Friday, June 3, 2016

अपनी दुर्दशा के लिए कांग्रेस ख़ुद ज़िम्मेदार है


-फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस जन-जन की पार्टी है. कांग्रेस का एक गौरवशाली इतिहास रहा है. कांग्रेस नेताओं की क़ुर्बानियों को यह देश कभी भुला नहीं पाएगा. कांग्रेस नेताओं ने अपने ख़ून से इस धरा को सींचा है. महात्मा गांधी को भला कौन नहीं जानता. देश को आज़ाद कराने के लिए उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी क़ुर्बान कर दी. पंडित जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने इस देश को संवारा है. कांग्रेस इस देश की माटी में रची-बसी है. जनमानस में कांग्रेस की पैठ है. पीढ़ी-दर-पीढ़ी कांग्रेस की कट्टर समर्थक रही है. इसके बावजूद कांग्रेस ने केंद्र और कई राज्यों की सत्ता गंवाई है. आख़िर क्या वजह है कि कांग्रेस पर मर मिटने वाले लाखों-करोड़ों समर्थकों के बावजूद कांग्रेस सत्ता में वापस नहीं लौट पा रही है?

हालांकि पिछले लोकसभा चुनाव के मुक़ाबले हाल में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का जनाधार बढ़ा है. बाक़ी राज्यों में कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया. आसाम में पिछ्ले लोकसभा चुनाव 29.6 फ़ीसद के मुक़ाबले कांग्रेस को 31.1 फ़ीसद मत मिले. इसी तरह तमिलनाडु में 4.3 के मुक़ाबले 6.6 फ़ीसद, पश्चिम बंगाल में 9.6 के मुक़ाबले 12.1 फ़ीसद और पुडुचेरी में 24.6 फ़ीसद के मुक़ाबले 30.6 फ़ीसद वोट मिले. भारतीय जनता पार्टी की बात करें, तो पिछले लोकसभा चुनाव के मुक़ाबले उसका जनाधार घटा है. हालांकि इसके बावजूद भाजपा आसाम में सरकार बनाने में कामयाब रही है.

भारतीय जनता पार्टी जिसका अपना कोई इतिहास नहीं है, सिवाय इसके कि उसके मातृ संगठन यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कथित कार्यकर्ता ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या की थी. इसके बावजूद भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई. आख़िर ऐसी कौन-सी बात है जो लोकप्रिय पार्टी कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया. इसे समझना बहुत आसान है. जो जनता किसी पार्टी को हुकूमत सौंपती है, वही जनता उससे हुकूमत छीन भी सकती है. कांग्रेस नेताओं को यह बात समझनी होगी.

देश की आज़ादी के बाद कांग्रेस सत्ता में आई और कुछ साल पहले तक कांग्रेस की ही हुकूमत रही है. हालांकि आपातकाल और ऒप्रेशन ब्लू स्टार और की वजह से कांग्रेस को नुक़सान भी हुआ. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसके लिए सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगी और अवाम ने उन्हें माफ़ करके सत्ता सौंप दी. कांग्रेस ने फिर से लगातार दस साल तक हुकूमत की. इस दौरान कांग्रेस ने कुछ ऐसे काम किए, जिनसे विरोधियों को उसके ख़िलाफ़ दुष्प्रचार का मौक़ा मिल गया. मसलन इलेक्ट्रोनिक मीटर, जो तेज़ चलते हैं और बिल ज़्यादा आता है. रसोई गैस के सिलेंडरों की संख्या सीमित कर देना. भाजपा ने इसका जमकर फ़ायदा उठाया. कांग्रेस नेता मामले को संभाल नहीं पाए. हालांकि कांग्रेस ने मनरेगा, आर्टीआई और खाद्य सुरक्षा जैसी अनेक ऐसी कल्याणकारी योजनाएं दीं, जिसका सीधा फ़ायदा आम जनता को हुआ. मगर कांग्रेस नेता चुनाव में इनका कोई फ़ायदा नहीं ले पाए. यह कांग्रेस की बहुत बड़ी कमी रही, जबकि भाजपा जनता से कभी पूरे न होने वाले लुभावने वादे करके सत्ता तक पहुंच गई.

क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि सत्ता के मद में चूर कांग्रेस नेता पार्टी कार्यकर्ताओं और जनता से दूर होते चले गए. कांग्रेस की अंदरूनी कलह,  आपसी खींचतान, कार्यकर्ताओं की बात को तरजीह न देना उसके लिए नुक़सानदेह साबित हुआ. हालत यह थी कि अगर कोई कार्यकर्ता पार्टी नेता से मिलना चाहे, तो उसे वक़्त नहीं दिया जाता था. कांग्रेस में सदस्यता अभियान के नाम पर भी सिर्फ़ ख़ानापूर्ति ही की गई. इसके दूसरी तरफ़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भाजपा को सत्ता में लाने के लिए दिन-रात मेहनत की. मुसलमानों और दलितों के प्रति संघ का नज़रिया चाहे, जो हो, लेकिन उसने भाजपा का जनाधार बढ़ाने पर ख़ासा ज़ोर दिया. संघ और भाजपा ने ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को पार्टी से जोड़ा. अगर कोई सड़क चलता व्यक्ति भी भाजपा कार्यालय चला जाए, तो उससे इस तरह बात की जाती है कि वह ख़ुद को भाजपा का अंग समझने लगता है.

पिछले दिनों उत्तराखंड में ख़ूब तमाशा हुआ. हालत यह हो गई कि अब पश्चिम बंगाल के कांग्रेस विधायकों को अपनी वफ़ादारी का हल्फ़नामा देना पड़ रहा है. पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के विधायको ने 100 रुपये के स्टाम्प पेपर पर लिखकर दस्तख़त किए हैं कि वे कांग्रेस पार्टी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के प्रति निष्ठा रखेंगे और पार्टी के ख़िलाफ़ की जाने वाली किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे. हल्फ़नामे में यह भी कहा गया है कि वे पार्टी के ख़िलाफ़ कोई नकारात्मक बात नहीं कहेंगे. ऐसे किसी काम को करने की ज़रूरत लगने पर वे पहले ही अपने पद से इस्तीफ़ा दे देंगे. इसमें यह भी लिखा है कि वे पार्टी के दिशा-निर्देशों से बंधे हुए हैं. बताया जा रहा है कि विधायकों से दस्तख़त कराने का फ़ैसला चुनाव के बाद हुई एक बैठक में लिया गया था. बैठक में कांग्रेस की राज्य इकाई के अध्यक्ष अधीर चौधरी, निर्वाचित विधायकों और जिलाध्यक्षों ने भाग लिया था. इस बारे में चौधरी का कहना है कि यह कोई बॉंड नहीं है. हमने किसी पर कोई दबाव नहीं डाला है कि अगर वे शर्तों को नहीं मानेंगे, तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी.  सभी ने पार्टी के प्रति वफ़ादारी दिखाने के लिए मर्ज़ी से दस्तख़त किए हैं. बहरहाल, कांग्रेस का यह क़दम उसके लिए फ़ायदेमंद साबित होगा, इसमें शक है.

वफ़ादारी काग़ज़ के टुकड़ों पर तय नहीं होती. यह तो दिल की बात है. कांग्रेस को अपने नेताओं, अपने सांसदों, अपने विधायकों, अपने कार्यकर्ताओं और अपने समर्थकों से ऐसा रिश्ता बनाना चाहिए, जिसे बड़े से बड़ा लालच तोड़ न पाए. इसके लिए कांग्रेस के नेताओं को ज़मीन पर उतरना पड़ेगा. सिर्फ़ सोनिया गांधी, राहुल गांधी या प्रियंका गांधी के कुछ लोगों के बीच चले जाने से कुछ नहीं होने वाला. कांग्रेस के सभी नेताओं को ह्क़ीक़त का सामना करना चाहिए. उन्हें चाहिए कि वे कार्यकर्ताओं की बात सुनें, जो लोग पार्टी के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं, जब तक उनकी बात नहीं सुनी जाएगी, उन्हें तरजीह नहीं दी जाएगी, तब तक कांग्रेस अपना खोया मुक़ाम नहीं पा सकती.

Wednesday, May 11, 2016

उत्तराखंड में लोकतंत्र की जीत

फ़िरदौस ख़ान
उत्तराखंड में सिर्फ़ कांग्रेस की ही जीत नहीं हुई है, बल्कि यहां लोकतंत्र की जीत हुई है, जनता की भावनाओं की जीत हुई है. देवभूमि की जनता ने लोकतांत्रिक तरीक़े से कांग्रेस को चुना था, उसे सत्ता सौंपी थी. लेकिन विपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी ने साज़िश करके राज्य में राष्ट्रपति शासन लगवा दिया. कांग्रेस ने हार नहीं मानी और अपना संघर्ष जारी रखा. आख़िरकार जीत सच की ही हुई. राज्य में कांग्रेस फिर से सत्ता में आ गई है. इससे जहां कांग्रेस ख़ेमे में जश्न का माहौल है, वहीं भारतीय जनता पार्टी को बड़ा झटका लगा है और पार्टी की ख़ासी किरकिरी भी हुई है.

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर कल राज्य विधानसभा में शक्ति परीक्षण कराया गया था, जिससे कांग्रेस सरकार की बहाली तय मानी जा रही थी, सिर्फ़ औपचारिक ऐलान बाक़ी था. सर्वोच्च न्यायालय ने आज शक्ति परीक्षण के नतीजे का ऐलान कर दिया. अदालत ने बताया है कि हरीश रावत के पक्ष में 33 विधायकों ने मतदान किया, जबकि भाजपा के पक्ष में 28 विधायकों ने अपना मत दिया. क़ाबिले-ग़ौर है कि शक्ति परीक्षण के दौरान अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल को छोड़कर सभी 61 विधायकों ने हाथ उठाकर अपने वोट दर्ज कराए. हालांकि मतदान के बाद बाहर आकर कांग्रेस और भाजपा विधायकों ने साफ़ इशारा कर दिया था कि कांग्रेस के पक्ष में 33 और भाजपा के पक्ष में 28 मत पड़े हैं. कांग्रेस और भाजपा दोनों के विधायकों ने कहा कि दोनों दलों के एक-एक विधायक ने क्रॊस मतदान किया. घनसाली से भाजपा विधायक भीम लाल आर्य ने रावत के समर्थन में मतदान किया, जबकि सोमेश्वर से कांग्रेस विधायक ने विश्वास मत के विरोध में अपना वोट दिया था.

अदालत में केंद्र सरकार ने यू टर्न लेते हुए कहा कि राज्य से राष्ट्रपति शासन हटाया जाएगा. इसी के साथ मामले ख़त्म हो गया है, लेकिन अदालत ने कहा है कि मामले की सुनवाई आगे भी जारी रहेगी. अदालत ने केंद्र सरकार को राष्ट्रपति शासन हटाने की मंज़ूरी दे दी है. अदालत ने कहा कि राष्ट्रपति शासन हटने के बाद हरीश रावत बतौर मुख्यमंत्री अपना दायित्व संभाल सकते हैं. साथ ही राष्ट्रपति शासन हटाने के आदेश की प्रति अदालत में रखने का निर्देश दिया. इसके फ़ौरन बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक हुई, जिसमें उत्तराखंड से राष्ट्रपति शासन हटाने की सिफ़ारिश करने का फ़ैसला लिया गया.
 ग़ौरतलब है कि राज्य में 27 मार्च को राष्ट्रपति शासन लगाया गया था, जिसे पहले नैनीताल उच्च न्यायालय की एकल पीठ और फिर दो न्यायाधीशों की पीठ ने हटाने और हरीश रावत को बहुमत साबित करने का निर्देश दिया था. इसे केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी. सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले का हल निकालने के लिए विधानसभा में शक्ति परीक्षण कराने का निर्देश दिया था. इस शक्ति परीक्षण में बहुजन समाज पार्टी और पीडीएफ़ ने हरीश रावत का साथ दिया.
हरीश रावत का कहना है कि वह सारी बातें भूलकर नई शुरुआत करेंगे. उन्होंने शक्ति परीक्षण में साथ देने के लिए बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मुख्यमंत्री का भी आभार जताया है. परी

राज्य में कांग्रेस की जीत पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए इसे लोकतंत्र की बताया है. कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि भारतीय जनता पार्टी द्वारा राज्य की निर्वाचित सरकार को गिराने की हर मुमकिन कोशिश के बाद उत्तराखंड में लोकतंत्र की जीत हुई है. उम्मीद है कि इस नतीजे से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पार्ती की हार से सबक़ मिल गया लेंगे. उन्होंने कहा कि देश की जनता हमारे पुरोधाओं द्वारा निर्मित लोकतंत्र नामक संस्था का क़त्ल बर्दाश्‍त नहीं करेगी. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी इसे उत्तराखंड में लोकतंत्र की जीत क़रार दिया है. 

Sunday, May 8, 2016

मदर्स डे


आज मदर्स डे है... दुनिया के उन तमाम मर्दों को हमारा सलाम, जो औरत को इंसान मानते हैं... उनके हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं... ऐसे बेटों पर किस मां को नाज़ न होगा... ऐसे भाइयों पर किस बहन को नाज़ न होगा... ऐसे वालिद पर किस बेटी को नाज़ न होगा...
A real man respects a woman
A real man never hurts a woman

Saturday, May 7, 2016

सभ्य समाज


क्या कभी समाज इतना सभ्य हो पाएगा कि उस समाज के पुरुषों की बुरी नज़र कभी किसी महिला पर न पड़े...?
जो समाज जितना ज़्यादा असभ्य होगा, उसे महिलाओं पर उतनी ही ज़्यादा पाबंदियां लगानी पड़ेंगी... क्योंकि जिस सभ्य समाज में सभ्य पुरुष रहते हों, उस समाज की महिलाओं को किसी अनहोनी का ख़ौफ़ नहीं होता...

Friday, May 6, 2016

औरत की इज़्ज़त


फ़िरदौस ख़ान
एक औरत को किसी भी मर्द की सबसे अच्छी बात कौन-सी लगती है... ज़ाहिर है, मर्द का औरत की इज़्ज़त करना, उसे सबसे ज़्यादा अच्छा लगता है... बाक़ी बातें बाद की हैं... हमने देखा है, जो मर्द औरतों की इज़्ज़त करते हैं, उनके घर की औरतों की ज़िन्दगी ख़ुशहाल होती है...
उनकी ये बात हमें बहुत पसंद है... वो अपनी मां की बहुत इज़्ज़त करते हैं... अपनी बहन के साथ उनका बर्ताव दोस्ताना है... ऐसा नहीं है कि वो सिर्फ़ अपनी मां और बहन की इज़्ज़त करते हैं... वो दुनिया की तमाम औरतों की इज़्ज़त करते हैं, औरतज़ात की इज़्ज़त करते हैं... वो कहते हैं- औरत का दर्जा बुलंद है... दुनिया का कोई भी मर्द ऐसा नहीं है, जिसकी मां न हो... एक मां अपने ख़ून से बच्चे को सींचती है, फिर उसी बच्चे को अपना दूध पिलाकर बड़ा करती है... लेकिन जब यही बच्चा बड़ा होकर मर्द बनता है, तो वो उस औरतज़ात पर ज़ुल्म ढहाने लगता है... उसे ग़ुलाम बनाकर रखना चाहता है... कितने शर्म की बात है...
वो कहते हैं- जो शख़्स औरतज़ात को कमतर समझता है, वो दुनिया की किसी भी औरत से मुहब्बत कर ही नहीं सकता, क्योंकि महबूब का दर्जा हमेशा बुलंद होता है... औरत से मुहब्बत करने वाले मर्द तो तख़्तो-ताज तक ठुकरा देते हैं... जो अपनी अना के ग़ुलाम हैं और मानते हैं कि औरत का दर्जा मर्द से कमतर है, वे भला किसी औरत से क्या ख़ाक मुहब्बत करेंगे...

Monday, May 2, 2016

कांग्रेस को उम्मीद


उत्तर प्रदेश हमेशा से ही कांग्रेस की ज़मीन रही है... पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी यहीं से चुनाव लड़ते रहे हैं... अब फिर से उत्तर प्रदेश से ही कांग्रेस को उम्मीद है... समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के कारनामों की वजह से यहां की अवाम कांग्रेस को ही देश की सच्ची सेवक पार्टी मानती है... अवाम धर्म और जातिवाद और बेमानी मुद्दों से ऊब चुकी है... उसे तो लोकतंत्र में यक़ीन है... इस बार उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे चौंकाने वाले होंगे...

Monday, April 25, 2016

स्वरोज़गार


कहते हैं- दूसरे के सिंहासन से अपनी चटाई अच्छी... क्योंकि किसी की जी हुज़ूरी तो नहीं करनी पड़ती...
आज के युवा अपने स्वरोज़गार को तरजीह दे रहे हैं... वाक़ई यह अच्छी बात है... अपना ख़ुद का काम ही ज़्यादा अच्छा होता है, भले ही परचून की दुकान क्यों न हो...  नौकरी में लगी बंधी तनख़्वाह तो होती है, लेकिन इसकी अपनी परेशानियां हैं... नौकरी प्राइवेट हो, तो और भी मुसीबत... हमेशा एक ही बात याद रखनी होती है- बॊस इस ऒलवेज़ राइट... न जॊब की गारंटी होती है, न काम का वाजिब मेहनताना, न पर्याप्त छुट्टियां...

अपने काम में जो मज़ा है, वो किसी की नौकरी में कहां... स्वरोज़गार अपनाओ और ख़ुश रहो ... :)

हम राहुल के साथ हैं...


एक बार कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने कहा था-जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं...मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है...मेरे लिए उसकी यही पहचान है...अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है...

मज़हब


सबसे अच्छा मज़हब वही है, जो अपने अनुयायियों को ये सिखाए कि उनकी वजह से किसी का दिल न दुखे, किसी को तकलीफ़ न पहुंचे...और सबसे अच्छी क़ौम वही है, जिसके मानने वाले किसी का दिल न दुखाएं, किसी को तकलीफ़ न पहुंचाएं...
  • दुनिया को इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आपका मज़हब क्या है... दुनिया को इस बात से बहुत फ़र्क़ पड़ता है कि आप कैसे इंसान हैं...


Sunday, April 24, 2016

पाणिग्रहण संस्कार पर मुग्ध हुए विदेशी


फ़िरदौस ख़ान
भारत विभिन्न संस्कृतियों का देश है. हर संस्कृति की अपनी-अपनी परंपराएं और अपने रीति-रिवाज हैं. यहां अमूमन सभी त्योहारों और मांगलिक कार्यों में पूरी आस्था के साथ परंपराओं और रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है. यहां जन्म से लेकर मृत्यु तक अनेक संस्कार होते हैं. इन्हीं में से एक संस्कार है पाणिग्रहण. हिंदू धर्म में इसे सोलह संस्कारों में से एक संस्कार माना जाता है. पाणिग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से हिंदू विवाह के नाम से जाना जाता है. हिंदू विवाह पति और पत्नी के बीच सात जन्मों का रिश्ता माना जाता है. मंत्रोच्चारण के बीच अग्नि के सात फेरे लेकर और ध्रुव तारे को साक्षी मानकर स्त्री-पुरुष तन और मन से एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं. भारतीय विवाह ख़ास होते हैं, क्योंकि इनमें ढेर सारे रीति-रिवाज होते हैं. ये रस्में विवाह से पहले शुरू हो जाती हैं और विवाह के बाद तक चलती हैं. ये परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं और इनके बिना विवाह पूर्ण नहीं होते, वह चाहे सगाई की रस्म हो, हल्दी- मेहंदी की रस्म हो या फिर दुल्हन की मुंह दिखाई की रस्म. हर परंपरा का अपना अलग महत्व है, अपनी अलग गरिमा और पहचान है. ये रस्में ही तो हैं, जो विवाह को और भी ज़्यादा यादगार बना देती हैं. छोटी-छोटी रस्में यादों में हमेशा के लिए बस जाती हैं.

विवाह से जुड़ी एक अहम रस्म है हल्दी लगाना. विवाह से पहले दुल्हन और दूल्हा हो सुहागिनें हल्दी यानी उबटन लगाती हैं. दुल्हन को उबटन लगाने के लिए दूल्हा के घर से महिलाएं आती हैं. इस उबटन में बेसन, हल्दी, चंदन, केसर और खु़शबू वाला तेल मिलाया जाता है. आजकल तो बाज़ार में तैयार उबटन मिलते हैं. बस उसमें तेल मिलाना होता है. उबटन से दूल्हा और दुल्हन की त्वचा कोमल हो जाती है और रंग भी निखर जाता है. इस रस्म के वक़्त दुल्हन को पीले कपड़े पहनाये जाते हैं और उसे फूलों के गहनों से सजाया जाता है. इसी तरह दुल्हन के घर की महिलाएं दूल्हे को हल्दी लगाने के लिए उसके घर जाती हैं. इस रस्म के बाद दूल्हा और दुल्हन के एक-दूसरे से मिलने पर रोक लग जाती है और यह पाबंदी विवाह तक रहती बनी है. विवाह से एक दिन पहले दूल्हा और दुल्हन को मेहंदी लगाई जाती है. दुल्हन को दूल्हा के घर से आई हुई मेहंदी लगती है. महिलाएं रतजगा करती हैं. रातभर संगीत की महफ़िल सजती है, जिसमें नाच-गाना शामिल होता है. इस दौरान सजी-धजी महिलाएं अपने-अपने हुनर का प्रदर्शन करती हैं. इसी तरह दूल्हा के हाथ पर भी शगुन के तौर पर मेहंदी लगाई जाती है. इस दौरान दूल्हे के घर भी जश्न का माहौल होता है. दूल्हे के दोस्त ख़ूब नाच-गाना करते हैं. अगले दिन शुभ मुहूर्त में मंत्रोच्चारण के बीच स्त्री-पुरुष विवाह के पवित्र बंधन में बंध जाते हैं. वर-वधू अपने बड़ों से आशीर्वाद लेते हैं. वर-वधू के नाते-रिश्तेदार और मित्र विवाह में शामिल होते हैं. विवाह समारोह के दौरान अनेक छोटी-छोटी रस्में होती हैं. लड़की हमेशा के लिए अपने मायके से जा रही होती है, इसलिए माहौल थोड़ा गंभीर होता है, लेकिन जीजा-सालियों की हंसी-ठिठोली माहौल को ख़ुशनुमा बना देती हैं. वर-वधू का द्वार सालियां व बहनें रोकती हैं. फिर दूल्हे द्वारा उन्हें नेग दिया जाता है. विवाह के बाद दुल्हन की मुंह दिखाई की रस्म होती है, जिसमें ससुराल की महिलाएं दुल्हन का घूंघट खोलकर उसका चेहरा देखती हैं और उसे नेग देती हैं.

ख़ास बात यह भी है कि विवाह की रस्मों में जिन चीज़ों का इस्तेमाल किया जाता है, उनका भी विशेष महत्व होता है, जैसे हल्दी, बेसन, केसर, घी, नारियल, पान, दूध, दही, पानी आदि. विवाह में चावल का भी ख़ूब काम आता है. चावल को शुद्ध और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद देने के लिए उनके ऊपर चावल छिड़का जाता है. मान्यता है कि चावल शुद्ध होने की वजह से नकारात्मक चीज़ों को दूर भगाता है, इसलिए विवाह के दौरान दूल्हा प्रज्जवलित अग्नि में चावल भी डालता है. कुलदेवी को भी चावल अर्पित किया जाता है. विवाह के बाद विदाई के वक़्त दुल्हन अपने हाथों में चावल भरकर सिर के पीछे की ओर फेंकती है. फिर दुल्हन ससुराल पहुंचकर चावल से भरे कलश को अपने पैरों से गिराकर घर में दाख़िल होती है. इन दोनों रस्मों के ज़रिये दुल्हन यह दुआ करती है कि उसके मायके और ससुराल दोनों में ख़ुशहाली हमेशा बनी रहे. इसी तरह धार्मिक रीति-रिवाजों में पान और सुपारी का भी इस्तेमाल किया जाता है. सुपारी को देवी का प्रतीक माना जाता है, जबकि पान ताज़गी और समृद्धि का प्रतीक है. पान को दूल्हा और दुल्हन के सिर पर लगाया जाता है. दूल्हे के परिवार का स्वागत भी पान से किया जाता है. विवाह की कई रस्मों में पान काम आता है. नारियल भी समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. मेहमानों को धन्यवाद के प्रतीक के रूप में पान के साथ नारियल भी दिया जाता है. विवाह के विभिन्न रीति-रिवाजों में पानी का भी ख़ूब इस्तेमाल होता है. पानी शुद्ध नदियों का प्रतीक है. यह जीवन का आधार है. इसके अलावा आम, केला, नीम और तुलसी के पत्तों का इस्तेमाल भी विवाह के विभिन्न रीति-रिवाजों में किया जाता है. इनके पत्ते शुद्धता के प्रतीक हैं. जब दुल्हन गृह-प्रवेश करती है, तो उस वक़्त गुड़ खिलाकर उसका स्वागत किया जाता है, ताकि रिश्तों में हमेशा मिठास बनी रहे. घी को पवित्र माना जाता है और विवाह की रस्मों के दौरान इसका भी ख़ूब इस्तेमाल होता है. विवाह के बाद की कई रस्मों में दही का इस्तेमाल भी होता है. कई रस्मों में दूध भी उपयोग में आता है.

 दरअसल, इन परंपराओं और रीति-रिवाजों के बिना विवाह की खु़शी अधूरी है. ये रस्में माहौल में ख़ुशियों के रंग भर देती हैं. विदेशी भी इन रस्मों के आकर्षण में बंधे यहां विवाह करने के लिए चले आते हैं. ऐसे बहुत से उदाहरण हैं. 23 अक्टूबर, 2010 को ब्रिटिश हास्य अभिनेता रसेल ब्रांड और गायिका कैटी पेरी ने रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान के नज़दीक वैदिक रीति-रिवाज से विवाह किया था. इससे पहले मार्च 2007 में अभिनेत्री लिज हर्ले और व्यापारी अरुण नायर ने जोधपुर में पारंपरिक भारतीय पद्धति से विवाह किया था. हाल में 31 दिसंबर, 2013 को आगरा में फ्रांसीसी जोड़े ने वैदिक रीति से विवाह किया. फ्रांस के रहने वाले जेन क्लाउड और उनकी महिला मित्र नथालिया भारत भ्रमण पर आए थे. दोनों 30 दिसंबर को आगरा पहुंचे. वह ताजमहल देखने गए और शहंशाह शाहजहां और उनकी बेगम मुमताज़ की मोहब्बत की दास्तान सुनकर मुग्ध हो गए. इस प्रेमकथा से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भारतीय रीति-रिवाज से विवाह करने का फ़ैसला कर लिया. जेन क्लाउड और नथालिया दूल्हा, दुल्हन के लिबास में सज-संवर कर कैलादेवी मंदिर में पहुंचे. जेन क्लाउड ने नथालिया को मंगलसूत्र पहनाया और अग्नि के सात फेरे लिए. विवाहित जोड़े का कहना है कि वे भारत की संस्कृति से बहुत प्रभावित हैं. यहां आकर उन्हें पता चला कि भारत में वैदिक रीति से विवाह को सात जन्मों का बंधन माना जाता है. यहां रिश्तों की मिठास और रीति-रिवाजों ने उन्हें बहुत प्रभावित किया, इसीलिए उन्होंने वैदिक रीति से विवाह किया. इससे पहले 25 दिसंबर, 2013 को मध्य प्रदेश के इंदौर में तीन विदेशी जोड़ों ने हिंदू रीति-रिवाजों के साथ विवाह किया. सभी वर-वधू भारतीय परिधानों में सजे-धजे थे. दूल्हों ने शेरवानी पहनी और साफ़ा बांधा. दुल्हनों ने लाल साड़ी पहनी और खु़द को पारंपरिक गहनों से सजाया. मंडप भी सजा और मंत्रोच्चारण के बीच सात फेरे लेकर वे विवाह के पवित्र बंधन में बंध गए. मैक्सिको की मारिया फ्लांडेज कैस्टिलो ने मैक्सिको के ही डेमियन उगाल्डे को वरमाला पहनाई. इंग्लैंड की लूसी हॉवेल ने आयरलैंड के डर्मोट ग्रीन को वरमाला पहनाई और स्पेन की मेंचू हर्नाडेज ने इंग्लैंड के ओलिवर एलिस को वरमाला पहनाकर हमेशा के लिए अपना बना लिया. इससे क़रीब एक माह पहले 19 नवंबर, 2013 को रूस के सेंट पीर्ट्सबर्ग से आए तीन जोड़ों ने उत्तराखंड के कनखल में वैदिक रीति से विवाह किया. ततियाना शूबेएकोव अपने मंगेतर ऑटोमोबाइल इंजीनियर सरनोव के साथ सात फेरे लिए. उनका कहना है कि उनकी दादी का विवाह धीरेंद्र ब्रह्मचारी ने कराया था और मां का विवाह प्रख्यात योगाचार्य बीकेएस आयंगर ने संपन्न कराया था. वह भी अपनी दादी और मां की तरह वैदिक रीति-रिवाज के साथ विवाह करना चाहती थीं, इसलिए भारत आईं. प्रोफेसर मैक्सीम ने अपनी मंगेतर येकटरीना से विवाह किया. मैक्सीम और येकटरीना का मानना है कि उनकी शादीशुदा ज़िंदगी ख़ुशहाल रहेगी. उनका कहना है कि भारत ऐसा अद्भुत देश है, जहां एक बार पाणिग्रहण संस्कार हो जाने के बाद जोड़ो को मौत ही जुदा करती है. आना कालीनीना का विवाह उनके मंगेतर व्यापारी अलेक्जेंडर के साथ संपन्न हुआ. आना कालीनीना और उनके मंगेतर अलेक्जेंडर भी वैदिक रीति-रिवाज के साथ विवाह करके बहुत ख़ुश हैं. तीन जोड़ों के विवाह को संपन्न कराने में चार भाषाएं इस्तेमाल की गई थीं. मंत्र संस्कृत में पढ़े गए और उनका अर्थ पंडितजी ने हिंदी में बताया. बाद में इसका अंग्रेजी अनुवाद किया गया, जबकि एक रूसी दुभाषिये ने जोड़ों को रूसी भाषा में मंत्रों का अर्थ समझाया. ये तीनों जोड़े वास्तु सीखने के लिए हरिद्वार आते रहे हैं, इसलिए इस इलाक़े उन्हें लगाव हो गया है. वे कहते हैं कि विवाह के बाद इस जगह से उनका रिश्ता अब और भी गहरा हो गया है.

 इसी तरह 11 मार्च, 2012 को वाराणसी में एक विदेशी जोड़े ने वैदिक रीति से विवाह किया. वाराणसी के कबीरचौरा स्थित एक लॊन में यह विवाह संपन्न हुआ. पेशे से पत्रकार अमेरिका (वाशिंगटन प्रांत) के सिएटल शहर निवासी डोरिक जानसन घोड़ी पर सवार होकर विवाह स्थल पर पहुंचे, जहां सिएटल की एक कंपनी में सीईओ शैरी डांटोनियो लाल जोड़े में सजी उनका का इंतजार कर रही थी. इस मंडप में सरोद वादक विकास महाराज के पुत्र बालम महाराज और वधू सुहाना मिश्रा का विवाह हुआ था. इसी विवाह मंडप में विदेशी युगल ने भी फेरे लिए. विदेशी युगल ने विकास महाराज से हिंदू रीति से विवाह की इच्छा जताई थी. डोरिक के माता-पिता के रूप में भी रस्में विकास महाराज और उनकी पत्नी ने ही निभाईं. 7 मार्च, 2009 में राजस्थान के पुष्कर में स्विट्जरलैंड के पहले से ही शादीशुदा जोड़े ने अपने रिश्ते को और भी मज़बूत करने के लिए वैदिक रीति से विवाह किया. स्विट्जरलैंड निवासी विनसेंट और उसकी पत्नी किकि ने पुष्कर के रावणा राजपूत समाज के चारभुजा मंदिर में वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच अग्नि के समक्ष सात फेरे लगाए और एक दूसरे को वरमाला पहनाई. दोनों से आठ साल पहले प्रेम विवाह किया था. उनका कहना थी कि यह दिन उनके लिए यादगार रहेगा. जून 2004 में जयपुर में स्विटज़लैंड के मारकोस और अलम्सा ने वैदिक रीति से विवाह किया था.  स्विटज़रलैंड के एक ऐसे ही प्रेमी जोड़े ने जयपुर में स्थानीय रीति रिवाज़ से विवाह किया. अलाम्सा का मानना था कि भारत में विवाह ज़्यादा कामयाब हैं, क्योंकि विवाह का अपना पारंपरिक तरीक़ा है. मारकोस का कहना था कि भारतीय विवाह में रौनक़ बहुत होती है, जो उन्हें बहुत पसंद आई. क़ाबिले-ग़ौर है कि सभी विदेशी दुल्हनें भारतीय दुल्हनों की तरह सजती-संवरती हैं. लाल लिबास, मांग में सिंदूर, मेहंदी से सजे हाथों में चूड़ियां, पारंपरिक गहने और फूलों के गजरे लगाए ये दुल्हनें किसी अप्सरा से कम नहीं लगतीं. दूल्हे भी पारंपरिक शेरवानी और साफ़ों में नज़र आते हैं.

इसे विडंबना ही कहेंगे कि आज जब भारतीय युवा अपनी संस्कृति से विमुख होकर पश्चिम की लहर में बह रहे हैं, वहीं विदेशियों में भारतीय संस्कृति और परंपराओं में आस्था बढ़ रही है. हर सल सैकड़ों विदेशी जोड़े भारत आते हैं और वैदिक रीति से विवाह करते हैं. भारतीय प्राच्य विद्या सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. प्रतीक मिश्रपुरी के मुताबिक़ वह खु़द साठ विदेशी जोड़ों का वैदिक रीति से विवाह करा चुके हैं. उनका कहना है कि विदेशियों के मन में तलाक़ का डर रहता है. इसलिए वे ऐसी पद्धतियों की तलाश में रहते हैं, जिनसे उनका विवाह लंबे वक़्त तक चल सके. एक अनुमान के मुताबिक़ अकेले राजस्थान में हर साल तक़रीबन तीन सौ विदेशी जोड़े विवाह करते हैं.

यह भारतीय परंपराओं और रीति-रिवाजों का आकर्षण ही है, जो विदेशियों को भी भारत आकर वैदिक रीति से विवाह रचाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. बेशक, यही परंपराएं और रीति-रिवाज हमारी गौरवशाली संस्कृति का प्रतीक हैं.

Wednesday, April 20, 2016

लुप्त होती कठपुतली कला...


फ़िरदौस ख़ान
भारतीय संस्कृति का प्रतिबिंब लोककलाओं में झलकता है. इन्हीं लोककलाओं में कठपुतली कला भी शामिल है. यह देश की सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ-साथ प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम भी है, लेकिन आधुनिक सभ्यता के चलते मनोरंजन के नित नए साधन आने से सदियों पुरानी यह कला अब लुप्त होने की क़गार पर है.

कठपुतली का इतिहास बहुत पुराना है. ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में पाणिनी की अष्टाध्यायी में नटसूत्र में पुतला नाटक का उल्लेख मिलता है. कुछ लोग कठपुतली के जन्म को लेकर पौराणिक आख्यान का ज़िक्र करते हैं कि शिवजी ने काठ की मूर्ति में प्रवेश कर पार्वती का मन बहलाकर इस कला की शुरुआत की थी. कहानी 'सिंहासन बत्तीसी' में भी विक्रमादित्य के सिंहासन की बत्तीस पुतलियों का उल्लेख है. सतवध्दर्धन काल में भारत से पूर्वी एशिया के देशों इंडोनेशिया, थाईलैंड, म्यांमार, जावा, श्रीलंका आदि में इसका विस्तार हुआ. आज यह कला चीन, रूस, रूमानिया, इंग्लैंड, चेकोस्लोवाकिया, अमेरिका व जापान आदि अनेक देशों में पहुंच चुकी है. इन देशों में इस विधा का सम-सामयिक प्रयोग कर इसे बहुआयामी रूप प्रदान किया गया है. वहां कठपुतली मनोरंजन के अलावा शिक्षा, विज्ञापन आदि अनेक क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जा रहा है.

भारत में पारंपरिक पुतली नाटकों की कथावस्तु में पौराणिक साहित्य, लोककथाएं और किवदंतियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. पहले अमर सिंह राठौड़, पृथ्वीराज, हीर-रांझा, लैला-मजनूं और शीरी-फ़रहाद की कथाएं ही कठपुतली खेल में दिखाई जाती थीं, लेकिन अब साम-सामयिक विषयों, महिला शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, परिवार नियोजन के साथ-साथ हास्य-व्यंग्य, ज्ञानवर्ध्दक व अन्य मनोरंजक कार्यक्रम दिखाए जाने लगे हैं. रीति-रिवाजों पर आधारित कठपुतली के प्रदर्शन में भी काफ़ी बदलाव आ गया है. अब यह खेल सड़कों, गली-कूचों में न होकर फ़्लड लाइट्स की चकाचौंध में बड़े-बड़े मंचों पर होने लगा है.

छोटे-छोटे लकड़ी के टुकड़ों, रंग-बिरंगे कपड़ों पर गोटे और बारीक काम से बनी कठपुतलियां हर किसी को मुग्ध कर लेती हैं. कठपुतली के खेल में हर प्रांत के मुताबिक़ भाषा, पहनावा व क्षेत्र की संपूर्ण लोक संस्कृति को अपने में समेटे रहते हैं. राजा-रजवाड़ों के संरक्षण में फली-फूली इस लोककला का अंग्रेजी शासनकाल में विकास रुक गया. चूंकि इस कला को जीवित रखने वाले कलाकार नट, भाट, जोगी समाज के दलित वर्ग के थे, इसलिए समाज का तथाकथित उच्च कुलीन वर्ग इसे हेय दृष्टि से देखता था.

महाराष्ट्र को कठपुतली की जन्मभूमि माना जाता है, लेकिन सिनेमा के आगमन के साथ वहां भी इस पारंपरिक लोककला को क्षति पहुंची. बच्चे भी अब कठपुतली का तमाशा देखने की बजाय ड्राइंग रूम में बैठकर टीवी देखना ज़्यादा पसंद करते हैं. कठपुतली को अपने इशारों पर नचाकर लोगों का मनोरंजन करने वाले कलाकर इस कला के क़द्रदानों की घटती संख्या के कारण अपना पुश्तैनी धंधा छोड़ने पर मजबूर हैं. अनके परिवार ऐसे हैं, जो खेल न दिखाकर सिर्फ़ कठपुतली बनाकर ही अपना गुज़र-बसर कर रहे हैं. देश में इस कला के चाहने वालों की तादाद लगातार घट रही है, लेकिन विदेशी लोगों में यह लोकप्रिय हो रही है. पर्यटक सजावटी चीज़ों, स्मृति और उपहार के रूप में कठपुतलियां भी यहां से ले जाते हैं, मगर इन बेची जाने वाली कठपुतलियों का फ़ायदा बड़े-बड़े शोरूम के विक्रेता ही उठाते हैं. बिचौलिये भी माल को इधर से उधर करके चांदी कूट रहे हैं, जबकि इनको बनाने वाले कलाकर दो जून की रोटी को भी मोहताज हैं.

कठपुतली व अन्य इसी तरह की चीज़ें बेचने का काम करने वाले बीकानेर निवासी राजा का कहना है कि जीविकोपार्जन के लिए कठपुतली कलाकारों को गांव-क़स्बों से पलायन करना पड़ रहा है. कलाकरों ने नाच-गाना और ढोल बजाने का काम शुरू कर लिया है. रोज़गार की तलाश ने ही कठपुतली कलाकरों की नई पीढ़ी को इससे विमुख किया है. जन उपेक्षा व उचित संरक्षण के अभाव में नई पीढ़ी इस लोक कला से उतनी नहीं जुड़ पा रही है जितनी ज़रूरत है. उनके परिवार के सदस्य आज भी अन्य किसी व्यवसाय की बजाय कठपुतली बनाना पसंद करते हैं. वह कहते हैं कि कठपुतली से उनके पूर्वजों की यादें जुड़ी हुई हैं. उन्हें इस बात का मलाल है कि प्राचीन भारतीय संसकृति व कला को बचाने और प्रोत्साहन देने के तमाम दावों के बावजूद कठपुतली कला को बचाने के लिए सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है.

पुरानी फ़िल्मों और दूरदर्शन के कई कार्यक्रमों में कठपुतलियों का अहम किरदार रहा है, मगर वक़्त के साथ-साथ कठपुतलियों का वजूद ख़त्म होता जा रहा है. इन विपरीत परिस्थितियों में सकारात्मक बात यह है कि कठपुतली कला को समर्पित कलाकारों ने उत्साह नहीं खोया है. भविष्य को लेकर इनकी आंखों में इंद्रधनुषी सपने सजे हैं. इन्हें उम्मीद है कि आज न सही तो कल लोककलाओं को समाज में इनकी खोयी हुई जगह फिर से मिल जाएगी और अपनी अतीत की विरासत को लेकर नई पीढ़ी अपनी जड़ों की ओर लौटेगी.