Showing posts with label अंतर्राष्ट्रीय. Show all posts
Showing posts with label अंतर्राष्ट्रीय. Show all posts

Thursday, September 21, 2017

कांग्रेस बेरोज़गारी दूर कर सकती है : राहुल गांधी

फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी फ़िलहाल अमेरिका के दौरे पर हैं. उन्होंने बुधवार रात न्यूयॉर्क के ऐतिहासिक टाइम्स स्क्वायर के पास एक होटल में भारतीय समुदाय के लोगों को संबोधित किया. ग़ौरतलब है कि वे इससे पहले प्रिंसटन और बर्कले यूनिवर्सिटी में भी भाषण दे चुके हैं. राहुल गांधी अपने भाषण में  जहां भारत से जुड़े मुद्दे उठा रहे हैं, वहीं उनका हल भी बता रहे हैं. वे बता रहे हैं कि किस तरह बेरोज़गारी और सांप्रदायिकता जैसी समस्याओं से निपटा जा सकता है, किस तरह देश का विकास किया जा सकता है. किस तरह देश दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना सकता है.
टाइम्स स्क्वायर में अप्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा, मैं मंच पर मौजूद सभी लोगों का स्वागत करता हूं और इस हॉल में मौजूद आप में से हर एक का स्वागत करता हूं.
आपको पता है कि कई साल पहले सैम भारत आए थे और उन्होंने अभी आपको इंदिरा गांधी जी द्वारा उनके प्रेजेंटेशन को सुनने की बात बताई. मुझे लगता है, सैम ने 1982- 1979 की बात है. मुझे लगता है कि आप दोबारा 1982 में आएं. तो वे 1982 में जब आए, तो उस वक़्त मैं 12 साल का था और एक सुबह मेरे पिता ने मुझसे कहा कि एक प्रेज़ेंटेशन होने वाला है और तुम्हें आना है.
तब प्रेज़ेंटेशन क्या होता है, मुझे ये नहीं पता था. मैंने सोचा कि मुझे कोई ईनाम मिलेगा. ख़ैर, मैं वहां गया और मेरी बहन और मैं कमरे में पीछे की तरफ़ चुपचाप बैठ गए. और हम वहां 6 घंटे तक बैठे रहे. और सैम और मेरे पिता कंप्यूटर पर चर्चा करते रहे. मुझे नहीं पता था कि ये कंप्यूटर क्या चीज़ है. हक़ीक़त में 1982 में कोई भी नहीं जानता था कि कंप्यूटर होता क्या है. मेरे लिए ये एक बॉक्स था, जिसमें टीवी स्क्रीन लगी हुई थी. मेरे लिए यह उस पर एक टीवी स्क्रीन के साथ एक छोटे से बॉक्स की तरह दिखता था. और सच कहूं तो मुझे वो प्रेज़ेंटेशन पसंद नहीं आया, क्योंकि बच्चे के तौर पर मुझे वहां 6 घंटे तक बैठना अच्छा नहीं लगा. और 4-5 साल बाद मैंने उस प्रेज़ेटेशन का नतीजा देखना शुरू किया. प्रधानमंत्री कार्यालय में टाईप राइटर होता था और हर कोई टाईप राइटर का इस्तेमाल करना चाहता था.
सैम और मेरे पिता ने पीएमओ में कहा कि अब हमें कंप्यूटर का इस्तेमाल करना होगा. और हर किसी ने उस वक़्त कहा,  नहीं. हमें अपना टाईप राइटर ही पसंद है, हमें कंप्यूटर नहीं चाहिए. तब सैम और मेरे पिता ने अपनी विशिष्ट शैली में कहा कि ठीक है. आप अपना टाईप राइटर रखें, लेकिन जो हम करना चाहते हैं, वो एक महीने के लिए टाईप राइटर की जगह कंप्यूटर का इस्तेमाल है. और एक महीने के बाद हम आपको आपका टाईप राइटर वापस दे देंगे. उन लोगों ने उन्हें एक महीने के लिए कंप्यूटर दिया और एक महीने बाद उन लोगों ने कहा कि ठीक है. अब हम आपको आपका टाईप राइटर वापस लौटा रहे हैं, तब हर किसी ने लड़ना शुरू कर दिया कि नहीं, हमें अब टाईप राइटर वापस नहीं चाहिए, हमें कंप्यूटर चाहिए.

विचारों को भारत में आने में वक़्त लगता है, लेकिन जब विचार अच्छा हो, तो भारत उसे तेज़ी से समझता है और उसे तेज़ी से अपनाता है. और दुनिया को दिखा देता है कि इसका बेहतर ढंग से इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है. मैं कार में सैम से बात कर रहा था और मैंने उन्हें एक बात कही और उन्होंने कहा कि ओह !
मैंने तो इसके बारे में कभी सोचा ही नहीं. आप सभी एनआरआई हैं. कांग्रेस आंदोलन, मूल कांग्रेस आंदोलन, एक एनआरआई आंदोलन था.  महात्मा गांधी एक प्रवासी भारतीय थे.  जवाहरलाल नेहरू इंग्लैंड से वापस लौटे थे. अम्बेडकर,  आज़ाद, पटेल ये सभी एनआरआई थे. उनमें से हर कोई बाहरी दुनिया में गया था. बाहरी दुनिया को देखा था.  भारत वापस लौट आया और जो कुछ विचार उन्हें हासिल हुआ, उससे भारत को बदल दिया. मैं इससे भी आगे जाऊंगा. भारत में सबसे बड़ी कामयाबी, हालांकि भाजपा के मित्र कहते हैं कि कुछ भी नहीं हुआ, लेकिन भारत में हमारी सबसे बड़ी सफ़लताओं में से एक दुग्ध क्रांति है. भारत में अधिकांश लोग दूध पीते हैं, उसे कुरियन नाम के व्यक्ति जो खुद एनआरआई थे, ने मुमकिन कर दिखाया. वे अमेरिका से वापस आए और उन्होंने भारत को बदल दिया.
सैम एक और मिसाल हैं. और इस तरह की हज़ारों-हज़ार मिसालें हैं, जिनके बारे में हमें पता नहीं है. तो इससे पहले कि मैं अपने भाषण की गहराई में जाऊं.  मैं आपको बताना चाहता हूं कि मैं सेंट फ्रांसिस्को, लॉस एंजिल्स, वाशिंगटन, न्यूयॉर्क में गया. मैंने प्रिंसटन और बर्कले में लोगों को संबोधित किया और जहां भी मैं गया, आप लोगों की वजह से मुझे एक हिन्दुस्तानी होने पर गर्व महसूस हुआ. इस देश में आप लोग हर जगह हैं. यहां भारतीय व्यक्ति है, जो अमेरिका के लिए काम कर रहा है. भारत के लिए काम कर रहा है, शांति से रह रहा है और इस देश और भारत देश का निर्माण कर रहा है.
तो मैं आपको यह बताकर अपनी बात की शुरुआत करना चाहता हूं कि हक़ीक़त में आप हमारे देश की रीढ़ हैं.
कुछ लोग भारत को एक भौगोलिक संरचना के तौर पर देखते हैं. वे भारत को ज़मीन के एक टुकड़े के रूप में देखते हैं. मैं भारत को ज़मीन के एक टुकड़े के रूप में नहीं देखता. मैं भारत को विचारों के एक समूह के तौर पर देखता हूं. तो मेरे लिए, कोई भी व्यक्ति, जो भारत के विचारों को तैयार करता है, वह भारतीय है. हमारे देश में कई सारे मज़हब हैं. हमारे देश में कई सारी अलग-अलग भाषाएं हैं. उनमें से हर कोई मिलजुल कर ख़ुशी से रहता है. और वे ऐसा करने में इसलिए कामयाब हुए हैं, क्योंकि इसकी वजह कांग्रेस पार्टी के विचार हैं.
सैम पित्रोदा ने अभी कहा कि कांग्रेस 130 साल पुरानी है. ये सही बात है. कांग्रेस का संगठन 100 साल से थोड़ा ज़्यादा पुराना है. लेकिन भारत में कांग्रेस के विचार हज़ारों साल पुराने हैं.
सैम ! हम सिर्फ़ एक संगठन का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि हम एक दर्शन का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो हज़ारों साल पुराना है. और मैं आपको थोड़ा बताता हूं कि वो दर्शन क्या है? गांधी जी ने हक़ीक़त में किसके लिए लड़ाई लड़ी? हमारा स्वतंत्रता संग्राम किस लिए था? कुरियन जी ने क्या काम किया?
सैम पित्रोदा ने क्या किया और हज़ारों प्रवासी भारतीयों ने क्या किया? ये सभी सच के लिए खड़े हुए. इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उनके सामने क्या खड़ा है. जब वे किसी चीज़ पर भरोसा करते हैं और उन्हें यक़ीन होता है कि ये सच है, तो वे इसके लिए खड़े हो जाते हैं और इसके लिए उन्हें क़ीमत चुकानी पड़ती है. यही कांग्रेस का विचार है.
मेरे इस सफ़र के दौरान मैंने काफ़ी बातचीत की. मैं प्रशासन के काफ़ी लोगों से मिला. मैंने डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों पार्टियों के लोगों से मुलाक़ात की. मैं कई दोस्तों से मिला.  एनआरआई दोस्तों से मिला. और मैं आपको बताना चाहता हूं कि मैं हैरान रह गया, क्योंकि इससे पहले कि मैं उन्हें कुछ बता पाता कि मैं किस बारे में चिंतित हूं, उन लोगों ने मुझे ठीक वही बात कह दी. और सबसे बड़ी बात ये थी कि ज़्यादातर लोगों ने मुझे बताया कि भारत में प्रबल रहने वाली सहिष्णुता का क्या हुआ? भारत में सद्भावना का क्या हुआ?
कई सारी चुनौतियां हैं, जिनका भारत को सामना करना पड़ रहा है. सबसे बड़ी चुनौती, और मैं आपको इसके आंकड़े दूंगा. हर दिन 30 हज़ार युवा नौकरी बाज़ार में शामिल होते हैं.इसका मतलब है कि 24 घंटे में 30 हज़ार नये भारतीय नौकरी के लिए बाज़ार में आते हैं. आज उनमें से केवल 450 को ही नौकरी मिल रही है. मैं बेरोज़गारों के बारे में बात नहीं कर रहा हूं. मैं बता रहा हूं कि हर एक दिन 30 हज़ार नये लोग आते हैं और सिर्फ़ 450 लोगों को ही नौकरी मिलती है. हमारे देश के सामने ये सबसे बड़ी चुनौती है. और इस चुनौती को लोगों को एकजुट करने और इस समस्या का समाधान करके एकीकृत दृष्टिकोण के निर्माण से संबोधित किया जा सकता है.
हम भारत में हर किसी चीज़ पर चर्चा करते हैं. भारत में बांटने वाली राजनीति चल रही है, लेकिन भारत का सामना जिस असली चुनौती से है, वो नौकरी के लिए आने वाले 30 हज़ार युवाओं और उनमें से केवल 450 को नौकरी मिलने को लेकर है.
अगर ऐसे ही चलता रहा, तो आप कल्पना कर सकते हैं कि क्या नतीजे होंगे. भारत अगर अपने युवाओं को रोज़गार नहीं दे पाता, तो वो उन्हें कोई दृष्टिकोण नहीं दे सकता. इस समस्या को हल करने के लिए कांग्रेस पार्टी के पास दूरदृष्टि है. और मैं इस विज़न के बारे में थोड़ा आपको बताना चाहता हूं.
इस वक़्त पूरा फ़ोकस 50-60 काफ़ी बड़ी कंपनियों पर है. मेरा मानना है कि अगर आपको भारत में लाखों-करोड़ों रोज़गार पैदा करने हैं, तो ये छोटे और मध्यम कारोबार को सशक्त बनाकर ही किया जा सकता है. ये काम उद्यमियों को सशक्त बनाकर किया जा सकता है. दूसरा, मैं आपको एक और आंकड़ा बताता हूं. भारत में 40 फ़ीसद सब्ज़ियां सड़ जाती हैं. कृषि को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए. यहां पंजाब के लोग भी हैं.
आप समझ सकते हैं कि मैं हक़ीक़त में क्या कह रहा हूं. कृषि हमारी सामरिक संपत्ति है. हमें कृषि का विकास करने की ज़रूरत है. हमें शीत भंडारण श्रृंखला विकसित करने की ज़रूरत है. हमें खेतों के पास फ़ूड प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की ज़रूरत है और हमें भारतीय कृषि को सशक्त बनाने की ज़रूरत है. अगर हम अपने किसानों को सशक्त बनाते हैं, तो हमें लाखों नौकरियां मिल सकती हैं.
स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं बदलने वाली हैं और बर्कले में मैंने अपने भाषण में ये बात कही थी. आज स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी सभी जानकारियां डॉक्टरों को याद हैं. आने वाले कल में ये सारी जानकारियां कंप्यूटर पर होने जा रही हैं. भारत में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है. हम हृदय शल्य चिकित्सा, नेत्र शल्य चिकित्सा सहित काफ़ी तादाद में शल्य क्रियाएं करते हैं. हमें इन सबकी गहरी समझ है कि इन्हें कैसे किया जा सकता है. स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में भारत के लिए बड़ा मौक़ा है. हम दुनिया के स्वास्थ्य सेवा केंद्र बन सकते हैं. लेकिन हमें आज इसके लिए योजना बनानी होगी. और मैं केवल स्वास्थ्य पर्यटन के बारे में बात नहीं कर रहा हूं. मैं ऐसी मान्यता प्रणाली के निर्माण के बारे में बात कर रहा हूं, जिससे भविष्य में चिकित्सा प्रक्रियाओं का बड़ा हिस्सा हमारे देश में किया जाएगा.
मैं आईआईटी के लिए भी इसी तरह का दृष्टिकोण आपको बता सकता हूं. मैं बर्कले में गया. कल मैं प्रिंस्टन में था. अमेरिकी विश्वविद्यालय ज्ञान नेटवर्क हैं. सूचनाएं उनके भीतर दौड़ती हैं. वे कारोबार से जुड़े हुए हैं, वे अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए हैं. हमारे आईआईटी शानदार संस्थान हैं, लेकिन वे नेटवर्क नहीं हैं. अगर हम अपने आईआईटी को अपने उद्योगों से जोड़ते हैं, अगर हम अपने आईआईटी को दुनियाभर के कारोबारों से जोड़ते हैं, तो वे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों के साथ प्रतिस्पर्धा करना शुरू कर देंगे. ये सारी चीज़एं हैं, जो की जा सकती हैं.
लेकिन मैं वापस अपने भाषण की शुरुआत में जाना चाहता हूं. आपको शामिल होने की ज़रूरत है. आपके पास ज़बरदस्त ज्ञान है, आपके पास शानदार समझ है, आप विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हैं. मैं आपको आगे आने और आगे बढ़ने के दृष्टिकोण पर कांग्रेस पार्टी के साथ काम करने के लिए आमंत्रित करना चाहता हूं. हम आपकी मदद लेना चाहते हैं और देखिए, सैम पित्रोदा ने अकेले दूरसंचार उद्योग को बदल कर रख दिया.हम एक सैम पित्रोदा को नहीं चाहते. हम कम से कम 10-15 सैम पित्रोदा चाहते हैं, क्योंकि भारत में काफ़ी काम करना है. अख़िर में मैं आपसे कहना चाहता हूं कि भारत ने हमेशा दुनिया को दिखाया है कि भाईचारे के साथ कैसे रहना है.
भारत हज़ारों सालों से एकता और शांति के साथ रहने के लिए दुनियाभर में जाना जाता है. इसे चुनौती दी जा रही है. हमारे देश में ऐसी ताक़तें हैं, जो देश को बांट कर रही हैं और देश के लिए यह बहुत ख़तरनाक है. और ये विदेशों में हमारी साख को बर्बाद कर रही हैं.
डेमोक्रेटिक पार्टी के, रिपब्लिकन पार्टी के काफ़ी सारे लोगों ने मुझसे पूछा कि हमारे देश में क्या हो रहा है. हम हमेशा विश्वास करते थे कि आपका देश एकजुटता से काम करता है. हम हमेशा मानते थे कि आपका देश शांतिपूर्ण है, आपके देश में क्या हो रहा है? और इसी चीज़ के ख़िलाफ़ हमें लड़ना है. दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बेहद अहम है. दुनिया बदल रही है और लोग हमारी तरफ़ देख रहे हैं. चीन उभर रहा है, अमेरिका के साथ हमारे संबंध हैं. हिंसक दुनिया के कई देश भारत की तरफ़ देख रहे हैं, और कह रहे हैं कि इक्कीसवीं सदी में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का जवाब भारत दे सकता है. इसलिए हम अपनी सबसे ताक़तवर संपत्ति खो नहीं सकते. हमारी सबसे बड़ी संपत्ति ख़ुशी, शांति और प्यार से रहने वाली 130 करोड़ जनता है. और पूरी दुनिया ने हमें इस चीज़ के लिए सम्मान दिया है. और यही वो चीज़ है, जिसे हम कांग्रेस के लोग, हममें से हर एक को बचाना है.एक देश के रूप में भारत सभी लोगों के लिए है. इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वे कौन हैं, मैं अपने सिख भाइयों को देख सकता हूं, मैं विभिन्न राज्यों के लोगों को देख सकता हूं.
भारत अकेले आप में से किसी से संबंधित नहीं है, बल्कि भारत इस पूरे कमरे से जुड़ा हुआ है. भारत का रिश्ता हम सभी से है और यही कांग्रेस पार्टी है. मैं एक बार फिर से आप सभी का बहुत धन्यवाद करना चाहता हूं.
और मैंने सैम को बताया है, सैम ! आप जब भी चाहें कि मैं अमेरिका आऊं, आप जहां कहीं भी मुझे बुलाना चाहें बस मुझे एक फ़ोन कर दें, मैं हाज़िर हो जाऊंगा. और आख़िरी बात मैंने आज सैम को बताया.
उन्होंने तस्वीरों के बारे में कहा और मैंने कुछ सीखा है. सैम, हमारे यहां व्यक्तिगत तस्वीरें चलती हैं, तो मुझे लगता है कि अगली बार हमारे पास काफ़ी वक़्त होगा, ताकि हम एक दूसरे के साथ सेल्फ़ी और फ़ोटो ले सकें.
आपका बहुत धन्यवाद.
आप सभी को शुभकामनाएं

Tuesday, October 6, 2015

मुसलमानों की बदहाली


फ़िरदौस खान
दुनिया में एक क़ौम ऐसी भी है, जिसके दुनियाभर में तक़रीबन 54 मुल्क हैं... इसके बावजूद क़ौम की हालत बद से बदतर होती जा रही है... हालत ये है कि कहीं उन्हें मस्जिदों में क़त्ल किया जा रहा है, तो कहीं उन्हीं के घर में घुसकर उन्हें मारा जा रहा है... न उनकी जान महफ़ूज़ और न ही कोई उनके माल का रखवाला है... वे बेबसी के आलम में अपना घर, अपना मुहल्ला, अपना शहर और अपना मुल्क छोड़कर ईसाई देशों में पनाह मांग रहे हैं... उनके रहमो-करम पर ज़िन्दा रहने के वसीले तलाश रहे हैं...
क्योंकि-
इस क़ौम के मानने वालों में इत्तेहाद नहीं है... इस क़ौम के फ़िरक़ापरस्त लोग ख़ुद को ’सच्चा’ और दूसरों को ’बुरा’ साबित करने में ही लगे रहते हैं... आपस में ही एक-दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं... इनकी बदहाली की सबसे बड़ी वजह यही है... 

Friday, September 4, 2015

इंसानियत को शर्मसार करते दहशतगर्द


फ़िरदौस ख़ान
दहशतगर्दों ने इंसानियत को शर्मसार करके रख दिया है. दुनियाभर के कई देश दहशतगर्दी से जूझ रहे हैं और कई अन्य देशों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है. दहशतगर्दों को किसी की जान लेते हुए ज़रा भी रहम नहीं आता. अपनी ख़ूनी प्यास बुझाने के लिए ये दहशतगर्द कितने ही घरों के चिराग़ों को बुझा डालते हैं, कितनी ही मांओं की गोद सूनी कर देते हैं और बच्चों को यतीम बना देते हैं. तीन साल का एलन कुर्दी भी दहशतगर्दों की वजह से ही मारा गया. वह अपने पांच साल के भाई गालेब और मां रिहाना के साथ समुद्र में डूब गया. पूरा परिवार कुछ अन्य लोगों के साथ जंग से जूझ रहे सीरिया से निकलकर यूरोप जा रहा था. किश्ती समुद्र में पलट गई. लहरों ने इसमें से एक पांच साल के बच्चे को तुर्की के समुद्र टक पर फेंक दिया. वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने बच्चे को उठाया और अस्पताल ले गए, लेकिन चिकित्सीय जांच में पता चला कि उसकी मौत हो चुकी है.

एलन के पिता अब्दुल्ला ने कहा कि उनके दोनों बच्चे बहुत ख़ूबसूरत थे. वे उनकी गोद में सिमटे थे कि किश्ती डूब गई. उन्होंने बच्चों को बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वे हाथों से फिसलकर आंखों के सामने समुद्र में समा गए. वे चाहते हैं कि पूरी दुनिया की नज़र इस हादसे पर जाए, ताकि दोबारा ऐसा किसी और के साथ न हो. अब्दुल्ला का कहना है कि उन्होंने अपने परिवार को ग्रीस ले जाने के लिए तस्करों को दो बार पैसे दिए, लेकिन उनकी हर कोशिश नाकाम रही. इसके बाद उन्होंने एक किश्ती पर सवार होकर पहुंचने की कोशिश की. किश्ती के पानी में जाने के चार मिनट बाद ही कैप्टन ने बताया कि वह डूबने वाली है. तेज़ लहरों की वजह से किश्ती पलट गई. वे अंधेरे में चीख़ रहे थे. उनकी आवाज़ उनकी पत्नी और बच्चे नहीं सुन सके. अब्दुल्ला अपने बेटे की लाश के साथ शुक्रवार को सीरिया के शहर कोबान पहुंचे. आईएसआईएस और कुर्दिश विद्रोहियों के बीच जंग की वजह से पूरा शहर तबाह हो चुका है. तीन महीने पहले ही अब्दुल के परिवार के 11 लोगों को आईएसआईएस के दहशतगर्दों ने क़त्ल कर दिया था. इसी शहर के कब्रिस्तान में एलन, उसकी मां और भाई को दफ़नाया गया.

ग़ौरतलब है कि तस्वीर के सामने आते ही दुनियाभर में एलन की तस्वीर छापने और न छापने पर बहस छिड़ गई. कई अख़बारों में छपा भी. ला-रिपब्लिका (इटली) ने शीर्षक दिया- ‘दुनिया को ख़ामोश करती एक उदास तस्वीर.’ इंग्लैंड के द सन ने लिखा ‘ये ज़िन्दगी और मौत है।’ डेली मिरर ने ‘असहनीय हक़ीक़त’ बताया. मेट्रो ने लिखा- ‘यूरोप बचा नहीं सका.’ द टाइम्स ने कहा- ‘बंटे हुए यूरोप का चेहरा.’ डेली मेल ने लिखा- ‘मानवीय आपदा का मासूम शिकार.’ अवाम के साथ-साथ सरकारों के बीच भी इस तस्वीर को लेकर बहस छिड़ी हुई है. जर्मनी ने कहा है कि यूरोप के सभी देश शरणार्थियों को जगह देने से इंकार करने लगेंगे, तो इससे ‘आइडिया ऑफ़ यूरोप’ ही ख़त्म हो जाएगा. ये बच्चा बच सकता था, अगर यूरोप के देश इन लोगों को शरण देने से इंकार नहीं करते. तुर्की के प्रेसिडेंट रीसेप अर्डान ने जी20 समिट में यहां तक कह दिया कि इंसानियत को इस मासूम की मौत की ज़िम्मेदारी लेनी होगी. जर्मनी और फ्रांस ने ऐलान किया कि शरणार्थियों के लिए यूरोपीय देशों का कोटा तय होगा. मौजूदा नियम में भी ढील दी जाएगी, ताकि लोगों का आना आसान हो सके.  यूएन रिपोर्ट के मुताबिक़ एक साल में 1.60 लाख लोग समुद्र के रास्ते ग्रीस आ चुके हैं. जनवरी से अब तक तीन हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है.

एलन की तस्वीर लेने वाले फ़ोटोग्राफ़र निलुफेर देमीर ने कहा है कि उन्होंने बच्चे को तट पर देखा. उन्हें लगा कि इस बच्चे में अब ज़िन्दगी नहीं बची है, तो उन्होंने तस्वीर लेने की सोची, ताकि दुनिया को बताया जा सके कि हालात कितने ख़राब हो चुके हैं. वाक़ई इस तस्वीर ने दहशतगर्दी पर एक बार फिर से सबका ध्यान खींचा है. अब देखना यह है कि इस मुद्दे पर क्या कोई सार्थक पहल होती है या फिर हमेशा की तरह ही बयानबाज़ी के बाद इसे फिर से ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा. इस मुद्दे पर अरब देशों की ख़ामोशी बेहद शर्मनाक है.

हालांकि यूरोपियन यूनियन ने आगामी 16 सितंबर को होने वाली बैठक में इस संकट से निकलने के रास्ते पर विचार करने का फ़ैसला किया है. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा है कि वे हज़ारों शरणार्थियों को अपनाने के लिए तैयार हैं. उन्होंने शरण दिए जाने को लेकर देश के क़ानून की समीक्षा के आदेश दे दिए हैं. हालांकि इस मुद्दे पर सभी देशों की एक राय नहीं बन पाई है. कोटा सिस्टम रिजेक्ट किया जा चुका है. यूरोपीय देशों में आपस में ही मतभेद सामने आ रहे हैं. इसकी वजह यह है कि कुछ देश इस संकट से ज़्यादा प्रभावित हैं. उनके यहां बहुत ज़्यादा शरणार्थी पहुंच रहे हैं, इसलिए इन पर शरणार्थियों के साथ सख़्ती करने का दबाव बन रहा है. हंगरी ने सर्बिया के बॉर्डर पर 175 किलोमीटर लंबी बाड़ लगाई है. वहीं, ब्रिटेन ने जनवरी 2014 के बाद से महज़ 216 सीरियाई शरणार्थियों को अपनाया है. तुर्की ने 20 लाख लोगों को शरण दी है. वहीं, पूरे यूरोप ने बीते चार साल में महज़ दो लाख शरणार्थियों को अपनाया है. तुर्की के प्रेसिडेंट ने तो यहां तक कह दिया कि 28 देश मिलकर यह विचार-विमर्श कर रहे हैं कि 28 हज़ार शरणार्थियों को आपस में कैसे बांटा जाए. इस साल जुलाई तक चार लाख 38 हज़ार लोग यूरोपीय देशों में शरण मांग चुके हैं. बीते साल ही पांच लाख 71 हज़ार लोग यूरोप में शरण ले चुके हैं. शरणार्थियों की यह बढ़ती तादाद यूरोपीय देशों ख़ासकर तौर पर शेंगेन देशों के लिए संकट का सबब बन गई है. शेंगेन इलाक़े के तहत कुल 26 यूरापीय देश आते हैं, जिन्होंने कॉमन बॉर्डर पर पासपोर्ट और दूसरे क़िस्म के बॉर्डर कंट्रोल हटा लिए हैं. कॉमन वीज़ा पॉलिसी के तहत यह पूरा इलाक़ा एक देश की तरह काम करता है. यहां लोगों की आवाजाही पर पाबंदी नहीं है. यूरोपीय देशों में शरण लेने की कोशिश करने वाले लोग ज़्यादातर भूमध्य सागर के ज़रिये वहां पहुंचने की कोशिश करते हैं. जिन देशों में ये जाते हैं, वहां इनके लिए खाना, छत और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने में सरकार को परेशानी होती हैं.

ग़ौरतलब है कि ये शरणार्थी पश्चिमी एशिया और नॉर्थ अफ्रीका के जंग से प्रभावित इलाक़ों और ग़रीब यूरोपीय देशों से हैं. ज़्यादातर लोग सीरिया और लीबिया से पहुंच रहे हैं, जहां पिछले चार साल से गृहयुद्ध छिड़ा हुआ है. यहां आतंकवादी संगठन आईएसआईएस ने लोगों का जीना दुश्वार कर रखा है. इसके अलावा अफ़ग़ानिस्तान, इराक़ और नाइजीरिया से भी लोग ग़रीबी और जंग से परेशान होकर यूरोप जाना चाहते हैं. यूरोप से आने वाले शरणार्थियों में कोसोवो और सर्बिया जैसे देशों के लोग शामिल हैं. इस साल ग्रीस के बॉर्डर पर सबसे ज़्यादा लोग शरण लेने पहुंचे. इनमें से ज़्यादातर सीरिया के नागरिक थे, जो तुर्की तक किश्तियों में सवार होकर पहुंचे. लोग छोटी-छोटी किश्तियों में बैठकर ये ट्यूनीशिया या लीबिया से इटली पहुंचने की कोशिश करते हैं. क्षमता से ज़्यादा लोग इन किश्तियों पर सवार होने की वजह से कई बार बड़े हादसे होते रहते हैं. कुछ किश्तियां लीबिया तट तक पहुंचने से पहले ही डूब गईं. कुछ लालची लोग इन लोगों की जान की परवाह न करते हुए इन्हें रबर की बनी किश्तियों में यूरोप भेजने की कोशिश करते हैं और बदले में लाखों रुपये कमाते हैं. ये किश्तियां पानी पर तैरते ताबूत बनकर रह गई  हैं. अब तक 3200 से ज़्यादा लोगों इन किश्तियों के डूबने की वजह से मारे जा चुके हैं और ये सिलसिला बदस्तूर जारी है.

दरअसल, दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ माहौल बनाना होगा. अगर अब भी इसे उतनी संजीदगी से नहीं लिया गया, जितना लिया जाना चाहिए, तो एक दिन ये पूरी दुनिया को तबाह कर देगा. जब तक दुनिया के सभी देश मिलकर ईमानदारी से दहशतगर्दों के ख़िलाफ़ सख़्ती नहीं बरतेंगे, तब तक न जाने कितने मासूम इसी तरह अपनी जान गंवाते रहेंगे.

Saturday, June 27, 2015

दहशतगर्द नमाज़ियों को भी नहीं बख़्श रहे हैं


फ़िरदौस ख़ान
दहशतगर्द नमाज़ियों को भी नहीं बख़्श रहे हैं... रमज़ान के दूसरे जुमे को क़ुवैत की मस्जिद में नमाज़ के दौरान बम धमाका किया गया, जिसमें 27 नमाज़ियों की मौत हो गई है और बहुत से नमाज़ी ज़्ख़्मी हो गए... जुमे की नमाज़ के दौरान मस्जिदों में बम धमाके कर नमाज़ियों का ख़ून बहाने की दिल दहला देने वाली ख़बरें आए दिन सुनने को मिलती रहती हैं... दहशतगर्दों को किसी की जान लेते हुए ज़रा भी रहम नहीं आता... अपनी ख़ूनी प्यास बुझाने के लिए ये दहशतगर्द कितने ही घरों के चिराग़ों को बुझा डालते हैं, कितनी ही मांओं की गोद सूनी कर देते हैं और बच्चों को यतीम बना देते हैं...
समझ नहीं आता कि ये दरिन्दे किसे अपना ख़ुदा मानते हैं, क्योंकि अल्लाह को मानने वाला किसी की जान बचाने के लिए अपनी जान तो दे देगा, लेकिन अपने फ़ायदे के लिए कभी किसी की जान नहीं लेगा...

ये देखकर बहुत दुख होता है कि आए दिन मस्जिदों में होने वाले बम धमाकों में मरने वाले नमाज़ियों के बच्चों से किसी को ज़रा भी हमदर्दी नहीं है...
वो मासूम बच्चे, जिनके बाप को वहशी दरिन्दों ने बम से उड़ा दिया... वो बच्चे, जो अब कभी अपने बाप के लाए नये कपड़े नहीं पहन पाएंगे, वो बच्चे, जिनका हाथ थामकर अब ईद की नमाज़ में ले जाने वाला बाप नहीं रहा... अब कौन उन्हें गोद में उठाकर प्यार करेगा, कौन ईद के मेले में ले जाएगा...

कहते हैं कि रमज़ान के महीने में अल्लाह शैतान को क़ैद कर देता है, लेकिन दुनिया में तो बड़े-बड़े शैतान भरे पड़े हैं, लानत हैं इन पर...
आओ ! दुआ करें कि इस दुनिया से दहशतगर्दी का ख़ात्मा हो और हर सिम्त चैन-अमन हो, आमीन

Monday, October 27, 2014

रेहाना ! हमें माफ़ करना...


-फ़िरदौस ख़ान
एक लड़की जो जीना चाहती थी... अरमानों के पंखों के साथ आसमान में उड़ना चाहती थी, लेकिन हवस के भूखे एक वहशी दरिन्दे ने उसकी जान ले ली. एक चहकती-मुस्कराती लड़की अब क़ब्र में सो रही होगी... उसकी रूह कितनी बेचैन होगी... सोचकर ही रूह कांप जाती है... लगता है उस क़ब्र में रेहाना जब्बारी नहीं हम ख़ुद दफ़न हैं...
रेहाना ! हमें माफ़ करना... हम तुम्हारे लिए सिर्फ़ दुआ ही कर सकते हैं...

ग़ौरतलब है कि तमाम क़वायद के बावजूद दुनियाभर के संगठन 26 साल की ईरानी महिला रेहाना जब्बारी को नहीं बचा सके. रेहाना को 25 अक्टूबर को फांसी दे दी गई. रेहाना पर इल्ज़ाम था कि उसने 2007 में अपने साथ ज़बरदस्ती करने की कोशिश करने वाले ख़ुफ़िया एजेंट मुर्तजा अब्दोआली सरबंदी पर चाक़ू से वार किया था, जिससे उसकी मौत हो गई थी. रेहाना को साल 2009 में क़त्ल का क़ुसूरवार पाया गया था. क़ानून मंत्री मुस्तफ़ा पी. मोहम्मदी ने अक्टूबर में इशारा किया था कि रेहाना की जान बच सकती है, लेकिन सरबंदी के परिजनों ने रेहाना की जान बचाने के लिए पैसे लेने से इंकार कर दिया. रेहाना की मां ने जज के सामने अपनी बेटी रेहाना की जगह ख़ुद को फांसी दे दिए जाने की गुहार लगाई थी.
पेशे से इंटीरियर डिज़ाइनर रेहाना को फांसी से बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुहिम चलाई गई, लेकिन उसकी जान नहीं बच सकी. मानवाधिकार संगठन ऐमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस आदेश को बिल्कुल ग़लत ठहराते हुए कहा कि हालांकि रेहाना ने सरबंदी को रेप की कोशिश करते वक़्त चाक़ू मारे जाने की बात मानी, लेकिन उसका क़त्ल कमरे में मौजूद एक अन्य व्यक्ति ने किया था.

रेहाना ने फांसी से पहले अपनी मां को एक ख़त लिखकर अपनी मौत के बाद अंगदान की ख़्वाहिश ज़ाहिर की. इस ख़त को रेहाना की मौत से दूसरे दिन 26 अक्टूबर को सार्वजनिक किया गया.  अपने ख़त में रेहाना लिखती है-

मेरी प्रिय मां,
आज मुझे पता चला कि मुझे किस्सास (ईरानी विधि व्यवस्था में प्रतिकार का क़ानून) का सामना करना पड़ेगा. मुझे यह जानकर बहुत बुरा लग रहा है कि आख़िर तुम क्यों नहीं अपने आपको यह समझा पा रही हो कि मैं अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी पन्ने तक पहुंच चुकी हूं. तुम जानती हो कि तुम्हारी उदासी मुझे कितना शर्मिंदा करती है. तुम क्यों नहीं मुझे तुम्हारे और अब्बा के हाथों को चूमने का एक मौक़ा देती हो?

मां, इस दुनिया ने मुझे 19 साल जीने का मौक़ा दिया. उस मनहूस रात को मेरा क़त्ल हो जाना चाहिए था. मेरी लाश शहर के किसी कोने में फेंक दी गई होती और फिर पुलिस तुम्हें मेरी लाश को पहचानने के लिए लाती और तुम्हें मालूम होता कि क़त्ल से पहले मेरा रेप भी हुआ था. मेरा क़ातिल कभी भी पकड़ में नहीं आता, क्योंकि हमारे पास उसके जैसी ना ही दौलत है, और ना ही ताक़त. उसके बाद तुम कुछ साल इसी तकलीफ़ और शर्मिंदगी में गुज़ार लेतीं और फिर इसी तकलीफ़ में तुम मर भी जातीं, लेकिन किसी अज़ाब की वजह से ऐसा नहीं हुआ. मेरी लाश तब फेंकी नहीं गई, लेकिन इविन जेल के सिंगल वॉर्ड स्थित क़ब्र और अब क़ब्रनुमा शहरे-जेल में यही हो रहा है. इसे ही मेरी क़िस्मत समझो और इसका इल्ज़ाम किसी पर मत मढ़ो. तुम बहुत अच्छी तरह जानती हो कि मौत ज़िन्दगी का अंत नहीं होती.

तुमने ही कहा था कि आदमी को मरते दम तक अपने मूल्यों की रक्षा करनी चाहिए. मां, जब मुझे एक क़ातिल के तौर पर अदालत में पेश किया गया, तब भी मैंने एक आंसू नहीं बहाया. मैंने अपनी ज़िन्दगी की भीख नहीं मांगी. मैं चिल्लाना चाहती थी, लेकिन ऐसा नहीं किया, क्योंकि मुझे क़ानून पर पूरा भरोसा था.

मां, तुम जानती हो कि मैंने कभी एक मच्छर भी नहीं मारा. मैं कॉकरोच को मारने की जगह उसकी मूंछ पकड़कर उसे बाहर फेंक आया करती थी. लेकिन अब मुझे सोच-समझकर क़त्ल किए जाने का मुजरिम बताया जा रहा है. वे लोग कितने पुरउम्मीद हैं, जिन्होंने जजों से इंसाफ़ की उम्मीद की थी. तुम जो सुन रही हो कृपया उसके लिए मत रोओ. पहले ही दिन से मुझे पुलिस ऑफ़िस में एक बुज़ुर्ग अविवाहित एजेंट मेरे स्टाइलिश नाख़ून के लिए मारते-पीटते हैं. मुझे पता है कि अभी ख़ूबसूरती की कद्र नहीं है. चेहरे की ख़ूबसूरती, विचारों और आरज़ुओं की ख़ूबसूरती, ख़ूबसूरत लिखावट, आंखों और नज़रिये की ख़ूबसूरती और यहां तक कि मीठी आवाज़ की ख़ूबसूरती.

मेरी प्रिय मां, मेरी विचारधारा बदल गई है, लेकिन तुम इसकी ज़िम्मेदार नहीं हो. मेरे अल्फ़ाज़ का अंत नहीं और मैंने किसी को सबकुछ लिखकर दे दिया है, ताकि अगर तुम्हारी जानकारी के बिना और तुम्हारी ग़ैर-मौजूदगी में मुझे फांसी दे दी जाए, तो यह तुम्हें दे दिया जाए. मैंने अपनी विरासत के तौर पर तुम्हारे लिए कई हस्तलिखित दस्तावेज़ छोड़ रखे हैं.

मैं अपनी मौत से पहले तुमसे कुछ कहना चाहती हूं. मां, मैं मिट्टी के अंदर सड़ना नहीं चाहती. मैं अपनी आंखों और जवान दिल को मिट्टी बनने देना नहीं चाहती, इसलिए प्रार्थना करती हूं कि फांसी के बाद जल्द से जल्द मेरा दिल, मेरी किडनी, मेरी आंखें, हड्डियां और वह सबकुछ जिसका ट्रांसप्लांट हो सकता है, उसे मेरे जिस्म से निकाल लिया जाए और इन्हें ज़रूरतमंद व्यक्ति को तोहफ़े के तौर पर दे दिया जाए. मैं नहीं चाहती कि जिसे मेरे अंग दिए जाएं, उसे मेरा नाम बताया जाए और वह मेरे लिए प्रार्थना करे.

Thursday, October 24, 2013

फ़ेसबुक प्रबंधन से अपील


फ़िरदौस ख़ान
यह देख कर बहुत दुख होता है कि इंसान ने शक्ल-सूरत तो इंसान वाली पाई है, लेकिन आज भी उसके अंदर ख़ूंख़ार जानवर बसा हुआ है... आज हमने फ़ेसबुक पर एक तस्वीर देखी, जो पाकिस्तान की मस्जिद में हुए बम विस्फ़ोट की है... फ़ेसबुक पर इस तस्वीर को मंदिर बताया जा रहा है... और बम विस्फ़ोट में मरने वाले मुसलमानों को हिंदू... साथ ही कहा जा रहा है कि मुसलमानों ने हिदुओं को काटा है...

हैरानी इस बात पर भी है कि पढ़े-लिखे समझदार हिंदू भाई इसे शेयर कर रहे हैं... क्या आपने तस्वीर को ध्यान से देखा कि यह मंदिर या मस्जिद...? दरअसल, ऐसे मामलों में कुछ लोग बिना-सोचे समझे अपने दिलों की भड़ास निकाल लेते हैं... बिना सच को जानें... क़ाबिले-ग़ौर है कि बांग्लादेश में हुए दंगों से दौरान कुछ मुसलमानों से भी ऐसा ही क्या था... बुद्धों की लाशों को मुसलमानों की लाशें बताया था... इसी तरह अन्य़ मुस्लिम देशों में मरने वाले मुसलमानों को बांग्लादेश में मारे गए मुसलमान कहकर नफ़रत फैलाने की कोशिश की थी...

सभी हिंदू भाइयों से हमारा अनुरोध है कि भाई इस तस्वीर में मरने वाले भी ’मुसलमान’ हैं... और ’मारने वाले’ भी... इस वक़्त तो दुनिया भर में मुसलमान ही मुसलमानों के ख़ून के प्यासे हो रहे हैं...

मुसलमान भाइयों से भी इल्तिजा है कि वो भी ऐसी झूठी अफ़वाहों को सच मानकर, नफ़रत को हवा न दें...

मुसलमान, मुसलमान को मारे... हिंदू को मारे या किसी और को... या फिर हिंदू मुसलमान को मारे... इस सबके बीच मौत तो सिर्फ़ इंसान और इंसानियत की ही होती है... क्या हम मिलजुल कर नफ़रत की इस खाई को पाट नहीं सकते हैं...? क्या हम खु़दा के बनाए इंसान और उसकी आने वाली नस्लों के लिए कोई बेहतरीन मिसाल पेश नहीं कर सकते...?
आप सबसे ग़ुज़ारिश है कि जवाब ज़रूर दें...

फ़ेसबुक प्रबंधन से अपील 
फ़ेसबुक को ऐसे पेजों पर पाबंदी लगानी चाहिए, जो नफ़रत फैलाने का काम करते हैं... चाहे ये पेज मुसलमानों के हों या फिर हिंदुओं के...

Saturday, July 27, 2013

मुसलमान ही मुसलमान का सबसे बड़ा दुश्मन है


यह एक कड़वीसच्चाईहैकि मुसलमान ही मुसलमान का सबसे बड़ा दुश्मन है... रमज़ान के मुबारक माह में भी इस क़ौम के लोग एक-दूसरे का ख़ून बहा रहे हैं... पाकिस्तान के अशांत क़बायली इलाक़े में हुए दो बम विस्फोट इसकी ताज़ा मिसालें हैं, जिनमें 45 लोग मारे गए और 100 से ज़्यादा ज़ख़्मी हो गए... पहला विस्फोट एक व्यस्त बाज़ार में हुआ और दूसरा स्कूल रोड पर... ये दोनों इलाक़े शिया मस्जिद के पास हैं...
अफ़सोस की बात यह भी है मुसलमान इस तरह के मामलों में ख़ामोशी अख्तियार कर लेते हैं... अगर यह हमला हिंदुस्तान या बर्मा के मुस्लिम बहुल इलाक़े में हो जाता, तो अब देश भर के मुसलमान हो-हल्ला मचा लेते... क्या पाकिस्तान या किसी और मुस्लिम देश में मरने वाले मुसलमान, मुसलमान नहीं हैं...
कहा जाता है कि रमज़ान के महीने में अल्लाह शैतान को क़ैद कर देता है, लेकिन इंसान के भेस में घूम रहे शैतान असल शैतान से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक हैं... काश! इन्हें भी क़ैद किया जा सकता...

Saturday, December 18, 2010

बेदर्द, निर्मोही और संगदिल नहीं हैं मर्द...



फ़िरदौस ख़ान
अमूमन मर्दों को संगदिल समझा जाता है...संगदिल मानकर उन्हें बेदर्द, निर्मोही जैसे संबोधन दे दिए जाते हैं... कथा -कहानियों में भी नायिकाएं अपने प्रीतम को ऐसे ही नाम से संबोधित करते हुए शिकायत करती हैं... माना जाता है कि महिलाएं ही बेहद जज़्बाती होती हैं...और किसी भी रिश्ते का टूटने का दर्द सबसे ज़्यादा उन्हें ही होता है...जबकि ऐसा नहीं है, मर्द भी रिश्तों को लेकर इतने ही भावुक होते हैं...यह बात अलग है कि वे अपने जज़्बात को बयान नहीं कर पाते...

ब्रिटेन में हाल ही में हुए एक सर्वे में यह बात सामने आई है कि दर्द सहन करने की क्षमता उम्र के साथ विकसित होती है. कम उम्र के मर्द इतने मज़बूत नहीं होते कि वे टूटे हुए रिश्ते के दर्द को बर्दाश्त कर सकें... मर्द अपनी भावनाएं दूसरों के साथ नहीं बांटते हैं, क्योंकि उनकी परवरिश ही ऐसी होती है...उन्हें बचपन से ही यह बताया जाता है कि लड़कियों के मुक़ाबले वे ज़्यादा मज़बूत हैं... इस मानसिकता के चलते वे अपनी भावनाओं को अपने भीतर ही समेटे रहते हैं...वे अपनी भावनाएं केवल प्रेमिका या साथी के साथ बांटते हैं ऐसे में उनके दूर हो जाने पर वे भावनात्मक तौर पर बेहद कमज़ोर हो जाते हैं...

लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज की समाजशास्‍त्री प्रोफेसर मिलैनी बर्टले के मुताबिक़ मर्द भी महिलाओं जैसा ही नाज़ुक दिल रखते हैं... लेकिन महिलाओं के पास अपने दुख-दर्द बांटने के लिए परिवार और दोस्त होते हैं, जबकि मर्दों के बीच प्रतियोगिता ज़्यादा होती है और वे एक-दूसरे की भावनाओं का क़द्र नहीं करते हैं...रिश्ते मर्दों को भावनात्मक मज़बूती देते हैं, इसलिए रिश्ते टूटने पर वे गहरे अवसाद में चली जाते हैं...

दर्द तो मर्दों को भी होता है...फ़िरदौस ख़ान
मर्द ऐसे क्यों होते हैं...फ़िरदौस ख़ान  

Saturday, April 24, 2010

आख़िर बच्ची को बूढ़े से निजात मिल ही गई...

दुनियाभर में शादी के नाम पर लड़कियों की ख़रीद-फ़रोख्त का सिलसिला जारी है... हालत यह है कि पूरी दुनिया में 'सभ्य' होने का ढोल पीटने वाले सऊदी अरब में भी लड़कियों को जानवरों की तरह बेचा और ख़रीदा जाता है.

सऊदी अरब में पिछले साल 12 साल की एक लड़की की मर्ज़ी के खिलाफ़ उसके परिवार वालों ने उसकी शादी उसके पिता के 80 वर्षीय चचेरे भाई से कर दी गई थी. बदले में उसके परिवारवालों को क़रीब साढ़े 14 हज़ार डालर मिले थे. इस ज़ुल्म के खिलाफ़ लड़की ने आवाज़ उठाई और रियाद के बुराइधा क़स्बे की एक अदालत में तलाक़ के लिए अर्ज़ी दाख़िल कर दी. लड़की की क़िस्मत अच्छी थी उसे तलाक़ मिल गई. राहत की बात यह भी है कि अब वहां की सरकार इस मसले पर पहली बार लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र तय करने पर गौर कर रही है.

मानवाधिकारों संगठनों ने भी लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 16 साल निश्चित करने की सिफ़ारिश की है. अब सरकार ने इस बारे में फ़ैसला लेने के लिए तीन समितियों का गठन किया है.

भारत में भी यह सिलसिला जारी है...

Thursday, October 8, 2009

फ्रांस की टूरिज़्म कंपनी ने ख़रीदा बापू का अफ़्रीकी घर

फ़िरदौस ख़ान
दक्षिण अफ्रीका के जोहांसबर्ग में स्थित महात्मा गांधी के ऐतिहासिक घर को फ्रांस की एक टूरिज़्म कंपनी ने खरीद लिया है...भारत सरकार ने महात्मा गांधी के जोहानिसबर्ग मकान के सूथेबी नीलामी घर के ज़रिये एक फ्रांसीसी कंपनी के हाथ में चले जाने पर अफ़सोस ज़ाहिर किया है. साथ ही कहा है कि सरकार एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के ज़रिये इस विरासत को हासिल करने की कवायद जारी रखेगी.

कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा है कि यह राष्ट्रीय भावनाओं से जुड़ा मामला है और इस ऐतिहासिक संपत्ति को हासिल करने और इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित करवाने के लिए हरसंभव प्रयास किया जाएगा. कोयला मंत्रालय के तहत आने वाले कोल इंडिया लि. ने इस मकान को हासिल करने के लिए इसके मालिक से संपर्क किया था और मंत्रालय इसके लिए कोई भी क़ीमत चुकाने को तैयार था. इसके लिए बातचीत जारी थी, लेकिन एक महीने की मोहलत दिए जाने के बावजूद उन्होंने सीआईएल से संपर्क नहीं किया. उन्होंने कहा कि सीआईएल निदेशक मंडल ने यह तय किया है कि इस बापू की इस विरासत को हासिल करने के लिए इसके कर्मचारी अपने एक दिन का वेतन देंगे, जबकि वे एक माह का वेतन देंगे, साथ ही अन्य स्रोतों से धन इकट्ठा करेंगे. जायसवाल ने बताया कि इस साल अगस्त में दक्षिण अफ्रीका की यात्रा के दौरान उन्होंने इस मकान का मुआयना किया था.

गौरतलब है कि पुरानी शैली के खपरैल की छत वाले इस मकान में गांधी जी 1908 से 1910 तक रहे थे. उन्होंने यहां से सत्याग्रह आंदोलन का नेतृत्व किया था. इस घर को उस वक़्त के मशहूर आर्किटेक्ट हरमन क्लेनबाक ने डिज़ाइन किया था. जोहांसबर्ग में बापू जुड़े कई अन्य यादगार स्थल भी हैं. इनमें मध्य जोहांसबर्ग में स्थित गांधी स्क्वायर, जोहांसबर्ग जेल, जहां बापू को एक बार कैद किया गया था, द विक्ट्री हाउस जहां वह वकालत किया करते थे. यहां हिंदुओं का अंतिम संस्कार गृह भी है, जिसे बापू ने बनवाया था. इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका के डरबन और पीटरमारित्जबर्ग में भी बापू जुड़े कई अन्य स्थल भी हैं, जो भारतीयों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र हैं.

बताया जाता है कि पेरिस स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध कंपनी वायजेयू द मांड ने जोहानिसबर्ग के उपनगरीय क्षेत्र स्थित द कराल नामक इस मकान को बिक्री के लिए मांगे गए तीन लाख 77029 डॉलर की क़ीमत से दोगुनी रक़म चुकाकर इसे हासिल किया है.

बापू की इस विरासत को हासिल करने की सरकार की कवायद का क्या नतीजा निकलेगा, यह तो आने वाले वाला वक़्त ही बताएगा...फ़िलहाल तो यह विरासत सरकार के हाथ से निकल ही चुकी है...

Friday, October 2, 2009

भारत के खिलाफ़ चीन की नई साज़िश

फ़िरदौस ख़ान
यह ख़बर वाक़ई हैरतअंगेज़ है कि चीनी दूतावास ने हाल ही में कुछ कश्मीरियों को वीज़ा देने के लिए अलग पन्नों का इस्तेमाल किया है. यह पासपोर्ट के ही पन्नों पर वीज़ा की मोहर लगाने की आम प्रक्रिया के बिलकुल अलग है. हालांकि भारत ने इस पर सख्त ऐतराज़ जताते हुए चीन से शिकायत भी की है...क़ाबिले-गौर है कि इससे पहले चीन ने ऐसी हरकतें अरुणाचल प्रदेश के लोगों वीज़ा देने में भी की हैं. पूर्वोत्तर के इस सूबे पर अपना दावा जताने वाला चीन इस इलाक़े के लोगों के भारतीय पासपोर्ट मंज़ूर करने से कतराता रहा है. इस मुद्दे पर भी भारत लगातार चीन से विरोध दर्ज कराता रहा है, लेकिन नतीजा हमेशा सिफ़र ही रहा.

बहरहाल, दिल्ली स्थित चीनी दूतावास ने कश्मीरियों को वीज़ा देने में जो नई नीति अपनाई है, उसे देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि सीमापार से विघटनकारी कारनामों के ज़रिये भारत की परेशानी का सबब बने चीन ने अब यह काम देश के भीतर से भी शुरू कर दिया है. चीन के इस क़दम से सुरक्षा के लिए ख़तरा पैदा हो सकता है, क्योंकि पासपोर्ट पर लगे वीज़ा के बगैर पासपोर्ट धारकों की यात्रा के सही रिकार्ड का पता नहीं चलेगा.

भारतीय खेमा मान रहा है कि चीन ने इस तरह से कश्मीर को भारत का हिस्सा होने पर सवालिया निशान लगाने की कोशिश की है. बताया जा रहा कि आब्रजन ब्यूरो को भी यह कह दिया गया है कि इस तरह से दिए गए वीज़ा को फ़ौरन ही नामंज़ूर कर दिया जाए.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विष्णु प्रकाश का कहना है कि 'यह हमेशा से हमारा रुख रहा है कि वीज़ा चाह रहे भारतीय नागरिकों के साथ उनके निवास प्रदेश या जातीय आधार पर कोई भी भेदभाव न हो.' इस मामले को चीनी दूतावास और बीजिंग में विदेश मंत्रालय के सामने उठाया गया है. इस बारे में चीनी दूतावास के एक प्रवक्ता ने इन सभी वीज़ों को वैध क़रार दिया है. समझा जाता है कि विदेश मंत्री एसएम कृष्णा चीन के विदेश मंत्री यांग जेइची के 26-27 अक्टूबर के भारतीय दौरे के दौरान इस मुद्दे को उठा सकते हैं. गौरतलब है कि जेइची बेंगलुरू में होने वाली भारत, चीन और रूस के विदेश मंत्रियों की त्रिपक्षीय बैठक में शिरकत के लिए यहां आएंगे.

फ़िलहाल तो यही कहा जा सकता है कि सीमा में घुसपैठ की खबरों के बाद चीन द्वारा हाल ही में जम्मू एवं कश्मीर राज्य के निवासियों को अलग वीज़ा देने की कार्रवाई से दोनों देशों के बीच अविश्वास पैदा होने का ख़तरा बढ़ गया है...

Thursday, October 1, 2009

चीन लोक गणराज्य की स्थापना की 60वीं वर्षगांठ आज


फ़िरदौस ख़ान
आज चीन लोक गणराज्य की स्थापना की 60वीं वर्षगांठ हैं और नए चीन के राजनयिक कार्य चलाने की 60वीं वर्षगांठ भी...पहली अक्टूबर 1949 में सर्वगीय अध्यक्ष माओ च्ये तुंग ने पेइचिंग में चीन लोक गणराज्य की स्थापना का ऐलान किया था. साथ ही घोषणा की कि चीन समानता, आपसी लाभ व दूसरों के देशों की प्रादेशिक अखंडता का सम्मान करने वाले सभी देशों की सरकारों के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करना चाहता है. पिछले 60 बरसों में चीन के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने वाले देशों की संख्या पहले के 18 से बढ़कर 171 हो गई है.

यह अफ़सोस की बात है कि... भारत और चीन के बीच जंग हुए क़रीब 47 साल बीतने के बावजूद वहां के बाशिंदे आज भी भारत को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं...हालांकि इन तल्खियों का का दावा करते हुए ब्रिटिश अखबार संडे टाइम्स ने यह भी बताया है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) में शामिल लोगों की अपने मुल्क के प्रति निष्ठा कम हो रही है...

हाल ही में चीन के राष्ट्रीय दिवस के मौके पर लिखे अखबार के एक लेख में कहा गया है, ‘बीजिंग में हर कोई अपने विदेश मंत्रालय की तरह रेशमी जुबान नहीं बोलता है. वहां ज्यादातर जिस दुश्मन की बात होती है, वह भारत ही होता है.’ रिपोर्ट के मुताबिक चीन में सेंसर के बावजूद तिब्बत के पठार को बचाने के लिए भारत के साथ जंग के मुद्दे के नफ़ा-नुक़सान के मुख्तलिफ को लेकर इंटरनेट पर बेबाक चर्चा की इजाज़त दी जा रही है.

चीन में गणराज्य की स्थापना की 60वीं वर्षगांठ के मौके पर अखबार ने अपने लेख में लिखा है कि इस मौके पर आधुनिक चीन के इतिहास की सबसे भव्य परेड देखी जा सकती है. परेड में नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों, बैलिस्टिक मिसाइलों, टैंकों और राइफलों के प्रदर्शन का दर्शन होगा. अलबत्ता, इसे चीन का शक्ति प्रदर्शन कहना ग़लत न होगा...

चीनी विदेश मंत्री यांग च्ये छी ने कहा कि पिछले 60 सालों में चीन विभिन्न देशों के साथ घनिष्ठ सहयोग व जिम्मेदाराना रूख से विभिन्न अन्तरराष्ट्रीय विवादों को हल करने में भाग लेता आया है, चीन ने विश्व शान्ति, विकास व सहयोग कार्य के लिए महत्वपूर्ण योगदान किया है. चीन का राजनयिक कार्य चीन के शक्तिशाली होने के चलते निरंतर आगे कदम बढ़ा रहा है.

गौरतलब है कि जनवादी गणराज्य चीन जिसको प्रायः चीन से जाना जाता है, दुनिया में सबसे ज़्यादा आबादी वाला देश है और क्षेत्रफल की दृष्टि से इसका स्थान तीसरा है. इतने बड़े भूखंड पर स्थित होने के कारण इसके पड़ोसियों की संख्या भी अधिक है. उत्तर में रूस, कोरिया तथा मंगोलिया, पश्चिम में कजाकस्तान, भारतीय और पाकिस्तानी कश्मीर, अफ़ग़ानिस्तान तथा उत्तरी भारत दक्षिण में भारत, नेपाल तथा बर्मा तथा दक्षिण पश्चिम में थाईलैंड, कम्बोडिया तथा वियतनाम है. उत्तर-पूर्व में जापान मुख्य भूमि से दूर स्थित है. चीन ताईवान को अपना स्वायत्त क्षेत्र कहता है, जबकि ताईवान का प्रशासन खुद को स्वतंत्र राष्ट्र कहता है. 1949 के गृहयुद्ध में जीत मिलने के बाद समाजवादियों ने चीन की सत्ता पर अधिकार किया और ताईवान तथा उससे सटे क्षेत्रों पर पुराने शासकों का अधिपत्य हुआ. इसके बाद से मुख्य चीन को चीन का जनवादी गणराज्य तथा ताईवान को चीनी गणराज्य कहा जाता है. यहां की मुख्य भाषा चीनी है जिसका पांपरिक तथा आधुनिक रूप दोनों प्रयुक्त होता है. प्रमुख नगरों में पेइचिंग तथा शंगहाई का नाम आता है.

चीन की सभ्यता विश्व की पुरातनतम सभ्यताओं में से एक है. इसका चार हज़ार वर्ष पुराना लिखित इतिहास है. यहां तरह-तरह के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक ग्रन्थ और पुरातन संस्कृति के अवशेष पाए गए हैं. दुनिया के अन्य राष्ट्रों की तरह चीनी राष्ट्र भी अपने विकास के दौरान आदिम समाज, दास समाज और सामन्ती समाज की मंजिलों से गुजरा था. ऐतिहासिक विकास के इस लम्बे दौर में, चीनी राष्ट्र की विभिन्न जातियों की परिश्रमी, साहसी और बुद्धिमान जनता ने अपने संयुक्त प्रयासों से एक शानदार और ज्योतिर्मय संस्कृति का सृजन किया, तथा समूची मानवजाति के लिये भारी योगदान भी किया. यह उन गिने चुने सभ्यताओं में एक है जिन्होंने प्राचीन काल में अपनी स्वतंत्र लेखन पद्धति का विकास किया. अन्य सभ्यताओं के नाम हैं- प्राचीन भारत (सिंधु घाटी सभ्यता), मेसोपोटामिया की सभ्यता, मिस्र और माया सभ्यता. चीनी लिपि अब भी चीन, जापान के साथ साथ आंशिक रूप से कोरिया तथा वियतनाम में प्रयुक्त होती है. पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर चीन में मानव बसाव लगभग साढ़े बाईस लाख (22.5 लाख) साल पुराना है.

Tuesday, September 29, 2009

हिन्दू शायर ने लिखा था पाक का क़ौमी तराना


फ़िरदौस ख़ान
पाकिस्तान में इन दिनों वहां के पहले क़ौमी तराने (राष्ट्रगान) बहस का मुद्दा बना हुआ है। पाक के अंग्रेजी अखबार ‘डान’ में सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका बीना सरवर ने इस बारे में लिखा है, ‘जिन्ना के विचारों से पीछा छुड़ाने की सोच के तहत ही आज़ाद की नज़्म को तुच्छ मान लिया गया था, लेकिन अपने प्रतीकों की वजह से वह नज़्म क़ाबिले-गौर है। इसे फिर से स्थापित किया जाए और कम से कम राष्ट्रीय गीत का दर्जा देकर सम्मान दिया जाए, ताकि हमारे बच्चे इससे सीख सकें. क्योंकि भारतीय बच्चे इक़बाल की कृति... सारे जहां से अच्छा... से सीख रहे हैं।’

ग़ौरतलब है कि 1950 में हाफ़िज़ जालंधरी की नज़्म को क़ौमी तराने का दर्जा देने से पहले जिस शायर को यह सम्मान दिया गया था उनका नाम था जगन्नाथ आज़ाद। पाकिस्तान के क़ायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्नाह ने लाहौर में रहने वाले उर्दू के शायर तिलोक चंद के बेटे जगन्नाथ आज़ाद को 1947 में देश के रूप में अलग होने से कुछ ही दिनों पहले पाकिस्तान का राष्ट्रगान लिखने का ज़िम्मा सौंपा था।

नया देश बनने के साथ ही देश के लिए विभिन्न चिन्ह और प्रतीक चुनने का काम भी शुरू हुआ. देश का झंडा पहले ही तैयार हो चुका था, लेकिन क़ौमी तराना नहीं बना था. आज़ादी के वक़्त पाकिस्तान के पास कोई क़ौमी तराना नहीं था. इसलिए जब भी परचम फहराया जाता तो " पाकिस्तान ज़िन्दाबाद, आज़ादी पैन्दाबाद" के नारे लगते थे.

क़ायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्नाह को यह मंज़ूर नही था. वे चाहते थे कि पाकिस्तान के क़ौमी तराने को रचने का काम जल्द से जल्द पूरा हो. उनके सलाहकारों ने उन्हें कई जानेमाने उर्दू शायरों के नामों पर गौर करने को कहा, लेकिन जो बेहतरीन क़ौमी तराना रच सकते थे, लेकिन जिन्नाह दुनिया के सामने पाकिस्तान की धर्मनिरपेक्ष छवि स्थापित करना चाहते थे. इसलिए उन्होंने लाहौर के उर्दू शायर जगन्नाथ आज़ाद से कहा ''मैं आपको पांच दिन का ही वक़्त दे सकता हूं, आप पाकिस्तान के लिए क़ौमी तराना लिखें". हालांकि पाकिस्तान के कई नेताओं को इससे जिन्नाह का यह क़दम अच्छा नहीं लगा, लेकिन जिन्नाह की मर्ज़ी के सामने किसी का नहीं चली. वे बेबस थे.

आखिरकार जगन्नाथ आज़ाद ने पांच दिनों के अंदर क़ौमी तराना तैयार कर लिया जो जिन्नाह को बहुत पसंद आया. क़ौमी तराना के बोल थे-

ऐ सरज़मीं ए पाक ज़र्रे तेरे हैं आज सितारों से तबनक रोशन है कहकशां से कहीं आज तेरी खाक़...

जिन्नाह ने इसे क़ौमी तराने के रूप मे मान्यता दी और उनकी मौत तक यही गीत क़ौमी तराना बना रहा. सितंबर 1948 में जिन्ना की मौत के महज़ छह माह बाद ही इस क़ौमी तराने की मान्यता भी ख़त्म कर दी गई. किस्तान सरकार ने एक राष्ट्र-गीत कमेटी बनाई और जाने माने शायरों से क़ौमी तराने के नमूने मंगवाए, लेकिन कोई भी गीत क़ौमी तराने के लायक़ नहीं बन पा रहा था. आखिरकार पाकिस्तान सरकार ने 1950 मे अहमद चागला द्वारा रचित धुन को राष्ट्रीय धुन के तौर पर मान्यता दी. उसी वक़्त ईरान के शाह पाकिस्तान की यात्रा पर आए और उन्हें यह धुन बेहद पसंद आई. यह धुन पाश्चात्य ज़्यादा लगती थी, लेकिन राष्ट्र-गीत कमेटी का मानना था कि इसका यह स्वरूप पाश्चात्य समाज में ज़्यादा पसंद किया जाएगा.

सन 1954 में उर्दू के मशहूर शायर हाफ़िज़ जालंधरी ने इस धुन के आधार पर एक गीत की रचना की. यह गीत राष्ट्र-गीत कमेटी के सदस्यों को पसंद भी आया. और आखिरकार हाफ़िज़ जालंधरी का लिखा गीत पाकिस्तान का क़ौमी तराना बन गया. इस क़ौमी तराने के बोल हैं-

पाक सरज़मी शाद बाद, किश्वरे हसीँ शाद बाद, तु निशाने अज़्मे आलीशान अर्ज़े पाकिस्तान मर्कज़े हसीँ शाद बाद...
हाफ़िज़ जालंधरी के इस क़ौमी तराने के बाद जगन्नाथ आज़ाद का गीत भुला दिया गया. बाद में जगन्नाथ आज़ाद बाद में भारत चले आए थे.

Monday, September 28, 2009

भारत से नफ़रत करते हैं चीन के कुछ बाशिंदे

यह अफ़सोस की बात है कि... भारत और चीन के बीच जंग हुए क़रीब 47 साल बीतने के बावजूद वहां के बाशिंदे आज भी भारत को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं...हालांकि इन तल्खियों का का दावा करते हुए ब्रिटिश अखबार संडे टाइम्स ने यह भी बताया है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) में शामिल लोगों की अपने मुल्क के प्रति निष्ठा कम हो रही है...

एक अक्टूबर को चीन के राष्ट्रीय दिवस के मौके पर लिखे अखबार के एक लेख में कहा गया है, ‘बीजिंग में हर कोई अपने विदेश मंत्रालय की तरह रेशमी जुबान नहीं बोलता है. वहां ज्यादातर जिस दुश्मन की बात होती है, वह भारत ही होता है.’ रिपोर्ट के मुताबिक चीन में सेंसर के बावजूद तिब्बत के पठार को बचाने के लिए भारत के साथ जंग के मुद्दे के नफ़ा-नुक़सान के मुख्तलिफ को लेकर इंटरनेट पर बेबाक चर्चा की इजाज़त दी जा रही है.

इतना ही नहीं, चीनी सेना में भ्रष्टाचार की बातें भी खुलकर होने लगी हैं. पीएलए के जानकार लोगों का कहना है कि कई बरसों से जंग का सामना न करने से चीनी सेना में भ्रष्टाचार फैल गया है. वे बताते हैं कि सैनिक बनने के लिए 10 हजार युआन (70 हजार रुपए) से लेकर सैन्य कॉलेज में भर्ती के लिए 30 हजार युआन (2.10 लाख रुपए) तक की रिश्वत देने की भ्रष्ट व्यवस्था काम कर रही है. इस मुद्दे पर स्तंभकार जनरल झांग शुतियान के हवाले से अखबार ने लिखा है- ‘अगर सेना में भ्रष्टाचार ऐसे ही क़ायम रहा तो उसूल मर जाएंगे और रिश्वत के ज़रिये तरक्की देने की इस प्रवृत्ति से सैनिकों में बगावत होने लगेगी.

चीन में गणराज्य की स्थापना की 60 वीं वर्षगांठ के मौके पर अखबार ने अपने लेख में लिखा है कि इस मौके पर आधुनिक चीन के इतिहास की सबसे भव्य परेड देखी जा सकती है. परेड में नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों, बैलिस्टिक मिसाइलों, टैंकों और राइफलों के प्रदर्शन का दर्शन होगा.

अलबत्ता, इसे चीन का शक्ति प्रदर्शन कहना ग़लत न होगा...

Wednesday, November 5, 2008

बराक हुसैन ओबामा ने रचा इतिहास


अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में करिश्माई डेमोक्रेट बराक हुसैन ओबामा ने जीत हासिल कर एक नया इतिहास रचा है. उन्होंने निर्वाचक मंडल के 338 मत हासिल कर लिए हैं, जबकि उनके रिपब्लिकन प्रतिद्वंद्वी जान मैक्केन को कुल 155 मत हासिल हुए हैं. इस तरह बराक ओबामा अमेरिका के 44वें राष्ट्रपति बन गए हैं. ग़ौरतलब है कि बराक आबोमा अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति चुने गए हैं.

उनकी जीत इस मायने में महत्वपूर्ण है कि 45 साल पहले मानवाधिकार आंदोलन के प्रणेता मार्टिन लूथर किंग ने समानता का जो सपना देखा था वह आज सच हो गया. आमतौर पर भारत समर्थक माने जाने वाले 47 वर्षीय ओबामा अपने नाम और जाति के कारण जानते थे कि व्हाइट हाउस तक पहुंचने का उनका सफ़र कितना मुश्किल होगा. उन्होंने एक बार कहा भी था कि यह एक युगांतकारी परिवर्तन होगा. केन्याई पिता और श्वेत अमेरिकी माता की संतान ओबामा ने यह कर दिखाया. अमेरिकी जनता को उनमें वह सब नज़र आया जिसकी उसे इस कठिन वक्त में दरकार है.

हारवर्ड में पढे़ ओबामा ने 21 माह के कठिन प्रचार अभियान के बाद दुनिया का सबसे ताकतवर ओहदा हासिल किया. पार्टी का उम्मीदवार बनने के लिए उन्होंने पहले अपनी ही पार्टी की हिलेरी क्लिंटन और फिर वियतनाम युद्ध के सेना नायक जान मैक्केन को पीछे छोड़ते हुए अमेरिका में एक बडे़ बदलाव के संकेत के साथ व्हाइट हाउस की गद्दी संभाल ली. ओबामा की जीत ने अमेरिकी इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है. देश सदियों जातीय वैमनस्यता का कोपभाजन बना रहा. आज से 200 साल पहले जिस सामाजिक बुराई का अंत हुआ उसकी सुखद अनुभूति का भी यह जीत प्रतीक है.

शिकागो के एक सामुदायिक कार्यकर्ता ओबामा के लिए व्हाइट हाउस की पहली पायदान इलिओनिस की सीनेट रही. सन 1996 में इस जीत से लोकप्रिय हुए ओबामा सन 2004 में संघीय सीनेट तक जा पहुंचे. अपने सहज व्यक्तित्व से ओबामा जल्द मीडिया की सुर्खियां बनने लगे. उन्होंने इसे बहुआयामी स्वरूप दिया और लेखन में जल्द बुलंदी हासिल की. उनकी दो पुस्तकें द आडेसिटी ऑफ होप तथा ड्रीम फ्राम माई फ़ादर बेहद सराही गई. आठ साल से सत्ता के शीर्ष पद से दूर डेमोक्रेट पार्टी में ओबामा ने एक नई जान फूंक दी. उनका नामांकन वाकई पार्टी के लिए जादुई साबित हुआ.

हवाई में चार अगस्त 1961 को जन्में ओबामा के अरबी मायने ही सौभाग्यशाली है. उन्हें लेकिन इस बात का अफ़सोस रहेगा कि उनके कैरियर में अहम भूमिका निभाने वाली उनकी नानी अपने सपने को साकार होने से कुछ दिन पहले ही चल बसीं. जाति एवं धर्म के विवाद के साथ चुनावी अभियान में अपने को लगातार मज़बूत करते रहे ओबामा ने कई जगह अपनी टिप्पणियों एवं संकेतों में भारत के साथ ठोस सहभागिता की भावना का इजहार किया. यहां तक कि भारत के साथ असैनिक परमाणु समझौते के प्रति समर्थन का, हालांकि पहले वह इसका विरोध करते रहे.

लेकिन कई ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें लेकर भारत में चिंता देखी गई. मसलन उनके आउटसोर्सिग के विरोध वाले रवैये पर. अगर ऐसा हुआ तो यह बेशक भारत के हक़ के ख़िलाफ़ जाएगा. उन्होंने प्रचार अभियान में कहा था कि जान मैक्केन के विपरीत मैं उन कंपनियों को कर में ढील नहीं दूंगा, जो बाहर के लोगों को नौकरियां देते है और वह लाभ उन कंपनियों को देना शुरू करूंगा जो यहां अमेरिका में रोगार सृजित करेंगे. चुनाव के लिए धन एकत्रित करने में रिकार्ड तोड़ चुके ओबामा 200 साल पहले ख़त्म हुए दासता के दर्द को नहीं भूले हैं. उन्होंने बेहिचक कहा कि अभी भी देश जातीय भेदभाव से पाक साफ़ नहीं हुआ है.

अपने प्रतिद्वंद्वी के मुक़ाबले अनुभवहीन कहे जाने वाले ओबामा ने सन 2003 में इराक पर हमले के समय से ही बुश प्रशासन की कड़ी आलोचना करनी शुरू कर दी थी. वह एक मोर्चे पर पूर्ववर्ती प्रशासन से बिल्कुल अलग है जब वह कहते है कि वह बिना शर्त ईरान से बातचीत करेंगे। प्रेरणादायक लफ़्ज़ों तथा बदलाव के नारे से जनता को आकर्षित करने में कामयाब रहे ओबामा बहस में भी मैक्केन पर भारी पड़े. बहस के पहले दौर से ही लगने लगा था कि व्हाइट हाउस उनका इंतज़ार कर रहा है. सवालों के कुशलता से जवाब देने से लेकर भावी प्रस्तावों में उनकी समझबूझ दिखाई दी. चाहे इराक़ का मुद्दा हो या फिर वित्तीय संकट अथवा स्वास्थ्य.

आतंकवाद से लड़ाई के मामले पर उनकी सोच है कि वह इसके लिए नई सहभागिता कायम करेंगे और एक साफ मिशन के साथ ही सैनिकों को लड़ाई के मैदान पर भेजेंगे. उन्होंने प्रचार अभियान में कहा था कि मैं इक्कीसवीं सदी के ख़तरों, आतंकवाद, परमाणु प्रसार, ग़रीबी, नरसंहार, जलवायु परिवर्तन तथा बीमारियों के ख़तरों से निपटने के लिए नई सहभागिता क़ायम करूंगा. शेयर बाजार में गिरावट से देश को उबारने के उनके दृष्टिकोण को पूर्व ज्वाइंट चीफ़ ऑफ स्टाफ्स के अध्यक्ष कोलिन पावेल ने भी ख़ूब सराहा. ओबामा की पत्नी वकील है और उनकी दो बेटियां हैं. दस वर्षीय मालिया और सात वर्षीय साशा.

Wednesday, October 8, 2008

पाक कश्मीर की आज़ादी के खिलाफ़ नहीं

आख़िर पाकिस्तान ने कश्मीरियों के बारे में अपना रुख़ साफ़ कर ही दिया। ब्रिटेन में पाकिस्तान के उच्चयुक्त वाजिद शम्सुल हसन ने कश्मीर पर कहा है कि पाकिस्तान कश्मीर में 'बाहर के चरमपंथियों के आतंकवाद' के ख़िलाफ़ है। उन्होंने कश्मीरियों के भारत के विरुद्ध बल प्रयोग को उचित ठहराया है. गौरतलब है कि श्री हसन हाल में देश के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के वॉल स्ट्रीट जर्नल को दिए उस इंटरव्यू के बारे में स्पष्टीकरण दे रहे थे, जिसमें उन्होंने भारत प्रशासित कश्मीर में इस्लामी चरमपंथियों को 'आतंकवादी' कहा था.


क़ाबिले-गौर यह भी है कि राष्ट्रपति ज़रदारी के विचारों के बारे में छपी रिपोर्ट के बाद प्रदर्शनकारियों ने भारत प्रशासित कश्मीर में जारी कर्फ़्यू की अवहेलना करते हुए भारतीय प्रशासन और ज़रदारी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किए थे। कश्मीर में ऐसा पहली बार हुआ है जब पाकिस्तान के किसी नेता के पुतले जलाए गए हैं। आमतौर भारत प्रशासित कश्मीर में भारतीय प्रशासन का विरोध करते समय पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगते रहे हैं.


प्रमुख अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने ज़रदारी के बयान की कड़े शब्दों में निंदा की है। उनका कहना है कि " ज़रदारी ने अमरीका को ख़ुश करने के लिए यह बयान दिया है। ज़रदारी भारत से डरते हैं और भारत को ख़ुश करने के लिए पाकिस्तान की प्रतिष्ठा से भी समझौता कर सकते हैं।'' उनका यह भी कहना है कि ''कश्मीरी युवा अपने हक़ के लिए लड़ रहे हैं। सच तो यह है कि कश्मीर की जनता सरकारी आतंकवाद का आतंक का शिकार है। कश्मीरी के विद्रोहियों को आतंकवादी कह देने से कश्मीर की स्वायत्ता और स्वतंत्रता का आंदोलन कमज़ोर पड़ने वाला नहीं है. चरमपंथी संगठन अल-उमर-मुजाहिदीन के प्रमुख कमांडर मुश्ताक़ ज़रगार ने भी ज़रदारी के बयान की आलोचना करते हुए कहा था कि "ज़रदारी ने भारत को कश्मीरी युवाओं को क़त्ल करने का लाइसेंस दे दिया है."


पाक उच्चायुक्त का कहना था कि राष्ट्रपति ज़रदारी 'कश्मीरी बाशिंदों के अपने संघर्ष को और स्वशासन के अधिकार' को नुक़सान पहुंचाने की कोशिश नहीं कर रहे थे। मीडिया को भेजे गए एक ई-मेल में उन्होंने कहा कि 'पाकिस्तान विदेशी चरमपंथियों की ओर से सीमापार घुसपैठ और कश्मीरियों की आज़ादी की मुहिम को नेस्तनाबूद किए जाने' के ख़िलाफ़ है। ई-मेल में यह भी कहा गया है कि- 'इन विदेशी चरमपंथियों ने कश्मीरियों के स्वतंत्रता के संघर्ष की मदद करने की जगह उसे नुक़सान पहुंचाया है।'


गौरतलब है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति बनने के बाद संसद को अपने पहले संबोधन में आसिफ़ अली ज़रदारी ने कश्मीर का ज़िक्र करते हुए कहा था कि- ''मूल अधिकारों की बहाली को लेकर कश्मीरी लोगों के न्यायसंगत संघर्ष के प्रति हम वचनबद्ध हैं।''

Wednesday, August 20, 2008

दहलीज़ से सियासत तक ख्वातीन


फ़िरदौस ख़ान
सदियों की गुलामी और दमन का शिकार रही भारतीय नारी अब नई चुनौतियों का सामना करने को तैयार है. इसकी एक बानगी अरावली की पहाड़ियों की तलहटी में बसे अति पिछड़े मेवात ज़िले के गांव नीमखेडा में देखी जा सकती है. यहां की पूरी पंचायत पर महिलाओं का क़ब्ज़ा है. ख़ास बात यह भी है कि सरपंच से लेकर पंच तक सभी मुस्लिम समाज से ताल्लुक़ रखती हैं. जिस समाज के ठेकेदार महिलाओं को बुर्के में कैद रखने के हिमायती हों, ऐसे समाज की महिलाएं घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर गांव की तरक्की के लिए काम करें तो वाक़ई यह काबिले-तारीफ़ है. गुज़श्ता 30 अक्टूबर को नीमखेडा को आदर्श गांव घोषित किया गया है.

गांव की सरपंच आसुबी का परिवार सियासत में दखल रखता है. क़रीब 20 साल पहले उनके शौहर इज़राइल गांव के सरपंच थे. इस वक्त उनके देवर आज़ाद मोहम्मद हरियाणा विधानसभा में डिप्टी स्पीकर हैं. वे बताती हैं कि यहां से सरपंच का पद महिला के लिए आरक्षित था. इसलिए उन्होंने चुनाव लडने का फैसला किया. उनकी देखा-देखी अन्य महिलाओं में भी पंचायत चुनाव में दिलचस्पी पैदा हो गई और गांव की कई महिलाओं ने पंच के चुनाव के लिए परचे दाखिल कर दिए.
पंच मैमूना का कहना है कि जब महिलाएं घर चला सकती हैं तो पंचायत का कामकाज भी बेहतर तरीके से संभाल सकती हैं, लेकिन उन्हें इस बात का मलाल जरूर है कि पूरी पंचायत निरक्षर है. इसलिए पढाई-लिखाई से संबंधित सभी कार्यों के लिए ग्राम सचिव पर निर्भर रहना पड़ता है. गांव की अन्य पंच हाजरा, सैमूना, शकूरन, महमूदी, मजीदन, आसीनी, नूरजहां और रस्सो का कहना है कि उनके गांव में बुनियादी सुविधाओं की कमी है. सडक़ें टूटी हुई हैं. बिजली भी दिनभर गुल ही रहती है. पीने का पानी नहीं है. महिलाओं को क़रीब एक किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है. नई पंचायत ने पेयजल लाइन बिछवाई है, लेकिन पानी के समय बिजली न होने की वजह से लोगों को इसका फ़ायदा नहीं हो पा रहा है.सप्लाई का पानी भी कडवा होने की वजह से पीने लायक़ नहीं है. स्वास्थ्य सेवाओं की हालत भी यहां बेहद खस्ता है. अस्पताल तो दूर की बात यहां एक डिस्पेंसरी तक नहीं है. गांव में लोग पशु पालते हैं, लेकिन यहां पशु अस्पताल भी नहीं है. यहां प्राइमरी और मिडल स्तर के दो सरकारी स्कूल हैं. मिडल स्कूल का दर्जा बढ़ाकर दसवीं तक का कराया गया है, लेकिन अभी नौवीं और दसवीं की कक्षाएं शुरू नहीं हुई हैं. इन स्कूलों में भी सुविधाओं की कमी है. अध्यापक हाज़िरी लगाने के बावजूद गैर हाज़िर रहते हैं. बच्चों को दोपहर का भोजन नहीं दिया जाता. क़रीब तीन हज़ार की आबादी वाले इस गांव से कस्बे तक पहुंचने के लिए यातायात की कोई सुविधा नहीं है. कितनी ही गर्भवती महिलाएं प्रसूति के दौरान समय पर उपचार न मिलने के कारण दम तोड़ देती हैं. गांव में केवल एक दाई है, लेकिन वह भी प्रशिक्षित नहीं है. पंचों का कहना है कि उनकी कोशिश के चलते इसी साल 22 जून से गांव में एक सिलाई सेंटर खोला गया है. इस वक़्त सिलाई सेंटर में 25 लड़कियां सिलाई सीख रही हैं.

गांववासी फ़ातिमा व अन्य महिलाओं का कहना है कि गांव में समस्याओं की भरमार है. पहले पुरुषों की पंचायत थी, लेकिन उन्होंने गांव के विकास के लिए कुछ नहीं किया. इसलिए इस बार उन्होंने महिला उम्मीदवारों को समर्थन देने का फ़ैसला किया. अब देखना यह है कि यह पंचायत गांव का कितना विकास कर पाती है, क्योंकि अभी तक कोई उत्साहजनक नतीजा सामने नहीं आया है. खैर, इतना तो जरूर हुआ है कि आज महिलाएं चौपाल पर बैठक सभाएं करने लगी हैं. वे बड़ी बेबाकी के साथ गांव और समाज की समस्याओं पर अपने विचार रखती हैं. पंचायत में महिलाओं को आरक्षण मिलने से उन्हें एक बेहतर मौका मिल गया है, वरना पुरुष प्रधान समाज में कितने पुरुष ऐसे हैं जो अपनी जगह अपने परिवार की किसी महिला को सरपंच या पंच देखना चाहेंगे. काबिले-गौर है कि उत्तत्तराखंड के दिखेत गांव में भी पंचायत पर महिलाओं का ही क़ब्जा है.

गौरतलब है कि संविधान के 73वें संशोधन के तहत त्रिस्तरीय पंचायतों में महिलाओं के लिए 33 फ़ीसदी आरक्षण की व्यवस्था है. केंद्रीय पंचायती राज मंत्री मणिशंकर अय्यर द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ पंचायती राज संस्थाओं में 10 लाख से ज़्यादा महिलाओं को निर्वाचित किया गया है, जो चुने गए सभी निर्वाचित सदस्यों का लगभग 37 फ़ीसद है. बिहार में महिलाओं की यह भागीदारी 54 फ़ीसद है. वहां महिलाओं के लिए 50 फ़ीसद आरक्षण लागू है. मध्यप्रदेश में भी गत मार्च में पंचायत मंत्री रुस्तम सिंह ने जब मध्यप्रदेश पंचायत राज व ग्राम स्वराज संशोधन विधेयक-2007 प्रस्तुत कर पंचायत और नगर निकाय चुनाव में महिलाओं को 50 फ़ीसदी आरक्षण देने की घोषणा की. पंचायती राज प्रणाली के तीनों स्तरों की कुल दो लाख 39 हज़ार 895 पंचायतों के 28 लाख 30 हज़ार 46 सदस्यों में 10 लाख 39 हज़ार 872 महिलाएं (36.7 फ़ीसद) हैं. इनमें कुल दो लाख 33 हजार 251 पंचायतों के 26 लाख 57 हज़ार 112 सदस्यों में नौ लाख 75 हज़ार 723 (36.7 फ़ीसद) महिलाएं हैं. इसी तरह कुल छह हज़ार 105 पंचायत समितियों के एक लाख 57 हज़ार 175 सदस्यों में से 58 हजार 328 (37.1 फ़ीसद) महिलाएं हैं. कुल 539 ज़िला परिषदों के 15 हज़ार 759 सदस्यों में पांच हज़ार 821 (36.9 फ़ीसद) महिलाएं हैं. क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि भारत में पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू होने की वजह से ही वे आगे बढ़ पाईं हैं.

हालांकि देश की सियासत में आज भी महिलाओं तादाद उतनी नहीं है, जितनी कि होनी चाहिए. यह कहना भी क़तई गलत नहीं होगा कि अपने पड़ौसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन के मुकाबले संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भारत अभी भी बहुत पीछे है. दुनियाभर में घोर कट्टरपंथी माने जाने वाले पाकिस्तान और बांग्लादेश में महिलाएं प्रधानमंत्री पद पर आसीन रही हैं. यूनिसेफ द्वारा कई चुनिंदा देशों में 2001-2004 के आधार पर बनाकर जारी की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 8.3 फ़ीसद, ब्राजील में 8.6 फ़ीसद, इंडोनेशिया में 11.3 फ़ीसद, बांग्लादेश में 14.8 फ़ीसद, यूएसए में 15.2 फ़ीसद, चीन में 20.3 फ़ीसद, नाइजीरिया में सबसे कम 6.4 फ़ीसद और पाकिस्तान में सबसे ज़्यादा 21.3 फ़ीसद रहा. इस मामले में पाकिस्तान ने विकसित यूएसए को भी काफी पीछे छोड़ दिया है. वर्ष 1996 में भारत की लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 7.3 फ़ीसद और 1999 में 9.6 फ़ीसद था. हालांकि चुनाव के दौरान कई सियासी दल विधानसभा और लोकसभा में भी महिलाओं को आरक्षण देने के नारे देते हैं, लेकिन यह महिला वोट हासिल करने का महज़ चुनावी हथकंडा ही साबित होता है. बहरहाल, उम्मीद पर दुनिया क़ायम है. फिलहाल यही कहा जा सकता है कि नीमखेड़ा और दिखेत की महिला पंचायतें महिला सशक्तिकरण की ऐसी मिसालें हैं, जिनसे दूसरी महिलाएं प्रेरणा हासिल कर सकती हैं.