Wednesday, October 20, 2010

हरियाणा के किसान ने बनाई बहु उद्देशीय प्रसंस्करण मशीन

फ़िरदौस ख़ान
हरित क्रांति के लिए अग्रणी हरियाणा को कृषि के क्षेत्र में सिरमौर बनाने में यहां के किसानों की अहम भूमिका है. यहां के किसानों ने न केवल खेतीबाड़ी में नित नए प्रयोग किए हैं, बल्कि तकनीकी क्षेत्र में भी अपनी योग्यता का परचम लहराया है. ऐसे ही एक किसान हैं यमुनानगर ज़िले के गांव दामला के धर्मवीर, जिन्होंने बहु उद्देशीय प्रसंस्करण मशीन बनाकर इस क्षेत्र में एक नई क्रांति को जन्म दिया है. इस मशीन से जूसर, ग्राइंडर, कुकर और मिक्सर का काम एक साथ लिया जा सकता है.

जड़ी-बूटियों की खेती करने वाले धर्मवीर बताते हैं कि उनका कारोबार जड़ी-बूटियों का है. वह अपने खेतों में उगी औषधियों को तैयार करके बाज़ार में बेचते हैं. औषधियों को पीसना, उनका जूस और अर्क़ निकालना बहुत मेहनत का काम है और इसमें समय भी ज़्यादा लगता है. साथ ही लेबर का ख़र्च बढ़ने से लागत भी ज़्यादा हो जाती है. इसलिए उन्होंने सोचा कि क्यों न ऐसी कोई मशीन बनाई जाए, जिससे उनका काम आसान हो जाए. उन्होंने वर्ष 2006 में बहु उद्देशीय प्रसंस्करण मशीन बनाई. उन्होंने क़रीब एक साल तक इस मशीन से जड़ी-बूटियों, गुलाब, ऐलोवेरा (धूतकुमारी), आंवला, जामुन, केला और टमाटर की प्रोसेसिंग करके विभिन्न उत्पाद तैयार किए. गुलाब का अर्क़, केले के छिलके का अर्क़, जामुन का जूस और जामुन की गुठली का पाउडर भी इससे तैयार किया. मशीन में जड़ी-बूटियों और फल-सब्ज़ियों की प्रोसेसिंग करके पांच-छह उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं. इन मशीन से एलोवेरा और आंवले की जैली, जूस, शैंपू, चूर्ण, तेल और मिठाई बना सकती है.

उनका कहना है कि छह फ़ीट ऊंची इस मशीन की क़ीमत एक लाख 35 हज़ार रुपये रखी गई है. इस मशीन का कुकर, मिक्सर और ग्राइंडर एक घंटे में क़रीब 150 किलोग्राम जड़ी-बूटियों और फल-सब्ज़ियों की प्रोसेसिंग करने में सक्षम है. मशीन में तीन टैंक लगे हैं, एक बड़ा और दो छोटे टैंक. बड़े टैक्स से जुड़े एक छोटे टैंक में अरंडी का तेल भरा होता है. जड़ी-बूटियां और फल-सब्जियां पकाते समय जलते नहीं हैं, क्योंकि अरंडी तेल से भरा टैंक अतिरिक्त ताप को सोख लेता है. मशीन को चलाने के लिए दो एचपी की मोटर लगी है. इस मशीन को चलाने के लिए पांच-छह लोगों की ज़रूरत होती है. यह मशीन छोटी फूड प्रोसेसिंग इकाइयों के लिए बड़ी उपयोगी हो सकती है. यह मशीन हल्की होने के कारण इसे कहीं भी आसानी से ले जाया जा सकता है.

उन्होंने बताया कि वर्ष 2006 में ही उनकी इस मशीन को फूड प्रोडक्ड ऑर्डर (एफपीओ) 1955 के तहत लाइसेंस मिल गया था. इसके अलावा अहमदाबाद के नेशनल इन्नोवेशन फ़ाउंडेशन (एनआईएफ) ने भी इस मशीन को उपयोगी माना है. उन्होंने सबसे पहले करनाल के नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीटयूट (एनडीआरआई) में आयोजित किसान मेले में इस मशीन को प्रदर्शित किया था, जहां इसे बहुत सराहा गया. इसके बाद वह हरियाणा के अलावा अन्य राज्यों में भी इस मशीन का प्रदर्शन करने लगे. वह बताते हैं कि वर्ष 2008 से इस मशीन की कॉमर्शियल बिक्री कर रहे हैं और अब तक 25 मशीनें बेच चुके हैं. उनका कहना है कि यह मशीन हरियाणा, राजस्थान और हिमाचल सरकार के बाग़वानी विभागों ने ख़रीदी है, ताकि फूड प्रोसेसिंग से जुड़े उद्यमियों के सामने इसे प्रदर्शित किया जा सके. वह बताते है कि राज्य में फूड प्रोसेसिंग इकाई संचालित करने वाले एक उद्यमी ने यह मशीन लगाई है.

उन्होंने 20 जून को नई दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित एसोचैम हर्बल इंटरनेशनल एक्सपो मेले में भी इस मशीन को प्रदर्शित किया था. इसमें आयुष विभाग, स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार, विज्ञान एवं तकनीकी मंत्रालय, राष्ट्रीय औषधि पादक विभाग के दिल्ली, छत्तीसगढ़, गुजरात, बिहार, सिक्किम, पंजाब और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों के किसानों व कंपनियों ने अपने-अपने उत्पादों को प्रदर्शित किया. उन्होंने हरियाणा के बाग़वानी विभाग की तरफ़ से मेले का प्रतिनिधित्व किया. इसमें उनके द्वारा निर्मित प्राकृतिक उत्पादनों को प्रदर्शित किया गया. उसके द्वारा निर्मित प्राकृतिक उत्पादनों को देखकर केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री दिनेश त्रिवेदी इतने प्रभावित हुए कि कार्यक्रम का सबसे ज़्यादा समय हरियाणा के इस स्टॉल पर व्यतीत किया. किसान द्वारा तैयार किए गए हर्बल उत्पादों में गहन रुचि दिखाई. उन्होंने कहा कि यह हमारे देश का ही नहीं, बल्कि विश्व का भविष्य है. धर्मवीर ने बताया कि मेले में आने वाले देश-विदेश से प्रतिनिधि, कंपनियों व अधिकारियों ने उसके द्वारा निर्मित प्रोसेसिंग मशीन में ख़ासी दिलचस्पी ली. उन्होंने इस मशीन को किसानों के लिए 'वरदान' बताते हुए कहा कि इससे किसानों की आर्थिक दशा सुधारने में मदद मिलेगी. इस उपलब्धि के लिए धर्मवीर को पिछले साल 18 नवंबर को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने सम्मानित किया था. इसके अलावा कई संस्थाओं ने भी उन्हें सम्मानित किया है.

Thursday, October 7, 2010

जब मुस्लिम वालिद को मिली थी हिन्दू बेटी


फ़िरदौस ख़ान
मज़हब के नाम पर जहां लोग एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे रहते हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सिर्फ़ इंसानियत को ही तरजीह देते हैं. ऐसे लोग ही समाज का आदर्श होते हैं। ऐसा ही एक वाक़िया है, जो किसी फ़िल्मी कहानी जैसा लगता है, मगर है बिल्कुल हक़ीक़त. इसमें एक ग़रीब मुस्लिम व्यक्ति को रास्ते में एक अनाथ हिन्दू बच्ची मिलती है और वह उसे अपनी बेटी की तरह पालता है, उसके युवा होने पर पुलिस को इसकी ख़बर लग जाती है और वे लड़की को ले जाती है. फिर बूढ़ा मुस्लिम पिता अपनी हिन्दू बेटी को पाने के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाता है. सबसे अहम बात यह है कि उसे अदालत से अपनी बेटी मिल जाती है और फिर दोनों ख़ुशी-ख़ुशी साथ रहने लगते हैं.

ग़ौरतलब है कि गुजरात के भड़ूच के समीपवर्ती गांव तनकरिया में रहने वाले क़रीब 60 वर्षीय जादूगर सरफ़राज़ क़ादरी वर्ष 1995 में मध्यप्रदेश के इटारसी शहर में जादू का खेल दिखाने गए थे. वहां से लौटते वक़्त उन्हें रेलवे स्टेशन पर रोती हुई एक बच्ची मिली. जब उन्होंने बच्ची से उसका नाम और पता पूछा तो वह कुछ भी बताने में असमर्थ रही. उन्हें उस बच्ची पर तरह आ गया और वे उसे अपने साथ घर ले आए. बच्ची के मिलने से कुछ साल पहले ही उनकी पत्नी, बच्चों एक बेटी और एक बेटे की मौत हो चुकी थी. उन्हें इस बच्ची में के रूप में अपनी ही बेटी नज़र आई. चुनांचे उन्होंने इस बच्ची को पालने का फ़ैसला ले लिया. बच्ची से मिलने के कुछ साल बाद ही उनके पास जादू का खेल सीखने के लिए एक लड़का और उसकी बहन आए. वे उनके ही घर रहने लगे. मगर दोनों ने अपने परिवार वालों को इसकी जानकारी नहीं दी. बच्चों के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवा दी. इस पर पुलिस क़ादरी के घर पहुंच गई. जांच के दौरान पुलिस को मुन्नी पर भी शक हुआ. पूछताछ में मामला सामने आने के बाद पुलिस मुन्नी को अपने साथ ले गई. इसके बाद क़ादरी ने 25 अगस्त 2008 को अदालत में एक याचिका दायर कर वर्षा पटेल उर्फ़ मुन्नी को वापस दिलाने की मांग की, लेकिन अदालत द्वारा क़ादरी का आवेदन ठुकराए जाने के बाद मुन्नी को महिला संरक्षण गृह में रखा गया.

क़ादरी ने अदालत में कहा था कि उन्होंने मुन्नी को बेटी की तरह पाला है, इसलिए उन्हें ही उसका संरक्षण मिलना चाहिए. अदालत का कहना था कि नाबालिग़ लड़की मिलने पर पुलिस को इसकी सूचना या उसके हवाले किया जाना चाहिए, जो क़ादिर ने नहीं किया. वह लड़की को भले ही अपनी बेटी मानता हो, लेकिन उसके पास इसका कोई सबूत नहीं है.

तमाम परेशानियों के बावजूद क़ादरी ने हार नहीं मानी और आख़िर उनकी मेहनत रंग लाई. 14 दिसंबर 2008 में भड़ूच की एक फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के न्यायाधीश एचके घायल ने मुख्य न्यायायिक मजिस्ट्रेट के फ़ैसले को पलटते हुए क़ादरी को मुन्नी के पालन-पोषण का ज़िम्मा सौंपने का आदेश दिया. अदालत ने पाया कि क़ादरी का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और मुन्नी अपनी मर्ज़ी से ही क़ादरी के साथ ही रह रही है. अदालत में दिए बयान में मुन्नी ने कहा था कि वह अपने पिता क़ादरी के साथ ही रहना चाहती है. उसका यह भी कहना था कि उसके अपने पिता का नाम जगदीश भाई के रूप में याद है, लेकिन मां का नाम उसे याद नहीं है. उसने यह भी कहा कि वह 18 साल की हो चुकी है.

यह वाक़िया उन लोगों के लिए नज़ीर है, जो नफ़रत को बढ़ावा देते हैं. कभी मज़हब के नाम पर, कभी भाषा के नाम पर तो कभी प्रांत विशेष के नाम पर बेक़सूर लोगों का ख़ून बहाकर अपनी जय-जयकार कराते हैं. कुछ भी हो, आख़िर में जीत तो इंसानियत की ही होती है.

Monday, October 4, 2010

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना...


आज राष्ट्रीय अखंडता दिवस  है...

फ़िरदौस ख़ान
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिंदी हैं हम वतन है, हिन्दोस्तां हमारा...
हिंसा किसी भी सभ्य समाज के लिए सबसे बड़ा कलंक हैं, और जब यह दंगों के रूप में सामने आती है तो इसका रूप और भी भयंकर हो जाता है। दंगे सिर्फ जान और माल का ही नुक़सान नहीं करते, बल्कि इससे लोगों की भावनाएं भी आहत होती हैं और उनके सपने बिखर जाते हैं। दंगे अपने पीछे दुख-दर्द, तकलीफ़ें और कड़वाहटें छोड़ जाते हैं. लेकिन कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद इंसानियत की मिसाल पेश करते हैं.

ऐसी ही एक महिला हैं गुजरात के अहमदबाद की गुलशन बानो, जिन्होंने एक हिन्दू लड़के को गोद लिया है. क़रीब 47 साल की गुलशन बानो केलिको कारख़ाने के पास अपने बच्चों के साथ रहती हैं. वर्ष 2002 के मुस्लिम विरोधी दंगों में जब लोग एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे हो रहे थे, उस समय उनके बेटे आसिफ़ ने एक हिन्दू लड़के रमन को आसरा दिया था. बेटे के इस काम ने गुलशन बानो का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया. रमन के आगे-पीछे कोई नहीं था. इसलिए उन्होंने उसे गोद लेने का फ़ैसला कर लिया. इस वाकिये को क़रीब छह साल बीत चुके हैं. रमन गुलशन बानो के परिवार में एक सदस्य की तरह रहता है. उसका कहना है कि गुलशन बानो उसके लिए मां से भी बढ़कर हैं. उन्होंने कभी उसे मां की ममता की कमी महसूस नहीं होने दी. बारहवीं कक्षा तक पढ़ी गुलशन बानो कहती हैं कि उनका जीवन संघर्षों से भरा हुआ है. उन्होंने अपने आठ बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा किया है. जब उन्होंने बिन मां-बाप का बच्चा देखा, तो उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने उसे अपना लिया. उनके घर ईद के साथ-साथ दिवाली भी धूमधाम से मनाई जाती है. अलग-अलग धर्मों से ताल्लुक़ रखने के बावजूद एक ही थाली में भोजन करने वाले मां-बेटे का प्यार इंसानियत का सबक़ सिखाता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ वर्ष 2000 में 16 लाख लोग हिंसा के कारण मौत के मुंह में समा गए थे. इनमें से तक़रीबन तीन लाख लोग युध्द या सामूहिक हिंसा में मारे गए, पांच लाख की हत्या हुई और आठ लाख लोगों ने खुदकुशी की. युध्द, गृहयुध्द या दंगे-फ़साद बहुत विनाशकारी होते हैं, लेकिन इससे भी कई गुना ज़्यादा लोग हत्या या आत्महत्या की वजह से मारे जाते हैं. हिंसा में लोग अपंग भी होते हैं. इनकी तादाद मरने वाले लोगों से क़रीब 25 गुना ज़्यादा होती है. हर साल क़रीब 40 करोड़ लोग हिंसा की चपेट में आते हैं और हिंसा के शिकार हर व्यक्ति के नज़दीकी रिश्तेदारों में कम से कम 10 लोग इससे प्रभावित होते हैं.

इसके अलावा ऐसे भी छोटे-छोटे झगड़े होते हैं, जिनसें जान व माल का नुक़सान तो नहीं होता, लेकिन उसकी वजह से तनाव की स्थिति जरूर पैदा हो जाती है. कई बार यह हालत देश और समाज की एकता, अखंडता और चैन व अमन के लिए भी खतरा बन जाती है. भारत भी हिंसा से अछूता नहीं है. आज़ादी के बाद से ही भारत के विभिन्न हिस्सों में सांप्रदायिक दंगे होते रहे हैं. इनमें 1961 में अलीगढ़, जबलपुर, दमोह और नरसिंहगढ़, 1967 में रांची, हटिया, सुचेतपुर-गोरखपुर, अहमदनगर, शोलापुर, मालेगांव, 1969 में अहमदाबाद, 1970 में भिवंडी, 1971 में तेलीचेरी (केरल), 1984 में सिख विरोधी दंगे, 1992-1993 में मुंबई में भड़के मुस्लिम विरोधी दंगे से लेकर 1999 में उड़ीसा में ग्राहम स्टेन्स की हत्या, 2001 में मालेगांव और 2002 में गुजरात में हुए मुस्लिम विरोधी दंगों सहित करीब 30 ऐसे नरसंहार शामिल हैं, जिनकी कल्पना मात्र से ही रूह कांप जाती है.

दंगों में कितने ही बच्चे अनाथ हो गए, सुहागिनों का सुहाग छिन गया, मांओं की गोदें सूनी हो गईं. बसे-बसाए खुशहाल घर उजड़ गए और लोग बेघर होकर खानाबदोश जिन्दगी जीने को मजबूर हो गए. हालांकि पीड़ितों को राहत देने के लिए सरकारों ने अनेक घोषणाएं कीं और जांच आयोग भी गठित किए, लेकिन नतीजा वही ‘वही ढाक के तीन पात’ रहा. आख़िर दंगा पीड़ितों की आंखें इंसाफ़ की राह देखते-देखते पथरा गईं, लेकिन किसी ने उनकी सुध नहीं ली.

सांप्रदायिक दंगों के बाद इनकी पुनरावृत्ति रोकने और देश में सांप्रदायिक सौहार्द्र और आपसी भाईचारे को बढ़ावा देने के मक़सद से कई सामाजिक संगठन अस्तित्व में आ गए जो देश में सांप्रदायिक सद्भाव की अलख जगाने का काम कर रहे हैंक.

ग़ौरतलब है कि हिंसा के मुख्य कारणों में अन्याय, विषमता, स्वार्थ और आधिपत्य स्थापित करने की भावना शामिल है. हिंसा को रोकने के लिए इसके बुनियादी कारणों को दूर करना होगा. इसके लिए गंभीर रूप से प्रयास होने चाहिएं. इससे जहां रोज़मर्रा के जीवन में हिंसा कम होगी, वही युध्द, गृहयुध्द और दंगे-फ़साद जैसी सामूहिक हिंसा की आशंका भी कम हो जाएगी. अहिंसक जीवन जीने के लिए यह ज़रूरी है कि ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ की प्रवृत्ति को अपनाया जाए. अहिंसक समाज की बुनियाद बनाने में परिवार के अलावा, स्कूल और कॉलेज भी अहम भूमिका निभा सकते हैं. इसके साथ ही विभिन्न धर्मों के धर्म गुरु भी लोगों को धर्म की मूल भावना मानवता का संदेश देकर अहिंसक समाज के निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं. देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए यह भी ज़रूरी है कि सांप्रदायिक मुद्दों को आपसी बातचीत से हल किया जाए.

Sunday, October 3, 2010

ब्लॉग इन प्रिंट मीडिया...एक शानदार तोहफ़ा

ब्लॉग की दुनिया में श्री बी एस पाबला  का अहम मुक़ाम है...विन्रम और हर वक़्त दूसरों की मदद के लिए तैयार रहने वाले पाबला जी ने ब्लॉग इन प्रिंट मीडिया की सूरत में ब्लॉगरों को जो तोहफ़ा दिया है, उसकी जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है... ब्लॉग इन प्रिंट मीडिया के  ज़रिये ब्लॉगरों को यह मालूम हो जाता है कि देश के किन किन अख़बारों और पत्रिकाओं में उनके ब्लॉग छाए हुए हैं... सबसे ख़ास बात यह भी है कि ब्लॉग इन प्रिंट मीडिया अख़बारों और पत्रिकाओं की कतरें भी शामिल रहती हैं...
ब्लॉग इन प्रिंट मीडिया का ख़्याल कैसे आया? यह पूछने पर पाबला जी बताते हैं कि हिंदी ब्लॉगरों के जनमदिन एक स्थान पर पाये जाने वाली पोस्ट के बाद, एक दिन मुझे अपने ही ब्लॉग का जिक्र समाचार पत्र में किये जाने की खबर लगी। बताने वाला यह नहीं बता पाया कि समाचार-पत्र कौन सा था, लेकिन पोस्ट ज़रूर बता दी। उत्सुकता हुयी कि आखिर वह कहां छपी है और क्या लिखा गया है। हमने पता लगाना शुरू किया। 'विक्टोरिया नम्बर 203' जैसा बड़ी टेढ़ी खीर वाला लगा यह काम। चाबी (पोस्ट) थी, लेकिन ताला (समाचार पत्र) नहीं! फिर खबर लगी कि 'उसे' एक ऐसे न्यूज़ पेपर पर देखा गया है जिसका एक संस्करण हमारे क्षेत्र से भी निकलता है। हमने अंदाजा लगाया और तीर निशाने पर बैठा। हमने सोचा, पता नहीं ऐसे कितने ही ब्लॉगर होंगें, जिन्हें मालूम भी नहीं होता होगा कि उनकी किसी पोस्ट की, किसी समाचार पत्र या पत्रिका या ऐसे ही किसी प्रिंट मीडिया में तारीफ की गयी है, चर्चा की गयी है, उद्धृत किया गया है। पता चल भी जाये तो उसकी झलक पाने के लिए कितने ही पापड़ बेलने पड़ते होंगे। इस सोच का परिणाम यह निकला कि एक ब्लॉग बना डाला गया 'प्रिंट मीडिया पर ब्लॉग चर्चा'। अपने ब्लॉग पोस्ट की कतरन तलाशी में जितनी जानकारी मिली, सभी इस ब्लॉग में डालनी शुरू कर दी। अब समस्या यह आयी कि किस कतरन को पहले रखा जाये किसे पीछे। समाधान यह निकाला गया कि जिस तारीख की कतरन है, उसी तारीख पर संबंधित पोस्ट लिखी जाए, फिर भले ही वह दो-तीन साल पहले की हो। बड़ा समय खाऊ काम लगा। वैसे ही व्यस्तता रहती है। मैंने सोचा जब बना ही लिया है यह सूचनात्मक ब्लॉग, तो क्यों न इसमें उनको शामिल किया जाए जिनके ब्लॉग की चर्चा की गयी है या जिन्होंने उन ब्लॉग लेखकों को सूचना दी है उसके जिक्र की।

पाबला जी कहते हैं कि आप अभी तक ब्लॉगवाणी , चिट्ठाजगत, रफ़्तार, गुरुजी आदि ब्लॉग संकलकों के द्वारा विभिन्न ब्लॉगों तक जाते होंगे किन्तु इस प्रिंट मीडिया वाले ब्लॉग के वेबसाईट में ढल जाने पर, आप उन ब्लॉगों तक अपनी पहुँच आसान बना सकेंगे जिन्हें प्रिंट मीडिया, रेडियो, टेलीविज़न, वेब-पत्रिकाओं ने स्थान दे उनकी उपयोगिता सिद्ध की है। परिणामस्वरूप, हालिया परिदृष्य में, बेहतर हिन्दी ब्लॉगों की तलाश में संतुष्ट हुया जा सकेगा।

तो फिर देर किस बात की? आईए इस नए नवेले अनोखे ब्लॉग-एग्रीगेटर www.BlogsInMedia.com का स्वागत करें जो केवल संचार माध्यमों में उल्लेखित हिन्दी ब्लॉगों का संकलन करेगा। यह निश्चित तौर पर अविवादित भी होगा क्योंकि ब्लॉग लेखक व एग्रीगेटर के मध्य आकलनकर्ता के रूप में मीडिया के अन्य कारक भी शामिल होंगे।

हिंदी ब्लॉगरों के जन्मदिन  के जन्मदिन वाले ब्लॉग का ज़िक्र करते हुए पाबला जी कहते हैं कि 18 मार्च को अनिता कुमार जी के जनमदिन के पहले, 12 मार्च को लवली कुमारी का जनमदिन था। प्रशांत की एक पोस्ट के जरिये देर से पता चला। दिन भर किसी के भी द्वारा कोई शुभकामना संदेश न पाने की उनकी उदासी ने, मुझे कहीं छू लिया। ऐसे मौकों पर मुझमें बड़ा उत्साह रहता है। क्योंकि आजकल के सामाजिक परिवर्तन के दौर में, कम से कम, साल के एक दिन तो किसी को शुभकामनाये देने का मौका/ बहाना मिल पाता है। इसी उत्साह और लवली के शब्द पढ़ उन्हें, देर से ही सही लेकिन, बधाई देने का मन हो आया। आनन-फानन में उनके फोन नम्बर की माँग की, उनके परिचित ब्लॉगरों से, जो स्वाभाविक रूप से हिचकिचा गये। तुरंत हमने भी बातों का रूख बदल कर, अपनी लापरवाही का दिखावा किया और पोस्ट पर ही टिप्पणी के रूप में शुभकामनाये देने की सोची। टिप्पणी के समय इंटरनेट देव रूठ गये और बात आयी गयी हो गयी।


मन में यह ख्याल आया कि कई बार, हममें से कितने ही व्यक्ति चाहकर भी, समय पर या देर से, शुभकामनायें नहीं दे पाते होंगे क्योंकि उन्हें पता ही नहीं रहता। कोई ऐसा स्थान मेरी जानकारी में नहीं है, जहाँ एक साथ सभी हिंदी ब्लॉगरों का डाटा सार्वजनिक अवस्था में मिल जाये। हालांकि इंटरनेट पर बहुतेरी सोशल नेट्वर्किंग वेबसाईट्स हैं जिनमें आप अपना/ अपनों का, जनमदिन आदि का रिकॉर्ड रख सकते हैं। वहाँ समस्या यह है कि आपको अपने किसी अलग से यूज़र नेम और पासवर्ड से घुसना पड़ेगा। इसके अलावा व्यर्थ के डाटा भी आपको देने पड़ते हैं, ईमेल आईडी के व्यवसायिक दुरूपयोग की भी संभावना रहती है।

इसलिए मैंने स्वयं के लिए, गूगल की सहायता से, एक कैलेंडर बनाया है। जैसे-जैसे जानकारी मिलती जायेगी, उसमें डालता जाऊंगा। कम से कम इधर-उधर भटकने की ज़रूरत तो नहीं होगी। वह कैलेंडर सार्वजनिक है, इसलिए आप भी देख पायेंगे, अपनों हिंदी ब्लॉगरों की विभिन्न वर्षगांठों को।

यह कैलेंडर मूल रूप में मेरे ब्लॉग पर सबसे नीचे मौज़ूद है. लेकिन इसे सीधे http://janamdin.blogspot.com/ पर देखा जा सकता है। इसका निर्माण इस पोस्ट के लिखते-लिखते ही किया गया है, इसलिए किसी तरह की साज सज्जा नहीं हो पाई है, बाद में आप की प्रतिक्रिया के अनुसार इसे संवारा जाएगा। वह कहते हैं कि आप स्वयं की या किसी और हिंदी ब्लॉगर की जानकारी देना चाहें तो मेरे ईमेल पर भेज दें। ईमेल पता मेरे प्रोफाईल पर उपलब्ध है।

ब्लॉग जगत के लिए की जाने वाली इस निस्वार्थ सेवा के लिए पाबला जी को हार्दिक शुभकामनाएं...

Thursday, September 30, 2010

है राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज़...

फ़िरदौस ख़ान
है राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज़
अहल-ए-नज़र समझते हैं इस को इमाम-ए-हिन्द
लबरेज़ है शराब-ए-हक़ीक़त से जाम-ए-हिन्द
सब फ़सलसफ़ी हैं ख़ित्त-ए-मग़रिब के राम-ए-हिन्द

बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच का फ़ैसला आ चुका है। अदालत ने विवादित ज़मीन को तीन हिस्सों में बांटा है। एक हिस्सा हिन्दुओं, दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े और तीसरा हिस्सा मुसलमानों को देने के निर्देश दिए गए हैं। न्यायाधीश एसयू ख़ान, न्यायाधीश सुधीर अग्रवाल और न्यायाधीश धर्मवीर शर्मा की खंडपीठ द्वारा दिए गए इस फ़ैसले का इससे बेहतर हल शायद ही कोई और हो सकता था। यह फ़ैसला देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने वाला है। इसलिए सभी पक्षों को इसे दिल से क़ुबूल करना चाहिए। हालांकि मुस्लिम पक्ष के वकील इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने की बात कर रहे हैं। मुसलमानों को चाहिए कि इस मामले को यहीं ख़त्म कर दें और देश और समाज की तरक्क़ी के बारे में सोचें। देश और समाज के हित में सांप्रदायिक सौहार्द्र बढ़ाने के लिए यह एक बेहतरीन मौक़ा है। विवादित ज़मीन पर मंदिर बने या मस्जिद, दोनों ही इबादतगाह हैं। दोनों के लिए ही हमारे मन में श्रध्दा होनी चाहिए।

राम हिन्दुओं के तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं में से एक हैं। राम ने अपने पिता के वचन को निभाने के लिए अपना सिंहासन त्यागकर वनवास क़ुबूल कर लिया। मुस्लिम बहुल देश इंडोनेशिया में भी राम को एक आदर्श पुरुष के रूप में देखा जाता है। यह दुनिया में सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है। हम जिस धरती पर रहते हैं, राम उसकी संस्कृति के प्रतीक हैं। हमें अपने देश की संस्कृति और सभ्यता का सम्मान करना चाहिए। अदालत के फ़ैसले का सम्मान करते हुए उदारवादी मुसलमानों को आगे आना चाहिए।

Wednesday, September 29, 2010

अफ़वाहें... जंगल में आग की तरह फैलती हैं...

फ़िरदौस ख़ान
अफ़वाहें... जंगल में  आग की तरह फैलती हैं... मौजूदा वक़्त की नज़ाकत को देखते हुए इससे बचकर रहना बेहद ज़रूरी है...क्योंकि अफ़वाहें और दहशत दोनों की ही प्रतिक्रियाएं संक्रामक होती हैं. अफ़वाहें महज़ एक फ़ीसदी लोग ही फैलाते हैं. ज़्यादातर अफ़वाहें तथ्यों से परे होती हैं. अफ़वाहों के बारे में सच्चाई को जानने का सबसे बढ़िया तरीक़ा यह है कि बताने वाले से पूछना चाहिए ''आपको किसने कहा?'' इसका जवाब किसी एक का नाम होगा. जब तक उसका नाम न सुन लें और उसकी सच्चाई का पता न कर लें तब तक उस पर भरोसा न करें. मानव की यह प्रवृत्ति होती है कि वह जितना सुनता है, उससे कहीं ज़्यादा वह बोलता है.
हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. के के अग्रवाल के मुताबिक़ अफ़वाहें वैज्ञानिक होती है और ये 100 बंदरों की गाथा पर आधारित होती हैं. एक बार जब यह आबादी में फैल जाती हैं तो फिर यह जंगल में आग की तरह फैलती हैं. 1000 लोगों की भीड़ में महज़ 10 लोगों को अफ़वाह फैलाने की ज़रूरत होती है और इसके साथ दहशत भी फैल सकती हैं. युध्द जैसी स्थिति में लोगों में अफ़वाह फैलाना आसान होता है और इससे दहशत भी बढ़ती है साथ ही एक अजीब तरह का खौफ़ सताने लगता है.
दहशत के आधात को परिभाषित नहीं किया जा सकता. साथ ही इससे निपटने के लिए भी ज़रूरी उपाय तय नहीं हैं. शरीर में अचानक से जान जाने की प्रतिक्रिया जैसी स्थिति सामने आ जाती है. दहशत के आघात से आमतौर पर दुर्भाग्यवश हार्ट अटैक जैसी स्थिति होती है और इससे बहुत ज़्यादा खौफ़ हो जाता है. एन्जाइटी भी कभी-कभी दहशत आघात की वजह बन सकती है और बहुत से लोग जो एन्जाइटी की गिरफ़्त में होते हैं, वे दहशत के आघात का शिकार बन सकते हैं.
एन्जाइटी एक अनुभव होता है जिसको व्यक्ति एक समय विशेष में या अन्य तरह से ग्रसित हो जाता है. यह क्षण भावुक होता है और इसमें अधिकतर लोग खतरे का अनुभव करते हैं। दिल की धड़कन बढ़ जाती है, मांस पेशियां तनाव में आ जाती हैं, व्यक्ति ज़िन्दगी से जूझने के लिए तैयार हो जाता है. इसे '' फाइट या फ्लाइट'' प्रतिक्रिया कहते हैं और ऐसे में व्यक्ति को अतिरिक्त ताक़त की ज़रूरत होती है, जिससे खतरनाक स्थिति से बचाया जा सके. वहीं दूसरी ओर, एंजाइटी डिसआर्डर की स्थिति तब होती है जब इसके लक्षण दिखाई दें, लेकिन ''फाइट या फ्लाइट'' प्रतिक्रिया का अनुभव स्पष्ट नहीं होता.
दहशत का अटैक अचानक से आता है और इसमें किसी भी तरह के कोई चेतावनी सूचक भी नहीं होते और इसकी कोई ख़ास वजह भी नहीं होती. जितना आप अनुभव करते हैं, उससे कहीं ज़्यादा इसकी क्षमता हाती है जैसा कि अनुभवी लोग खुलासा करते हैं. दहशत के आघात के लक्षणों में शामिल हैं-

* दिल की धड़कन बढ़ जाना
* सांस लेने में दिक्कत या जितनी आपको हवा चाहिए उतनी न मिल पा रही हो
* खौफ़ जो कि शरीर को शक्तिहीन करने लगता है
* 'ट्रम्बलिंग,' पसीना आना, कांपना
* 'चोकिंग,' सीने में दर्द होना
* अचानक से गरम या बहुत ठंडे का अहसास होना
* हाथ की या पैर की उंगलियों का सुन्न हो जाना
* एक ऐसा डर जिससे आपके सामने मौत का मंज़र दिखे
इन लक्षणों के अलावा दहशत के आघात को निम्न परिस्थितियों में चिन्हित किया गया है:
* यह अचानक होता है, इसके लिए कोई विशेष स्थिति नहीं होती और अकसर इसका कोई जोड़ या किसी से संबंध नहीं होता है.
* यह कुछ मिनटों में गुज़र जाता है, शरीर ''फाइट या फ्लाइट'' को लम्बे समय तक नहीं झेल सकता. लेकिन बार-बार अटैक घंटों तक असर डाल सकता है.

 दहशत का आघात ख़तरनाक नहीं होता, लेकिन इससे बड़े पैमाने पर खौफ़ छा जाता है क्योंकि इसमें व्यक्ति 'क्रेजी' और 'नियंत्रण से बाहर' का अनुभव करता है. पैनिक डिसआर्डर से खौफ़ व्याप्त हो जाता है, क्योंकि पैनिक अटैक से इसका संबंध है और इसकी वजह से अन्य तरह की जटिलताएं जैसे फोबिया, डिप्रेशन, सब्स्टेंस एब्यूज, चिकित्सीय जटिलताएं और यहां तक की आत्महत्या भी शामिल है. इसका असर हल्के या सामाजिक असंतुलन तक शामिल होता है. इसलिए बेहतर है कि अफ़वाहों को फैलने से रोका जाए.

Tuesday, September 14, 2010

हिन्दी दिवस की रस्म अदायगी

फ़िरदौस ख़ान
देश की आज़ादी को छह दशक से भी ज़्यादा का वक़्त बीत चुका है। इसके बावजूद अभी तक हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा हासिल नहीं हो पाया है। यह बात अलग है कि हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस पर कार्यक्रमों का आयोजन कर रस्म अदायगी कर ली जाती है। हालत यह है कि कुछ लोग तो अंग्रेज़ी में भाषण देकर हिन्दी की दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाने से भी नहीं चूकते।

हिन्दी दिवस 14 सितंबर को राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय के तत्वावधान में नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में हिंदी दिवस समारोह का आयोजन किया जा रहा है। समारोह में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी वर्ष 2008-09 के लिए राजीव गांधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार, हिंदी में मौलिक पुस्तक लेखन के लिए इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार 2008-09 तथा केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों को हिंदी में किए गए उत्कृष्ट कार्य के लिए पुरस्कार और हिंदी गृह पत्रिका पुरस्कार 2009-10 प्रदान करेंगे। इस अवसर पर शील्ड/प्रमाण पत्र तथा नकद राशि के रूप में कुल 53 पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। अधिकारियों का दावा है कि संविधान सभा द्वारा हिंदी को राजभाषा के रूप में घोषित किए जाने की 61वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम से 90 संघ की राजभाषा नीति के सफ़ल कार्यान्वयन के लिए उत्साहवर्धक वातावरण बनाने और उसे क़ायम रखने के लिए मदद मिलेगी।

गौरतलब है कि संवैधानिक रूप से हिन्दी भारत की प्रथम राजभाषा है। यह देश की सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है। इतना ही नहीं चीनी के बाद हिन्दी दुनियाभर में सबसे ज़्यादा बोली और समझी जाती है। भारत में उत्तर और मध्य भागों में हिन्दी बोली जाती है, जबकि विदेशों में फ़िज़ी, गयाना, मॉरिशस, नेपाल और सूरीनाम के कुछ बाशिंदे हिन्दी भाषी हैं। एक अनुमान के मुताबिक़ दुनियाभर में क़रीब 60 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं।

देश में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा होने के बाद भी हिन्दी राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। हिन्दी हमारी राजभाषा है। राष्ट्रीय और आधिकारिक भाषा में काफ़ी फ़र्क है। जो भाषा किसी देश की जनता, उसकी संस्कृति और इतिहास को बयान करती है, उसे राष्ट्रीय भाषा कहते हैं। मगर जो भाषा कार्यालयों में उपयोग में लाई जाती है, उसे आधिकारिक भाषा कहा जाता है। इसके अलावा अंग्रेज़ी को भी आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है।

संविधान के अनुचछेद-17 में इस बात का ज़िक्र है कि आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा नहीं माना जा सकता है। भारत के संविधान के मुताबिक़ देश की कोई भी अधिकृत राष्ट्रीय भाषा नहीं है। यहां 23 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के तौर पर मंज़ूरी दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 344 (1) और 351 के मुताबिक़ भारत में अंग्रेज़ी सहित 23 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें आसामी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं। ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रीय भाषा तो आधिकारिक भाषा बन जाती है, लेकिन आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी लेना ज़रूरी है। संविधान में यह भी कहा गया है कि यह केंद्र का दायित्व है कि वह हिन्दी के विकास के लिए निरंतर प्रयास करे। विभिन्नताओं से भरे भारतीय परिवेश में हिन्दी को जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया जाए।

भारतीय संविधान के मुताबिक़ कोई भी भाषा, जिसे देश के सभी राज्यों द्वारा आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया गया हो, उसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा गया है। मगर हिन्दी इन मानकों को पूरा नहीं कर पा रही है, क्योंकि देश के सिर्फ़ 10 राज्यों ने ही इसे आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया है, जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल है। इन राज्यों में उर्दू को सह-राजभाषा का दर्जा दिया गया है। उर्दू जम्मू-कश्मीर की राजभाषा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है। संविधान के लिए अनुच्छेद 351 के तहत हिन्दी के विकास के लिए विशेष प्रावधान किया गया है।

ग़ौरतलब है कि देश में 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ था। देश में हिन्दी और अंग्रेज़ी सहित 18 भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है, जबकि यहां क़रीब 800 बोलियां बोली जाती हैं। दक्षिण भारत के राज्यों ने स्थानीय भाषाओं को ही अपनी आधिकारिक भाषा बनाया है। दक्षिण भारत के लोग अपनी भाषाओं के प्रति बेहद लगाव रखते हैं, इसके चलते वे हिन्दी का विरोध करने से भी नहीं चूकते। 1940-1950 के दौरान दक्षिण भारत में हिन्दी के ख़िलाफ़ कई अभियान शुरू किए गए थे। उनकी मांग थी कि हिन्दी को देश की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा न दिया जाए।

संविधान सभा द्वारा 14 सितम्बर, 1949 को सर्वसम्मति से हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया था। तब से केन्द्रीय सरकार के देश-विदेश स्थित समस्त कार्यालयों में प्रतिवर्ष 14 सितम्बर हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के मुताबिक़ भारतीय संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपी देवनागरी होगी। साथ ही अंकों का रूप अंतर्राष्टीय्र स्वरूप यानी 1, 2, 3, 4 आदि होगा। संसद का काम हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में किया जा सकता है, मगर राज्यसभा या लोकसभा के अध्यक्ष विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं। संविधान के अनुच्छोद 120 के तहत किन प्रयोजनों के लिए केवल हिन्दी का इस्तेमाल किया जाना है, किन के लिए हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल ज़रूरी है और किन कार्यों के लिए अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल किया जाना है। यह राजभाषा अधिनियम 1963, राजभाषा अधिनियम 1976 और उनके तहत समय-समय पर राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है।

पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के चलते अंग्रेज़ी भाषा हिन्दी पर हावी होती जा रही है। अंग्रेज़ी को स्टेट्स सिंबल के तौर पर अपना लिया गया है। लोग अंग्रेज़ी बोलना शान समझते हैं, जबकि हिन्दी भाषी व्यक्ति को पिछड़ा समझा जाने लगा है। हैरानी की बात तो यह भी है कि देश की लगभग सभी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाएं अंग्रेज़ी में होती हैं। इससे हिन्दी भाषी योग्य प्रतिभागी इसमें पिछड़ जाते हैं। अगर सरकार हिन्दी भाषा के विकास के लिए गंभीर है तो इस भाषा को रोज़गार की भाषा बनाना होगा। आज अंग्रेज़ी रोज़गार की भाषा बन चुकी है। अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों को नौकरी आसानी से मिल जाती है। इसलिए लोग अंग्रेज़ी के पीछे भाग रहे हैं। आज छोटे क़स्बों तक में अंग्रेज़ी सिखाने की 'दुकानें' खुल गई हैं। अंग्रेज़ी भाषा नौकरी की गारंटी और योग्यता का 'प्रमाण' बन चुकी है। अंग्रेज़ी शासनकाल में अंग्रेज़ों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अंग्रेज़ियत को बढ़ावा दिया, मगर आज़ाद देश में मैकाले की शिक्षा पध्दति को क्यों ढोया जा रहा है, यह समझ से परे है।

हिन्दी के विकास में हिन्दी साहित्य के अलावा हिन्दी पत्रकारिता का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इसके अलावा हिन्दी सिनेमा ने भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा दिया है। मगर अब सिनेमा की भाषा भी 'हिन्गलिश' होती जा रही है। छोटे पर्दे पर आने वाले धारावाहिकों में ही बिना वजह अंग्रेज़ी के वाक्य ठूंस दिए जाते हैं। हिन्दी सिनेमा में काम करके अपनी रोज़ी-रोटी कमाने वाले कलाकार भी हर जगह अंग्रेज़ी में ही बोलते नज़र आते हैं। आख़िर क्यों हिन्दी को इतनी हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है? यह एक ज्वलंत प्रश्न है।

अधिकारियों का दावा है कि हिन्दी राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, जनभाषा के सोपानों को पार कर विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर है, मगर देश में हिन्दी की जो हालत है, वो जगज़ाहिर है। साल में एक दिन को ‘हिन्दी दिवस’ के तौर पर माना लेने से हिंदी का भला होने वाला नहीं है। इसके लिए ज़रूरी है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए ज़मीनी स्तर पर ईमानदारी से काम किया जाए।

Monday, September 13, 2010

बाढ़ के क़हर को रोकने की दरकार


फ़िरदौस ख़ान
बरसात का मौसम आते ही उत्तर भारत के कई राज्य बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं. इस साल भी उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में बाढ़ ने क़हर बरपाया है. बाढ़ से जान व माल का भारी नुक़सान हुआ है. लाखों लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं. कितने ही लोग बाढ़ की वजह से मौत की आग़ोश में समा गए. सैकड़ों मकान क्षतिग्रस्त हो गए, हज़ारों लोग बेघर होकर शरणार्थी जीवन गुज़ारने को मजबूर हुए. खेतों में खड़ी फ़सलें तबाह हो गईं, जिन्हें किसानों ने अपने ख़ून-पसीने से सींचा था.

देश में बाढ़ आने के कई कारण हैं. देश में बाढ़ अमूमन उत्तर पूर्वी राज्यों को ही निशाना बनाती है. इसकी सबसे बड़ी वजह है कि चीन और ऊपरी पहाड़ों में भारी बारिश होती है और वर्षा का यह पानी भारत के निचले इलाक़ों की तरह बहता है. फिर यही पानी देश में तबाही का कारण बनता है. नेपाल में भारी बारिश का पानी भी बिहार की कोसी नदी को उफ़ान पर ला देता है, जिससे नदी के रास्ते में आने वाले इलाक़े पानी में डूब जाते हैं. ग़ौरतलब है कि कोसी नदी नेपाल में हिमालय से निकलती है. यह नदी बिहार में भीम नगर के रास्ते भारत में दाख़िल होती है. कोसी बिहार में भारी तबाही मचाती है, इसलिए इसे बिहार का शोक या अभिशाप भी कहा जाता है. कोसी नदी हर साल अपनी धारा बदलती रहती है. वर्ष 1954 में भारत ने नेपाल के साथ समझौता करके इस पर बांध बनाया. हालांकि बांध नेपाल की सीमा में बनाया गया है, लेकिन इसके रखरखाव का काम भारत के ज़िम्मे है. नदी के तेज़ बहाव के कारण यह बांध कई बार टूट चुका है. आधिकारिक जानकारी के मुताबिक़ बांध बनाते वक्त अाकलन किया गया था कि यह नौ लाख क्यूसेक पानी के बहाव को सहन कर सकता है और बांध की आयु 25 साल आंकी गई थी. पहली बार यह बांध 1963 में टूटा. इसके बाद 1968 में पांच जगहों से यह टूटा. उस वक्त क़ोसी का बहाव नौ लाख 13 हज़ार क्यूसेक मापा गया था. फिर वर्ष 1991 नेपाल के जोगनिया और 2008 में नेपाल के ही कुसहा नामक स्थान पर बांध टूट गया. हैरानी की बात यह रही कि उस वक्त नदी का बहाव महज़ एक लाख 44 हज़ार क्यूसेक था.

कोसी की तरह गंडक नदी भी नेपाल के रास्ते बिहार में प्रवेश करती है. गंडक को नेपाल में सालिग्राम और मैदान में नारायणी कहते हैं. यह पटना में आकर गंगा में मिल जाती है. बरसात में गंडक भी उफ़ान पर होती है और इसके आसपास के इलाक़े बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं. मध्यप्रदेश में नर्मदा और छत्तीसगढ़ की कुछ नदियों के उफ़ान पर आने पर इनके रास्ते में पड़ने वाले इलाक़े प्रभावित होते हैं. इसी तरह दक्षिण भारत में कावेरी और कृष्णा नदियां भी तबाही मचा देती हैं.

बाढ़ से हर साल करोड़ों का नुक़सान होता है, लेकिन नुक़सान का यह अंदाज़ा वास्तविक नहीं होता. बाढ़ से हुए नुक़सान की सही राशि का अंदाज़ा लगाना आसान नहीं है, क्योंकि बाढ़ से मकान व दुकानें क्षतिग्रस्त होती हैं. फ़सलें तबाह हो जाती हैं. लोगों का कारोबार ठप हो जाता है. बाढ़ के साथ आने वाली बीमारियों की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं पर भी काफ़ी पैसा ख़र्च होता है. लोगों को बाढ़ से नुक़सान की भरपाई में काफ़ी वक्त लग जाता है. यह कहना ग़लत न होगा कि बाढ़ किसी भी देश, राज्य या व्यक्ति को कई साल पीछे कर देती है. बाढ़ से उसका आर्थिक और सामाजिक विकास ठहर जाता है. इसलिए बाढ़ से होने वाले नुक़सान का सही अंदाज़ा लगाना बेहद मुश्किल है. अधिकारिक जानकारी के मुताबिक़ 2008 की कोसी नदी की बाढ़ के कारण करीब 1.500 करोड़ के नुकसान का अनुमान लगाया गया था. भारत में बाढ़ ने सबसे ज्यादा तबाही 1955 में मचाई थी. उसके बाद 1971, 1973, 1977 1978, 1980, 1984, 1988, 1998, 2001, 2004 और 2008 में मचाई थी.

इस साल चीन और पाकिस्तान भी बाढ़ की चपेट में आए हुए हैं. इन दोनों ही देशों में भी बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है. जान व माल का भारी नुक़सान हुआ है. चीन के उत्तर पश्चिमी प्रांत गांसू में आई भीषण बाढ़ ने सैकड़ों लोगों को मौत की नींद सुला दिया और सैकड़ों लोग लापता हो गए. चीन में मूसलाधार बारिश की वजह से बाढ़ के हालात पैदा हो गए और इससे नौ प्रांतों के क़रीब एक करोड़ 70 लाख लोग प्रभावित हुए. बारिश की वजह से 40 हजार से ज्यादा मकान ढह गए और क़रीब सवा लाख मकान क्षतिग्रस्त हो गए.

पाकिस्तान क़रीब 20 फ़ीसदी हिस्सा बाढ़ के पानी में डूब गया है. पाक में बाढ़ से सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं और 60 लाख लोग बेघर हुए हैं. बाढ़ के चलते देश में भुखमरी और बीमारियां फैलने का ख़तरा भी पैदा हो गया है. बाढ़ से पहले पाक अर्थव्यवस्था भी बुरे दौर से गुज़र रही थी. इस साल यहां की आर्थिक विकास दर 4.5 फ़ीसदी थी, लेकिन बाढ़ के चलते यह शून्य से तीन फ़ीसदी के बीच रहने का अनुमान है. बाढ़ से यहां की क़रीब 14 फ़ीसदी कृषि भूमि बर्बाद हो गई है और इससे देश की अर्थव्यवस्था को क़रीब तीन अरब डॉलर का नुक़सान हुआ है.

गौरतलब है कि बांग्लादेश के बाद भारत ही दुनिया का दूसरा सर्वाधिक बाढ़ग्रस्त देश है. 1960 से 1980 के बीच दुनिया में बाढ से जो लोग मरे उनमें से 20 फीसदी भारत से ही थे. विडंबना यह भी है कि पिछले करीब छह दशकों में बाढ़ से होने वाले नुकसान में 50 से 90 गुना बढ़ोतरी हुई है. एक अनुमान के मुताबिक 1953 में जहां कुल नुकसान करीब 50 करोड़ रुपए था, वहीं 1984 में यह 2500 करोड़, 1985 में 4100 करोड़ और 1988 में 4600 करोड़ रुपए हो गया. 1990 के शुरू में कम नुकसान हुआ. 1997 में 800 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था, लेकिन 1999 और 2000 में बाढ़ से ज्यादा तबाही हुई. हर साल बाढ़ से होने वाले जान व माल के नुकसान में बढ़ोतरी ही हो रही है, जो बेहद चिंताजनक है.

देश में कुल 62 प्रमुख नदी प्रणालियां हैं, जिनमें से 18 ऐसी हैं जो अमूमन बाढ़ग्रस्त रहती हैं. उत्तर-पूर्व में असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश तथा दक्षिण में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु बाढ़ग्रस्त इलाके माने जाते हैं. लेकिन कभी-कभार देश के अन्य राज्य भी बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं.

पिछले करीब छह दशकों में देश में 256 बड़े बांध बनाए गए हैं और 154 निर्माणाधीन हैं. साथ ही पिछले करीब दो दशकों से बाढ़ नियंत्रण में मदद के लिए रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना व्यवस्था का भी इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन संतोषजनक नतीजे सामने नहीं आ पा रहे हैं. बाढ़ से निपटने के लिए 1978 में केंद्रीय बाढ़ नियंत्रण बोर्ड का गठन किया गया था. देश के कुल 32.9 करोड़ हेक्टेयर में से क़रीब 4.64 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ प्रभावित इलाक़ों में आता है. इसके बावजूद बाढ़ से ख़तरे वाले 1.64 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र को ही संरक्षित किया गया है. आयोग के मुताबिक़ देश में हर साल क़रीब 4000 अरब घन मीटर बारिश होती है.

हैरत का बात यह भी है कि बाढ़ एक राष्ट्रीय आपदा है, इसके बावजूद इसे राज्य सूची में रखा गया है. इसके तहत केंद्र सरकार बाढ़ से संबंधित कितनी ही योजनाएं बना ले, लेकिन उन पर अमल करना राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है. प्रांतवाद के चलते राज्य बाढ़ से निपटने के लिए पर्याप्त उपाय नहीं कर पाते. एक राज्य की बाढ़ का पानी समीपवर्ती राज्य के इलाक़ों को भी प्रभावित करता है. राज्यों में हर साल बाढ़ की रोकथाम के लिए योजनाएं बनाई जाती हैं, मगर प्रशासनिक लापरवाही के चलते इन योजनाओं पर ठीक से अमल नहीं हो पाता. नतीजतन, यह योजनाएं महज़ काग़जों तक ही सिमट कर जाती हैं. हालांकि बाढ़ को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनमें बाढ़ प्रभावित इलाकों में बांध बनाना, नदियों के कटान वाले इलाक़ों में कटान रोकना, पानी की निकासी वाले नालों की सफ़ाई और उनकी सिल्ट निकालना, निचले इलाक़े के गांवों को ऊंचा करना, सीवरेज व्यवस्था को सुधारना और शहरों में नालों के रास्ते आने वाले अतिक्रमणों को हटाना आदि शामिल है.

क़ाबिले-ग़ौर है कि विकसित देशों में आगजनी, तूफ़ान, भूकंप और बाढ़ के लिए कस्बों का प्रशासन भी पहले से तैयार रहता है. उन्हें पहले से पता होता है कि किस पैमाने पर, किस आपदा की दशा में, उन्हें क्या-क्या करना है. वे बिना विपदा के छोटे पैमाने पर इसका अभ्यास करते रहते हैं. इसमें आम शहरियों के मुखियाओं को भी शामिल किया जाता है. गली-मोहल्ले के हर घर तक यह सूचना मीडिया या डाक के ज़रिये संक्षेप में पहुंचा दी जाती है कि किस दशा में उन्हें क्या करना है. संचार व्यवस्था के टूटने पर भी वे प्रशासन से क्या उम्मीद रख सकते हैं. पहले तो वे इसकी रोकथाम की कोशिश करते हैं. इसमें विशेषज्ञों की सलाह ली जाती है. इस प्रक्रिया को आपदा प्रबंधन कहते हैं. आग तूफान और भूकंप के दौरान आपदा प्रबंधन एक खर्चीली प्रक्रिया है, लेकिन बाढ़ का आपदा नियंत्रण उतना खर्चीला काम नहीं है. इसे बखूबी बाढ आने वाले इलाकों में लागू किया जा सकता है. विकसित देशों में बाढ़ के आपदा प्रबंधन में सबसे पहले यह ध्यान रखा जाता है कि मिट्टी, कचरे वगैरह के जमा होने से इसकी गहराई कम न हो जाए. इसके लिए नदी के किनारों पर खासतौर से पेड़ लगाए जाते हैं, जिनकी जड़ें मिट्टी को थामकर रखती हैं. नदी किनारे पर घर बसाने वालों के बगीचों में भी अनिवार्य रूप से पेड़ लगवाए जाते हैं. जहां बाढ़ का खतरा ज्यादा हो, वहां नदी को और अधिक गहरा कर दिया जाता है. गांवों तक में पानी का स्तर नापने के लिए स्केल बनी होती है.

भारत में भी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए पहले से ही तैयार रहना होगा. इसके लिए जहां प्रशासन को चाक-चौबंद रहने की ज़रूरत है, वहीं जनमानस को भी प्राकृतिक आपदा से निपटने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए. स्कूल, कॉलेजों के अलावा जगह-जगह शिविर लगाकर लोगों को यह प्रशिक्षण दिया जा सकता है. इसमें स्वयंसेवी संस्थाओं की भी मदद ली जा सकती है. इस तरह प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है.

Tuesday, August 31, 2010

जो आज़ादी के बावजूद आज़ाद नहीं थे

फ़िरदौस ख़ान
देशभर में 15 अगस्त को जश्ने-आज़ादी के तौर पर मनाया जाता है, लेकिन इन्हीं खुशनुमा लम्हों के बीच एक ऐसा भी तबक़ा है, जिसके लिए इस दिन का कोई विशेष महत्व नहीं है. चौंकिए नहीं, यह सच है. दरअसल, घुमंतू जातियां के लोग 31 अगस्त को आज़ादी का जश्न मनाते हैं.

ऑल इंडिया विमुक्त जाति मोर्चा के सदस्य भोला का कहना है कि ऐसा नहीं कि हम स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाते, लेकिन सच तो यही है कि हमारे लिए 15 अगस्त की बजाय 31 अगस्त का ज़्यादा महत्व है. वे बताते हैं कि 15 अगस्त 1947 को जब देश आज़ाद हुआ था और लोग खुली फ़िज़ा में सांस ले रहे थे, तब भी घुमंतू जातियों के लोगों को दिन में तीन बार पुलिस थाने में हाज़िरी लगानी पड़ती थी. अगर कोई व्यक्ति बीमार होने पर या किसी दूसरी वजह से थाने में उपस्थित नहीं हो पाता, तो पुलिस द्वारा उसे प्रताड़ित किया जाता था. इतना ही नहीं चोरी या कोई अन्य अपराधिक घटना होने पर भी पुलिस क़हर उन पर टूटता था. यह सिलसिला लंबे अरसे तक चलता रहा. आख़िरकार तंग आकर प्रताड़ित लोगों ने इस प्रशासनिक कुप्रथा के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की और फिर शुरू हुआ सिलसिला लोगों में जागरूकता लाने का. लोगों का संघर्ष रंग लाया और फिर वर्ष 1952 में अंग्रेज़ों द्वारा 1871 में बनाए गए एक्ट संशोधन किया गया. इसी साल 31 अगस्त को घुमंतू जातियों के लोगों को थाने में हाज़िरी लगाने से निजात मिली.

इस समय देशभर में विमुक्त जातियों के 192 कबीलों के क़रीब 20 करोड़ लोग हैं. हरियाणा की क़रीब साढ़े सात फ़ीसद आबादी इन्हीं जातियों की है. इन विमुक्त जातियों में सांसी, बावरिये, भाट, नट, भेड़कट और किकर आदि जातियां शामिल हैं. भाट जाति से संबंध रखने वाले प्रभु बताते हैं कि 31 अगस्त के दिन क़बीले के रस्मो-रिवाज के मुताबिक़ सामूहिक नृत्य का आयोजन किया जाता है. महिलाएं इकट्ठी होकर पकवान बनाती हैं और उसके बाद सामूहिक भोज होता है. बच्चे भी अपने-अपने तरीक़ों से खुशी ज़ाहिर करते हैं. कई क़बीलों में पतंगबाज़ी का आयोजन किया जाता है. जीतने वाले व्यक्ति को समारोह की शोभा माना जाता है. लोग उसे बधाइयां के साथ उपहार पेश करते हैं. इन जातियों के लोगों के संस्थानों में भी 31 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस समारोह मनाए जाते हैं. इन कार्यक्रमों में केंद्रीय मंत्रियों से लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी भी शिरकत करते हैं. इसकी तैयारियों के लिए संगठन के पदाधिकारी इलाक़े के गांव-गांव का दौरा कर लोगों को समारोह के लिए आमंत्रित करते हैं.

हरियाणा के अलावा देश के अन्य राज्यों में भी आदिवासी समाज की अनेक जातियां निवास करती हैं, जिनमें आंध प्रदेश में भील, चेंचु, गोंड, कांडा, लम्बाडी, सुंगली और नायक, असम में बोषे, कचारी मिकिर यानी कार्बी, लंलुग, राथा, दिमासा, हमर और हजोंग, बिहार और झारखंड में झमुर, बंजारा, बिरहोर, कोर्वा, मुंडा, ओरांव, संथाल, गोंड और खंडिया, गुजराज में भील, ढोडिया, गोंड, सिद्दी, बोर्डिया और भीलाला, हिमाचल प्रदेश में गद्दी, लाहुआला और स्वांगला, कर्नाटक में भील, चेंचु, गाउड, कुरूबा, कम्मारा, कोली, कोथा, मयाका और टोडा, केरल में आदियम, कोंडकप्पू, मलैस और पल्लियार, मध्य प्रदेश में भील, बिरहोर, उमर, गोंड, खरिआ, माझी, मुंडा और ओरांव, छत्तीसगढ़ में परही, भीलाला, भीलाइत, प्रधान, राजगोंड, सहरिया, कंवर, भींजवार, बैगा, कोल और कोरकू, महाराष्ट्र में भील, भुंजिआ, चोधरा, ढोडिया, गोंड, खरिया, नायक, ओरावं, पर्धी और पथना, मेघालय में गारो, खासी और जयंतिया, उड़ीसा में जुआंग, खांड, करूआ, मुंडारी, ओरांव, संथाल, धारूआ और नायक, राजस्थान में भील, दमोर, गरस्ता, मीना और सलरिया, तमिलनाडू में इरूलर, कम्मरार, कोंडकप्पू, कोटा, महमलासर, पल्लेयन और टोडा, त्रिपुरा में चकमा, गारो, खासी, कुकी, लुसाई, लियांग और संताल, पश्चिम बंगाल में असुर, बिरहोर, कोर्वा, लेपचा, मुंडा, संथाल और गोंड, मिजोरम में लुसई, कुकी, गारो, खासी, जयंतिया और मिकिट, गोवा में टोडी और नायक, दमन व द्वीप में ढोडी, मिक्कड़ और वर्ती, अंडमान में जारवा, निकोबारी, ओंजे, सेंटीनेलीज, शौम्पेंस और ग्रेट अंडमानी, उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में भाटी, बुक्सा, जौनसारी और थारू, नागालैंड में नागा, कुकी, मिकिट और गारो, सिक्किम में भुटिया और लेपचा तथा जम्मू व कश्मीर में चिद्दंपा, गर्रा, गाुर और गड्डी आदि शामिल हैं. इनमें से अनेक जातियां अपने अधिकारों को लेकर संघर्षरत हैं.

इंडियन नेशनल लोकदल के टपरीवास विमुक्त जाति मोर्चा के ज़िलाध्यक्ष बहादुर सिंह का कहना है कि आज़ादी के छह दशक बाद भी आदिवासी समाज की घुमंतू जातियां विकास से कोसों दूर हैं. वे कहते हैं कि घुमंतू जातियों के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए सरकार को चाहिए कि वे इन्हें स्थाई रूप से आबाद करे. इनके लिए बस्तियां बनाई जाएं और उन्हें आवास मुहैया कराए जाएं. बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा दी जाए. उन्हें एसटी का दर्जा दिया जाए, ताकि उन्हें भी आरक्षण का लाभ मिल सके.

ग़ौरतलब है कि आदिवासी समाज की अधिकतर जातियां आज भी बदहाली की ज़िन्दगी गुज़ारने का मजबूर हैं. ग्रामीण विकास मंत्रालय के एक सर्वेक्षण के मुताबिक़ इन जातियों का आधे से ज़्यादा हिस्सा गरीबी की रेखा से नीचे पाया गया है. इनकी प्रति व्यक्ति आय देश में सबसे नीचे रहती है. एक रिपोर्ट के मुताबिक़ जनजातियों की 9,17,590 एकड़ जनजातीय भूमि हस्तांतरित की गई और ऐसी भूमि का महज़ 5,37,610 एकड़ भूमि ही उन्हें वापस दिलाई गई है.

घुमंतू जातियों की बदहाली के अनेक कारण हैं, जिनमें वनों का विनाश मुख्य रूप से शामिल है. वन जनजातियों के जीवनयापन का एकमात्र साधन हैं, लेकिन वन परिस्थितिकी तंत्रों में जनजातियों और वन के बीच एक अटूट रिश्ता है. ख़त्म हो रहे वन संसाधन, वन जनसंख्या के एक बड़े हिस्से के लिए खाद्य सुरक्षा को जोखिम में डाल रहे हैं. जागरूकता की कमी भी इन जातियों के विकास में रुकावट बनी है. केंद्र सरकार और प्रदेश सरकारों द्वारा शुरू किए गए विभिन्न विकास संबंधी कार्यक्रमों के बारे में घुमंतू जातियों के लोगों को जानकारी नहीं है, जिसके कारण उन्हें योजनाओं का समुचित लाभ नहीं मिल पाता.

ग़ौरतलब है कि पांचवीं पंचवर्षीय योजना से देशभर में जनजातियों के विकास के लिए जनजातीय उप योजना कार्यनीत टीएसपी भी अपनाई गई. इसके तहत अमूमन जनजातियों से बसे संपूण क्षेत्र को उनकी आबादी के हिसाब से कई वर्गों में शामिल किया गया है. इन वर्गों में समेकित क्षेत्र विकास परियोजना टीडीपी, संशोधित क्षेत्र विकास .ष्टिकोण माडा, क्लस्टर और आदिम जनजातीय समूह शामिल हैं. जनजातीय उप योजना दृष्टिकोण कम से कम राज्य में राज्य योजना से जनजातियों की आबादी के अनुपात में और केंद्रीय मंत्रालयों और वित्तीय संस्थाओं के बजट से देश के लिए जनजातीय आबादी के समग्र समानुपात में राज्य योजना के साथ-साथ केंद्रीय मंत्रालयों से जनजातीय क्षेत्रों के लिए निधि आबंटन सुनिश्चित करता है. जनजातीय कार्य मंत्रालय ने अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और विकास पर लक्षित विभिन्न योजनाओं करे कार्यान्वित करना जारी रखा है, लेकिन अफ़सोस की बात यही है कि अज्ञानता, भ्रष्टाचार और लालफ़ीताशाही के चलते ये जातियां सरकारी योजनाओं के लाभ से महरूम हैं. इसके लिए ज़रूरी है कि इन जातियों में जागरूकता अभियान चलाकर उनके चहुंमुखी विकास के लिए कारगर क़दम उठाए जाएं, वरना सरकार की कल्याणकारी योजनाएं कागज़ों तक ही सिमट कर रह जाएंगी.

Monday, August 23, 2010

भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक है रक्षाबंधन

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...रक्षाबंधन के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं...
फ़िरदौस ख़ान
रक्षाबंधन भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक है. यह त्यौहार श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षाबंधन बांधकर उनकी लंबी उम्र और कामयाबी की कामना करती हैं. भाई भी अपनी बहन की रक्षा करने का वचन देते हैं.

रक्षाबंधन के बारे में अनेक कथाएं प्रचलित हैं. भविष्य पुराण में कहा गया है कि एक बार जब देवताओं और दानवों के बीच युद्ध हो रहा था, तो दानवों ने देवताओं को पछाड़ना शुरू कर दिया. देवताओं को कमज़ोर पड़ता देख स्वर्ग के राजा इंद्र देवताओं के गुरु बृहस्पति के पास गए और उनसे मदद मांगी. तभी वहां बैठी इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने मंत्रों का जाप कर एक धागा अपने पति के हाथ पर बांध दिया. इस युद्ध में देवताओं को जीत हासिल हुई. उस दिन श्रावण पूर्णिमा थी. तभी से श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षा सूत्र बांधने की प्रथा शुरू हो गई. अनेक धार्मिक ग्रंथों में रक्षा बंधन का ज़िक्र मिलता है. जब सुदर्शन चक्र से श्रीकृष्ण की अंगुली ज़ख़्मी हो गई थी, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दी थी. बाद में श्रीकृष्ण ने कौरवों की सभा में चीरहरण के वक़्त द्रौपदी की रक्षा कर उस आंचल के टुकड़े का मान रखा था. मेवाड़ की महारानी कर्मावती ने मुग़ल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा की याचना थी . राखी का मान रखते हुए हुमायूं ने मेवाड़ पहुंचकर बहादुरशाह से युद्ध कर कर्मावती और उसके राज्य की रक्षा की थी.

विभिन्न संस्कृतियों के देश भारत के सभी राज्यों में पारंपरिक रूप से यह त्यौहार मनाया जाता है. उत्तरांचल में रक्षा बंधन को श्रावणी के नाम से जाना जाता है. महाराष्ट्र में इसे नारियल पूर्णिमा और श्रावणी कहते हैं, बाकि दक्षिण भारतीय राज्यों में इसे अवनि अवित्तम कहते हैं. रक्षाबंधन का धार्मिक ही नहीं, सामाजिक महत्व भी है. भारत में दूसरे धर्मों के लोग भी इस पावन पर्व में शामिल होते हैं.

रक्षाबंधन ने भारतीय सिनेमा जगत को भी ख़ूब लुभाया है. कई फ़िल्मों में रक्षाबंधन के त्यौहार और इसके महत्व को दर्शाया गया है. रक्षाबंधन को लेकर अनेक कर्णप्रिय गीत प्रसिद्ध हुए हैं. भारत सरकार के डाक-तार विभाग ने भी रक्षाबंधन पर विशेष सुविधाएं शुरू कर रखी हैं. अब तो वाटरप्रूफ़ लिफ़ाफ़े भी उपलब्ध हैं. कुछ बड़े शहरों के बड़े डाकघरों में राखी के लिए अलग से बॉक्स भी लगाए जाते हैं. राज्य सरकारें भी रक्षाबंधन के दिन अपनी रोडवेज़ बसों में महिलाओं के लिए मुफ़्त यातायात सुविधा मुहैया कराती है.

आधुनिकता की बयार में सबकुछ बदल गया है। रीति-रिवाजों और गौरवशाली प्राचीन संस्कृति के प्रतीक पारंपरिक त्योहारों का स्वरूप भी अब पहले जैसा नहीं रहा है। आज के ग्लोबल माहौल में रक्षाबंधन भी हाईटेक हो गया है। वक़्त के साथ-साथ भाई-बहन के पवित्र बंधन के इस पावन पर्व को मनाने के तौर-तरीकों में विविधता आई है। दरअसल व्यस्तता के इस दौर में त्योहार महज़ रस्म अदायगी तक ही सीमित होकर रह गए हैं।

यह विडंबना ही है कि एक ओर जहां त्योहार व्यवसायीकरण के शिकार हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इससे संबंधित जनमानस की भावनाएं विलुप्त होती जा रही हैं। अब महिलाओं को राखी बांधने के लिए बाबुल या प्यारे भईया के घर जाने की ज़रूरत भी नहीं रही। रक्षाबंधन से पहले की तैयारियां और मायके जाकर अपने अज़ीज़ों से मिलने के इंतज़ार में बीते लम्हों का मीठा अहसास अब भला कितनी महिलाओं को होगा। देश-विदेश में भाई-बहन को राखी भेजना अब बेहद आसान हो गया है। इंटरनेट के ज़रिये कुछ ही पलों में वर्चुअल राखी दुनिया के किसी भी कोने में बैठे भाई तक पहुंचाई जा सकती है। डाक और कोरियर की सेवा तो देहात तक में उपलब्ध है। शुभकामनाओं के लिए शब्द तलाशने की भी ज़रूरत नहीं। गैलरियों में एक्सप्रेशंस, पेपर रोज़, आर्चीज, हॉल मार्क सहित कई देसी कंपनियों केग्रीटिंग कार्ड की श्रृंख्लाएं मौजूद हैं। इतना ही नहीं फ़ैशन के इस दौर में राखी भी कई बदलावों से गुज़र कर नई साज-सज्जा के साथ हाज़िर हैं। देश की राजधानी दिल्ली और कला की सरज़मीं कलकत्ता में ख़ास तौर पर तैयार होने वाली राखियां बेहिसाब वैरायटी और इंद्रधनुषी दिलकश रंगों में उपलब्ध हैं। हर साल की तरह इस साल भी सबसे ज़्यादा मांग है रेशम और ज़री की मीडियम साइज़ राखियों की। रेशम या ज़री की डोर के साथ कलाबत्तू को सजाया जाता है, चाहे वह जरी की बेल-बूटी हो, मोती हो या देवी-देवताओं की प्रतिमा। इसी अंदाज़ में वैरायटी के लिए जूट से बनी राखियां भी उपलब्ध हैं, जो बेहद आकर्षक लगती हैं। कुछ कंपनियों ने ज्वैलरी राखी की श्रृंख्ला भी पेश की हैं। सोने और चांदी की ज़ंजीरों में कलात्मक आकृतियों केरूप में सजी ये क़ीमती राखियां धनाढय वर्ग को अपनी ओर खींच रही हैं। यहीं नहीं मुंह मीठा कराने के लिए पारंपरिक दूध से बनी मिठाइयों की जगह अब चॉकलेट के इस्तेमाल का चलन शुरू हो गया है। बाजार में रंग-बिरंगे कागज़ों से सजे चॉकलेटों के आकर्षक डिब्बों को ख़ासा पसंद किया जा रहा है।

कवयित्री इंदुप्रभा कहती हैं कि आज पहले जैसा माहौल नहीं रहा। पहले संयुक्त परिवार होते थे। सभी भाई मिलजुल कर रहते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। नौकरी या अन्य कारोबार के सिलसिले में लोगों को दूर-दराज के इलाकों में बसना पड़ता है। इसके कारण संयुक्त परिवार बिखरकर एकल हो गए हैं। ऐसी स्थिति में बहनें रक्षाबंधन के दिन अलग-अलग शहरों में रह रहे भाइयों को राखी नहीं बांध सकतीं। महंगाई के इस दौर में जब यातायात के सभी साधनों का किराया काफ़ी ज़्यादा हो गया है, तो सीमित आय अर्जित करने वाले लोगों के लिए परिवार सहित दूसरे शहर जाना और भी मुश्किल काम है। ऐसे में भाई-बहन को किसी न किसी साधन के ज़रिये भाई को राखी भेजनी पड़ेगी। बाज़ार से जुड़े लोग मानते हैं कि भौतिकतावादी इस युग में जब आपसी रिश्तों को बांधे रखने वाली भावना की डोर बाज़ार होती जा रही है तो ऐसे में दूरसंचार के आधुनिक साधन ही एक-दूसरे के बीच फ़ासलों को कम किए हुए हैं। आज के समय में जब कि सारे रिश्ते-नाते टूट रहे हैं, सांसारिक दबाव को झेल पाने में असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं. ऐसे में रक्षाबंधन का त्यौहार हमें भाई- बहन के प्यारे बंधन को हरा- भरा करने का मौक़ा देता है. साथ ही दुनिया के सबसे प्यारे बंधन को भूलने से भी रोकता है.

Tuesday, August 17, 2010

प्रकाश स्तंभ जैसी किताब : इंद्रेश कुमार


हमारी किताब ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ में 55 संतों व फ़क़ीरों की वाणी एवं जीवन-दर्शन को प्रस्तुत किया गया है...  इसकी ‘प्रस्तावना’ राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री इंद्रेश कुमार ने लिखी है...इसी प्रस्तावना को यहां प्रकाशित कर रही हूं...

लेखनी विचारों को स्थायित्व प्रदान करती है. इस मार्ग से ज्ञान जन साधारण के मन में घर कर लेता है. अच्छा और बुरा दोनों समान रूप से समाज व मनुष्य के सामने आता रहता है और उसके जीवन में घटता भी रहता है. दोनों में से ही सीखने को मिलता है, आगे बढ़ने का अवसर मिलता है. परंतु निर्भर करता है सीखने वाले के दृष्टिकोण पर ‘आधा गिलास ख़ाली कि आधा गिलास भरा’, ‘बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोई’. अच्छे में से तो अच्छा सीखने को मिलता ही है, परंतु बुरे में से भी अच्छा सीखना बहुत कठिन है. प्रस्तुत पुस्तक ‘गंगा जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ जब समाज में जाति, पंथ, दल, भाषा के नाम पर द्वेष फैल रहा हो, सभ्यताओं के नाम पर टकराव बढ रहा हो, संसाधनों पर क़ब्ज़े की ख़ूनी स्पर्धा हो, ऐसे समय पर प्रकाश स्तंभ के रूप में समाधान का मार्ग दिखाने का अच्छा प्रयास है.

इस्लाम में पांच दीनी फ़र्ज़ बताए गए हैं-(1) तौहीद, (2) नमाज़, (3) हज, (4) रो्ज़ा और (5) ज़कात. परंतु इसी के साथ-साथ एक और भी अत्यंत सुंदर नसीहत दी गई है ‘हुब्बुल वतनी निफसुल ईमान’ अर्थात् वतन (राष्ट्र) से प्यार करना, उसकी रक्षा करना एवं उसके विकास और भाईचारे के लिए काम करना, यह उसका फर्ज़ है. इस संदेश के अनुसार मुसलमान को दोनों यानि मज़हबी एवं वतनी फ़र्ज़ में खरा उतरना चाहिए. हज के लिए मक्का शरीफ़ जाएंगे, परंतु ज़िंदाबाद सऊदी अरब, ईरान, सूडान की नहीं, बल्कि हिन्दुस्तान की बोलेंगे. सर झुकेगा हिंदुस्तान पर, कटेगा भी हिंदुस्तान के लिए.

इसी प्रकार से इस्लाम में अन्य अनेक महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं जैसे ‘लकुम दीनुकुम बलियदीन’ अर्थात् तेरा दीन तेरा, मेरा दीन मेरा, एक-दूसरे के दीन में दख़ल नहीं देंगे, एक-दूसरे के दीन की इज़्ज़त करेंगे. सर्वपंथ समभाव यानी समन्वय यानी आपसी बंधुत्व का बहुत ही ख़ूबसूरत मार्ग है. इसीलिए ऊपरवाले को ‘रब-उल-आलमीन’ कहा गया है न कि ‘रब-उल-मुसलमीन’. उसका सांझा नाम ‘ऊपरवाला’ है. संपूर्ण विश्व के सभी पंथों के लोग हाथ व नज़र ऊपर उठाकर प्रार्थना (दुआ) करते हैं. ‘ऊपरवाले’ को अपनी-अपनी मातृभाषा में पुकारना यानी याद करना. वह तो अंतर्यामी है. वह तो सभी भाषाएं एवं बोलियां जानता है. वह तो गूंगे की, पत्थर की, कीट-पतंग की भी सुनता है, जो कि आदमी (मनुष्य) नहीं जानता है. अंग्रेज़ी-लेटिन में उसे God, अरबी में अल्लाह, तुर्की में तारक, फ़ारसी में ख़ुदा, उर्दू में रब, गुरुमुखी में वाहे गुरु, हिंदी-संस्कृत-असमिया-मणिपुरी-कश्मीरी-तमिल-गुजराती-बंगला-मराठी-नेपाली-भोजपुरी-अवधी आदि में भी पुकारते हैं भगवान, ईश्वर, परमात्मा, प्रभु आदि. ऊपरवाला एक है, नाम अनेक हैं. गंतव्य व मंतव्य एक है, मार्ग व पंथ अनेक हैं. भारतीय संस्कृति का यही पावन संदेश है. अरबी भाषा में ‘अल्लाह-हु-अकबर’ को अंग्रेज़ी में God is Great, हिन्दी में ‘भगवान (ईश्वर) महान है’ कहेंगे. इसी प्रकार से संस्कृत के ‘वंदे मातरम्’ को अंग्रेज़ी में Salute to Motherland और उर्दू में मादरे-वतन ज़िंदाबाद कहेंगे. इसी प्रकार से अरबी में ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ को संस्कृत में ‘खल्विंदम इदम सर्व ब्रह्म’ एवं हिंदी में कहेंगे प्रभु सर्वशक्तिमान है, सर्वज्ञ है और वह एक ही है, उर्दू में कहेंगे कि ख़ुदा ही सब कुछ है, ख़ुदा से ही सब कुछ है.

हज़रत मुहम्मद साहब ने बुलंद आवाज़ में कहा है कि मेरे से पूर्व ख़ुदा ने एक लाख 24 हज़ार पैग़म्बर भेजे हैं. वे अलग-अलग समय पर, अलग-अलग प्रकार के हालात में, अलग-अलग धरती (देश) पर आए हैं. उनकी उम्मतें भी हैं, किताबें भी हैं. अनेक उम्मतें आज भी हैं. इस हदीस की रौशनी में एक प्रश्न खड़ा होता है कि वे कौन हैं? कु़रान शरीफ़ में 25 पैग़म्बरों का वर्णन मिलता है, जिसमें से दो पैग़म्बर ‘आदम और नूह’ भारत आए हैं, जिन्हें पहला एवं जल महाप्रलय वाला मनु कहा व माना जाता है. मुसलमान उम्मत तो पैग़म्बर साहब की हैं, परंतु प्रत्येक पैग़म्बर का सम्मान करना सच्चे मुसलमान का फ़र्ज़ बनता है. इसलिए गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदत्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥

अर्थात् जब-जब मानवता (धर्म) नष्ट होती है, दुष्टों के अत्याचार बढते हैं, तब मैं समय-समय पर धर्म (सज्जनता) की स्थापना हेतु आता हूं.

एक बात स्वयं रसूल साहब कहते हैं कि मुझे पूर्व से यानी हिमालय से यानी हिंदुस्तान से ठंडी हवाएं आती हैं, यानी सुकून (शांति) मिलता है. भारत में भारतीय संस्कृति व इस्लाम के जीवन मूल्यों को अपनी ज़िंदगी में उतारकर कट्टरता एवं विदेशी बादशाहों से जूझने वाले संतों व फ़क़ीरों की एक लंबी श्रृंखला है, जो मानवता एवं राष्ट्रीयता का पावन संदेश देते रहे हैं. बहुत दिनों से इच्छा थी कि ऐसे श्रेष्ठ भारतीय मुस्लिम विद्वानों की वाणी एवं जीवन समाज के सामने आए, ताकि आतंक, मज़हबी कट्टरता, नफ़रत, अपराध, अनपढ़ता आदि बुराइयों एवं कमियों से मुस्लिम समाज बाहर निकलकर सच्ची राष्ट्रीयता के मार्ग पर तेज़ गति व दृढ़ता से आगे बढ़ सके. कहते हैं ‘सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं’. इन संतों व फ़क़ीरों ने तो राम व कृष्ण को केंद्र मान सच्ची इंसानियत की राह दिखाई है. किसी शायर ने कहा है-
मुश्किलें हैं, मुश्किलों से घबराना क्या
दीवारों में ही तो दरवाज़े निकाले जाते हैं

शेख़ नज़ीर ने तो दरगाह और मंदिर के बीच खड़े होकर कहा-
जब आंखों में हो ख़ुदाई, तो पत्थर भी ख़ुदा नज़र आया
जब आंखें ही पथराईं, तो ख़ुदा भी पत्थर नज़र आया

इस नेक, ख़ुशबू एवं ख़ूबसूरती भरे काम को पूर्ण करने के लिए मेरे सामने थी मेरी छोटी बहन एवं बेटी सरीखी फ़िरदौस ख़ान. जब मैंने अपनी इच्छा व्यक्त की, तो उसने कहा कि भैया यह तो ऊपरवाले ने आपके द्वारा नेक बनो और नेक करो का हुकुम दिया है, मैं इस कार्य को अवश्य संपन्न करूंगी. ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ पुस्तक में ऐसे ही 55 संतों व फ़क़ीरों की वाणी एवं जीवन प्रकाशित किया गया है. लेखिका चिन्तक है, सुधारवादी है, परिश्रमी है, निर्भय होकर सच्चाई के नेक मार्ग पर चलने की हिम्मत रखती है. विभिन्न समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं में नानाविध विषयों पर उसके लेख छपते रहते हैं. ज़िंदगी में यह पुस्तक लेखिका को एवं समाज को ठीक मिशन के साथ मंज़िल की ओर बढ़ने का अवसर प्रदान करेगी. सफ़लताओं की शुभकामनाओं के साथ मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा उस पर उसकी कृपा सदैव बरसती रहे.

भारत के ऋषि, मुनियों अर्थात् वैज्ञानिकों एवं विद्वानों ने वैश्विक स्तर पर बंधुत्व बना रहे इसके लिए हंजारों, लाखों वर्ष पूर्व एक सिध्दांत यानि सूत्र दिया गया था ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ यानि World is one family यानी ‘विश्व एक परिवार है’. परिवार का भाव एवं व्यवहार ही अधिकतम समस्याओं के समाधान का उपाय है. भारत वर्ष में समय-समय पर अनेक पंथ (मत) जन्मते रहे और आज भी जन्म रहे हैं. इन सब पंथों के मानने वालों का एक-दूसरे पंथ में आवागमन कभी भी टकराव एवं देश के प्रति, पूर्वजों के प्रति अश्रध्दा का विषय नहीं बना. जब इस्लाम जो कि भारत के बाहर से आया और धीरे-धीरे भारी संख्या में भारतीय समाज अलग-अलग कारणों से इस्लाम में आ गया, तो कुछ बादशाहों एवं कट्टरपंथियों द्वारा इस आड़ में अरबी साम्राज्य के विस्तार को भारत में स्थापित करने के प्रयत्न भी किए जाने लगे, जबकि सत्य यह है कि 99 प्रतिशत मुस्लिमों के पूर्वज हिंदू ही हैं. उन्होंने मज़हब बदला है न कि देश एवं पूर्वज और न ही उनसे विरासत में मिली संस्कृति (तहज़ीब) बदली है. इसलिए भारत के प्राय: सभी मुस्लिम एवं हिंदुओं के पुरखे सांझे हैं यानी समान पूर्वजों की संतति है. इसी ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ को भारत में एक और नया नाम मिला ‘गंगा जमुनी तहज़ीब’. गंगा और यमुना दोनों नदियां भारतीय एवं भारतीयता का प्रतीक हैं, इनका मिलन पवित्र संगम कहलाता है, जहां नफ़रत, द्वेष, कट्टरता, हिंसा, विदेशियत नष्ट हो जाती है. मन एवं बुध्दि को शांति, बंधुत्व, शील, ममता, पवित्रता से ओत-प्रोत करती है. आज हिंदुस्तान के अधिकांश लोग इसी जीवन को जी ना चाहते हैं. ख़ुशहाल एवं शक्तिशाली हिंदुस्तान बनाना व देखना चाहते हैं.

मुझे विश्वास है कि प्रकाश स्तंभ जैसी यह पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ सभी देशवासियों को इस सच्ची राह पर चलने की हिम्मत प्रदान करेगी.
-इंद्रेश कुमार

(लेखक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक हैं. साथ ही हिमालय परिवार, राष्ट्रवादी मुस्लिम आंदोलन, भारत तिब्बत सहयोग मंच, समग्र राष्ट्रीय सुरक्षा मंच आदि के मार्गदर्शक एवं संयोजक हैं)


किताब का नाम : गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत
लेखिका : फ़िरदौस ख़ान
पेज : 172
क़ीमत : 200 रुपये

प्रकाशक
ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह) 
205 -सी, चावड़ी बाज़ार
दिल्ली-110006

प्रभात प्रकाशन
 4/19, आसफ़ अली रोड
दरियागंज
नई दिल्ली-110002
फ़ोन : 011 2328 9555

Ganga jamuni sanskriti ke agradoot written by Firdaus Khan