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Thursday, December 11, 2025

अरावली पर्वत श्रृंखला का वजूद ख़तरे में


डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
आज अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस है। हर साल 11 दिसम्बर को अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने साल 2003 में यह दिवस घोषित किया था। इसका उद्देश्य पर्वतों के महत्व, संरक्षण और पर्वतीय समुदायों के समक्ष आने वाली चुनौतियों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। पर्वत पेयजल, जैव विविधता, औषधियों, भोजन और लकड़ी आदि के महत्वपूर्ण स्रोत हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक दोहन की वजह से इनका वजूद ख़तरे में पड़ गया है। इसलिए आज इन्हें संरक्षण की बेहद ज़रूरत है।   

अरावली पर्वत श्रृंखलाओं का अस्तित्व ख़तरे में हैं। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पर्वत श्रृंखलाओं में खनन कार्य पर पाबंदी लगाई हुई है, लेकिन न्यायालय द्वारा अरावली पहाड़ियों की एक नई आधिकारिक परिभाषा को मंज़ूरी दिए जाने से प्रयावरणविदों की चिन्ता बढ़ है। उनका कहना है कि अगर वक़्त रहते इनका संरक्षण नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब अरावली पहाड़ों की जगह सिर्फ़ मरूस्थल ही नज़र आएगा। ग़ौरतलब है कि यह गुजरात के हिम्मत नगर से राजधानी दिल्ली तक 560 किलोमीटर लम्बी विश्व की सर्वाधिक पुरानी पर्वत श्रृंखला है, जिसकी चौड़ाई दस से 100 किलोमीटर तक है। सर्वाधिक ऊंचाई 1723 मीटर राजस्थान के माउंट आबू में है। पहाड़ियों में अकूत खनिज भंडार और क़ीमती पत्थरों का ख़ज़ाना है। खनन से हरियाणा और राजस्थान में अरावली पर्वत श्रृंखला को बहुत नुक़सान पहुंचा है।

क़ाबिले-ग़ौर है कि विगत 20 नवम्बर को सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पहाड़ियों की एक नई आधिकारिक परिभाषा को मंज़ूरी दी है। इसके तहत अरावली के अंदर किसी भी भू-आकृति में स्थानीय राहत से कम से कम 100 मीटर की ऊंचाई होनी चाहिए, जिसमें इसकी ढलान और आसपास के क्षेत्र शामिल हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति द्वारा प्रस्तुत उन सिफ़ारिशों को मंज़ूर कर लिया, जिनमें उत्तर-पश्चिम भारत में 692 किलोमीटर की सीमा को परिभाषित करने की नई परिभाषा को मानकीकृत करने की मांग की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय को बताया गया कि भारतीय वन सर्वेक्षण के एक आकलन के मुताबिक़ 12,081 मानचित्र की गई पहाड़ियों में से सिर्फ़ 1048 ही 8.7 मापदंड को पूरा करती हैं, यानी 100 मीटर के मापदंड को पूरा करती हैं। इन नये मानदंडों के तहत अरावली पर्वत श्रृंखला का तक़रीबन 90 फ़ीसद हिस्सा अपने क़ानूनी संरक्षण से बेदख़ल हो जाएगा। 
ग़ौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पर्वत के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

 न्यायालय ने नब्बे के दशक से अरावली पर्वत क्षेत्र में अवैध खनन पर बार-बार रोक लगाई है। क़ाबिले-ग़ौर है कि 21 दिसम्बर 1992 को केंद्र सरकार के नोटिफ़िकेशन और 12 दिसम्बर 1996 के सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले के बाद पूरे अरावली पहाड़ी क्षेत्र को वन क्षेत्र घोषित किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने 18 मार्च 2004 को आदेश दिए थे कि अरावली श्रृंखला में किसी प्रकार से हरियाली को नष्ट नहीं किया जा सकता। इस आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पहाड़ी में लगे पौधों को भी वन संरक्षित क्षेत्र मानते हुए वन क्षेत्र की परिभाषा तय की थी। इसके लिए गठित की गई सेंट्रल इंपॉवर्ड कमेटी को अनेक अधिकार सौंपते हुए पेड़ों की अवैध कटाई और खनन को रोकने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। इस कमेटी ने भी 7 जून 2007, 12 सितम्बर 2007 और 7 दिसम्बर 2007 को जारी आदेश में पेड़ों की कटाई नहीं होने देने के सख़्त निर्देश दिए थे। कमेटी ने सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी रिपोर्ट में कुछ ख़ास जगहों को छोड़कर इस समूची पर्वत श्रृंखला के आसपास खुदाई पर पूरी तरह रोक लगाने और संरक्षित क्षेत्रों में बनाई गई इमारतों को गिराने की सिफ़ारिश की थी। यह क्षेत्र हरियाणा भूमि एक्ट की धारा 4-5 के तहत भी आता था। इसलिए इस ज़मीन को किसी भी प्रकार का नुक़सान पहुंचाना पर्यावरण नियमों की अवहेलना करना है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने 29 अक्टूबर 2002 को हरियाणा सरकार को निर्देश जारी कर कहा था कि गुड़गांव और फ़रीदाबाद में खनन कार्य से पर्यावरण प्रदूषित होने के साथ असंतुलित भी हो रहा है, इसलिए दोनों ज़िलों में तुरंत प्रभाव से खनन कार्य बंद कराया जाए। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद प्रदेश सरकार ने कार्रवाई करते हुए एक टीम का गठन किया और खनन कार्य बंद करवा दिया, लेकिन कुछ दिनों बाद खनन माफ़िया अरावली श्रृंखलाओं में सक्रिय हो गया और फिर से ब्लास्टिंग के माध्यम से खनन कार्य किया जाने लगा। अवैध खनन का मामला जब मीडिया ने उठाया तो सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए फिर से खनन कार्य बंद कराने के निर्देश दिए। सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बाद प्रदेश सरकार ने अवैध खनन रोकने के लिए बाक़ायदा एक कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी में पुलिस विभाग, पंचायत विभाग, राजस्व विभाग व खनन विभाग के अधिकारियों को शामिल किया गया था। यह भी सुनिश्चित किया गया था कि अवैध खनन रोकने के लिए कमेटी नियमित रूप से अपने-अपने क्षेत्रों की पर्वत श्रृंखलाओं में जाकर अवैध खनन को पूरी तरह बंद कराए। अवैध खनन की शिकायतें मिलने पर वन मंडल अधिकारी सतबीर सिंह दहिया ने फ़रीदाबाद ज़िले के खेड़ी कलां गांव में छापा मारा था और स्थानीय अधिकारियों को सख़्ती से अवैध खनन पर रोक लगाने की हिदायत दी गई थी। उस वक़्त वन क्षेत्र से दूर खनन की इजाज़त लेकर वन्य इलाके की भी खुदाई की जा रही थी। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में व्यावसायिक व निर्माण गतिविधियों का तेज़ी से प्रसार का सबसे ज़्यादा ख़ामियाज़ा अरावली पहाड़ियों का भुगतना पड़ रहा है। गुड़गांव, मानेसर और फ़रीदाबाद इलाके़ में पत्थरों के लिए अंधाधुंध खनन किया गया था।

पर्यावरणविद् और वाटर मैन नाम से विख्यात हाजी इब्राहिम ख़ान का कहना है कि अरावली पर्वत के विषय में मंज़ूर किए गये नये मानदंडों की वजह से इसका वजूद ख़तरे में पड़ जाएगा। अरावली की पहाड़ियां बारिश, सूखा और बाढ़ को नियंत्रित करती हैं, लेकिन ज़्यादा ऊंची न होने की वजह से इनका अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है, जिससे इसके अस्तित्व को ख़तरा पैदा हो गया है। अरावली के जंगल तबाह होने से यहां रहने वाले वन्य प्राणियों का अस्तित्व भी संकट में पड़ गया है। आबादी की तरफ़ आने पर ये जानवर अकसर दुर्घटना का भी शिकार होते रहते हैं। कई बार तो बस्ती के लोग वन विभाग के अधिकारियों की मदद से जानवरों को जंगल में छोड़ आते हैं। पहले यहां शेर, चीते, हिरण, भेड़िये, नील गाय, गीदड़, जंगली बिल्ले, ख़रगोश, सांप, नेवले, मोर, तीतर आदि बड़ी तादाद में थे, लेकिन अब ये लुप्त होते जा रहे हैं। 

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा है- “गुजरात से लेकर राजस्थान और हरियाणा तक फैली अरावली पर्वतमाला ने लम्बे समय से भारतीय भूगोल और इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सरकार ने अवैध खनन से पहले ही बर्बाद हो चुकी इन पहाड़ियों के लिए अब लगभग 'डेथ वारंट' पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। सरकार ने घोषणा की है कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली कोई भी पहाड़ी खनन के ख़िलाफ़ कड़े प्रतिबंधों के अधीन नहीं है। यह फ़ैसला अवैध खननकर्ताओं और माफ़ियाओं के लिए खुला निमंत्रण है कि वे इस श्रृंखला के उस 90 प्रतिशत हिस्से का भी सफ़ाया कर दें, जो सरकार द्वारा निर्धारित ऊंचाई सीमा से नीचे आता है।“

अरावली पहाड़ियों की परिभाषा में बदलाव को लेकर कांग्रेस नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा है- "यह अजीब है और इसके पर्यावरण और पब्लिक हेल्थ पर बहुत गंभीर नतीजे होंगे। इसकी तुरंत समीक्षा की ज़रूरत है।"

बहरहाल, अरावली पर्वत श्रृंखलाओं को बचाने की ज़रूरत है। साथ ही सरकारों को भी गंभीरता बरतनी होगी, ताकि इनका वजूद क़ायम रहे।  

Wednesday, March 20, 2019

गौरैया बिन सूना घर-आंगन

विश्व गौरैया दिवस 20 मार्च पर विशेष
फ़िरदौस ख़ान
सुबह होते ही गौरैया घर आंगन में चहकती, फुदकती फिरती थीं. उनकी चहचहाहट सुबह को ख़ुशगवार बना दिया करती थी. कुछ दहाई पहले तक घर के आंगन में गौरैया का बसेरा हुआ करता था, लेकिन फिर हालात ऐसे बदले कि कान गौरैया की चहचहाहट सुनने को तरस गए. गौरैया बस्तियों के आसपास रहना पसंद करती है. उसे इंसानों से बेहद लगाव है, लेकिन इंसानों ने आधुनिकता की चकाचौंध के फेर में इस नन्हे परिन्दे के आशियाने को ही उजाड़ कर रख दिया है. महानगरों और शहरों को छोड़ दें, तो गांव-देहात में अब भी गौरैया नज़र आ जाती हैं.

गौरैया एक छोटी चिड़िया है. मादा गौरैया को चिड़ी या चिड़िया और नर गौरैया को चिड़ा भी कहते हैं. यह हल्के भूरे रंग की होती है. इसके शरीर पर छोटे-छोटे पंख और पीली चोंच और पैरों का रंग पीला होता है. नर गौरैया का पहचान उसके गले के पास काले धब्बे से होती है. यह पासेराडेई परिवार की सदस्य है, लेकिन कुछ लोग इसे 'वीवर फिंच' परिवार की सदस्य मानते हैं. इसकी लंबाई 14 से 16 सेंटीमीटर होती है और इसका वज़न 25 से 35 ग्राम तक होता है. एक वक़्त में इसके कम से कम तीन अंडे होते हैं. गौरेया ज़्यादातर झुंड में ही रहती है. भोजन की तलाश गौरेया के झुंड दो मील तक की दूरी तय कर लेते हैं. शहरी इलाक़ों में गौरैया की छह तरह ही प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें हाउस स्पैरो, स्पेनिश स्पैरो, सिंड स्पैरो, रसेट स्पैरो, डेड सी स्पैरो और ट्री स्पैरो शामिल हैं. इनमें हाउस स्पैरो को गौरैया कहा जाता है.

गौरैया शहरों में ज़्यादा पाई जाती है. अमूमन यह हर तरह की जलवायु में रहती है, लेकिन पहाड़ी इलाक़ों में यह कम दिखाई देती है. गांव-देहात, क़स्बों और छोटे शहरों में इसे ख़ूब देखा जा सकता है. मगर अब गौरैया लुप्त होने की क़गार पर है. भारत सहित दुनिया के कई देशों ब्रिटेन, इटली, फ़्रांस, जर्मनी और चेक गणराज्य आदि में इसकी तादाद बहुत तेज़ी से कम हो रही है. पश्चिमी देशों में हुए अध्ययनों के मुताबिक़ गौरैया की आबादी घटकर ख़तरनाक स्तर तक पहुंच गई है. पक्षी विज्ञानी मानते हैं कि गौरैया की आबादी में 60 से 80 फ़ीसद कमी आई है. आंध्र विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अध्ययन की मानें, तो गौरैया की आबादी में तक़रीबन 60 फ़ीसद की गिरावट दर्ज की गई है. ब्रिटेन की ‘रॉयल सोसायटी ऑफ़ प्रोटेक्शन ऑफ़ बर्डस’ ने भारत से लेकर दुनिया के कई हिस्सों में अनुसंधानकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययनों के आधार पर गौरैया को ‘रेड लिस्ट’ में शामिल कर लिया है. नीदरलैंड में इसे 'दुर्लभ प्रजाति' के वर्ग में रखा गया है.

गौरैया की घटती तादाद के लिए बदलता माहौल काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार है. पहले घर के आंगन बड़े हुआ करते थे. परिन्दों को दाना डाला जाता था. उनके लिए पानी से भरे कूंडे रखे जाते थे. भोजन और पानी की तलाश में उन्हें भटकना नहीं पड़ता था. आबादी से पेड़ कटने लगे हैं. बाग़-बग़ीचों, खेत-खलिहानों की जगह कंकरीट के जंगल बस गए हैं. पहले घरों में पेड़ होते थे, रौशनदान वग़ैरह होते थे, जहां गौरैया अपना बसेरा बना लिया करती थी. मगर अब घर की जगह फ़्लैट्स बनने लगे हैं, जिनमें आंगन के लिए कोई जगह नहीं होती. पक्षी विज्ञानी और वन्यप्राणी विशेषज्ञों का मानना है कि खेतों में कीटनाशकों के ज़्यादा इस्तेमाल से गौरैया पर बुरा असर पड़ा है. गौरैया के बच्चों का शुरुआती सिर्फ़ कीड़े-मकोड़े ही होते हैं, लेकिन अब लोग खेतों से लेकर अपने घर की क्यारियों तक में रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल करते हैं, जिससे पौधों को कीड़े नहीं लगते. ऐसे में गौरैया जैसे परिन्दों को भोजन नहीं मिल पाता. जो कीड़े होते भी हैं, वे कीटनाशकों की वजह से मर जाते हैं. फिर इन्हीं ज़हरीले कीटों को खाने से गौरैया मर जाती हैं. सीसा रहित पेट्रोल के जलने पर मिथाइल नाइट्रेट नामक यौगिक तैयार होता है, जो छोटे जीव-जंतुओं के लिए नुक़सानदेह है. अब घरों में गौरैया के लिए दाना-पानी रखने का चलन भी बंद हो गया है. इसलिए गौरैया के लिए भोजन का संकट भी पैदा हो गया है.

गौरैया को अपने घोंसलों के लिए सुरक्षित जगह नहीं मिल पाती, ऐसे में उसके अंडे और नन्हे बच्चे दूसरे जीव खा जाते हैं. वह ख़ुद भी चील, बाज़ और बिल्लियों का भोजन बन जाती है. अगर किसी घर में गौरैया ने अपना घोंसला बना भी लिया, तो लोग नज़र पड़ते ही उसे उजाड़ देते हैं. इसके अलावा मोबाइल टावरों से निकले वाली तंरगों को भी गौरैयों के लिए हानिकारक माना जा रहा है. ये तंरगें उनकी दिशा खोजने वाली प्रणाली को प्रभावित कर रही हैं और इनके प्रजनन पर भी विपरीत असर पड़ रहा है. पक्षी विज्ञानियों का कहना है कि गौरैया के घोंसलों के लिए ऐसी जगह मुहैया करानी होगी, जहां उसके अंडे और बच्चे सुरक्षित रहें.

गौरैया के प्रति जनमानस में जागरुकता पैदा करने के लिए साल 2010 में विश्व गौरैया दिवस मनाने का फ़ैसला किया गया, तक से हर साल 20 मार्च को दुनियाभर में विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है. सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद मुहम्मद दिलावर जैसे लोग गौरैया के संरक्षण के काम में जुटे हैं और उन्हीं की कोशिशों का नतीजा है कि अब दुनिया भर में 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाने लगा है. दिल्ली सरकार ने साल 2012 में इसे राज्य-पक्षी घोषित किया था. यह बिहार का राज्य पक्षी है.
ग़ौरतलब है कि महाराष्ट्र के नासिक शहर के पर्यावरण विज्ञानी मोहम्मद दिलावर बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसायटी से जुड़े हुए हैं. उन्होंने साल 2008 में गौरैया को बचाने की मुहिम शुरू की थी. उन्होंने इंटरनेट के ज़रिये गौरैया संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने का काम शुरू किया. इस मुहिम को कामयाबी मिली और 50 देशों तक उनकी बात पहुंच गई.
उन्होंने लकड़ी से गौरेया के लिए छोटे-छोटे घर बनाए हैं और एक फ़ीडर भी, जिससे गौरैया को सुरक्षित जगह और दाना-पानी मिल सके. गौरैया घर की लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई इतनी रखी गई है कि वह इसमें आराम से रह सके. इसके निचले हिस्से में छोटे-छोटे कई छिद्र हैं, ताकि हवा  आ जा सके और पानी आसानी से बह जाए.

गौरैया के संरक्षण के प्रति सरकार भी गंभीर नज़र आ रही है. देश भर में सरकारी स्तर पर गौरैया के संरक्षण के लिए मुहिम चलाई जा रही है. इसके तहत लोगों को गौरैया के अस्तित्व पर आए संकट के बारे में बताया जा रहा है.  विद्यालयों में जागरुकता कार्यक्रमों का आयोजन कर बच्चों को गौरैया संरक्षण के बारे में बताया जा रहा है. बच्चों को बताया जा रहा है कि  यह जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों इस सॄष्टि के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं.  बच्चों को गौरैया घर बांटे जा रहे हैं, ताकि वे उन्हें अपने घर में लगाएं.

पिछले साल बिहार के वन एवं पर्यावरण विभाग ने गौरैया के संरक्षण के लिए सभी सरकारी दफ़्तरों, आवासों, विद्यालयों, सामुदायिक भवनों  और अन्य सभी सरकारी इमारतों में लकड़ी के 'गौरैया घर' रखने की मुहिम शुरू की थी. इसके तहत राज्यभर में गौरैया संरक्षण के लिए जन जागृति अभियान चलाया जा रहा है. जगह-जगह नुक्कड़ नाटकों और और सेमिनारों के ज़रिये लोगों को गौरैया संरक्षण के लिए प्रेरित करना है. सरकारी विद्यालयों में बच्चों को गौरैया घर वितरित किए जा रहे हैं. सरकार का मानना है कि अब घरों में आंगन ख़त्म होते जा रहे हैं. ऐसे में गौरैया को घोंसला बनाने के लिए सुरक्षित जगह नहीं मिल पा रही है.

उत्तर प्रदेश में लड़की के छोटे-छोटे घर बनाकर लोगों से उन्हें अपने घर में रखने की अपील की जा रही है, ताकि गौरैया को आबादी में रहने के लिए जगह मिल सके. अधिकारियों का कहना है कि गौरैया को बचाने के लिए लोगों को कोशिश करनी चाहिए. घोंसले बनाकर उनके लिए दाना-पानी का इंतज़ाम करके उन्हें बचाया जा सकता है.  ग़ैर सरकारी संस्थाएं भी गौरैया बचाओ मुहिम में शामिल हो रही हैं. गांव-देहात के लोग भी इस नन्हे परिन्दे को बचाने के लिए आगे आ रहे हैं. चिड़िया घरों में विश्व गौरैया दिवस पर गौरैया घरों की बिक्री की जाएगी.

गौरैया का अस्तित्व ख़तरे में है. अगर जल्द ही इसके संरक्षण के लिए कारगर क़दम नहीं उठाए गए, आने वाली पीढ़ियां इसे देखने को तरस जाएंगी. गौरैया के संरक्षण के लिए जनमानस में जागरुकता पैदा करनी होगी. विश्व गौरैया दिवस बीत जाने के बाद भी गौरैया बचाओ मुहिम धीमी नहीं पड़नी चाहिए. इस मुहिम को जनमानस तक पहुंचाना होगा, तभी इसके बेहतर नतीजे सामने आएंगे. गौरैया संरक्षण की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ सरकार की ही नहीं है, बल्कि यह हम सबकी सांझी ज़िम्मेदारी है. इसलिए गौरैया संरक्षण के लिए सबको साथ मिलकर काम करना होगा, ताकि हमारे घरों के आंगन में फिर से गौरैया चहकने लगें.

Sunday, August 12, 2018

बाढ़ के क़हर को रोकने की दरकार

फ़िरदौस ख़ान
बरसात का मौसम शुरू ही देश के कई राज्य बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं. बाढ़ से जान व माल का भारी नुक़सान होता है. लाखों लोग बाढ़ से प्रभावित होते हैं. कितने ही लोग बाढ़ की वजह से मौत की आग़ोश में समा जाते हैं. सैकड़ों मकान क्षतिग्रस्त हो जाते हैं,  हज़ारों लोगों को बेघर होकर शरणार्थी जीवन गुज़ारने को मजबूर होना पड़ता हैं. खेतों में खड़ी फ़सलें तबाह हो जाती हैं.

देश में बाढ़ आने के कई कारण हैं. बाढ़ अमूमन उत्तर पूर्वी राज्यों को ही निशाना बनाती है. इसकी सबसे बड़ी वजह है कि चीन और ऊपरी पहाड़ों में भारी बारिश होती है और वर्षा का यह पानी भारत के निचले इलाक़ों की तरह बहता है. फिर यही पानी तबाही की वजह बनता है. नेपाल में भारी बारिश का पानी भी बिहार की कोसी नदी को उफ़ान पर ला देता है, जिससे नदी के रास्ते में आने वाले इलाक़े पानी में डूब जाते हैं. ग़ौरतलब है कि कोसी नदी नेपाल में हिमालय से निकलती है. यह नदी बिहार में भीम नगर के रास्ते भारत में दाख़िल होती है. कोसी बिहार में भारी तबाही मचाती है, इसलिए इसे बिहार का शोक या अभिशाप भी कहा जाता है. कोसी नदी हर साल अपनी धारा बदलती रहती है. साल 1954 में भारत ने नेपाल के साथ समझौता करके इस पर बांध बनाया था. हालांकि बांध नेपाल की सीमा में बनाया गया है, लेकिन इसके रखरखाव का काम भारत के ज़िम्मे है. नदी के तेज़ बहाव के कारण यह बांध कई बार टूट चुका है. आधिकारिक जानकारी के मुताबिक़ बांध बनाते वक्त आकलन किया गया था कि यह नौ लाख क्यूसेक पानी के बहाव को सहन कर सकता है और बांध की उम्र 25 साल आंकी गई थी. पहली बार यह बांध 1963 में टूटा. इसके बाद 1968 में पांच जगहों से यह टूटा. उस वक़्त कोसी का बहाव नौ लाख 13 हज़ार क्यूसेक मापा गया था. फिर साल 1991 नेपाल के जोगनिया और 2008 में नेपाल के ही कुसहा नामक स्थान पर बांध टूट गया. हैरानी की बात यह रही कि उस वक़्त नदी का बहाव महज़ एक लाख 44 हज़ार क्यूसेक था. फ़िलहाल कोसी पर बने बांध में जगह-जगह दरारें पड़ी हुई हैं.

कोसी की तरह गंडक नदी भी नेपाल के रास्ते बिहार में दाख़िल करती है. गंडक को नेपाल में सालिग्राम और मैदान में नारायणी कहते हैं. यह पटना में आकर गंगा में मिल जाती है. बरसात में गंडक भी उफ़ान पर होती है और इसके आसपास के इलाक़े बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं. ग़ौरतलब है कि बांग्लादेश के बाद भारत ही दुनिया का दूसरा सर्वाधिक बाढ़ग्रस्त देश है. देश में कुल 62 प्रमुख नदी प्रणालियां हैं, जिनमें से 18 ऐसी हैं जो अमूमन बाढ़ग्रस्त रहती हैं. उत्तर-पूर्व में असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश तथा दक्षिण में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु बाढ़ग्रस्त इलाके माने जाते हैं, लेकिन कभी-कभार देश के अन्य राज्य भी बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं. पश्चिम बंगाल की मयूराक्षी, अजय, मुंडेश्वरी, तीस्ता और तोर्सा नदियां तबाही मचाती हैं, ओडिशा में सुवर्णरेखा, बैतरनी, ब्राह्मणी, महानंदा, ऋषिकुल्या, वामसरदा नदियां उफ़ान पर रहती हैं. आंध्रप्रदेश में गोदावरी और तुंगभद्रा, त्रिपुरा में मनु और गुमती, महाराष्ट्र में वेणगंगा, गुजरात और मध्य-प्रदेश में नर्मदा नदियों की वजह से इनके तटवर्ती इलाक़ों में बाढ़ आती है.

बाढ़ से हर साल करोड़ों रुपये का नुक़सान होता है, लेकिन नुक़सान का यह अंदाज़ा वास्तविक नहीं होता. बाढ़ से हुए नुक़सान की सही राशि का अंदाज़ा लगाना आसान नहीं है, क्योंकि बाढ़ से मकान व दुकानें क्षतिग्रस्त होती हैं. फ़सलें तबाह हो जाती हैं. लोगों का कारोबार ठप हो जाता है. बाढ़ के साथ आने वाली बीमारियों की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं पर भी काफ़ी पैसा ख़र्च होता है. लोगों को बाढ़ से नुक़सान की भरपाई में काफ़ी वक़्त लग जाता है. यह कहना ग़लत न होगा कि बाढ़ किसी भी देश, राज्य या व्यक्ति को कई साल पीछे कर देती है. बाढ़ से उसका आर्थिक और सामाजिक विकास ठहर जाता है. इसलिए बाढ़ से होने वाले नुक़सान का सही अंदाज़ा लगाना बेहद मुश्किल है.

जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक़, देश में पिछले साढ़े छह दशक के दौरान बाढ़ से सालाना औसतन 1654 लोगों की मौत हुई और 92763 पशुओं की जान गई. इससे सालाना औसतन 71.69 लाख हेक्टेयर इलाक़े पर असर पड़ा और तकरीबन 1680 करोड़ रुपये फ़सलें तबाह हो गईं. बाढ़ से सालाना 12.40 लाख मकानों को नुक़सान पहुंचा. साल 1953 से 2017 के कुल नुक़सान पर नज़र डालें, तो देश में बाढ़ की वजह से 46.60 करोड़ हेक्टेयर इलाक़े में 205.8 करोड़
लोग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. इस दौरान 8.06 करोड़ मकानों को नुक़सान पहुंचा है. अफ़सोस की बात है कि हर साल बाढ़ से होने वाले जान व माल के नुकसान में बढ़ोतरी हो रही है, जो बेहद चिंताजनक है.

पिछले सात दशकों में देश में अनेक बांध बनाए गए हैं. साथ ही पिछले क़रीब तीन दशकों से बाढ़ नियंत्रण में मदद के लिए रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना व्यवस्था का भी इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन संतोषजनक नतीजे सामने नहीं आ पा रहे हैं. बाढ़ से निपटने के लिए 1978 में केंद्रीय बाढ़ नियंत्रण बोर्ड का गठन किया गया था. देश के कुल 32.9 करोड़ हेक्टेयर में से तक़रीबन 4.64 करोड़ हेक्टेयर भूमि बाढ़ प्रभावित इलाक़े में आती है. देश में हर साल तक़रीबन 4000 अरब घन मीटर बारिश होती है.

हैरत का बात यह भी है कि बाढ़ एक राष्ट्रीय आपदा है, इसके बावजूद इसे राज्य सूची में रखा गया है. इसके तहत केंद्र सरकार बाढ़ से संबंधित कितनी ही योजनाएं बना ले, लेकिन उन पर अमल करना राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है. प्रांतवाद के कारण राज्य बाढ़ से निपटने के लिए पर्याप्त उपाय नहीं कर पाते. एक राज्य की बाढ़ का पानी समीपवर्ती राज्य के इलाक़ों को भी प्रभावित करता है. मसलन हरियाणा का बाढ़ का पानी राजधानी दिल्ली में छोड़ दिया जाता है, जिससे यहां के इलाक़े पानी में डूब जाते हैं. राज्यों में हर साल बाढ़ की रोकथाम के लिए योजनाएं बनाई जाती हैं, मगर प्रशासनिक लापरवाही की वजह से इन योजनाओं पर ठीक से अमल नहीं हो पाता. नतीजतन, यह योजनाएं महज़ काग़जों तक ही सिमट कर जाती हैं. हालांकि बाढ़ को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनमें बाढ़ प्रभावित इलाकों में बांध बनाना, नदियों के कटान वाले इलाक़ों में कटान रोकना, पानी की निकासी वाले नालों की सफ़ाई और उनकी सिल्ट निकालना, निचले इलाक़ों के गांवों को ऊंचा करना, सीवरेज व्यवस्था को सुधारना और शहरों में नालों के रास्ते आने वाले कब्ज़ों को हटाना आदि शामिल है.

क़ाबिले-ग़ौर है कि विकसित देशों में आगजनी, तूफ़ान, भूकंप और बाढ़ के लिए क़स्बों का प्रशासन भी पहले से तैयार रहता है. उन्हें पहले से पता होता है कि किस पैमाने पर, किस आपदा की दशा में, उन्हें क्या-क्या करना है. वे बिना विपदा के छोटे पैमाने पर इसका अभ्यास करते रहते हैं. गली-मोहल्लों के हर घर तक यह सूचना मीडिया या डाक के ज़रिये संक्षेप में पहुंचा दी जाती है कि किस दशा में उन्हें क्या करना है. संचार व्यवस्था के टूटने पर भी वे प्रशासन से क्या उम्मीद रख सकते हैं. पहले तो वे इसकी रोकथाम की कोशिश करते हैं. इसमें विशेषज्ञों की सलाह ली जाती है. इस प्रक्रिया को आपदा प्रबंधन कहते हैं. आग तूफ़ान और भूकंप के दौरान आपदा प्रबंधन एक ख़र्चीली प्रक्रिया है, लेकिन बाढ़ का आपदा नियंत्रण उतना ख़र्चीला काम नहीं है. इसे बख़ूबी बाढ़ आने वाले इलाक़ों में लागू किया जा सकता है. विकसित देशों में बाढ़ के आपदा प्रबंधन में सबसे पहले यह ध्यान रखा जाता है कि मिट्टी, कचरे वगैरह के जमा होने से इसकी गहराई कम न हो जाए. इसके लिए नदी के किनारों पर ख़ासतौर से पेड़ लगाए जाते हैं, जिनकी जड़ें मिट्टी को थामकर रखती हैं. नदी किनारे पर घर बसाने वालों के बग़ीचों में भी अनिवार्य रूप से पेड़ लगवाए जाते हैं. जहां बाढ़ का ख़तरा ज़्यादा हो, वहां नदी को और अधिक गहरा कर दिया जाता है. गांवों तक में पानी का स्तर नापने के लिए स्केल बनी होती है.

हमारे देश में भी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए पहले से ही तैयार रहना होगा. इसके लिए जहां प्रशासन को चाक-चौबंद रहने की ज़रूरत है, वहीं जनमानस को भी प्राकृतिक आपदा से निपटने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए. स्कूल, कॉलेजों के अलावा जगह-जगह शिविर लगाकर लोगों को यह प्रशिक्षण दिया जा सकता है. इसमें स्वयंसेवी संस्थाओं की भी मदद ली जा सकती है. इस तरह प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुक़सान को कम किया जा सकता है.

Saturday, June 30, 2018

प्लास्टिक कचरे से गहराता संकट

फ़िरदौस ख़ान                                    
प्लास्टिक ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है. अमूमन हर चीज़ के लिए प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है, वो चाहे दूध हो, तेल, घी, आटा, चावल, दालें, मसालें, कोल्ड ड्रिंक, शर्बत, सनैक्स, दवायें, कपड़े हों या फिर ज़रूरत की दूसरी चीज़ें सभी में प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है. बाज़ार से फल या सब्ज़ियां ख़रीदो, तो वे भी प्लास्टिक की ही थैलियों में ही मिलते हैं. प्लास्टिक के इस्तेमाल की एक बड़ी वजह यह भी है कि टिन के डिब्बों, कपड़े के थैलों और काग़ज़ के लिफ़ाफ़ों के मुक़ाबले ये सस्ता पड़ता है. पहले कभी लोग राशन, फल या तरकारी ख़रीदने जाते थे, तो प्लास्टिक की टोकरियां या कपड़े के थैले लेकर जाते थे. अब ख़ाली हाथ जाते हैं, पता है कि प्लास्टिक की थैलियों में सामान मिल जाएगा. अब तो पत्तल और दोनो की तर्ज़ पर प्लास्टिक की प्लेट, गिलास और कप भी ख़ूब चलन में हैं. लोग इन्हें इस्तेमाल करते हैं और फिर कूड़े में फेंक देते हैं. लेकिन इस आसानी ने कितनी बड़ी मुश्किल पैदा कर दी है, इसका अंदाज़ा अभी जनमानस को नहीं है.

दरअसल, प्लास्टिक कचरा पर्यावरण के लिए एक गंभीर संकट बन चुका है. केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक़ देश में सबसे ज़्यादा प्लास्टिक कचरा बोतलों से आता है. साल 2015-16 में करीब 900 किलो टन प्लास्टिक बोतल का उत्पादन हुआ था. राजधानी दिल्ली में अन्य महानगरों के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा प्लास्टिक कचरा पैदा होता है. साल 2015 के आंकड़ों की मानें, तो दिल्ली में 689.52 टन, चेन्नई में 429.39 टन, मुंबई में 408.27 टन, बेंगलुरु में 313.87 टन और हैदराबाद में 199.33 टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है. सिर्फ़ दस फ़ीसद प्लास्टिक कचरा ही रि-साइकिल किया जाता है, बाक़ी का 90 फ़ीसद कचरा पर्यावरण के लिए नुक़सानदेह साबित होता है.
रि-साइक्लिंग की प्रक्रिया भी प्रदूषण को बढ़ाती है. रि-साइकिल किए गए या रंगीन प्लास्टिक थैलों में ऐसे रसायन होते हैं, जो ज़मीन में पहुंच जाते हैं और इससे मिट्टी और भूगर्भीय जल विषैला बन सकता है. जिन उद्योगों में पर्यावरण की दृष्टि से बेहतर तकनीक वाली रि-साइकिलिंग इकाइयां नहीं लगी होतीं. उनमें रि-साइक्लिंग के दौरान पैदा होने वाले विषैले धुएं से वायु प्रदूषण फैलता है. प्लास्टिक एक ऐसा पदार्थ है, जो सहज रूप से मिट्टी में घुल-मिल नहीं सकता. इसे अगर मिट्टी में छोड़ दिया जाए, तो भूगर्भीय जल की रिचार्जिंग को रोक सकता है. इसके अलावा प्लास्टिक उत्पादों के गुणों के सुधार के लिए और उनको मिट्टी से घुलनशील बनाने के इरादे से जो रासायनिक पदार्थ और रंग आदि उनमें आमतौर पर मिलाए जाते हैं, वे भी अमूमन सेहत पर बुरा असर डालते हैं.

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि प्लास्टिक मूल रूप से नुक़सानदेह नहीं होता, लेकिन प्लास्टिक के थैले अनेक हानिकारक रंगों, रंजक और अन्य तमाम प्रकार के अकार्बनिक रसायनों को मिलाकर बनाए जाते हैं. रंग और रंजक एक प्रकार के औद्योगिक उत्पाद होते हैं, जिनका इस्तेमाल प्लास्टिक थैलों को चमकीला रंग देने के लिए किया जाता है. इनमें से कुछ रसायन कैंसर को जन्म दे सकते हैं और कुछ खाद्य पदार्थों को विषैला बनाने में सक्षम होते हैं. रंजक पदार्थों में  कैडमियम जैसी जो धातुएं होती हैं, जो सेहत के लिए बेहद नुक़सानदेह हैं. थोड़ी-थोड़ी मात्रा में कैडमियम के इस्तेमाल से उल्टियां हो सकती हैं और दिल का आकार बढ़ सकता है. लम्बे समय तक जस्ता के इस्तेमाल से मस्तिष्क के ऊतकों का क्षरण होने लगता है.

हालांकि पर्यावरण और वन मंत्रालय ने रि-साइकिंल्ड प्लास्टिक मैन्यूफैक्चर एंड यूसेज़ रूल्स-1999 जारी किया था. इसे 2003 में पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम-1968 के तहत संशोधित किया गया है, ताकि प्लास्टिक की थैलियों और डिब्बों का नियमन और प्रबंधन सही तरीक़े से किया जा सके. भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने धरती में घुलनशील प्लास्टिक के 10 मानकों के बारे में अधिसूचना जारी की थी, मगर इसके बावजूद हालात वही 'ढाक के तीन पात' वाले ही हैं.

हालांकि दिल्ली समेत देश के कई राज्यों में पॉलीथिन और प्लास्टिक से बनी सामग्रियों पर रोक लगाने का ऐलान किया जा चुका है. इसका उल्लंघन करने पर जुर्माने और क़ैद का प्रावधान भी है.प्लास्टिक के इस्तेमाल से होने वाली समस्याएं ज़्यादातर कचरा प्रबंधन प्रणालियों की ख़ामियों की वजह से पैदा हुई हैं. प्लास्टिक का यह कचरा नालियों और सीवरेज व्यवस्था को ठप कर देता है. इतना ही नहीं नदियों में भी इनकी वजह से बहाव पर असर पड़ता है और पानी के दूषित होने से मछलियों की मौत तक हो जाती है. नदियों के ज़रिये प्लास्टिक का ये कचरा समुद्र में भी पहुंच रहा है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की रिपोर्ट के मुताबिक़ हर साल तकरीबन 80 लाख टन कचरा समंदरों में मिल रहा है. समंदरों में जो प्लास्टिक कचरा मिल रहा है, उसका तक़रीबन 90 फ़ीसद हिस्सा दस नदियों से आ रहा है, जिनमें यांग्त्जे, गंगा, सिंधु, येलो, पर्ल, एमर, मिकांग, नाइल और नाइजर नदियां शामिल हैं. इनमें से आठ नदियां एशिया की हैं. इनमें सबसे ज़्यादा पांच नदियां चीन की, जबकि दो नदियां भारत और एक अफ़्रीका की है. चीन ने 46 शहरों में कचरे को क़ाबू करने का निर्देश जारी किया है, ताकि नदियों के प्रदूषण को कम किया जा सके. प्लास्टिक पशुओं की मौत का भी सबब बन रहा है. कूड़े के ढेर में पड़ी प्लास्टिक की थैलियों को खाकर आवारा पशुओं की बड़ी तादाद में मौतें हो रही हैं.

प्लास्टिक के कचरे की समस्या से निजात पाने के लिए प्लास्टिक थैलियों के विकल्प के रूप में जूट से बने थैलों का इस्तेमाल ज़्यादा से ज़्यादा किया जाना चाहिए. साथ ही प्लास्टिक कचरे का समुचित इस्तेमाल किया जाना चाहिए. देश में सड़क बनाने और दीवारें बनाने में इसका इस्तेमाल शुरू हो चुका है. प्लास्टिक को इसी तरह अन्य जगह इस्तेमाल करके इसके कचरे की समस्या से निजात पाई जा सकती है. बहरहाल, प्लास्टिक कचरे से निपटने के लिए बेहद ज़रूरी है कि इसके प्रति जनमानस को जागरूक किया जाए, क्योंकि इस मुहिम में जनमानस की भागीदारी बहुत ज़रूरी है. इसके लिए जन आंदोलन चलाया जाना चाहिए.

Thursday, April 24, 2014

अपनी पृथ्वी को बचाएं...


पृथ्वी हमारे जीवन का मूल आधार है... जल, जंगल और ज़मीन के बिना जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती... पृथ्वी है, तो हम हैं... इसलिए अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए हमें अपनी पृथ्वी को बचाना ही होगा... पृथ्वी को बचाने के लिए हमें जल, जंगल और ज़मीन को बचाना होगा... और यह तभी मुमकिन है, जब बढ़ती आबादी पर रोक लगाई जाए... क्योंकि यह लगातार बढ़ती आबादी ही है, जो जल, जंगल और ज़मीन को निग़लती जा रही है...

आओ !
अपनी पृथ्वी को बचाएं...
कुछ पेड़ लगाएं...
थोड़ा पानी बचाएं...
बढ़ती आबादी प रोक लगाएं
अपनी पृथ्वी को बचाएं...

Friday, September 11, 2009

हरियाणा वन विभाग के करोड़ों वृक्ष गायब

फ़िरदौस ख़ान
वृक्ष और वनस्पति स्वच्छ पर्यावरण, स्वस्थ जीवन पध्दति तथा सतत् कृषि की आधारभूत आवश्यकताएं हैं। हालांकि भारत एक कृषि समृध्द देश है, लेकिन रेगिस्तान, मिट्टी की उपजाऊ शक्ति का विनाश, भूमि कटाव, खारा पानी जल प्लावन आदि समस्याएं सतत् कृषि उत्पादन के लिए पहले से ही भारी खतरा उत्पन्न कर रही हैं और अब घटते वनों ने एक नई चुनौती पैदा कर दी है। हरियाणा में गायब होते करोड़ों वृक्ष वन विभाग के प्रदेश को हरा-भरा बनाने के तमाम दावों को धूल चटा रहे हैं।

गौरतलब है कि वन विभाग वर्ष 2010 तक प्रदेश के 10 फीसदी और 2021 तक 20 फीसदी वन क्षेत्र को विकसित करने का सपना पाले हुए है, लेकिन हकीकत में लक्ष्य पूरा होता नजर नहीं आ रहा। हैरत की बात यह भी है कि वन विभाग के करीब 15 करोड़ वृक्ष भी गायब हैं। यह खुलासा विभाग के एक सर्वे में हुआ है। पिछले साल अक्टूबर में कराए गए इस सर्वे में वर्ष 2005 तक लगाए गए वृक्षों की नंबरिंग में पता चला है कि प्रदेश में वन के नाम पर महज 1.33 करोड़ वृक्ष ही हैं, जबकि इनकी तादाद 16.5 करोड़ होनी चाहिए थी। सर्वे में पांच साल तक के वृक्षों को शामिल किया गया, जबकि 2005 के बाद लगाए गए वृक्षों की गिनती नहीं की गई।

इतना ही नहीं वन विभाग के दावों और विभाग के सर्वे में भी भारी विरोधाभास है। विभाग के दावों के मुताबिक प्रदेश में हर साल करीब 2.5 करोड़ पौधे रोपे जाते हैं, जबकि सर्वे में हर साल इनकी तादाद घटती जा रही है। अब इसका मतलब यही हो सकता है कि या तो वन विभाग के दावे झूठे हैं या फिर देखरेख के अभाव में पौधे सूख जाते हैं। अब अगर पौधों की ठीक से देखभाल ही नहीं की जाती तो उनके रोपने का औचित्य ही क्या रह जाता है, इसका जवाब तो वन विभाग के आला अधिकारी ही दे सकते हैं। प्रदेश की वन एवं पर्यावरण मंत्री किरण चौधरी का कहना है कि हम अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रयासरत हैं और हमें कामयाबी जरूर मिलेगी।

हरियाणा के कुल भौगोलिक क्षेत्र में केवल 3.5 फीसदी हिस्से पर वन हैं। वर्ष 1966 में हरियाणा के गठन के समय वन का यह क्षेत्र महज 2.28 फीसदी ही था। उस समय किसान अपने खेतों में शीशम, कीकर, आम, अमरूद, बेर, जामुन और शहतूत आदि के वृक्ष लगाया करते थे। उनका मकसद इनसे छाया, फल और लकड़ी प्राप्त करना होता था। बाद में 1978 में विश्व बैंक से मिले अनुदान से वन विभाग ने राज्य में सामुदायिक वन परियोजना शुरू की। इसके तहत किसानों को जल्द बढ़ने वाले पॉपुलर और सफेदे के पौधे मुफ्त बांटे गए। इसके बाद वर्ष 1999 में राज्य में शुरू हुई सामुदायिक वानिकी परियोजना को वन विभाग व यूरोपीय संघ के 109.5 करोड़ रुपये के अनुदान और हरियाणा सरकार के 32 करोड़ रुपये के योगदान से कार्यान्वित किया गया यह परियोजना वर्ष 2008 में खत्म हो गई। परियोजना राज्य के पंचकुला, अम्बाला, यमुनानगर, कुरुक्षेत्र, सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, भिवानी, महेंद्रगढ़ और रेवाड़ी जिलों के तीन सौ गांवों में सामुदायिक भूमि, पंचायती भूमि, कृषि के लिए अनुपयुक्त भूमि और निजी भूमि पर लागू की गई।


भारत के वन सर्वेक्षण, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की रिपोर्ट-2003 के मुताबिक वर्ष 1999 से 2001 तक की तीन साल की अवधि में हरियाणा के वन क्षेत्र में 82 फीसदी इजाफा हुआ। हरियाणा में इस समय 1754 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है, जो 1999 के वन क्षेत्र की तुलना में 790 किलोमीटर की वृध्दि दर्शाता है। वन क्षेत्र में यह सुधार गुणात्मक और मात्रात्मक दोनों रूप से हुआ है। राज्य में घने वनों का क्षेत्रफल 449 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 1139 वर्ग किलोमीटर हो गया है, जो पहले के मुकाबले 54 फीसदी ज्यादा है। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक वन क्षेत्र में यह बढ़ोतरी कुछ वर्षों के दौरान चलाई गई सघन पौधारोपण गतिविधियों के कारण हुई है। वर्ष 1999 के बाद सरकारी, संस्थाओं और निजी फार्मों की भूमि पर 10 करोड़ पौधे लगाए जा चुके हैं। सर्वेक्षण में हरियाणा में सरकारी वन क्षेत्र के अलावा फार्म की भूमि, संस्थाओं और समुदायिक भूमि पर लगाए गए पौधों का अनुमान भी लगाया गया। वनों के बाहर राज्य के 1526 वर्ग किलोमीटर भौगोलिक क्षेत्र पर पौधारोपण किया जा चुका है। इस तरह वन तथा वृक्षों के अधीन कुल क्षेत्र बढ़कर 7.4 फीसदी हो गया है, जबकि समूचे भारत का औसत 2.5 फीसदी है।

भारतीय वन संरक्षण की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र 238 मिलियन हेक्टेयर में केवल 64 मिलियन हेक्टेयर ही वन क्षेत्र है, यानी 19.27 फीसदी क्षेत्र पर वन हैं। इनमें से भी केवल 11.7 फीसदी क्षेत्र पर ही सघन वन हैं, जबकि बाकी वन क्षेत्र में भूमि कटाव और कम घनत्व जैसी समस्याएं हैं। केंद्रीय वन मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2003 तक देश में 26 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के सघन वन खत्म हो चुके हैं, जबकि किसी समय देश के तीन लाख 90 हजार 564 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में घने वन थे और दो लाख 87 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में खुले वन थे। सबसे ज्यादा वन कर्नाटक में 34 फीसदी क्षेत्र को हरा-भरा बना रहे थे। उसक बाद जम्मू कश्मीर में 25 फीसदी, असम में 24 फीसदी, केरल में 22.7 फीसदी, बिहार व झारखंड में 22.5 फीसदी, महाराष्ट्र में 11.8 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 11.3 फीसदी, राजस्थान में 3.8 फीसदी और पंजाब में 2.5 फीसदी क्षेत्र में वन थे।

'द स्टेट ऑफ इंडियन फॉरेस्ट' की एक रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल मिजोरम में सबसे ज्यादा 87 फीसदी, अंडमान और निकोबार में 84 फीसदी, नागालैंड में 82 फीसदी, मणिपुर में 77 फीसदी, मेघालय में 75 फीसदी, लक्ष्यद्वीप 71 फीसदी, अरुणाचल प्रदेश मे 68 फीसदी, सिक्किम में 45 फीसदी, उत्तराखंड में 45 फीसदी, केरल में 40 फीसदी, दिल्ली में 11 फीसदी, जम्मू-कश्मीर में 10 फीसदी, पांडिचेरी में 8 फीसदी, गुजरात में 7 फीसदी, दमन और दीप में 7 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 6 फीसदी,, बिहार में 6 फीसदी, राजस्थान में 4 फीसदी, तथा पंजाब और हरियाणा में सबसे कम 3 फीसदी भू-भाग पर ही वन हैं। भारत की 1988 की वन नीति के मुताबिक देश के कुल भौगोलिक भू-भाग का 33 फीसदी हिस्सा वनों से परिपूर्ण होना चाहिए। केंद्रीय सरकार का लक्ष्य 2012 तक 33 फीसदी क्षेत्र को वन क्षेत्र के तहत लाना है।

सरकार इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए निजी सहयोग के अलावा जनमानस की भागीदारी सुनिश्चित करने पर खासा ध्यान दे रही है। अगर सरकार इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वाकई गंभीर है तो उसे वनों के विस्तार के अलावा फार्मों और कृषि वानिकी जैसी वैकल्पिक भू-उपयोग की पध्दतियों को बढ़ावा देना होगा। भारत में करीब 200 मिलियन हेक्टेयर भूमि पर कृषि होती है। इसलिए कृषि भूमि पर फसलों के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के वृक्ष लगाकर ज्यादा से ज्यादा भूमि को हरा-भरा बनाया जा सकता है।

गौरतलब है कि वनों के घटने के कई कारण हैं, जिनमें वृक्षों का सूखना, घरेलू ईंधन, लकड़ी के कोयले का कारोबार, फर्नीचर व इसी तरह के अन्य कार्यों के लिए पेड़ों का काटा जाना शामिल है। इसमें कोई दो राय नहीं कि वृक्ष को देवता की तरह पूजने वाले देश में वन माफिया लोगों को थोड़े से धन का लालच देकर उनसे पेड़ कटवा लेते हैं। देश की लचर कानून व्यवस्था और आपसी मिलीभगत के चलते न तो वन विभाग इनके खिलाफ कोई कार्रवाई करता है और न ही पुलिस इस मामले में कोई केस दर्ज करती है। नियम तो यह है कि राजस्व भूमि से पेड़ काटने से पहले प्रशासन से लिखित अनुमति ली जाए और इसके एवज में दोगुने पौधे रोपे जाएं और वृक्ष बनने तक उनकी समुचित देखभाल की जाए, मगर शायद ही कोई ऐसा करता हो।

बहरहाल, यही कहा जा सकता है कि अगर देश और प्रदेश को हरा-भरा बनाना है तो पौधों को फाइलों में नहीं, बल्कि धरती पर रोपा जाए और वृक्ष बनने तक ईमानदारी से उनकी देखभाल की जाए। साथ ही जनमानस को भी वृक्षों के महत्व को बताना हागा, ताकि पौधारोपण एक जन आंदोलन बन सके। हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि जब तक कोई अभियान जन अभियान का रूप धारण नहीं करता तब तक वह कामयाब नहीं हो पाता।

Tuesday, September 9, 2008

आर्सेनिक के ज़हरीले असर से मिल सकेगी निजात


फ़िरदौस ख़ान
भारत के कई इलाके ऐसे हैं, जहां के भूमिगत पानी में आर्सेनिक की काफ़ी ज़्यादा मात्रा है. इसकी वजह से इन इलाकों में उगने वाली फ़सलों में भी आर्सेनिक पाया जाता है...आर्सेनिक का सेहत पर बहुत ही बुरा असर पड़ता है...हालांकि ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने पूर्वी भारत में चावल और पानी को जहरीले आर्सेनिक से होने वाले ज़हरीले असर से बचाने का तरीक़ा खोज लिया है.

एक अनुमान के मुताबिक़ पूर्वी भारत और बांग्लादेश में सात करोड़ से अधिक लोग चावल और पानी की वजह इस ज़हर का शिकार हो जाते हैं. इन लोगों में वे किसान भी शामिल हैं जो सिंचाई के लिए प्रदूषित भूजल का इस्तेमाल करते हैं. बंगाल डेल्टा के हर 100 लोगों में से एक व्यक्ति आर्सेनिक के ज़हरीले असर की वजह से मौत के क़रीब होगा, जबकि 100 में पांच लोगों को इस ज़हर के अन्य लक्षण दिखाई देते हैं. बेलफास्ट स्थित क्वींस विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने दक्षिण एशिया के ऐसे हजारों लोगों के लिए आर्सेनिक मुक्त पानी उपलब्ध कराने के लिए कम लागत वाली तकनीक विकसित की है जो भूजल में इस ज़हर के उच्च स्तर से दो चार हैं.

एक अंतरराष्ट्रीय टीम की अगुवाई कर रहे क्वींस विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने कोलकाता के निकट कशिंपोर में एक परीक्षण संयंत्र भी स्थापित किया है जो ग्रामीण समुदायों को रसायन मुक्त भूजल शोधन तकनीक मुहैया कराता है, ताकि उन्हें पानी और खेती के लिए ज़रूरी साफ़ पानी मिल सके. विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक और परियोजना के समन्वयक भास्कर सेनगुप्ता के मुताबिक़ दक्षिणी एशिया में बीमारी के अनेक मामलों के पीछे आर्सेनिक का ज़हर है. इसकी वजह से कैंसर के मामले भी बढ़ रहे हैं. आर्सेनिक के उच्च स्तर से प्रदूषित भूजल का ज़हरीलापन ख़त्म करने के लिए कम लागत वाली तकनीक कृषि के लिए एक चुनौती है. इस तकनीक को इलाके के लिए उपयुक्त करार देते हुए उन्होंने कहा कि क्वींस द्वारा विकसित किया गया यह तरीका एकमात्र तरीक़ा है जो पर्यावरण के अनुकूल है इस्तेमाल करने में आसान है और सस्ती दर पर ग्रामीण समुदाय के लिए उपलब्ध है.

अलबत्ता उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले में वक़्त में लोगों को आर्सेनिक के ज़हरीले असर से निजात मिल सकती है...सरकार को भी चाहिए कि वह लोगों को इस ज़हर के असर से बचाने कि दिशा में कारगर क़दम उठाए...