार है और इसमें से क़रीब पौने सात सौ करोड़ रुपए पर न्यूज़ चैनलों का कब्ज़ा है. यहां हैरत की बात यह भी है कि अरब कि आबादी वाले भारत में सात हज़ार घरों के लोगों की पसंद देशभर कि जनता की पसंद का प्रतिनिधित्व भला कैसे कर सकती है? लेकिन विज्ञापनदाता इसी टीआरपी को आधार बनाकर विज्ञापन देते हैं, इसलिए यही मान्य हो चुकी है.
समाचार-पत्र अपने विकास का लंबा सफ़र तय कर चुके हैं. उन्होंने प्रेस कि आज़ादी के लिए कई जंगे लड़ी हैं. उन्होंने ख़ुद अपने लिए दिशा-निर्देश तय किए हैं. मगर इलेक्ट्रोनिक मीडिया अभी अपने शैशव काल में है, शायद इसी के चलते उसने आचार संहिता कि धारणा पर विशेष ध्यान नहीं दिया. अब जब सरकार उस पर लगाम कसने कि तैयारी कर रही है तो उसकी नींद टूटी है. सरकार के अंकुश से बचने के लिए ज़रूरी है कि अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण न किया जाए. हर अधिकार कर्तव्य, मर्यादा और जवाबदेही से बंधा होता है. इसलिए बेहतर होगा कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया अपने लिए ख़ुद ही आचार संहिता बनाए और फिर सख्ती से उसका पालन भी करे.

Monday, August 11, 2008

पत्रकारिता बनाम स्टिंग ऑपरेशन


फ़िरदौस ख़ान
इन दिनों पत्रकारिता जगत विशेषकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया में स्टिंग ऑपरेशन का बोलबाला है. स्टिंग शब्द 1930 के अमेरिकन स्लेंग से निकलकर आया शब्द है, जिसका अर्थ है, पूर्व नियोजित चोरी या धोखेबाजी की क्रिया. इसके क़रीब चार दशक बाद यह शब्द अमेरिकन उपयोग में आने लगा, जिसका अर्थ था, पुलिस द्वारा नियोजित गुप्त ओप्रशंस जो किसी शातिर अपराधी को फंसाने के लिए किए जाते थे. धीरे-धीरे स्टिंग ऑपरेशन अपराधियों को पकड़ने का कारगर हथियार बन गया. इसकी कामयाबी को देखते हुए मीडिया ने भी इसका इस्तेमाल शुरू कर दिया और इसमें उसे बेहतर नतीजे भी हासिल हुए हैं. स्टिंग ओप्रशंस ख़बरिया चैनलों की टीआरपी बढ़ाने का ज़रिया बन गए हैं. टैम मीडिया रिसर्च इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक़ शक्ति कपूर से जुड़े कास्टिंग काउच के प्रसारण के समय इंडिया टीवी की टीआरपी पांचवें पायदान से पहले पायदान पर आ गई थी. इसी तरह स्टिंग ऑपरेशन दुर्योधन, चक्रव्यूह, घूस महल और ऑपरेशन कलंक ने जहां लोगों को हकीक़त से रूबरू कराया, वहीं चैनलों की टीआरपी बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाई. भारत ही नहीं विदेशों में भी स्टिंग ऑपरेशन के ज़रिये भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े मामलों का पर्दाफाश किया गया है.

अमेरिका में 'वाशिंगटन पोस्ट' के बर्नस्टीन और वुडवर्ड नामक दो जासूस पत्रकारों ने 1970 में वाटरगेट कांड का खुलासा करके राष्ट्रपति निक्सन को अपना पद छोड़ने पर मजबूर कर दिया था. इन दिनों पत्रकारिता जगत विशेषकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया में स्टिंग ऑपरेशन का बोलबाला है. स्टिंग शब्द 1930 के अमेरिकन स्लेंग से निकलकर आया शब्द है, जिसका अर्थ है, पूर्व नियोजित चोरी या धोखेबाजी की क्रिया. इसके क़रीब चार दशक बाद यह शब्द अमेरिकन उपयोग में आने लगा, जिसका अर्थ था, पुलिस द्वारा नियोजित गुप्त ओप्रशंस जो किसी शातिर अपराधी को फंसाने के लिए किए जाते थे. धीरे-धीरे स्टिंग ऑपरेशन अपराधियों को पकड़ने का कारगर हथियार बन गया. इसकी कामयाबी को देखते हुए मीडिया ने भी इसका इस्तेमाल शुरू कर दिया और इसमें उसे बेहतर नतीजे भी हासिल हुए हैं. स्टिंग ओप्रशंस ख़बरिया चैनलों की टीआरपी बढ़ाने का ज़रिया बन गए हैं. टैम मीडिया रिसर्च इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक़ शक्ति कपूर से जुड़े कास्टिंग काउच के प्रसारण के समय इंडिया टीवी की टीआरपी पांचवें पायदान से पहले पायदान पर आ गई थी. इसी तरह स्टिंग ऑपरेशन दुर्योधन, चक्रव्यूह, घूस महल और ऑपरेशन कलंक ने जहां लोगों को हकीक़त से रूबरू कराया, वहीं चैनलों की टीआरपी बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाई. भारत ही नहीं विदेशों में भी स्टिंग ऑपरेशन के ज़रिये भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े मामलों का पर्दाफाश किया गया है. अमेरिका में 'वाशिंगटन पोस्ट' के बर्नस्टीन और वुडवर्ड नामक दो जासूस पत्रकारों ने 1970 में वाटरगेट कांड का खुलासा करके राष्ट्रपति निक्सन को अपना पद छोड़ने पर मजबूर कर दिया था.

स्टिंग ऑपरेशन के लिए जहां एक अलग प्रकार की ख़ास भाषा को काम में लिया जाता है. इनमें मुख्य रूप से छोटे कैमरों का इस्तेमाल होता है. रेडियो कोवर्ट कैमरे से 500 फीट की दूरी तक के चित्र आसानी से लिए जा सकते हैं. वायरलैस कलर ब्रूच कैमरे को कपड़ों में कोट पिन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. कोवर्ट टाई में पहना जा सकता है. जैकेट कोवर्ट कैमरे की जैकेट हर साइज़ में बाज़ार में उपलब्ध है. क्योक कोवर्ट कैमरा-घड़ी में छुपे इस कैमरे में पॉकेट पीसी सॉफ्टवेर के साथ रिमोट कंट्रोल, मल्टी मीडिया कार्ड और पॉवर एडेप्टर है. टेबल लैंप वायरलैस कैमरे को टेबल लैंप में आसानी से छुपाया जा सकता है. पेंसिल शार्पनर कैमरे को किसी भी जगह रखा जा सकता है. एयर प्योरिफायर कोवर्ट कैमरा-पर्सनल एयर प्योरिफायर में लगा डिजिटल वीडियो रिकॉर्डर होता है. फोलिएज बास्केट कैमरे को फूलदान में छुपाया जा सकता है. पोर्टेबल वायरलैस बुक कैमरा-किताब में लगा पिनहोल कैमरा है. स्टिंग ऑपरेशन में सी बिहाइंड-यू सन ग्लासेस भी बहुत काम आता है. बेहद साधारण दिखने वाले इस चश्मे से अपने पीछे हो रही गतिविधियों को आसानी से देखा जा सकता है. टॉकी पिक्चर्स से बोले हुए शब्द की तस्वीर कैमरे में क़ैद की जा सकती है. डिसअपीयरिंग इंक पेन का इस्तेमाल गुप्त सूचनाएं लिखने के लिए किया जाता है. इसमें विशेष प्रकार की स्याही का इस्तेमाल होता है, जिसकी लिखावट 24 घंटे के बाद ख़ुद मिट जाती है. कमरे के बाहर की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए दरवाज़े के पीप होल पर होल व्यूअर लगाया जाता है. बिग इयर से 400 फीट की दूरी से सबकुछ सुना जा सकता है. सिगरेट ट्रांसमीटर से 1200 फीट की दूरी तक सुनाई देता है. लेजर बीम की मदद से किसी भी स्थान पर हो रही बातचीत को कर में बैठे भी सुना जा सकता है. स्पाइप ऐसा उपकरण है जो पाइप सिस्टम के ज़रिये बेसमेंट से बेडरूम में कही गई हर बात पिक कर लेता है. शुगर लंप माइक को आसानी से कहीं भी छुपाया जा सकता है. बगड मैं नामक इस छोटे वाइस रिकॉर्डर को घड़ी, पेन या टाई में लगाया जा सकता है.

इसके अलावा स्टिंग ऑपरेशन में फ़ोन टेपिंग का भी इस्तेमाल किया जाता है. टेलीग्राफ एक्ट, 1885 के गैरकानूनी तरीके से किसी का फ़ोन टेप करने की मनाही है. सरकार विशेष परिस्थिति में किसी के फ़ोन टेप करने की इजाज़त देती है. 1996 में सर्वोच्च न्यायालय ने फ़ोन टेपिंग से संबंधित दिशा-निर्देश तय किए और इसे टेपिंग निजता के अधिकार का उल्लंघन बताया. फ़रवरी 2006 में दूरसंचार विभाग ने फ़ोन टेपिंग से संबंधित नए दिशा-निर्देश जारी किए. इसके तहत फ़ोन टेपिंग मामले में सुरक्षा एजेंसियों और फ़ोन कंपनियों को ज़्यादा जवाबदेह बनाया गया. हालांकि निजी जासूस एजेंसियां, स्टॉक मार्केट ऑपरेटर्स, व्यापारी, शातिर अपराधी और गैरकानूनी एक्सचेंज चलाने वाले बड़े पैमाने पर फ़ोन टेप करते हैं.

हालांकि गत अगस्त में 'लाइव इंडिया' द्वारा फ़र्जी स्टिंग ऑपरेशन दिखाए जाने के बाद स्टिंग ओप्रशंस की विश्वसनीयता और ख़बरिया चैनलों के माप-दंडों को लेकर बहस छिड़ गई है. स्टिंग ऑपरेशन के अलावा न्यूज़ चैनलों पर सैक्स स्कैंडल, मशहूर लोगों के चुम्बन दृश्यों और हत्या जैसे जघन्य अपराधों को भी मिर्च-मसाला लगाकर दिखाया जा रहा है. भूत-प्रेत और ओझाओं ने भी न्यूज़ चैनलों में अपनी जगह बना ली है. सूचना और प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी ने न्यूज़ चैनलों को फटकार लगाते हुए कहा था कि उन्हें ख़बरें दिखाने के लिए लाइसेंस दिए गए हैं न कि भूत-प्रेत दिखाने के लिए. न्यूज़ चैनलों को मनोरंजन चैनल बनाया जन सरकार बर्दाश्त नहीं करेगी. उन्होंने न्यूज़ चैनलों पर टिप्पणी करते हुए यहां तक कहा था की अब लालू प्रसाद यादव का तम्बाकू खाना भी ब्रेकिंग न्यूज़ हो जाता है. रिचर्ड गेरे द्वारा शिल्पा शेट्टी को चूमे जाने की घटना को सैकड़ों बार चैनलों पर दिखाए जाने पर भी उन्होंने नाराज़गी जताई थी. ख़बरिया चैनलों के संवाददाताओं पर पीड़ितों को आत्महत्या के लिए उकसाने और भीड़ को भड़काकर लोगों को पिटवाने के आरोप भी लगते रहे हैं.

दरअसल, सारा मामला टीआरपी बढ़ाने और फिर इसके ज़रिये ज़्यादा से ज़्यादा विज्ञापन हासिल कर बेतहाशा दौलत बटोरने का है. एक अनुमान के मुताबिक़ एक अरब से ज़्यादा की आबादी वाले भारत में क़रीब 10 करोड़ घरों में टेलीविज़न हैं. इनमें से क़रीब छह करोड़ केबल कनेक्शन धारक हैं. टीआरपी बताने का काम टैम इंडिया मीडिया रिसर्च नामक संस्था करती है. इसके लिए संस्था ने देशभर में चुनिंदा शहरों में सात हज़ार घरों में जनता मीटर लगाए हुए हैं. इन घरों में जिन चैनलों को देखा जाता है, उसके हिसाब से चैनलों के आगे या पीछे रहने की घोषणा की जाती है. जो चैनल जितना ज़्यादा देखा जाता है वह टीआरपी में उतना ही आगे रहता है और विज्ञापनदाता भी उसी आधार पर चैनलों को विज्ञापन देते हैं. ज़्यादा टीआरपी वाले चैनल की विज्ञापन डरें भी ज़्यादा होती हैं. एक अनुमान के मुताबिक़ टेलीविज़न उद्योग का कारोबार 14,800 करोड़ रुपए का है. 10,500 करोड़ रुपए का विज्ञापन का बाज़ार है और इसमें से क़रीब पौने सात सौ करोड़ रुपए पर न्यूज़ चैनलों का कब्ज़ा है. यहां हैरत की बात यह भी है कि अरब कि आबादी वाले भारत में सात हज़ार घरों के लोगों की पसंद देशभर कि जनता की पसंद का प्रतिनिधित्व भला कैसे कर सकती है? लेकिन विज्ञापनदाता इसी टीआरपी को आधार बनाकर विज्ञापन देते हैं, इसलिए यही मान्य हो चुकी है.

इसके अलावा न्यूज़ चैनलों में ख़बरें कम और सस्ता मनोरंजन ज़्यादा से ज़्यादा परोसा जाने लगा है, मगर इस सबके बावजूद हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्टिंग ऑपरेशन के ज़रिये ही भ्रष्टाचार के अनेक बड़े मामले सामने आए हैं, जिन्होंने संसद तक को हिलाकर रख दिया. इसके अलावा अनेक पीड़ितों को इंसाफ़ दिलाने कि मुहिम में भी मीडिया ने सराहनीय भूमिका निभाई है.मीडिया पर लगाम कसने के लिए सरकार नियमन विधेयक-2007 लाने कि बात कर रही है और बाक़ायदा इसके लिए कंटेंट कोड को सभी प्रसारकों के पास सुझावों और आपत्तियों के लिए भेजा गया है, लेकिन सरकार के इस क़दम को लेकर सभी ख़बरिया चैनलों ने हाय-तौबा मचानी शुरू कर दी है.

हालांकि कंटेंट कोड में प्रत्यक्ष रूप से ख़बरिया चैनलों पर सरकारी नियंत्रण कि कोई बात नहीं है, लेकिन इसमें दर्ज नियमों को देखा जाए तो ये चैनलों पर लगाम कसने के लिए काफ़ी हैं. प्रसारकों को जिन बातों पर सख्त एतराज़ है उनमें कंटेंट ऑडिटर कि नियुक्ति और पब्लिक मैसेजिंग सर्विस है. कंटेंट कोड के मुताबिक़ सभी चैनलों को कंटेंट कोड कि नियुक्ति करनी होगी और उन्हें हर प्रसारण सामग्री के लिए सरकार के प्रति जवाबदेह बनाया जाएगा. इसके अलावा पब्लिक मैनेजिंग सर्विस कोड के तहत कुल कंटेंट का 10 फ़ीसदी हिस्सा इससे तय किया जाएगा. सरकार निजी प्रसारकों से जनहित में अपने कसीस भी कार्यक्रम का प्रचार करवा सकती है. हालांकि प्रसारकों ने सरकार कि मंशा को देखते हुए न्यूज़ ब्रोडकास्टर एसोसिएशन (एनबीए) बनाकर मोर्चा संभाल लिया है. उनका कहना है कि सरकार निजी न्यूज़ चैनलों को सरकारी प्रचार के लिए इस्तेमाल करना चाहती है, जिसे क़तई मंज़ूर नहीं किया जा सकता. टीवी चैनलों से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार मीडिया पर किसी भी प्रकार के सरकारी नियंत्रण का विरोध करते हुए कहते हैं कि सरकार खोजी पत्रकारिता पर रोक लगाने के मक़सद से प्रसारण विधेयक ला रही है, क्यूंकि कई स्टिंग ओप्रशनों ने राजनीतिज्ञों के काले कारनामे दिखाकर उनकी पोल खोल दी थी.

समाचार-पत्र अपने विकास का लंबा सफ़र तय कर चुके हैं. उन्होंने प्रेस कि आज़ादी के लिए कई जंगे लड़ी हैं. उन्होंने ख़ुद अपने लिए दिशा-निर्देश तय किए हैं. मगर इलेक्ट्रोनिक मीडिया अभी अपने शैशव काल में है, शायद इसी के चलते उसने आचार संहिता कि धारणा पर विशेष ध्यान नहीं दिया. अब जब सरकार उस पर लगाम कसने कि तैयारी कर रही है तो उसकी नींद टूटी है. सरकार के अंकुश से बचने के लिए ज़रूरी है कि अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण न किया जाए. हर अधिकार कर्तव्य, मर्यादा और जवाबदेही से बंधा होता है. इसलिए बेहतर होगा कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया अपने लिए ख़ुद ही आचार संहिता बनाए और फिर सख्ती से उसका पालन भी करे.

(यह आलेख जनवरी 2008 में बहुभाषी संवाद समिति 'हिन्दुस्थान समाचार' की स्वर्ण जयंती पर प्रकाशित स्मारिका में शाया हुआ था)