Showing posts with label विरासत. Show all posts
Showing posts with label विरासत. Show all posts

Tuesday, July 21, 2026

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काको लागूं पायं



डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
बात उन दिनों की है जब हम हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. हर रोज़ सुबह फ़ज्र की नमाज़ के बाद रियाज़ शुरू होता था. क़रीब दो घंटे तक सुरों की साधना. इस दौरान दिल को जो सुकून मिलता था. उसे शब्दों में बयां करना बहुत मुश्किल है.

इसके बाद कॉलेज जाना और कॉलेज से ऑफ़िस. ऑफ़िस के बाद फिर गुरु जी के पास जाना. संध्या, सरस्वती की वन्दना के साथ शुरू होती. गुरुजी सबसे पहले संगीत की देवी मां सरस्वती की वन्दना से ही रियाज़ शुरू करते थे और फिर वही सुरों की साधना का सिलसिला जारी रहता. हमारे गुरुजी बालकृष्ण बजाज जी, संगीत के प्रति बहुत ही समर्पित थे. वो जितने संगीत के प्रति समर्पित थे उतना ही अपने शिष्यों के प्रति भी स्नेह रखते थे. उनकी पत्नी भी बहुत अच्छे स्वभाव की गृहिणी थीं. गुरुजी के बेटे सन्नी और बेटी शैली हम सबके साथ ही शिक्षा ग्रहण करते थे. कुल मिलाकर बहुत ही पारिवारिक माहौल था.

हमारा बी.ए फ़ाइनल का संगीत का इम्तिहान था. एक राग के गायन के वक़्त हम कुछ भूल गए. हमारे नोट्स की कॉपी हमारे ही कॉलेज के एक सहपाठी के पास थी, जो उसने अभी तक लौटाई नहीं थी. अगली सुबह इम्तिहान था. हम बहुत परेशान थे कि क्या करें. इसी कशमकश में हमने गुरुजी के घर जाने का फ़ैसला किया. शाम को क़रीब सात बजे हम गुरुजी के घर गए.

वहां का मंज़र देखकर पैरों तले की ज़मीन निकल गई. घर के बाहर सड़क पर सफ़ेद शामियाना लगा था. दरी पर बैठी बहुत-सी औरतें रो रही थीं. हम अन्दर गए, आंटी (गुरुजी की पत्नी को हम आंटी कहते हैं) ने बताया कि गुरुजी के बड़े भाई श्री हरिकृष्ण बजाज की सड़क हादसे में मौत हो गई है. और वो दाह संस्कार के लिए शमशान गए हैं. हम उन्हें सांत्वना देकर वापस आ गए.

रात के क़रीब डेढ़ बजे गुरुजी हमारे घर आए. मोटर साइकिल उनका बेटा चला रहा था और गुरुजी पीछे तबले थामे बैठे थे.

अम्मी ने हमें नींद से जगाया. हम कभी भी रात को जागकर पढ़ाई नहीं करते थे, बल्कि सुबह जल्दी उठकर पढ़ना ही हमें पसंद था .हम बैठक में आए.

गुरुजी ने कहा - तुम्हारी आंटी ने बताया था की तुम्हें कुछ पूछना था. कल तुम्हारा इम्तिहान भी है. मैंने सोचा- हो सकता है, तुम्हें कोई ताल भी पूछनी हो इसलिए तबले भी ले आया. गुरुजी ने हमें क़रीब एक घंटे तक शिक्षा दी.

गुरुजी अपने भाई के दाह संस्कार के बाद सीधे हमारे पास ही आ गए थे. ऐसे गुरु पर भला किसको नाज़ नहीं होगा, जिन्होंने ऐसे नाज़ुक वक़्त में भी अपनी शिष्या के प्रति अपने दायित्व को निभाया हो.

संत कबीर जी ने ऐसे ही समर्पित गुरु के बारे में कहा है-
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काको लागूं पायं।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय।।

हमारे गुरु जी गुरु-शिष्य परम्परा की जीवंत मिसाल हैं.
गुरुजी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं.

Saturday, August 13, 2022

ऐ मेरे प्यारे वतन, तुझपे दिल क़ुर्बान


फ़िरदौस ख़ान
यह ख़ुशनुमा अहसास है कि हमारा देश आज़ादी की 75वीं सालगिरह मना रहा है. जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी यानी जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. जन्म स्थान या अपने देश को मातृभूमि कहा जाता है. भारत और नेपाल में भूमि को मां के रूप में माना जाता है. यूरोपीय देशों में मातृभूमि को पितृ भूमि कहते हैं. दुनिया के कई देशों में मातृ भूमि को गृह भूमि भी कहा जाता है. इंसान ही नहीं, पशु-पक्षियों और पशुओं को भी अपनी जगह से प्यार होता है, फिर इंसान की तो बात ही क्या है. हम ख़ुशनसीब हैं कि आज हम आज़ाद देश में रह रहे हैं. देश को ग़ुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद कराने के लिए हमारे पूर्वजों ने बहुत क़ुर्बानियां दी हैं. उस वक़्त देश प्रेम के गीतों ने लोगों में जोश भरने का काम किया. बच्चों से लेकर नौजवानों, महिलाओं और बुज़ुर्गों तक की ज़ुबान पर देश प्रेम के जज़्बे से सराबोर गीत किसी मंत्र की तरह रहते थे. क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की नज़्म ने तो अवाम में फ़िरंगियों की बंदूक़ों और तोपों का सामने करने की हिम्मत पैदा कर दी थी.
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-क़ातिल में है
वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है...
देश प्रेम के गीतों का ज़िक्र मोहम्मद अल्लामा इक़बाल के बिना अधूरा है. उनके गीत सारे जहां से अच्छा के बग़ैर हमारा कोई भी राष्ट्रीय पर्व पूरा नहीं होता. हर मौक़े पर यह गीत गाया और बजाया जाता है. देश प्रेम के जज़्बे से सराबोर यह गीत दिलों में जोश भर देता है.
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्तां हमारा
यूनान, मिस्र, रोमा, सब मिट गए जहां से
अब तक मगर है बाक़ी, नामो-निशां हमारा...
जयशंकर प्रसाद का गीत यह अरुण देश हमारा, भारत के नैसर्गिक सौंदर्य का बहुत ही मनोहरी तरीक़े से चित्रण करता है.
अरुण यह मधुमय देश हमारा
जा पहुंच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा...
हिन्दी फ़िल्मों में भी देश प्रेम के गीतों ने लोगों में राष्ट्र प्रेम की गंगा प्रवाहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. आज़ादी से पहले इन गीतों ने हिन्दुस्तानियों में ग़ुलामी की जंज़ीरों को तोड़कर मुल्क को आज़ाद कराने का जज़्बा पैदा किया और आज़ादी के बाद देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय एकता की भावना का संचार करने में अहम किरदार अदा किया है. फ़िल्मों का ज़िक्र किया जाए तो देश प्रेम के गीत रचने में कवि प्रदीप आगे रहे. उन्होंने 1962 की भारत-चीन जंग के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए ‘ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आंख में भर लो पानी’ गीत लिखा. लता मंगेशकर द्वारा गाये इस गीत का तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मौजूदगी में 26 जनवरी, 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान में सीधा प्रसारण किया गया था. गीत सुनकर जवाहरलाल नेहरू की आंखें भर आई थीं. साल 1943 बनी फिल्म क़िस्मत के गीत ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है’ ने उन्हें अमर कर दिया. इस गीत से ग़ुस्साई तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ़्तारी के आदेश दिए थे, जिसकी वजह से प्रदीप को भूमिगत होना पड़ा था. उनके लिखे फ़िल्म जागृति (1954) के गीत ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिन्दुस्तानकी’ और ‘दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’ आज भी लोग गुनगुना उठते हैं. शकील बदायूंनी का लिखा फ़िल्म सन ऑफ़ इंडिया का गीत ‘नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं’ बच्चों में बेहद लोकप्रिय है. कैफ़ी आज़मी के लिखे और मोहम्मद रफ़ी के गाये फ़िल्म हक़ीक़त के गीत ‘कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों’ को सुनकर आंखें नम हो जाती हैं और शहीदों के लिए दिल श्रद्धा से भर जाता है. फ़िल्म लीडर का शकील बदायूंनी का लिखा और मोहम्मद रफ़ी का गाया और नौशाद के संगीत से सजा गीत ‘अपनी आज़ादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं, सर कटा सकते हैं, लेकिन सर झुका सकते नहीं’ बेहद लोकप्रिय हुआ. प्रेम धवन द्वारा रचित फ़िल्म हम हिन्दुस्तानी का गीत ‘छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी, नये दौर में लिखेंगे, मिलकर नई कहानी’ आज भी इतना ही मीठा लगता है. उनका फ़िल्म क़ाबुली वाला का गीत भी रोम-रोम में देश प्रेम का जज़्बा भर देता है.
ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन, तुझ पे दिल क़ुर्बान
तू ही मेरी आरज़ू, तू ही मेरी आबरू, तू ही मेरी जान...
राजेंद्र कृष्ण द्वारा रचित फ़िल्म सिकंदर-ए-आज़म का गीत भारत देश के गौरवशाली इतिहास का मनोहारी बखान करता है.
जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा, वो भारत देश है मेरा
जहां सत्य अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा, वो भारत देश है मेरा...
इसी तरह गुलशन बावरा द्वारा रचित फ़िल्म उपकार का गीत देश के प्राकृतिक खनिजों के भंडारों और खेतीबाड़ी और जनमानस से जुड़ी भावनाओं को बख़ूबी प्रदर्शित करता है.
मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती
मेरी देश की धरती
बैलों के गले में जब घुंघरू
जीवन का राग सुनाते हैं
ग़म कोसों दूर हो जाता है
जब ख़ुशियों के कमल मुस्काते हैं...
इसके अलावा फ़िल्म अब दिल्ली दूर नहीं, अमन, अमर शहीद, अपना घर, अपना देश, अनोखा, आंखें, आदमी और इंसान, आंदोलन, आर्मी, इंसानियत, ऊंची हवेली, एक ही रास्ता, क्लर्क, क्रांति, कुंदन, गोल्ड मेडल, गंगा जमुना, गंगा तेरा पानी अमृत, गंगा मान रही बलिदान, गंवार, चंद्रशेखर आज़ाद, चलो सिपाही चलो, चार दिल चार रास्ते, छोटे बाबू, जय चित्तौ़ड, जय भारत, जल परी, जियो और जीने दो, जिस देश में गंगा बहती है, जीवन संग्राम, जुर्म और सज़ा, जौहर इन कश्मीर, जौहर महमूद इन गोवा, ठाकुर दिलेर सिंह, डाकू और महात्मा, तलाक़, तूफ़ान और दीया, दीदी, दीप जलता रहे, देशप्रेमी, धर्मपुत्र, धरती की गोद में, धूल का फूल, नई इमारत, नई मां, नवरंग, नया दौर, नया संसार, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, प्यासा, परदेस, पूरब और पश्चिम, प्रेम पुजारी, पैग़ाम, फ़रिश्ता और क़ातिल, अंगारे, फ़ौजी, बड़ा भाई, बंदिनी, बाज़ार, बालक, बापू की अमर कहानी, बैजू बावरा, भारत के शहीद, मदर इंडिया, माटी मेरे देश की, मां बाप, मासूम, मेरा देश मेरा धर्म, जीने दो, रानी रूपमति, लंबे हाथ, शहीद, आबरू, वीर छत्रसाल, दुर्गादास, शहीदे-आज़म भगत सिंह, समाज को बदल डालो, सम्राट पृथ्वीराज चौहान, हम एक हैं, कर्मा, हिमालय से ऊंचा, नाम और बॉर्डर आदि फ़िल्मों के देश प्रेम के गीत भी लोगों में जोश भरते हैं. मगर अफ़सोस कि अमूमन ये गीत स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस या फिर गांधी जयंती जैसे मौक़ों पर ही सुनने को मिलते हैं, ख़ासकर ऑल इंडिया रेडियो पर.
बहरहाल, यह हमारे देश की ख़ासियत है कि जब राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवय या इसी तरह के अन्य दिवस आते हैं तो रेडियो पर देश प्रेम के गीत सुनाई देने लगते हैं. बाक़ी दिनों में इन गीतों को सहेजकर रख दिया जाता है. शहीदों की याद और देश प्रेम को कुछ विशेष दिनों तक ही सीमित करके रख दिया गया है. इन्हीं ख़ास दिनों में शहीदों को याद करके उनके प्रति अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है. कवि जगदम्बा प्रसाद मिश्र हितैषी के शब्दों में यही कहा जा सकता है-
शहीदों की चिताओं लगेंगे हर बरस मेले
वतन पे मरने वालों का यही बाक़ी निशां होगा… 
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं)

Monday, February 7, 2022

सूफ़ियाना बसंत पंचमी

 

फ़िरदौस ख़ान
बसंत पंचमी को जश्ने बहारा भी कहा जाता है, क्योंकि बसंत पंचमी बहार के मौसम का पैग़ाम लाती है. सूफ़ियों के लिए बंसत पंचमी का दिन बहुत ख़ास होता है. ख़ानकाहों में बसंत पंचमी मनाई जाती है. बसंत का पीला साफ़ा बांधे मुरीद बसंत के गीत गाते हैं. बसंत पंचमी के दिन मज़ारों पर पीली चादरें चढ़ाई जाती हैं. पीले फूलों की भी चादरें चढ़ाई जाती हैं, पीले फूल चढ़ाए जाते हैं. क़व्वाल पीले साफ़े बांधकर हज़रत अमीर ख़ुसरो के गीत गाते हैं.
आज बसंत मना ले सुहागन
आज बसंत मना ले  
अंजन–मंजन कर पिया मोरी
लंबे नेहर लगाए
तू क्या सोवे नींद की माटी
सो जागे तेरे भाग सुहागन
आज बसंत मना ले
ऊंची नार के ऊंचे चितवन
ऐसो दियो है बनाय
शाहे अमीर तोहे देखन को
नैनों से नैना मिलाय
आज बसंत मना ले, सुहागन
आज बसंत मना ले  

कहा जाता है कि ख़ानकाहों में बसंत पंचमी मनाने की यह रिवायत हज़रत अमीर ख़ुसरो ने शुरू की थी. हुआ यूं कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (रहमतुल्लाह) को अपने भांजे हज़रत सैयद नूह के विसाल से बहुत सदमा पहुंचा और वह उदास रहने लगे. हज़रत अमीर ख़ुसरो से अपने मुर्शिद की यह हालत देखी न गई. वे उन्हें ख़ुश करने के जतन करने लगे, लेकिन कामयाब नहीं हो पाए. एक दिन हज़रत अमीर ख़ुसरो अपने साथियों के साथ कहीं जा रहे थे. नीले आसमान पर सूरज दमक रहा था. उसकी सुनहरी किरनें ज़मीन पर पड़ रही थीं. उन्होंने रास्ते में सरसों के खेत देखे. सरसों के पीले फूल बहती हवा से लहलहा रहे थे. उनकी ख़ूबसूरती हज़रत अमीर ख़ुसरो की निगाहों में बस गई और वे वहीं खड़े होकर फूलों को निहारने लगे. तभी उन्होंने देखा कि एक मंदिर के पास कुछ हिन्दू श्रद्धालु हर्षोल्लास से नाच गा रहे हैं. यह देखकर उन्हें बहुत अच्छा लगा. उन्होंने इस बारे में पूछा तो श्रद्धालुओं ने बताया कि आज बसंत पंचमी है और वे लोग देवी सरस्वती पर पीले फूल चढ़ाने जा रहे हैं, ताकि देवी ख़ुश हो जाए.
इस पर हज़रत अमीर ख़ुसरो ने सोचा कि वे भी अपने पीर मुर्शिद, अपने औलिया को पीले फूल देकर ख़ुश करेंगे. फिर क्या था. उन्होंने पीले फूलों के गुलदस्ते बनाए और कुछ पीले फूल अपने साफ़े में भी लगा लिए. फिर वे अपने पीर भाइयों और क़व्वालों को साथ लेकर नाचते-गाते हुए अपने मुर्शिद के पास पहुंच गए. अपने मुरीदों को इस तरह नाचते-गाते देखकर उनके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई. और इस तरह बसंत पंचमी के दिन हज़रत अमीर ख़ुसरो को उनकी मनचाही मुराद मिल गई. तब से हज़रत अमीर ख़ुसरो हर साल बसंत पंचमी मनाने लगे. 
अमीर ख़ुसरो को सरसों के पीले फूल इतने भाये कि उन्होंने इन पर एक गीत लिखा-   
सगन बिन फूल रही सरसों
अम्बवा फूटे, टेसू फूले, कोयल बोले डार-डार
और गोरी करत सिंगार
मलनियां गेंदवा ले आईं कर सों
सगन बिन फूल रही सरसों
तरह तरह के फूल खिलाए
ले गेंदवा हाथन में आए
निज़ामुद्दीन के दरवज़्ज़े पर
आवन कह गए आशिक़ रंग
और बीत गए बरसों
सगन बिन फूल रही सरसों

ग़ौरतलब है कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (रहमतुल्लाह) चिश्ती सिलसिले के औलिया हैं. उनकी ख़ानकाह में बंसत पंचमी की शुरुआत होने के बाद दूसरी दरगाहों और ख़ानकाहों में भी बंसत पंचमी बड़ी धूमधाम से मनाई जाने लगी. इस दिन मुशायरों का भी आयोजन किया जाता है, जिनमें शायर बंसत पंचमी पर अपना कलाम पढ़ते हैं.
हिन्दुस्तान के अलावा पड़ौसी देशों पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी बंसत पंचमी को जश्ने बहारा के तौर पर ख़ूब धूमधाम से मनाया जाता है. 
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं)    

Sunday, April 24, 2016

पाणिग्रहण संस्कार पर मुग्ध हुए विदेशी


फ़िरदौस ख़ान
भारत विभिन्न संस्कृतियों का देश है. हर संस्कृति की अपनी-अपनी परंपराएं और अपने रीति-रिवाज हैं. यहां अमूमन सभी त्योहारों और मांगलिक कार्यों में पूरी आस्था के साथ परंपराओं और रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है. यहां जन्म से लेकर मृत्यु तक अनेक संस्कार होते हैं. इन्हीं में से एक संस्कार है पाणिग्रहण. हिंदू धर्म में इसे सोलह संस्कारों में से एक संस्कार माना जाता है. पाणिग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से हिंदू विवाह के नाम से जाना जाता है. हिंदू विवाह पति और पत्नी के बीच सात जन्मों का रिश्ता माना जाता है. मंत्रोच्चारण के बीच अग्नि के सात फेरे लेकर और ध्रुव तारे को साक्षी मानकर स्त्री-पुरुष तन और मन से एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं. भारतीय विवाह ख़ास होते हैं, क्योंकि इनमें ढेर सारे रीति-रिवाज होते हैं. ये रस्में विवाह से पहले शुरू हो जाती हैं और विवाह के बाद तक चलती हैं. ये परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं और इनके बिना विवाह पूर्ण नहीं होते, वह चाहे सगाई की रस्म हो, हल्दी- मेहंदी की रस्म हो या फिर दुल्हन की मुंह दिखाई की रस्म. हर परंपरा का अपना अलग महत्व है, अपनी अलग गरिमा और पहचान है. ये रस्में ही तो हैं, जो विवाह को और भी ज़्यादा यादगार बना देती हैं. छोटी-छोटी रस्में यादों में हमेशा के लिए बस जाती हैं.

विवाह से जुड़ी एक अहम रस्म है हल्दी लगाना. विवाह से पहले दुल्हन और दूल्हा हो सुहागिनें हल्दी यानी उबटन लगाती हैं. दुल्हन को उबटन लगाने के लिए दूल्हा के घर से महिलाएं आती हैं. इस उबटन में बेसन, हल्दी, चंदन, केसर और खु़शबू वाला तेल मिलाया जाता है. आजकल तो बाज़ार में तैयार उबटन मिलते हैं. बस उसमें तेल मिलाना होता है. उबटन से दूल्हा और दुल्हन की त्वचा कोमल हो जाती है और रंग भी निखर जाता है. इस रस्म के वक़्त दुल्हन को पीले कपड़े पहनाये जाते हैं और उसे फूलों के गहनों से सजाया जाता है. इसी तरह दुल्हन के घर की महिलाएं दूल्हे को हल्दी लगाने के लिए उसके घर जाती हैं. इस रस्म के बाद दूल्हा और दुल्हन के एक-दूसरे से मिलने पर रोक लग जाती है और यह पाबंदी विवाह तक रहती बनी है. विवाह से एक दिन पहले दूल्हा और दुल्हन को मेहंदी लगाई जाती है. दुल्हन को दूल्हा के घर से आई हुई मेहंदी लगती है. महिलाएं रतजगा करती हैं. रातभर संगीत की महफ़िल सजती है, जिसमें नाच-गाना शामिल होता है. इस दौरान सजी-धजी महिलाएं अपने-अपने हुनर का प्रदर्शन करती हैं. इसी तरह दूल्हा के हाथ पर भी शगुन के तौर पर मेहंदी लगाई जाती है. इस दौरान दूल्हे के घर भी जश्न का माहौल होता है. दूल्हे के दोस्त ख़ूब नाच-गाना करते हैं. अगले दिन शुभ मुहूर्त में मंत्रोच्चारण के बीच स्त्री-पुरुष विवाह के पवित्र बंधन में बंध जाते हैं. वर-वधू अपने बड़ों से आशीर्वाद लेते हैं. वर-वधू के नाते-रिश्तेदार और मित्र विवाह में शामिल होते हैं. विवाह समारोह के दौरान अनेक छोटी-छोटी रस्में होती हैं. लड़की हमेशा के लिए अपने मायके से जा रही होती है, इसलिए माहौल थोड़ा गंभीर होता है, लेकिन जीजा-सालियों की हंसी-ठिठोली माहौल को ख़ुशनुमा बना देती हैं. वर-वधू का द्वार सालियां व बहनें रोकती हैं. फिर दूल्हे द्वारा उन्हें नेग दिया जाता है. विवाह के बाद दुल्हन की मुंह दिखाई की रस्म होती है, जिसमें ससुराल की महिलाएं दुल्हन का घूंघट खोलकर उसका चेहरा देखती हैं और उसे नेग देती हैं.

ख़ास बात यह भी है कि विवाह की रस्मों में जिन चीज़ों का इस्तेमाल किया जाता है, उनका भी विशेष महत्व होता है, जैसे हल्दी, बेसन, केसर, घी, नारियल, पान, दूध, दही, पानी आदि. विवाह में चावल का भी ख़ूब काम आता है. चावल को शुद्ध और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद देने के लिए उनके ऊपर चावल छिड़का जाता है. मान्यता है कि चावल शुद्ध होने की वजह से नकारात्मक चीज़ों को दूर भगाता है, इसलिए विवाह के दौरान दूल्हा प्रज्जवलित अग्नि में चावल भी डालता है. कुलदेवी को भी चावल अर्पित किया जाता है. विवाह के बाद विदाई के वक़्त दुल्हन अपने हाथों में चावल भरकर सिर के पीछे की ओर फेंकती है. फिर दुल्हन ससुराल पहुंचकर चावल से भरे कलश को अपने पैरों से गिराकर घर में दाख़िल होती है. इन दोनों रस्मों के ज़रिये दुल्हन यह दुआ करती है कि उसके मायके और ससुराल दोनों में ख़ुशहाली हमेशा बनी रहे. इसी तरह धार्मिक रीति-रिवाजों में पान और सुपारी का भी इस्तेमाल किया जाता है. सुपारी को देवी का प्रतीक माना जाता है, जबकि पान ताज़गी और समृद्धि का प्रतीक है. पान को दूल्हा और दुल्हन के सिर पर लगाया जाता है. दूल्हे के परिवार का स्वागत भी पान से किया जाता है. विवाह की कई रस्मों में पान काम आता है. नारियल भी समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. मेहमानों को धन्यवाद के प्रतीक के रूप में पान के साथ नारियल भी दिया जाता है. विवाह के विभिन्न रीति-रिवाजों में पानी का भी ख़ूब इस्तेमाल होता है. पानी शुद्ध नदियों का प्रतीक है. यह जीवन का आधार है. इसके अलावा आम, केला, नीम और तुलसी के पत्तों का इस्तेमाल भी विवाह के विभिन्न रीति-रिवाजों में किया जाता है. इनके पत्ते शुद्धता के प्रतीक हैं. जब दुल्हन गृह-प्रवेश करती है, तो उस वक़्त गुड़ खिलाकर उसका स्वागत किया जाता है, ताकि रिश्तों में हमेशा मिठास बनी रहे. घी को पवित्र माना जाता है और विवाह की रस्मों के दौरान इसका भी ख़ूब इस्तेमाल होता है. विवाह के बाद की कई रस्मों में दही का इस्तेमाल भी होता है. कई रस्मों में दूध भी उपयोग में आता है.

 दरअसल, इन परंपराओं और रीति-रिवाजों के बिना विवाह की खु़शी अधूरी है. ये रस्में माहौल में ख़ुशियों के रंग भर देती हैं. विदेशी भी इन रस्मों के आकर्षण में बंधे यहां विवाह करने के लिए चले आते हैं. ऐसे बहुत से उदाहरण हैं. 23 अक्टूबर, 2010 को ब्रिटिश हास्य अभिनेता रसेल ब्रांड और गायिका कैटी पेरी ने रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान के नज़दीक वैदिक रीति-रिवाज से विवाह किया था. इससे पहले मार्च 2007 में अभिनेत्री लिज हर्ले और व्यापारी अरुण नायर ने जोधपुर में पारंपरिक भारतीय पद्धति से विवाह किया था. हाल में 31 दिसंबर, 2013 को आगरा में फ्रांसीसी जोड़े ने वैदिक रीति से विवाह किया. फ्रांस के रहने वाले जेन क्लाउड और उनकी महिला मित्र नथालिया भारत भ्रमण पर आए थे. दोनों 30 दिसंबर को आगरा पहुंचे. वह ताजमहल देखने गए और शहंशाह शाहजहां और उनकी बेगम मुमताज़ की मोहब्बत की दास्तान सुनकर मुग्ध हो गए. इस प्रेमकथा से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भारतीय रीति-रिवाज से विवाह करने का फ़ैसला कर लिया. जेन क्लाउड और नथालिया दूल्हा, दुल्हन के लिबास में सज-संवर कर कैलादेवी मंदिर में पहुंचे. जेन क्लाउड ने नथालिया को मंगलसूत्र पहनाया और अग्नि के सात फेरे लिए. विवाहित जोड़े का कहना है कि वे भारत की संस्कृति से बहुत प्रभावित हैं. यहां आकर उन्हें पता चला कि भारत में वैदिक रीति से विवाह को सात जन्मों का बंधन माना जाता है. यहां रिश्तों की मिठास और रीति-रिवाजों ने उन्हें बहुत प्रभावित किया, इसीलिए उन्होंने वैदिक रीति से विवाह किया. इससे पहले 25 दिसंबर, 2013 को मध्य प्रदेश के इंदौर में तीन विदेशी जोड़ों ने हिंदू रीति-रिवाजों के साथ विवाह किया. सभी वर-वधू भारतीय परिधानों में सजे-धजे थे. दूल्हों ने शेरवानी पहनी और साफ़ा बांधा. दुल्हनों ने लाल साड़ी पहनी और खु़द को पारंपरिक गहनों से सजाया. मंडप भी सजा और मंत्रोच्चारण के बीच सात फेरे लेकर वे विवाह के पवित्र बंधन में बंध गए. मैक्सिको की मारिया फ्लांडेज कैस्टिलो ने मैक्सिको के ही डेमियन उगाल्डे को वरमाला पहनाई. इंग्लैंड की लूसी हॉवेल ने आयरलैंड के डर्मोट ग्रीन को वरमाला पहनाई और स्पेन की मेंचू हर्नाडेज ने इंग्लैंड के ओलिवर एलिस को वरमाला पहनाकर हमेशा के लिए अपना बना लिया. इससे क़रीब एक माह पहले 19 नवंबर, 2013 को रूस के सेंट पीर्ट्सबर्ग से आए तीन जोड़ों ने उत्तराखंड के कनखल में वैदिक रीति से विवाह किया. ततियाना शूबेएकोव अपने मंगेतर ऑटोमोबाइल इंजीनियर सरनोव के साथ सात फेरे लिए. उनका कहना है कि उनकी दादी का विवाह धीरेंद्र ब्रह्मचारी ने कराया था और मां का विवाह प्रख्यात योगाचार्य बीकेएस आयंगर ने संपन्न कराया था. वह भी अपनी दादी और मां की तरह वैदिक रीति-रिवाज के साथ विवाह करना चाहती थीं, इसलिए भारत आईं. प्रोफेसर मैक्सीम ने अपनी मंगेतर येकटरीना से विवाह किया. मैक्सीम और येकटरीना का मानना है कि उनकी शादीशुदा ज़िंदगी ख़ुशहाल रहेगी. उनका कहना है कि भारत ऐसा अद्भुत देश है, जहां एक बार पाणिग्रहण संस्कार हो जाने के बाद जोड़ो को मौत ही जुदा करती है. आना कालीनीना का विवाह उनके मंगेतर व्यापारी अलेक्जेंडर के साथ संपन्न हुआ. आना कालीनीना और उनके मंगेतर अलेक्जेंडर भी वैदिक रीति-रिवाज के साथ विवाह करके बहुत ख़ुश हैं. तीन जोड़ों के विवाह को संपन्न कराने में चार भाषाएं इस्तेमाल की गई थीं. मंत्र संस्कृत में पढ़े गए और उनका अर्थ पंडितजी ने हिंदी में बताया. बाद में इसका अंग्रेजी अनुवाद किया गया, जबकि एक रूसी दुभाषिये ने जोड़ों को रूसी भाषा में मंत्रों का अर्थ समझाया. ये तीनों जोड़े वास्तु सीखने के लिए हरिद्वार आते रहे हैं, इसलिए इस इलाक़े उन्हें लगाव हो गया है. वे कहते हैं कि विवाह के बाद इस जगह से उनका रिश्ता अब और भी गहरा हो गया है.

 इसी तरह 11 मार्च, 2012 को वाराणसी में एक विदेशी जोड़े ने वैदिक रीति से विवाह किया. वाराणसी के कबीरचौरा स्थित एक लॊन में यह विवाह संपन्न हुआ. पेशे से पत्रकार अमेरिका (वाशिंगटन प्रांत) के सिएटल शहर निवासी डोरिक जानसन घोड़ी पर सवार होकर विवाह स्थल पर पहुंचे, जहां सिएटल की एक कंपनी में सीईओ शैरी डांटोनियो लाल जोड़े में सजी उनका का इंतजार कर रही थी. इस मंडप में सरोद वादक विकास महाराज के पुत्र बालम महाराज और वधू सुहाना मिश्रा का विवाह हुआ था. इसी विवाह मंडप में विदेशी युगल ने भी फेरे लिए. विदेशी युगल ने विकास महाराज से हिंदू रीति से विवाह की इच्छा जताई थी. डोरिक के माता-पिता के रूप में भी रस्में विकास महाराज और उनकी पत्नी ने ही निभाईं. 7 मार्च, 2009 में राजस्थान के पुष्कर में स्विट्जरलैंड के पहले से ही शादीशुदा जोड़े ने अपने रिश्ते को और भी मज़बूत करने के लिए वैदिक रीति से विवाह किया. स्विट्जरलैंड निवासी विनसेंट और उसकी पत्नी किकि ने पुष्कर के रावणा राजपूत समाज के चारभुजा मंदिर में वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच अग्नि के समक्ष सात फेरे लगाए और एक दूसरे को वरमाला पहनाई. दोनों से आठ साल पहले प्रेम विवाह किया था. उनका कहना थी कि यह दिन उनके लिए यादगार रहेगा. जून 2004 में जयपुर में स्विटज़लैंड के मारकोस और अलम्सा ने वैदिक रीति से विवाह किया था.  स्विटज़रलैंड के एक ऐसे ही प्रेमी जोड़े ने जयपुर में स्थानीय रीति रिवाज़ से विवाह किया. अलाम्सा का मानना था कि भारत में विवाह ज़्यादा कामयाब हैं, क्योंकि विवाह का अपना पारंपरिक तरीक़ा है. मारकोस का कहना था कि भारतीय विवाह में रौनक़ बहुत होती है, जो उन्हें बहुत पसंद आई. क़ाबिले-ग़ौर है कि सभी विदेशी दुल्हनें भारतीय दुल्हनों की तरह सजती-संवरती हैं. लाल लिबास, मांग में सिंदूर, मेहंदी से सजे हाथों में चूड़ियां, पारंपरिक गहने और फूलों के गजरे लगाए ये दुल्हनें किसी अप्सरा से कम नहीं लगतीं. दूल्हे भी पारंपरिक शेरवानी और साफ़ों में नज़र आते हैं.

इसे विडंबना ही कहेंगे कि आज जब भारतीय युवा अपनी संस्कृति से विमुख होकर पश्चिम की लहर में बह रहे हैं, वहीं विदेशियों में भारतीय संस्कृति और परंपराओं में आस्था बढ़ रही है. हर सल सैकड़ों विदेशी जोड़े भारत आते हैं और वैदिक रीति से विवाह करते हैं. भारतीय प्राच्य विद्या सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. प्रतीक मिश्रपुरी के मुताबिक़ वह खु़द साठ विदेशी जोड़ों का वैदिक रीति से विवाह करा चुके हैं. उनका कहना है कि विदेशियों के मन में तलाक़ का डर रहता है. इसलिए वे ऐसी पद्धतियों की तलाश में रहते हैं, जिनसे उनका विवाह लंबे वक़्त तक चल सके. एक अनुमान के मुताबिक़ अकेले राजस्थान में हर साल तक़रीबन तीन सौ विदेशी जोड़े विवाह करते हैं.

यह भारतीय परंपराओं और रीति-रिवाजों का आकर्षण ही है, जो विदेशियों को भी भारत आकर वैदिक रीति से विवाह रचाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. बेशक, यही परंपराएं और रीति-रिवाज हमारी गौरवशाली संस्कृति का प्रतीक हैं.

Sunday, January 17, 2016

जान हमने भी गंवाई है वतन की ख़ातिर...


फ़िरदौस ख़ान
'कुछ लोगों' की वजह से पूरी मुस्लिम क़ौम को शक की नज़र से देखा जाने लगा है... इसके लिए जागरूक मुसलमानों को आगे आना होगा... और उन बातों से परहेज़ करना होगा जो मुसलमानों के प्रति 'संदेह' पैदा करती हैं... कोई कितना ही झुठला ले, लेकिन यह हक़ीक़त है कि हिन्दुस्तान के मुसलमानों ने भी देश के लिए अपना खू़न और पसीना बहाया है. हिन्दुस्तान मुसलमानों को भी उतना ही अज़ीज़ है, जितना किसी और को... यही पहला और आख़िरी सच है... अब यह मुसलमानों का फ़र्ज़ है कि वो इस सच को 'सच' रहने देते हैं... या फिर 'झूठा' साबित करते हैं...

इस देश के लिए मुसलमानों ने अपना जो योगदान दिया है, उसे किसी भी हालत में नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता. कितने ही शहीद ऐसे हैं, जिन्होंने देश के लिए अपनी जान तक कु़र्बान कर दी, लेकिन उन्हें कोई याद तक नहीं करता. हैरत की बात यह है कि सरकार भी उनका नाम तक नहीं लेती. इस हालात के लिए मुस्लिम संगठन भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं. वे भी अपनी क़ौम और वतन से शहीदों को याद नहीं करते.

हमारा इतिहास मुसलमान शहीदों की कु़र्बानियों से भरा पड़ा है. मसलन, बाबर और राणा सांगा की लड़ाई में हसन मेवाती ने राणा की ओर से अपने अनेक सैनिकों के साथ युध्द में हिस्सा लिया था. झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की दो मुस्लिम सहेलियों मोतीबाई और जूही ने आख़िरी सांस तक उनका साथ निभाया था. रानी के तोपची कुंवर गु़लाम गोंसाई ख़ान ने झांसी की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहूति दी थी. कश्मीर के राजा जैनुल आबदीन ने अपने राज्य से पलायन कर गए हिन्दुओं को वापस बुलाया और उपनिषदों के कुछ भाग का फ़ारसी में अनुवाद कराया. दक्षिण भारत के शासक इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय ने सरस्वती वंदना के गीत लिखे. सुल्तान नाज़िर शाह और सुल्तान हुसैन शाह ने महाभारत और भागवत पुराण का बंगाली में अनुवाद कराया. शाहजहां के बड़े बेटे दारा शिकोह ने श्रीमद्भागवत और गीता का फ़ारसी में अनुवाद कराया और गीता के संदेश को दुनियाभर में फैलाया.

गोस्वामी तुलसीदास को रामचरित् मानस लिखने की प्रेरणा कृष्णभक्त अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना से मिली. तुलसीदास रात को मस्जिद में ही सोते थे. 'जय हिन्द' का नारा सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज के कप्तान आबिद हसन ने 1942 में दिया था, जो आज तक भारतीयों के लिए एक मंत्र के समान है. यह नारा नेताजी को फ़ौज में सर्वअभिनंदन भी था.

छत्रपति शिवाजी की सेना और नौसेना के बेड़े में एडमिरल दौलत ख़ान और उनके निजी सचिव भी मुसलमान थे. शिवाजी को आगरे के क़िले से कांवड़ के ज़रिये क़ैद से आज़ाद कराने वाला व्यक्ति भी मुसलमान ही था. भारत की आज़ादी के लिए 1857 में हुए प्रथम गृहयुध्द में रानी लक्ष्मीबाई की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उनके पठान सेनापतियों जनरल गुलाम ग़ौस ख़ान और ख़ुदादा ख़ान की थी. इन दोनों ही शूरवीरों ने झांसी के क़िले की हिफ़ाज़त करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए. गुरु गोबिन्द सिंह के गहरे दोस्त सूफ़ी बाबा बदरुद्दीन थे, जिन्होंने अपने बेटों और 700 शिष्यों की जान गुरु गोबिन्द सिंह की रक्षा करने के लिए औरंगंज़ेब के साथ हुए युध्दों में कु़र्बान कर दी थी, लेकिन कोई उनकी क़ुर्बानी को याद नहीं करता. बाबा बदरुद्दीन का कहना था कि अधर्म को मिटाने के लिए यही सच्चे इस्लाम की लड़ाई है.

अवध के नवाब तेरह दिन होली का उत्सव मनाते थे. नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में श्रीकृष्ण के सम्मान में रासलीला का आयोजन किया जाता था. नवाब वाजिद शाह अली ने ही अवध में कत्थक की शुरुआत की थी, जो राधा और कृष्ण के प्रेम पर आधारित है. प्रख्यात नाटक 'इंद्र सभा' का सृजन भी नवाब के दरबार के एक मुस्लिम लेखक ने किया था. भारत में सूफ़ी पिछले आठ सौ बरसों से बसंत पंचमी पर 'सरस्वती वंदना' को श्रध्दापूर्वक गाते आए हैं. इसमें सरसों के फूल और पीली चादर होली पर चढ़ाते हैं, जो उनका प्रिय पर्व है. महान कवि अमीर ख़ुसरो ने सौ से भी ज़्यादा गीत राधा और कृष्ण को समर्पित किए थे. अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की बुनियाद मियां मीर ने रखी थी. इसी तरह गुरु नानकदेव के प्रिय शिष्य व साथी मियां मरदाना थे, जो हमेशा उनके साथ रहा करते थे. वह रबाब के संगीतकार थे. उन्हें गुरुबानी का प्रथम गायक होने का श्रेय हासिल है. बाबा मियां मीर गुरु रामदास के परम मित्र थे. उन्होंने बचपन में रामदास की जान बचाई थी. वह दारा शिकोह के उस्ताद थे. रसखान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्तों में से एक थे जैसे भिकान, मलिक मोहम्मद जायसी आदि. रसखान अपना सब कुछ त्याग कर श्रीकृष्ण के प्रेम में लीन हो गए. श्रीकृष्ण की अति सुंदर रासलीला रसखान ने ही लिखी. श्रीकृष्ण के हज़ारों भजन सूफ़ियों ने ही लिखे, जिनमें भिकान, मलिक मोहम्मद जायसी, अमीर ख़ुसरो, रहीम, हज़रत सरमाद, दादू और बाबा फरीद शामिल हैं. बाबा फ़रीद की लिखी रचनाएं बाद में गुरु ग्रंथ साहिब का हिस्सा बनीं.

बहरहाल, मुसलमानों को ऐसी बातों से परहेज़ करना चाहिए, जो उनकी पूरी क़ौम को कठघरे में खड़ा करती हैं...
जान हमने भी गंवाई है वतन की ख़ातिर
फूल सिर्फ़ अपने शहीदों पे चढ़ाते क्यों हो...

Friday, January 1, 2016

सुनने की फ़ुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में...

फ़िरदौस ख़ान
ये कहानी है दिल्ली के ’शहज़ादे’ और हिसार की ’शहज़ादी’ की. उनकी मुहब्बत की. गूजरी महल की तामीर का तसव्वुर सुलतान फ़िरोज़शाह तुगलक़ ने अपनी महबूबा के रहने के लिए किया था...शायद यह किसी भी महबूब का अपनी महबूबा को परिस्तान में बसाने का ख़्वाब ही हो सकता था और जब गूहरी महल की तामीर की गई होगी...तब इसकी बनावट, इसकी नक्क़ाशी और इसकी ख़ूबसूरती को देखकर ख़ुद भी इस पर मोहित हुए बिना न रह सका होगा...
हरियाणा के हिसार क़िले में स्थित गूजरी महल आज भी सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की अमर प्रेमकथा की गवाही दे रहा है. गूजरी महल भले ही आगरा के ताजमहल जैसी भव्य इमारत न हो, लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि प्रेम पर आधारित है. ताजमहल मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज़ की याद में 1631 में बनवाना शुरू किया था, जो 22 साल बाद बनकर तैयार हो सका. हिसार का गूजरी महल 1354 में फ़िरोज़शाह तुग़लक ने अपनी प्रेमिका गूजरी के प्रेम में बनवाना शुरू किया, जो महज़ दो साल में बनकर तैयार हो गया. गूजरी महल में काला पत्थर इस्तेमाल किया गया है, जबकि ताजमहल बेशक़ीमती सफ़ेद संगमरमर से बनाया गया है. इन दोनों ऐतिहासिक इमारतों में एक और बड़ी असमानता यह है कि ताजमहल शाहजहां ने मुमताज़ की याद में बनवाया था. ताज एक मक़बरा है, जबकि गूजरी महल फ़िरोज़शाह तुग़लक ने गूजरी के रहने के लिए बनवाया था, जो महल ही है.
गूजरी महल की स्थापना के लिए बादशाह फ़िरोज़शाह तुग़लक ने क़िला बनवाया. यमुना नदी से हिसार तक नहर लाया और एक नगर बसाया. क़िले में आज भी दीवान-ए-आम, बारादरी और गूजरी महल मौजूद हैं. दीवान-ए-आम के पूर्वी हिस्से में स्थित कोठी फ़िरोज़शाह तुग़लक का महल बताई जाती है. इस इमारत का निचला हिस्सा अब भी महल-सा दिखता है. फ़िरोज़शाह तुग़लक के महल की बंगल में लाट की मस्जिद है. अस्सी फ़ीट लंबे और 29 फ़ीट चौड़े इस दीवान-ए-आम में सुल्तान कचहरी लगाता था. गूजरी महल के खंडहर इस बात की निशानदेही करते हैं कि कभी यह विशाल और भव्य इमारत रही होगी.
सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की प्रेमगाथा बड़ी रोचक है. हिसार जनपद के ग्रामीण इस प्रेमकथा को इकतारे पर सुनते नहीं थकते. यह प्रेम कहानी लोकगीतों में मुखरित हुई है. फ़िरोज़शाह तुग़लक दिल्ली का सम्राट बनने से पहले शहज़ादा फ़िरोज़ मलिक के नाम से जाने जाते थे. शहज़ादा अकसर हिसार इलाक़े के जंगल में शिकार खेलने आते थे. उस वक्त यहां गूजर जाति के लोग रहते थे. दुधारू पशु पालन ही उनका मुख्य व्यवसाय था. उस काल में हिसार क्षेत्र की भूमि रेतीली और ऊबड़-खाबड़ थी. चारों तरफ़ घना जंगल था. गूजरों की कच्ची बस्ती के समीप पीर का डेरा था. आने-जाने वाले यात्री और भूले-भटके मुसाफ़िरों की यह शरणस्थली थी. इस डेरे पर एक गूजरी दूध देने आती थी. डेरे के कुएं से ही आबादी के लोग पानी लेते थे. डेरा इस आबादी का सांस्कृतिक केंद्र था.
एक दिन शहज़ादा फ़िरोज़ शिकार खेलते-खेलते अपने घोड़े के साथ यहां आ पहुंचा. उसने गूजर कन्या को डेरे से बाहर निकलते देखा तो उस पर मोहित हो गया. गूजर कन्या भी शहज़ादा फ़िरोज़ से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. अब तो फ़िरोज़ का शिकार के बहाने डेरे पर आना एक सिलसिला बन गया. फिरोज़ ने गूजरी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा तो उस गूजर कन्या ने विवाह की मंजरी तो दे दी, लेकिन दिल्ली जाने से यह कहकर इंकार कर दिया कि वह अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़कर नहीं जा सकती. फ़िरोज़ ने गूजरी को यह कहकर मना लिया कि वह उसे दिल्ली नहीं ले जाएगा.
1309 में दयालपुल में जन्मा फ़िरोज़ 23 मार्च 1351 को दिल्ली का सम्राट बना. फ़िरोज़ की मां हिन्दू थी और पिता तुर्क मुसलमान था. सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक ने इस देश पर साढ़े 37 साल शासन किया. उसने लगभग पूरे उत्तर भारत में कलात्मक भवनों, किलों, शहरों और नहरों का जाल बिछाने में ख्याति हासिल की. उसने लोगों के लिए अनेक कल्याणकारी काम किए. उसके दरबार में साहित्यकार, कलाकार और विद्वान सम्मान पाते थे.
दिल्ली का सम्राट बनते ही फ़िरोज़शाह तुग़लक ने महल हिसार इलांके में महल बनवाने की योजना बनाई. महल क़िले में होना चाहिए, जहां सुविधा के सब सामान मौजूद हों. यह सोचकर उसने क़िला बनवाने का फ़ैसला किया. बादशाह ने ख़ुद ही करनाल में यमुना नदी से हिसार के क़िले तक नहरी मार्ग की घोड़े पर चढ़कर निशानदेही की थी. दूसरी नहर सतलुज नदी से हिमालय की उपत्यका से क़िले में लाई गई थी. तब जाकर कहीं अमीर उमराओं ने हिसार में बसना शुरू किया था.
किवदंती है कि गूजरी दिल्ली आई थी, लेकिन कुछ दिनों बाद अपने घर लौट आई. दिल्ली के कोटला फिरोज़शाह में गाईड एक भूल-भूलैया के पास गूजरी रानी के ठिकाने का भी ज़िक्र करते हैं. तभी हिसार के गूजरी महल में अद्भुत भूल-भूलैया आज भी देखी जा सकती है.
क़ाबिले-गौर है कि हिसार को फ़िरोज़शाह तुग़लक के वक्त से हिसार कहा जाने लगा, क्योंकि उसने यहां हिसार-ए-फिरोज़ा नामक क़िला बनवाया था. 'हिसार' फ़ारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'क़िला'. इससे पहले इस जगह को 'इसुयार' कहा जाता था. अब गूजरी महल खंडहर हो चुका है. इसके बारे में अब शायद यही कहा जा सकता है-
सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में


उजड़ी हुई बस्तियों में आबादियां बोलती हैं...

Thursday, May 5, 2011

...तो बात ही कुछ और होती

पिछले शनिवार को दिल्ली के हिंदी भवन में हिंदी साहित्य निकेतन ने अपनी पचास वर्ष की विकास यात्रा के उपलक्ष्य में एक समारोह का आयोजन किया... इस समारोह में ब्लॉगरों को सम्मानित भी किया गया... हमें भी इस समारोह के लिए आमंत्रित किया गया... मसरूफ़ियत की वजह से इस तरह के कार्यक्रमों में जाना नहीं हो पाता... दिन-रात बस ख़बरें और सिर्फ़ ख़बरें...वक़्त का पता ही नहीं चल पाता कि कब दोपहर आई और कब शाम हो गई... और जब कभी वक़्त मिलता है तो परिवार और दोस्तों की ही याद आती है... अरसा हो जाता है अपनों से मिले हुए...यह तो भला हो संचार क्रांति का, जिसकी वजह से दुआ-सलाम हो जाया करती है...ख़ैर, शनिवार की शाम को एक मीटिंग में जाना था...सोचा-सोचा दो-दो निमंत्रण पत्र आए हुए हैं...कुछ देर के लिए हिन्दी भवन जाया जाए, वहां कुछ पत्रकार साथियों से मुलाक़ात हो गई...समारोह में क़रीब दस मिनट गुज़ारने के बाद हम बाहर आ गए... 

यहां मुलाक़ात हुई लेखक लक्ष्मण राव जी से... वह हिंदी भवन के बाहर चाय बनाकर अपनी रोज़ी कमा रहे हैं... महाराष्ट्र के अमरावती ज़िले के गांव तडेगांव दशासर में 22 जुलाई 1954 को जन्मे लक्ष्मण राव किसी के लिए भी प्रेरणा स्त्रोत हो सकते हैं...उन्होंने दिल्ली तिमारपुर पत्राचार विद्यालय से उच्चतर माध्यमिक व दिल्ली विश्वविधालय से बीए किया. उन्होंने दसवीं कक्षा पास करके महाराष्ट्र के अमरावती में सूत मिल में काम किया... कुछ वक़्त बाद मिल बंद हो गई. इसके बाद वह गांव चले गए और वहां खेतीबाड़ी करने लगे... यहां उनका मन नहीं लगा और वह भोपाल आ गए और यहां बेलदार का काम करने लगे... यहां भी उनका मन नहीं रमा और फिर उन्होंने दिल्ली आने का फ़ैसला किया... 30 जुलाई 1975 को वह दिल्ली आ गए और दो वक़्त की रोटी के लिए मेहनत मजदूरी करने लगे... 1977 में दिल्ली के आईटीओ के विष्णु दिगम्बर मार्ग पर वह पान और बीड़ी-सिगरेट बेचने लगे. उन्हें शुरू से ही किताबों से बहुत लगाव था... वह दरियागंज में रविवार को लगने वाले पुस्तक बाज़ार में जाते और कई किताबें ले आते... जब भी उन्हें वक़्त मिलता वह किताबें पढ़ते... किताबों के इसी शौक़ ने उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया... 

उन्होंने लिखना शुरू कर दिया...उनका पहला उपन्यास ' नई दुनिया की नई कहानी' 1979 में प्रकाशित हुआ... इसके बाद वह सुर्ख़ियों में आ गए... लोगों को यक़ीन नहीं हो पा रहा था कि पान और बीड़ी-सिगरेट बेचने वाला व्यक्ति भी उपन्यास लिख सकता है... फ़रवरी 1981 में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संडे रिव्यू में उनका परिचय प्रकाशित हुआ...27 मई, 1984 को तीन मूर्ति भवन में उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलने का मौक़ा मिला... उन्होंने इंदिरा गांधी से उनके जीवन पर किताब लिखने की ख्वाहिश ज़ाहिर की. इस पर इंदिरा गांधी ने उन्हें अपने प्रधानमंत्रित्व काल के बारे में किताब लिखने की सलाह दी... इसके बाद लक्ष्मण राव ने प्रधानमंत्री नामक एक नाटक लिखा. 1982 में उनका उपन्यास रामदास प्रकाशित हुआ... 2001 में नर्मदा (उपन्यास) और 2006 में परंपरा से जुड़ी भारतीय राजनीति नामक किताब प्रकाशित हुई... फिर 2008 में रेणु नामक किताब का प्रकाशन हुआ...

इनके अलावा वह कई और किताबें लिख चुके हैं, जिनमें शिव अरुणा, सर्पदंश, साहिल, पत्तियों की सरसराहट, प्रात: काल, नर्मदा, दृष्टिकोण, अहंकार, समकालीन संविधान, अभिव्यक्ति, मौलिक पत्रकारिता, प्रशासन, राष्ट्रपति (नाटक ) आत्मकथा साहित्य व्यासपीठ और स्वर्गीय राजीव गांधी की जीवनी संयम आदि शामिल है...

भारतीय अनुवाद परिषद सहित क़रीब 11 संस्थाएं उन्हें सम्मानित कर चुकी हैं, जिनमें भारतीय अनुवाद परिषद, कोच लीडरशिप सेंटर, इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती, निष्काम सेवा सोसायटी, अग्निपथ, अखिल भारतीय स्वतंत्र लेखक मंच, शिव रजनी कला कुंज, प्रागैतिक सहजीवन संस्थान, यशपाल जैन स्मृति, चिल्ड्रेन वैली स्कूल, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद शामिल हैं...

वह बताते हैं कि राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने उनका नवीनतम उपन्यास " रेणु" पढ़ने के बाद उन्हें राष्ट्रपति भवन में आमंत्रित किया था...उन्हें इस बात का मलाल है कि उन्हें प्रकाशक नहीं मिला...इसलिए वह ख़ुद ही प्रकाशक बन गए...उन्होंने भारतीय साहित्य कला प्रकाशन शुरू किया... वह यह भी कहते हैं कि प्रकाशक बन्ने के लिए बड़े तामझाम की ज़रूरत नहीं... बस मज़बूत इरादा और लगन होनी चाहिए... वह ख़ुद साइकिल से विभिन्न स्कूलों और कॉलेजों में जाकर अपनी किताबें बेचते हैं... वह अपने नियमित ग्राहकों को हर किताब पर पचास फ़ीसदी की छूट भी देते हैं...

लक्ष्मण जी ने चाय बनाई... हम चाय पी रहे थे...और यहां-वहां की बातें चल रही थीं...कुछ साथी मौजूदा व्यवस्था से परेशान थे...वे एक और बग़ावत पर ज़ोर दे रहे थे...सब अपने-अपने कामों में मसरूफ़ थे...लक्ष्मण जी भी तल्लीनता से आने वालों को चाय बना-बनाकर दे रहे थे... हिन्दी भवन के सभागार से तालियों की आवाज़ें आ रही थीं...उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक पुरस्कार बांट रहे थे... और हम सोच रहे थे कि साहित्य पर भी सियासत और सत्ता ही भारी पड़ती है... काश निशंक की जगह लक्ष्मण राव ब्लॉगरों को सम्मानित कर रहे होते तो बात ही कुछ और होती और तब हम भी हिंदी भवन के बाहर न होकर अंदर रहकर उस खुशनुमा लम्हे को जी रहे होते...

Tuesday, September 14, 2010

हिन्दी दिवस की रस्म अदायगी

फ़िरदौस ख़ान
देश की आज़ादी को छह दशक से भी ज़्यादा का वक़्त बीत चुका है। इसके बावजूद अभी तक हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा हासिल नहीं हो पाया है। यह बात अलग है कि हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस पर कार्यक्रमों का आयोजन कर रस्म अदायगी कर ली जाती है। हालत यह है कि कुछ लोग तो अंग्रेज़ी में भाषण देकर हिन्दी की दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाने से भी नहीं चूकते।

हिन्दी दिवस 14 सितंबर को राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय के तत्वावधान में नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में हिंदी दिवस समारोह का आयोजन किया जा रहा है। समारोह में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी वर्ष 2008-09 के लिए राजीव गांधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार, हिंदी में मौलिक पुस्तक लेखन के लिए इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार 2008-09 तथा केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों को हिंदी में किए गए उत्कृष्ट कार्य के लिए पुरस्कार और हिंदी गृह पत्रिका पुरस्कार 2009-10 प्रदान करेंगे। इस अवसर पर शील्ड/प्रमाण पत्र तथा नकद राशि के रूप में कुल 53 पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। अधिकारियों का दावा है कि संविधान सभा द्वारा हिंदी को राजभाषा के रूप में घोषित किए जाने की 61वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम से 90 संघ की राजभाषा नीति के सफ़ल कार्यान्वयन के लिए उत्साहवर्धक वातावरण बनाने और उसे क़ायम रखने के लिए मदद मिलेगी।

गौरतलब है कि संवैधानिक रूप से हिन्दी भारत की प्रथम राजभाषा है। यह देश की सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है। इतना ही नहीं चीनी के बाद हिन्दी दुनियाभर में सबसे ज़्यादा बोली और समझी जाती है। भारत में उत्तर और मध्य भागों में हिन्दी बोली जाती है, जबकि विदेशों में फ़िज़ी, गयाना, मॉरिशस, नेपाल और सूरीनाम के कुछ बाशिंदे हिन्दी भाषी हैं। एक अनुमान के मुताबिक़ दुनियाभर में क़रीब 60 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं।

देश में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा होने के बाद भी हिन्दी राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। हिन्दी हमारी राजभाषा है। राष्ट्रीय और आधिकारिक भाषा में काफ़ी फ़र्क है। जो भाषा किसी देश की जनता, उसकी संस्कृति और इतिहास को बयान करती है, उसे राष्ट्रीय भाषा कहते हैं। मगर जो भाषा कार्यालयों में उपयोग में लाई जाती है, उसे आधिकारिक भाषा कहा जाता है। इसके अलावा अंग्रेज़ी को भी आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है।

संविधान के अनुचछेद-17 में इस बात का ज़िक्र है कि आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा नहीं माना जा सकता है। भारत के संविधान के मुताबिक़ देश की कोई भी अधिकृत राष्ट्रीय भाषा नहीं है। यहां 23 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के तौर पर मंज़ूरी दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 344 (1) और 351 के मुताबिक़ भारत में अंग्रेज़ी सहित 23 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें आसामी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं। ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रीय भाषा तो आधिकारिक भाषा बन जाती है, लेकिन आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी लेना ज़रूरी है। संविधान में यह भी कहा गया है कि यह केंद्र का दायित्व है कि वह हिन्दी के विकास के लिए निरंतर प्रयास करे। विभिन्नताओं से भरे भारतीय परिवेश में हिन्दी को जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया जाए।

भारतीय संविधान के मुताबिक़ कोई भी भाषा, जिसे देश के सभी राज्यों द्वारा आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया गया हो, उसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा गया है। मगर हिन्दी इन मानकों को पूरा नहीं कर पा रही है, क्योंकि देश के सिर्फ़ 10 राज्यों ने ही इसे आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया है, जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल है। इन राज्यों में उर्दू को सह-राजभाषा का दर्जा दिया गया है। उर्दू जम्मू-कश्मीर की राजभाषा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है। संविधान के लिए अनुच्छेद 351 के तहत हिन्दी के विकास के लिए विशेष प्रावधान किया गया है।

ग़ौरतलब है कि देश में 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ था। देश में हिन्दी और अंग्रेज़ी सहित 18 भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है, जबकि यहां क़रीब 800 बोलियां बोली जाती हैं। दक्षिण भारत के राज्यों ने स्थानीय भाषाओं को ही अपनी आधिकारिक भाषा बनाया है। दक्षिण भारत के लोग अपनी भाषाओं के प्रति बेहद लगाव रखते हैं, इसके चलते वे हिन्दी का विरोध करने से भी नहीं चूकते। 1940-1950 के दौरान दक्षिण भारत में हिन्दी के ख़िलाफ़ कई अभियान शुरू किए गए थे। उनकी मांग थी कि हिन्दी को देश की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा न दिया जाए।

संविधान सभा द्वारा 14 सितम्बर, 1949 को सर्वसम्मति से हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया था। तब से केन्द्रीय सरकार के देश-विदेश स्थित समस्त कार्यालयों में प्रतिवर्ष 14 सितम्बर हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के मुताबिक़ भारतीय संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपी देवनागरी होगी। साथ ही अंकों का रूप अंतर्राष्टीय्र स्वरूप यानी 1, 2, 3, 4 आदि होगा। संसद का काम हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में किया जा सकता है, मगर राज्यसभा या लोकसभा के अध्यक्ष विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं। संविधान के अनुच्छोद 120 के तहत किन प्रयोजनों के लिए केवल हिन्दी का इस्तेमाल किया जाना है, किन के लिए हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल ज़रूरी है और किन कार्यों के लिए अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल किया जाना है। यह राजभाषा अधिनियम 1963, राजभाषा अधिनियम 1976 और उनके तहत समय-समय पर राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है।

पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के चलते अंग्रेज़ी भाषा हिन्दी पर हावी होती जा रही है। अंग्रेज़ी को स्टेट्स सिंबल के तौर पर अपना लिया गया है। लोग अंग्रेज़ी बोलना शान समझते हैं, जबकि हिन्दी भाषी व्यक्ति को पिछड़ा समझा जाने लगा है। हैरानी की बात तो यह भी है कि देश की लगभग सभी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाएं अंग्रेज़ी में होती हैं। इससे हिन्दी भाषी योग्य प्रतिभागी इसमें पिछड़ जाते हैं। अगर सरकार हिन्दी भाषा के विकास के लिए गंभीर है तो इस भाषा को रोज़गार की भाषा बनाना होगा। आज अंग्रेज़ी रोज़गार की भाषा बन चुकी है। अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों को नौकरी आसानी से मिल जाती है। इसलिए लोग अंग्रेज़ी के पीछे भाग रहे हैं। आज छोटे क़स्बों तक में अंग्रेज़ी सिखाने की 'दुकानें' खुल गई हैं। अंग्रेज़ी भाषा नौकरी की गारंटी और योग्यता का 'प्रमाण' बन चुकी है। अंग्रेज़ी शासनकाल में अंग्रेज़ों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अंग्रेज़ियत को बढ़ावा दिया, मगर आज़ाद देश में मैकाले की शिक्षा पध्दति को क्यों ढोया जा रहा है, यह समझ से परे है।

हिन्दी के विकास में हिन्दी साहित्य के अलावा हिन्दी पत्रकारिता का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इसके अलावा हिन्दी सिनेमा ने भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा दिया है। मगर अब सिनेमा की भाषा भी 'हिन्गलिश' होती जा रही है। छोटे पर्दे पर आने वाले धारावाहिकों में ही बिना वजह अंग्रेज़ी के वाक्य ठूंस दिए जाते हैं। हिन्दी सिनेमा में काम करके अपनी रोज़ी-रोटी कमाने वाले कलाकार भी हर जगह अंग्रेज़ी में ही बोलते नज़र आते हैं। आख़िर क्यों हिन्दी को इतनी हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है? यह एक ज्वलंत प्रश्न है।

अधिकारियों का दावा है कि हिन्दी राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, जनभाषा के सोपानों को पार कर विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर है, मगर देश में हिन्दी की जो हालत है, वो जगज़ाहिर है। साल में एक दिन को ‘हिन्दी दिवस’ के तौर पर माना लेने से हिंदी का भला होने वाला नहीं है। इसके लिए ज़रूरी है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए ज़मीनी स्तर पर ईमानदारी से काम किया जाए।

Monday, August 23, 2010

भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक है रक्षाबंधन

Add caption
...रक्षाबंधन के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं...
फ़िरदौस ख़ान
रक्षाबंधन भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक है. यह त्यौहार श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षाबंधन बांधकर उनकी लंबी उम्र और कामयाबी की कामना करती हैं. भाई भी अपनी बहन की रक्षा करने का वचन देते हैं.

रक्षाबंधन के बारे में अनेक कथाएं प्रचलित हैं. भविष्य पुराण में कहा गया है कि एक बार जब देवताओं और दानवों के बीच युद्ध हो रहा था, तो दानवों ने देवताओं को पछाड़ना शुरू कर दिया. देवताओं को कमज़ोर पड़ता देख स्वर्ग के राजा इंद्र देवताओं के गुरु बृहस्पति के पास गए और उनसे मदद मांगी. तभी वहां बैठी इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने मंत्रों का जाप कर एक धागा अपने पति के हाथ पर बांध दिया. इस युद्ध में देवताओं को जीत हासिल हुई. उस दिन श्रावण पूर्णिमा थी. तभी से श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षा सूत्र बांधने की प्रथा शुरू हो गई. अनेक धार्मिक ग्रंथों में रक्षा बंधन का ज़िक्र मिलता है. जब सुदर्शन चक्र से श्रीकृष्ण की अंगुली ज़ख़्मी हो गई थी, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दी थी. बाद में श्रीकृष्ण ने कौरवों की सभा में चीरहरण के वक़्त द्रौपदी की रक्षा कर उस आंचल के टुकड़े का मान रखा था. मेवाड़ की महारानी कर्मावती ने मुग़ल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा की याचना थी . राखी का मान रखते हुए हुमायूं ने मेवाड़ पहुंचकर बहादुरशाह से युद्ध कर कर्मावती और उसके राज्य की रक्षा की थी.

विभिन्न संस्कृतियों के देश भारत के सभी राज्यों में पारंपरिक रूप से यह त्यौहार मनाया जाता है. उत्तरांचल में रक्षा बंधन को श्रावणी के नाम से जाना जाता है. महाराष्ट्र में इसे नारियल पूर्णिमा और श्रावणी कहते हैं, बाकि दक्षिण भारतीय राज्यों में इसे अवनि अवित्तम कहते हैं. रक्षाबंधन का धार्मिक ही नहीं, सामाजिक महत्व भी है. भारत में दूसरे धर्मों के लोग भी इस पावन पर्व में शामिल होते हैं.

रक्षाबंधन ने भारतीय सिनेमा जगत को भी ख़ूब लुभाया है. कई फ़िल्मों में रक्षाबंधन के त्यौहार और इसके महत्व को दर्शाया गया है. रक्षाबंधन को लेकर अनेक कर्णप्रिय गीत प्रसिद्ध हुए हैं. भारत सरकार के डाक-तार विभाग ने भी रक्षाबंधन पर विशेष सुविधाएं शुरू कर रखी हैं. अब तो वाटरप्रूफ़ लिफ़ाफ़े भी उपलब्ध हैं. कुछ बड़े शहरों के बड़े डाकघरों में राखी के लिए अलग से बॉक्स भी लगाए जाते हैं. राज्य सरकारें भी रक्षाबंधन के दिन अपनी रोडवेज़ बसों में महिलाओं के लिए मुफ़्त यातायात सुविधा मुहैया कराती है.

आधुनिकता की बयार में सबकुछ बदल गया है। रीति-रिवाजों और गौरवशाली प्राचीन संस्कृति के प्रतीक पारंपरिक त्योहारों का स्वरूप भी अब पहले जैसा नहीं रहा है। आज के ग्लोबल माहौल में रक्षाबंधन भी हाईटेक हो गया है। वक़्त के साथ-साथ भाई-बहन के पवित्र बंधन के इस पावन पर्व को मनाने के तौर-तरीकों में विविधता आई है। दरअसल व्यस्तता के इस दौर में त्योहार महज़ रस्म अदायगी तक ही सीमित होकर रह गए हैं।

यह विडंबना ही है कि एक ओर जहां त्योहार व्यवसायीकरण के शिकार हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इससे संबंधित जनमानस की भावनाएं विलुप्त होती जा रही हैं। अब महिलाओं को राखी बांधने के लिए बाबुल या प्यारे भईया के घर जाने की ज़रूरत भी नहीं रही। रक्षाबंधन से पहले की तैयारियां और मायके जाकर अपने अज़ीज़ों से मिलने के इंतज़ार में बीते लम्हों का मीठा अहसास अब भला कितनी महिलाओं को होगा। देश-विदेश में भाई-बहन को राखी भेजना अब बेहद आसान हो गया है। इंटरनेट के ज़रिये कुछ ही पलों में वर्चुअल राखी दुनिया के किसी भी कोने में बैठे भाई तक पहुंचाई जा सकती है। डाक और कोरियर की सेवा तो देहात तक में उपलब्ध है। शुभकामनाओं के लिए शब्द तलाशने की भी ज़रूरत नहीं। गैलरियों में एक्सप्रेशंस, पेपर रोज़, आर्चीज, हॉल मार्क सहित कई देसी कंपनियों केग्रीटिंग कार्ड की श्रृंख्लाएं मौजूद हैं। इतना ही नहीं फ़ैशन के इस दौर में राखी भी कई बदलावों से गुज़र कर नई साज-सज्जा के साथ हाज़िर हैं। देश की राजधानी दिल्ली और कला की सरज़मीं कलकत्ता में ख़ास तौर पर तैयार होने वाली राखियां बेहिसाब वैरायटी और इंद्रधनुषी दिलकश रंगों में उपलब्ध हैं। हर साल की तरह इस साल भी सबसे ज़्यादा मांग है रेशम और ज़री की मीडियम साइज़ राखियों की। रेशम या ज़री की डोर के साथ कलाबत्तू को सजाया जाता है, चाहे वह जरी की बेल-बूटी हो, मोती हो या देवी-देवताओं की प्रतिमा। इसी अंदाज़ में वैरायटी के लिए जूट से बनी राखियां भी उपलब्ध हैं, जो बेहद आकर्षक लगती हैं। कुछ कंपनियों ने ज्वैलरी राखी की श्रृंख्ला भी पेश की हैं। सोने और चांदी की ज़ंजीरों में कलात्मक आकृतियों केरूप में सजी ये क़ीमती राखियां धनाढय वर्ग को अपनी ओर खींच रही हैं। यहीं नहीं मुंह मीठा कराने के लिए पारंपरिक दूध से बनी मिठाइयों की जगह अब चॉकलेट के इस्तेमाल का चलन शुरू हो गया है। बाजार में रंग-बिरंगे कागज़ों से सजे चॉकलेटों के आकर्षक डिब्बों को ख़ासा पसंद किया जा रहा है।

कवयित्री इंदुप्रभा कहती हैं कि आज पहले जैसा माहौल नहीं रहा। पहले संयुक्त परिवार होते थे। सभी भाई मिलजुल कर रहते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। नौकरी या अन्य कारोबार के सिलसिले में लोगों को दूर-दराज के इलाकों में बसना पड़ता है। इसके कारण संयुक्त परिवार बिखरकर एकल हो गए हैं। ऐसी स्थिति में बहनें रक्षाबंधन के दिन अलग-अलग शहरों में रह रहे भाइयों को राखी नहीं बांध सकतीं। महंगाई के इस दौर में जब यातायात के सभी साधनों का किराया काफ़ी ज़्यादा हो गया है, तो सीमित आय अर्जित करने वाले लोगों के लिए परिवार सहित दूसरे शहर जाना और भी मुश्किल काम है। ऐसे में भाई-बहन को किसी न किसी साधन के ज़रिये भाई को राखी भेजनी पड़ेगी। बाज़ार से जुड़े लोग मानते हैं कि भौतिकतावादी इस युग में जब आपसी रिश्तों को बांधे रखने वाली भावना की डोर बाज़ार होती जा रही है तो ऐसे में दूरसंचार के आधुनिक साधन ही एक-दूसरे के बीच फ़ासलों को कम किए हुए हैं। आज के समय में जब कि सारे रिश्ते-नाते टूट रहे हैं, सांसारिक दबाव को झेल पाने में असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं. ऐसे में रक्षाबंधन का त्यौहार हमें भाई- बहन के प्यारे बंधन को हरा- भरा करने का मौक़ा देता है. साथ ही दुनिया के सबसे प्यारे बंधन को भूलने से भी रोकता है.

Sunday, June 13, 2010

मदरसे में गूंजती हैं, गायत्री मंत्र की स्वर लहरियां... फ़िरदौस ख़ान

ॐ भूर्भुव: स्वः तत् सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥
जी हां, यह बिलकुल सच है... उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर ज़िले के सतासीपुर स्थित नियामत-उलूम मदरसे में गायत्री मंत्र का पाठ होता है... ख़ास बात यह है कि मदरसे में सबसे पहले वन्दे मातरम् गाया जाता है...उसके बाद क़ुरआन की तिलावत होती है...  इसके साथ ही गीता और रामायण का भी पाठ होता है...

संस्कृत के शिक्षक अब्दुल कलाम कहते हैं कि हमारा मक़सद बच्चों को क़ुरआन, गीता और रामायण की तालीम देकर बेहतर इंसान बनाना है... मज़हब के नाम पर दंगे-फ़साद फैलाने वालों को इससे सबक़ लेना चाहिए...

क़रीब तीन दशक पहले 1976 में मौलवी मेहराब हासिम ने इस मदरसे की स्थापना की थी. इस मदरसे में लगभग 200 छात्र तालीम हासिल कर रहे हैं, जिनमें हिन्दू बच्चे भी शामिल हैं...

मदरसे के संस्थापक व प्राधानाचार्य मौलवी मेहराब हासिम का कहना है कि राष्ट्रहित से ऊंचा कोई नहीं है और वंदे मातरम् तो हमारे देश का गुणगान है. ऐसे में यह समझ में नहीं आता कि वंदे मातरम् गाने पर कुछ मज़हब के ठेकेदार क्यों ऐतराज़ जताते हैं. ये शर्मनाक, गंभीर और सोचनीय है...

एक तरफ़ जहां हिन्दुस्तान में मज़हब के नाम पर नफ़रत फैलाने का काम किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ ऐसे लोग भी हैं जो गंगा-जमुनी तहज़ीब को बढ़ावा दे रहे हैं... यक़ीनन ऐसे लोग ही इंसानियत को ज़िंदा रखे हुए हैं...

Thursday, October 8, 2009

फ्रांस की टूरिज़्म कंपनी ने ख़रीदा बापू का अफ़्रीकी घर

फ़िरदौस ख़ान
दक्षिण अफ्रीका के जोहांसबर्ग में स्थित महात्मा गांधी के ऐतिहासिक घर को फ्रांस की एक टूरिज़्म कंपनी ने खरीद लिया है...भारत सरकार ने महात्मा गांधी के जोहानिसबर्ग मकान के सूथेबी नीलामी घर के ज़रिये एक फ्रांसीसी कंपनी के हाथ में चले जाने पर अफ़सोस ज़ाहिर किया है. साथ ही कहा है कि सरकार एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के ज़रिये इस विरासत को हासिल करने की कवायद जारी रखेगी.

कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा है कि यह राष्ट्रीय भावनाओं से जुड़ा मामला है और इस ऐतिहासिक संपत्ति को हासिल करने और इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित करवाने के लिए हरसंभव प्रयास किया जाएगा. कोयला मंत्रालय के तहत आने वाले कोल इंडिया लि. ने इस मकान को हासिल करने के लिए इसके मालिक से संपर्क किया था और मंत्रालय इसके लिए कोई भी क़ीमत चुकाने को तैयार था. इसके लिए बातचीत जारी थी, लेकिन एक महीने की मोहलत दिए जाने के बावजूद उन्होंने सीआईएल से संपर्क नहीं किया. उन्होंने कहा कि सीआईएल निदेशक मंडल ने यह तय किया है कि इस बापू की इस विरासत को हासिल करने के लिए इसके कर्मचारी अपने एक दिन का वेतन देंगे, जबकि वे एक माह का वेतन देंगे, साथ ही अन्य स्रोतों से धन इकट्ठा करेंगे. जायसवाल ने बताया कि इस साल अगस्त में दक्षिण अफ्रीका की यात्रा के दौरान उन्होंने इस मकान का मुआयना किया था.

गौरतलब है कि पुरानी शैली के खपरैल की छत वाले इस मकान में गांधी जी 1908 से 1910 तक रहे थे. उन्होंने यहां से सत्याग्रह आंदोलन का नेतृत्व किया था. इस घर को उस वक़्त के मशहूर आर्किटेक्ट हरमन क्लेनबाक ने डिज़ाइन किया था. जोहांसबर्ग में बापू जुड़े कई अन्य यादगार स्थल भी हैं. इनमें मध्य जोहांसबर्ग में स्थित गांधी स्क्वायर, जोहांसबर्ग जेल, जहां बापू को एक बार कैद किया गया था, द विक्ट्री हाउस जहां वह वकालत किया करते थे. यहां हिंदुओं का अंतिम संस्कार गृह भी है, जिसे बापू ने बनवाया था. इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका के डरबन और पीटरमारित्जबर्ग में भी बापू जुड़े कई अन्य स्थल भी हैं, जो भारतीयों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र हैं.

बताया जाता है कि पेरिस स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध कंपनी वायजेयू द मांड ने जोहानिसबर्ग के उपनगरीय क्षेत्र स्थित द कराल नामक इस मकान को बिक्री के लिए मांगे गए तीन लाख 77029 डॉलर की क़ीमत से दोगुनी रक़म चुकाकर इसे हासिल किया है.

बापू की इस विरासत को हासिल करने की सरकार की कवायद का क्या नतीजा निकलेगा, यह तो आने वाले वाला वक़्त ही बताएगा...फ़िलहाल तो यह विरासत सरकार के हाथ से निकल ही चुकी है...

Tuesday, February 10, 2009

रिवायतों को खत्म करने की साज़िश

फ़िरदौस ख़ान
पहले मज़हब शिया और सुन्नी तबकों में बंटा था, लेकिन अब मज़हब बंटना शुरू हो गया है, क़ाज़ी साहब की नीयत से. जो रिवायतें पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम के वक्त से चली आ रही हैं, अब उन्हें तोड़-मरोड़कर पेश करने की ही नहीं, बल्कि उन्हें ख़त्म करने की कोशिशें की जा रही हैं. इसकी ताज़ा मिसाल है मध्य प्रदेश के नीमच इलाके के चेहलुम पर होने वाले चालीसवें के खाने को बंद करने का ऐलान. हैरत की बात तो यह है कि यह सब बच्चों को तालीम दिलाने के नाम पर किया जा रहा है. माना बच्चों को शिक्षित करना आज बेहद ज़रूरी है, लेकिन क्या रिवायतों को ख़त्म किए बिना बच्चों को तालीम नहीं दिलाई जा सकती है?

गौरतलब है कि हर साल पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम के नवासे व कर्बला के शहीद हज़रत इमाम हुसैन के चालीसवें पर खाना लोगों को खिलाया जाता रहा है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा. इस परम्परा को ख़त्म किया जा रहा है. नीमच के शहर क़ाज़ी हिदायतुल्लाह ख़ान व हनीफि़या हेल्प सोसायटी के अध्यक्ष मज़हर भाई सदियों से चली आ रही इस परम्परा को ग़लत मानते हैं. उनका कहना है कि पिछले जुम्मे को नमाज़ के बाद उन्होंने शहर के मोज़िज़ लोगों से इस बारे में बात की और इसे बंद करने का फै़सला लिया. अपने फैसले के समर्थन में वह इस बात का हवाला भी देते हैं कि इस भोजन से बचने वाले पैसे को बच्चों की तालीम पर ख़र्च किया जाएगा.

दोस्त फ़ाउंडेशन के चेयरमैन हसन इमाम सख्त लहजे में इस फ़ैसले का विरोध करते हुए कहते हैं कि चेहलुम पर खाना खिलाना तो सवाब का काम है और इस तरह के आयोजनों से लोगों में अपनी रिवायतों के प्रति दिलचस्पी भी बनी रहती है. सामूहिक भोज की शुरुआत पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम ने ही की थी. इस तरह के आयोजनों में आने वाले लोगों को कार्यक्रम के मक़सद के बारे में भी बताया जाता था. हज़रत इमाम हुसैन ने नेकी और सच्चाई के रास्ते पर चलते हुए खुद को कु़र्बान कर दिया था. आज के दौर में ऐसे आयोजनों की ज़्यादा ज़रूरत है, जिनके ज़रिये हज़रत इमाम हुसैन की कु़र्बानी और उनकी शिक्षाओं के बारे में ग़ैर मुस्लिमों को भी जानकारी दी जानी चाहिए.

अफ़ज़ल का कहना है कि बच्चों को तालीम दिलाना अच्छी बात है. आज सबसे ज़्यादा इसी बात की ज़रूरत महसूस की जा रही है कि हर बच्चे को तालीम मिले, लेकिन हज़रत इमाम हुसैन के चालीसवें के खाने को बंद करना का फै़सला सही नहीं है. मुहर्रम और चेहलुम पर उनकी याद में होने वाली दुआओं और नियाज़ वगैरह से ही तो बच्चों को उनकी शिक्षाओं, आदर्शों और कुर्बानियों के बारे में मालूम होता है.

एस.ए. रहमान इस फैसले का विरोध करते हुए कहते हैं कि इस तरह के कार्यक्रमों से ही आने वाली पीढ़ियों को अपने शहीदों के बारे में जानकारी मिलती रहती है. कर्बला के शहीद हज़रत इमाम हुसैन की फ़ातिहा के खाने को बंद करने से ये लोग भला कितनी रक़म बचा लेंगे? बच्चों की तालीम के लिए पैसे जमा करने के और भी बहुत से तरीक़े हो सकते हैं. हम अपने ऐशो-आराम पर ज़्यादा से ज़्यादा पैसा खर्च करते हैं, उसी मद से पैसा बचाकर या यूं कहिए कि फ़िज़ूल ख़र्च को कम करके पैसा बचाया जा सकता है. मगर चालीसवें के खाने को बंद करके पैसा बचाने की बात गले से नीचे नहीं उतर रही है.

दरअसल, इस तरह के लोग उन संगठनों के हाथों की कठपुतलियां बन चुके हैं, जिनका मक़सद ही इस्लाम की रिवायतों को ख़त्म करना है. सवाल यह भी है कि इस तरह के फ़ैसले लेने का हक़ क्या किसी छोटे से क़स्बे के किसी `व्यक्ति विशेष´ को है? हक़ीक़त यही है कि ऐसे लोग सिर्फ सुर्खियां बटोरने के लिए ही इस तरह का ऐलान करते हैं. क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि आम चुनाव क़रीब हैं और सियासत में किस्मत आज़माने के ख्वाहिशमंद लोग ऐसे मौक़ों की फ़िराक़ में रहते हैं. सवाल यह भी है कि मुख्यधारा में शामिल होने के अपनी रिवायतों को ख़त्म करना ही कसौटी है? कट्टरपंथी जमातें उन्हीं मुसलमानों को राष्ट्रवादी मानती हैं जो इस्लाम की रिवायतों को दरकिनार कर उनके इशारों पर चलती हैं. सवाल यह भी है कि भारत जैसे मुल्क में जहां सबको अपनी मजहबी आजादी में जीने का हक़ हासिल है और अपने धार्मिक मान्यताओं पर चलने की पूरी आज़ादी है, ऐसे में किसी ख़ास कट्टरपंथी जमातों को खुश करने के लिए इस तरह के फ़रमान जारी करना कहां तक जायज़ है?

Thursday, September 25, 2008

सरस्वती को धरती पर लाने की क़वायद


फ़िरदौस ख़ान
हरियाणा में आदि अदृश्य नदी सरस्वती को फिर से धरती पर लाने की क़वायद शुरू कर दी गई है. इसके लिए राज्य के सिंचाई विभाग ने सरस्वती की धारा को दादूपुर नलवी नहर का पानी छोड़ने की योजना बनाई है. देश के अन्य राज्य में भी इस पर काम चल रहा है. अगर यह महती योजना सिरे चढ़ जाती है तो इससे हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के तकरीबन 20 करोड़ लोगों की काया पलट जाएगी. इस नदी से जहां राज्यों के लोगों को पीने का पानी उपलब्ध हो सकेगा, वहीं सिंचाई जल को तरस रहे खेत भी लहलहा उठेंगे.काबिले-गौर है कि सरस्वती नदी पर चल रहे शोध में सैटेलाइट से मिले चित्रों से पता चला है कि अब भी सरस्वती नदी सुरंग के रूप में मौजूद है. बताया जाता है कि हिमाचल श्रृंगों से बहने वाली यह नदी करीब 1600 किलोमीटर हरी-की दून से होती हुई जगाधरी, कालिबंगा और लोथल मार्ग से सोमनाथ के समीप समुद्र में मिलती है. सरस्वती शोध संस्थान के अध्यक्ष दर्शनलाल जैन के मुताबिक सैटेलाइट चित्रों से प्राचीन सरस्वती नदी के जलप्रवाह की जानकारी मिलती है. साथ ही यह भी पता चलता है कि यह सिंधु नदी से भी ज्यादा बड़ी और तीव्रगामी थी. नदी का प्रवाह शिवालिक पर्वतमालाओं से जगाधरी के समीप आदिबद्री से शुरू होता है, जिसका मूल स्त्रोत हिमालय में है. नदी तटों के साथ इसकी ईसा पूर्व 3300 से लेकर ईसा पूर्व 1500 तक 1200 से भी ज्यादा पुरातात्विक प्रमाण मिले हैं.

गौरतलब है कि हरियाणा के सिंचाई विभाग ने मुर्तजापुर के पास सरस्वती नदी की बुर्जी आरडी 36284 से 94000 तक पक्का करके इसमें दादूपुर नलवी नहर का पानी प्रवाहित करने की योजना बनाई है. राज्य के सिंचाई मंत्री कैप्टन अजय यादव का कहना है कि सरस्वती नदी में नहर का पानी आ जाने के बाद इससे रजबाहे निकाले जाएंगे, ताकि लोगों को पानी मिल सके. सैटेलाइट से मिले सरस्वती के चित्र के आधार पर काम शुरू किया जाएगा.

काबिले-गौर है कि सरस्वती नदी पर चल रहे शोध में सैटेलाइट से मिले चित्रों से पता चला है कि अब भी सरस्वती नदी सुरंग के रूप में मौजूद है. बताया जाता है कि हिमाचल श्रृंगों से बहने वाली यह नदी करीब 1600 किलोमीटर हरी-की दून से होती हुई जगाधरी, कालिबंगा और लोथल मार्ग से सोमनाथ के समीप समुद्र में मिलती है. सरस्वती शोध संस्थान के अध्यक्ष दर्शनलाल जैन के मुताबिक सैटेलाइट चित्रों से प्राचीन सरस्वती नदी के जलप्रवाह की जानकारी मिलती है. साथ ही यह भी पता चलता है कि यह सिंधु नदी से भी ज्यादा बड़ी और तीव्रगामी थी. नदी का प्रवाह शिवालिक पर्वतमालाओं से जगाधरी के समीप आदिबद्री से शुरू होता है, जिसका मूल स्त्रोत हिमालय में है. नदी तटों के साथ इसकी ईसा पूर्व 3300 से लेकर ईसा पूर्व 1500 तक 1200 से भी ज्यादा पुरातात्विक प्रमाण मिले हैं.

योजना की कामयाबी के लिए कुछ विदेशी भू-विज्ञानी और नासा भी योगदान दे रहे हैं. इस अनुसंधान में सरस्वती शोध संस्थान, रिमोट सैंसिंग एजेंसी, भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर, सेंट्रल वाटर कमीशन, स्टेट वाटर रिसोर्सेज, सेंट्रल एरिड जोन रिसर्च इंस्टीटयूट, हरियाणा सिंचाई विभाग, अखिल भारतीय इतिहास संगठन योजना और इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (अहमदाबाद ) आदि काम कर रहे हैं.

केंद्र सरकार ने 2000 में सरस्वती नदी को प्रवाहित करने के लिए तीन परियोजनाओं को चालू करने का काम अपने हाथ में लिया था, जो राज्य सरकारों की मदद से पूरा किया जाना है. चेन्नई स्थित सरस्वती सिंधु शोध संस्थान के अधिकारियों के मुताबिक इस दिशा में पहली परियोजना हरियाणा के यमुनानगर जिले में सरस्वती के उद्गम माने जाने वाले आदिबद्री से पिहोवा तक उस प्राचीन धारा के मार्ग की खोज है. दूसरी परियोजना का संबंध भाखड़ा की मुख्य नहर के जल को पिहोवा तक पहुंचाना है. इसके लिए कैलाश शिखर पर स्थित मान सरोवर से आने वाली सतलुज जलधारा का इस्तेमाल किया जाएगा. सर्वे ऑफ इंडिया के मानचित्रों में आदिबद्री से पिहोवा तक के नदी मार्ग को सरस्वती मार्ग दर्शाया गया है. तीसरी परियोजना सरस्वती नदी के प्राचीन जलमार्ग को खोलने और भू-जल स्त्रोतों का पता लगाना है. इसके लिए मुंबई के भाभा परमाणु अनुसंधान संस्थान और राजस्थान के जोधपुर के रिमोट सैंसिंग एप्लीकेशन केंद्र के विज्ञानी काम में जुटे हैं. इसके अलावा सरस्वती घाटी में पश्चिम गढ़वाल में स्थित हर-की दून ग्लेशियर से सोमनाथ तक प्रवाहित होने वाली प्राचीन जलधारा मार्ग की खोज पर भी जोर दिया जा रहा है.

तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी ) राजस्थान के थार रेगिस्तान में सरस्वती नदी की खोज का काम कर रहा है. निगम के अधिकारियों का कहना है कि सरस्वती की खोज के लिए पहले भी कई संस्थाओं ने काम किया है और कई स्थानों पर खुदाई भी की गई है, लेकिन 250 मीटर से ज्यादा गहरी खुदाई नहीं की गई थी. निगम जलमार्ग की खोज के लिए कम से कम एक हजार मीटर तक खुदाई करने पर जोर दे रहा है. दुनिया के अन्य हिस्सों में रेगिस्तान में एक हजार मीटर से भी ज्यादा नीचे स्वच्छ जल के स्त्रोत मिले हैं.

सरस्वती नदी को फिर से प्रवाहित किए जाने की तमाम कोशिशों के बावजूद इसके शोध में जुटी संस्थाएं सरकार से काफी खफा हैं. सरस्वती शोध संस्थान के अध्यक्ष दर्शनलाल जैन का कहना है कि आदिबद्री और कलायत में सरस्वती नदी का पानी मौजूद होने के बावजूद इसमें नहर का पानी प्रवाहित करना दुख की बात है. सरकार को चाहिए सरस्वतीकि कलायत में फूट रही सरस्वती की धाराओं को जमीन के ऊपर लाया जाए. महज नदी के एक हिस्से को पक्का करने की बजाय आदिबद्री से लेकर सिरसा तक नदी को पक्का कर पानी प्रवाहित किया जाए. साथ ही कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड की तर्ज पर सरस्वती विकास प्राधिकरण का गठन किया जाए. उनका यह भी कहना है कि अगर सरकार चाहे तो तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम अपने खर्च पर हरियाणा में सरस्वती नदी खुदाई करने को तैयार है.

Wednesday, September 24, 2008

याद रहेगी बेगम हज़रत महल की क़ुर्बानी

पेशकश : चांदनी
जंगे-आज़ादी के सभी अहम केंद्रों में अवध सबसे ज्यादा वक़्त तक आज़ाद रहा. इस बीच बेगम हज़रत महल ने लखनऊ में नए सिरे से शासन संभाला और बगावत की कयादत की. तकरीबन पूरा अवध उनके साथ रहा और तमाम दूसरे ताल्लुकदारों ने भी उनका साथ दिया. बेगम अपनी कयादत की छाप छोड़ने में कामयाब रहीं.

फैज़ाबाद के एक बेहद ग़रीब परिवार में पैदा हुई इस लडक़ी (बेगम) को नवाब वाजिद अली शाह के हरम में बेगमात की खातिरदारी के लिए रखा गया था, लेकिन उनकी खूबसूरती और अक्लमंदी पर फ़िदा होकर नवाब ने उसे अपने हरम में शामिल कर लिया. बेटा होने पर नवाब ने उसे 'महल' का दर्जा दिया. ब्रिटिश संवाददाता डब्ल्यू. एच. रसेल के मुताबिक़ बेगम अपने शौहर वाजिद अली शाह से कहीं ज़्यादा क़ाबिल थीं. वाजिद अली ने भी इसे मानने में कोई हिचकिचाहट महसूस नहीं की.

बेगम की हिम्मत का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्होंने मटियाबुर्ज में जंगे-आज़ादी के दौरान नज़रबंद किए गए वाजिद अली शाह को छुड़ाने के लिए लार्ड कैनिंग के सुरक्षा दस्ते में भी सेंध लगा दी थी. योजना का भेद खुल गया, वरना वाजिद अली शाह शायद आज़ाद करा लिए जाते. इतिहासकार ताराचंद लिखते हैं कि बेगम खुद हाथी पर चढक़र लडाई के मैदान में फ़ौज का हौसला बढ़ाती थीं.


जंगे-आज़ादी की कमान संभालने से पहले बेगम हज़रत महल ने अपने बारह साला बेटे शहजादे बिरजिस कद्र को अवध का नवाब घोषित कर दिया था. इसकी मान्यता उन्होंने आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र से भी ली, ताकि उन्हें कानून उनका हक मिल सके. ऐसा इसलिए भी किया गया कि इससे पहले गाजिउद्दीन हैदर (1814-1827) ने मुगलों से नाता तोड़कर खुद को इंग्लैंड के राजा के अधीन घोषित कर दिया था. वे 1819 में अवध के प्रभु संपन्न राजा बने थे. इसलिए जंगे-आज़ादी के वक़्त नवाब की कानूनन हालत मुल्क के दूसरे सूबेदारों से अलग थी.

बेगम के सामने कई दिक्कतें थीं. वे खुद भी नवाब का ओहदा संभाल सकती थीं. उन्हें यह भी समझाया गया कि अगर वे बगावत करेंगी तो मटियाबुर्ज में वाजिद अली शाह की जान पर बन सकती है. उनकी राह में उनकी बाकी सौतों रोड़ा बनी हुई थीं. इन्हीं हालात के बीच उन्होंने फ़ैसला लिया. इसमें उनका सबसे ज़्यादा साथ वाजिद अली शाह के हरम के दरोगा मम्मू खान और नवाबों के पुश्तैनी वफ़ादार रहे राजा जयलाल सिंह ने दिया. राजा जयलाल सिंह ने अवध के ताल्लुकदारों को बेगम के इरादों से वाकिफ कराते हुए भरोसा दिलाया और उन्हें बेगम के समर्थन में लामबंद कर लिया. मम्मू खान ने बाकी बेगमों की तऱफ से हो रहे विरोध को भी संभाला. तब बिरजिस कद्र को जुलाई में अवध का नवाब बनाया गया और शासन की कमान बेगम ने ख़ुद संभाली.

शुरुआती अव्यवस्था से निपट कर बेगम ने अवध के शासन को व्यवस्थित करने का काम संभाला. उनके सामने कई चुनौतियां थीं. शहर की बिगडती क़ानून व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए बेगम ने अली राजा बेग को शहर कोतवाल नियुक्त किया. शहर में अमन-चैन कायम होने लगा. राजधानी होने के नाते लखनऊ की सुरक्षा का काम काफी मुश्किल था, क्योंकि जंगे-आज़ादी के नेताओं में आपस में और बेगम व मौलवी अहमदुल्ला में मतभेद पैदा हो गए थे. कैसरबाग की कई बेगमें भी हज़रत महल के ख़िलाफ़ थीं और रेजिडेंसी में रह रहे अंग्रेज़ सेनापतियों को गुप्त सूचनाएं भेज रही थीं, क्योंकि उन्हें अपनी सुरक्षा और जागीरों की फ़िक्र अवध की बजाय ज़्यादा थी.

हालांकि ज़्यादातर अंग्रेज़ लखनऊ को छोड़ चुके थे, फिर भी अवध के कई ज़िलों में ताल्लुकदारों से उनका संघर्ष जारी था. इन सेनानियों को मदद पहुंचानी थी. यह जाहिर था कि अंग्रेज अवध पर अपना वर्चस्व फिर कायम करने के लिए जोरदार हमला करेंगे, इसलिए सुरक्षा की मुकम्मल रणनीति भी बनानी थी. बेगम की सरकार की माली हालत खस्ता थी, जिसे बेहतर करना था. साथ ही अवध की लड़ाई में साथ देने के लिए कानुपर और दिल्ली वगैरह से बंगाल आर्मी के काफ़ी तादाद में जो सिपाही लखनऊ पहुंच चुके थे, उनकी तनख्वाह और रसद का इंतज़ाम भी बेगम को करना था. मशहूर लेखक रोशन तकी के मुताबिक़ ताल्लुकदारों की मदद से बेगम इस काम में काफ़ी हद तक कामयाब रहीं.

इन चुनौतियों से निपटने के लिए 26 से 28 नवंबर 1857 के बीच बेगम ने फ़ौरी तौर पर कई काम किए. 26 नवंबर को ही राजा देवीबख्श सिंह की फ़ौज ने लखनऊ में चिनहट की लड़ाई के बाद बची रह गई फौज के हमले को नाकाम कर बनी गांव की तरफ खदेड दिया. 27 नवंबर को सूचना मिली कि कॉलिन कैंपबेल कानुपर से लखनऊ के लिए चल पड़ा है. इसी बीच जनरल आउटरम भी आलमबाग में डेरा डाल चुका था. उनको पीछे धकेलने के लिए कई ताल्लुकदारों की सेना राजा देवीबख्श सिंह की अगुवाई में तैनात की गई. साथ ही अवध के समृध्द इलाके के ताल्लुकदारों को उनके इलाके में रवाना किया गया कि वे रसद और सेना का इंतज़ाम करें.

इन शुरुआती कदमों के बाद बेगम ने एक रक्षा परिषद बनाई. इसने तय किया कि कैसरबाग को मुख्य दुर्ग माना जाए. इसके अलावा सात और ऐसी जगहों की निशानदेही की गई, जहां से अंग्रेजी सेना लखनऊ में दाखिल को सकती थी. यहां पर सेना की तैनाती के साथ-साथ खाई भी खुदवाई गई. इसी रणनीति का यह नतीजा रहा कि लंबे वक्त तक रेजिडेंसी घिरी रही. नतीजतन, दूसरी अहम लड़ाई मार्च 1858 में ही हो पाई, जिसमें अवध की सेना को पीछे हटना पड़ा.

हालात बिगड़ते देख ताल्लुकदारों ने बेगम को उनके बेटे बिरजिस कद्र के साथ सुरक्षित नेपाल भेज दिया और लडाई जारी रखी. बेगम के प्रमुख सेनापति राजा जयपाल सिंह और राना बेनीमाधव दरगाह पर लगे मोर्चे पर पहुंचे और कसम खाई कि वे आखिरी दम तक लडेंग़े. जंगे-आज़ादी के तमाम नेता महीनों गुरिल्ला लड़ाई लड़ते रहे. आखिरकार इनमें से ज़्यादातर फांसी पर चढ़ा दिए गए. खुद लार्ड कैनिंग ने कुबूल किया कि तमाम कोशिशों के बावजूद हम 1859 तक अवध को एक हद तक शांत और व्यवस्थित कर सके. उधर, 1879 में नेपाल में बेगम का इंतकाल हो गया.