Monday, May 2, 2011

ऑनर किलिंग पर इबरतनाक फ़ैसला...


फ़िरदौस ख़ान
उत्तर प्रदेश में ऑनर किलिंग मामले में दोषी को फांसी की सख्त सज़ा दिए जाने से इस तरह की दिल दहला देने वाली वारदातों पर कुछ अंकुश लगेगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है. इस फ़ैसले ने जहां समाज को यह संदेश दिया है कि क़ानून से ऊपर कुछ भी नहीं है, वहीं  सामाजिक कुरीतियों के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे लोगों का मनोबल भी बढ़ाया है.

क़ाबिले-गौर है कि रामपुर ज़िले के गांव क्रमचा निवासी शौकत सैफ़ी की बेटी नसीम जहां गांव के ही अपने प्रेमी यासीन से निकाह करना चाहती थी. प्रेमी के भुर्जी बिरादरी का होने की वजह से शौकत को यह रिश्ता मंज़ूर नहीं था. इसलिए नसीम पिता का घर छोड़कर प्रेमी के घर चली गई. बाद में शौकत उसे वापस घर लाया और उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन जब वह मानी तो उसे धारदार हथियार से बेटी की गर्दन काट दी और पेट फाड़ डाला. नसीम की मौक़े पर ही मौत हो गई थी. यह मामला 19 जून 2009 का है. अपर सत्र न्यायाधीश कामिनी पाठक ने अपने फैसले में चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा कि बेटियां घर में ही सुरक्षित नहीं हैं और बेटी की हत्या करना बर्बरतापूर्ण कृत्य है. ऐसा करने वाले को फांसी देना ज़रूरी है.    

इससे पहले बीती मई में दिल्ली की एक अदालत ने ऑनर किलिंग को संपूर्ण नारीत्व के सम्मान पर हमला क़रार देते हुए एक ही परिवार के तीन सदस्यों को फांसी की सज़ा सुनाई थी. मामले के मुताबिक़ 1516 अक्टूबर 2007 को उर्मिला की तीन नाबालिग बच्चों की आंखों के सामने उसके पति सुरेंदर सिंह, सास और देवर ने हत्या कर दी थी. 

इसी तरह  इसी तरह बीते माह मई में सुप्रीम कोर्ट ने 'ऑनर किलिंग' के मामले में सुनवाई करते हुए कहा था कि इज़्ज़त के नाम पर हो रही हत्या राष्ट्र पर कलंक है और यह बर्बर और सामंती प्रथा है जिसे ख़त्म किया जाना चाहिए. उसने सभी अदालतों को निर्देश दिए कि ऑनर किलिंग को दुर्लभतम मामलों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए और मौत की सज़ा देनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसा असभ्य व्यवहार करने वालों के लिए ऐसे उपाय ज़रूरी हैं. जो भी व्यक्ति ऑनर किलिंग का षडयंत्र रचने जा रहा है उसे अंदाज़ा होना चाहिए कि फांसी का तख़्ता उसका इंतज़ार कर रहा है.

मामले के मुताबिक़ भगवान दास की अपनी बेटी से बहुत नाराज़ थे, क्योंकि उसने अपने पति को छोड़ दिया था और उसने अपने एक चचेरे भाई से संबंध बना लिए थे. इसकी वजह से 16 मई, 2006 को बिजली के तार से गला घोंटकर अपनी बेटी की हत्या कर दी थी. इस मामले में हाईकोर्ट ने उसे उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई थी. हाईकोर्ट के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फ़ैसले को बरक़रार रखा और भगवान दास के इस तर्क को ख़ारिज कर दिया कि केवल परिस्थिति जन्य साक्ष्य के आधार पर सज़ा नहीं दी जा सकती.

बीते अप्रैल माह में भी सुप्रीम कोर्ट ने ऑनर किलिंग या इज्ज़त के नाम पर हत्याओं के ख़िलाफ़ सख़्त रूख अपनाते हुए कहा था कि इस कुप्रथा को बिना किसी रियायत के जड़ से उखाड़ फेंकना होगा.

पिछले साल हरियाणा के करनाल के सत्न न्यायालय ने मनोज-बबली हत्याकांड के पांच दोषियों को फांसी और एक को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई थी. अदालत ने 25 मार्च को इस मामले में तथाकथित खाप नेता गंगा राज और बबली के पांच परिजनों को क़त्ल का कसूरवार ठहराया था. कैथल ज़िले के करोडन गांव के मनोज ने क़रीब तीन साल पहले 18 मई 2007 को बबली के घरवालों के विरोध के बावजूद उससे शादी की थी. दोनों के समान गोत्न का होने के कारण खाप पंचायत ने इस विवाह का विरोध किया और मनोज के परिवार के सामाजिक बहिष्कार का फैसला सुना दिया. शादी के बाद मनोज और बबली करनाल में जाकर रहने लगे, लेकिन अब भी उनकी मुसीबतें अब भी कम नहीं उन्हें शादी तोड़ने के लिए कहा जाने लगा. जब उन्होंने इनकार कर दिया तो उन्हें धमकियां मिलने लगीं और 15 जून 2007 को उनकी बेरहमी से ह्त्या कर दी गई थी. इनके शव बाद में 23 जून को बरवाला ब्रांच नहर से बरामद हुए थे. क़रीब तीन साल तक चले इस मामले में लगभग 50 सुनवाइयां हुईं तथा इस दौरान 40 से ज्यादा गवाहों के बयान दर्ज किए गए थे.

प्राचीनकाल से ही भारत में सामाजिक, राजनीतिक अन्य मामलों में पंचायत की अहम भूमिका रही है. पहले हर छोटे बड़े फ़ैसले पंचायत के ज़रिये ही निपटाए जाते थे. गांवों में आज भी पंचायतों का बोलबाला है. पंचायतों दो प्रकार की होती हैं. एक लोकतांत्रिक प्रणाली द्वारा चुनी गई पंचायतें और दूसरी खाप पंचायतें. दरअसल, खाप या सर्वखाप एक सामाजिक प्रशासन की पद्धति है, जो भारत के उत्तर पश्चिमी प्रदेशों यथा उत्तर भारत विशेषकर हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में प्रचलित हैं. ये पंचायतें पिछले काफ़ी वक़्त से अपने के फ़ैसलों को लेकर सुर्ख़ियों में रही हैं. बानगी देखिये :

20 मार्च 1994 को झज्जर ज़िले के नया गांव में मनोज आशा को मौत की सज़ा मिली. परिजनों ने खाप पंचायतों की हरी झंडी मिलने के बाद दोनों प्रेमियों को मौत की नींद सुला दिया. वर्ष 1999 में भिवानी के देशराज निर्मला को पंचायत के ठेकेदारों को ठेंगा दिखाकर प्रेम-प्रसंग जारी रखने की क़ीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. दोनों की पत्थर मारकर हत्या कर दी गई.  

वर्ष 2000 में झज्जर ज़िले के जोणधी गांव में हुई पंचायत ने आशीष दर्शना को भाई-बहन का रिश्ता क़ायम करने का फ़रमान सुनाया, जबकि उनका एक बच्चा भी था. वर्ष 2003 में जींद ज़िले के रामगढ़ गांव में दलित युवती मीनाक्षी ने सिख समुदाय के लड़के से प्रेम विवाह कर लिया. चूंकि क़दम लड़की ने बढ़ाया था,

लिहाज़ा उसे पंचायती लोगों ने मौत की सज़ा सुना दी. साहसी प्रेमी जोड़े ने कोर्ट की शरण लेकर विवाह तो कर लिया, लेकिन उन्हें दूसरे राज्य में जाकर गुमनामी की जिंदगी गुज़ारनी पड़ी. वर्ष 2005 के दौरान झज्जर ज़िले के आसंडा गांव में रामपाल सोनिया को भी पति-पत्नी से भाई-बहन बनने का फ़रमान सुना दिया. राठी दहिया गोत्र के बीच अटका यह मामला भी लंबा खिंचा. आख़िर  रामपाल को अदालत की शरण लेनी पड़ी. क़रीब पौने तीन साल की अदालती लड़ाई के बाद रामपाल की जीत हुई, लेकिन खाप पंचायतों का खौफ़ उन्हें आज भी है. 

करनाल ज़िले के बल्ला गांव में भी 9 मई 2008 को एक प्रेमी जोड़े को पंचायत के ठेकेदारों की शह पर मौत के घात उतार दिया गया. जस्सा सुनीता भी एक ही गोत्र से थे. दोनों ने पंचायत की परवाह करते हुए शादी कर ली, मगर कुछ समय बाद ही दोनों की बेरहमी से हत्या कर दी गई.

अप्रैल 2009 के दौरान कैथल ज़िले के करोड़ गांव में विवाह रचाने वाले मनोज बबली को मौत की नींद सुला दिया गया. दोनों एक ही गोत्र के थे. उन्हें बुरा अंजाम भुगतने की धमकी दी गई थी, लेकिन इसकी परवाह करते हुए उन्होंने विवाह कर लिया था. बाद में दोनों को बस से उतारकर मार दिया गया.

अप्रैल 2009 के दौरान कैथल ज़िले के करोड़ गांव में विवाह रचाने वाले मनोज बबली को मौत की नींद सुला दिया गया. दोनों एक ही गोत्र के थे. उन्हें बुरा अंजाम भुगतने की धमकी दी गई थी, लेकिन इसकी परवाह करते हुए उन्होंने विवाह कर लिया था. बाद में दोनों को बस से उतारकर मार दिया गया. हिसार ज़िले के मतलौडा गांव में मेहर और सुमन की प्रेम करने की चेतावनी दी गई. कई दिनों तक लुका-छिपी चलती रही, लेकिन आख़िर में उन्हें भी मौत की नींद सुला दिया गया.  नारनौल ज़िले के गांव बेगपुर में गोत्र विवाद के चलते युवक के परिवार का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया. बाद में पंचायत ने फ़ैसला सुनाया कि नवदंपत्ति को सदैव के लिए गांव छोड़ना होगा. आख़िर विजय अपनी पत्नी रानी को लेकर हमेशा के लिए गांव से चला गया. जुलाई 2009 के दौरान जींद जिले के गांव सिंहवाल में अपनी पत्नी को लेने पहुंचे वेदपाल की कोर्ट के वारंट अफसर पुलिस की मौजूदगी में पीट-पीट कर हत्या कर दी गई. मट्टौर निवासी वेदपाल पर पंचायत ने आरोप लगाया था कि उसने गोत्र के ख़िलाफ़ जाकर सोनिया से शादी की है. 

झज्जर ज़िले के सिवाना गांव में भी अगस्त 2009 में गांव के ही युवक-युवती का प्रेम-प्रसंग पंचायत को बुरा लगा. एक दिन दोनों के शव पेड़ पर लटकते मिले. रोहतक ज़िले के खेड़ी गांव में शादी के साल बाद सतीश कविता को भाई-बहन बनने का फ़रमान सुना दिया गया. पति-पत्नी को अलग कर दिया गया और युवक के पिता आज़ाद सिंह के मुंह में जूता ठूंसा गया था. उनका एक बच्चा भी है. इस मुद्दे पर हाईकोर्ट ने स्वयं संज्ञान लेते हुए सरकार को नोटिस जारी किया था. अदालत ने 11 फ़रवरी को उन पंचायतियों के नाम मांगे हैं, जिन्होंने यह फ़तवा जारी किया था. इस संबंध में कविता ने एसपी अनिल राव को शिकायत भी दर्ज करा दी थी. पुलिस ने विभिन्न धाराओं के तहत मामला भी दर्ज कर लिया है. हालांकि पुलिस ने अभी तक आरोपियों के नाम उजागर नहीं किए हैं. हालांकि पांच फरवरी को बेरवाल-बैनीवाल खाप की सांझा पंचायत के बाद सतीश-कविता का रिश्ता बहाल कर दिया था. जूता मुंह में दिए जाने की भी निंदा की गई थी. इस पंचायत ने भी कविता के गांव खेड़ी में प्रवेश पर रोक लगाई है. इस पंचायत ने कविता द्वारा पुलिस को की गई शिकायत वापस लेने के भी कहा था. दोनों पक्षों ने बेरवाल-बैनीवाल खाप पंचायत के फ़ैसले को स्वीकार करने की घोषणा कर दी थी. इसके बावजूद हाईकोर्ट के दख़ल के कारण इस मुद्दे पर अभी असंमजस की स्थिति बनी हुई है. इस माले में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस मुकुल मुदगल जस्टिस जसबीर सिंह की खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा था-खाप पंचायतों को इस तरह का कोई अधिकार नहीं है कि वे किसी दंपत्ति को भाई-बहन बना दें और जो उसके आदेश का पालन करे, उसे मौत के घाट उतार दें.

यह एक सामाजिक बुराई है. इन खाप पंचायतों को समानांतर न्याय पालिका चलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती. वैसे खाप पंचायतों द्वारा दिए गए फ़ैसलों के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट की खंडपीठ का रुख़ सदा कड़ा ही रहा है. इस मामले में पहले भी हाईकोर्ट हरियाणा सरकार से यह पूछ चुका है कि वह क़ानून के ख़िलाफ़ काम करने वाली तुगलकी फ़रमान जारी करने वाली खाप पंचायतों के ख़िलाफ़ कार्रवाई क्यों नहीं कर रही. हाईकोर्ट ने कहा था कि इन पंचायतों द्वारा इस तरह के आदेश जारी करना गैर क़ानूनी है. इस तरह के आदेश कंगारू ला की तरह हैं और उनको रोकना ज़रूरी है. यह अफ़गानिस्तान नही है, यह भारत है. यहां पर तालिबान कोर्ट को मान्यता नहीं दी जा सकती. चीफ जस्टिस ने यह बात उस वकील को कही थी जिसने कोर्ट में एक जवाब दाख़िल कर खाप पंचायतों के क़दम उनकी कार्रवाई को सही ठहराया था.


क़ाबिले-गौर है कि इस तरह के मुद्दे हमेशा से ही सरकार के लिए भी परेशानी का सबब बने हैं, क्योंकि वोट बैंक के चलते सियासी दल इन मामलों से दूर ही रहते हैं. राज्य में क़रीब 22 फ़ीसदी जाट वोट बैंक है. यही वजह कि राज्य सरकार किसी की भी हो खाप पंचायतों के आगे घुटने टेकती है. यही वजह है कि मौत तक के फ़रमान जारी हुए और उन पर अमल हुआ. पुलिस को गवाह तक ढूंढना मुश्किल होता है. ऊपर से सियासी दबाव अलग काम करता है. इसलिए  खाप पंचायतों की तानाशाही के सामने प्रशासन भी बेबस नज़र आता है. हरियाणा में इन पंचायतों का इतना खौफ़ है कि पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में परिजनों से जान का ख़तरा बताने वाले प्रेमी जोड़ों की याचिकाओं की तादाद दिनोदिन बढ़ रही है. पिछले साल 3739 याचिकाएं हाईकोर्ट में आईं और इस साल अभी 28 याचिकाएं चुकी हैं, जिनमें अपने परिजनों से ही जान का ख़तरा बताते हुए सुरक्षा की गुहार लगाई गई है.  खाप पंचायतों के फ़ैसले से आहत हुए सतीश और कविता का कहना था कि शादी के तीन साल बाद उन्हें भाई-बहन बनने के लिए कहा जा रहा है. मेरे ससुर के मुंह में जूता डाला जाता है, बेटे रौनक के 'दादा' को 'नाना' बनने के लिए कहा जाता है. खाप पंचायतों के फ़रमानों का ख़ामियाज़ा भुगतने वाले झज्जर के आसंडा निवासी रामपाल सोनिया का कहना था कि वक़्त के साथ पंचायतों को बदलना होगा. पंचायत ने हम दोनों को शादी के बाद भाई-बहन बनने का फ़रमान जारी कर दिया था. खाप पंचायतों के प्रतिनिधि परंपराओं के नाम पर ख़ुद के अहं को ऊपर रखते हैं.

उधर, खाप पंचायतों के प्रतिनिधि के भी ख़ुद को सही बताते हुए अनेक तर्क देते हैं. उनका कहना है कि हिन्दू मेरिज एक्ट में संशोधन होना चाहिए और एक गोत्र तथा एक गांव में शादी को क़ानून अनुमति नहीं मिलनी चाहिए. सर्व खाप महम चौबीसी के प्रधान रणधीर सिंह कहते हैं हिन्दू मेरिज एक्ट में ख़ासकर उत्तर हरियाणा की परंपराओं का कोई उल्लेख नहीं है. उन्हें प्रेम करने वालों से ऐतराज़ नहीं है, लेकिन जहां भाई-बहन का रिश्ता माना जाता है वहां पति-पत्नी का संबंध जोड़ना उचित नहीं है. इसलिए इससे बचा जाना चाहिए. अलग-अलग गांवों के युवा शादी करते हैं तो उन्हें दिक्क़त नहीं है. उन्होंने कहा कि सतीश और कविता के मामले में खाप पंचायत ने नरमी दिखाई है.

गौरतलब है कि गैर सरकारी संगठन लायर फार ह्यूमन राइट इंटरनेशनल ने हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दाख़िल कर खाप पंचायतों द्वारा गैर क़ानूनी तानाशाही आदेश जारी करने के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने इन खाप पंचायतों पर रोक लगाने की मांग की है. साथ ही याचिका में कहा गया है कि सिंगवाल नरवाना में खाप पंचायत द्वारा मारे गए युवक वेदपाल के मामले की जांच के लिए वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी की अगुवाई में एक एसआईटी बनाई जाए जो हाईकोर्ट की निगरानी में काम करे. इस मामले की सुनवाई के लिए एक स्पेशल कोर्ट भी बनाई जाए जो इस मामले में शामिल लोगों को जल्दी सज़ा दे सके. बहरहाल, खाप पंचायतों की तानाशाही फ़रमानों से परेशान प्रेमी जोड़ों को आस बंधी है कि वो ख़ुशी-ख़ुशी अपनी ज़िंदगी बसर कर सकते हैं.

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से उन लोगों को कुछ सबक ज़रूर मिलेगा, जो इज्ज़त के नाम पर महिलाओं पर ज़ुल्म ढहाते हैं.   

Saturday, January 8, 2011

नाख़ुदा जिनका नहीं, उनका ख़ुदा होता है...

फ़िरदौस ख़ान
किश्तियां सबकी पहुंच जाती हैं साहिल तक
नाख़ुदा जिनका नहीं उनका ख़ुदा होता है
जी, हां इन्हीं शब्दों को सार्थक कर रहे हैं हरियाणा के हिसार ज़िले के गांव कैमरी में स्थित श्रीकृष्ण प्रणामी बाल सेवा आश्रम के संस्थापक बाबा दयाल दास। क़रीब 40 साल पहले बाबा दयाल दास को रास्ते में एक बेसहारा बच्चा मिला था, जिसे उन्होंने अपना लिया। और फिर यहीं से शुरू हुआ बेसहारा बच्चों को सहारा देने का सिलसिला। बाबा अनाथ और बेसहारा बच्चों को जहां माता और पिता दोनों का प्यार दे रहे हैं, वहीं मार्गदर्शक बनकर उनमें ज़िन्दगी की मुश्किल राहों में निरंतर आगे बढ़ते हुए जन सेवा की अलख जगा रहे हैं। एक छोटी-सी कुटिया से शुरू हुए इस आश्रम में आज क़रीब 150 लोग रह रहे हैं, जिनमें 63 लड़के-लड़कियां शामिल हैं। सभी एक परिवार की तरह रहते हैं।

बाबा बताते हैं कि पहले आश्रम का नाम निजानंद अनाथ आश्रम रखा गया था, लेकिन बाद में बदलकर श्रीकृष्ण प्रणामी बाल सेवा आश्रम कर दिया गया। वह कहते हैं कि वह नहीं चाहते कि किसी भी तरह बच्चों को 'अनाथ' होने का अहसास हो। आश्रम में हरियाणा के अलावा पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और नेपाल तक के बच्चे हैं। बच्चों को घर जैसा माहौल देने की पूरी कोशिश की जाती है। बच्चों को स्कूल और कॉलेज की शिक्षा दिलाई जाती है। उच्च शिक्षा हासिल कर अनेक बच्चे आज बेहतर ज़िन्दगी जी रहे हैं। कई तो सरकारी सेवा में भी गए हैं। अध्यापक हरिदास बताते हैं कि यहां पर बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए हरसंभव प्रयास किए जाते हैं। बच्चों की सभी सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जाता है, ताकि उन्हें कभी किसी चीज़ की कोई कमी महसूस न हो।

रमेश प्रणामी बताते हैं कि दो साल की उम्र में वह इस आश्रम में लाए गए थे। यहां उन्हें परिवार का प्यार मिला। गांव के ही स्कूल से उन्होंने दसवीं कक्षा पास की। इसके बाद हिसार के दयानंद कॉलेज से स्नातक की। उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया। फिर पंजाब विश्वविद्यालय से नेचरोपैथी में डिप्लोमा किया। इस वक्त वह हिसार में श्रीकृष्ण प्रणामी योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान चला रहे हैं। उनका विवाह हो चुका है। आश्रम से उन्हें इतना लगाव है कि किसी न किसी रूप में वह आज भी आश्रम से जुड़े हुए हैं। वह कहते हैं कि यह आश्रम तो उनका घर है, इससे वह कभी दूर नहीं हो सकते। वह बताते हैं कि दसवीं तक की शिक्षा उन्हें आश्रम ने ही दिलवाई। इसके बाद की शिक्षा उन्हें पार्ट टाइम जॉब करके पूरी की। मगर अब ऐसा नहीं है। आश्रम में लड़कों को उच्च शिक्षा दिलाई जाती है। वह बताते हैं कि जो लड़कियां पढ़ना चाहती हैं उन्हें भी उच्च शिक्षा दिलाई जाती है, लेकिन जो लड़कियां आगे पढ़ना नहीं चाहतीं, उनका विवाह करा दिया जाता है। अभी तक आश्रम की आठ लड़कियों का अच्छे परिवारों में विवाह कराया जा चुका है। ये लड़कियां अपनी ससुराल में ख़ुशहाल ज़िन्दगी बसर कर रही हैं।

आश्रम में रह रहे बच्चे किसी भी तरह आम बच्चों से अलग नहीं हैं। वे बाबा को अपना पिता और आश्रम को घर मानते हैं। मनमोहन, आदित्य, संदीप और हेमंत कहते हैं कि आश्रम ही उनका घर है और बाबा ही उनके पिता हैं। स्कूलों में पिता के नाम की जगह बाबा का ही नाम लिखा हुआ है। यहां उनकी सुख-सुविधाओं का अच्छे से ख्याल रखा जाता है। आश्रम में रह रही लड़कियां भी घर के काम-काज भी सीखती हैं। वे भोजन आदि बनाने में रसोइयों की मदद करती हैं, ताकि वे भी स्वादिष्ट भोजन बनाना सीख सकें। किरण, सोनिया, गीता और बबीता का कहना है कि उन्हें रसोइयों की मदद करना अच्छा लगता है, क्योंकि इससे उन्हें काफ़ी कुछ सीखने को मिलता है। आश्रम में रह रही बुज़ुर्ग महिलाओं के साथ उन्हें नानी-दादी का प्यार मिलता है। अनाथ बच्चों के अलावा आश्रम में उन बुजुर्ग़ों को भी आश्रय दिया जाता है, जिन्हें उम्र के आख़िरी पड़ाव में एक अदद छत की तलाश है। ये बुज़ुर्ग यहां आकर संतुष्ट हैं। फूला देवी कहती हैं कि यहां वह बहुत ख़ुश हैं।

बाबा दयाल दास बताते हैं कि आश्रम का सारा ख़र्च श्रध्दालुओं द्वारा दिए गए दान से चलता है। आश्रम में गऊशाला भी है, जिसमें क़रीब 60 गायें हैं। गायों की सेवा आश्रम में रहने वाले लोग ही करते हैं। आश्रम में अनाथ बच्चों के पालन-पोषण की सेवा का कार्य सुशीला प्रणामी कर रही हैं।

जहां ख़ून के रिश्ते साथ छोड़ जाते हैं, वहां बाबा दयाल दास जैसे जनसेवक आगे बढ़कर उनका हाथ थाम लेते हैं। सच ऐसे ही लोग तो सच्चे जनसेवक कहलाते हैं।

Tuesday, December 21, 2010

छोटी प्याज़ ने बड़ों-बड़ों को रुलाया

फ़िरदौस ख़ान
आख़िर एक बार फिर प्याज़ अवाम को महंगाई के आंसू रुला रही है. अभी दो दिन पहले देशभर की मंडियों में प्याज़ 20 रुपये किलो मिल रही थी. लेकिन जैसे ही ख़बरिया चैनलों ने चिल्ला-चिल्लाकर बताना शुरू किया कि देश की राजधानी दिल्ली में प्याज़ 80 से 100 किलो रुपये बिक रही है तो कुछ ही घंटों में देशभर में प्याज़ की क़ीमत आसमान छूने लगी. आड़तियों ने प्याज़ की जमाखोरी शुरू कर दी.

गौरतलब है कि देशभर में प्याज़ की क़ीमतें पिछले कुछ दिनों में भारी इज़ाफ़ा हुआ है. महाराष्ट्र का नासिक जो प्याज़ का सबसे बड़ा उत्पादन केंद्र है वहां भी प्याज़ 70 रुपये किलो बिक रही है, जबकि राजधानी दिल्ली में प्याज़ की क़ीमतें 80 से सौ रुपये तक पहुंच गई है. क़ाबिले-गौर है कि 1998 में प्याज़ की आसमान बढ़ी क़ीमतों ने दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया था.

सनद रहे प्याज़ निर्यात की प्रक्रिया न्यूनतम निर्यात मूल्य के आधार पर नियंत्रित होती है. ये मूल्य नाफ़ेड दूसरी कंपनियों के साथ मिलकर तय करता है. प्याज़ के निर्यात के लिए निर्यातकों को नाफ़ेड से प्रमाण-पत्र लेना होता है. केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय कृषि सहकारिता वितरण फ़ेडरेशन (नाफ़ेड) से कहा है कि वो निर्यातकों को प्याज़ निर्यात करने की मंज़ूरी न दे. सरकार ने प्याज़ का न्यूनतम निर्यात मूल्य 525 डॉलर प्रति टन से बढ़ाकर 1200 डॉलर प्रति टन यानी क़रीब 54 हज़ार रुपए प्रति टन कर दिया गया है, ताकि नाफ़ेड से प्रमाण-पत्र व्यापारी देश से बाहर प्याज़ न भेज पाएं.

हालांकि सोमवार को बुलाई आपात बैठक में केंद्र सरकार फ़िलहाल प्याज़ का निर्यात बंद करने का फ़ैसला कर चुकी है. सरकार 15 जनवरी तक निर्यात परमिट जारी नहीं करेगी. कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा है कि प्याज़ की क़ीमतें अभी कुछ दिनों तक और ऐसी ही बढ़ी हुई रह सकती हैं. और प्याज़ के दामों में अगले 3 हफ़्ते में सुधार होगा. उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र और राजस्थान में मॉनसून में भारी बारिश की वजह से प्याज़ की पैदावार पर बुरा असर पड़ा है. वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने कहा कि प्याज़ के दाम जमाखोरी की वजह से बढ़े हैं.

पिछले माह नवंबर में हुई बेमौसम की बरसात की वजह से प्याज़ के उत्पादन में गिरावट आई है. देश की कई कृषि उत्पादन बाजार समितियों में प्याज़ का भाव 7100 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है. प्याज़ उत्‍पादन के मामले में देश में महाराष्‍ट्र सबसे आगे है. यहां नासिक प्याज़ का सबसे बड़ा बाजार है. महाराष्‍ट्र की लासलगांव मंडी एशिया की सबसे बड़ी प्याज़ मंडी है. आज यहां प्याज़ के दाम 6299 रुपये प्रति क्विंटल, उमराने में 7100 रुपये, पिम्‍पलगांव में 6263 रुपये, मनमाड़ में 6450 रुपये और नंदगांव में 5000 रुपये हो गए हैं. फ़िलहाल हालात से निपटने के लिए पड़ौसी मुल्क पकिस्तान से प्याज़ मंगाई गई है. अमृतसर में सीमा शुल्क विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी मुताबिक़ पाकिस्तान से प्याज़ के कई ट्रक भारत आ चुके हैं. एक ट्रक में पांच से 15 टन प्याज़ है. पाकिस्तान से यहां तक प्याज़ के आने की लागत 18 से 20 रुपये प्रति किलोग्राम होती है, जिसमें सीमा शुल्क, उपकर, परिवहन और हैंडलिंग की लागत शामिल है.

नाफ़ेड ने राजधानी दिल्ली के बाशिंदों को राहत देने के लिए में प्याज़ की बिक्री 35 से 40 रुपए प्रति किलोग्राम की क़ीमत पर करने का ऐलान कर दिया है. राष्ट्रीय राजधानी में नाफ़ेड और एनसीसीएफ के 25 स्टोर हैं. देश के दूसरे राज्यों की अवाम का क्या होगा? प्याज़ के दाम बढ़ने से जहां होटल वाले परेशान हैं, वहीं गृहिणियों का बजट भी बिगड़ गया है. शाकाहारी तो बिना प्याज़ के कुछ दिन काम चला सकते हैं, लेकिन मांसाहारियों के लिए प्याज़ के बिना एक दिन भी गुज़ारना मुश्किल है.

फ़िलहाल, प्याज़ की बढ़ी क़ीमतों पर क़ाबू पाने की सरकारी कवायद जारी है. जमाखोरी के मद्देनज़र छापामारी के भी निर्देश दिए गए हैं. उधर दूसरी तरफ़ प्याज़ को लेकर सियासी रोटियां भी सेंकी जाने लगी है. भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने प्याज़ की क़ीमतों में हुई भारी वृद्धि के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की आर्थिक नीतियों को मुख्य रूप से ज़िम्मेदार ठहराया है. उनका आरोप है कि सरकार द्वारा समय रहते एहतियाती क़दम न उठाए जाने की वजह से प्याज़ की क़ीमतें आसमान छू रही हैं. बहरहाल प्याज़ क्या-क्या रंग दिखाती है, देखते रहिए.

अनुराग मुस्कान, बस नाम ही काफ़ी है... फ़िरदौस ख़ान



वो वादा ही क्या जो वफ़ा हो जाए... लेकिन हमने वादा निभा दिया है... क्योंकि वादा खिलाफ़ी तो हमारी फ़ितरत में शामिल ही नहीं...

कुछ देर पहले हमारी अनुराग मुस्कान जी से बात हो रही थी... हाल ही में उनका पहला व्यंग्य संग्रह शाया हुआ है-चौथा बंदर... हमने अनुराग से वादा किया था कि आपकी किताब की समीक्षा लिखेंगे...वादा उन दिनों का था जब हम उनके लेख देखकर उनसे कहा करते थे कि आप इतना अच्छा लिखते हैं किताब शाया क्यों नहीं कराते... वे हंस कर टाल देते और कहते स्टार न्यूज़ की एंकरिंग से फ़ुर्सत मिले तो कुछ किया भी जाए... ख़ैर, न हमने हार मानी न स्टार न्यूज़ वालों ने उन्हें वक़्त दिया... आख़िर, अनुराग ने कड़ी मशक्क़त करके किताब तैयार कर ही ली... उनकी मेहनत रंग लाई और किताब आकर्षक रंग-रूप के साथ हमारे हाथ में आ ही गई... अपने वादे के मुताबिक़ हम किताब की समीक्षा भी लिख चुके हैं...आख़िर एक दोस्त से किया वादा कैसे तोड़ सकते हैं...

अनुराग मुस्कान के बारे में क्या कहें...बस नाम ही काफ़ी है... अनुराग किसी परिचय के मोहताज नहीं... बेहद ख़ूबसूरत शख्सियत के मालिक अनुराग बहुत अच्छे एंकर होने के साथ-साथ बहुत अच्छे लेखक और अच्छे अच्छे फोटोग्राफ़र भी हैं...हमारी नज़्मों, गज़लों और लेखों के लिए वे ख़ुद की खींची तस्वीरें भेजते रहे हैं...इसके लिए हम उनके तहे-दिल से शुक्रगुज़ार हैं... इसी साल के शुरू में उन्होंने हमें एक टेबल कैलेंडर भेजा था... ख़ूबसूरत 12 तस्वीरों से सजा बेहद आकर्षक कैलेंडर... यह कैलेंडर अनुराग ने ही बनवाया था...

बक़ौल अनुराग-अब अपने मुंह अपनी तारीफ़ क्या करूं...आगरे का हूं, सो बचपन से ही ख़्वाबों के 'ताजमहल' बनाने की आदत रही है... कुछ मीनारें तो खड़ी कर पाया हूं शायद, बस, इमारत का तामीर होना अभी बाक़ी है... विगत दस वर्षों से इलैक्ट्रॉनिक मीडिया से संबद्ध हूं, वर्तमान में 'स्टार न्यूज़' में एंकर! लेखन के लिए किसी तरह वक़्त निकाल ही लेता हूं... विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य, लेख एवं कहानियां प्रकाशित, आगरा आकाशवाणी एवं मंचों के लिए नाट्य लेखन में सक्रिय... कभी सालों तक मंचों पर काव्य पाठ किया और अपनी लिखीं ग़ज़लें भी पढ़ी है... फ़ोटोग्राफ़ी का भी शौक़ है, अपना एसएलआर कैमरा हमेशा अपने साथ रखता हूं... थोड़े लिखे को ही बहुत समझें...

पुस्‍तक के बारे में प्रख्यात व्‍यंग्‍यकार ज्ञान चतुर्वेदी का कहना है :
''अनुराग के लेखन में वैसा बहुत कुछ दिखता है जैसा ज्‍यादातर दिखता नहीं है. यह व्‍यंग्‍य-संग्रह अपनी विशेषताओं और सीमाओं के बीच भीड़ से अलग लगेगा, यह मैं कह सकता हूं. यही बड़ी बात है, वरना आजकल यह कह पाने को भी तरस जाता हूं.''

ख़ैर, अनुराग की किताब को ज़रूर पढ़ें... यक़ीन मानिए अगर एक बार किताब हाथ में थाम ली तो पूरी पढ़े बिना नहीं रह सकेंगे...


किताब का नाम : चौथा बंदर (व्‍यंग्‍य-संग्रह)
लेखक : अनुराग मुस्‍कान
मूल्य : सजिल्द : 290 .00
अंतिका प्रकाशन
सी 56 / यूजीएफ-4 , शालीमार गार्डेन एक्सटेंशन-2
गाज़ियाबाद 201005 (उ. प्र. )
फोन 0120-6475212
Email : antika56@gmail.com

नोट : विदेश में रहने वाले यहां संपर्क कर किताब मंगवा सकते हैं, जबकि देश रहने वाले यहां संपर्क कर सकते हैं.
समीक्षा बाद में पोस्ट करेंगे...

Saturday, December 18, 2010

बेदर्द, निर्मोही और संगदिल नहीं हैं मर्द...



फ़िरदौस ख़ान
अमूमन मर्दों को संगदिल समझा जाता है...संगदिल मानकर उन्हें बेदर्द, निर्मोही जैसे संबोधन दे दिए जाते हैं... कथा -कहानियों में भी नायिकाएं अपने प्रीतम को ऐसे ही नाम से संबोधित करते हुए शिकायत करती हैं... माना जाता है कि महिलाएं ही बेहद जज़्बाती होती हैं...और किसी भी रिश्ते का टूटने का दर्द सबसे ज़्यादा उन्हें ही होता है...जबकि ऐसा नहीं है, मर्द भी रिश्तों को लेकर इतने ही भावुक होते हैं...यह बात अलग है कि वे अपने जज़्बात को बयान नहीं कर पाते...

ब्रिटेन में हाल ही में हुए एक सर्वे में यह बात सामने आई है कि दर्द सहन करने की क्षमता उम्र के साथ विकसित होती है. कम उम्र के मर्द इतने मज़बूत नहीं होते कि वे टूटे हुए रिश्ते के दर्द को बर्दाश्त कर सकें... मर्द अपनी भावनाएं दूसरों के साथ नहीं बांटते हैं, क्योंकि उनकी परवरिश ही ऐसी होती है...उन्हें बचपन से ही यह बताया जाता है कि लड़कियों के मुक़ाबले वे ज़्यादा मज़बूत हैं... इस मानसिकता के चलते वे अपनी भावनाओं को अपने भीतर ही समेटे रहते हैं...वे अपनी भावनाएं केवल प्रेमिका या साथी के साथ बांटते हैं ऐसे में उनके दूर हो जाने पर वे भावनात्मक तौर पर बेहद कमज़ोर हो जाते हैं...

लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज की समाजशास्‍त्री प्रोफेसर मिलैनी बर्टले के मुताबिक़ मर्द भी महिलाओं जैसा ही नाज़ुक दिल रखते हैं... लेकिन महिलाओं के पास अपने दुख-दर्द बांटने के लिए परिवार और दोस्त होते हैं, जबकि मर्दों के बीच प्रतियोगिता ज़्यादा होती है और वे एक-दूसरे की भावनाओं का क़द्र नहीं करते हैं...रिश्ते मर्दों को भावनात्मक मज़बूती देते हैं, इसलिए रिश्ते टूटने पर वे गहरे अवसाद में चली जाते हैं...

दर्द तो मर्दों को भी होता है...फ़िरदौस ख़ान
मर्द ऐसे क्यों होते हैं...फ़िरदौस ख़ान  

Friday, December 10, 2010

भ्रष्टाचार : हम किसी से कम नहीं...फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान
पिछले काफ़ी अरसे से देश की जनता भ्रष्टाचार से जूझ रही है और भ्रष्टाचारी मज़े कर रहे हैं. पंचायतों से लेकर संसद तक भ्रष्टाचार का बोलबाला है. सरकारी दफ़्तरों के चपरासी से लेकर आला अधिकारी तक बिना रिश्वत के सीधे मुंह बात तक नहीं करते. संसद के अन्दर भ्रष्टाचार को लेकर हौ-हल्ला होता है तो बाहर जनता धरने-प्रदर्शन कर अपने गुस्से का इज़हार करती है. हालांकि भ्रष्टाचार से निपटने के लिए सरकारी स्तर पर भी तमाम दावे कर औपचारिकता पूरी कर ली जाती है, लेकिन नतीजा वही 'ढाक के तीन पात' ही रहता है. अब तो हालत यह हो गई है कि हमारा देश भ्रष्टाचार के मामले में भी लगातर तरक्क़ी कर रहा है. विकास के मामले में भारत दुनिया में कितना ही पीछे क्यों न हो, मगर भ्रष्टाचार के मामले में चौथे नंबर पर पहुंच गया है.

गौरतलब है कि जर्मनी के बर्लिन स्थित गैर सरकारी संगठन ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (टीआई) की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले साल भारत में काम कराने के लिए 54 फ़ीसदी लोगों को रिश्वत देनी पड़ी. जबकि पूरी दुनिया की चौथाई आबादी घूस देने को मजबूर है. इस संगठन एनजीओ ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के सर्वे में दुनियाभर के 86 देशों में 91 हज़ार लोगों से बात करके रिश्वतखोरी से संबंधित आंकड़े जुटाए हैं. 2010 के ग्लोबल करप्शन बैरोमीटर के मुताबिक़ पिछले 12 महीनों में हर चौथे आदमी ने 9 संस्थानों में से एक में काम करवाने के लिए रिश्वत दी. इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस विभाग से लेकर अदालतें तक शामिल हैं.

भ्रष्टाचार के मामले में अफ़गानिस्तान, नाइजीरिया इराक़ और भारत सबसे ज़्यादा भ्रष्ट देशों की फ़ेहरिस्त में शामिल किये गए हैं.इन देशों में आधे से ज़्यादा लोगों ने रिश्वत देने की बात स्वीकार की. इस रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में 74 फ़ीसदी लोगों का कहना है कि देश में पिछले तीन बरसों में रिश्वतखोरी में ख़ासा इज़ाफ़ा हुआ है, बाक़ी दुनियाभर के 60 फ़ीसदी लोग ही ऐसा मानते हैं. इस रिपोर्ट पुलिस विभाग को सबसे ज़्यादा भ्रष्ट करार दिया गया है. पुलिस से जुड़े 29 फ़ीसदी लोगों ने स्वीकार किया है कि उन्हें अपना काम कराने के लिए रिश्वत देनी पड़ी है. संस्था के वरिष्ठ अधिकारी रॉबिन होंडेस का कहना है कि यह तादाद पिछले कुछ सालों में बढ़ी है और 2006 के मुक़ाबले दोगुनी हो गई है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन (79वें), भारत (84वें), पाकिस्तान और बांग्लादेश (139वें) में भ्रष्टाचार तेज़ी से फैल रहा है. हालत यह है कि धार्मिक संगठनों में भी भ्रष्टाचार बढ़ा है.

क़ाबिले-गौर है कि ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल 2003 से हर साल भ्रष्टाचार पर रिपोर्ट जारी कर रही है. वर्ष 2009 की रिपोर्ट में सोमालिया को सबसे भ्रष्ट देश बताया गया है, जबकि इस साल भारत इस स्थान रहा है. देश में पिछले छह महीनों में आदर्श हाउसिंग घोटाला, राष्ट्रमंडल खेलों में धांधली, और 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में घोटाले ने भ्रष्टाचार की पोल खोल कर रख दी है. जब ऊपरी स्तर पर यह हाल है तो ज़मीनी स्तर पर क्या होता होगा, सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.

टीआई की रिपोर्ट में न्यूज़ीलैंड, डेनमार्क, सिंगापुर, स्वीडन और स्विटज़रलैंड को दुनिया के सबसे ज़्यादा साफ़-सुथरे देश बताया गया है. गौरतलब है कि ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल का अंतरराष्ट्रीय सचिवालय बर्लिन में स्थित है और दुनियाभर के 90 देशों में इसके राष्ट्रीय केंद्र हैं. विभिन्न देशों में भ्रष्टाचार का स्तर मापने के लिए टीआई दुनिया के बेहतरीन थिंक टैंक्स, संस्थाओं और निर्णय श्रमता में दक्ष लोगों की मदद लेता है. यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट की ओर से घोषित अंतर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस के मौक़े पर जारी की जाती है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल की 191 देशो की फ़ेहरिस्त में भारत को 178वें स्थान पर रखा गया था. करेप्शन प्रेसेप्शन इंडेक्स में भारत 87 वें पायदान पर है. संसद में बैठे नेताओं में से क़रीब एक चौथाई पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप हैं. 1948 से 2008 तक अवैध तरीक़े से हमारे देश से क़रीब 20 लाख करोड़ रुपए बाहर भेजे गए हैं, जो देश की आर्थिक विकास दर (जीडीपी) का चालीस फ़ीसदी है.

विभिन्न संगठनों के संघर्ष के बाद भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए 12 अक्टूबर 2005 को देशभर में सूचना का अधिकार क़ानून भी लागू किया गया. इसके बावजूद रिश्वत खोरी कम नहीं हुई. अफ़सोस तो इस बात का है कि भ्रष्टाचारी ग़रीबों, बुजुर्गों और विकलांगों तक से रिश्वात मांगने से बाज़ नहीं आते. वृद्धावस्था पेंशन के मामले में भी भ्रष्ट अधिकारी लाचार बुजुर्गों के आगे भी रिश्वत के लिए हाथ फैला देते हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने भ्रष्टाचार को स्वीकार करते हुए कहा था कि सरकार की तरफ़ से जारी एक रुपए में से जनता तक सिर्फ़ 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं. ज़ाहिर है बाक़ी के 85 पैसे सरकारी अफ़सरों की जेब में चले जाते हैं. जिस देश का प्रधानमंत्री रिश्वतखोरी को स्वीकार कर रहा हो, वहां जनता की क्या हालत होगी कहने की ज़रूरत नहीं. मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मानते हैं कि मौजूदा समय में देश में भ्रष्टाचार और गरीबी बड़ी समस्याएं हैं. हक़ीक़त में जनता के कल्याण के लिए शुरू की गई तमाम योजनाओं का फ़ायदा तो नेता और नौकरशाह ही उठाते हैं. आख़िर में जनता तो ठगी की ठगी ही रह जाती है. शायद यही उसकी नियति है.

बहरहाल, भ्रष्टाचार पर कैसे रोक लगाई जाए, इस पर गंभीरता से बरते जाने की ज़रूरत है. साथ इस बात की भी ज़रूरत है की भ्रष्टाचारियों के ख़िलाफ़ सख्त कानूनी कारवाई की जाए, क्योंकि सिर्फ़ भाषणबाज़ी से कुछ होने वाला नहीं है.

Wednesday, December 8, 2010

दर्द तो मर्दों को भी होता है...फ़िरदौस ख़ान

अंग्रेज़ी में कहावत है कि 'बॉयज़ डोंट क्रा'ई यानी लड़के नहीं रोते... मतलब रोती तो लड़कियां हैं. मगर ऐसा नहीं है... दुख, दर्द तकलीफ़ तो मर्दों को भी होता है... दिल पर चोट पहुंचने पर वे भी रोते हैं, तड़पते हैं, कराहते हैं...

 अमूमन बचपन से ही लड़कों के मन में यह बात बैठा दी जाती है कि लड़के मज़बूत होते हैं, ताक़तवर होते, हिम्मत वाले होते हैं... इसलिए उन्हें ख़ुद को कमज़ोर नहीं समझना है... इसी ज़हनियत के चलते मर्द अपने दुख-दर्द दूसरों के साथ नहीं बांट पाते और मन ही मन सबकुछ झेलते रहते हैं...

मर्द अपनी भावनाएं व्यक्त करने में झिझकते हैं... वे डरते हैं कि कहीं उन्हें कमज़ोर न समझ लिया जाए...और फिर उनका मज़ाक़ न उड़ाया जाए...वे कभी नहीं चाहते कि कोई भी उन्हें कमज़ोर या दब्बू समझे...ऐसे में घर, दफ़्तर या समाज में उनकी 'इमेज' का क्या होगा...?  

हक़ीक़त यही है कि मर्दों को भी उतने ही प्यार और देखभाल  की ज़रूरत होती है, जितनी लड़कियों को... जब किसी लड़की पर कोई परेशानी आती है तो पूरा परिवार सब कुछ छोड़कर उसके बारे में ही सोचने लग जाता है, मगर मर्दों को यह कहकर उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है कि वे ख़ुद सक्षम है... ऐसे में वे ख़ुद को बेहद अकेला महसूस करते हैं... 

कुछ ख़ास बातें मर्दों के बारे में
  • अध्ययनों की मानें तो मर्दों में औरतों के मुक़ाबले जनरल इंटेलिजेंस तीन फ़ीसदी कम होता है.
  • मर्द ऐसे ग्रीटिंग कार्ड पसंद करते हैं, जिनमें संदेश बड़े शब्दों में लिखा हुआ हो.
  • मर्दों के बात करने से पहले ही बता दें कि वे आपकी बात ध्यान से सुने., साथ ही बात का विषय भी पहले ही बताना होगा. उनसे एक बार में एक विषय ही विषय पर बात करें, वह
    भी सीधे व सरल शब्दों में.
  • मर्द जब अपने कारोबार को लेकर परेशान होते हैं तो वे अपने रिश्तों पर ध्यान नहीं दे पाते.
  • मर्द जब किसी वजह से परेशान होते हैं तो वे अकेले रहना ही पसंद करते हैं. ऐसे में उन्हें प्रेमिका का साथ भी पसंद नहीं आता.
  • मर्द प्यार के मामले में पहल करते हुए भी डरते हैं कि कहीं लड़की मना न कर दे... अगर लड़की ने मना दिया तो वो बर्दाश्त नहीं कर पाते...
    क्योंकि इससे  उनके अहं को चोट पहुंचती है...
औरतों के बारे में कुछ ऐसी बातें हैं, जिन्हें मर्द कभी समझ नहीं पाते... मसलन-
  • जब महिलाओं को दो दिन के लिए भी कहीं बाहर जाना होता है तो वे सूटकेस भरकर कपड़े क्यों लेकर जाती हैं.
  • महिलाएं ऐसी फ़िल्में देखना क्यों पसंद करती हैं, जिन्हें देखकर रोना आए.
  • गहने या महंगे कपड़े ख़रीदते वक़्त महिलाओं के चेहरे पर ज़्यादा रौनक़ होती है, जबकि कोई और सामान ख़रीदने पर उनके चेहरे पर ऐसी ख़ुशी नहीं दिखाई देती.




Saturday, December 4, 2010

मर्द ऐसे क्यों होते हैं...फ़िरदौस ख़ान

अमूमन देखने में आता है कि ज़्यादातर महिलाओं के बारे में लिखा जाता है... मर्दों के बारे में बहुत कम पढ़ने को मिलता है... इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि मर्द लेखक महिलाओं के बारे में ही लिखना पसंद करते हैं...महिलाएं भी ख़ुद महिलाओं के बारे में ही लिखने को तरजीह देती हैं...एक पत्रकार साथी से इस बारे में बात हो रही थी तो उन्होंने कहा कि शुक्र है तुमने मदों के बारे में कुछ सोचा तो... ख़ैर, मर्दों के बारे में लिखने का आगाज़ एक हलकी-फुल्की पोस्ट से कर रहे हैं... बाद में कुछ गंभीर लेख भी मर्दों के बारे में लिखेंगे... अगर किसी को कोई बात बुरी लगे तो दिल पर न लीजिएगा, यही गुज़ारिश है...
आज हम बात कर रहे हैं...मर्दों की कुछ आदतों के बारे में...जिन्हें लेकर लड़कियों को अकसर उनसे शिकायत रहती है...
  • अगर आप उनसे ज़्यादा सुन्दर हैं तो वे हीन भावना का शिकार हो जाएंगे. अगर वे आपसे ज़्यादा सुन्दर हैं तो वे ख़ुद को दुनिया का सबसे सुन्दर व्यक्ति समझेंगे.
  • अगर आप उनके साथ अच्छी तरह बात करेंगी तो वे समझेंगे कि आप उनसे प्यार करती हैं. अगर आप ऐसा नहीं करेंगी तो वे कहेंगे की आप बहुत घमंडी हैं.
  • जब भी आप कोई बेहद ख़ूबसूरत लिबास पहने हों तो वे समझेंगे कि आप उन्हें लुभाना चाहती हैं. अगर आपका लिबास कुछ ख़ास नहीं है तो वे समझेंगे कि आप गंवार हैं.
  • अगर आप उनसे किसी बात पर बहस करेंगी तो वे समझेंगे कि आप ज़िद्दी हैं. अगर आप ख़ामोश रहेंगी तो वे समझेंगे कि आपके पास दिमाग़ नाम की कोई चीज़ है ही नहीं.
  • अगर आप उन्हें प्यार नहीं करेंगी तो वे आपको डॉमिनेट करने की कोशिश करेंगे. अगर आप उनसे प्यार का इज़हार करेंगी तो वे ज़ाहिर करेंगे कि उन पर बहुत लड़कियां मरती हैं.
  • जब कभी आप उन्हें कोई समस्या बताएंगी तो वे आपको ही सबसे बड़ी समस्या समझेंगे. अगर आप उन्हें अपनी समस्या नहीं बताएंगी तो वे कहेंगे कि आप उन पर यक़ीन नहीं करतीं.
  • अगर आप उन्हें किसी बात पर डांटेंगी तो वे बुरा मान जाएंगे. अगर वे आपको डांटेंगे तो कहेंगे कि वे आपकी बहुत परवाह करते हैं.
  • अगर आप उनसे किया कोई वादा तोड़ दें तो वे आप पर से यक़ीन तोड़ देंगे. अगर वे आपसे किया वादा तो दें तो आप पर हक़ जताएंगे.
  • अगर आप किसी चीज़ में कामयाब हो जाएं तो वे इसे आपकी क़िस्मत कहेंगे. अगर ख़ुद कामयाब हो जाएं तो इसे अपनी क़ाबिलियत क़रार देंगे.
  • अगर आप उन्हें कोई तकलीफ़ पहुंचाने की कोशिश करेंगी तो आपको ज़ालिम कहेंगे. अगर वे आपको दुख पहुंचाएं तो कहेंगे कि आप बहुत जज़्बाती हो.
  • अगर आप उन्हें कॉल करेंगी तो यह ज़ाहिर करेंगे कि वे बहुत मसरूफ़ हैं. अगर कॉल नहीं करेंगी तो कहेंगे कि आप उन्हें याद ही नहीं करतीं.

Friday, December 3, 2010

विकलांग व्‍यक्तियों के सशक्तिकरण की दरकार

फ़िरदौस ख़ान
दुनियाभर में 65 करोड़ लोग विकलांगता के शिकार हैं. वर्ष 2001 में हुई जनगणना के मुताबिक भारत में 2.19 करोड़ लोग विकलांग हैं जो कुल आबादी के 2.13 फ़ीसदी हैं. इसमें दृष्टि 29 फ़ीसदी श्रवण 6 फ़ीसदी, वाणी 7 फ़ीसदी, गति 28 फ़ीसदी और मानसिक 10 फ़ीसदी शामिल हैं. राष्ट्रीय सैंपल सर्वे संगठन (एनएसएसओ) के 2002 की रिपोर्ट के मुताबिक़ कुल विकलांगों में दृष्टि 14 फ़ीसदी श्रवण 15 फ़ीसदी, वाणी 10 फ़ीसदी, गति 51 फ़ीसदी और मानसिक 10 फ़ीसदी हैं. 75 फ़ीसदी विकलांग ग्रामीण इलाकों में रहते हैं, 49 फ़ीसदी विकलांग निरक्षर हैं और 34 फ़ीसदी रोज़गार प्राप्त हैं. पूर्व में चिकित्सकीय पुनर्वास पर दिए बल की बजाए अब सामाजिक पुनर्वास पर ध्यान दिया जा रहा है. सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के तहत विकलांगता विभाग, विकलांग व्यक्तियों की मदद करता है, जिनकी संख्या वर्ष 2001 में हुई जनगणना के मुताबिक़ 2.19 करोड़ थी जो देश की कुल आबादी का 2.13 फ़ीसदी था. इनमें दृष्टि, श्रवण, वाणी, गति तथा मानसिक रूप से विकलांग व्यक्ति शामिल थे.

हर साल 3 दिसम्‍बर को अंतर्राष्‍ट्रीय विकलांगता दिवस मनाया जाता है. 1981 से मनाए जा रहे इस दिन का मक़सद विकलांग व्‍यक्तियों के प्रति बेहतर समझ क़ायम करना और उनके अधिकारों पर ध्‍यान देने के साथ-साथ उन्‍हें राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्‍कृतिक जीवन में मिलने वाले लाभ दिलाना है. विकलांगों से संबंधित विश्‍व कार्यकलाप कार्यक्रम ने विकलांगों की समाज में संपूर्ण और कारगर भागीदारी का लक्ष्‍य निर्धारित किया था जिसे संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा ने 1982 में स्‍वीकार कर लिया. संयुक्‍त राष्‍ट्र ने विकलांगों के लिए पूर्ण और कारगर भागीदारी की प्रतिबद्धता व्‍यक्‍त की, जिसे 2006 में मंज़ूर विकलांगता के शिकार लोगों के नवगठित अधिकार समझौते में और मज़बूती प्रदान की गई. भारत ने 30 मार्च 2007 को संयुक्‍त राष्‍ट्र समझौते पर हस्‍ताक्षर किए. भारत सरकार विकलांग लोगों की पूर्ण भागीदारी, उनके अधिकारों की रक्षा और उन्‍हें समान अवसर प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है. भारत की अधिकांश आबादी गांवों में रहती है और स्‍वास्‍थ्‍य और पुनर्वास सेवा तक पहुंच हमेशा से चुनौती का विषय रहा है. इस तथ्‍य को ध्‍यान में रखते हुए हमारी सरकार ने सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर विभिन्‍न कार्यक्रमों के ज़रिये उन लोगों तक पहुंचने के लिए अनेक क़दम उठाए हैं जिन तक पहुंचा नहीं जा सका.

सामाजिक न्‍याय और अधिकारिता मंत्रालय हर साल 3 दिसम्‍बर को विकलांगों के सशक्तिकरण के लिए राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार प्रदान करता है. इन पुरस्‍कारों की शुरुआत 1969 में विकलांगों को नौकरी देने वाले सर्वश्रेष्‍ठ मालिकों और सर्वश्रेष्‍ठ कर्मचारी को पुरस्‍कृत करने के लिए की गई थी. बदलते परिदृश्‍य को ध्‍यान में रखते हुए राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार योजना की समीक्षा की गई और समय समय पर इसमें बदलाव करते हुए पुरस्‍कारों की विभिन्‍न नई श्रेणियां शुरू की गईं. राष्‍ट्रीय पुरस्‍कारों की वर्तमान योजना के मुताबिक़ विकलांगों के सशक्तिकरण के लिए 13 श्रेणियों में 63 पुरस्‍कार दिए जाएंगे, जिनमें सर्वश्रेष्‍ठ कर्मचारी/ स्‍व रोज़गार विकलांग, सर्वश्रेष्‍ठ मालिक और नौकरी देने वाले अधिकारी/विकलांगों को नौकरी देने वाली एजेंसी, विकलांगों के लिए काम करने वाले सर्वश्रेष्‍ठ व्‍यक्ति और संस्‍थान, अनुकरणीय व्‍यक्ति, विकलांगों का जीवन बेहतर बनाने के उद्देश्‍य से सर्वश्रेष्‍ठ व्‍यावहारिक अनुसंधान/नवपरिवर्तन/उत्‍पादों का विकास, विकलांगों के लिए अवरोध मुक्‍त वातावरण तैयार करने की दिशा में श्रेष्‍ठ कार्य, पुनर्वास सेवाएं देने वाला श्रेष्‍ठ ज़िला, राष्‍ट्रीय विश्‍वास की स्‍थानीय स्‍तर की समिति, राष्‍ट्रीय विकलांगता, वित्‍त् और विकास निगम को दिशा देने वाले सर्वश्रेष्‍ठ राज्‍य, सर्वश्रेष्‍ठ सृजनशील वयस्‍क विकलांग व्‍यक्ति, सर्वश्रेष्‍ठ सृजनशील विकलांग बच्‍चा, सर्वश्रेष्‍ठ ब्रेल प्रेस और सर्वश्रेष्‍ठ सुगम्‍य वेबसाइट शामिल हैं.

आधिकारिक जानकारी के मुताबिक़ देशभर के विभिन्‍न प्राधिकारों को पत्र लिखकर नामांकन मांगे गए. इसके अलावा मंत्रालय की वेबसाइट में विज्ञापन देने के अलावा देशभर के विभिन्‍न लोकप्रिय क्षेत्रीय दैनिक समाचार-पत्रों में भी विज्ञापन दिये गए. जो सिफ़ारिशें प्राप्‍त हुईं उनमें से स्‍क्रीनिंग समिति ने संक्षिप्‍त सूची तैयार की और राष्‍ट्रीय चयन समिति ने पुरस्‍कारों को अंतिम रूप दिया. हर साल 3 दिसम्‍बर को अंतर्राष्‍ट्रीय विकलांगता दिवस के अवसर पर यह पुरस्‍कार दिए जाते हैं., भारतीय पुनर्वास परिषद् के मुताबिक़ निःशक्त व्यक्ति अधिनियम, 1995 के अन्तर्गत विकलांग व्यक्तियों को अनेक अधिकार दिए गए हैं. अविकलांग व्यक्तियों की तरह समान अवसर का अधिकार, विकलांगजनों के कानूनी अधिकारों की सुरक्षा और जीवन के कार्यों में अविकलांग व्यक्तियों के बराबर पूर्ण भागीदारी का अधिकार दिया गया है. इस अधिनियम द्वारा विकलांगजनों को क़ानूनी तौर पर मान्यता दी गई है और विभिन्न विकलांगताओं को क़ानूनी परिभाषा दी गई है.

इस अधिनियम से विकलांगजनों को यह अधिकार है कि उनकी देखभाल की जाए और जीवन की मुख्यधारा में उन्हें पुनर्वासित किया जाए और सरकार तथा इस अधिनियम द्वारा कवर किए गए प्राधिकरणों और अन्य प्राधिकरण और स्थापनाओं का यह दायित्व है कि वे इस अधिनियम के प्रावधानों के मद्देनज़र विकलांगजनों के प्रति अपने कर्त्तव्यों को पूरा करें. केन्द्रीय और राज्य सरकारों का यह कर्त्तव्य है कि वे रोकथाम संबंधी उपाय करें, ताकि विकलांगताओं को रोका जा सके. प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर कर्मचारियों को प्रशिक्षित करें, स्वास्थ्य और सफ़ाई संबंधी सेवाओं में सुधार करें. वर्ष में कम से कम एक बार बच्चों की जांच करें, जोखिम वाले मामलों की पहचान करें. प्रसवपूर्व और प्रसव के बाद मां और शिशु के स्वास्थ्य की देखभाल करें और विकलांगता की रोकथाम के लिए विकलांगता के कारण और बचाव के  उपायों के बारे में जनता को जागरूक करें. प्रत्येक विकलांग बच्चे को 18 वर्ष की आयु तक उपयुक्त वातावरण में निःशुल्क शिक्षा का अधिकार है.

सरकार को विशेष शिक्षा प्रदान करने के लिए विशेष स्कूल स्थापित करने चाहिए, सामान्य स्कूलों में विकलांग छात्रों के एकीकरण को बढ़ावा देना चाहिए और विकलांग बच्चों के व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए अवसर मुहैया कराने चाहिए. पांचवीं कक्षा तक पढाई कर चुके विकलांग बच्चे मुक्त स्कूल या मुक्त विश्वविद्यालयों के माध्यम से अंशकालिक छात्रों के रुप में अपनी शिक्षा जारी रख सकते हैं और सरकार से विशेष पुस्तकें और उपकरणों को निःशुल्क प्राप्त करने का उन्हें अधिकार है. सरकार का यह कर्त्तव्य है कि वह नए सहायक उपकरणों, शिक्षण सहायक साधनों और विशेष शिक्षण सामग्री का विकास करे ताकि विकलांग बच्चों को शिक्षा में समान अवसर प्राप्त हों. विकलांग बच्चों को पढ़ाने के लिए सरकार को शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान स्थापित करने हैं, विस्तृत शिक्षा संबंधी योजनाएं बनानी हैं. विकलांग बच्चों को स्कूल जाने-आने के लिए परिवहन सुविधाएं देनी हैं, उन्हें पुस्तकें, वर्दी और अन्य सामग्री, छात्रवृत्तियां, पाठ्यक्रम और नेत्रहीन छात्रों को लिपिक की सुविधाएं देना है. दृष्टिहीनता, श्रवण विकलांग और प्रमस्तिष्क अंगघात से ग्रस्त विकलांगजनों की प्रत्येक श्रेणी के लिए पदों का आरक्षण होगा. इसके लिए प्रत्येक तीन वर्षों में सरकार द्वारा पदों की पहचान की जाएगी. भरी न गई रिक्तियों को अगले साल के लिए ले जाया जा सकता है.

विकलांगजनों को रोजगार देने के लिए सरकार को विशेष रोज़गार केन्द्र स्थापित करने हैं. सभी सरकारी शैक्षिक संस्थान और सहायता प्राप्त संस्थान सीटों को विकलांगजनों के लिए आरक्षित रखेंगे. रिक्तियों को गरीबी उन्मूलन योजनाओं में आरक्षित रखना है. नियोक्ताओं को प्रोत्साहन भी देना है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनके द्वारा लगाए गए कुल कर्मचारियों में से 5 व्यक्ति विकलांग हैं. आवास और पुनर्वास के उद्देश्यों के लिए विकलांग व्यक्ति रियायती दर पर जमीन के तरजीही आबंटन के हक़दार होंगे. विकलांग व्यक्तियों के साथ परिवहन सुविधाओं, सड़क पर यातायात के संकेतों या निर्मित वातावरण में कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा. सरकारी रोजगार के मामलों में विकलांग व्यक्तियों के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा. सरकार विकलांग व्यक्तियों या गंभीर विकलांगता से ग्रस्त व्यक्तियों के संस्थानों की मान्यता निर्धारित करेगी. मुख्य आयुक्त और राज्य आयुक्त विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों से संबंधित शिकायतों के मामलों की जांच करेंगे. सरकार और स्थानीय प्राधिकरण विकलांग व्यक्तियों के पुनर्वास का कार्य करेंगे, गैर-सरकारी संगठनों को सहायता देंगे, विकलांग कर्मचारियों के लिए बीमा योजनाएं बनाएंगे और विकलांग व्यक्तियों के लिए बेरोजगारी भत्ता योजना भी बनाएंगे. छलपूर्ण तरीक़े से विकलांग व्यक्तियों के लाभ को लेने वालों या लेने का प्रयास करने वालों को 2 साल की सज़ा या 20 हज़ार रुपए तक का जुर्माना होगा.

राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999 के अन्तर्गत विकलांगता से ग्रस्त व्यक्तियों को भी अनेक अधिकार दिए गए हैं. इस अधिनियम के अनुसार केन्द्रीय सरकार का यह दायित्व है कि वह ऑटिज्म, प्रमस्तिष्क अंगघात, मानसिक मंदता और बहु विकलांगता ग्रस्त व्यक्तियों के कल्याण के लिए, नई दिल्ली में राष्ट्रीय न्यास का गठन करें. केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थापित किए गए राष्ट्रीय न्यास को यह सुनिश्चित करना होता है कि इस अधिनियम की धारा 10 में वर्णित उद्देश्यों पूरे हों. राष्ट्रीय न्यास के न्यासी बोर्ड का यह दायित्व है कि वे वसीयत में उल्लिखित किसी भी लाभग्राही के समुचित जीवन स्तर के लिए आवश्यक प्रबंध करें और विकलांगजनों के लाभ हेतु अनुमोदित कार्यक्रम करने के लिए पंजीकृत संगठनों को वित्तीय सहायता प्रदान करें. इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार, विकलांग व्यक्तियों को स्थानीय स्तर की समिति द्वारा नियुक्त संरक्षक की देखरेख में, रखे जाने का अधिकार है. नियुक्त किए गए ऐसे संरक्षकों उस व्यक्ति और विकलांग प्रतिपाल्यों की संपत्ति के लिए ज़िम्मेदार और उत्तरदायी होंगे.

यदि विकलांग व्यक्ति का संरक्षक उसके साथ दुप्र्यवहार कर रहा है या उसकी उपेक्षा कर रहा है या उसकी संपत्ति का दुरुपयोग कर रहा है तो विकलांग व्यक्ति को अपने संरक्षक को हटा देने का अधिकार है. जहां न्यासी बोर्ड कार्य नहीं करता या इसने सौंपे गए कार्यों के कार्यनिष्पादन में लगातार चूक की है, वहां विकलांग व्यक्तियों हेतु पंजीकृत संगठन, न्यासी बोर्ड को हटाने/इसका पुनर्गठन करने के लिए केन्द्रीय सरकार से शिकायत कर सकता है. इस अधिनियम के उपबन्ध राष्ट्रीय न्यास पर जवाबदेही, मॉनीटरिग, वित्त, लेखा और लेखा-परीक्षा के मामले में बाध्यकारी होंगे.

भारतीय पुनर्वास अधिनियम, 1992 के अंतर्गत निःशक्त व्यक्तियों को भी अधिकार दिए गए हैं. इस अधिनियम के तहत परिषद द्वारा रखे जा रहे रजिस्टरों में जिन प्रशिक्षित और विशेषज्ञ व्यावसायिकों के नाम दर्ज हैं, उनके द्वारा विकलांगजनों को लाभ पहुंचाना. शिक्षा के उन न्यूनतम मानकों को बनाए रखने की गारंटी जो भारत में विश्वविद्यालयों या संस्थानों द्वारा पुनर्वास अर्हता की मान्यता के लिए अपेक्षित हैं. शिक्षा के उन न्यूनतम मानकों को बनाए रखने की गारंटी जो भारत में विश्वविद्यालयों या संस्थानों द्वारा पुनर्वास अर्हता की मान्यता के लिए अपेक्षित हैं. केन्द्र सरकार के नियंत्रणाधीन और अधिनियम द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर किसी सांविधिक परिषद द्वारा पुनर्वास व्यावसायिकों के व्यवसाय के विनियम की गारंटी.

मानसिक रूप से मंद व्यक्तियों को मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 के अंतर्गत विकलांगों को अनेक अधिकार दिए गए हैं. मानसिक रुप से रुग्ण व्यक्तियों के उपचार और देखभाल के लिए सरकार या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा स्थापित या अनुरक्षित किए जा रहे किसी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय नर्सिग होम या स्वास्थ्य लाभ गृह (सरकारी सार्वजनिक अस्पताल या नर्सिग होम के अलावा) में भर्ती होने, उपचार करवाने या देखभाल करवाने का अधिकार. मानसिक रुप से रुग्ण कैदी और नाबालिग को भी सरकारी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या मनश्चिकित्सीय नर्सिग होम्स में इलाज करवाने का अधिकार है. 16 वर्ष से कम आयु के नाबालिगों, व्यवहार में परिवर्तन कर देने वाले अल्कोहल या अन्य व्यवसनों के आदी व्यक्ति और वे व्यक्ति जिन्हें किसी अपराध के लिए दोषी ठहराया गया है, को सरकार द्वारा स्थापित या अनुरक्षित किए जा रहे अलग मनश्चिकित्सीय अस्पतालों या नर्सिग होम में भर्ती होने, उपचार करवाने या देखरेख करवाने का अधिकार है. मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्तियों को सरकार से मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को विनियमित, निर्देशित और समन्वित करवाने का अधिकार है.

सरकार का दायित्व इस अधिनियम के अंतर्गत स्थापित केन्द्रीय प्राधिकरणों और राज्य प्राधिकरणों के माध्यम से मनश्चिकित्सीय अस्पतालों और नर्सिग होमों को स्थापित और अनुरक्षित करने के लिए ऐसे विनियमनों और लाइसेंसों को जारी करने का है. इन सरकारी अस्पतालों और नर्सिग होमों में इलाज अन्तःरोगी या बाह्य रोगी के रुप में हो सकता है. मानसिक रुप से रुग्ण व्यक्ति ऐसे अस्पतालों या नर्सिग होमों में अपने आप भर्ती होने के लिए अनुरोध कर सकते हैं और नाबालिग अपने संरक्षकों के द्वारा भर्ती होने के लिए अनुरोध कर सकते हैं. मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्तियों के रिश्तेदारों द्वारा भी रुग्ण व्यक्तियों की ओर से भर्ती होने के लिए अनुरोध किया जा सकता है. भर्ती आदेशों को मंज़ूर करने के लिए स्थानीय मजिस्ट्रेट को भी आवेदन किया जा सकता है. पुलिस का दायित्व है कि भटके हुए या उपेक्षित मानसिक रुग्ण व्यक्ति को सुरक्षात्मक हिफाजत में लें, उसके संबंधी को सूचित करें और ऐसे व्यक्ति के भर्ती आदेशों को जारी करवाने हेतु उसे स्थानीय मजिस्ट्रेट के सामने उपस्थित करें.

मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्तियों को इलाज होने के बाद अस्पताल से डिस्चार्ज होने का अधिकार है और अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार वह छुट्टी का हक़दार है. जहां कहीं मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति भूमि सहित अपनी अन्य संपत्तियों की स्वयं देखरेख नहीं कर सकते वहां, जिला न्यायालय आवेदन करने पर ऐसी संपत्तियों के प्रबंधन की रक्षा और सुरक्षा ऐसे मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्तियों के संरक्षकों की नियुक्ति करने के द्वारा या ऐसी संपत्ति के प्रबंधकों की नियुक्ति द्वारा प्रतिपालय न्यायालय को सौंप कर करनी पड़ती है. सरकारी मनश्चिकित्सीय अस्पताल या नर्सिग होम में अंतःरोगी के रूप में भर्ती हुए मानसिक रुप से रुग्ण व्यक्ति के उपचार का ख़र्च, जब तक कि मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति की ओर से उसके संबंधी या अन्य व्यक्ति द्वारा ऐसे ख़र्च को वहन करने की सहमति न दी गई हो, संबंधित राज्य सरकार द्वारा ख़र्च का वहन किया जाएगा और इस तरह के अनुरक्षण के लिए प्रावधान ज़िला न्यायालय के आदेश द्वारा दिए गए हैं. इस तरह का खर्च मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति की संपत्ति से भी लिया जा सकता है. इलाज करवा रहे मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्तियों के साथ किसी भी प्रकार का असम्मान (चाहे यह शारीरिक हो या मानसिक) या क्रूरता नहीं की जाएगी और न ही मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति का प्रयोग उसके रोग-निदान या उपचार को छोड़कर, अनुसंधान के उद्देश्य से या उसकी सहमति से नहीं किया जाएगा. सरकार से वेतन, पेंशन, ग्रेच्यूटी या अन्य भत्तों के हकदार मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्तियों (जैसे सरकारी कर्मचारी, जो अपने कार्यकाल के दौरान मानसिक रूप से रुग्ण हो जाते हैं), को ऐसे भत्तों की अदायगी से मना नहीं किया जा सकता है. मजिस्ट्रेट से इस आशय का तथ्य प्रमाणित होने के बाद, मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति की देखरेख करने वाला व्यक्ति या मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति के आश्रित ऐसी राशि को प्राप्त करेंगे. यदि मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति कोई वकील नहीं कर सकता या कार्यवाहियों के संबंध में उसकी परिस्थितियों की ऐसी अपेक्षा हो तो अधिनियम के अंतर्गत उसे मजिस्ट्रेट या ज़िला न्यायालय के आदेश द्वारा वकील की सेवाओं को लेने का अधिकार है.

विकलांगों के कल्याण के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही है. विकलांगों के लिए राष्ट्रीय छात्रवृत्ति की इस योजना के तहत प्रत्येक वर्ष 500 नई छात्रवृत्ति ऐसे प्रतिभागियों को दी जाती है जो 10वीं के बाद 1 साल से अधिक अवधि वाले व्यावसायिक या तकनीकी पाठ्यक्रमों में अध्ययन करते हैं. हालांकि मानसिक पक्षाघात, मानसिक मंदता, बहु-विकलांगता तथा गंभीर श्रवण हानि से ग्रस्त छात्रों की स्थिति में छात्रवृत्ति 9वीं कक्षा से छात्र-छात्राओं को अध्ययन पूरा करने के लिए दी जाती है. छात्रवृत्ति के लिए प्रार्थनापत्र आमंत्रित करने की विज्ञप्ति प्रमुख राष्ट्रीय/क्षेत्रीय समाचारपत्रों में जून के महीने में दी जाती है तथा इसे मंत्रालय की वेबसाइट पर भी प्रकाशित किया जाता है. राज्य सरकारों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन से इस योजना के व्यापक विज्ञापन के लिए अनुरोध किया जाता है.

ऐसे छात्र जो 40 फ़ीसदी या ज़्यादा विकलांग की श्रेणी में आते हैं और जिनके परिवार की आय 15 हज़ार रुपए से ज़्यादा न हो, वे भी इस योजना के तहत आते हैं. स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर के तकनीकी या व्यावसायिक पाठ्यक्रमों वाले छात्रों को प्रति माह 700 रुपए की राशि सामान्य स्थिति में तथा 1,000 रुपए की राशि छात्रावास में रहने वाले छात्रों को दी जाती है. डिप्लोमा तथा सर्टिफिकेट स्तर के व्यावसायिक पाठ्यक्रमों वाले छात्रों को प्रति माह 400 रुपए की राशि सामान्य स्थिति में तथा 700 रुपए की राशि छात्रावास में रहने वाले छात्रों को दी जाती है. छात्रवृत्ति के अलावा छात्रों को पाठ्यक्रम की फ़ीस भी दी जाती है जिसकी राशि वार्षिक 10,000 रुपए तक है. इस योजना के तहत अंधे /बहरे स्नातक और स्नातकोत्तर छात्रों को व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को पूरा करने के लिए सॉफ्ट्वेयर के साथ कंप्यूटर के लिए भी आर्थिक सहायता दी जाती है. यह सहायता मानसिक पक्षाघात से ग्रस्त छात्रों को आवश्यक सॉफ्टवेयर की उपलब्धता के लिए भी दी जाती है.

सिर्फ़ योजनायें बनाने से विकलांगों का सशक्तिकरण होने वाला नहीं है. इसके लिए ज़रूरी है कि सरकारी योजनाओं का फ़ायदा ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचे. इसके लिए जागरूकता की ज़रूरत है. आम लोगों को भी चाहिए कि अगर उनके आस-पास ऐसा कोई व्यक्ति या बच्चा है तो उसके परिजनों को सरकारी योजनाओं की जानकारी मुहैया कराएं. यक़ीन मानिए हमारी ज़रा सी मदद से किसी की ज़िन्दगी की दिशा बदल सकती है. उसे जीने की एक नई राह मिल सकती है. मौक़ा मिलने पर विकलांग व्यक्ति भी विभिन्न क्षेत्रों में कामयाबी की इबारत लिख सकते हैं.