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Wednesday, November 22, 2017

हर बार क़ब्र छोटी पड़ जाती

फ़िरदौस ख़ान
कल एक वाक़िया सुना... सच या झूठ, जो भी हो... लेकिन वो सबक़ ज़रूर देता है...
एक क़बिस्तान में एक क़ब्र खोदी गई... उस क़ब्र में लेट कर देखा गया कि क़ब्र सही है, छोटी तो नहीं है, कहीं कोई कमी तो नहीं रह गई... क़ब्र सही थी...
क़ब्र में मैयत को उतारा गया... लेकिन जैसे ही क़ब्र में मैयत रखी, क़ब्र छोटी पड़ गई... मैयत को ऊपर उठा लिया गया... फिर से क़ब्र को वसीह (बड़ा) किया गया... और उसमें मैयत उतारी गई... लेकिन फिर से क़ब्र छोटी पड़ गई... कई बार क़ब्र खोदी गई, लेकिन हर बार वह छोटी पड़ जाती... सब हैरान और परेशान थे... आख़िरकार मुर्दे को जैसे-तैसे दफ़नाया गया...
जिस शख़्स को दफ़नाया गया था, उसके बारे में घरवालों और आस-पड़ौस के लोगों से मालूमात की गई... मालूम हुआ कि उसने अपने भाइयों की ज़मीन पर क़ब्ज़ा किया हुआ था... लोगों का मानना था कि इसी वजह से उसकी क़ब्र तंग हो गई थी...

हम ये तो नहीं जानते कि ये वाक़िया सच्चा है या झूठा... हां, लेकिन इतना ज़रूर है कि इसने सोचने पर मजबूर कर दिया... आख़िर इंसान को चाहिये ही कितना होता है... दो वक़्त का खाना, चार जोड़े कपड़े... और मरने के बाद दो गज़ ज़मीन... फिर भी क्यों लोग दूसरों की हक़ तल्फ़ी करके ज़मीन-जायदाद, माल और दौलत इकट्ठी कराते हैं... सब यही रह जाना है... साथ अगर कुछ जाएगा, तो वो सिर्फ़ आमाल ही होंगे...
फिर क्यों इंसान दूसरों को लूटने में लगा हुआ है...? ज़रा सोचिये...

Monday, May 8, 2017

ठंडा पानी और बर्फ़...

सब इंसानों की बुनियादी ज़रूरतें एक जैसी ही हैं... लेकिन सबके पास अपनी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने के साधन नहीं हैं... दुनिया में कितने ही लोग ऐसे हैं, जिनके पास ज़रूरत से ज़्यादा, यहां तक कि बेहिसाब चीज़ें हैं... बहुत से लोग ऐसे हैं, जिनके पास अपनी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने लाय़क भी चीज़ें नहीं हैं... वे महरूम रह जाते हैं... अगर हम एक-दूसरे की मदद करें, इंसान के नाते... ये मानकर कि ये हम पर फ़र्ज़ है, और सामने वाले का ये हक़ है... तो इसमें कोई दो राय नहीं कि इससे जहां हमें दिली सुकून मिलेगा, वहीं सामने वाले की ज़रूरत पूरी हो जाएगी... ऐसा करके हम किसी पर कोई अहसान नहीं करेंगे, बल्कि ये सामने वाला का ही अपनापन होगा कि वो हमारी मदद को क़ुबूल करके हमें ख़ुशी देगा...

बात किसी को रुपये-पैसे की मदद या कोई क़ीमती चीज़ देने की नहीं है... हम अपनी हैसियत के हिसाब से जो कर सकते हैं, वो हमें करना ही चाहिए... मिसाल के तौर पर...

हमारे घर के पास एक सरकारी स्कूल है... अकसर उसका नल ख़राब रहता है... स्कूल में पीने साफ़ पानी का भी कोई इंतज़ाम नहीं है... पानी की जो टंकी है, उसकी भी सफ़ाई नहीं होती... तपती गरमी के मौसम में बच्चों को बहुत परेशानी होती है... हमने अपने घर के आगे सड़क पर एक नल लगवाया... पहले घर के अंदर नल लगा था, लेकिन उसमें रेत आने लगा था, कई बार ठीक कराने के बावजूद जब रेत आना बंद नहीं हुआ, तो उसे बंद करवाकर बाहर नल लगवा लिया... आसपास से बहुत लोग पानी भरने आते थे...  स्कूल के बच्चे भी यहां आने लगे... मगर कुछ वक़्त बाद यह नल भी खराब हो गया... एक दिन अम्मी ने बच्चों को मायूस लौटते देख, उनसे रुकने को कहा और फ़्रिज से ठंडा पानी लाकर उन्हें पिला दिया... अब हर रोज़ बच्चे आने लगे... स्कूल के अलावा सड़कों पर काग़ज़ बीनने वाले बच्चे भी दरवाज़ा खटखटाकर पानी और खाना मांग लेते हैं...

हमारी चार साल की भतीजी भी जब बच्चों को देखती है, तो पानी की बोतल लेकर दौड़ती है... कहते हैं कि बच्चे अपने बड़ों से ही सीखते हैं... हमारी भी एक आदत रही है, कहीं से आते हैं, तो आटो या रिक्शेवाले से पानी को ज़रूर पूछते हैं...

इलाक़े के एक-दो घरों के लोग बर्फ़ भी ले जाते हैं... हालांकि अब घर-घर फ़्रिज हैं, लेकिन अब भी सब लोगों के पास फ़्रिज नहीं हैं... पहले तो ऐसा बहुत होता था कि एक के घर फ़्रिज आया, तो आसपास के लोग बर्फ़ ले जाते थे...
अम्मी जान कई बर्तनों में बर्फ़ जमाती हैं, ताकि किसी को को ख़ाली हाथ न लौटना पड़े... एक रोज़ अम्मी से एक पड़ौसन ने कहा कि हमारे बस का नहीं ये सब... कौन रोज़-रोज़ अपने दरवाज़े पर भीड़ लगाए... हम तो साफ़ मना कर देते हैं... ख़ैर, ये उनकी अपनी सोच है... ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है...

ये सब लिखने का हमारा मक़सद ये है कि अगर हमारे आसपास ऐसे लोग हैं, जिनकी हम किसी भी तरह कोई मदद कर सकते हैं, तो हमें उनकी मदद करनी चाहिए...

Monday, April 25, 2016

मज़हब


सबसे अच्छा मज़हब वही है, जो अपने अनुयायियों को ये सिखाए कि उनकी वजह से किसी का दिल न दुखे, किसी को तकलीफ़ न पहुंचे...और सबसे अच्छी क़ौम वही है, जिसके मानने वाले किसी का दिल न दुखाएं, किसी को तकलीफ़ न पहुंचाएं...
  • दुनिया को इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आपका मज़हब क्या है... दुनिया को इस बात से बहुत फ़र्क़ पड़ता है कि आप कैसे इंसान हैं...


Sunday, December 27, 2015

गर्म कपड़े


हम सब बाज़ार से नये-नये कपड़े-कपड़े ख़रीदते रहते हैं... हर मौसम में मौसम के हिसाब से कपड़े आते हैं... सर्दियों के मौसम में स्वेटर, जैकेट, गरम कोट, कंबल, रज़ाइयां और भी न जाने क्या-क्या... बाज़ार जाते हैं, जो अच्छा लगा ख़रीद लिया... हालांकि घर में कपड़ों की कमी नहीं होती... लेकिन नया दिख गया, तो अब नया ही चाहिए... इस सर्दी में कुछ नया ही पहनना है... पिछली बार जो ख़रीदा था, अब वो पुराना लगने लगा... वार्डरोब में नये कपड़े आते रहते हैं और पुराने कपड़े स्टोर में पटख़ दिए जाते हैं...
ये घर-घर की कहानी है... जो कपड़े हम इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं और वो पहनने लायक़ हैं, तो क्यों न उन्हें ऐसे लोगों को दे दिया जाए, जिन्हें इनकी ज़रूरत है...

कुछ लोग इस्तेमाल न होने वाली चीज़ें दूसरों को इसलिए भी नहीं देते कि किसे दें, कौन देने जाए... किसके पास इतना वक़्त है... अगर हम अपना थोड़ा-सा वक़्त निकाल कर इन चीज़ों को उन हाथों तक पहुंचा दें, जिन्हें इनकी बेहद ज़रूरत है, तो कितना अच्छा हो...

चीज़ वहीं अच्छी लगती है, जहां उसकी ज़रूरत होती है...

Thursday, July 9, 2015

रोटी बैंक...


फ़िरदौस ख़ान
इंसान चाहे, तो क्या नहीं कर सकता. उत्तर प्रदेश के महोबा ज़िले के बाशिन्दों ने वो नेक कारनामा कर दिखाया है, जिसके लिए इंसानियत हमेशा उन पर फ़ख़्र करेगी.  बुंदेली समाज के अध्यक्ष हाजी मुट्टन चच्चा और संयोजक तारा पाटकर ने कुछ लोगों के साथ मिलकर एक ऐसे बैंक की शुरुआत की है, जो भूखों को रोटी मुहैया कराता है.
बीती 15 अप्रैल से शुरू हुए इस बैंक में हर घर से दो रोटियां ली जाती हैं. शुरू में इस बैंक को सिर्फ़ 10 घरों से ही रोटी मिलती थी, लेकिन रफ़्ता-रफ़्ता इनकी तादाद बढ़ने लगी और अब 400 घरों से रोटियां मिलती हैं. इस तरह हर रोज़ बैंक के पास 800 रोटियां जमा हो जाती हैं,  जिन्हें पैकेट बनाकर ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचाया जाता है. इस वक़्त 40 युवा और पांच वरिष्ठ नागरिक इस मुहिम को चला रहे हैं.
शाम को युवा घर-घर जाकर रोटी और सब्ज़ी जमा करते हैं. फिर इनके पैकेट बनाकर इन्हें उन लोगों को पहुंचाते हैं, जिनके पास खाने का कोई इंतज़ाम नहीं है. पैकिंग का काम महिलाएं करती हैं. इस काम में तीन से चार घंटे का वक़्त लगता है. फ़िलहाल बैंक एक वक़्त का खाना ही मुहैया करा रहा है, भविष्य में दोनों वक़्त का खाना देने की योजना है.
इस नेक काम में लगे लोग बहुत ख़ुश हैं. अगर देशभर में इस तरह के रोटी बैंक खुल जाएं, तो फिर कोई भूखा नहीं सोएगा.

Tuesday, May 12, 2009

हसन के इंतज़ार में पथराईं मां की आंखें














फ़िरदौस ख़ान
जब घर का चश्मो-चिराग कहीं खो जाता है, तो उसकी याद में किस तरह दिल तड़पता है और आंखें गंगा-जमुना की धारा बन जाती हैं, इसके तसव्वुर से ही रूह कांप उठती है. अगर जाने वाले को इसका अहसास हो तो कभी वह ख्वाब में भी अपने घर-परिवार को छोड़कर जाने की बात नहीं सोचेगा. उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरपुर जिले के कस्बे बुढाना के 10 साल के मोहम्मद हसन की गुमशुदगी को चार साल होने वाले हैं. उसकी मां आयशा का रो-रोकर बुरा हाल है. उन्होंने अपने लाल को हर जगह तलाशा, मगर वो कहीं न मिला. सुबह सूरज की पहली किरण से ही पूरा घर अपने लाडले के इंतज़ार में पलकें बिछा लेता है, उम्मीद की एक लौ कायम रहती है कि कभी कोई तो आएगा, उनके बेटे की खबर लेकर, लेकिन जब रात ढलती है और हसन की कोई ख़बर नहीं आती तो दिल बुझने लगता है.

मोहम्मद हसन के पिता मोहम्मद फुरकान का कहना है कि उन्हें क्या पता था कि उनका बेटा उनसे बिछड़ जाएगा. वे तो बस इतना चाहते थे कि मदरसे से आने के बाद हसन यहां-वहां खेलकर वक्त बर्बाद करने के बजाय उनके काम में हाथ बंटाए, ताकि उसे काम करने की आदत पड़ जाए. वे कहते हैं कि हम तो खेती करने वाले लोग हैं. सुबह पौ फटने से लेकर देर रात तक खेतों में खून-पसीना बहाना पड़ता है तब कहीं जाकर घर-परिवार के गुजारे लायक आमदनी जुटा पाते हैं. हम बचपन से ही बच्चों को काम की आदत डालते हैं, ताकि बड़े होकर वे मेहनत-मजदूरी कर सकें. बस, खेत में काम करने की बात को लेकर ही बेटे पर उनका हाथ उठ गया और वह कहीं चला गया. अपनी इस गलती के लिए वे आज तक पछता रहे हैं. काश, उन्होंने अपने बेटे को मारने के बजाय प्यार से समझाया होता तो आज वह हमारे साथ ही होता. उन्होंने अपने बेटे को आसपास ही नहीं दूर-दराज तक के इलाकों में ढूंढा, मगर वह कहीं नहीं मिला. उन्होंने अपने सब रिश्तेदारों के यहां जाकर भी बेटे को तलाश किया.

बच्चे का मामू जान कारी मोहम्मद आरिफ साहब का कहना है कि मोहम्मद हसन अपने पिता मोहम्मद फुरकान से बहुत डरता था. उसके पिता उससे खेत में काम करने को कहते थे. इसी बात को लेकर कई बार वे अपने बेटे को पीट भी चुके हैं. इससे पहले दो बार वह अपने पिता की मार खाने के बाद अपने मामा के पास बंतीखेड़ा आ गया. बाद में वो उसे समझा-बुझाकर उसके घर छोड़कर आए. वे बताते हैं कि हसन पढ़ने में बहुत होशियार है. उसे पास के ही मदीना-उल-तुलूम मदरसे में कुरआन हिफ्ज यानि मुंह जबानी याद करने के लिए दाखिल कराया गया था. छोटी-सी उम्र में ही उसने तीन पारे अध्याय हिफ्ज कर लिए थे. उसे क्रिकेट खेलने का बहुत शौक है. नम आंखों से वे कहते हैं कि हसन जहां कहीं भी होगा, क्रिकेट जरूर खेलता होगा.

कारी साहब कहते हैं कि आज भी देहात के मुसलमानों में फोटो खिंचवाने का चलन नहीं है. जब कभी दस्तावेजों के लिए जरूरत पड़ती है, तभी लोग फोटो खिंचवाते हैं. एक दिन उन्होंने यूं ही मदरसे में बच्चों के साथ अपने भांजे हसन की फोटो खिंचवा ली थी, वरना आज उसकी तलाश के लिए एक तस्वीर तक उनके पास नहीं होती.

हसन का बड़ा भाई मोहम्मद मुबारक 15 साल का है. पोलियो की वजह से एक पैर से लाचार होने के बावजूद वे भी अपने भाई की तलाश में जगह-जगह भटकता रहता है. उसका कहना है कि बस उसे एक बार उसका भाई मिल जाए, वे उसे कहीं नहीं जाने देगा. हसन का छोटा भाई अब्दुल कादिर, बहनें आरिफा और मंतशा भी अपने भाई को देखने के लिए तरस रही हैं. वे दिन-रात यही दुआ करती हैं कि बस एक बार उनका भाई घर वापस आ जाए.