Thursday, December 11, 2025

उमरपुरा के सिख भाइयों ने बनवाई मस्जिद


डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
हमारे प्यारे हिन्दुस्तान की सौंधी मिट्टी में आज भी मुहब्बत की महक बरक़रार है. इसलिए यहां के बाशिन्दे वक़्त-दर-वक़्त इंसानियत, प्रेम और भाईचारे की मिसाल पेश करते रहते हैं. कितने ही मामले ऐसे हैं, जब यहां के हिन्दू और सिख भाइयों ने मुसलमानों को मस्जिदों और क़ब्रिस्तानों के लिए ज़मीनें दी है.   

हाल ही में पंजाब का ही वाक़िया देखें. पंजाब के मलेरकोटला ज़िले की तहसील अहमदगढ़ के गांव उमरपुरा में 9 दिसम्बर 2025 के मुबारक दिन पहली बार नई मस्जिद में नमाज़ अदा की गई. पंजाब के शाही इमाम मौलाना मुहम्मद उस्मान लुधियानवी ने पहली नमाज़ पढ़ाई. यह गांव की पहली मस्जिद है. इससे पहले गांव में कोई मस्जिद नहीं थी.

ख़ुशनुमा बात यह है कि गुज़श्ता जनवरी 2025 में गांव के पूर्व सरपंच सुखजिन्दर सिंह नोनी और उनके भाई अवनिन्दर सिंह ने अपनी 5.5 बिस्वा ज़मीन मस्जिद के लिए वक़्फ़ की थी, ताकि गांव के मुसलमान भाई अपने ही गांव में नमाज़ अदा कर सकें. गांव के मुसलमानों को नमाज़ के लिए दूर-दराज़ के इलाक़ों में जाना पड़ता था. मस्जिद की तामीर में गांव के सिख परिवारों ने भी हर मुमकिन मदद की.
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'शिवम उर्फ़ अहीर धाम क़ब्रिस्तान
गुज़श्ता दिसम्बर माह में बिहार के बक्सर ज़िले के चौसा प्रखंड के रामपुर पंचायत के गांव डेवी डिहरा के जनार्दन सिंह ने अपने बेटे शिवम कुमार की मौत के बाद मुसलमानों के क़ब्रिस्तान के लिए एक बीघा ज़मीन वक़्फ़ कर दी. 
गुज़श्ता 18 नवम्बर 2025 को देहरादून में हुए एक सड़क हादसे में शिवम कुमार की मौत हो गई थी. शिवम एक नेक युवक था और वह ज़रूरतमंदों की मदद करता था. इसलिए उसके परिवार ने अपने बेटे की याद में क़ब्रिस्तान को ज़मीन देने का फ़ैसला किया, ताकि शिवम की स्मृति आने वाली पीढ़ियों के बीच इंसानियत की मिसाल बनकर ज़िन्दा रहे. इस क़ब्रिस्तान का नाम 'शिवम उर्फ़ अहीर धाम क़ब्रिस्तान’ रखा गया है. यहां शिवम की स्मृति में पौधारोपण भी किया गया.
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गुज़श्ता 28 नवम्बर 2025 को जम्मू में जम्मू डेवलपमेंट अथॉरिटी ने पत्रकार अरफ़ाज़ डिंग का घर ढहा दिया, तो उनके हिन्दू पड़ौसी कुलदीप शर्मा ने उन्हें अपनी ज़मीन का एक हिस्सा देने की पेशकश की, ताकि वह अपना घर बना सकें. ये भी आपसी भाईचारे की एक शानदार मिसाल है.
गुज़श्ता मई 2022 में उत्तराखंड के रुद्रपुर में दो हिन्दू बहनों सरोज और अनीता ने ईदगाह के लिए ज़मीन वक़्फ़ की थी. काशीपुर इलाक़े में ईदगाह कमेटी के प्रमुख हसीन ख़ान ने कहा था- “जब हमारा देश साम्प्रदायिक तनाव झेल रहा है, तब ऐसे माहौल में इन बहनों का ज़मीन वक़्फ़ करना महान काम है.”
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गुज़श्ता जून 2019 में उत्तर प्रदेश के अयोध्या के गोसाईगंज इलाक़े के गांव बेलवारी खान के हिन्दू भाइयों ने मुसलमानों को क़ब्रिस्तान के लिए ज़मीन वक़्फ़ की थी. भूमि दानकर्ता रीपदांद महाराज ने बताया कि सैकड़ों वर्षों से गोसाईगंज नगर व आसपास के मुसलमान इस ज़मीन को क़ब्रिस्तान के रूप में इस्तेमाल करते आए हैं. इसलिए हम लोगों ने अपने पूर्वजों के दिए गये वचन को निभाते हुए खतौनी में चले आ रहे अपने मालिकाना हक़ को ख़त्म करते हुए मुस्लिम क़ब्रिस्तान कमेटी के पक्ष में पंजीकृत दान पत्र लिख दिया है. 
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गुज़श्ता मई 2016 में बिहार के सिवान ज़िले की बिसवार पंचायत के गांव खडखडिया में एक हिन्दू भाई चन्द्र कुमार तिवारी ने अपनी निजी ज़मीन का कुछ हिस्सा मुसलमानों के क़ब्रिस्तान के लिए वक़्फ़ कर इंसानियत की मिसाल क़ायम की. उन्होंने अपनी पैतृक ज़मीन खाता संख्या 85 तौजी संख्या 6310 रक़बा 4 कट्ठा 11 धुर में से उत्तर पश्चिम के कोने पर 4 कट्ठा भूमि मुस्लिम क़ब्रिस्तान के लिए दी.  
सब भाई-बहनों को दिल से सलाम. मुहब्बत का ये जज़्बा यूं ही क़ायम रहे, आमीन

अरावली पर्वत श्रृंखला का वजूद ख़तरे में


डॉ. फ़िरदौस ख़ान  
आज अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस है। हर साल 11 दिसम्बर को अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने साल 2003 में यह दिवस घोषित किया था। इसका उद्देश्य पर्वतों के महत्व, संरक्षण और पर्वतीय समुदायों के समक्ष आने वाली चुनौतियों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। पर्वत पेयजल, जैव विविधता, औषधियों, भोजन और लकड़ी आदि के महत्वपूर्ण स्रोत हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक दोहन की वजह से इनका वजूद ख़तरे में पड़ गया है। इसलिए आज इन्हें संरक्षण की बेहद ज़रूरत है।   

अरावली पर्वत श्रृंखलाओं का अस्तित्व ख़तरे में हैं। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पर्वत श्रृंखलाओं में खनन कार्य पर पाबंदी लगाई हुई है, लेकिन न्यायालय द्वारा अरावली पहाड़ियों की एक नई आधिकारिक परिभाषा को मंज़ूरी दिए जाने से प्रयावरणविदों की चिन्ता बढ़ है। उनका कहना है कि अगर वक़्त रहते इनका संरक्षण नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब अरावली पहाड़ों की जगह सिर्फ़ मरूस्थल ही नज़र आएगा। ग़ौरतलब है कि यह गुजरात के हिम्मत नगर से राजधानी दिल्ली तक 560 किलोमीटर लम्बी विश्व की सर्वाधिक पुरानी पर्वत श्रृंखला है, जिसकी चौड़ाई दस से 100 किलोमीटर तक है। सर्वाधिक ऊंचाई 1723 मीटर राजस्थान के माउंट आबू में है। पहाड़ियों में अकूत खनिज भंडार और क़ीमती पत्थरों का ख़ज़ाना है। खनन से हरियाणा और राजस्थान में अरावली पर्वत श्रृंखला को बहुत नुक़सान पहुंचा है।

क़ाबिले-ग़ौर है कि विगत 20 नवम्बर को सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पहाड़ियों की एक नई आधिकारिक परिभाषा को मंज़ूरी दी है। इसके तहत अरावली के अंदर किसी भी भू-आकृति में स्थानीय राहत से कम से कम 100 मीटर की ऊंचाई होनी चाहिए, जिसमें इसकी ढलान और आसपास के क्षेत्र शामिल हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति द्वारा प्रस्तुत उन सिफ़ारिशों को मंज़ूर कर लिया, जिनमें उत्तर-पश्चिम भारत में 692 किलोमीटर की सीमा को परिभाषित करने की नई परिभाषा को मानकीकृत करने की मांग की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय को बताया गया कि भारतीय वन सर्वेक्षण के एक आकलन के मुताबिक़ 12,081 मानचित्र की गई पहाड़ियों में से सिर्फ़ 1048 ही 8.7 मापदंड को पूरा करती हैं, यानी 100 मीटर के मापदंड को पूरा करती हैं। इन नये मानदंडों के तहत अरावली पर्वत श्रृंखला का तक़रीबन 90 फ़ीसद हिस्सा अपने क़ानूनी संरक्षण से बेदख़ल हो जाएगा। 
ग़ौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पर्वत के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

 न्यायालय ने नब्बे के दशक से अरावली पर्वत क्षेत्र में अवैध खनन पर बार-बार रोक लगाई है। क़ाबिले-ग़ौर है कि 21 दिसम्बर 1992 को केंद्र सरकार के नोटिफ़िकेशन और 12 दिसम्बर 1996 के सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले के बाद पूरे अरावली पहाड़ी क्षेत्र को वन क्षेत्र घोषित किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने 18 मार्च 2004 को आदेश दिए थे कि अरावली श्रृंखला में किसी प्रकार से हरियाली को नष्ट नहीं किया जा सकता। इस आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पहाड़ी में लगे पौधों को भी वन संरक्षित क्षेत्र मानते हुए वन क्षेत्र की परिभाषा तय की थी। इसके लिए गठित की गई सेंट्रल इंपॉवर्ड कमेटी को अनेक अधिकार सौंपते हुए पेड़ों की अवैध कटाई और खनन को रोकने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। इस कमेटी ने भी 7 जून 2007, 12 सितम्बर 2007 और 7 दिसम्बर 2007 को जारी आदेश में पेड़ों की कटाई नहीं होने देने के सख़्त निर्देश दिए थे। कमेटी ने सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी रिपोर्ट में कुछ ख़ास जगहों को छोड़कर इस समूची पर्वत श्रृंखला के आसपास खुदाई पर पूरी तरह रोक लगाने और संरक्षित क्षेत्रों में बनाई गई इमारतों को गिराने की सिफ़ारिश की थी। यह क्षेत्र हरियाणा भूमि एक्ट की धारा 4-5 के तहत भी आता था। इसलिए इस ज़मीन को किसी भी प्रकार का नुक़सान पहुंचाना पर्यावरण नियमों की अवहेलना करना है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने 29 अक्टूबर 2002 को हरियाणा सरकार को निर्देश जारी कर कहा था कि गुड़गांव और फ़रीदाबाद में खनन कार्य से पर्यावरण प्रदूषित होने के साथ असंतुलित भी हो रहा है, इसलिए दोनों ज़िलों में तुरंत प्रभाव से खनन कार्य बंद कराया जाए। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद प्रदेश सरकार ने कार्रवाई करते हुए एक टीम का गठन किया और खनन कार्य बंद करवा दिया, लेकिन कुछ दिनों बाद खनन माफ़िया अरावली श्रृंखलाओं में सक्रिय हो गया और फिर से ब्लास्टिंग के माध्यम से खनन कार्य किया जाने लगा। अवैध खनन का मामला जब मीडिया ने उठाया तो सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए फिर से खनन कार्य बंद कराने के निर्देश दिए। सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बाद प्रदेश सरकार ने अवैध खनन रोकने के लिए बाक़ायदा एक कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी में पुलिस विभाग, पंचायत विभाग, राजस्व विभाग व खनन विभाग के अधिकारियों को शामिल किया गया था। यह भी सुनिश्चित किया गया था कि अवैध खनन रोकने के लिए कमेटी नियमित रूप से अपने-अपने क्षेत्रों की पर्वत श्रृंखलाओं में जाकर अवैध खनन को पूरी तरह बंद कराए। अवैध खनन की शिकायतें मिलने पर वन मंडल अधिकारी सतबीर सिंह दहिया ने फ़रीदाबाद ज़िले के खेड़ी कलां गांव में छापा मारा था और स्थानीय अधिकारियों को सख़्ती से अवैध खनन पर रोक लगाने की हिदायत दी गई थी। उस वक़्त वन क्षेत्र से दूर खनन की इजाज़त लेकर वन्य इलाके की भी खुदाई की जा रही थी। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में व्यावसायिक व निर्माण गतिविधियों का तेज़ी से प्रसार का सबसे ज़्यादा ख़ामियाज़ा अरावली पहाड़ियों का भुगतना पड़ रहा है। गुड़गांव, मानेसर और फ़रीदाबाद इलाके़ में पत्थरों के लिए अंधाधुंध खनन किया गया था।

पर्यावरणविद् और वाटर मैन नाम से विख्यात हाजी इब्राहिम ख़ान का कहना है कि अरावली पर्वत के विषय में मंज़ूर किए गये नये मानदंडों की वजह से इसका वजूद ख़तरे में पड़ जाएगा। अरावली की पहाड़ियां बारिश, सूखा और बाढ़ को नियंत्रित करती हैं, लेकिन ज़्यादा ऊंची न होने की वजह से इनका अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है, जिससे इसके अस्तित्व को ख़तरा पैदा हो गया है। अरावली के जंगल तबाह होने से यहां रहने वाले वन्य प्राणियों का अस्तित्व भी संकट में पड़ गया है। आबादी की तरफ़ आने पर ये जानवर अकसर दुर्घटना का भी शिकार होते रहते हैं। कई बार तो बस्ती के लोग वन विभाग के अधिकारियों की मदद से जानवरों को जंगल में छोड़ आते हैं। पहले यहां शेर, चीते, हिरण, भेड़िये, नील गाय, गीदड़, जंगली बिल्ले, ख़रगोश, सांप, नेवले, मोर, तीतर आदि बड़ी तादाद में थे, लेकिन अब ये लुप्त होते जा रहे हैं। 

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा है- “गुजरात से लेकर राजस्थान और हरियाणा तक फैली अरावली पर्वतमाला ने लम्बे समय से भारतीय भूगोल और इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सरकार ने अवैध खनन से पहले ही बर्बाद हो चुकी इन पहाड़ियों के लिए अब लगभग 'डेथ वारंट' पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। सरकार ने घोषणा की है कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली कोई भी पहाड़ी खनन के ख़िलाफ़ कड़े प्रतिबंधों के अधीन नहीं है। यह फ़ैसला अवैध खननकर्ताओं और माफ़ियाओं के लिए खुला निमंत्रण है कि वे इस श्रृंखला के उस 90 प्रतिशत हिस्से का भी सफ़ाया कर दें, जो सरकार द्वारा निर्धारित ऊंचाई सीमा से नीचे आता है।“

अरावली पहाड़ियों की परिभाषा में बदलाव को लेकर कांग्रेस नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा है- "यह अजीब है और इसके पर्यावरण और पब्लिक हेल्थ पर बहुत गंभीर नतीजे होंगे। इसकी तुरंत समीक्षा की ज़रूरत है।"

बहरहाल, अरावली पर्वत श्रृंखलाओं को बचाने की ज़रूरत है। साथ ही सरकारों को भी गंभीरता बरतनी होगी, ताकि इनका वजूद क़ायम रहे।  

Monday, December 1, 2025

आज पहली दिसम्बर है...

 


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
आज पहली दिसम्बर है... दिसम्बर का महीना हमें बहुत पसंद है... क्योंकि इसी माह में क्रिसमस आता है... जिसका हमें सालभर बेसब्री से इंतज़ार रहता है... यानी क्रिसमस के अगले दिन से ही इंतज़ार शुरू हो जाता है... 
दिसम्बर में ही हमारी जान फ़लक की सालगिरह भी तो आती है...
इस महीने में दिन बड़े होने शुरू हो जाते हैं... और रातें छोटी होने लगती हैं... यह बात अलग है कि इसका असर जनवरी में ही नज़र आता है... दिसम्बर में ठंडी हवायें चलने लगती हैं... सुबह और शामें कोहरे से ढकी होती हैं... क्यारियों में गेंदा और गुलाब महकने लगते हैं... सच, बहुत ख़ूबसूरत होता है दिसम्बर का महीना...
इसी महीने में अपने साल भर के कामों पर ग़ौर करने का मौक़ा भी मिल जाता है... यानी इस साल में क्या खोया और क्या पाया...? नये साल में क्या पाना चाहते हैं... और उसके लिए क्या तैयारी की है...वग़ैरह-वग़ैरह...

ग़ौरतलब है कि दिसम्बर ग्रेगोरी कैलंडर के मुताबिक़ साल का बारहवां महीना है. यह साल के उन सात महीनों में से एक है, जिनके दिनों की तादाद 31 होती है. दुनिया भर में ग्रेगोरी कैलेंडर का इस्तेमाल किया जाता है. यह जूलियन कालदर्शक का रूपातंरण है. ग्रेगोरी कालदर्शक की मूल इकाई दिन होता है. 365 दिनों का एक साल होता है, लेकिन हर चौथा साल 366 दिन का होता है, जिसे अधिवर्ष कहते हैं. सूर्य पर आधारित पंचांग हर 146,097 दिनों बाद दोहराया जाता है. इसे 400 सालों मे बांटा गया है. यह 20871 सप्ताह के बराबर होता है. इन 400 सालों में 303 साल आम साल होते हैं, जिनमें 365 दिन होते हैं, और 97 अधि वर्ष होते हैं, जिनमें 366 दिन होते हैं. इस तरह हर साल में 365 दिन, 5 घंटे, 49 मिनट और 12 सेकंड होते है. इसे पोप ग्रेगोरी ने लागू किया था.
 (हमारी डायरी से)