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Tuesday, May 21, 2024

लोकप्रिय नेता थे राजीव गांधी


किसी भी बेटे के लिए उसके पापा का जाना बहुत तकलीफ़देह होता है... हमें भी अपने पापा की बहुत याद आ रही है... स्वर्गीय राजीव गांधी पापा के प्रिय नेता थे...हमारे और पापा के प्रिय नेता स्वर्गीय राजीव गांधी को भावभीनी श्रद्धांजली...

लोकप्रिय नेता थे राजीव गांधी
-फ़िरदौस ख़ान
श्री राजीव गांधी ने उन्नीसवीं सदी में इक्कीसवीं सदी के भारत का सपना देखा था.  स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले श्री राजीव गांधी देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे. वे बार-बार कहते थे कि भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ ही उनका अन्य बड़ा मक़सद इक्कीसवीं सदी के भारत का निर्माण है. अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल की, जिनमें संचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि शामिल हैं. वे देश की कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते हैं. वे युवाओं के लोकप्रिय नेता थे. उनका भाषण सुनने के लिए लोग घंटों इंतज़ार किया करते थे. उन्‍होंने अपने प्रधानमंत्री काल में कई ऐसे महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए, जिसका असर देश के विकास में देखने को मिल रहा है. आज हर हाथ में दिखने वाला मोबाइल उन्हीं फ़ैसलों का नतीजा है.

चालीस साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले श्री राजीव गांधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे और दुनिया के उन युवा राजनेताओं में से एक हैं, जिन्होंने सरकार की अगुवाई की है. उनकी मां श्रीमती इंदिरा गांधी 1966 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं, तब वह उनसे उम्र में आठ साल बड़ी थीं. उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू 58 साल के थे, जब उन्होंने आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर शपथ ली. देश में पीढ़ीगत बदलाव के अग्रदूत श्री राजीव गांधी को देश के इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश हासिल हुआ था. अपनी मां के क़त्ल के बाद 31 अक्टूबर 1984 को वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे. अपनी मां की मौत के सदमे से उबरने के बाद उन्होंने लोकसभा के लिए चुनाव कराने का आदेश दिया. दुखी होने के बावजूद उन्होंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया. महीने भर की लंबी चुनावी मुहिम के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के तक़रीबन सभी हिस्सों में जाकर 250 से ज़्यादा जनसभाएं कीं और लाखों लोगों से रूबरू हुए. उस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और पार्टी ने रिकॉर्ड 401 सीटें हासिल कीं. सात सौ करोड़ भारतीयों के नेता के तौर पर इस तरह की शानदार शुरुआत किसी भी हालत में क़ाबिले-तारीफ़ मानी जाती है. यह इसलिए भी बेहद ख़ास है, क्योंकि वे उस सियासी ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे, जिसकी चार पीढ़ियों ने जंगे-आज़ादी के दौरान और इसके बाद हिन्दुस्तान की ख़िदमत की थी. इसके बावजूद श्री राजीव गांधी सियासत में नहीं आना चाहते थे. इसीलिए वे सियासत में देर से आए.

श्री राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था. वे सिर्फ़ तीन साल के थे, जब देश आज़ाद हुआ और उनके नाना आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. उनके माता-पिता लखनऊ से नई दिल्ली आकर बस गए. उनके पिता फ़िरोज़ गांधी सांसद बने, जिन्होंने एक निडर तथा मेहनती सांसद के रूप में ख्याति अर्जित की.
राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया, जहां इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में काम किया. वे कुछ वक़्त के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए, लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया. वहां उनके कई दोस्त बने, जिनके साथ उनकी ताउम्र दोस्ती बनी रही. बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे. स्कूल से निकलने के बाद श्री राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए. उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.
उनके सहपाठियों के मुताबिक़ उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं. हालांकि संगीत में उनकी बहुत दिलचस्पी थी. उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था. उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी और रेडियो सुनने का भी ख़ासा शौक़ था. हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था. इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ़्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस हासिल किया. इसके बाद वे  1968 में घरेलू राष्ट्रीय जहाज़ कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए.
कैम्ब्रिज में उनकी मुलाक़ात इतालवी सोनिया मैनो से हुई थी, जो उस वक़्त वहां अंग्रेज़ी की पढ़ाई कर रही थीं. उन्होंने 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली. वे अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में श्रीमती इंदिरा गांधी के निवास पर रहे. वे ख़ुशी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, लेकिन  23 जून 1980 को एक जहाज़ हादसे में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने सारे हालात बदल कर रख दिए. उन पर सियासत में आकर अपनी मां की मदद करने का दबाव बन गया. फिर कई अंदरूनी और बाहरी चुनौतियां भी सामने आईं. पहले उन्होंने इन सबका काफ़ी विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी मां की बात माननी पड़ी और इस तरह वे न चाहते हुए भी सियासत में आ गए. उन्होंने जून 1981 में अपने भाई की मौत की वजह से ख़ाली हुए उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई.  इसी महीने वे युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए. उन्हें नवंबर 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों से संबंधित महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई, जिसे उन्होंने बख़ूबी अंजाम दिया. साथ ही कांग्रेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने उसी लगन से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित और सक्रिय किया.

अपने प्रधानमंत्री काल में राजीव गांधी ने नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए कारगर क़दम उठाए, लेकिन पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को नाकाम करने की उनकी कोशिश का बुरा असर हुआ. वे सियासत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन यह विडंबना है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज़्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा.  उन्होंने कई साहसिक क़दम उठाए, जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं. इसकी वजह से चरमपंथी उनके दुश्मन बन गए. नतीजतन, श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक़्त उन पर हमला किया गया, लेकिन वे बाल-बाल बच गए. साल 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वह कांग्रेस के नेता पद पर बने रहे. वे आगामी आम चुनाव के प्रचार के लिए 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर गए, जहां एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई. देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी.
राजीव गांधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, जिसे श्रीमती सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया.

राजीव गांधी अपने विरोधियों की मदद के लिए भी हमेशा तैयार रहते थे. साल 1991 में जब राजीव गांधी की हत्या कर दी गई, तो एक पत्रकार ने भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी से संपर्क किया. उन्होंने पत्रकार को अपने घर बुलाया और कहा कि अगर वह विपक्ष के नेता के नाते उनसे राजीव गांधी के ख़िलाफ़ कुछ सुनना चाहते हैं, तो मैं एक भी शब्द राजीव गांधी के ख़िलाफ़ नहीं कहेंगे, क्योंकि राजीव गांधी की मदद की वजह से ही ज़िन्दा हैं. उन्होंने भावुक होकर कहा कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तो उन्हें पता नहीं कैसे पता चल गया कि मेरी किडनी में समस्या है और इलाज के लिए मुझे विदेश जाना है. उन्होंने मुझे अपने दफ़्तर में बुलाया और कहा कि वह उन्हें आपको संयुक्त राष्ट्र में न्यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं और उम्मीद है कि इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर आप अपना इलाज करा लेंगे. मैं न्यूयॉर्क गया और आज इसी वजह से मैं जीवित हूं. फिर वाजपेयी बहुत भावविह्वल होकर बोले कि मैं विपक्ष का नेता हूं, तो लोग उम्मीद करते हैं कि में विरोध में ही कुछ बोलूंगा. लेकिन ऐसा मैं नहीं कर सकता. मैं राजीव गांधी के बारे में वही कह सकता हूं, जो उन्होंने मेरे लिए किया.

आज़ाद भारत स्वर्गीय राजीव महत्वपूर्ण योगदान के लिए हमेशा उनका ऋणी रहेगा. कांग्रेस स्वर्गीय राजीव गांधी की पुण्यतिथि 21 मई को ’बलिदान दिवस’ के रूप में मनाती है.

Wednesday, December 12, 2018

अहंकार हार गया और राहुल जीत गए

फ़िरदौस ख़ान 
अहंकार को एक दिन टूटना ही होता है. अहंकार की नियति ही टूटना है. इतिहास गवाह है कि किसी का भी अहंकार कभी ज़्यादा वक़्त तक नहीं रहा. इस अहंकार की वजह से बड़ी-बड़ी सल्तनतें नेस्तनाबूद हो गईं. किसी हुकूमत को बदलते हुए वक़्त नहीं लगता. बस देर होती है अवाम के जागने की. जिस दिन अवाम बेदार हो जाती है, जाग जाती है, उसी दिन से हुक्मरानों के बुरे दिन शुरू हो जाते हैं, उनका ज़वाल (पतन) शुरू हो जाता है. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी यही तो हुआ. यहां अहंकार हार गया और विनम्रता जीत गई. चुनाव नतीजों वाले दिन शाम को हुई प्रेस कॊन्फ़्रेंस में राहुल गांधी ने कहा कि हम किसी को देश से मिटाना नहीं चाहते. हम विचारधारा की लड़ाई लड़ेंगे. मैं मोदी जी का धन्यवाद करता हूं, जिनसे मैंने यह सीखा कि एक पॉलिटिशियन होने के नाते मुझे क्या नहीं कहना या करना चाहिए.

ये राहुल गांधी का धैर्य, विनम्रता और शालीनता ही है कि उन्होंने विपरीत हालात का हिम्मत से मुक़ाबला किया. जब भारतीय जनता पार्टी द्वारा उनके नेतृत्व पर सवाल उठाए गए, चुनावों में नाकामी मिलने पर उनका मज़ाक़ उड़ाया गया, उनके लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया, लेकिन राहुल गांधी ने कभी अपनी तहज़ीब नहीं छोड़ी, अपने संस्कार नहीं छोड़े. उन्होंने अपने विरोधियों के लिए भी कभी अपशब्दों का इस्तेमाल नहीं किया. उन्होंने मिज़ोरम और तेलंगाना में जीतने वाले दलों को मुबारकबाद दी. चुनावों में जीतने वाले सभी उम्मीदवारों को शुभकामनाएं दीं. अहंकार कभी उन पर हावी नहीं हुआ. विधानसभा चुनावों में जीत का श्रेय उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को दिया. उन्होंने कहा कि उनके कार्यकर्ता बब्बर शेर हैं. राहुल गांधी में हार को क़ुबूल करने की हिम्मत भी है. पिछले चुनावों में नाकामी मिलने पर उन्होंने हार का ज़िम्मा ख़ुद लिया. ये सब बातें ही तो हैं, जो उन्हें महान बनाती हैं और ये साबित करती हैं कि उनमें एक महान नेता के सभी गुण मौजूद हैं.


अमूमन देखा जाता है कि जब कोई पार्टी सत्ता में आ जाती है, तो उसे घमंड हो जाता है. राजनेता बेलगाम हो जाते हैं. उन्हें लगता है कि सत्ता उनकी मुट्ठी में है, वे जो चाहें कर सकते हैं. उन्हें टोकने, रोकने वाला कोई नहीं है. साल 2014 के आम चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने जनता से बड़े-बड़े वादे किए थे. उन्हें ख़ूब सब्ज़ बाग़ दिखाए थे, लेकिन सत्ता में आते ही अपने वादों से उलट काम किया. भारतीय जनता पार्टी ने महंगाई कम करने का वादा किया था, लेकिन उसके शासनकाल में महंगाई आसमान छूने लगी. भारतीय जनता पार्टी ने महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों पर रोक लगाने का वादा किया था, लेकिन आए-दिन महिला शोषण के दिल दहला देने वाले मामले सामने आने लगे. भारतीय जनता पार्टी ने किसानों को राहत देने का वादा किया था, लेकिन किसानों के ख़ुदकुशी के मामले थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं. किसानों को अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करने पर मजबूर होना पड़ा. भारतीय जनता पार्टी ने युवाओं को रोज़गार देने का वादा किया था, लेकिन रोज़गार देना तो दूर, नोटबंदी और जीएसटी लागू करके जो उद्योग-धंधे चल रहे थे, उन्हें भी बंद करने का काम किया है. जो लोग काम कर रहे थे, वे भी रोज़ी-रोटी के लिए तरसने लगे. भारतीय जनता पार्टी की सरकार जो भी फ़ैसले ले रही है, उनसे सिर्फ़ बड़े उद्योगपतियों को ही फ़ायदा हो रहा है. ऑक्सफ़ेम सर्वेक्षण के मुताबिक़ पिछले साल यानी 2017 में भारत में सृजित कुल संपदा का 73 फ़ीसद हिस्सा देश की एक फ़ीसद अमीर आबादी के पास है. राहुल गांधी ने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सवाल भी किया था. ग़ौरतलब है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विदेश यात्राओं और उनकी सरकार पर अमीरों के लिए काम करने और उनके कर्ज़ माफ़ करने को लेकर लगातार हमला करते रहे हैं. इतना ही नहीं भारत और फ्रांस सरकार के बीच हुए राफ़ेल लड़ाकू विमान सौदे पर भी राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं.  

दरअसल, एक तरफ़ केन्द्र की मोदी सरकार अमीरों को तमाम सुविधाएं दे रही है, उन्हें करों में छूट दे रही है, उनके कर माफ़ कर रही है, उनके क़र्ज़ माफ़ कर रही है. वहीं दूसरी तरफ़ ग़रीब जनता पर आए दिन नये-नये कर लगाए जा रहे हैं, कभी स्वच्छता के नाम पर, तो कभी जीएसटी के नाम पर उनसे वसूली की जा रही है. खाद्यान्नों और रोज़मर्रा में काम आने वाली चीज़ों के दाम भी लगातार बढ़ाए जा रहे हैं. मरीज़ों के लिए इलाज कराना भी मुश्किल हो गया है. दवाओं यहां तक कि जीवन रक्षक दवाओं और ख़ून के दाम भी बहुत ज़्यादा बढ़ा दिए गए हैं. ऐसे में ग़रीब मरीज़ कैसे अपना इलाज कराएंगे, इसकी सरकार को ज़रा भी फ़िक्र नहीं है. सरकार का सारा ध्यान जनता से कर वसूली पर ही लगा हुआ है. वैसे भी प्रधानमंत्री ख़ुद कह चुके हैं कि उनके ख़ून में व्यापार है.

ऐसे मुश्किल दौर में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अवाम के साथ खड़े हैं. वे लगातार बेरोज़गारी, महंगाई, किसानों की दुर्दशा, महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसक वारदातों और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अलख जगाए हुए हैं. अवाम को भी समझ में आ गया है कि उनसे झूठे वादे करके उन्हें ठगा गया. इसलिए अब जनता उन वादों के बारे में सवाल करने लगी है. जनता पूछने लगी कि कहां हैं, वे अच्छे दिन जिसका इंद्रधनुषी सपना भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें दिखाया था. कहां हैं, वह 15 लाख रुपये, जिन्हें उनके खाते में डालने का वादा किया गया था. कहां है वह विदेशी काला धन, जिसके बारे में वादा किया गया था कि उसके भारत में आने के बाद जनता के हालात सुधर जाएंगे.

अवाम अब जागने लगी है. इसी का नतीजा है कि उसने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी को उखाड़ फेंका और कांग्रेस को हुकूमत सौंप दी. अवाम राहुल गांधी पर यक़ीन करने लगी है. वह समझ चुकी है कि कांग्रेस ही देश की एकता और अखंडता को बनाए रख सकती है. कांग्रेस के राज में ही सब मिलजुल कर चैन-अमन के साथ रह सकते हैं, क्योंकि कांग्रेस विनाश में नहीं, विकास में यक़ीन रखती है. जनता अब बदलाव चाहती है.

Friday, June 22, 2018

सेवा दल को कांग्रेस की तवज्जो मिली

फ़िरदौस ख़ान 
देश में कुछ संगठन ऐसे हैं, जो निस्वार्थ भाव से जन सेवा के काम में जुटे हैं. अखिल भारतीय कांग्रेस सेवा दल भी एक ऐसा ही संगठन है, जो मुश्किल वक़्त में लोगों की मदद करता है. कहीं बाढ़ आए, सूखा पड़े या फिर कोई और मुसीबत आए, संगठन के कार्यकर्ता राहत के कामों में बढ़ चढ़कर शिरकत करते हैं. दरअसल, जंगे-आज़ादी के वक़्त वजूद में आए इस संगठन का मक़सद ही सामाजिक समरसता को बनाए रखना और देश के नवनिर्माण में योगदान देना है. समाज सेवा के साथ-साथ कांग्रेस को मज़बूत करने में भी इसने अपना अहम किरदार अदा किया है.

पिछले कुछ अरसे से कांग्रेस की अनदेखी के शिकार इस संगठन की गतिविधियां फिर से तेज़ हो गई हैं. कांग्रेस ने अब अपने आनुषांगिक संगठन सेवा दल पर तवज्जो देनी शुरू कर दी है. यह संगठन हर महीने के आख़िरी रविवार को देशभर के एक हज़ार क़स्बों, शहरों और महानगरों में ’ध्वज वंदन’ कार्यक्रम करेगा. इन कार्यक्रमों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी आदि के सिद्धांतों और विचारों को जनमानस के सामने रखा जाएगा और उनकी प्रासंगिकता पर चर्चा की जाएगी.

हाल में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने सेवा दल के प्रस्तावों को अपनी मंज़ूरी दी है. उन्होंने सेवा दल के पदाधिकारियों को यक़ीन दिलाया है कि पहले की तरह ही यह संगठन आज़ाद होकर काम करेगा. सेवा दल की कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक में संगठन के पदाधिकारियों ने उनके समक्ष कई प्रस्ताव रखे थे, जिसे उन्होंने मंज़ूर कर लिया.

 सेवा दल के मुख्य संगठक लालजी भाई देसाई का कहना है कि सेवा दल अब पहले की तरह सक्रिय नहीं है. अब तो सेवा दल को कांग्रेस के कार्यक्रमों की ज़िम्मेदारी भी नहीं दी जाती है. मौजूदा हालात को देखते हुए सेवा दल को फिर से खड़ा करने की कोशिश की जा रही है. इसी सिलसिले में कांग्रेस अध्यक्ष के सामने कुछ सुझाव रखे गए.

ग़ौरतलब है कि डॉ. नारायण सुब्बाराव हार्डिकर ने 1 जनवरी, 1924 को आंध्र प्रदेश के काकिनाडा में कांग्रेस सेवा दल की स्थापना की थी. इसके पहले अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू थे. देश को आज़ाद कराने की मुहिम में शामिल कांग्रेस के क़द्दावर नेता इस संगठन से जुड़े हुए थे. सीमाप्रांत और बलूचिस्तान के महान राजनेता ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान के संगठन लाल कुर्ती का विलय भी सेवादल में किया गया था. आज़ादी की मुहिम में सेवा दल के अहम किरदार के मद्देनज़र साल 1931 में इसका आज़ाद वजूद ख़त्म करके इसे कांग्रेस का हिस्सा बना दिया गया. कहा जाता है कि ये फ़ैसला सरदार बल्लभ भाई पटेल की सिफ़ारिश पर किया गया था. उन्हें डर था कि सेवा दल कहीं अपने मातृ संगठन कांग्रेस को ही ख़त्म न कर दे. अपनी इस आशंका का ज़िक्र करते हुए उन्होंने महात्मा गांधी से कहा था कि ‘अगर सेवादल को आज़ाद छोड़ दिया गया, तो वह हम सबको लील जाएगा.’
पहले इसे हिन्दुस्तानी सेवा दल के नाम से जाना जाता था, बाद इसे कांग्रेस सेवा दल का नाम दिया. दरअसल, कांग्रेसियों ने महिला सेना का गठन किया था. इस पर कार्रवाई करते हुए साल 1932 में बिटिश शासकों ने सेवा दल पर पाबंदी लगा दी थी, बाद में कांग्रेस से तो पाबंदी हटा ली गई, लेकिन हिन्दुस्तानी सेवा दल पर पाबंदी जारी रही. बाद में यह संगठन कांग्रेस सेवा दल के नाम से वजूद में आया.

क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि देश को आज़ादी मिलने के बाद कांग्रेस हुकूमत में आ गई. कांग्रेस का सारा ध्यान सत्ता संभालने में लग गया. कांग्रेस के कई नये आनुषांगिक संगठन वजूद में आते गए और बदलते वक़्त के साथ-साथ सेवा दल की अनदेखी होने लगी. सेवा दल के कार्यकर्ताओं को मलाल है कि उन्हें महज़ रवायती बना दिया गया. कांग्रेस के समारोहों में उनकी ज़िम्मेदारी वर्दी पहनकर इंतज़ामों की देखरेख की रह गई.  जिस मक़सद से सेवा दल का गठन किया गया था, वह कहीं पीछे छूटने लगा. लेकिन इस सबके बावजूद सेवा दल के कार्यकर्ता अपने काम में लगे रहे. वे सामाजिक कार्यों में पहले की तरह ही बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते रहे, चाहे प्राकृतिक आपदाओं में पीडि़तों की मदद करनी हो या फिर महाकुंभ जैसे धार्मिक आयोजनों और महोत्सवों में श्रद्धालुओं के रहने और भोजन का इंतज़ाम करना हो. हर जगह इनकी मौजूदगी नज़र आती है.  

कांग्रेस के अग्रिम संगठनों में सेवा दल का अनुशासन और निष्ठा इसे और भी ख़ास बनाती है. बिल्कुल फ़ौज की तरह इसका संचालन किया जाता है. एक दौर वह भी था जब सेवा दल में प्रशिक्षण लेने के बाद ही किसी को कांग्रेस में शामिल किया जाता था. कहा जाता है कि इंदिरा गांधी ने अपने बेटे राजीव गांधी को कांग्रेस में शामिल करने से पहले सेवा दल का प्रशिक्षण दिलाया था, ताकि वे पार्टी की नीतियों को बेहतर तरीक़े से समझ पाएं. निस्वार्थ सेवा और सहयोग भाव की वजह से ही सेवा दल को कांग्रेस का सच्चा सिपाही कहा जाता है.

फ़िलवक़्त देश के 700 ज़िलों और शहरों में सेवा दल की इकाइयां हैं. सेवा दल की एक युवा इकाई शुरू करने की योजना है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा युवाओं को इससे जोड़ा जा सके. आज जब कांग्रेस अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाने और पार्टी को हुकूमत में लाने के लिए जद्दोजहद कर रही है, ऐसे में सेवा दल कांग्रेस के लिए बहुत मददगार साबित हो सकता है, बस इस पर ख़ास तवज्जो देने की ज़रूरत है. देश में फैले अराजकता और अविश्वास के माहौल को देखते हुए भी सेवा दल जैसे संगठनों की बेहद ज़रूरत है, जो सांप्रदायिक सौहार्द्र, सामाजिक समरसता और आपसी भाईचारे को बढ़ावा देने का काम करते हैं.

Thursday, May 31, 2018

जनता बेहाल, सरकार मालामाल

फ़िरदौस ख़ान 
केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने 26 मई को चार साल पूरे कर लिए हैं. इन चार सालों को लेकर भारतीय जनता पार्टी के नेता और सरकार अपनी कामयाबी के कितने ही दावे कर लें, लेकिन हक़ीक़त यही है कि हर मोर्चे पर केंद्र सरकार नाकारा ही साबित हुई है. हालत यह है कि आम आदमी को इंसाफ़ मिलने की बात तो दूर, ख़ुद सर्वोच्च न्यायालय के चार जजों को इंसाफ़ के लिए जनता के बीच आना पड़ा. अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए सरकार ने हमेशा ग़ैर ज़रूरी मुद्दों को हवा दी है.  अवाम ने शिक्षा की बात की, तो शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की बजाय जेएनयू और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में विवाद पैदा किए गए. अवाम ने रोज़गार मांगा, तो नोटबंदी कर उन्हें बैंक के सामने क़तारों में दिन-रात खड़ा रहने पर मजबूर कर दिया गया. स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें, तो गोरखपुर के मृत बच्चों की लाशें सामने आ जाती हैं. ऒक्सीज़न की कमी से किस तरह वे तड़प-तड़प कर मौत की आग़ोश में चले गए. दरअसल, मुट्ठीभर अमीरों को छोड़कर देश की अवाम का बुरा हाल है. आलम ये है कि तीज-त्यौहारों के दिनों में भी लोगों के पास काम नहीं हैं. बाज़ार में भी मंदी छाई हुई है. दुकानदार दिन भर ग्राहकों का इंतज़ार करते है, लेकिन जब लोगों के पैसे होंगे, तभी तो वे कुछ ख़रीद पाएंगे. बड़े उद्योगपतियों को छोड़कर बाक़ी छोटे काम-धंधे करने वालों के काम ठप्प होकर रह गए हैं. बेरोज़गारी कम होने की बजाय दिनोदिन बढ़ रही है.

देश की अवाम त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही है और ऐसे में केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी के नेता अपने चार साल के शासनकाल की उपलब्धियां गिनाते नहीं थक रहे हैं. बेशक इन चार सालों में केंद्र सरकार का काफ़ी भला हुआ है. उसके ख़ज़ाने लगातार भर रहे हैं. पेट्रोल पर भारी एक्साइज़ ड्यूटी से केंद्र को भारी मुनाफ़ा हुआ है. पिछले चार साल के दौरान इससे सरकार को 150 गुना ज़्यादा राजस्व मिला है. ग़ौरतलब है कि पिछली कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार की एक्साइज़ ड्यूटी में मोदी सरकार 126 फ़ीसद बढोतरी कर चुकी है. पेट्रोल पर जहां केंद्र और राज्य सरकारें मालामाल होती हैं, वहीं उपभोक्ताओं को भारी नुक़सान होता है. केंद्र सरकार  पेट्रोल पर एक्साइज़ ड्यूटी लगाती है और राज्य सरकार अपने स्तर से वैट और बिक्री कर लगाती हैं, जिससे इसकी क़ीमत बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है. पिछले साल मार्च में पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने लोकसभा में बताया था कि एक अप्रैल 2014 को मोदी सरकार से पहले पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 9.48 रुपये और डीजल पर 3.56 रुपये थी. महज़ दो साल में एनडीए सरकार ने एक्साइज टैक्स में 126 फ़ीसद का इज़ाफ़ा किया, जिससे एक्साइज ड्यूटी बढ़कर 21.48 रुपये हो गई. डीज़ल पर भी एक्साइज टैक्स की दर ज़्यादा रही. मार्च 2016 तक डीजल पर चार बार एक्साइज़ ड्यूटी में बढ़ोतरी की गई, जिससे 3.56 से बढ़कर टैक्स 17.33 रुपये हो गया. इस दौरान मोदी सरकार ने 144 फ़ीसद ज़्यादा कमाई की. मोदी सरकार ने वित्तीय वर्ष 2014-5 में सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी से 99.184  लाख करोड़, स्टेट वैट और सेल्स टैक्स से 137.157 लाख करोड़, साल 2015-16 में 178.591 और 142.848 और साल 2016-17 में 242.691 और 166.378 लाख करोड़ रुपये वसूले. यानी इससे सरकार जितना ज़्यादा फ़ायदा हुआ, जनता को उतना ही नुक़सान उठाना पड़ा.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी सरकार को तेल के दाम कम करने का चैलेंज देते हुए कहा था कि तेल की क़ीमते कम कीजिए, वरना हम आपको मजबूर कर देंगे. इसके बाद केंद्र सरकार ने डीज़ल और पेट्रोल की क़ीमत में एक पैसे की कमी कर दी. इस पर राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर तंज़ करते हुए कहा है कि आपने पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में एक पैसे की कटौती की है. एक पैसा!!  अगर ये आपका मज़ाक़ करने का तरीक़ा है, तो ये बचकाना और बेहद घटिया है. एक पैसे की कटौती मेरे द्वारा दिया गए फ्युएल चैलेंज का वाजिब जवाब नहीं है.

भारतीय जनता पार्टी  सरकार के शासनकाल में घोटाले भी ख़ूब हुए हैं. सूचना के अधिकार के तहत भारतीय रिज़र्व बैंक से मांगी गई एक जानकारी के मुताबिक़ साल 2014-2015 से 2017-2018 के बीच देश के अलग-अलग बैंकों से 19000 से ज़्यादा धोखाधड़ी के मामले सामने आए हैं, जिनमें 90 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा का घोटाला हुआ है. अप्रैल, 2017 से मार्च, 2018 के बीच बैंक धोखाधड़ी के 5152 मामले दर किए गए, जिनमें 28,459 करोड़ रुपये शामिल हैं.  इससे पहले साल 2016-17 में 5076 बैंक घोटाले हुए, जिनमें 23,933 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी हुई. ग़ौरतलब है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय जैसी कई केंद्रीय जांच एजेंसियां उद्योगपतियों द्वारा किए गए धोखाधड़ी के मामलों की तफ़्तीश कर रही हैं. इनमें नीरव मोदी और मेहुल चोकसी द्वारा किया गया 12 सौ करोड़ से ज़्यादा का पंजाब नेशनल बैंक घोटाला भी शामिल है.

भले ही भारतीय जनता पार्टी जश्न मना रही है, लेकिन विपक्षी दल इसे विश्वासघात के तौर पर देख रहे हैं, वहीं अवाम भी सरकार से हिसाब मांगने लगी है. मोदी सरकार के चार साल पूरे होने पर कांग्रेस ने एक पोस्‍टर जारी किया है. कांग्रेस के राष्‍ट्रीय महासचिव अशोक गहलोत का कहना है कि मोदी सरकार के चार साल जनता से विश्वासघात जैसा है. उन्होंने कहा कि आम आदमी का भरोसा सरकार से उठ चुका है. वामदलों ने भी सरकार पर जनता से विश्वासघात करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि देश के सभी तबक़े सरकार से परेशान हैं.

क़ाबिले-ग़ौर है कि पिछले चार सालों में देश की हालत बद से बदतर हुई है. देश में मज़हब और जाति के नाम पर वैमन्य बढ़ा है, लोगों में अविश्वास बढ़ा है. उनका चैन-अमन प्रभावित हुआ है. उनकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी मुतासिर हुई है. दादरी के अख़्लाक हत्याकांड से समाज में कटुता बढ़ी, जबकि आरक्षण को लेकर चले आंदोलन की वजह से जातिगत वैमन्य बढ़ोतरी हुई है. बढ़ती महंगाई ने लोगों का जीना दुश्वार कर दिया है. तीज-त्यौहारों के रंग फीके पड़ गए हैं, क्योंकि बेरोज़गारी और महंगाई की वजह से लोग ज़रूरत का पूरा सामान तक ख़रीद नहीं पा रहे हैं.

अब जब इस सरकार को चार साल पूरे हो गए हैं, तो ऐसे में लोग उन वादों के बारे में सवाल करने लगे हैं, जो भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता में आने से पहले जनता से किए थे.  तब लोगों को लगा था कि देश में ऐसा शासन आएगा, जिसमें सब मालामाल हो जाएंगे, मगर जब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन गई और महंगाई ने अपना रंग दिखाना शुरू किया, तो लोगों को लगा कि इससे तो पहले ही वे सुख से ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे. ऐसा नहीं है कि अच्छे दिन नहीं आए हैं, अच्छे दिन आए हैं, लेकिन मुट्ठी भर अमीरों के लिए. बहरहाल, प्रधानमंत्री ने उन चुनावी वादों को चुनावी जुमले कहकर टाल चुके हैं, लेकिन जनता टालने के मूड में बिल्कुल नहीं है. 

Thursday, May 17, 2018

सियासत का मौसम बदला-बदला है...

फ़िरदौस ख़ान
सियासत का मौसम कब बदल जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता. ये सियासत की ही ज़मीन है, जो सावन में भी ख़ुश्क रह जाए और सूखे में भी बिन बादल भीग जाए. कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को ही लें. कर्नाटक में पहली बार उन्होंने ख़ुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताकर सबको चौंका दिया है. चौंका इसलिए दिया है, क्योंकि सियासी गलियारे में अभी तक यही माना जा रहा था कि अगर 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस जीत हासिल करती है, तो वे अपने किसी क़रीबी और विश्वसनीय व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाना चाहेंगे. वे ख़ुद अपनी मां सोनिया गांधी की तरह पार्टी संगठन का ही काम देखेंगे और सरकार पर नज़र रखेंगे.  लेकिन राहुल गांधी के एक बयान ने सियासी माहौल को गरमा दिया है.

प्रधानमंत्री बनने के सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, मैं क्यों पीएम नहीं बनूंगा, अगर 2019 का चुनाव जीते तो ज़रूर पीएम बन सकता हूं. अपने इस बयान से उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुली चुनौती दी है कि वे मुक़ाबले के लिए तैयार हैं. ये राहुल गांधी का हौसला और आत्मविश्वास ही है कि पिछले कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में हारने और सत्ता गंवाने के बाद फिर से संघर्ष के लिए खड़े हो जाते हैं. वे जानते हैं कि सियासत में कभी मौसम एक जैसा नहीं रहता. यहां कुछ भी स्थाई नहीं है. सत्ता कब किसके हाथ में आ जाए, कब किसके हाथ से फिसल जाए, कोई नहीं जानता.  वे जानते हैं कि जीत और हार, धूप और छांव की तरह हैं. और वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता. ये हर पल बदलता रहता है. वक़्त कभी उनके साथ रहा है, तो आज उनके विरोधियों के साथ है. कांग्रेस आज भले ही गर्दिश में है, लेकिन उसने कभी अपनी विचारधारा से अपने उसूलों के साथ समझौता नहीं किया. इसीलिए कांग्रेस आज भी इस देश की माटी में रची-बसी है. अवाम का मिज़ाज हमेशा कांग्रेस के साथ रहा है और आगे भी रहेगा. कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी है, जिसे हर कोई अपनी पार्टी मानता है. कांग्रेस जनमानस की पार्टी रही है. कांग्रेस ने हमेशा इस देश की आत्मा और अपनी अनमोल व समृद्ध विरासत का प्रतिनिधित्व किया है. महात्मा गांधी ने कांग्रेस के बारे में कहा है, "कांग्रेस इस देश में रहने वाले सभी भारतीयों की है, चाहे वे हिन्दू हों, मुसलमान हों, ईसाई, सिख या पारसी हों." कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी कहते हैं, "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है." यही कांग्रेस की ख़ासियत है.

कांग्रेस हमेशा जनमानस का सहारा बनी और मुश्किल वक़्त में अवाम को हिम्मत दी. किसी भी देश की तरक़्क़ी के लिए, अवाम की ख़ुशहाली के लिए चैन-अमन सबसे ज़रूरी है. पिछले कुछ बरसों में देश में जो नफ़रत और ग़ैर यक़ीनी का माहौल बना है, उस ख़ौफ़ के माहौल में राहुल गांधी ने अवाम को यक़ीन दिलाया है कि वे उसकी हिफ़ाज़त करेंगे. वे उन लोगों की हिफ़ाज़त करने का भी वादा करते हैं, जो हमेशा उनके ख़िलाफ़ रहते हैं, उनके ख़िलाफ़ दुष्प्रचार करते हैं. ऐसा राहुल गांधी ही कर सकते हैं, क्योंकि वे उस विरासत से ताल्लुक़ रखते हैं, जिसने देश की गरिमा को बढ़ाया. बेशक, कांग्रेस का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है. वे कांग्रेस के नेताओं ने इस देश के लिए अपना जान तक क़ुर्बान कर दी. देश को ग़ुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद कराने में महात्मा गांधी के योगदान को भला कौन भुल पाएगा. उन्होंने अपनी सारी ज़िन्दगी देश के नाम कर दी.  देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत के निर्माताओं में अग्रणी रहे हैं. श्रीमती इंदिरा गांधी ने भारत को विश्व पटल पर चमकाया. श्री राजीव गांधी ने देश को, देश के युवाओं को नई राह दी, जिसकी बदौलत आज देश उन्नति के शिखर तक पहुंचा है. श्रीमती सोनिया गांधी ने भी देश के लिए बहुत कुछ किया है और आज भी कर रही हैं. जब भी देश और पार्टी पर कोई संकट आया, श्रीमती सोनिया गांधी आगे आईं.

क़ाबिले-ग़ौर है कि राहुल गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद श्रीमती सोनिया गांधी ने ख़्वाहिश ज़ाहिर की थी कि वे अब आराम करना चाहती हैं. माना जा रहा था कि वे अब सियासत से दूरी बना लेंगी. उन्होंने ऐसा किया भी. उन्होंने कुछ अरसे के लिए सियासी सरगर्मियों से फ़ासला रखा, लेकिन कांग्रेस को संकट में देख उन्होंने सियासत में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है. कर्नाटक में उन्होंने चुनावी रैलियां करते हुए केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार से चार साल का हिसाब मांगा. उन्होंने  बीजापुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज़ करते हुए कहा कि मोदी जी अच्छा भाषण देते हैं, एक अभिनेता की तरह भाषण देते हैं. लेकिन केवल भाषण से लोगों का पेट नहीं भर सकता, लोगों का कल्याण नहीं हो सकता है. अगर भाषण से पेट भरता, तो मेरी प्रार्थना है कि वह और भी अच्छा भाषण दें.

सोनिया गांधी चुनावी मुहिम में इसीलिए उतरी हैं, ताकि कांग्रेस को मज़बूत बना सकें. एक वक़्त वह था, जब वे न तो खुद सियासत में आना चाहती थीं और न ही अपने बच्चों को इसमें शामिल होने देना चाहती थीं. लेकिन वक़्त जो न कराए, कम है. राहुल गांधी की भी सियासत में इतनी गहरी दिलचस्पी नहीं थी. वह सत्ता के पीछे भी नहीं भागे. एक वह वक़्त था, जब देश में उनकी पार्टी की सरकार थी, तब उनके समर्थक चाहते थे कि वह सरकार में कोई अहम ओहदा लें, कोई मंत्रालय संभालें, लेकिन उन्होंने बता दिया कि वे सरकार में कोई किरदार निभाने की बजाय पार्टी संगठन में काम करना पसंद करते हैं, इसलिए उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री का ओहदा लेने से साफ़ इंकार कर दिया था.

मगर आज हालात जुदा हैं. राहुल गांधी ने ख़ुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार, तो बता दिया है. क्या उनके सहयोगी दल इस पर राज़ी होंगे? उनके सहयोगी दलों के कई नेता न जाने कब से प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोये बैठे हैं.
क्या राहुल गांधी ने बहुत-सोच-समझकर ये ऐलान किया है? सवाल कई हैं, लेकिन जवाब आने वाले वक़्त की तह में छुपे हैं. बहरहाल, कांग्रेसी ख़ासकर राहुल गांधी के चाहने वाले उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में ही देखना चाहते हैं.

Friday, May 4, 2018

कांग्रेस को अवाम की आवाज़ बनना होगा

फ़िरदौस ख़ान
एक ख़ुशहाल देश की पहचान यही है कि उसमें रहने वाले हर व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान हो, उसे बुनियादी ज़रूरत की सभी चीज़ें, सभी सुविधाएं मुहैया हों. जब व्यक्ति ख़ुशहाल होगा, तो परिवार ख़ुशहाल होगा, परिवार ख़ुशहाल होगा, तो समाज ख़ुशहाल होगा. एक ख़ुशहाल समाज ही आने वाली पीढ़ियों को बेहतर समाज, बेहतर परिवेश दे सकता है. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सर्वोदय समाज का सपना देखा था और वे इसे साकार करना चाहते थे. गांधीजी कहते हैं- "समाजवाद का प्रारंभ पहले समाजवादी से होता है. अगर एक भी ऐसा समाजवादी हो, तो उस पर शून्य बढ़ाए जा सकते हैं. हर शून्य से उसकी क़ीमत दस गुना बढ़ जाएगी, लेकिन अगर पहला अंक शून्य हो, तो उसके आगे कितने ही शून्य बढ़ाए जाएं, उसकी क़ीमत फिर भी शून्य ही रहेगी." भूदान आन्दोलन के जनक विनोबा भावे के शब्दों में, सर्वोदय का अर्थ है- सर्वसेवा के माध्यम से समस्त प्राणियो की उन्नति. आज देश को इसी सर्वोदय समाज की ज़रूरत है.

पिछले कुछ बरसों देश एक ऐसे दौर से गुज़र रहा है, जहां सिर्फ़ मुट्ठीभर लोगों का ही भला हो रहा है. बाक़ी जनता की हालत बद से बदतर होती जा रही है. लोगों के काम-धंधे तो पहले ही बर्बाद हो चुके हैं. बढ़ती महंगाई की मार भी लोग झेल ही रहे हैं. ऐसे में अपराधों की बढ़ती वारदातों ने डर का माहौल पैदा कर दिया है. हालत ये है कि चंद महीने की मासूम बच्चियां भी दरिन्दों का शिकार बन रही हैं. क़ानून-व्यवस्था की हालत भी कुछ ऐसी है कि शिकायत करने वाले मज़लूम की हिरासत में मौत तक हो जाती है और आरोपी खुले घूमते रहते हैं. ऐसे में जनता का शासन-प्रशासन से यक़ीन उठने लगा है. बीते मार्च माह में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आरोपी की फ़ौरन गिरफ़्तारी पर रोक लगाने के आदेश के बाद से इन तबक़ों में खौफ़ पैदा हो गया है. उन्हें लगता है कि पहले ही उनके साथ अमानवीय व्यवहार के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं, ऐसे में उन पर दबंगों का ज़ुल्म और ज़्यादा बढ़ जाएगा. अपने अधिकारों के लिए उन्हें सड़क पर उतरना पड़ा. क़ाबिले-गौर है कि देश में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की आबादी तक़रीबन 20 करोड़ है. लोकसभा में इन तबक़ों के 131 सदस्य हैं. हैरानी की बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी में 67 सांसद इसी तबक़े से होने के बावजूद दलितों के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों पर कोई आवाज़ सुनाई नहीं दे रही है. चंद सांसदों के बयान सामने आए, लेकिन जो विरोध होना चाहिए था, वह दिखाई नहीं पड़ा. ग़ौरतलब है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक़, हर 15 मिनट में एक दलित के साथ अपराध होता है. रोज़ाना छह दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है. ये तो सिर्फ़ सरकारी आंकड़े हैं, और उन मामलों के हैं, जो दर्ज हो जाते हैं. जो मामले दर्ज नहीं कराए जाते, या दर्ज नहीं हो पाते, उनकी तादाद कितनी हो सकती है, इसका अंदाज़ा लगाना कोई मुश्किल नहीं है.

बुरे हालात में कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल दलितों के समर्थन में सामने आए. कांग्रेस ने दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में संविधान बचाओ रैली का आयोजन करके जहां भाजपा सरकार को ये चेतावनी दी कि अब और ज़ुल्म बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, वहीं दलितों को भी ये यक़ीन दिलाने की कोशिश की गई कि वे अकेले नहीं हैं. कांग्रेस हमेशा उनके साथ है. रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि  दलितों के ख़िलाफ़ अत्याचार बढ़ रहा है. मोदी के दिल में दलितों के लिए कोई जगह नहीं है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस दलितों, ग़रीबों, किसानों औऱ देश के सभी कमज़ोर तबक़ों की रक्षा के लिए हमेशा लड़ती रहेगी. कांग्रेस ने सत्तर साल में देश की गरिमा बनाई और पिछले चार साल में मोदी सरकार ने इसे धूमिल कर दिया, इसे चोट पहुंचाई. उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने देश को संविधान दिया और ये संविधान दलितों, ग़रीबों और महिलाओं की रक्षा करता है. आज सर्वोच्च न्यायालय को कुचला और दबाया जा रहा है, पहली बार ऐसा हुआ है कि चार जज हिन्दुस्तान की जनता से इंसाफ़ मांग रहे हैं. उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग इस संविधान को कभी नहीं छू पाएंगे, क्योंकि हम ऐसा होने नहीं देंगे. उन्होंने कहा कि आज जनता बेहाल है. देश के प्रधानमंत्री सिर्फ़ अपने मन की बात सुनते हैं. वह किसी को बोलना देना नहीं चाहते. वे कहते हैं कि सिर्फ़ मेरे मन की बात सुनो. मैं कहता हूं कि 2019 के चुनाव में देश की जनता मोदीजी को अपने मन की बात बताएगी.

दरअसल, आपराधिक मामलों में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के नाम सामने आने की वजह से भी अवाम का भाजपा सरकार से यक़ीन ख़त्म हो चला है. भाजपा नेताओं के अश्लील और विवादित बयान भी इस पार्टी के चाल, चरित्र और चेहरे को सामने लाते रहते हैं. ये बेहद अफ़सोस की बात है कि केंद्र सरकार में ज़िम्मेदार पदों पर बैठे लोग पूरी तरह से संवेदनहीन रवैया अपनाये हुए हैं. इसी ही वारदातों की तरफ़ इशारा करते हुए राहुल गांधी ने तंज़ किया, मोदी जी अब नया नारा देंगे- "बेटी बचाओ, बीजेपी के लोगों से बचाओ."

बहरहाल, आज देश को ऐसे रहनुमाओं की ज़रूरत है, जो बिना किसी भेदभाव के अवाम के लिए काम करें. जनता को इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि देश में किस सियासी दल का शासन है, उसे तो बस चैन-अमन चाहिए, बुनियादी सुविधाएं चाहिएं, ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए अच्छा माहौल चाहिए. अवाम की ये ज़रूरतें वही सियासी दल पूरी कर सकते हैं, जो पूर्वाग्रह से ग्रस्त न हों. इसमें कोई दो राय नहीं है कि कांग्रेस ने इस देश के लिए बहुत कुछ किया है. आज भी अवाम को कांग्रेस से बहुत उम्मीदें हैं. राहुल गांधी की ज़िम्मेदारी है कि वे विपक्ष में होने के नाते, एक सियासी दल के अध्यक्ष होने के नाते, जनता को ये यक़ीन दिलाते रहें कि वे हमेशा उसके साथ हैं. महात्मा गांधी के सर्वोदय के सिद्धांत पर अमल करते हुए देश और समाज के लिए काम करना भी उनकी ज़िम्मेदारियों में शामिल हैं. आज जनता को ऐसे नेता की ज़रूरत है, जो उनकी आवाज़ बन सके. कांग्रेस इसमें कितना कामयाब हो पाती है, ये आने वाला वक़्त ही बताएगा. 

Friday, April 20, 2018

आंदोलन और सरकार की नाकामी

फ़िरदौस ख़ान
जनतंत्र में, लोकतंत्र में जनता को ये अधिकार होता है कि वे अपनी मांगों के समर्थन में, अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलन कर सकती है,  सरकार की ग़लत नीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकती है. लेकिन आंदोलन के दौरान, प्रदर्शन के दौरान हिंसा करने की इजाज़त किसी को भी नहीं दी जा सकती. सरकार को भी ये अधिकार नहीं है कि वे शांति से किए जा रहे आंदोलन को कुचलने के लिए किसी भी तरह के बल का इस्तेमाल करे. बल्कि सरकार की ये ज़िम्मेदारी होती है कि वह आंदोलन कर रहे प्रदर्शनकारियों को सुरक्षा मुहैया कराए. इस बात का ख़्याल रखे कि कहीं इस आंदोलन की आड़ में असामाजिक तत्व कोई हंगामा खड़ा न कर दें. अगर आंदोलन में किसी भी तरह की हिंसा होती है, तो उस पर क़ाबू पाना, उसे रोकना भी सरकार की ही ज़िम्मेदारी है. लेकिन केंद्र की  बहुमत वाली भारतीय जनता पार्टी की मज़बूत सरकार इस मामले में बेहद कमज़ोर साबित हो रही है.

हाल में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम पर सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को लेकर पहले दलितों ने भारत बंद किया था. उसके बाद सर्वणों ने आरक्षण के ख़िलाफ़ जवाबी आंदोलन शुरू कर दिया. ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के दुरुपयोग पर चिंता ज़ाहिर करते हुए गिरफ़्तारी और आपराधिक मामला दर्ज किए जाने पर रोक लगा दी थी. क़ाबिले-ग़ौर है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव को ख़त्म करने और उन्हें इंसाफ़ दिलाने के लिए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम लाया गया था. संसद द्वारा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम को 11 सितम्बर, 1989 को पारित किया था. इसे 30 जनवरी, 1990 से जम्मू कश्मीर को छोड़कर पूरे में लागू किया गया. यह अधिनियम उस हर व्यक्ति पर लागू होता हैं, जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं हैं और वह इस तबक़े के सदस्यों का उत्पीड़न करता हैं. इस अधिनियम में पांच अध्याय और 23 धाराएं शामिल हैं.  इस क़ानून के तहत किए गए अपराध ग़ैर- ज़मानती, संज्ञेय और अशमनीय हैं. यह क़ानून अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोगों पर अत्याचार करने वालों को सज़ा देता है. यह पीड़ितों को विशेष सुरक्षा और अधिकार देता है और मामलों के जल्द निपटारे के लिए अदालतों को स्थापित करता है. इस क़ानून के तहत भारतीय दंड संहिता में शामिल क़ानूनों में ज़्यादा सज़ा दिए जाने का प्रावधान है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों पर होने वाले अमानवीय और अपमानजनक बर्ताव को अपराध माना गया है.  इनमें उन्हें जबरन अखाद्य पदार्थ मल, मूत्र इत्यादि खिलाने, उनका सामाजिक बहिष्कार करने जैसे कृत्य अपराध की श्रेणी में शामिल किए गए हैं. अगर कोई व्यक्ति किसी अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के सदस्य से कारोबार करने से इनकार करता है, तो इसे आर्थिक बहिष्कार माना जाएगा.  इसमें किसी अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के सदस्य के साथ काम करने या उसे काम पर रखने/नौकरी देने से इनकार करना, इस तबक़े के लोगों को सेवा प्रदान न करना या उन्हें सेवा प्रदान नहीं करने देना आदि इसमें शामिल हैं.

लेकिन सर्वोच्च न्यालाय के फ़ैसले से दलितों पर अत्याचार करने वाले लोगों की गिरफ़्तारी बेहद मुश्किल हो जाएगी, क्योंकि सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की गिरफ़्तारी के लिए उसके नियोक्ता की मज़ूरी लेना ज़रूरी है. अगर दोषी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी नहीं है,  तो एसएसपी स्तर के पुलिस अधिकारी की सहमति के बाद ही उसकी गिरफ़्तारी हो सकेगी. इतना ही नहीं, अदालत ने अग्रिम ज़मानत का भी प्रावधान कर दिया है और एफ़आईआर दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच को भी ज़रूरी कर दिया है. यानी दलितों पर अत्याचार के मामले में आरोपी की गिरफ़्तारी और उन पर कोई मामला दर्ज करना बहुत ही मुश्किल हो जाएगा. ऐसी हालत में दलितों पर अत्याचार के मामलों में इज़ाफ़ा होगा, इसमें कोई दो राय नहीं है. सख़्त क़ानून होने के बावजूद आए दिन देश के किसी न किसी हिस्से से दलितों के साथ अमानवीय बर्ताव करने के मामले सामने आते रहते हैं. अब जब क़ानून ही कमज़ोर हो जाएगा, तो हालात बद से बदतर होने में देर नहीं लगेगी.  

ये भी बेहद अफ़सोस की बात है कि आंदोलन न सिर्फ़ उग्र रूप धारण कर रहे हैं, बल्कि अमानवीयता की भी सारी हदें पार कर रहे हैं. बंद के दौरान कई जगह हिंसा की वारदातें हुईं. आगज़नी हुई, दुकानें जलाई गईं, वाहन फूंके गए, फ़ायरिंग हुई. लोग ज़ख़्मी हुए, कई लोगों की जानें चली गईं.  मरने वालों में पुलिस वाले भी शामिल थे, जो अपनी ड्यूटी कर रहे थे. जगह-जगह रेलें रोकी गईं, पटरियां उखाड़ दी गईं.  चक्का जाम किया गया. रास्ते बंद कर दिए गए. किसी को इस बात का ख़्याल भी नहीं आया कि बच्चे स्कूल से कैसे सही-सलामत घर लौटेंगे ? जो लोग सफ़र में हैं, वे कैसे अपने घरों को लौटेंगे या गंतव्य तक पहुंचेंगे? इस झुलसती गरमी में रेलों में बैठे यात्री बेहाल हो गए. बच्चे भूख-प्यास से बिलखते रहे. जो लोग बीमार थे, अस्पताल तक नहीं पहुंच पाए. अमानवीयता की हद ये रही कि बिहार के हाजीपुर में एंबुलस में बैठी महिला अपने बीमार बच्चे की ज़िन्दगी का वास्ता देती रही, प्रदर्शनकारियों के आगे हाथ जोड़ती रही, मिन्नतें करती रही, लेकिन किसी को उस पर तरस नहीं आया. किसी ने एंबुलेंस को रास्ता नहीं दिया, नतीजतन इलाज के अभाव में एक बच्चे की मौत हो गई, एक मां की गोद सूनी हो गई.

देश में बंद के दौरान हालात इतने ख़राब हो गए कि सेना बुलानी पड़ी. कई जगह कर्फ़्यू लगाया गया, जिससे रोज़मर्राह की ज़िन्दगी बुरी तरह मुतासिर हुई. आंदोलन के दौरान न सिर्फ़ सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाया गया, बल्कि निजी संपत्तियों को भी नुक़सान पहुंचाया गया. आंदोलनकारी जिस सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाते हैं, वे जनता की अपनी संपत्ति है. ये संपत्ति जनता से लिए गए कई तरह के करों से ही बनाई जाती है. यानी इसमें जनता की ख़ून-पसीने की कमाई शामिल होती है. सरकार इस नुक़सान को पूरा करने के लिए जनता पर करों का बोझ और बढ़ा देती है. जिन लोगों की निजी संपत्ति को नुक़सान पहुंचता है, वे ताउम्र उसकी भरपाई करने में गुज़ार देते हैं. आबाद लोग बर्बाद हो जाते हैं. ये सच है कि कोई भी आंदोलन एक न एक दिन ख़त्म हो ही जाता है.  उस आंदोलन से हुई माली नुक़सान की भरपाई भी कुछ बरसों में हो ही जाती है, लेकिन किसी की जान चली जाए, तो उसकी भरपाई कभी नहीं हो पाती.

दरअसल, देश में किसी भी तरह की हिंसा के लिए सरकार की सीधी जवाबदेही बनती है. देश में चैन-अमन क़ायम रखना, जनमानस को सुरक्षित रखना, उनके जान-माल की सुरक्षा करना सरकार की ही ज़िम्मेदारी है. सरकार के पास पुलिस है, सेना है, ताक़त है, इसके बावजूद अगर हिंसा होती है, तो इसे सरकार की नाकामी ही माना जाएगा. शासन और प्रशासन दोनों ही इस मामले में नाकारा साबित हुए हैं. केंद्र सरकार न तो दलितों के अधिकारों की रक्षा कर पा रही है और न ही क़ानून व्यवस्था को सही तरीक़े से लागू कर पा रही है. ऐसी हालत में जनता किसे पुकारे?

Saturday, April 14, 2018

देश को मज़बूत विपक्ष चाहिए

फ़िरदौस ख़ान
किसी भी देश के लिए सिर्फ़ सरकार का मज़बूत होना ही काफ़ी नहीं होता.  देश की ख़ुशहाली के लिए, उसकी तरक़्क़ी के लिए एक मज़बूत विपक्ष की भी ज़रूरत होती है. ये विपक्ष ही होता है, जो सरकार को तानाशाह होने से रोकता है, सरकार को जनविरोधी फ़ैसले लेने से रोकता है. सरकार के हर जन विरोधी क़दम का जमकर विरोध करता है. अगर सदन के अंदर उसकी सुनवाई नहीं होती है, तो वह सड़क पर विरोध ज़ाहिर करता है. जब सरकार में शामिल अवाम के नुमाइंदे सत्ता के मद में चूर हो जाते हैं और उन लोगों की अनदेखी करने लगते हैं, जिन्होंने उन्हें सत्ता की कुर्सी पर बिठाया है, तो उस वक़्त ये विपक्ष ही तो होता है, जो अवाम का प्रतिनिधित्व करता है. अवाम की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाता है. आज देश की यही हालत है. भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार तानाशाही रवैया अख़्तियार किए हुए. सत्ता में आने के बाद जिस तरह से कथित जन विरोधी फ़ैसले लिए गए, उससे अवाम की हालत दिनोदिन बद से बदतर होती जा रही है. यह फ़ैसला नोटबंदी का हो या जीएसटी का, बिजली और रसोई गैस की क़ीमतें बढ़ाने का हो या फिर बात-बात पर कर वसूली का. इस सबने अवाम को महंगाई के बोझ तले इतना दबा दिया है कि अब उसका दम घुटने लगा है. कहीं मिनिमम बैंलेस न होने पर ग्राहकों के खाते से मनमाने पैसे काटे जा रहे हैं, तो कहीं आधार न होने के नाम पर, राशन कार्ड को आधार से न जोड़ने के नाम पर लोगों को राशन से महरूम किया जा रहा है.

देश की अवाम पिछले काफ़ी वक़्त से बुरे दौर से गुज़र रही है. जनमानस ने जिन लोगों को अपना प्रतिनिधि बनाकर संसद में, विधानसभा में भेजा था, वे अब सत्ता के नशे में हैं. उन्हें जनमानस के दुखों से, उनकी तकलीफ़ों से कोई सरोकार नहीं रह गया है. ऐसे में जनता किसके पास जाए, किसे अपने अपने दुख-दर्द बताए. ज़ाहिर है, ऐसे में जनता विपक्ष से ही उम्मीद करेगी. जनता चाहेगी कि विपक्ष उसका नेतृत्व करे. उसे इस मुसीबत से निजात दिलाए. ये विपक्ष का उत्तरदायित्व भी है कि वे जनता की आवाज़ बने, जनता की आवाज़ को मुखर करे.

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की प्रमुख व कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी  देश के हालात को बख़ूबी समझ रहे हैं. सोनिया गांधी अवाम को एक मज़बूत विपक्ष देना चाहती हैं, वे देश को एक जन हितैषी सरकार देना चाहती हैं. इसीलिए उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के ख़िलाफ़ मुहिम शुरू कर दी है. दिल्ली में हुए कांग्रेस के महाधिवेशन में उन्होंने कहा कि पिछले चार साल में कांग्रेस को तबाह करने के लिए अहंकारी और सत्ता के नशे में मदमस्त लोगों ने कोई कसर बाक़ी नहीं रखी. साम-दाम-दंड-भेद का पूरा खेल चल रहा है, लेकिन सत्ता के अहंकार के आगे ना कांग्रेस कभी झुकी है और ना कभी झुकेगी. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के तानाशाही तौर तरीक़ों, संविधान की उपेक्षा, संसद का अनादर, विपक्ष पर फ़ज़्री मुक़दमों और मीडिया पर लगाम लगाने का कांग्रेस विरोध कर रही है.

राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश के उन्नाव और जम्मू कश्मीर के कठुआ में हुई बलात्कार की घटनाओं के विरोध में गुरुवार आधी रात को इंडिया गेट पर कैंडल मार्च निकाला.

ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों सोनिया गांधी ने भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ गठजोड़ बनाने के लिए विपक्षी दलों को रात्रिभोज दिया. सोनिया गांधी के आवास 10 जनपथ पर हुए इस रात्रिभोज में विपक्षी दल के नेता शामिल हुए, जिनमें समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेइटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ़) के नेता बदरुद्दीन अजमल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के शरद पवार और तारिक अनवर, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव और मीसा भारती, जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला, झारखंड मुक्ति मोर्चा के हेमंत सोरेन और बाबूलाल मरांडी, राष्ट्रीय जनता दल के अजित सिंह और जयंत सिंह, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी राजा, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मोहम्मद सलीम, द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम (डीएमके) के कनिमोई, बहुजन समाज पार्टी के सतीश चंद्र मिश्रा, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सुदीप बंदोपाध्याय, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतनराम मांझी, जनता दल-सेक्युलर (जेडी-एस) के कुपेंद्र रेड्डी, रेवलूशनेरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) के रामचंद्रन और केरल कांग्रेस के नेता भी शामिल हुए. कांग्रेस के नेताओं में राहुल गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गु़लाम नबी आज़ाद, अहमद पटेल,  एके एंटोनी, मल्लिकार्जुन खड़गे, रणदीप सुरजेवाला आदि नेताओं ने शिरकत की.

सोनिया गांधी बख़ूबी समझती हैं कि इस वक़्त कांग्रेस को उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. जब भी पार्टी पर कोई मुसीबत आई है, तो सोनिया गांधी ढाल बनकर खड़ी हो गईं. देश के लिए, देश की जनता के लिए, पार्टी के लिए हमेशा उन्होंने क़ुर्बानियां दी हैं. देश का शासन उनके हाथ में था, प्रधानमंत्री का ओहदा उनके पास था, वे चाहतीं, तो प्रधानमंत्री बन सकती थीं या अपने बेटे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने डॊ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया. उनकी अगुवाई में न सिर्फ़ कांग्रेस एक मज़बूत पार्टी बनकर उभरी और सत्ता तक पहुंची, बल्कि भारत विश्व मंच पर एक बड़ी ताक़त बनकर उभरा.

राहुल गांधी को कांग्रेस की बागडौर सौंपने के बाद सोनिया गांधी आराम करना चाहती थीं. अध्यक्ष पद पर रहते हुए ही उन्होंने सियासत से दूरी बना ली थी. राहुल गांधी ही पार्टी के सभी अहम फ़ैसले कर रहे थे. लेकिन पार्टी को मुसीबत में देखकर उन्होंने सियासत में सक्रियता बढ़ा दी है. फ़िलहाल वे विपक्ष को एकजुट करने की क़वायद में जुटी हैं.  वह भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ एक मज़बूत गठजोड़ बनाना चाहती हैं.  क़ाबिले-ग़ौर है कि जब-जब कांग्रेस पर संकट के बादल मंडराये, तब-तब सोनिया गांधी ने आगे आकर पार्टी को संभाला और उसे मज़बूती दी. उन्होंने कांग्रेस की हुकूमत में वापसी के लिए देशभर में रोड शो किए थे. आख़िरकार उनकी अगुवाई में कांग्रेस ने साल 2004 और 2009  का आम चुनाव जीतकर केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार बनाई थी. उस दौरान देश के कई राज्यों में कांग्रेस सत्ता में आई. लेकिन जब से अस्वस्थता की वजह से सोनिया गांधी की सियासत में सक्रियता कम हुई है, तब से पार्टी पर संकट के बादल मंडराने लगे. साल 2014 में केंद की सत्ता से बेदख़ल होने के बाद कांग्रेस ने कई राज्यों में भी शासन खो दिया. हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी ने ख़ूब मेहनत भी की, लेकिन उन्हें वह कामयाबी नहीं मिल पाई, जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही थी.

अगले साल आम चुनाव होने हैं. उससे पहले इसी साल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने हैं. कांग्रेस के पास बहुत ज़्यादा वक़्त नहीं बचा है. सोनिया गांधी ने रात्रिभोज के बहाने विपक्षी द्लों को एकजुट करने की कोशिश की है. अगर सोनिया गांधी इसमें कामयाब हो जाती हैं, तो इससे जहां देश को एक मज़बूत विपक्ष मिलेगा, वहीं आम चुनाव में पार्टी की राह भी आसान हो सकती है. 

Sunday, March 18, 2018

राहुल गांधी ने किया सबकी रक्षा का वादा

फ़िरदौस ख़ान
किसी भी देश की तरक़्क़ी के लिए, किसी भी समाज की ख़ुशहाली के लिए चैन-अमन सबसे ज़रूरी है. पिछले चार बरसों में देश में जो नफ़रत का माहौल बना है, कहीं मज़हबी झगड़े, तो कहीं जातिगत ख़ून-ख़राबा. इस ख़ौफ़ के माहौल में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अवाम को यक़ीन दिलाया है कि वे उसकी रक्षा करेंगे. उन्होंने उन लोगों की रक्षा करने की भी बात कही, जो हमेशा उनके ख़िलाफ़ रहते हैं, उनके ख़िलाफ़ दुष्प्रचार करते हैं. सच, ऐसा राहुल गांधी ही कर सकते हैं. राहुल गांधी ही वो शख़्सियत हैं, जो अपने दुश्मनों, अपने विरोधियों के बारे में भी हमेशा अच्छा ही सोचते हैं, अच्छा ही करते हैं.

देश की राजधानी दिल्ली के ताल कटोरा स्टेडियम में आयोजित कांग्रेस के महाधिवेशन को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने पूरे देश में डर का माहौल बना दिया है. प्रेस के लोग भी डरते हैं. जनता इंसाफ़ के लिए अदालत में जाती है. पहली बार ऐसा हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट के चार जज इंसाफ़ के लिए जनता की तरफ़ दौड़े. ये आरएसएस का काम है. कांग्रेस पार्टी और आरएसएस में बहुत फ़र्क़ है. हम हिन्दुस्तान के इंस्टीट्यूशन की इज़्ज़त करते हैं, वो हिन्दुस्तान के इंस्टीट्यूशन को ख़त्म करना चाहते हैं. वो सिर्फ़ एक इंस्टीट्यूशन चाहते हैं, आरएसएस. और वो चाहते हैं कि हिन्दुस्तान के सब इंस्टीट्यूशन आरएसएस के नीचे काम करें. चाहे वो ज्यूडिशरी हो, चाहे वो पार्लियामेंट हो, पुलिस हो, कोई भी इंस्टीट्यूशन हो. ये सच्चाई की लड़ाई है. हम हमारे इंस्टीट्यूशन की रक्षा करेंगे. हम पीछे नहीं हटेंगे.

मीडिया के दुष्प्रचार का ज़िक्र करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि प्रेस वाले हमारे बारे में, कांग्रेस पार्टी के बारे में भी ख़राब लिखते हैं, कभी-कभी ग़लत भी लिखते हैं. लेकिन मैं आपको यक़ीन दिलाता हूं कि हम आपकी भी रक्षा करेंगे. आप जितना भी ख़राब हमारे बारे में लिखना चाहते हो, लिखो. मगर कांग्रेस पार्टी का ये हाथ आपकी रक्षा करेगा. जब आरएसएस आपको मारेगी, दबाएगी, काटेगी, ये हाथ आपकी रक्षा करेगा. हम लोग आपकी रक्षा करेंगे.

उन्होंने कहा कि ये दो विचारधाराओं की लड़ाई है. हमारी विचारधारा जीतेगी. ये गांधी जी का संगठन है. शेरों का संगठन है. हम किसी से नहीं डरेंगे. सच्चाई की लड़ाई लड़ेंगे. उन्होंने कहा कि मैं पंद्रह साल से राजनीति में हूं. ये आसान नहीं है. झटके लगते हैं, ठोकर लगती है, चोट लगती है, दर्द भी होता है. इससे हम सीखते हैं. हमसे ग़लती होती है, तो हम उसे मान लेते हैं और कहते हैं कि फिर से ग़लती नहीं करेंगे, लेकिन आरएसएस और बीजेपी वाले ग़लती मानते नहीं हैं, किसी की सुनते भी नहीं हैं. पूरी दुनिया कह देगी कि ग़लती की, तो मोदी जी आंसू बहा देंगे, लेकिन ये नहीं मानेंगे कि ग़लती की. मोदी सरकार की नीतियों की वजह से देश बर्बाद हो गया, लेकिन वो लोग ये नहीं मानते.

राहुल गांधी ने कहा कि आज देश में ग़ुस्सा फैलाया जा रहा है. देश को बांटा जा रहा है. हिन्दुस्तान के एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से लड़ाया जा रहा है. हमारा काम जोड़ना का काम है. उन्होंने कांग्रेस के निशान का ज़िक्र करते हुए कहा कि ये जो हाथ का निशान है, यही एक निशान है जो हिन्दुस्तान को जोड़ने का काम कर सकता है. यही एक निशान है, जो इस देश को आगे ले जा सकता है.  इस निशान की जो शक्ति है, वो आपके अंदर है. अगर देश को जोड़ने का काम करना है, तो हम सबको मिलकर, देश की जनता को मिलकर काम करना होगा. उन्होंने कहा कि हम भविष्य की बात कर रहे हैं, बदलाव की बात कर रहे हैं. हमारी परम्पराओं में बदलाव किया जाता है, मगर बीते हुए वक़्त को भूला नहीं जाता है. युवाओं की बात होती है, मगर मैं कहना चाहता हूं कि अगर युवा कांग्रेस पार्टी को आगे ले जाएंगे, तो हमारे अनुभवी नेताओं के बिना कांग्रेस पार्टी आगे नहीं जा सकती. मेरा काम वरिष्ठ नेताओं और युवाओं को जोड़ने का काम है. एक नई दिशा दिखाने का काम है. इसके लिए संगठन में कई बदलाव करने होंगे. पार्टी के मेहनतकश कार्यकर्ताओं को आगे लाना होगा. नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच की दीवार को तोड़ना होगा. इस दीवार के अलग-अलग रूप हैं. एक रूप होता है कि पेराशूट की तरह ऊपर से टिकट लेकर कोई व्यक्ति गिरता है. दूसरा रूप होता है, दस-पंद्रह साल कार्यकर्ता ख़ून-पसीना बहाता है और फिर टिकट से पहले उसको कहा जाता है, भईया, तुम कार्यकर्ता हो, तुम्हारे पास पैसा नहीं है, तुम्हें टिकट नहीं मिलेगा. पर मैं कहता हूं- नहीं-नहीं-, तुम कार्यकर्ता हो, तुम्हारे दिल में कांग्रेस की विचारधारा है, तुम्हें टिकट ज़रूर मिलेगा और गुजरात में हमने छोटा-सा उदाहरण दिया, बड़ा नहीं, छोटा-सा, कांग्रेस पार्टी ने कार्यकर्ताओं को टिकट दिया और नतीजा आपने देखा.

दूसरी दीवार और शायद ये और भी बड़ी दीवार है, मगर ये जो पहली दीवार है, उसे तोड़े बिना वो दूसरी दीवार नहीं तोड़ी जा सकती. वो दीवार है- हिन्दुस्तान के युवाओं और राजनीतिक सिस्टम के बीच की दीवार. युवाओं ने मोदी जी में विश्वास किया, लेकिन वे ठगे गए. नीरव मोदी, ललित मोदी और अमित शाह जी का पुत्र अमेरिका भाग गए.

उन्होंने कहा कि अगर इन दीवारों को तोड़ना है, तो इसके लिए आगे आना होगा. उन्होंने ख़ाली स्टेज की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि ये स्टेज मैंने आपके लिए ख़ाली किया है. अगर हिन्दुस्तान को बदलना है, तो हर जात, हर मज़हब के लड़कों को, लड़कियों को समझना पड़ेगा कि आप ही बदल सकते हो और कोई नहीं बदल सकता. जो लोग हिन्दुस्तान के विज़न को समझते हैं, जिनके दिल में हिन्दुस्तान की आग जलती है, मैं उनसे इस स्टेज को भरूंगा.  आपका हाथ पकड़ कर आपको यहां बिठाऊंगा. मैं सत्तर-अस्सी साल पहले वाली,  महात्मा गांधी जी, जवाहरलाल नेहरू जी, सरदार पटेल जी, मौलाना आज़ाद जी, जगजीवन राम जी वाली कांग्रेस को देखना चाहता हूं. जैसे उन दिनों कांग्रेस पार्टी हुआ करती थी, वैसी ही कांग्रेस पार्टी देखना चाहता हूं. वरिष्ठ नेता हैं, आपकी जगह है, कांग्रेस पार्टी में युवा हैं, आपकी जगह है और कांग्रेस पार्टी के बाहर करोड़ों युवा हैं, आपकी भी जगह है.
हमें मिलकर काम करना है. दुनिया में आज दो विज़न दिखाई दे रहे है. एक अमेरिका का विज़न और दूसरा चीन का विज़न है. मैं चाहता हूं कि दस साल के अंदर एक इंडिया का विज़न भी दिखाई दे जाए. पूरी दुनिया ये कहे कि ये तरीक़ा सबसे अच्छा है. भाईचारे का, अहिंसा का, प्यार का. इसके लिए युवाओं को रोज़गार देना होगा. हर ज़िले में कोई न कोई चीज़ है. उत्तर प्रदेश को लीजिए. कानपुर, मिर्ज़ापुर, मुरादाबाद, कोई भी ज़िला देख लीजिए. स्किल की हिन्दुस्तान में कोई कमी नहीं है, इंटेलिजेंस की हिन्दुस्तान में कोई कमी नहीं है ऊर्जा की कोई कमी नहीं है. कमी एक है, जिसके पास स्किल है, जिसके पास ऊर्जा है, उसके पास बैंक लोन नहीं है, उसके पास टैक्नॊलोजी नहीं है. जो हमारा स्किल का ढांचा है, हर ज़िले में, हम उसे बैंकों के पैसे से और टैक्नॊलोजी से जोड़ने का काम करेंगे.
दूसरी बात, किसान अनाज उगाता है, सब्ज़ी उगाता है. उसका ज़्यादा से ज़्यादा उत्पाद ख़राब हो जाता है. उत्तर प्रदेश की सड़कों पर आलू दिखाई देते हैं. किसान उन्हें फेंक देते हैं. कांग्रेस पार्टी पूरे देश में फ़ूड पार्कों का नेटवर्क फैलाएगी. हर ज़िले में किसान अपना अनाज, अपनी सब्ज़ी, अपना फल सीधा फ़ूड प्रोसेसिंग फ़ैक्ट्री में जाकर बेचेगा. उन्होंने किसानों को यक़ीन दिलाया कि हमारी सरकार आने पर हम आपकी रक्षा करेंगे, दिल से आपकी रक्षा करेंगे और जैसे हमने सत्तर हज़ार करोड़ रुपये का क़र्ज़ माफ़ किया था, वैसे ही ज़रूरत पड़ने पर आपकी मदद करेंगे. तीसरा सबसे बड़ा काम शिक्षा का है. आज व्यापम स्कैम पूरे देश में फैलाया जा रहा है. दिल्ली में युवा धरना दे रहे हैं. प्रश्न पत्र बिकता है. इसे ख़रीदकर परीक्षा देने वाले पूरे देश में फैल रहे हैं.  शिक्षा पर सबका हक़ है. हमारी सरकार आने पर हम देश के कोने-कोने में उच्च शिक्षा की व्यवस्था करेंगे.

उन्होंने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच के फ़र्क़ को बताया. उन्होंने कहा कि कांग्रेस और विपक्ष में क्या फ़र्क़ है, एक सबसे बड़ा फ़र्क़ है- वो क्रोध और ग़ुस्से का प्रयोग करते हैं, हम प्यार प्रयोग करते हैं. हम भाईचारे का प्रयोग करते हैं और चाहे कुछ भी हो जाए, मैं फिर से दोहराना चाहता हूं कि ये देश हम सबका है, हर धर्म का है, हर जात का है. हर व्यक्ति का है और जो भी पार्टी करेगी, वो पूरे देश के लिए करेगी, देश के हर व्यक्ति के लिए करेगी और किसी को पीछे नहीं छोड़ेगी.

गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गांधी के मंदिर जाने पर भारतीय जनता पार्टी ने उन पर ख़ूब तंज़ किए थे. इस बारे में राहुल गांधी ने कहा कि गुजरात का चुनाव हुआ और वहां काफ़ी लोगों ने कहा कि मैं मंदिर जाता हूं. अजीब-सी बात है, क्योंकि मैं सालों से गुजरात चुनाव के बहुत पहले से, अपने दौरों पर मंदिर जाता हूं और मैं सिर्फ़ मंदिर में नहीं जाता हूं, मैं मस्जिद में, गुरुद्वारे में, चर्च में भी जाता हूं. मुझे जब भी कोई बुलाता है, मैं जाता हूं. उन्होंने दो मंदिरों का ज़िक्र करते हुए कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच के फ़र्क़ को बताया. उन्होंने कहा कि मैं आपको दो मंदिरों की कहानी बताता हूं. अपने दौरों पर दो अलग-अलग मंदिरों के पुजारी मिले, जिसमें एक कांग्रेस समर्थक थे और दूसरे भारतीय जनता पार्टी से थे. पहले मंदिर गया, शिव का मंदिर था, पूजा हो रही थी, पंडित जी बैठे थे. पूजा ख़त्म हुई, अलग-अलग चीज़ें थीं. सवाल पूछने की आदत है, तो मैंने पंडित जी से पूछा, गुरुजी आप मुझे बताइए आपने किया क्या? आपने दूध डाला, पानी डाला, मंत्र पढ़े, आपने क्या किया ? उन्होंने कहा कि बेटा समझना चाहता हैं, तो इन सिक्योरिटी वालों को परे कर. सिक्योरिटी वालों को परे किया. उन्होंने कहा कि अच्छा इधर आ, पीछे खड़ा हो जा. मंदिर के पीछे दीवार पर माथा लगा. फिर उन्होंने कहा, तू भगवान ढूंढ रहा है न, तो तुझे भगवान कहीं भी मिल जाएगा. जहां तू देखेगा, वहीं मिल जाएगा. मंदिर में ढूंढ रहा है, तो मंदिर में मिलेगा, चर्च में मिलेगा, गुरुद्वारे में मिलेगा, पेड़-पौधों में मिलेगा, आसमान की शून्यता में मिलेगा, जहां तू देखेगा, तुझे भगवान दिखेगा. ये जो हमने किया, ये हम करते हैं, ये हमें करने दे. अगर तू भगवान ढूंढ रहा है, तो जहां भी तू देखेगा, तुझे भगवान दिखेगा. इसके बाद बिल्कुल वही हालात, वैसा ही शिव मंदिर, वही पूजा वही सवाल. मगर पंडित जी ने सवाल का जवाब देने से मना कर दिया, लेकिन मैं अड़ गया. हम बाहर आ चुके थे. पंडित जी ने कहा कि मैंने तेरे लिए पूजा कर दी है. अब तुम प्रधानमंत्री बनने जा रहे हो, वो छत देख रहे हो. ऐसा करना जब तुम प्रधानमंत्री बन जाओ, तो इस पर सोना लगा देना. मतलब एक व्यक्ति सच्चाई कहता है. हमारा भगवान मंदिर में है, मस्जिद में है, चर्च में है, गुरुद्वारे में है, सब जगह है. हम तो पहले पुजारी की तरह सच के सिपाही हैं.  

उन्होंने कहा कि बीजेपी की राजनीति में बीजेपी का जो धर्म है, वो सिर्फ़ सत्ता को पाने के लिए है. लेकिन हम जनता के लिए लड़ते हैं. हमारे लोगों ने देश के लिए अपना ख़ून दिया है. हम नफ़रत नहीं करते, हम ग़ुस्सा नहीं करते. आप हमें मारे-पीटो, हम आपसे नफ़रत नहीं करेंगे.
उन्होंने कहा कि आज देश मुश्किल में है. किसान कहते हैं कि हम जी नहीं सकते. खेती से आमदनी नहीं होती, आत्महत्या करनी पड़ती है. दूसरी तरफ़ करोड़ों युवा बेरोज़गार हैं, उन्हें रास्ता नहीं दिख रहा है. समझ नहीं आ रहा है कि क्या करें. चार साल पहले इन लोगों ने मोदी जी पर भरोसा किया था, जो अब टूट चुका है. ख़त्म हो चुका है. उन्होंने कहा कि देश में करोड़ों युवा, जो आज थके हुए हैं, जब वे मोदी जी की तरफ़ देखते हैं, तो उन्हें रास्ता दिखाई नहीं देता. उन्हें ये बात समझ नहीं आती कि उन्हें रोज़गार कहां से मिलेगा ? किसानों को उनकी फ़सल का सही दाम कब मिलेगा ? देश एक तरह से थका हुआ है, रास्ता ढूंढ रहा है और मैं दिल से कहता हूं कि देश को सिर्फ़ कांग्रेस पार्टी ही रास्ता दिखा सकती है. उन्होंने कहा कि हम साथ मिलकर काम करें, तो कांग्रेस फिर से जीत सकती है.

ग़ौरतलब है कि 16 से 18 मार्च को आयोजित कांग्रेस के 84वें महाधिवेशन में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री  मनमोहन सिंह, मोती लाल वोरा, गु़लाम नबी आज़ाद, मल्लिकार्जुन खड़गे के अलावा स्टीयरिंग कमेटी के सदस्यों, अंतर्राष्ट्रीय डेलिगेट्स, एआईसीसी सदस्यों, पीसीसी सदस्यों और देश भर से आए पार्टी कार्यकर्ताओं ने शिरकत की और अपने विचार रखे. 

Friday, March 16, 2018

अब भी वक़्त है...

फ़िरदौस ख़ान
मुद्दई सुस्त और गवाह चुस्त. ये कहावत इस वक़्त कांग्रेस के नेताओं और रणनीतिकारों पर बिल्कुल सही बैठ रही है.  पार्टी कार्यकर्ता कांग्रेस को वापस सत्ता में लाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं. जनमानस भी कांग्रेस पर यक़ीन करना चाहता है. मेघालय में जनता ने कांग्रेस को 21 सीटें जिताकर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनाया, लेकिन इसके बावजूद महज़ दो सीटें जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी ने सरकार बनाने के लिए दावा पेश कर दिया. यहां कांग्रेस नैतिक रूप से भले ही चुनाव जीत गई हो, लेकिन रणनीति के लिहाज़ से पार्टी की हार हुई है. भारतीय जनता पार्टी के कारनामों को देखा जाए, तो उसके लिए नैतिकता कोई मायने नहीं रखती. वह सिर्फ़ जीतना चाहती है, भले ही उसके लिए उसे तमाम क़ायदे-क़ानून ताक़ पर ही क्यों न रखने पड़ें. एक कहावत भी है कि मुहब्बत और जंग में सब जायज़ है. ये सियासी जंग है, जिसे वही जीत सकता है, जिसमें जीतने की ख़्वाहिश हो, जीतने का जज़्बा हो. और ये ख़्वाहिश और ये जज़्बा इस वक़्त भारतीय जनता पार्टी में कूट-कूट कर भरा हुआ है.

ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी मेहनत नहीं करते हैं. वे भी दिन-रात मेहनत करते हैं. मीलों पैदल चलते हैं, जनसभाएं करते हैं. ट्वीट कर प्रधानमंत्री से सवाल करते हैं. लेकिन उन्हें मालूम होना चाहिए कि चुनाव जीतने के लिए सिर्फ़ यही काफ़ी नहीं होता. इसके लिए जनता का समर्थन जुटाना होता है. जनसभाओं और रैलियों में महज़ भीड़ इकट्ठी करना ही काफ़ी नहीं है. इस भीड़ को वोटों में भी बदले जाने की ज़रूरत होती है. पिछ्ले कुछ सालों में देश के हालात काफ़ी ख़राब हुए हैं. लगातार बढ़ती महंगाई, नोटबंदी और जीएसटी ने लोगों के काम-धंधे चौपट कर दिए. एक तो पहले ही बेरोज़गारी कम नहीं थी, ऊपर से जो लोग काम में लगे थे, वे भी घर बैठ गए. सांप्रदायिक और जातिगत संघर्ष ने भी माहौल को ख़राब करने का काम किया. इतना ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी जिन वादों के बूते सत्ता में आई थी, उसे भी उसने तिलांजली दे दी. ऐसे में कांग्रेस के पास मुद्दों की कमी नहीं है. कांग्रेस को देशभर में एक जन आंदोलन चलाना चाहिए. इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के मामले में भी कांग्रेस ख़ामोशी अख़्तियार किए हुए है.  कांग्रेस जिस तरह घोटालों का विरोध कर रही है, उसे इसी तरह महंगाई व अन्य मुद्दों को लेकर जनता के बीच बने रहना चाहिए.

चुनाव में बहुमत न मिले, तो सरकार बनाने के लिए गठबंधन की ज़रूरत होती है. चुनाव से पहले ही इसके लिए तैयारी कर लेनी चाहिए. सियासत में एक-एक पल बेशक़ीमती हुआ करता है, इसलिए बहुत ही चौकस रहने की ज़रूरत होती है. जब मुक़ाबला किसी भारतीय जनता पार्टी से हो, तो और भी होशियार रहने की ज़रूरत होती है. राहुल गांधी अच्छे से जानते हैं कि उनका मुक़ाबला किससे है. उन्होंने ख़ुद कहा है कि भारतीय जनता पार्टी मणिपुर और गोवा की तरह मेघालय में जनादेश को अनदेखा करते हुए ग़लत तरीक़े से सरकार बना रही है. महज़ दो सीटों के साथ भारतीय जनता पार्टी ने परोक्ष ढंग से मेघालय में सत्ता हथिया ली. भारतीय जनता पार्टी का यह रवैया लोगों के जनादेश के प्रति घोर असम्मान दिखाता है. भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता हथियाने की भूख और अवसरवादी गठबंधन बनाने के लिए धन का इस्तेमाल किया है.

सियासी लिहाज़ से ऐसे नाज़ुक वक़्त में राहुल गांधी अपनी नानी के घर चले गए. बेहतर होता कि वे कुछ दिन बाद इटली जाते. वे यहीं रहकर पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ, पार्टी समर्थकों के साथ होली का त्यौहार मनाते और हर सियासी उठापटक़ पर नज़र रखते. मेघालय में सही रणनीति बनाई गई होती, गठबंधन किया होता, तो पार्टी की सरकार बन सकती थी. कांग्रेस ने जीत के बाद मणिपुर और गोवा की सत्ता गंवाने के बाद भी सबक़ नहीं लिया. ऐसे वक़्त में राहुल गांधी का कार्यकर्ताओं के बीच होना बेहद ज़रूरी था, ताकि कार्यकर्ताओं का मनोबल कमज़ोर न पड़े.

त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय की हार सिर्फ़ राहुल गांधी की ही शिकस्त नहीं है, बल्कि यह पूरी पार्टी की हार है, ख़ासकर कांग्रेस के रणनीतिकारों की हार है. कांग्रेस के पास या यूं कहें कि राहुल गांधी को ऐसे रणनीतिकारों की बेहद ज़रूरत है, जो हालात पर पैनी नज़र रख सकें. जो जनमानस के बीच कांग्रेस को मज़बूत करने का काम कर सकें, जो भीड़ को वोटों में बदलने के फ़न में माहिर हों, जो विरोधियों की हर चाल को समझ सकें और उसे मात दे सकें. लोकसभा चुनाव को बहुत ज़्यादा वक़्त नहीं बचा है. इस साल के आख़िर में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव होने हैं. अगर कांग्रेस अब भी पूरी ताक़त झोंक दे, तो कामयाबी उसके क़दम चूम सकती है.

बेशक, राहुल गांधी एक अच्छे इंसान हैं. वे लोगों से मिलते हैं, उनके सुख-दुख में शरीक होते हैं. मंदिरों में पूजा-पाठ करते हैं, मज़ारों पर चादरें चढ़ाते हैं. वे हर काम चुनावी फ़ायदे के लिए नहीं करते. लोगों से मिलना-जुलना और उनके सुख-दुख में शामिल होना, उसके स्वभाव में शामिल है. ये कांग्रेस के लिए फ़क्र की बात है कि उन्हें एक सच्चा नेता मिला है, लेकिन सियासत में सच्चाई और अच्छाई के साथ सही रणनीति की भी ज़रूरत होती है. ये बात कांग्रेस ख़ासकर राहुल गांधी को समझनी होगी.

Friday, February 23, 2018

उप चुनाव बताएंगे हवा का रुख़

फ़िरदौस ख़ान
उत्तर प्रदेश और बिहार में लोकसभा और विधानसभा के उपचुनावों को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज़ हो गई हैं. उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा और बिहार की अररिया लोकसभा सीटों के लिए 11 मार्च को मतदान होना है. इसी दिन बिहार की जहानाबाद और भभुआ विधानसभा सीटों के लिए भी वोट डाले जाएंगे. चुनाव नतीजे 14 मार्च को आएंगे. सियासी दलों ने इन चुनावों में जीत हासिल करने के लिए कमर कस ली है. ये उप चुनाव जहां प्रतिष्ठा का सवाल बने हुए हैं, वहीं अगले साल होने वाले आम चुनाव के लिहाज़ से भी अहम माने जा रहे हैं. सियासी दलों का मानना है कि ये चुनाव साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव का रुख़ तय करेंगे.

उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटें पहले भारतीय जनता पार्टी के पास थीं. भारतीय जनता पार्टी की पूरी कोशिश है कि वह अपनी इन सीटों पर दबदबा बनाए रखे. भारतीय जनता पार्टी के लिए गोरखपुर सीट जीतना इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सीट रही है. उन्होंने साल 1998 से लगातार पांच बार भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीता है. इससे पहले उनके गुरु व गोरखनाथ मंदिर के पूर्व महंत अवैद्यनाथ मंहत यहां से तीन बार लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. यह सीट जीतकर वह पांच बार संसद तक पहुंचे हैं. इतना ही नहीं, किसी सत्ताधारी पार्टी के लिए वह सीट प्रतिष्ठा का सवाल बन जाती है, जो उसके शासक के पास रही हो.

कांग्रेस के लिए भी ये उप चुनाव बहुत अहम है. फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस का पुराना और गहरा रिश्ता रहा है. देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू साल 1952 में इसी सीट से चुनाव जीतकर संसद में पहुंचे थे. उन्होंने साल 1952, 1957 और 1962 में लगातार तीन बार इस सीट पर जीत का परचम लहराया. पंडित जवाहर लाल नेहरू का जलवा यह था कि साल 1962 में समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कांग्रेस को हराने के लिए यहां से ख़ुद चुनाव लड़ा और शिकस्त खाई.  पंडित जवाहर लाल नेहरू की वजह से ही यह सीट बेहद ख़ास हो गई. पंडित जवाहरलाल नेहरू की मौत के बाद उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित यहां से साल 1964 का उपचुनाव जीतकर सांसद बनीं. उन्होंने साल 1967 में यहां से जीत दर्ज की. संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधि बनने के बाद साल 1969 में उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया. यहां हुए उपचुनाव में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार जनेश्वर मिश्र ने जीत हासिल की. इसके बाद साल 1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के विश्वनाथ प्रताप सिंह ने यहां से चुनाव जीता. साल 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की उम्मीदवार कमला बहुगुणा ने जीत हासिल की, जो बाद में कांग्रेस में शामिल हो गईं. साल 1980 के चुनाव में लोकदल के उम्मीदवार बीडी सिंह ने यहां से चुनाव जीता. साल 1984 के आम चुनाव में कांग्रेस के रामपूजन पटेल ने यहां से जीत दर्ज की. बाद में वह जनता दल में चले गए और साल 1989 और 1991 में भी उन्होंने जीत हासिल की. साल 1996 और 1998 के आम चुनाव में समाजवादी पार्टी के जंग बहादुर ने यहां से चुनाव जीता. साल 1999 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के ही धर्मराज पटेल और साल 2004 के आम चुनाव में बाहुबली अतीक़ अहमद ने यहां से जीत का परचम लहराया. साल 2009 के लोकसभा चुनाव में यह सीट बहुजन समाज पार्टी के खाते में चली गई. यहां से बहुजन समाज पार्टी के कपिल मुनि करवरिया ने जीत दर्ज की. यह जीत बहुजन समाज के लिए इसलिए भी बहुत ख़ास थी, क्योंकि पार्टी के संस्थापक कांशीराम यह सीट हार गए थे. कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले फूलपुर लोकसभा क्षेत्र में पहली बार साल 2014 में केशव प्रसाद मौर्य ने जीत हासिल करके इसे भारतीय जनता पार्टी की झोली में डाल दिया.

समाजवादी पार्टी भी इन सीटों को हासिल करने के लिए जी जान लगा देना चाहती है. ऐसा करके वह विधानसभा में मिली हार के ज़ख़्म पर कुछ मल्हम लगाना चाहती है. भारतीय जनता पार्टी ने समाजवादी पार्टी से ही राज्य की सत्ता छीनी थी. समाजवादी पार्टी चाहती है कि अगर ये सीटें उसकी झोली में आ गईं, तो इससे पार्टी में एक नई जान आ जाएगी. इस जीत से पार्टी कार्यकर्ताओं में भी जोश पैदा होगा. उप चुनाव में समाजवादी पार्टी एकला चलो की राह पर चल रही है. समाजवादी पार्टी के विधानसभा में विपक्ष के नेता राम गोविंद चौधरी ने किसी भी दल के साथ गठबंधन से इंकार करते हुए कहा है कि दोनों सीटों पर उनके उम्मीदवार पार्टी के चुनाव निशान पर ही मैदान में उतरेंगे.

गौरतलब है कि गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफ़ा देने की वजह से ख़ाली हुई हैं. योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य अपनी-अपनी सीटों से इस्तीफ़ा देकर उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बन गए हैं. उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्रिमंडल में रहने के लिए प्रदेश की विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य होना ज़रूरी है. इस चुनाव में इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन भी मुद्दा बनी हुई है. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने चुनाव आयोग से ईवीएम की बजाय मतपत्रों से मतदान कराए जाने की मांग की है.

उधर, बिहार में भी उपचुनाव को लेकर माहौल गरमाया हुआ है. बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड ने उपचुनाव से दूरी बना ली है. पार्टी का कहना है कि उसका कोई उम्मीदवार इस चुनाव में खड़ा नहीं होगा. सियासी गलियारे में कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का घटक दल यानी जनता दल यूनाइटेड ने भारतीय जनता पार्टी के दबाव में आकर उप चुनाव से किनारा किया है. भारतीय जनता पार्टी अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र उप चुनाव जीतकर यह संदेश देना चाहती है कि जनता में उसकी पैठ अभी भी बनी हुई है.

बहरहाल,  कांग्रेस राजस्थान में हुए उप चुनाव में मिली जीत से उत्साहित है. कांग्रेस ने अलवर, अजमेर और मांडलगढ़ विधानसभा क्षेत्रों में हुए उप चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को करारी शिकस्त दी थी. इसके अलावा कांग्रेस, समाजवादी पार्टी व अन्य विपक्षी दलों का यह भी मानना है कि जनता वादा ख़िलाफ़ी के लिए भारतीय जनता पार्टी को सबक़ सिखाएगी. हालांकि भारतीय जनता पार्टी के नेता सभी सीटों पर जीत के दावे कर रहे हैं. अलबत्ता, सियासी दलों की जीत और हार जनता के हाथ में है.

Saturday, February 17, 2018

कौन बनेगा प्रधानमंत्री मोदी, राहुल या...


फ़िरदौस ख़ान
वक़्त कैसे बीतता है, पता ही नहीं चलता. कल की ही सी बात लगती है. अब फिर से आम चुनाव का मौसम आ गया. अगले ही बरस लोकसभा चुनाव होने हैं. सभी सियासी दलों ने चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं. अवाम में भी सरग़ोशियां बढ़ गई हैं. सबकी ज़ुबान पर यही सवाल है कि अगली बार किसकी सरकार आएगी. क्या भारतीय जनता पार्टी वापसी करेगी? अवाम ने जिन अच्छे दिनों की आस में भाजपा को चुना था, वो तो अभी तक नहीं आए और न ही कभी आने की उम्मीद है. ऐसे में क्या अवाम भाजपा को सबक़ सिखाएगी और देश की बागडोर एक बार फिर से कांग्रेस को सौंपेगी? अवाम कांग्रेस को चुनेगी, तो कांग्रेस की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद का दावेदार कौन होगा. क्या पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे?

हालांकि पार्टी की तरफ़ से यही दावा किया जा रहा है कि कांग्रेस के सत्ता में आने पर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाएगा. कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख और मुख्य प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला का कहना है कि मोदी का विकल्प सिर्फ़ और सिर्फ़ राहुल गांधी ही हैं. कोई और नहीं हो सकता. कांग्रेस और देश के लोग राहुल गांधी को देश का अगला प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं. पार्टी के वरिष्ठ नेता एम वीरप्पा मोइली का भी यही कहना है कि पार्टी और युवाओं की महत्वाकांक्षा राहुल गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनते देखना है. वे कहते हैं कि राहुल गांधी अब नरेन्द्र मोदी से तुलना से परे हैं. वे एक मज़बूत व्यक्तित्व के रूप में उभरे हैं.
बेशक कांग्रेस नेता, कार्यकर्ता और पार्टी समर्थक राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं, लेकिन क्या ख़ुद राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं?

ये जगज़ाहिर है कि अपने पिता की तरह ही राहुल गांधी भी सियासत में नहीं आना चाहते थे, लेकिन उन्हें सियासत में आना पड़ा.  साल 2004 के आम चुनाव में कांग्रेस को शानदार जीत मिली थी और राहुल गांधी भी भारी मतों से चुनाव जीतकर सांसद बने थे. केन्द्र में कांग्रेस की सरकार बनी और डॊ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने. लेकिन राहुल गांधी ने सरकार में कोई ओहदा नहीं लिया. वे पार्टी संगठन से ही जुड़े रहे. इसी तरह साल 2009 के आम चुनाव में भी कांग्रेस ने जीत का परचम लहराते हुए वापसी की और राहुल गांधी ने भी अपने निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में शानदार जीत हासिल की. क़यास लगाए जा रहे थे कि वे इस बार ज़रूर सरकार में कोई अहम ज़िम्मेदारी संभालेंगे, लेकिन इस बार भी उन्होंने सरकार में कोई ओहदा लेने से इंकार करते हुए संगठन को मज़बूत करने पर ही ज़्यादा ध्यान दिया. इसमें कोई दो राय नहीं है कि राहुल गांधी चाहते, तो वे प्रधानमंत्री बन सकते थे. आज हालात और हैं, पहले उनकी मां सोनिया गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी संभाल रही थीं, लेकिन आज राहुल गांधी ख़ुद इस ज़िम्मेदारी को निभा रहे हैं. अब उन पर दोहरी ज़िम्मेदारी है. पहली पार्टी संगठन को मज़बूत करने की और दूसरी खोया हुआ जनाधार हासिल करके पार्टी को हुकूमत में लाने की. क्या ऐसे हालात में वे ख़ुद प्रधानमंत्री बनना चाहेंगे और पार्टी अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी किसी वरिष्ठ नेता को सौंप देंगे. या फिर ख़ुद पार्टी की ज़िम्मेदारी संभालते रहेंगे और किसी अन्य क़रीबी नेता को प्रधानमंत्री बनाने के लिए उसका नाम पेश करेंगे? पार्टी के क़रीबी सूत्रों का माना है कि राहुल गांधी अपने एक क़रीबी नेता को प्रधानमंत्री बनाना चाहेंगे. पार्टी का ये क़रीबी नेता उनके पिता राजीव गांधी का भी विश्वासपात्र रहा है. इस नेता के गांधी परिवार से गहरे रिश्ते हैं और राहुल गांधी की विदेश यात्रा में वह उनके साथ रहता है.

इसके बरअक्स अगर देश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनती है, तो प्रधानमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार नरेन्द्र मोदी ही हो सकते हैं. ये नरेन्द्र मोदी की ही चतुराई थी कि पिछले लोकसभा चुनाव में हर तरफ़ मोदी-मोदी ही हो रहा था. भले ही मोदी भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार थे, लेकिन चुनाव में भाजपा कहीं नहीं थी. ऐसा लग रहा था कि ये चुनाव कांग्रेस और नरेन्द्र मोदी के बीच है. नरेन्द्र मोदी ने ख़ुद को पार्टी से बड़ा साबित करके दिखा दिया. भाजपाई ख़ुद मोदी लहर की बात कर रहे थे, मोदी नाम की सुनामी की बात कर रहे थे. इस बारे में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का अपना ही नज़रिया है. वे मानते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव में जो सरकार बनेगी, उसमें मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए कोई जगह नहीं होगी. वे ये भी कहते हैं कि लोकसभा चुनाव में अगर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) जीतता भी है, तो उसके सहयोगी दल नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद पर स्वीकार नहीं करेंगे. ऐसे में मौजूदा गृहमंत्री राजनाथ सिंह के प्रधानमंत्री बन सकते है. इसकी वजह ये है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के घटक द्ल नरेन्द्र मोदी से नाराज़ चल रहे हैं. ऐसे हालात में वे मोदी को फिर से मौक़ा नहीं देना चाहेंगे, हां अगर भारतीय जनता पार्टी बहुमत हासिल कर लेती है, तो फिर सहयोगी दलों का विरोध भी मोदी की राह में कोई रुकावट नहीं बन पाएगा.  क़ाबिले-ग़ौर है कि नरेन्द्र मोदी पिछले लोकसभा चुनाव से ही 2024 तक का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं. इसमें उन्हें कितनी कामयाबी मिलती है, ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा.

बहरहाल, इसी माह पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. त्रिपुरा में 18 फ़रवरी में मतदान होगा, जबकि मेघालय और नागालैंड में 27 फ़रवरी वोट डाले जाएंगे. तीनों राज्यों के चुनाव नतीजे 3 मार्च को आएंगे. इन तीनों ही राज्यों में विधानसभा सीटों की संख्या 60-60  है. गौरतलब है कि त्रिपुरा विधानसभा का कार्यकाल 6 मार्च को, मेघालय विधानसभा का 13 मार्च और नगालैंड विधानसभा का कार्यकाल 14 मार्च को पूरा हो रहा है. मेघालय में कांग्रेस हुकूमत में है और उसके विधायकों की संख्या 29 है. त्रिपुरा में सीपीआई (एम) 51 सीटों के साथ सत्ता में है. वह पिछले 25 साल से सत्तासीन है. नगालैंड में नगा पीपुल्स फ्रंट की सरकार है और उसके पास 45 सीटें हैं. इनके अलावा इसी साल कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी विधानसभा चुनाव होने हैं. इन चुनावों के नतीजे आगामी लोकसभा चुनाव की राह तय करेंगे.

Saturday, February 3, 2018

भाजपा की कांटों भरी राह

फ़िरदौस ख़ान
केन्द्र में सत्तारूढ़  भारतीय जनता पार्टी ने अगले साल होने वाले आमसभा चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं. वह पिछली बार की तरह 2019 के लोकसभा चुनाव में भी अच्छा प्रदर्शन करना चाहती है. इसके लिए पार्टी चुनावी रणनीति भी बना रही है, लेकिन उसके लिए आम चुनाव की राह उतनी आसान नहीं है. इसकी सबसे बड़ी वजह है भारतीय जनता पार्टी सरकार की वादा ख़िलाफ़ी. साल 2014 में भारतीय जनता पार्टी ने जो लोक लुभावन नारे दिए थे, जिनके बूते पर उसने लोकसभा चुनाव की वैतरणी पार की थी, अब जनता उनके बारे में सवाल करने लगी है. जनता पूछने लगी कि कहां हैं, वे अच्छे दिन जिसका इंद्रधनुषी सपना भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें दिखाया था. कहां हैं, वह 15 लाख रुपये, जिन्हें उनके खाते में डालने का वादा किया गया था. कहां है वह विदेशी काला धन, जिसके बारे में वादा किया गया था कि उसके स्वदेश में आने के बाद जनता के हालात सुधर जाएंगे.

भारतीय जनता पार्टी जिन वादों के सहारे सत्ता की सीढ़ियां चढ़ी थी, सत्ता की कुर्सी पाते ही उन्हें भूल गई और ठीक उनके उलट काम करने लगी. भारतीय जनता पार्टी ने महंगाई कम करने का वादा किया था, लेकिन उसके शासनकाल में महंगाई आसमान छूने लगी. भारतीय जनता पार्टी ने महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों पर अंकुश लगाने का वादा किया था, लेकिन आए-दिन महिला शोषण के दिल दहला देने वाले कितने ही मामले सामने आ रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी ने किसानों को राहत देने का वादा किया था, लेकिन किसानों के ख़ुदकुशी के मामले थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी ने युवाओं को रोज़गार देने का वादा किया था, लेकिन रोज़गार देना तो दूर, नोटबंदी और जीएसटी लागू करके जो उद्योग-धंधे चल रहे थे, उन्हें भी बंद करने का काम किया है. भारतीय जनता पार्टी की सरकार जो भी फ़ैसले ले रही है, उनसे सिर्फ़ बड़े उद्योगपतियों को ही फ़ायदा हो रहा है. ऑक्सफ़ेम सर्वेक्षण के हवाले से कहा गया है कि पिछले साल यानी 2017 में भारत में सृजित कुल संपदा का 73 फ़ीसद हिस्सा देश की एक फ़ीसद अमीर आबादी के पास है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सवाल भी किया है. ग़ौरतलब है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विदेश यात्राओं और उनकी सरकार पर अमीरों के लिए काम करने और उनके कर्ज़ माफ़ करने को लेकर लगातार हमला कर रहे हैं.
दरअसल, एक तरफ़ केन्द्र सरकार अमीरों को तमाम सुविधाएं दे रही है, उन्हें करों में छूट दे रही है, उनके कर माफ़ कर रही है, उनके क़र्ज़ माफ़ कर रही है. वहीं दूसरी तरफ़ ग़रीब जनता पर आए दिन नये-नये कर लगाए जा रहे हैं, कभी स्वच्छता के नाम पर, तो कभी जीएसटी के नाम पर उनसे वसूली की जा रही है. खाद्यान्नों और रोज़मर्रा में काम आने वाली चीज़ों के दाम भी लगातार बढ़ाए जा रहे हैं. मरीज़ों के लिए इलाज कराना भी मुश्किल हो गया है. दवाओं यहां तक कि जीवन रक्षक दवाओं और ख़ून के दाम भी बहुत ज़्यादा बढ़ा दिए गए हैं. ऐसे में ग़रीब मरीज़ कैसे अपना इलाज कराएंगे, इसकी सरकार को ज़रा भी फ़िक्र नहीं है. सरकार का सारा ध्यान जनता से कर वसूली पर ही लगा हुआ है.

इतना ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी ने आम चुनाव में कांग्रेस के जिस भ्रष्टाचार को, जिस घोटाले को अपने लिए प्रचार का साधन बनाया था, उन मामलों में भी अदालत में कांग्रेस पाक-साफ़ साबित हुई है.
टू जी स्पैक्ट्रम घोटाले में केन्द्रीय जांच ब्यूरो की विशेष अदालत ने पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा और कनिमोई सहित 17 आरोपियों को सभी मामलों में बरी कर दिया. न्यायाधीश ओपी सैनी ने अपने फ़ैसले में लिखा है, "मैं ये भी बता दूं कि बीते सात साल से हर दिन- गर्मी की छुट्टियों सहित, मैं सुबह नौ बजे से शाम पांच बजे तक पूरी निष्ठा से खुली अदालत में बैठता था और इंतज़ार करता था कि कोई आए और अपने पास से कोई ऐसा सबूत दे जो क़ानूनी तौर पर मंज़ूर हो, लेकिन सब बेकार रहा. एक भी शख़्स सामने नहीं आया. इससे पता चलता है कि हर कोई अफ़वाहों, अनुमानों और गपशप से बनी आम राय के हिसाब से चल रहा था. लेकिन न्यायिक कार्यवाही में लोगों की इस राय की जगह नहीं है. "

इस फ़ैसले से यह साबित हो गया कि टू जी स्पैक्ट्रम घोटाला पूरी तरह से काल्पनिक और मनगढ़ंत था. कांग्रेस को बदनाम करके अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए बड़े लोगों को आरोपी बनाया गया था. यह फ़ैसला संयुक्त प्रगतिशाल गठबंधन के लिए राहत का सबब बना, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र सरकार और केन्द्रीय जांच ब्यूरो कठघरे में ज़रूर खड़े हो गए हैं. अल्पसंख्यकों और दलितों पर हो रहे लगातार हमलों को लेकर भी केन्द्र की मोदी सरकार पहले से ही सवालों के घेरे में है.

हालांकि कुछ समय पहले हुए गुजरात और हिमाचल प्रदेश चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया. भारतीय जनता पार्टी ने जहां गुजरात में अपनी सत्ता बचाई, वहीं हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस से सत्ता छीनी. इस साल देश के आठ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, मेघालय, मिज़ोरम और नागालैंड शामिल हैं. हालांकि भारतीय जनता पार्टी इस बात को लेकर आश्वस्त है कि इन विधानसभा चुनावों में भी वह अच्छा प्रदर्शन करेगी, लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बहुत फ़र्क़ है. विधानसभा चुनाव जहां क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर लड़े जाते हैं, वहीं लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे छाये रहते हैं. भारतीय जनता पार्टी के सांसद इस बात को लेकर परेशान हैं कि वे चुनावों में जनता को क्या मुंह दिखाएंगे. जनता जब उनसे सवाल पूछेगी, तो सिवाय बग़ले झांकने के वे कुछ नहीं कर पाएंगे.

फ़िलहाल भारतीय जनता पार्टी अपना जनाधार बढ़ाने पर ख़ासा ध्यान दे रही है. उसने मिलेनियम वोटर कैंपेन नामक एक मुहिम शुरू की है. इस मुहिम में उन दो करोड़ युवाओं को शामिल करने की कोशिश की जाएगी, जो साल 2019 में पहली बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे. इन युवाओं को पार्टी से जोड़ने के लिए सोशल मीडिया की मदद ली जाएगी. पिछले लोकसभा चुनाव में भी पार्टी ने ज़्यादा से ज़्यादा युवाओं को जोड़ा था और उसे युवाओं का समर्थन भी मिला था. क़ाबिले-ग़ौर है कि ’मन की बात’ के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नये मतदाताओं पर ज़ोर देते हुए कहा था, 'हम लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए इक्कीसवीं सदी में पैदा हुए लोगों का स्वागत करते हैं, क्योंकि वे योग्य मतदाता बन जाएंगे. उनका वोट 'नये भारत का आधार' बन जाएगा.

बहरहाल, भारतीय जनता पार्टी अपनी कोशिश में कितनी कामयाब हो पाती है, यह तो आने वाला वक़्त बताएगा. लेकिन इतना ज़रूर है कि उसकी राह कांटों भरी होगी, जो उसने अपनी राह में ख़ुद बोये हैं.

Friday, January 26, 2018

राहुल गांधी की गरिमा और बढ़ गई

फ़िरदौस ख़ान
किसी भी इंसान का बर्ताव उसके संस्कारों का परिचय देता है. संस्कार विरासत में मिलते हैं, घर से मिला करते हैं. संस्कार बाज़ार में नहीं मिलते. ज़्यादा पैसा या बड़ा पद मिलने से संस्कार नहीं मिल जाते.  राहुल गांधी को देखें, वो अपने विरोधियों का नाम भी सम्मान के साथ लेते हैं, उनके नाम के साथ जी लगाते हैं, जबकि उनके विरोधी भले ही वे देश के बड़े से बड़े पद पर हों, उनके लिए ग़लत शब्दों का इस्तेमाल करते हैं.  दरअसल, किसी का अपमान करना या उसके लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करके इंसान सामने वाला का अपमान नहीं करता, बल्कि अपने ही संस्कारों का प्रदर्शन करता है.

और जहां तक गणतंत्र दिवस समारोह में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल को छठी क़तार में बिठाने की बात है, तो उनके विरोधियों को समझना होगा कि जो अवाम के दिलों में बसते हैं, उन्हें इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उन्हें किस क़तार में बिठाया गया. राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष हैं, उन्हें पहली क़तार में जगह मिलनी चाहिए थी, लेकिन उन्हें छठी क़तार में जगह दी गई. उनके साथ राज्यसभा में पार्टी के नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद बैठे थे. इसी दीर्घा में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पहली क़तार में और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी दूसरी क़तार में नज़र आ रही थीं.

राहुल गांधी का कहना है कि उन्हें छठी की जगह, साठवीं क़तार में जगह दी जाए, तब भी वे समारोह में शिरकत करेंगे, क्योंकि उनके लिए राष्ट्रीय पर्व अहमियत रखता है, न कि बैठने की जगह. हालांकि कांग्रेस ने उन्हें पहली कतार में जगह नहीं दिए जाने पर सवाल उठाया था.
कांग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ट्विटर पर लिखा, "कांग्रेस अध्यक्ष श्री राहुल गांधी को गणतंत्र दिवस के राष्ट्रीय पर्व पर अहंकारी शासकों ने सारी परंपराओं को दरकिनार करके पहले चौथी पंक्ति और फिर छठी पंक्ति में जानबूझकर बिठाया. हमारे लिए संविधान का उत्सव ही सर्वप्रथम है."
पहले राहुल गांधी के लिए चौथी कतार में जगह दिए जाने की बात सामने आई थी, लेकिन बाद में उन्हें छठी क़तार में जगह दी गई.
दरअसल, राहुल गांधी को पीछे जगह देकर केन्द की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने अपनी ही छवि धूमिल की है. इस वाक़िये से राहुल गांधी की गरिमा और ज़्यादा बढ़ गई है.

देश को कहां ले जाएगी विरोध की ग़लत परम्परा

फ़िरदौस ख़ान
भारतीय जनता पार्टी ने देश की सियासत में कई ऐसी ग़लत परम्पराएं शुरू की हैं, जो आने वाले वक़्त में अपना क़हर ज़रूर ढहाएंगी. इनमें से एक परम्परा विरोध की है. विरोध किया जाना चाहिए, लेकिन सिर्फ़ विरोध के लिए विरोध नहीं होना चाहिए. भारतीय जनता पार्टी की तर्ज़ पर अन्य सियासी दल भी विरोध के इस तरीक़े को अपना सकते हैं. जिस तरह से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का ग़ैर ज़रूरी विरोध किया जाता है, उसे किसी भी लिहाज़ से सही नहीं कहा जा सकता. वे जहां जाते हैं, उनके ख़िलाफ़ प्रदर्शन किए जाते हैं, उनके ख़िलाफ़ अपशब्दों का इस्तेमाल किया जाता है, उनके परिवार पर मिथ्या आरोप लगाए जाते हैं, गणतंत्र दिवस समारोह में उन्हें छठी पंक्ति में बैठने की जगह दी जाती है. आख़िर ये सब किस संस्कृति का हिस्सा है.

कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद जब पहली बार राहुल गांधी अपने संसदीय निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में गए, तो पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने गुलाबों के सुर्ख़ फूलों से उनका स्वागत किया गया. उन्हें फूलों के गुलदस्ते दिए गए. वे जहां-जहां से गुज़रे, उन पर सुर्ख़ गुलाबों की पंखुड़ियां बरसाई गईं. उन्हें यक़ीन दिलाया कि कांग्रेस सत्ता में हो या विपक्ष में हर हाल में वे हमेशा कांग्रेस के साथ रहेंगे, उनके साथ रहेंगे. दरअसल, राहुल गांधी के बेहरीन जाने से पहले ही यह तय हो गया था कि वे 15 और 16 जनवरी को अमेठी में रहेंगे.  वे 8 जनवरी को बहरीन में आयोजित भारतीय अप्रवासियों के ग्लोबल ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ पीपल ऑफ़ इंडियन रीजन सम्मेलन को संबोधित करने के बाद 10 जनवरी को स्वदेश लौटे थे. राहुल गांधी का अमेठी दौरे का कार्यक्रम तय होने के साथ ही पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनके स्वागत की तैयारियां शुरू कर दी थीं. उन्हें जहां-जहां जाना था, वहां का भी जायज़ा ले लिया गया.

अमेठी में जहां कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता राहुल गांधी के स्वागत की तैयारियों में ज़ोरशोर से जुटे थे, वहीं उनके विरोधियों में भी हलचल शुरू हो चुकी थी. दरअसल, जब से भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी स्मृति ईरानी ने पिछले लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त खाई है, तब से वे राहुल गांधी के ख़िलाफ़ बहुत ज़्यादा मुखर हुई हैं. वे हमेशा राहुल गांधी के ख़िलाफ़ बयान देने के लिए आतुर रहती हैं. लेकिन राहुल गांधी ने कभी स्मृति ईरानी पर एक लफ़्ज़ भी ख़र्च नहीं किया. इतना ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेता भी किसी न किसी बहाने राहुल गांधी का विरोध करते रहते हैं. राहुल गांधी विदेश जाते हैं, तब भी उन पर तंज़ कसे जाते हैं, पूछा जाता है कि वे कहां गए हैं, क्यों गए हैं, कब आएंगे, वग़ैरह-वग़ैरह. इस बार उन्होंने राहुल गांधी के अमेठी दौरे को लेकर उनके विरोध की रणनीति बना डाली. राहुल गांधी अमेठी आएं तो परेशानी, न आएं तो हज़ार शिकायतें.

बहरहाल, राहुल गांधी अपने दौरे के पहले दिन रायबरेली ज़िले के सलोन गए. और वहां के लोगों से मुलाक़ात कर उनकी परेशानियां सुनीं. उन्होंने प्रधानमंत्री पर अमेठी से सौतेला बर्ताव करने का आरोप लगाते हुए कहा कि वे अमेठी में फ़ूड पार्क बना रहे थे. इससे किसानों को फ़ायदा होता, उन्हें उनकी फ़सल के वाजिब दाम मिलते, लेकिन मोदी सरकार ने इसे बंद कर दिया. नतीजतन किसानों को अपने ख़ून-पसीने से उगाई फ़सल सड़क पर फेंकनी पड़ रही है. उन्होंने कहा,”चाहे कुछ भी हो जाए, यहां फ़ूड पार्क बनेगा और मैं ये काम करूंगा. जैसे ही हमारी सरकार बनेगी हम यहां फ़ूड पार्क बनाएंगे और किसानों के उत्पाद यहां पर सही दामों में बेचे जाएंगे. मैं ये करके दिखाऊंगा.’

राहुल गांधी से मिलकर जहां किसानों के मन में कुछ उम्मीद जगी, वहीं उनके विरोधी उनके ख़िलाफ़ खड़े हो गए. सलोन में राहुल गांधी का विरोध किया गया. स्थानीय भाजपा विधायक दल बहादुर कोरी की अगुवाई में कुछ लोगों ने उन्हें काले झंडे दिखाते हुए उनके ख़िलाफ़ नारेबाज़ी की. इस दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को खदेड़ने की कोशिश की. इस मामले को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की पुलिस से भी तीखी नोकझोंक हुई. दूसरे दिन भी ठीक ऐसा ही हुआ. अपना रास्ता रोके जाने पर राहुल गांधी को ग़ुस्सा आ गया और वे अपनी गाड़ी से उतरकर पैदल ही गौरीगंज शहर की तरफ़ चल पड़े. उनके पैदल चलने पर विशेष सुरक्षा समूह (एसपीजी) से लेकर ज़िला प्रशासन तक में हड़कंप मच गया. उनके सभा स्थल तक पहुंचने से पहले ही भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने हंगामा शुरू कर दिया. वे सुबह से हाथों में पोस्टर लेकर राहुल गांधी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे थे. पोस्टर में लिखा था, 'राहुल गांधी लापता सांसद का स्वागत'. इससे पहले भी भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता राहुल गांधी के लापता होने के पोस्टरों से अमेठी की दीवारों को रंग चुके हैं. फिर क्या था कांग्रेस के कार्यकर्ता भी उनसे भिड़ गए. मामला बढ़ता देख, पुलिस को दख़ल देना पड़ा. पुलिस से भी उनकी झड़प हो गई. नतीजतन पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया. मामले की गंभीरता को देखते हुए राहुल गांधी ने अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया.

अपने दो दिवसीय दौरे के दौरान जहां राहुल गांधी ने पार्टी कार्यकर्ताओं से बातचीत कर उनका मनोबल बढ़ाया, वहीं आम लोगों की समस्याएं भी सुनीं. इस बीच अमेठी के गंगागंज सखनपुर की रहने वाली किस्मतुल  अपने बेटे मोहम्मद सरवर को लेकर आई और राहुल गांधी से बेटे के इलाज के लिए मदद की गुहार लगाई. उनका बेटा पैरालाइज़्ड होने की वजह से व्हील चेयर पर चलने को मजबूर है. राहुल गांधी ने उन्हें तसल्ली देते हुए कहा, परेशान मत हो अम्मा, इसका इलाज होगा, आपका बेटा ठीक हो जाएगा. ग़ौरतलब है कि राहुल गांधी बहुत लोगों की मदद करते हैं.

अमेठी प्रवास के दौरान राहुल गांधी ने चुरावा के हनुमान मंदिर में पूजा-अर्चना कर खिचड़ी दान की और आदतन रास्ते में एक जगह रुककर नाश्ता भी किया. राहुल गांधी जहां जाते हैं, लोगों के दिल जीत लेते हैं. राहुल गांधी साल 2004 से अमेठी के सांसद हैं. अमेठी के बाशिन्दे राहुल गांधी के आगमन से ख़ुश थे, लेकिन विरोधी उनके ख़िलाफ़ माहौल बनाने में जुटे हैं. राहुल गांधी को इस तरफ़ ख़ास ध्यान देना होगा.

बहरहाल, भारतीय जनता पार्टी ने पोस्टर की जो परम्परा शुरू की है, उसका रंग दिखना शुरू हो गया है. भारतीय जनता पार्टी की तर्ज़ पर कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने भी पोस्टर तक छपवाकर अमेठी की दीवारों पर लगवा डाले. गौरीगंज रेलवे स्टेशन पर लगे एक पोस्टर में राहुल गांधी को भगवान राम और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रावण के तौर पर दिखाया गया है. पोस्टर में तीर-कमान लिए दिख रहे राहुल गांधी के बारे में लिखा गया है कि राहुल के रूप में भगवान राम का अवतार, 2019 में आएगा राहुल राज (रामराज). पोस्टर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दस सिर के साथ रावण के रूप में दिखाया गया हैं. बताया जा रहा है कि यह पोस्टर कांग्रेस के अभय शुक्ला उर्फ़ रिज्जू ने लगवाया है. इससे पहले भी अमेठी में राहुल गांधी के पोस्टर लगाए जा चुके हैं. ये पोस्टर अमेठी के तिलोई विधानसभाओं क्षेत्र के सिंहपुर ब्लॉक के कांग्रेस नेता अभिषेक वाजपेयी ने राहुल गांधी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने पर लगवाए थे. पोस्टर में राहुल गांधी को अर्जुन अवतार और युग पुरुष का ख़िताब दिया गया था, जबकि एक अन्य पोस्टर में राहुल गांधी को शिव भक्त, जनेऊधारी और भगवान परशुराम का वंशज बताया गया था. इतना ही नहीं, सोशल मीडिया में भी कांग्रेसी, भाजपा को टक्कर दे रहे हैं.  

Friday, January 19, 2018

राहुल गांधी ने सच ही तो कहा है

फ़िरदौस ख़ान
अच्छे लोगों के लिए पूरी दुनिया ही अपना परिवार हुआ करती है, उन्हें किसी से कोई बैर नहीं होता. वे जहां जाते हैं, वहां के लोगों को अपना बना लिया करते हैं. लेकिन बुरे लोग अपने परिवार को भी तहस-नहस कर डालते हैं. भारत के प्राचीन ग्रंथ महा उपनिषद में कहा गया है- अयं बन्धुरयं नेतिगणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥
यानी यह अपना भाई है और यह अपना भाई नहीं है, इस तरह की बात तंगदिल लोग करते हैं, बड़े दिल वाले लोगों के लिए तो पूरी दुनिया ही उनका अपना परिवार है. दरअसल, महा उपनिषद का यह श्लोक आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उस वक़्त रहा होगा, जब इसे लिखा गया होगा. प्राचीनकाल से ही भारत की विचारधारा वसुधैव कुटुम्बकम् रही है और यही विचारधारा कांग्रेस की भी है. कांग्रेस ने हमेशा सर्वधर्म समभाव, सर्वधर्म सदभाव में यक़ीन किया है. इसीलिए कांग्रेस अपनी स्थापना काल से ही जन-जन की पार्टी रही है. कांग्रेस के शासनकाल में सभी मज़हबों के लोग मिलजुल रहते आए हैं, लेकिन पिछले कुछ बरसों से देश की हवा में सांप्रदायिकता और जातिवाद का ज़हर शामिल हो गया है.

कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने बहरीन में भारतीयों को संबोधित करते हुए यह मुद्दा उठाया. उन्होंने केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार लोगों को जाति और धर्म के आधार पर बांट रही है. नौकरी पैदा करने में भारत पिछले आठ सालों में सबसे निचले स्तर पर आ गया है. नये निवेश के मामले में भारत पिछले 13 सालों में निचले स्तर पर पहुंच गया है. नोटबंदी के फ़ैसले की वजह से दुनिया भर के भारतीयों की कमाई पर बुरा असर पड़ा है. भारत की आर्थिक विकास की रफ़्तार थम गई है. सरकार बेरोज़गार युवाओं के ग़ुस्से को समाज में नफ़रत फैलाने में इस्तेमाल कर रही है. मैं ऐसे भारत की कल्पना भी नहीं कर सकता, जहां देश का हर नागरिक ख़ुद को देश का हिस्सा न समझे. देश में आज दलितों को पीटा जा रहा है, पत्रकारों को धमकाया जा रहा है और जजों की रहस्यमयी हालात में मौत हो रही है. मैं यहां आपको यह बताने के लिए आया हूं कि आप अपने देश के लिए कितने ख़ास हैं, कितने अहम हैं. आपके घर में गंभीर समस्या है और उसके समाधान की प्रक्रिया में आपको शामिल होना है. आज भारत को आपकी प्रतिभा, आपके कौशल और देशभक्ति की ज़रूरत है. हमें हिंसा और नफ़रत पर चल रही बातचीत को प्रगति, रोज़गार और आपसी भाईचारे की तरफ़ लाना है. हमलोग यह काम आपके कौशल के बिना नहीं कर सकते. उन्होंने कहा कि भारत के निर्माण में अनिवासी भारतीय समुदाय का अहम किरदार रहा है. देश के तीन महान नेता महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और भीमराव आंबेडकर कभी न कभी अनिवासी भारतीय रहे हैं. दक्षिण अफ़्रीका से वापस आने के बाद महात्मा गांधी ने जिस दर्शन को स्थापित किया, वह भारतीय दर्शन था. गांधी के दर्शन में जाति और धर्म के आधार पर विभेद नहीं किया गया. भारत ने लंबा सफ़र इसी दर्शन की बुनियाद पर किया है, लेकिन अब ख़तरे मंडरा रहे हैं. मैं कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष हूं और इस पार्टी का जन्म ही लोगों को साथ लाने के लिए हुआ था.

ग़ौरतलब है कि राहुल गांधी की यह पहली विदेश यात्रा है. वे ग्लोबल ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ पीपुल ऑफ़ इंडिया ओरिजिन द्वारा बहरीन में आयोजित सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए थे। उन्होंने बहरीन के क्राउन प्रिंस शेख़ सलमान बिन हमाद अल ख़लीफ़ा से मुलाक़ात की और पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखी गई किताब ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ उन्हें भेंट की.

बहरीन में दिए गए राहुल गांधी के भाषण को लेकर देश में सियासत गरमा गई और आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो गया. भारतीय जनता पार्टी ने कड़ी प्रतिक्रिया ज़ाहिर करते हुए राहुल गांधी के बयान को शर्मनाक तक कह डाला. इसके जवाब में उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष राज बब्बर ने कहा कि सत्तापक्ष को आलोचना और चिंता में फ़र्क़ समझना चाहिए. राहुल गांधी ने चिंता ज़ाहिर की है. अपने लोगों के बीच में चिंता की जाती है, ताकि उसका हल निकाला जा सके. बहरीन में राहुल के कार्यक्रम में देश के सभी प्रदेशों के लोग थे. पंजाब, केरल, महाराष्ट्र, गुजरात समेत अन्य तमाम प्रदेशों के लोगों के बीच में ये कहना कि हम सबको एक मसले के हल के लिए एकजुट होना चाहिए, यह देश की आलोचना नहीं है. अगर सत्ता पक्ष को लगता है कि आलोचना है, तो फिर लगता है कि कहीं ना कहीं दाढ़ी में तिनका है.

सत्ता पक्ष के नेता, राहुल गांधी की कितनी भी बुराई करें, लेकिन इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता कि उन्होंने बहरीन में जो भी कहा है, बिल्कुल सच कहा है. पिछले कुछ सालों में कई ऐसे वाक़ियात हुए हैं, जिन्होंने सामाजिक समरस्ता में ज़हर घोलने की कोशिश की है, सांप्रदायिक सद्भाव को चोट पहुंचाने की कोशिश की है. मज़हब के नाम पर लोगों को बांटने की कोशिश की है, जात-पांत के नाम पर एक-दूसरे को लड़ाने की कोशिश की है. देश की गरीब जनता पर नित-नये टैक्स का बोझ डाला जा रहा है. आए-दिन खाद्यान्न और रोज़मर्रा में काम आने वाली चीज़ों के दाम बढ़ाए जा रहे हैं. हालत यह है कि जनता की जमा पूंजी पर भी आंखें गड़ा ली गई हैं. बैंक नित-नये फ़रमान जारी कर ग्राहकों के खाते से पैसा काट रहे हैं. मरीज़ों को भी नहीं बख़्शा जा रहा है. दवाओं यहां तक कि जीवन रक्षक दवाओं के दाम भी बहुत ज़्यादा बढ़ा दिए गए हैं. कभी नोटबंदी तो कभी जीएसटी लागू कर लोगों के काम-धंधे बंद कर दिए गए. समाज में हाशिये पर रहने वाले तबक़ों की आवाज़ को भी कुचलने की कोशिश की जा रही है. आदिवासियों को उजाड़ा जा रहा है. जल, जंगल और ज़मीन के लिए संघर्ष करने वाले आदिवासियों को नक्सली कहकर प्रताड़ित करने का सिलसिला जारी है. दलितों पर अत्याचार बढ़ गए हैं. ज़ुल्म के ख़िलाफ़ बोलने पर दलितों को देशद्रोही कहकर सरेआम पीटा जाता है. हाल ही में महाराष्ट्र में पुणे ज़िले के भीमा-कोरेगांव मंा हुई हिंसा में दलितों पर हमले किए गए. गाय के नाम पर मुसलमान तो निशाने पर हैं ही. अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने पर उन्हें दहशतगर्द क़रार देकर अंदर कर दिया जाता है.

अलबत्ता देश की एकता और अखंडता को बनाए रखना, देश में चैन और अमन क़ायम रखना सरकार की सबसे पहली ज़िम्मेदारी है. अगर सरकार इसमें नाकाम साबित हो रही है, तो ये विपक्ष की ज़िम्मेदारी है कि वे सरकार को आईना दिखाए और देश में चैन और अमन बनाए रखने के लिए काम करे. अगर राहुल गांधी ये काम कर रहे हैं, तो इसके लिए उनकी सराहना की जानी चाहिए, उनका साथ दिया जाना चाहिए. बहरहाल, सत्तापक्ष को आत्ममंथन की ज़रूरत है, आत्म विश्लेषण की ज़रूरत है.