Monday, October 27, 2014

बेगम अख़्तर को समर्पित रही संगोष्ठी


नई दिल्ली. बेगम अख़्तर जितनी बड़ी गायिका थीं, उतनी बड़ी ही इंसान थीं. यह बात लेखक और फ़िल्मकार शरद दत्त ने बेगम अख़्तर को समर्पित सन्निधि की संगोष्ठी में अध्यक्षीय भाषण के दौरान कही. गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा और विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान की ओर से रविवार को सन्निधि सभागार में आयोजित संगोष्ठी में दत्त ने बेगम अख़्तर के साथ व्यतीत क्षणों का विस्तार से ज़िक्र करते हुए कहा कि वे अपने मिज़ाज से जीती थीं और कार्यक्रमों में शिरकत करने से इंकार तब भी नहीं करती थीं, जब वे बीमार रहती थीं. वे बड़ी कलाकार अपने प्रयासों के कारण बनीं, लेकिन उनमें अहंकार कभी नहीं रहा.
काका कालेलकर और विष्णु प्रभाकर की स्मृति में हर माह आयोजित होने वाली इस बार की संगोष्ठी ग़ज़ल और डायरी लेखन पर केंद्रित थी. मुख्य अतिथि दीक्षित दनकौरी के सानिध्य में संगोष्ठी में नए रचनाकारों ने अपनी ताज़ातरीन ग़ज़लें पेश कीं. इनमें विशिष्ट अतिथि और वरिष्ठ पत्रकार फ़िरदौस ख़ान सहित प्रदीप तरकश, विकास राज, राजेंद्र कलकल, अरुण शर्मा अनंत, कालीशंकर सौम्य, मनीष मधुकर, उर्मिला माधव, सीमा अग्रवाल, शालिनी रस्तोगी, जीतेंद्र प्रीतम, कामदेव शर्मा, अनिल मीत और अस्तित्व अंकुर शामिल थे. इनकी ग़ज़लों में मौजूदा समय की विसंगतियों और विडंबनाओं का उल्लेख था.
इस मौक़े पर शायरी के क्षेत्र में चर्चित दीक्षित दनकौरी ने अपनी चुनिंदा ग़ज़लों को पेश करने से पहले नये रचनाकारों को हिदायत दी कि वे मंचीय कवियों की नक़ल न करें और न ही सस्ती लोकप्रियता की ओर भागें. उन्होंने नये रचनाकारों से आग्रह किया कि वे अपने स्तर से रचना-कर्म की ख़ूब गहराई डूबें. उन्होंने कहा कि लेखन का कार्य दिखने में भले आसान-सा लगे पर यह वास्तव में कठिन काम है.
समारोह में विशिष्ट अतिथि व स्टार न्यूज़ एजेंसी की समूह संपादक फ़िरदौस ख़ान ने डायरी लेखन का ज़िक्र करते हुए कहा कि इन दिनों डायरी लेखन ख़ूब हो रहा है. डायरी, आत्मकथा का ही एक रूप है. फ़र्क़ बस ये है कि आत्मकथा में पूरी ज़िन्दगी का ज़िक्र होता है और ज़िन्दगी के ख़ास वाक़ियात ही इसमें शामिल  किए जाते हैं, जबकि डायरी में रोज़मर्रा की उन सभी बातों को शामिल किया जाता है, जिससे लेखक मुतासिर होता है. डायरी में अपनी ज़ाती बातें होती हैं, समाज और देश-दुनिया से जुड़े क़िस्से हुआ करते है. डायरी लेखन जज़्बात से सराबोर होता है, क्योंकि इसे अमूमन रोज़ ही लिखा जाता है. इसलिए उससे जुड़ी तमाम बातें ज़ेहन में ताज़ा रहती हैं. डायरी लिखना अपने आप में ही बहुत ख़ूबसूरत अहसास है. डायरी एक बेहद क़रीबी दोस्त की तरह है, क्योंकि इंसान जो बातें किसी और से नहीं कह पाता, उसे डायरी में लिख लेता है. हमारे मुल्क में भी डायरी लेखन एक जानी-पहचानी विधा बन चुकी है. इसकी बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए साहित्य जगत ने भी इसे क़ुबूल कर लिया है. बलॊग ने आज इसे घर-घर पहुंचा दिया है. उन्होंने कहा कि डायरी का ज़िक्र तेरह साल की एनी फ्रेंक के बिना अधूरा है. नीदरलैंड पर नाज़ी क़ब्ज़े के दौरान दो साल उसके परिवार ने छिपकर ज़िन्दगी गुज़ारी. बाद में नाज़ियों ने उन्हें पकड़ लिया और शिविर में भेज दिया, जहां उसकी मां की मौत हो गई. बाद में टायफ़ाइड की वजह से ऐनी और उसकी बहन ने भी दम तोड़ दिया. इस दौरान एनी ने अपनी ज़िन्दगी के अनुभवों को डायरी में लिखा था. जब रूसियों ने उस इलाक़े को आज़ाद करवाया, तब एनी की डायरी मिली. परिवार के ऑटो फ्रैंक ने ’द डायरी ऑफ़ ए यंग गर्ल’ नाम से इसे शाया कराया.  दुनियाभर की अनेक भाषाओं इसका में अनुवाद हो चुका है. और ये दुनिया की सबसे ज़्यादा लोकप्रिय डायरी में शुमार की जाती है.

विशिष्ट अतिथि डॊ. सुनीता ने डायरी लेखन पर कहा कि साहित्य में बाक़ी विधाओं की तरह डायरी लेखन को भले कोई ख़ास महत्व नहीं मिला, लेकिन इसके महत्व को कमतर नहीं आंका जाना चाहिए, क्योंकि मलाला और मुख़्तारन बाई जैसी महिलाओं की संघर्षशील जिंदगी की कठिनाइयों की सच्चाई उनकी डायरियों के ज़रिये ही दुनिया जान सकी. उन्होंने कहा कि डायरी लेखन ही एक ऐसा लेखन है, जिसमें लिखने वालों को ख़ुद से साक्षात्कार करना पड़ता है और यह कोई ज़रूरी नहीं कि डायरी लेखन केवल कोई बड़े लेखक तक ही सीमित हैं. डायरी से हर उस ख़ास और आम आदमी का सरोकार रहता रहा है, जिसमें अभिव्यक्ति की आकांक्षा है. डायरी लेखन पर सुरेश शर्मा ने भी अपने विचार रखे. उन्होंने कहा कि डायरी लेखन में ईमानदारी बरतनी चाहिए, जो बहुत ही कम देखने को मिलती है.

गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा की मंत्री कुसुम शाह के सानिध्य में आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत और किरण आर्या ने किया, जबकि स्वागत भाषण करते हुए विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान के मंत्री अतुल प्रभाकर ने आयोजन के मक़सद को उजागर किया और भावी कार्यक्रमों की जानकारी दी. संगोष्ठी में गणमान्य लोगों ने शिरकत की.



रेहाना ! हमें माफ़ करना...


-फ़िरदौस ख़ान
एक लड़की जो जीना चाहती थी... अरमानों के पंखों के साथ आसमान में उड़ना चाहती थी, लेकिन हवस के भूखे एक वहशी दरिन्दे ने उसकी जान ले ली. एक चहकती-मुस्कराती लड़की अब क़ब्र में सो रही होगी... उसकी रूह कितनी बेचैन होगी... सोचकर ही रूह कांप जाती है... लगता है उस क़ब्र में रेहाना जब्बारी नहीं हम ख़ुद दफ़न हैं...
रेहाना ! हमें माफ़ करना... हम तुम्हारे लिए सिर्फ़ दुआ ही कर सकते हैं...

ग़ौरतलब है कि तमाम क़वायद के बावजूद दुनियाभर के संगठन 26 साल की ईरानी महिला रेहाना जब्बारी को नहीं बचा सके. रेहाना को 25 अक्टूबर को फांसी दे दी गई. रेहाना पर इल्ज़ाम था कि उसने 2007 में अपने साथ ज़बरदस्ती करने की कोशिश करने वाले ख़ुफ़िया एजेंट मुर्तजा अब्दोआली सरबंदी पर चाक़ू से वार किया था, जिससे उसकी मौत हो गई थी. रेहाना को साल 2009 में क़त्ल का क़ुसूरवार पाया गया था. क़ानून मंत्री मुस्तफ़ा पी. मोहम्मदी ने अक्टूबर में इशारा किया था कि रेहाना की जान बच सकती है, लेकिन सरबंदी के परिजनों ने रेहाना की जान बचाने के लिए पैसे लेने से इंकार कर दिया. रेहाना की मां ने जज के सामने अपनी बेटी रेहाना की जगह ख़ुद को फांसी दे दिए जाने की गुहार लगाई थी.
पेशे से इंटीरियर डिज़ाइनर रेहाना को फांसी से बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुहिम चलाई गई, लेकिन उसकी जान नहीं बच सकी. मानवाधिकार संगठन ऐमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस आदेश को बिल्कुल ग़लत ठहराते हुए कहा कि हालांकि रेहाना ने सरबंदी को रेप की कोशिश करते वक़्त चाक़ू मारे जाने की बात मानी, लेकिन उसका क़त्ल कमरे में मौजूद एक अन्य व्यक्ति ने किया था.

रेहाना ने फांसी से पहले अपनी मां को एक ख़त लिखकर अपनी मौत के बाद अंगदान की ख़्वाहिश ज़ाहिर की. इस ख़त को रेहाना की मौत से दूसरे दिन 26 अक्टूबर को सार्वजनिक किया गया.  अपने ख़त में रेहाना लिखती है-

मेरी प्रिय मां,
आज मुझे पता चला कि मुझे किस्सास (ईरानी विधि व्यवस्था में प्रतिकार का क़ानून) का सामना करना पड़ेगा. मुझे यह जानकर बहुत बुरा लग रहा है कि आख़िर तुम क्यों नहीं अपने आपको यह समझा पा रही हो कि मैं अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी पन्ने तक पहुंच चुकी हूं. तुम जानती हो कि तुम्हारी उदासी मुझे कितना शर्मिंदा करती है. तुम क्यों नहीं मुझे तुम्हारे और अब्बा के हाथों को चूमने का एक मौक़ा देती हो?

मां, इस दुनिया ने मुझे 19 साल जीने का मौक़ा दिया. उस मनहूस रात को मेरा क़त्ल हो जाना चाहिए था. मेरी लाश शहर के किसी कोने में फेंक दी गई होती और फिर पुलिस तुम्हें मेरी लाश को पहचानने के लिए लाती और तुम्हें मालूम होता कि क़त्ल से पहले मेरा रेप भी हुआ था. मेरा क़ातिल कभी भी पकड़ में नहीं आता, क्योंकि हमारे पास उसके जैसी ना ही दौलत है, और ना ही ताक़त. उसके बाद तुम कुछ साल इसी तकलीफ़ और शर्मिंदगी में गुज़ार लेतीं और फिर इसी तकलीफ़ में तुम मर भी जातीं, लेकिन किसी अज़ाब की वजह से ऐसा नहीं हुआ. मेरी लाश तब फेंकी नहीं गई, लेकिन इविन जेल के सिंगल वॉर्ड स्थित क़ब्र और अब क़ब्रनुमा शहरे-जेल में यही हो रहा है. इसे ही मेरी क़िस्मत समझो और इसका इल्ज़ाम किसी पर मत मढ़ो. तुम बहुत अच्छी तरह जानती हो कि मौत ज़िन्दगी का अंत नहीं होती.

तुमने ही कहा था कि आदमी को मरते दम तक अपने मूल्यों की रक्षा करनी चाहिए. मां, जब मुझे एक क़ातिल के तौर पर अदालत में पेश किया गया, तब भी मैंने एक आंसू नहीं बहाया. मैंने अपनी ज़िन्दगी की भीख नहीं मांगी. मैं चिल्लाना चाहती थी, लेकिन ऐसा नहीं किया, क्योंकि मुझे क़ानून पर पूरा भरोसा था.

मां, तुम जानती हो कि मैंने कभी एक मच्छर भी नहीं मारा. मैं कॉकरोच को मारने की जगह उसकी मूंछ पकड़कर उसे बाहर फेंक आया करती थी. लेकिन अब मुझे सोच-समझकर क़त्ल किए जाने का मुजरिम बताया जा रहा है. वे लोग कितने पुरउम्मीद हैं, जिन्होंने जजों से इंसाफ़ की उम्मीद की थी. तुम जो सुन रही हो कृपया उसके लिए मत रोओ. पहले ही दिन से मुझे पुलिस ऑफ़िस में एक बुज़ुर्ग अविवाहित एजेंट मेरे स्टाइलिश नाख़ून के लिए मारते-पीटते हैं. मुझे पता है कि अभी ख़ूबसूरती की कद्र नहीं है. चेहरे की ख़ूबसूरती, विचारों और आरज़ुओं की ख़ूबसूरती, ख़ूबसूरत लिखावट, आंखों और नज़रिये की ख़ूबसूरती और यहां तक कि मीठी आवाज़ की ख़ूबसूरती.

मेरी प्रिय मां, मेरी विचारधारा बदल गई है, लेकिन तुम इसकी ज़िम्मेदार नहीं हो. मेरे अल्फ़ाज़ का अंत नहीं और मैंने किसी को सबकुछ लिखकर दे दिया है, ताकि अगर तुम्हारी जानकारी के बिना और तुम्हारी ग़ैर-मौजूदगी में मुझे फांसी दे दी जाए, तो यह तुम्हें दे दिया जाए. मैंने अपनी विरासत के तौर पर तुम्हारे लिए कई हस्तलिखित दस्तावेज़ छोड़ रखे हैं.

मैं अपनी मौत से पहले तुमसे कुछ कहना चाहती हूं. मां, मैं मिट्टी के अंदर सड़ना नहीं चाहती. मैं अपनी आंखों और जवान दिल को मिट्टी बनने देना नहीं चाहती, इसलिए प्रार्थना करती हूं कि फांसी के बाद जल्द से जल्द मेरा दिल, मेरी किडनी, मेरी आंखें, हड्डियां और वह सबकुछ जिसका ट्रांसप्लांट हो सकता है, उसे मेरे जिस्म से निकाल लिया जाए और इन्हें ज़रूरतमंद व्यक्ति को तोहफ़े के तौर पर दे दिया जाए. मैं नहीं चाहती कि जिसे मेरे अंग दिए जाएं, उसे मेरा नाम बताया जाए और वह मेरे लिए प्रार्थना करे.

Thursday, September 4, 2014

किताबें...



हमें बचपन से ही किताबें बहुत भाती हैं. अपने दोस्तों को भी उनकी सालगिरह पर किताबें ही देतेहैं, लेकिन जिनका किताबों से कोई सरोकार नहीं यानी उन्हें किताबें पसंद नहीं, तो उनके लिए कोई दूसरा तोहफ़ा ख़रीदने में हमें काफ़ी सोचना पड़ता है... ख़ैर पसंद अपनी-अपनी.

दूरदर्शन में हमारे साथ एक बंगाली प्रोड्यूसर भी थे. उनसे बंगाली तहज़ीब को क़रीब से जानने का मौक़ा मिला. वैसे भी हम बांग्ला साहित्य पढ़ते रहे हैं. वहां के लोगों की एक बात हमें बेहद पसंद है और उनके इस जज़्बे की हम दिल से क़द्र करते हैं. बंगाल में लोग शादी-ब्याह में भी तोहफ़े के तौर पर किताबें भी देते हैं.

गुज़श्ता दो साल पहले प्रगति मैदान में लगे मेले में जाने का मौक़ा मिला, तो हमने उर्दू, अरबी, पंजाबी और हिन्दी की बहुत-सी किताबें ख़रीदीं. पाकिस्तान और ईरान के स्टॉल पर बहुत भीड़ थी. यह देखकर अच्छा लगा कि किताबों के क़द्रदानों की आज भी कोई कमी नहीं है. जब भी घर जाना होता है, तो हमारी यही कोशिश रहती है कि अम्मी और बहन-भाइयों के लिए उनकी पसंद की कोई न कोई किताब लेकर जाएं. अम्मी को उर्दू और अरबी की किताबें पसंद हैं. भाई को पत्रकारिता, पशु-पक्षियों और बाग़वानी की. हमारे घर पर एक अच्छी-ख़ासी लाइब्रेरी है. यहां भी हमारे पास किताबों का एक ज़ख़ीरा है.

किताबों की अपनी ही एक दुनिया है. कहते हैं किताबों से अच्छा कोई दोस्त नहीं होता. कॉलेज के वक़्त हर महीने आठ से दस किताबें पढ़ लेते थे. लाइब्रेरी में उर्दू और पंजाबी की किताबें पढ़ने वाले हम अकेले थे. उर्दू या पंजाबी का कोई बुज़ुर्ग पाठक कभी साल-दो-साल में ही वहां आता था. कई बार लाइब्रेरी के लोग किताबों को तरतीब से लगाने के लिए हमारी मदद लेते थे, तो कभी फटी-पुरानी या कभी-कभी नई किताबों के नाम, लेखक और प्रकाशक के नाम हिन्दी में लिखने में. हमें यह सब काम करना बहुत अच्छा लगता था.

किताबों से मुताल्लिक़ एक ख़ास बात. कुछ लोगों की आदत में शुमार होता है कि वो अच्छी किताब देखते ही आपसे मांग लेंगे. आपने एक बार किताब दे दी तो फिर मजाल है कि वो आपको वापस मिल जाए. किताबों के पन्ने मोड़ने, पैन से लाइनें खींचकर किताबों की अच्छी सूरत को बिगाड़ने में भी लोगों को बहुत मज़ा आता है. हमारे पास नामी कहानीकारों की कहानियों का एक संग्रह था. एक रोज़ हम उसे अपने साथ दफ़्तर ले गए. एक लड़की ने हमसे मांग लिया. कई महीने गुज़र गए, लेकिन उसने वापस नहीं किया. हमने पूछा तो कहने लगी-वक़्त ही नहीं मिला. ख़ैर क़रीब दो साल बाद हमारा उसके घर जाना हुआ, तो उसने उसे लौटा दिया. लेकिन उसे वापस पाकर हमें बेहद दुख हुआ. तक़रीबन हर सफ़े पर पैन से लाइनें खींची हुईं थीं. कवर पेज भी बेहद अजनबी लगा. जब भी उस किताब को देखते, तो बुरा लगता. छोटे भाई ने हमारी सालगिरह पर नई किताब लाकर दी और उस किताब को अलमारी से हटा दिया. ऐसे कितने ही क़िस्से हैं अपनी प्यारी किताबों से जुदा होने के...

रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की जद्दो-जहद में लोग किताबें पढ़ने के शौक़ को क़ायम नहीं रख पाते. जो लोग किताबें पढ़ने के शौक़ीन हैं, उनसे यही गुज़ारिश है कि वो इसे पूरा ज़रूर करें. ख़ैर, हमारा काम तो किताबों से ही जुड़ा है. किताबों की समीक्षा लिखते हैं, इस वजह से भी आए दिन कोई न कोई किताब मिलती ही रहती है और वक़्त निकालकर उसे पढ़ना भी होता है...

अलबत्ता, जांनिसार अख़्तर साहब का एक शेअर याद आता है-
ये इल्म का सौदा, ये रिसालें, ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं...

ज़िन्दगी रही तो फिर इसी ब्लॉग पर मुलाक़ात होगी...
तब तक के लिए अल्लाह हाफिज़

Wednesday, July 2, 2014

राइट टू रिकॉल


देश में 'राइट टू रिकॉल' की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि अवाम को अपनी ग़लती के लिए पांच साल पछताना न पड़े. 'राइट टू रिकॉल' यानी जनप्रतिनिधियों को कार्यकाल के बीच में ही वापस बुलाने का अधिकार. यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें आम आदमी को नियत प्रक्रिया के तहत अपने ऐसे प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार है, जिनके काम से वह संतुष्ट नहीं है. अमेरिका, स्विटज़रलैंड, वेनेज़ुएला और कनाडा आदि देशों में 'राइट टू रिकॉल' क़ानून लागू है. महंगाई की मार से त्रस्त देश की जनता को शिद्दत से इसकी ज़रूरत महसूस हो रही है, ताकि अपनी ग़लती का ख़ामियाज़ा उसे पांच साल न भुगतना पड़े...
-फ़िरदौस ख़ान

Monday, May 19, 2014

ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल



क्या आपका वोट उसी उम्मीदवार के खाते में गया है, जिसे आपने वोट डाला था...?
इलेक्ट्रॊनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं. सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी के मुताबिक़ ख़ुद चुनाव आयोग ने ईवीएम हैकिंग को पकड़ा है, जहां किसी भी बटन को दबाने पर वोट भाजपा के खाते में ही गया था, लेकिन इसके बावजूद कोई कार्रवाई नहीं गई. उन्होंने एक फ़िल्म के ज़रिये समझाया था कि कैसे ईवीएम की मॉस हैकिंग की जा सकती है, मतलब एक साथ हज़ारों मशीनों से मनपसंद वोट डलवाए जा सकते हैं. उन्होंने बैलेट पेपर्स से चुनाव कराए जाने की मांग की थी, जिससे वोट करने वाले को पता रहे कि उसका वोट किस उम्मीदवार को पड़ा है.
ईवीएम में धांधली की कई ख़बरें सामने आ रही हैं. इसकी निष्पक्ष जांच होनी ही चाहिए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके...



Indian voting machines Hacked

Sunday, May 11, 2014

ज़मीं पर ईश्वर का प्रतिरूप है मां...

फ़िरदौस ख़ान
क़दमों को मां के इश्क़ ने सर पे उठा लिया
साअत सईद दोश पे फ़िरदौस आ गई...
ईश्वर ने जब कायनात की तामीर कर इंसान को ज़मीं पर बसाने का तसव्वुर किया होगा...यक़ीनन उस वक़्त मां का अक्स भी उसके ज़हन में उभर आया होगा... जिस तरह सूरज से यह कायनात रौशन है...ठीक उसी तरह मां से इंसान की ज़िन्दगी में उजाला बिखरा है...तपती-झुलसा देने वाली गर्मी में दरख़्त की शीतल छांव है मां...तो बर्फ़ीली सर्दियों में गुनगुनी धूप का अहसास है मां...एक ऐसी दुआ है मां, जो अपने बच्चों को हर मुसीबत से बचाती है... मां, जिसकी कोख से इंसानियत जनमी...जिसके आंचल में कायनात समा जाए...जिसकी छुअन से दुख-दर्द दूर हो जाएं...जिसके होठों पर दुआएं हों... जिसके दिल में ममता हो और आंखों में औलाद के लिए इंद्रधनुषी सपने सजे हों...ऐसी ही होती है मां...बिल्कुल ईश्वर के प्रतिरूप जैसी...ईष्वर के बाद मां ही इंसान के सबसे क़रीब होती है...

सभी नस्लों में मां को बहुत अहमियत दी गई है. इस्लाम में मां का बहुत ऊंचा दर्जा है. क़ुरआन की सूरह अल अहक़ाफ़ में अल्लाह फ़रमाता है-"हमने मनुश्य को अपने मां-बाप के साथ अच्छा बर्ताव करने की ताक़ीद की. उसकी मां ने उसे (पेट में) तकलीफ़ के साथ उठाए रखा और उसे तकलीफ़ के साथ जन्म भी दिया। उसके गर्भ में पलने और दूध छुड़ाने में तीस माह लग गए." हज़रत मुहम्मद सलल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि "‘मां के क़दमों के नीचे जन्नत है." आपने एक हदीस में फ़रमाया है-"‘मैं वसीयत करता हूं कि इंसान को मां के बारे में कि वह उसके साथ नेक बर्ताव करे." एक हदीस के मुताबिक़ एक व्यक्ति ने हज़रत मुहम्मद साहब से सवाल किया कि- इंसानों में सबसे ज़्यादा अच्छे बर्ताव का हक़दार कौन है? इस पर आपने जवाब दिया-तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने दोबारा वही सवाल किया. आपने फ़रमाया-तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने तीसरी बार फिर वही सवाल किया. इस बार भी आपने फ़रमाया कि तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने चौथी बार फिर भी यही सवाल किया. आपने कहा कि तुम्हारा पिता. यानी इस्लाम में मां को पिता से तीन गुना ज़्यादा अहमियत दी गई है. इस्लाम में जन्म देने वाली मां के साथ-साथ दूध पिलाने और परवरिश करने वाली मां को भी ऊंचा दर्जा दिया गया है. इस्लाम में इबादत के साथ ही अपनी मां के साथ नेक बर्ताव करने और उसकी ख़िदमत करने का भी हुक्म दिया गया है. कहा जाता है कि जब तक मां अपने बच्चों को दूध नहीं बख़्शती तब तक उनके गुनाह भी माफ़ नहीं होते.

भारत में मां को शक्ति का रूप माना गया है. हिन्दू धर्म में देवियों को मां कहकर पुकारा जाता है. धन की देवी लक्ष्मी, ज्ञान की देवी सरस्वती और शक्ति की देवी दुर्गा को माना जाता है. नवरात्रों में मां के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना का विधान है. वेदों में मां को पूजनीय कहा गया है. महर्षि मनु कहते हैं-दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्या होता है, सौ आचार्यों के बराबर एक पिता होता है और एक हज़ार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण मां होती है। तैतृयोपनिशद्‌ में कहा गया है-मातृ देवो भव:. इसी तरह जब यक्ष ने युधिष्ठर से सवाल किया कि भूमि से भारी कौन है तो उन्होंने जवाब दिया कि माता गुरुतरा भूमे: यानी मां इस भूमि से भी कहीं अधिक भारी होती है. रामायण में श्रीराम कहते हैं- जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी यानी जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. बौद्ध धर्म में महात्मा बुद्ध के स्त्री रूप में देवी तारा की महिमा का गुणगान किया जाता है.

यहूदियों में भी मां को सम्मान की दृश्टि से देखा जाता है. उनकी धार्मिक मान्यता के मुताबिक़ कुल 55 पैग़म्बर हुए हैं, जिनमें सात महिलाएं थीं. ईसाइयों में मां को उच्च स्थान हासिल है. इस मज़हब में यीशु की मां मदर मैरी को सर्वोपरि माना जाता है. गिरजाघरों में ईसा मसीह के अलावा मदर मैरी की प्रतिमाएं भी विराजमान रहती हैं. यूरोपीय देशों में मदरिंग संडे मनाया जाता है. दुनिया के अन्य देशों में भी मदर डे यानी मातृ दिवस मनाने की परंपरा है. भारत में मई के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाया जाता है. चीन में दार्शनिक मेंग जाई की मां के जन्मदिन को मातृ दिवस के तौर पर मनाया जाता है, तो इज़राईल में हेनेरिता जोल के जन्मदिवस को मातृ दिवस के रूप में मनाकर मां के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है. हेनेरिता ने जर्मन नाज़ियों से यहूदियों की रक्षा की थी. नेपाल में वैशाख के कृष्ण पक्ष में माता तीर्थ उत्सव मनाया जाता है. अमेरिका में मई के दूसरे रविवार को मदर डे मनाया जाता है. इस दिन मदर डे के लिए संघर्ष करने वाली अन्ना जार्विस को अपनी मुहिम में कामयाबी मिली थी. इंडोनेशिया में 22 दिसंबर को मातृ दिवस मनाया जाता है. भारत में भी मदर डे पर उत्साह देखा जाता है.

मां बच्चे को नौ माह अपनी कोख में रखती है. प्रसव पीड़ा सहकर उसे इस संसार में लाती है. सारी-सारी रात जागकर उसे सुख की नींद सुलाती है. हम अनेक जनम लेकर भी मां की कृतज्ञता प्रकट नहीं कर सकते. मां की ममता असीम है, अनंत है और अपरंपार है. मां और उसके बच्चों का रिश्ता अटूट है. मां बच्चे की पहली गुरु होती है. उसकी छांव तले पलकर ही बच्चा एक ताक़तवर इंसान बनता है. हर व्यक्ति अपनी मां से भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है. वो कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए, लेकिन अपनी मां के लिए वो हमेशा उसका छोटा-सा बच्चा ही रहता है. मां अपना सर्वस्व अपने बच्चों पर न्यौछावर करने के लिए हमेशा तत्पर रहती है. मां बनकर ही हर महिला ख़ुद को पूर्ण मानती है.

कहते हैं कि एक व्यक्ति बहुत तेज़ घुड़सवारी करता था. एक दिन ईश्वर ने उस व्यक्ति से कहा कि अब ध्यान से घुड़सवारी किया करो. जब उस व्यक्ति ने इसकी वजह पूछी तो ईश्वर ने कहा कि अब तुम्हारे लिए दुआ मांगने वाली तुम्हारी ज़िन्दा नहीं है. जब तक वो ज़िन्दा रही उसकी दुआएं तुम्हें बचाती रहीं, मगर उन दुआओं का साया तुम्हारे सर से उठ चुका है. सच, मां इस दुनिया में बच्चों के लिए ईश्वर का ही प्रतिरूप है, जिसकी दुआएं उसे हर बला से महफ़ूज़ रखती हैं. मातृ शक्ति को शत-शत नमन...

Friday, April 25, 2014

मीडिया...


फ़िलहाल हिन्दुस्तानी मीडिया ख़ासकर इलेक्ट्रॊनिक मीडिया का जो चेहरा सामने आया है, उसे देखते हुए यह कहना ग़लत न होगा कि अगर आतंकवादी संगठन भी हिन्दुस्तान में दस करोड़ रुपये ख़र्च कर दें, तो ये देश में उनकी भी लहर बनवा देंगे... हिन्दुस्तानी मीडिया आज देश-दुनिया को यही संदेश दे रहा है...
वाक़ई देश के लिए यह बहुत शर्म की बात है...
  • इस चुनाव के नतीजे जो भी रहें, लेकिन हिन्दुस्तानी मीडिया ख़ासकर इलेक्ट्रॊनिक मीडिया की साख ज़रूर गिर गई है... पहले लोग आंख मूंद कर मीडिया पर भरोसा करते थे, लेकिन अब वह भरोसा ख़त्म हो गया है... 

Thursday, April 24, 2014

अपनी पृथ्वी को बचाएं...


पृथ्वी हमारे जीवन का मूल आधार है... जल, जंगल और ज़मीन के बिना जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती... पृथ्वी है, तो हम हैं... इसलिए अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए हमें अपनी पृथ्वी को बचाना ही होगा... पृथ्वी को बचाने के लिए हमें जल, जंगल और ज़मीन को बचाना होगा... और यह तभी मुमकिन है, जब बढ़ती आबादी पर रोक लगाई जाए... क्योंकि यह लगातार बढ़ती आबादी ही है, जो जल, जंगल और ज़मीन को निग़लती जा रही है...

आओ !
अपनी पृथ्वी को बचाएं...
कुछ पेड़ लगाएं...
थोड़ा पानी बचाएं...
बढ़ती आबादी प रोक लगाएं
अपनी पृथ्वी को बचाएं...

Monday, March 3, 2014

हमारे लेख फिर चोरी हुए...


एक महान (?) व्यक्ति है. उसका एक ब्लॊग Behind The Curtains - Bollywood है, जो उसने अपने माता-पिता को समर्पित किया है... ख़ास बात यह है कि उसने अपने ब्लॊग में चोरी के लेख पोस्ट किए हैं... अपने दो लेखों (मीना कुमारी और प्रिया राजवंश पर लिखे) पर अभी हमारी नज़र पड़ी...
इस व्यक्ति ने हमारे लेख अपने ब्लॊग पर पोस्ट करने से पहले इजाज़त लेनी लेना तो दूर, हमारे लेखों
चांद तन्हा, आसमां तन्हा और प्रिया राजवंश : परी कथा सी ज़िंदगी )
से हमारा नाम तक ग़ायब कर दिया... साथ ही लेख के शीर्षक भी बदल दिए, शायद इस व्यक्ति ने सोचा होगा कि लेखों के शीर्षक बदलने से वे पकड़ में नहीं आएंगे...

पता नहीं इस महान (?) व्यक्ति ने कितने लोगों के लेख चोरी करके अपने माता-पिता को समर्पित किए होंगे...?
उसके माता-पिता को अगर यह बात पता चले, तो उन्हें कैसा लगेगा...?

हम इस चोरी के ख़िलाफ़ अपना ऐतराज़ दर्ज करते हैं...

तस्वीर : गूगल से साभार

Tuesday, January 7, 2014

छवि...


सियासी दल चुनाव के क़रीब आते ही अपने नेताओं की छवि सुधारने के लिए विदेशी कंपनियों को अरबों रुपये देते हैं... ज़ाहिर है, जो पार्टियां ऐसा करती हैं, जनता के बीच उनके नेताओं की छवि अच्छी नहीं होती... अब जनता जागरूक हो चुकी है, वह किसी विदेशी कंपनी के झांसे में आने वाली नहीं है...
कितना अच्छा होता, अगर इन सियासी दलों के नेता विदेशी कंपनियों पर अरबों रुपये लुटाने की बजाय ये पैसा अपने ही देश की ग़रीब जनता की भलाई के लिए ख़र्च कर देते...
फिर उन्हें अपनी छवि (फ़र्ज़ी) बनाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती... काश! इस मुल्क के नेताओं में इतनी समझ आ जाती... 

Friday, January 3, 2014

सबक़


कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सियासत में आम आदमी के दख़ल की बात कही... वे जनता के बीच भी गए... अपने स्तर पर वे जो कर सकते थे, कुछ हद तक उन्होंने किया... लेकिन उनके साथी कांग्रेसियों ने इसे संजीदगी से नहीं लिया... वे हमेशा चमचमाते कपड़ों, महंगी गाड़ियों और एसी कमरों तक ही सीमित रहे...  नतीजतन, केजरीवाल ने आम आदमी की बात करके दिल्ली की सत्ता हासिल कर ली... विधानसभा चुनाव के नतीजों से कांग्रेस नेताओं ने अब भी सबक़ नहीं लिया, तो आने वाला वक़्त उनके और उनकी पार्टी के लिए और भी बुरा हो सकता है...
फ़िरदौस ख़ान