Saturday, April 15, 2017

भाषाई मर्यादा की दरकार

फ़िरदौस ख़ान
भाषा का दरख़्त दिल में उगता है और ज़ुबान से फल देता है. यानी जिसके दिल में जो होगा, वह शब्दों के ज़रिये बाहर आ जाएगा. किसी व्यक्ति की भाषा से उसके संस्कारों का, उसके विचारों का, उसके आचरण का पता चलता है. माना लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी है, सबको अपनी बात कहने का पूरा हक़ है. लेकिन कहीं अभिव्यक्ति की इस आज़ादी का, इस हक़ का ग़लत इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा है? यह समझना भी ज़रूरी है. भाषा शैली व्यक्ति के व्यक्तित्व का आईना है, समाज की सभ्यता का पैमाना है. आए दिन जिस तरह के बयान सुनने को मिल रहे हैं, क्या वे एक सभ्य समाज की निशानी कहे जा सकते हैं ? ताज़ा मामला पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सिर काटकर लाने वाले को इनाम देने के ऐलान का है.  

ग़ौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में बीरभूम ज़िले के सिवड़ी में हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ता हनुमान जयंती के मौक़े पर जय श्रीराम के नारे लगाते हुए सड़कों पर उतर आए. चूंकि पुलिस ने उन्हें जुलूस निकालने की इजाज़त नहीं दी थी, इसलिए जुलूस को रोकने की कोशिश की गई. इस बार विवाद इतना बढ़ गया कि हाथापाई होने लगी. पुलिस ने ग़ुस्साये कार्यकर्ताओं को क़ाबू करने के लिए लाठीचार्ज कर दिया. इस घटना के बाद इलाक़े में तनाव का माहौल पैदा हो गया. इसके बाद भारतीय जनता युवा मोर्चा के नेता योगेश वार्ष्णेय ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सिर काटकर लाने वाले को इनाम देने का ऐलान कर दिया. उन्होंने कहा कि वह ख़ुद उसे 11 लाख का इनाम देंगे, जो ममता बनर्जी का स‍िर काटकर लाएगा. उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि ऐसा घिनौना कृत्य किसी इंसान द्वारा किया जा सकता है. यह काम किसी हैवान द्वारा ही किया जा सकता है और हैवान को सज़ा मिलना अति आवश्यक है.
मीडिया में इस बयान के आते ही तृणमूल कांग्रेस के ज़िलाध्यक्ष रामफूल उपाध्याय की शिकायत पर योगेश वार्ष्णेय के ख़िलाफ़ सिविल लाइंस थाने में मुक़दमा दर्ज किया गया. ख़ैर, बात यहीं ख़त्म नहीं हुई. कोलकाता की टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम सैयद मोहम्मद नुरूर रहमान बरकती ने एक क़दम आगे बढ़ते हुए योगेश वार्ष्णेय के सिर की क़ीमत दोगुनी कर दी. उन्होंने ऐलान किया कि योगेश वार्ष्णेय का सिर क़लम करने वाले को 22 लाख रुपये दिए जाएंगे. समाजवादी पार्टी के नेता भी कहां पीछे रहने वाले थे. पार्टी के पूर्व विधायक ज़मीरउल्लाह ने कहा कि ऐसा बयान देने वाले की जीभ काट लेनी चाहिए.
किसी का सिर काटकर लाने पर इनाम देने के ऐलान का यह पहला मामला नहीं है. इससे पहले तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के भारतीय जनता पार्टी के विधायक राजा सिंह ने अपने विवादित बयान में कहा था कि जो लोग राम मंदिर बनाए जाने का विरोध करते हैं, हम उनका सिर काट देंगे. उन्होंने आगे कहा कि उनका यह बयान उन लोगों के लिए है, जो यह कहते हैं कि राम मंदिर का निर्माण हुआ, तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. हम उनके इस बात के कहने का इंतज़ार कर रहे हैं, ताकि हम उनका सिर काट सकें. इसी तरह पिछले माह मध्य प्रदेश के उज्जैन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ महानगर प्रचार प्रमुख डॉ. कुंदन चंद्रावत ने एक विवादित बयान देते हुए कहा था कि कोई हत्यारे केरल के सीएम का सिर काटकर ला दे, वह अपनी एक करोड़ स्र्पये की संपत्ति उसके नाम कर देंगे.

दरअसल, आज सहनशीलता कम हो रही है. लोग अपनी आलोचना ज़रा सी भी बर्दाश्त नहीं कर पाते. जहां कोई ऐसी बात हुई, जो उनके मन मुताबिक़ न हुई, या जो उन्हें पसंद नहीं आई, तो वे आग बबूला हो उठते हैं. सारी मान-मर्यादाएं ताख़ पर रख देते हैं और ऐसे बयान दे डालते हैं. सियासत में चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेता इस मामले में सबसे आगे रहते हैं. ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने ही विवादित बयान दिए हैं. इस मामले में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी आदि के नेता भी पीछे नहीं हैं.

भारतीय संस्कृति में महिलाओं का महत्वपूर्ण स्थान है. नारी को नारायणी कहा गया है, देवी कहा गया है. लेकिन हक़ीक़त में देश और समाज के कर्ताधर्ता महिलाओं के ख़िलाफ़ अपशब्द बोलने से बाज़ नहीं आ रहे हैं. हाल के कुछ सालों में सियासत में भाषाई मर्यादा ख़त्म होने लगी है. देश के प्रधानमंत्री से लेकर कार्यकर्ता तक एक ही तरह की भाषा इस्तेमाल करते मिल जाएंगे. केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार में ऐसे बयानवीरों की लंबी फ़ेहरिस्त है, जिनके बयानों ने देश में हंगामा बरपा किया है. यह बेहद अफ़सोस की बात है कि सत्ता के उच्च पदों पर बैठे लोग भाषाई मर्यादा के मामले में बेहद बौने साबित हो रहे हैं. कहते हैं, पहले तोलो, फिर बोलो, यानी बोलने से पहले सौ बार सोच लेना चाहिए कि क्या बोलना है, किस तरह बोलना है. कहा गया है कि तलवार का ज़ख़्म भर जाता है, लेकिन बात का ज़ख़्म कभी नहीं भरता.

बहरहाल, उच्च पदों पर बैठे वाले लोगों ख़ास कर सामाजिक क्षेत्र में काम करने वालों को इस तरह के बयानों से बचना चाहिए. ऐसे बयानों से समाज में कटुता बढ़ती है. ऐसे बयान देश की एकता और अखंडता के साथ-साथ समाज के चैन-अमन के लिए भी ख़तरनाक हैं. देश और समाज में वैमन्य फैलाने वाले इन बयानों में तेज़ी आई है, तो इसके लिए वरिष्ठ नेता भी ज़िम्मेदार कहे जा सकते हैं, जिन पर अपने कार्यकर्ताओं को भाषा की मर्यादा व देश की संस्कृति सिखाने की ज़िम्मेदारी है. किसी भी पार्टी का कोई नेता अगर भड़काऊ बयानबाज़ी करता है, तो उस पर कार्रवाई तक नहीं की जाती. यही दूसरे नेताओं में भी उत्साह का संचार करती है. देश में भाषाई मर्यादा जिस तरह की जिस तरह से धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, उसे देखते हुए सरकार को ही आगे आना पड़ेगा और ऐसी व्यवस्था बनानी पड़ेगी, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी कहने की आज़ादी किसी को न दे. न तो सार्वजनिक मंचों से और न ही चुनावी रैलियों में. लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए यही बेहतर मार्ग है.

Friday, April 14, 2017

बग़ावत से जूझती कांग्रेस

फ़िरदौस ख़ान
पिछले काफ़ी अरसे से कांग्रेस अंदरूनी कलह और बग़ावत से जूझ रही है. इसी अंदरूनी कलह की वजह से कांग्रेस केंद्र और कई राज्यों से सत्ता गंवा चुकी है. उत्तराखंड में भी कांग्रेस अपने ही विधायकों की वजह से सत्ता से बाहर हो गई थी. हालांकि काफ़ी जद्दोजहद के बाद उसे खोयी हुई सत्ता वापस मिल गई. अब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भी पार्टी को छोड़कर जा रहे हैं. अब कांग्रेस को तीन और राज्यों से झटका लगा है. मुंबई में निकाय चुनाव से पहले महाराष्ट्र के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री गुरुदास कामत ने पार्टी से इस्तीफ़ा देते हुए राजनीति से संन्यास का ऐलान कर दिया है. गुरुदास कामत को गांधी परिवार का भरोसेमंद माना जाता है. पार्टी कार्यकर्ताओं को भेजे संदेश में उन्होंने लिखा है, "कई महीनों से मैंने महसूस किया कि मुझे नये लोगों को आगे आने के लिए पीछे हट जाना चाहिए. दस दिन पहले मैं कांग्रेस अध्यक्ष से मिला और इस्तीफ़ा देने की मंशा ज़ाहिर की. इसके बाद मैंने उन्हें और राहुल जी को पत्र लिखकर बता दिया कि मैं पार्टी छोड़ना चाहता हूं. इसके बाद से कोई जवाब नहीं आया. मैंने राजनीति से संन्यास लेने के बारे में बता दिया है." सियासी गलियारे में चर्चा है कि गुरुदास कामत मुंबई इकाई में अपनी उपेक्षा से नाराज़ थे. वह पार्टी में सुधार चाहते थे. इसके लिए उन्होंने पार्टी हाईकमान को कुछ सुझाव भी दिए, जिस पर कोई तवज्जो नहीं दी गई. कहा यह भी जा रहा है राहुल गांधी की मुंबई कांग्रेस प्रमुख संजय निरुपम से नज़दीकी और अपनी अनदेखी ने उन्हें चोट पहुंचाई.

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के क़द्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने पार्टी का साथ छोड़ कर अपनी अलग सियासी पार्टी बना ली है. राज्यसभा का टिकट नहीं मिलने से अजीत जोगी कांग्रेस आलाकमान से नाराज़ थे. बेटे अमित को पार्टी से निकाले जाने पर भी उनमें कांग्रेस के लिए आक्रोश था. ग़ौरतलब है कि अमित जोगी अंतागढ़ टेप कांड में कांग्रेस से निकाले गए थे. उन्होंने अपने पैतृक गांव मरवाही में कांग्रेस पर कांग्रेस छोड़ने का ऐलान करते हुए कहा, "मैं अब कांग्रेस से आज़ाद हूं." इस मौक़े पर कांग्रेस के तीन विधायक और कई पूर्व विधायक भी मौजूद थे. अजीत जोगी का कहना है कि अब राज्य के फ़ैसले दिल्ली से नहीं होंगे. उनका कहना है कि कांग्रेस अब नेहरू, इंदिरा और राजीव-सोनिया गांधी वाली कांग्रेस नहीं रह गई है. इसमें जनाधार वाले नेताओं के लिए कोई जगह नहीं है.

पूर्वोत्तर में भी कांग्रेस एक बार फिर संकट में घिर गई है. अरुणाचल प्रदेश, असम और मेघालय के बाद त्रिपुरा पूर्वोत्तर का चौथा राज्य है, जहां कांग्रेस को बग़ावत का सामना करना पड़ा है.यहां पार्टी के छह बाग़ी विधायक कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. इनमें त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री समीर रंजन बर्मन के पुत्र सुदीप राय बर्मन, बिस्वबंधु सेन, दिबा चंद्र हृंखाव्ल, आशीष साहा, दिलीप सरकार और प्राणजीत सिन्हा रॉय शामिल हैं. समीर रंजन बर्मन पहले ही पार्टी छोड़ चुके हैं.  इससे राज्य की 60 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस की विधायकों की संख्या दस से घटकर तीन रह जाएगी. त्रिपुरा में वाम की सरकार है. विधानसभा की 50 सीटों पर वाम का क़ब्ज़ा है. यहां अब तृणमूल मुख्य विपक्षी पार्टी बन जाएगी. कांग्रेस के बाग़ी नेताओं का कहना है कि पश्चिम बंगाल चुनाव में वाम के साथ भागीदारी करने के पार्टी के फ़ैसले के ख़िलाफ़ उन्होंने इस्तीफ़ा दिया है. पिछले चुनावों में कांग्रेस की तरफ़ से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार समीर रंजन बर्मन ने कहा है, " तृणमूल में शामिल होने का हमारा मक़सद वाम की इस भ्रष्ट, जन विरोधी सरकार को हराना है." उन्होंने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस-वाम गठबंधन के विरोध में नेता विपक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. अब त्रिपुरा कांग्रेस में अध्यक्ष बिरजीत सिन्हा और दो अन्य विधायक हैं. ग़ौरतलब है कि त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव 2018 में होगा. माकपा के प्रदेश सचिव बिजन धर ने दावा किया है कि विधानसभा से इस्तीफ़ा देने वाले कांग्रेस के एक अन्य असंतुष्ट विधायक जितेन सरकार ने सत्तारूढ़ माकपा में शामिल होने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की है. उनका यह भी कहना है कि दिलीप सरकार माकपा के पूर्व सदस्य हैं, जो माकपा के टिकट पर पांच बार विधानसभा पहुंचे और वह नौ साल तक विधानसभा के अध्यक्ष रहे हैं. उन्हें माकपा में वापस लाया जाएगा.

ग़ौरतलब है कि कांग्रेस के लिए चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में नतीजे मायूस करने वाले रहे. सिर्फ़ पुड्डुचेरी में ही कांग्रेस सरकार बना पाने में कामयाब रही है. असम, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा. कांग्रेस में बग़ावत के लिए कौन ज़िम्मेदार है. क्या कांग्रेस नेताओं का पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से विश्वास कम हो रहा है या फिर राज्यों के पार्टी नेताओं का असंतोष बग़ावत के तौर पर सामने आ रहा है.

क़ाबिले-ग़ौर है कि कांग्रेस में बग़ावत के सुर उस वक़्त मुखर हो रहे हैं, जब राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने की बात चल रही है. पार्टी के दिग्गज नेता पार्टी की कमान राहुल गांधी को सौंप देना चाहते हैं. राहुल की टीम में युवा चेहरों को तरजीह दिए जाने की भी पूरी उम्मीद है.

हालांकि कांग्रेस की अंदरूनी दिक़्क़तों को दूर करने के लिए पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने एक 'एडवाइज़र्स ब्लॉक' का गठन करने की सलाह दी है. इसमें दस नेता और उद्योगपतियों को शामिल किया जाएगा, जो पार्टी के अहम मुद्दों पर फ़ैसले लेंगे. बताया जा रहा है कि यह भारतीय जनता पार्टी के पार्लियामेंट्री बोर्ड जैसा होगा. राहुल गांधी इसमें पी. चिदंबरम और ग़ुलाम नबी आज़ाद जैसे वरिष्ठ नेताओं को शामिल करना चाहते हैं.  कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को मलाल है कि पार्टी नेतृत्व उनकी बात नहीं सुनता. राहुल गांधी को चाहिए कि वे अपनी पहुंच पार्टी के आख़िरी कार्यकर्ता तक बनाएं. अगर वे ऐसा पर पाए, तो कांग्रेस को उसका खोया रुतबा वापस दिला पाएंगे.

बहरहाल, कांग्रेस चाहती, तो गुरुदास कामत को उसी वक़्त मना लेती, जब उन्होंने इस्तीफ़ा देने की पेशकश की थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. कांग्रेस को चाहिए कि वह भले ही पार्टी की बागडोर युवा टीम के हवाले कर दे, लेकिन पार्टी के विश्वसनीय और पुराने उन नेताओं की अनदेखी न करे, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी कांग्रेस को समर्पित कर दी. वही दरख़्त फलता-फूलता है, जिसकी जड़ें मज़बूत हों, कांग्रेस को भी अपनी जड़ों की मज़बूती को बरक़रार रखना होगा, वरना पार्टी को बिखरने में देर नहीं लगेगी.



Tuesday, April 4, 2017

लोकतंत्र में बढ़ती हिन्दुत्व विचारधारा

फ़िरदौस ख़ान
उत्तर प्रदेश ने देश की सियासत में एक ऐसी इबारत लिखी है, जिसका आने वाले वक़्त में गहरा असर पड़ेगा. नरेंद्र मोदी ने गुजरात से हिन्दुत्व की जो राजनीति शुरू की थी, वह अब उत्तर प्रदेश से परवान चढ़ेगी. भारतीय जनता पार्टी पहले से ही कहती रही है कि पूर्ण बहुमत मिलने के बाद देश में हिन्दुत्ववादी एजेंडे को लागू किया जाएगा. केंद्र में भी बहुमत की सरकार है और अब उत्तर प्रदेश में भी भाजपा ने बहुमत की सरकार बनाई है. ऐसे में देश-प्रदेश में हिन्दुत्ववादी विचारधारा को ध्यान में रखकर फ़ैसले लिए जाएं, तो हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए.

क़ाबिले-ग़ौर है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा, जबकि अन्य राज्यों में वह क्षेत्रीय नेताओं के नाम पर विधानसभा चुनाव लड़ती है. मध्य प्रदेश में शिवराज चौहान के नाम पर जनता से वोट मांगे जाते हैं. इसी तरह छ्त्तीसगढ़ में रमन सिंह और बिहार में सुशील मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाता है. इन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ से मुख्यमंत्री पद का दावेदार कौन होगा, यह भी पहले से ही तय होता है. फिर उत्तर प्रदेश में ऐसा क्या हो गया कि राज्य में नेताओं की एक बड़ी फ़ौज होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी को मोदी के नाम पर चुनाव लड़ना पड़ा. भारतीय जनता पार्टी के काफ़ी वरिष्ठ नेता उत्तर प्रदेश से ही हैं, जिनमें राजनाथ, कलराज मिश्र, कल्याण सिंह, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती आदि शामिल हैं. इसके बावजूद पार्टी ने इन नेताओं को तरजीह नहीं दी.

विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को उम्मीद से ज़्यादा कामयाबी मिली. अकेले उसके 312 विधायक जीते, जबकि सहयोगियों के साथ यह आंकड़ा 325 है. इसके बावजूद इनमें से कोई मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाया. भाजपा ने सांसद योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाकर सबको चौंका दिया. इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश के सियासी इतिहास में पहली बार बने दो उप-मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा और केशव प्रसाद मौर्य विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं. लोकसभा सांसद केशव मौर्या की भी पहचान एक कट्टर हिन्दुत्ववादी नेता की रही हैं. वह विश्व हिन्दू परिषद से भी जुड़े रहे हैं.

योगी सरकार के इकलौते मुसलमान मंत्री मोहसिन रज़ा भी विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं. वह कुछ वक़्त पहले ही भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए थे. माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग और वक्फ़ बोर्ड समेत कई ऐसे निगम हैं, जिनका अध्यक्ष मुसलमान ही होता है. शायद इसलिए ही रज़ा को यह पद मिल गया, वरना भारतीय जनता 20 करोड़ से ज़्यादा आबादी वाले उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को एक भी मुसलमान ऐसा नहीं मिला था, जिसे वह उम्मीदवार बना पाती. पार्टी के वरिष्ठ नेता शाहनवाज़ ख़ान ने ख़ुद इस बात की तस्दीक की थी.

आख़िर क्या वजह है कि भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में विधायकों को तरजीह देने की बजाय सांसद को मुख्यमंत्री बनाया. जानकारों का मानना है कि इतना बड़ा फ़ैसला भारतीय जनता पार्टी अकेले अपने दम पर नहीं ले सकती. इसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक का एजेंडा काम कर रहा था. ऐसा लगता है कि संघ मोदी का विकल्प तैयार कर रहा है. योगी आदित्यनाथ की छवि कट्टर हिन्दुत्ववादी नेता की रही है. वह गोरखनाथ मंदिर के पूर्व महंत अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी हैं. वह हिन्दू युवाओं के सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी समूह हिन्दू युवा वाहिनी के संस्थापक भी हैं. एक समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ विवादित बयान देने के लिए भी जाने जाते हैं. उनके विवादित बयानों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है. पिछले साल जून में उनके इस बयान पर ख़ूब विवाद हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था, "जब अयोध्या में विवादित ढांचा गिराने से कोई नहीं रोक सका तो मंदिर बनाने से कौन रोकेगा." उससे पहले जून 2015 में योग के विरोध पर उन्होंने कहा था,  "जो लोग योग का विरोध कर रहे हैं उन्‍हें भारत छोड़ देना चाहिए. जो लोग सूर्य नमस्‍कार को नहीं मानते उन्‍हें समुद्र में डूब जाना चाहिए." इसी तरह फ़रवरी 2015 में उनका यह बयान आया, "अगर उन्हें अनुमति मिले तो वो देश के सभी मस्जिदों के अंदर गौरी-गणेश की मूर्ति स्थापित करवा देंगे. आर्यावर्त ने आर्य बनाए, हिंदुस्तान में हम हिंदू बना देंगे. पूरी दुनिया में भगवा झंडा फहरा देंगे. मक्का में ग़ैर मुस्लिम नहीं जा सकता है, वैटिकन में ग़ैर ईसाई नहीं जा सकता है. हमारे यहां हर कोई आ सकता है." प्रदूषण और मुसलमानों की बढ़ती आबादी जैसे मुद्दों पर भी वह कई विवादित बयान दे चुके हैं.

उत्तर प्रदेश के 21वें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ साल 1998 से लगातार भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. चुनाव के दौरान उनके समर्थकों ने 'दिल्ली में मोदी, यूपी में योगी' का नारा दिया था. उत्तर प्रदेश में योगी के मुख्यमंत्री बनने से यह साफ़ है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश के लोकतंत्र में हिन्दुत्ववादी विचारधारा को बढ़ावा दे रहा है. साल 2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के बनने के बाद से देश में सांप्रदायिक घटनाओं में ख़ासी बढ़ोतरी हुई है. उत्तर प्रदेश के दादरी कांड के बाद एक समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ हमले बढ़ गए. गौमांस के नाम पर लोगों का एक झुंड किसी पर भी टूट पड़ता था. इससे एक समुदाय विशेष के मन में असुरक्षा की भावना बढ़ गई. अन्य सियासी दलों ने मुसलमानों के इसी डर का ख़ूब फ़ायदा उठाया. इस तरह की घटनाओं ने वोटों के ध्रुवीकरण का काम किया. भाजपा समर्थित लोगों के वोट इकट्टे हो गए और ग़ैर भाजपाई और मुसलमानों के वोट बंट गए.

मोदी भले ही सबका साथ, सबका विकास का नारा देते रहें, लेकिन सब जानते हैं कि उन्होंने किसका विकास किया और किसे अनदेखा किया. उनके ’जुमले’ तो जगज़ाहिर हैं. संवैधानिक पद पर बैठने के बाद व्यक्ति विशेष की मजबूरी बन जाती है कि उसे सबके हित की बात बोलनी ही पड़ती है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की यह विशेषता रही है कि वे कितने ही बड़े संवैधानिक पद पर क्यों न बैठ जाएं, बात सिर्फ़ अपने मन की ही करते हैं. भले ही इससे किसी को ठेस ही क्यों न पहुंचे.

बहरहाल, उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ योगी का मुख्यमंत्री बनना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बड़ी जीत ज़रूर है, लेकिन यह भारतीय जनता पार्टी की सियासी हार है.

Saturday, March 25, 2017

राहुल गांधी के अपने कितने ’अपने’

फ़िरदौस ख़ान
पिछले के कई बरसों से देश में कोई भी चुनाव हो, राहुल गांधी की जान पर बन आती है. पिछले लोकसभा चुनाव हों, उससे पहले के विधानसभा चुनाव हों या उसके बाद के विधानसभा चुनाव हों, सभी के चुनाव नतीजे राहुल गांधी के सियासी करियर पर गहरा असर डालते हैं. पिछले काफ़ी अरसे से कांग्रेस को लगातार हार का सामना करना पड़ रहा है. और हर हार के साथ राहुल गांधी के हिस्से में एक हार और दर्ज हो जाती है. आख़िर क्या वजह है कि राहुल गांधी के आसपास शुभचिंतकों की बड़ी फ़ौज होने के बावजूद वह कामयाब नहीं हो पा रहे हैं.

हाल ही में पांच राज्यों में चुनाव के नतीजे आने के बाद राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं. भले ही पंजाब में कांग्रेस सरकार बनाने में कामयाब हो गई, लेकिन उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों ने कांग्रेस को ख़ासा मायूस किया है. उत्तराखंड में भी कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा है. हालांकि मणिपुर और गोवा में कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी से बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन सियासी रणनीति सही नहीं होने की वजह से कांग्रेस सरकार बनाने में नाकाम रही.

ग़ौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में साल 2009 के लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस 2004 के मुक़ाबले और ज़्यादा मज़बूत होकर सामने आई, तो उसका श्रेय राहुल गांधी को ही दिया गया. ख़ासकर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के 21 सांसद जीतकर आने को राहुल गांधी की कामयाबी बताया गया. मगर उसके बाद से कांग्रेस को ज़्यादातर नाकामी का ही सामना करना पड़ रहा है. जिस वक़्त केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और उत्तर प्रदेश से कांग्रेस में 21 सांसद थे, तब साल 2012 में वहां हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस महज़ 28 सीटें ही जीत पाई थी. उस वक़्त पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 117 में से 46 सीटें जीत सकी थी. हार की वजह कैप्टन अमरिन्दर सिंह से कांग्रेसियों का नाराज़ होना और पार्टी द्वारा अमरिन्दर सिंह को मुख्यमंत्री पद के लिए पसंद किया जाना बताया गया था. इसी तरह गोवा में भी कांग्रेस को सत्ता से बेदख़्ल होना पड़ा. उत्तराखंड और मणिपुर में कांग्रेस सत्ता हासिल करने में कामयाब रही. गुजरात चुनाव में भले ही कांग्रेस को हार मिली हो, लेकिन देवभूमि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने जीत हासिल की. फिर अगले साल 2013 में दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, त्रिपुरा और नगालैंड में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. मेघालय, मिज़ोरम और कर्नाटक में कांग्रेस को जीत हासिल हुई. पिछले 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को अपनी सत्ता गंवानी पड़ी. एक दशक से सत्ता पर क़ाबिज़ कांग्रेस महज़ 44 सीटों तक ही सिमट कर रह गई. इतना ही नहीं, साल 2014 में हरियाणा और महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस की हार हुई और सत्ता उसके हाथों से निकल गई. इसी तरह झारखंड और जम्मू-कश्मीर में भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. अगले साल 2015 में कांग्रेस बिहार में महागठबंधन में शामिल हुई और उसने जीत का मुंह देखा. साल 2016 में असम कांग्रेस के हाथ से निकल गया. केरल और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को नाकामी ही मिली. पुड्डुचेरी में कांग्रेस को जीत नसीब हुई.
इस साल के आख़िर में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. कुछ दिन बाद दिल्ली नगर निगम में चुनाव होने हैं. कांग्रेस निकाय चुनाव में भी बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पा रही है. पिछले दिनों महाराष्ट्र निकाय चुनाव में कांग्रेस को नाकामी हासिल हुई. कांग्रेस महज़ 31 सीटों तक ही सिमट कर रह गई, जबकि साल 2012 के चुनाव में कांग्रेस के 52 पार्षद जीते थे.

हालत यह है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी कांग्रेस के ख़राब प्रदर्शन पर मायूसी ज़ाहिर करते हुए कांग्रेस को नये सिरे से अपनी रणनीतियों पर विचार करने की सलाह दे डाली. कांग्रेस की लगातार हार से पार्टी के बीच से आवाज़ उठने लगी है. कुछ वक़्त पहले दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री ने राहुल गांधी को अपरिपक्व कह दिया था. अब उनके बेटे संदीप दीक्षित ने पार्टी की रणनीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि देवरिया से दिल्ली तक की यात्रा रोकने से पार्टी को काफ़ी नुक़सान हो गया है. सनद रहे कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले कांग्रेस ने शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर दिया था और बड़े ही जोश से राहुल गांधी अगुवाई में देवरिया से दिल्ली की यात्रा शुरू कर दी थी, लेकिन बाद में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी से समझौता कर लिया.

राहुल गांधी बहुत अच्छे इंसान हैं. वह ख़ुशमिज़ाज, ईमानदार, मेहनती और सकारात्मक सोच वाले हैं और मेहनत भी ख़ूब करते हैं. इसके बावजूद उतने कामयाब नहीं हो पाते, जितने होने चाहिए. आख़िर उनकी नाकामी की वजह क्या है? अगर इस पर गौर क्या जाए, तो कई वजहें सामने आती हैं. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि जो लोग ख़ुद को राहुल गांधी का क़रीबी और शुभचिंतक कहते हैं, वही लोग उनके बारे में दुष्प्रचार करते हैं. यूं तो राहुल गांधी जनसभाएं करते हैं, आम आदमी से सीधे रूबरू होकर बात करते हैं, लेकिन अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं से दूर हैं.
क़ाबिले-ग़ौर है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी बीमारी की वजह से सियासत में सक्रिय नहीं हैं. उनकी ग़ैर हाज़िरी में पार्टी के सभी फ़ैसले राहुल गांधी ही ले रहे हैं. इन फ़ैसलों में उनके सियासी सलाहकारों की भी बड़ी भूमिका रहती है. हर चुनाव में पार्टी की हार के बाद राहुल गांधी को अपनी रणनीतियों में बदलाव लाने की सलाह दी जाती है. पार्टी को अपनी हार का विशलेषण कर ख़ामियों को दूर करना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता. पार्टी हर चुनाव में अपनी पुरानी ख़ामियों को दोहराती है.

कुछ महीनों बाद फिर से दो राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. साल 2019 में लोकसभा चुनाव आ रहा है. कांग्रेस के पास ज़्यादा वक़्त नहीं है. उसे आने वाले चुनावों में जीत हासिल करनी है, तो ईमानदारी से अपनी ख़ामियों पर ग़ौर करना होगा. पार्टी को अपनी चुनावी रणनीति बनाते वक़्त कई बातों को ज़ेहन में रखना होगा. उसे सभी वर्गों का ध्यान रखते हुए अपने पदाधिकारी तक करने होंगे. पार्टी के क्षेत्रीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी विश्वास में लेना होगा, क्योंकि जनता के बीच तो इन्हीं को जाना है. बूथ स्तर तक पार्टी संगठन को मज़बूत करना होगा. राहुल गांधी को चाहिए कि वे पार्टी के आख़िरी कार्यकर्ता तक से संवाद करें. उनकी पहुंच हर कार्यकर्ता तक और कार्यकर्ता की पहुंच राहुल गांधी तक होनी चाहिए. उन्हें पार्टी के मायूस कार्यकर्ताओं में जोश भरना होगा और जनसंपर्क बढ़ाना होगा. अगर वह ऐसा कर पाए, तो फिर कांग्रेस को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक पाएगा.


Wednesday, December 21, 2016

काले धन पर पारदर्शिता बरतनी होगी

फ़िरदौस ख़ान
कालेधन पर रोक लगाने के केंद्र सरकार के नोटबंदी के फ़ैसले के बाद अब सबकी नज़र सियासी दलों के चंदे पर है.  देश की अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता के लिए सामाजिक अंकेक्षण की मांग उठ रही है. जब नोटबंदी, कैश लेस ट्रांजेक्शन, सोना, रियल स्टेट में कैश लेस ख़रीद-बिक्री को लेकर आम जनता प्रभावित है, तो फिर जनता द्वारा भरे गए प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष करों से मिली रक़म का इस्तेमाल करने वाले नेताओं और सियासी दलों को भी पारदर्शिता बरतनी होगी.

इस बाबत चुनाव में काले धन का इस्तेमाल रोकने के लिए चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार को क़ानून में संशोधन की सिफ़ारिश की है. इसके लिए चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार को तीन सुझाव भी दिए हैं. पहला सियासी दलों के दो हज़ार रुपये से ज़्यादा गुप्त चंदा लेने पर रोक लगाई जाए, दूसरा चुनाव न लड़ने वाले सियासी दलों को आयकर से छूट नहीं दी जाए और तीसरा सियासी दल कूपन के ज़रिये चंदा देने वाले लोगों की भी पूरी जानकारी रखें. क़ाबिले-ग़ौर है कि फ़िलहाल गुप्त चंदे पर क़ानूनी रोक नहीं है. जनप्रतिनिधित्व क़ानून 1951 की धारा 29(सी) के तहत 20 हज़ार रुपये से ज़्यादा के चंदे की सूचना चुनाव आयोग को देनी होती है. इससे नीचे की रक़म का कोई ब्यौरा नहीं दिया जाता. आमदनी के मामले में कांग्रेस ने चुनाव आयोग को बताया कि एक दशक में उसे दो-तिहाई रकम 20 हज़ार रुपये से नीचे के चंदे के ज़रिये हुई है, जबकि भारतीय जनता पार्टी ने अपनी 44 फ़ीसद आमदनी को 20 हज़ार रुपये से नीचे की मदद को बताया है. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के मुताबिक़  उन्हें 20 हज़ार रुपये से ज़्यादा चंदा देने वाला कोई नहीं है, इसलिए उनमें यह दर 100 फ़ीसद है. ऐसे में नियामक एजेंसियां यह पता लगाने में नाकाम रहती हैं कि सियासी दलों के पास आख़िर इतनी बड़ी रक़म कहां से आई है. सियासी दलों को आयकर भरने से भी छूट है. आयकर क़ानून की धारा 13ए के तहत  संपत्ति, चंदा, या दूसरे स्रोतों से हुई आमदनी पर कोई कर नहीं देना पड़ता. कूपन या रसीद के ज़रिये चंदा देने वालों का ब्यौरा देना भी ज़रूरी नहीं है. इस तरह छोटी-छोटी रक़म के कूपनों के ज़रिये कितनी भी रक़म दिखाई जा सकती है. सियासी दल चुनाव आयोग को जिस रक़म का ब्यौरा देते हैं, वह पैसा कॊरपोरेट घरानों से चंदे के तौर पर आता है, जो पूरी तरह आयकर से मुक्त है. इसके अलावा सियासी आरटीआई के दायरे में नहीं आते. सियासी दलों की आमदनी और ख़र्च दोनों ही में पारदर्शिता नहीं होती. चुनाव आयोग भी अपने लेखा विभाग से इसकी जांच नहीं करा सकता. ऐसी हालत में कालेधन को बहुत ही आसानी से सफ़ेद किया जा सकता है. सियासी दलों पर आरोप लग रहे हैं कि नोटबंदी के बाद उनके खातों में एक लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा के पुराने नोट जमा हुए हैं. यह भी आरोप है कि बहुत से छोटे सियासी दल 25 फ़ीसद कमीशन पर कालेधन को सफ़ेद बनाने में लगे हैं. साथ ही सियासी गलियारे में चर्चा थी कि नोटबंदी के बाद सियासी दलों के खातों में जमा हुए पुराने नोटों की जांच नहीं होगी. हालांकि विवाद बढ़ने पर राजस्व सचिव हंसमुख अढिया को सफ़ाई देनी पड़ी कि नोटबंदी के बाद कोई भी सियासी दल 500 और 1000 रूपये में चंदा स्वीकार नहीं कर सकता. अगर उन्होंने ऐसा किया, तो उन पर भी कार्रवाई होगी.

ग़ौरतलब है कि चुनावों में कालेधन का ख़ूब इस्तेमाल होता है. चुनाव सुधार के लिए काम करने वाली एजेंसियों का भी यही कहना है कि काला धन सबसे ज़्यादा चुनावों में ही खपता है. क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि सियासी दलों को मिली रियायत का ग़लत फ़ायदा उठाने का मौक़ा मिला रहता है. बड़ी रक़म को ज़्यादा हिस्सों में बांटकर कालेधन को सफ़ेद बनाया जा सकता है. आयकर में छूट हासिल करने के मक़सद से ही ज़्यादतर सियासी दलों का गठन हुआ है. फ़िलहाल देश में 1900 से ज़्यादा सियासी दल हैं, जिनमें से तक़रीबन 1400 सियासी दलों ने किसी भी चुनाव में अपना एक उम्मीदवार भी मैदान में नहीं उतारा. हालत यह है कि पिछले आम चुनाव में महज़ 45 दलों ने ही चुनाव लड़ा. चंदे के कूपन का भी कोई नियम नहीं है. कितने भी कूपन छपवाकर कितनी भी रक़म का चंदा दिखाया जा सकता है.

एसोसिएशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक रिफ़ॊर्म्स (एडीआर) की साल 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक़ सियासी दलों को 75 फ़ीसद से ज़्यादा चंदा अज्ञात स्रोतों से मिला. पिछले दस सालों में सियासी दलों के चंदे में 478 की बढ़ोतरी हुई. साल 2004 के लोकसभा चुनाव में 38 दलों को 253.46 करोड़ रुपये का चंदा मिला, जो साल 2014 में बढ़कर 1463.63 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. पिछले तीन लोकसभा चुनावों में 44 फ़ीसद चंदा नक़दी के तौर पर था. लोकसभा चुनावों के अलावा इस दौरान हुए विधानसभा चुनावों में भी सियासी दलों ने चंदे के तौर पर करोड़ों रुपये जुटाये.  साल 2004 से 2015 के बीच हुए विधानसभा चुनावों में सियासी दलों को 3368.06 करोड़ रुपये मिले. इसमें से 63 फ़ीसद रक़म नक़दी के तौर पर मिली. चुनाव आयोग में जमा किए गए चुनावी ख़र्च के विवरण के मुताबिक़ पिछले तीन लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दलों में समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, अन्नाद्रमुक, बीजू जनता दल और शिरोमणि अकाली दल को सबसे ज़्यादा चंदा मिला है और इन्हीं दलों ने सबसे ज़्यादा रक़म खर्च भी की है. साल 2004 और 2015 के विधानसभा चुनावों के दौरान क्षेत्रीय दलों समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, शिरोमणि अकाली दल, शिवसेना और तृणमूल कांग्रेस को सबसे ज़्यादा चंदा मिला है और इन्हीं दलों ने सबसे ज़्यादा पैसे ख़र्च किए हैं. एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2014-15 में चुनावी ट्रस्टों ने 177.55 करोड़ चंदे के तौर पर जुटाये हैं और उनमें से 177.40 करोड़ अलग-अलग सियासी दलों को चंदे के रूप में दिए गए.

अफ़सोस की बात है कि अपनी आमदनी के मामले में सियासी दल पारदर्शिता नहीं चाहते. सनद रहे कि केंद्रीय चुनाव आयोग ने जब साल 2013 में पार्टियों को सार्वजनिक संस्था घोषित करते हुए उन्हें सूचना का अधिकार (आरटीआई) के दायरे में लाने का आदेश दिया था, तब कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा और वामदलों से लेकर तक़रीबन सभी बड़े-छोटे दलों ने एक सुर में इसका विरोध किया था. पिछले सरकार केंद्र की भाजपा सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में कहा था कि सियासी दलों को आरटीआई के दायरे में लाने से उनके संचालन पर असर पड़ेगा और सियासी विरोधी भी इसका फ़ायदा उठा सकते हैं. सियासी दल भी इस बात को बख़ूबी जानते हैं कि चुनाव के दौरान कालाधन बाहर आ जाता है. कालेधन के मामले में सख़्ती होने से उनकी आमदनी पर भी इसका असर पड़ेगा. सियासी दलों के इसी विरोध की वजह से ही चुनाव आयोग और लॊ कमीशन के सुझावों की तमाम फ़ाइलें दफ़्तरों में पड़ी धूल फांक रही हैं. चुनाव आयोग ने सियासी दलों के लिए कई और भी सिफ़ारिशें की थीं, जिनमें सियासी दलों को आरटीआई का जवाब देने, उनके दान खातों का ऒडिट करने, एक उम्मीदवार के एक ज़्यादा सीटों से चुनाव लड़ने और निर्दलीय उम्मीदवार के चुनाव लड़ने आदि पर रोक लगाना शामिल है.

दरअसल, कालेधन से जुड़ा मुद्दा चुनावी सुधारों से भी जुड़ा हुआ है. अगर सरकार कालेधन के मामले में वाक़ई गंभीर है, तो उसे चुनाव सुधारों की दिशा में भी सख़्त फ़ैसले लेने होंगे. उसे चुनाव में धन-बल के अत्यधिक इस्तेमाल पर भी पाबंदी लगानी होगी. सियासी दलों को चाहिए कि वे भी कैश लेस चंदा लेना शुरू करें और साथ ही अपनी आमदनी को सार्वजनिक करें. विदेशों की तर्ज़ पर भारत को भी इस दिशा में कारगर क़दम उठाने होंगे. अमेरिका, ब्रिटेन्, जर्मनी, फ़्रांस, ऒस्ट्रेलिया और आयरलैंड आदि देशों ने सियासी दलों को मिलने वाले चंदे पर सख़्त नियम बनाए हुए हैं. सियासी दलों को अपनी आमदनी का ब्यौरा देना होता है. फ़्रांस में चुनाव का सारा ख़र्च सरकार ही वहन करती है.

बहरहाल, कालेधन पर पारदर्शिता बरतने की सारी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ जनता की ही नहीं है, सरकार और सियासी दलों को भी अर्थव्यवस्था को पारदर्शी बनाने के अपने दायित्व को पूरी ईमानदारी के साथ निभाना होगा.

Wednesday, December 14, 2016

यह जनता के पैसे का दुरुपयोग है

फ़िरदौस ख़ान
कहते हैं, बुरी घड़ी कहकर नहीं आती. बुरा वक़्त कभी भी आ जाता है. मौत या हादसों का कोई वक़्त मुक़र्रर नहीं होता. जब कोई हादसा होता है, जान या माल का नुक़सान होता है, तो किसी भी व्यक्ति को इसका सदमा लग सकता है. ऐसे में व्यक्ति के जिस्म में ताक़त नहीं रहती और शारीरिक क्रियाएं धीमी पड़ जाती हैं. दिमाग़ रक्त वाहिनियों की पेशियों पर नियंत्रण नहीं रख पाता, जिससे दिमाग़ और जिस्म का तालमेल गड़बड़ा जाता है. दिल की धड़कन भी धीमी हो जाती है. व्यक्ति क चक्कर आने लगते हैं, वह बेहोश हो जाता है, कई बार उसकी मौत भी हो जाती है. मौत कभी पूरा न होने वाला नुक़सान है. मौत के सदमे से उबरना आसान नहीं है. सदमे का ताल्लुक़ भावनाओं से है, संवेदनाओं से है. अगर कोई इन संवेदनाओं के साथ खिलवाड़ करे, तो उसे किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन सियासी हलक़े में मौत और सदमे पर भी सियासत की बिसात बिछा ली जाती है. फिर अपने फ़ायदे के लिए शह और मात का खेल खेला जाता है. इन दिनों तमिलनाडु में भी यही सब देखने को मिल रहा है.
तमिलनाडु में सत्तारूढ़ पार्टी अन्नाद्र्मुक दावा कर रही है कि जयललिता की मौत के सदमे से 470 लोगों की मौत हो चुकी है. पार्टी ने मृतकों के परिवार को तीन लाख रुपये की मदद देने का ऐलान किया है. पार्टी ने ऐसे लोगों की फ़ेहरिस्त जारी की है, जिनकी मौत सदमे की वजह से हुई है. पार्टी का यह भी कहना है कि जयललिता के निधन के बाद अब तक छह लोग ख़ुदकुशी की कोशिश कर चुके हैं. ऐसे चार लोगों का ब्यौरा भी जारी किया गया है. जयललिता की मौत की ख़बर सुनने पर ख़ुदकुशी की कोशिश करने वाले एक व्यक्ति को पार्टी ने 50 हज़ार रुपये देने की घोषणा की है. इतना ही नहीं जयललिता की मौत की ख़बर सुनकर अपनी उंगली काटने वाले व्यक्ति को भी 50 हज़ार रुपये की मदद देने का ऐलान किया जा चुका है.

इसमें कोई शक नहीं है कि ’अम्मा’ के नाम से प्रसिद्ध जयललिता तमिलनाडु की लोकप्रिय नेत्री थीं. उन्होंने राज्य की ग़रीब जनता के कल्याण के लिए कई योजनाएं शुरू की थीं. उन्होंने साल 2013 में चेन्नई में ‘अम्मा कैंटीन’ शुरू की, जहां बहुत कम दाम पर भोजन मुहैया कराया जाता है. अब पूरे राज्य में 300 से ज़्यादा ऐसी कैंटीन हैं, जिनमें एक रुपये में एक इडली और सांभर दिया जाता है, और पांच रुपये में चावल और सांभर परोसा जाता है. ग़रीब तबक़े के लोग इन कैंटीन में नाममात्र के दाम पर भरपेट भोजन करते और ’अम्मा’ के गुण गाते हैं. ये कैंटीन सरकारी अनुदान पर चलती हैं. इसके अलावा ग़रीबी रेखा के नीचे के परिवारों को हर महीने 25 किलो चावल, दालें, मसाले और खाने का अन्य सामान मुफ़्त दिया जाता है. सरकारी अस्पतालों में लोगों का मुफ़्त इलाज किया जाता है. उन्होंने पालना बेबी योजना, अम्मा मिनरल वॉटर, अम्मा सब्ज़ी की दुकान, अम्मा फ़ार्मेसी, बेबी केयर किट, अम्मा मोबाइल जैसी कई योजनाएं भी चलाई. इतना ही नहीं उन्होंने मुफ़्त में भी कई सुविधाएं लोगों को दीं, जिनमें ग़रीब औरतों को मिक्सर ग्राइंडर, लड़कियों को साइकिलें, छात्रों को स्कूल बैग, किताबें, यूनिफॉर्म और मुफ़्त में मास्टर हेल्थ चेकअप आदि शामिल हैं. क़ाबिले-ग़ौर बात यह भी है कि चुनाव के वक़्त लोगों को लुभाने के लिए उन्हें  रोज़मर्रा के काम आने वाली चीज़ें ’तोहफ़े’ में दी जाती हैं, जिनमें टेलीविज़न, एफ़एम रेडियो,  इडली-डोसा बनाने में इस्तेमाल की जाने वाली पिसाई मशीन, साइकिल, लैपटॉप वग़ैरह शामिल हैं. अपने इन्हीं ग़रीब हितैषी कार्यों की वजह से जयललिता जनप्रिय हो गईं. उनकी लोकप्रिय का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बाक़ी राज्यों में भाजपा की लहर चल रही थी, उस वक़्त उनकी पार्टी अन्नाद्रमुक ने तमिलनाडु में 39 में 37 सीटों पर जीत का परचम लहराया था. वह अपने सियासी गुरु एमजी रामचंद्रन के बाद सत्ता में लगातार दूसरी बार आने वाली तमिलनाडु में पहली राजनीतिज्ञ थीं.

ग़ौरतलब है कि 68 वर्षीय जयललिता को 22 सितंबर को अस्पताल में दाख़िल कराया, तो बहुचर्चित सबरीमाला मंदिर ने उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना के साथ तक़रीबन 75 हज़ार श्रद्धालुओं को मुफ़्त भोजन कराना शुरू कर दिया था. लोग उनके लिए दुआएं कर रहे थे. 5 दिसंबर को उनकी मौत के बाद राज्य में शोक की लहर दौड़ गई. जन सैलाब उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुआ. सरकार ने पांच दिन का शोक घोषित कर दिया.  जगह-जगह शोक सभाओं का आयोजन कर उनकी आत्मिक शांति के लिए प्रार्थनाएं होने लगीं. फिर ख़बरें आने लगीं कि जयललिता की मौत के सदमे में फ़लां-फ़लां व्यक्ति की मौत हो गई. अन्नाद्रमुक ने मृतकों के लिए सहायता राशि देने की घोषणा कर डाली. इस काम में राज्य सरकार भी पीछे नहीं रही.  इन मरने वाले लोगों की मौत सदमे से हुई है या नहीं ? ये बात अलग है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस तरह सरकारी ख़ज़ाने पर बोझ डालना सही है, क्या करदाताओं की मेहनत की कमाई, जिसका बड़ा हिस्सा करों के रूप में राज्य को मिलता है, उसका इस्तेमाल इन लोगों के परिजनों को मुआवज़ा देने में होना भी चाहिए था? जयललिता की लोकप्रियता के बाद भी इस सवाल का जवाब ’न’ ही है. तमिलनाडु सरकार को सरकारी ख़ज़ाने के पैसे का इस तरह से दुरुपयोग करने से बचना चाहिए था.

इससे बेहतर यह होता कि अन्नाद्रमुक जन कल्याण की कोई और योजना शुरू करती, जिससे ग़रीबों का भला होता ही, वह योजना जयललिता के प्रशंसकों-समर्थकों के मन में उनकी स्मृतियों को भी तरोताज़ा किए रहती. इसके साथ-साथ उन योजनाओं को जारी रखने का संकल्प भी लिया जाना चाहिए था, जो जयललिता ने अपने कार्यकाल में शुरू की थीं. अन्नाद्रमुक और पन्नीर सेल्वम की सरकार को समझना होगा कि हथकंडे अपनाकर कुछ वक़्त के लिए ही जनता का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा जा सकता है, पर इस तरह खींचा गया ध्यान स्थाई नहीं होता है. यह तो तभी होता है, जब जन कल्याण के कार्य एक संकल्प के तौर पर किए जाएं. जयललिता यही करती थीं, इसीलिए उन्हें ’अम्मा’ कहा जाता है, जबकि पन्नीर सेल्वम सरकारी ख़ज़ाने का दुरुपयोग ही कर रहे हैं. यह उन मौतों को गरिमा प्रदान करनी भी है, जो जयललिता के निधन के बाद सदमा लगने से हुई बताई जा रही हैं. इंसान का जीवन अनमोल होता है. अलबत्ता अल्पकाल में होने वाली मौतों को महिमा-मंडित करना भी प्रकृति और उसके नियमों के ख़िलाफ़ है.

Monday, November 28, 2016

जन आक्रोश दिवस

नोटबंदी से आम लोगों को ही ज़्यादा तकलीफ़ हुई. लोग अपने काम-धंधे छोड़कर नोट बदलवाने के लिए क़तारों में लग गए. रोज़मर्रा की ज़िन्दगी ठहर गई.
लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने नारा दिया था कि वह विदेशों में जमा कालाधन वापस लाएगी और इस पैसे को जन कल्याण के कार्यों में ख़र्च किया जाएगा. मगर सत्ता में आने के बाद भाजपा की केंद्र सरकार ने विदेशों में जमा कालेधन पर ख़ामोशी अख़्तियार कर ली और नोटबंदी कर जनता को ही कठघरे में खड़ा कर दिया. रोटी, कपड़ा और एक अदद छत के जुगाड़ में उम्रभर हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले लोग अपनी कड़ी मशक़्क़त के पैसों को बदलवाने के लिए दिन-रात क़तारों में खड़े होने को मजबूर हो गए. वे समझ नहीं पा रहे थे कि उनका पास ऐसा कौन-सा कालाधन है, जिसके लिए उन्हें यह सज़ा भुगतनी पड़ रही है.

इस वक़्त कांग्रेस अवाम के हक़ की लड़ाई लड़ रही है...

Tuesday, November 22, 2016

सामरिक ताक़त बढ़ाएंगे एक्सप्रेस-वे

फ़िरदौस ख़ान
विकास का मतलब सिर्फ़ किसी चीज़ या जगह को ख़ूबसूरत बनाना ही नहीं है, बल्कि विकास सुविधाओं में भी विस्तार करता है. देश का सबसे लंबा 'आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे' इसकी एक बेहतरीन मिसाल है. सौंदर्य से परिपूर्ण हरेभरे इस एक्सप्रेस वे पर अत्याधुनिक सुविधाओं की व्यवस्था की गई है. सड़क हादसे या कोई और ज़रूरत पड़ने पर हैलीकॉप्टर का भी इंतज़ाम है. यहां जगह-जगह सीसीटीवी लगाए गए हैं. साथ ही मोर्टल, पैट्रोल पंप और फ़ूड कॊर्नर भी मौजूद हैं. इसकी एक बड़ी ख़ासियत यह भी है कि आपातकाल या जंग के वक़्त यहां पर लड़ाकू विमान उड़ान भर सकते हैं और उन्हें उतारा भी जा सकता है, यानी यह एक्सप्रेस-वे एयरस्ट्रिप की तरह काम करेगा. इस दौरान दोनों तरफ़ से यातायात भी सामान्य रूप से चलता रहेगा.
हाईवे पर बनने वाले इस रनवे को हाई-वे स्ट्रिप और रोड रनवे कहा जाता है. पड़ौसी देश पाकिस्तान, चीन, पोलैंड, स्वीडन, जर्मनी और सिंगापुर में ऐसे रोड रनवे हैं. ग़ौरतलब है कि सड़क के जिस हिस्से का इस्तेमाल रनवे के लिए किया जाता है, उस पर बिजली के खंभे और मोबाइल फ़ोन के टॊवर नहीं लगाए जाते. इस हिस्से पर उन्हीं सुविधाओं मुहैया कराई जाती हैं, जिनकी ज़रूरत हवाई जहाज़ों को होती है.

आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे को यमुना एक्सप्रेस वे और ताज एक्सप्रेस वे के नाम से भी जाना जाता है. यह भारत की सबसे लंबी छह लेन सड़क है. आने वाले वक़्त में तीन किमी लंबी हवाई पटटी के पास (खंभौली-कबीरपुर के बीच) एक्सप्रेस-वे की सड़क को 12 लेन किया जाएगा, ताकि हवाई जहाज़ों की लैंडिंग और टेकऑफ़ के वक़्त यातायात सामान्य रहे. तक़रीबन 13 हज़ार 200 करोड़  करोड़ रुपये की लागत से बने इस एक्सप्रेस-वे के रास्ते में गंगा-जमुना समेत पांच नदियां आती हैं.  370 किलोमीटर लंबा और 110 मीटर चौड़ा यह एक्सप्रेस-वे उन्नाव, कानपुर, हरदोई, औरैया, मैनपुरी, कन्नौज, इटावा और फ़िरोज़ाबाद को आगरा से जोड़ेगा. इस एक्सप्रेस-वे पर 13 बड़े और 52 छोटे पुल बनाए गए हैं. इस पर चार आरओबी भी बने हैं. इसके रास्ते में पड़ने वाले क़स्बों और गांवों के लोगों की सुविधा के लिए इस पर 132 फुट ओवरब्रिज और 59 अंडरपास बनाए गए हैं. इससे लोगों को आवाजाही में किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं होगी. फ़िलहाल इस एक्सप्रेस-वे पर एडवांस ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम भी लगाया जाएगा. इसके अलावा साइड बैरीकेटिंग में आधुनिक रिफ़्लेक्टिव पेंट किया जाएगा, जो इसे और ख़ूबसूरत बनाएगा. इससे दुर्घटना और ट्रैफ़िक जाम की समस्या से भी लोगों को निजात मिलेगी.

दरअसल, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का ड्रीम प्रोजेक्ट है. उन्होंने इसमें बहुत दिलचस्पी ली, तभी इसे तक़रीबन 22 महीने में पूरा कर लिया गया. लिछले दिनों वायु सेना के अधिकारियों के साथ कई अन्य अधिकारियों ने एक्सप्रेस-वे का मुआवना किया था. इस पर लड़ाकू विमानों उड़ान भरने और उतरने का अभ्यास भा कराया गया. समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव के 78वें जन्मदिन 21 नवंबर को इस एक्सप्रेस-वे का उद्गाटन किया गया. इस मौक़े पर ग्वालियर से आए मिराज 2000 और बरेली से आने वाले चार सुखोई विमान उड़ान भरी. ये लड़ाकू विमान तक़रीबन 300 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ़्तार से एक्सप्रेस-वे को छूकर वापस उड़ गए. उद्घाटन के बावजूद एक्सप्रेस वे आम वाहनों के लिए नहीं खोला गया, क्योंकि अभी तक एक्सप्रेस वे की सेफ़्टी ऑडिट नहीं हुई है. सेफ़्टी ऑडिट का काम पूरा होने के बाद इसे अगले माह दिसंबर में आम लोगों के लिए खोल दिया जाएगा.
इस अत्याधुनिक एक्सप्रेस वे पर वाहनों को तेज़ रफ़्तार से चलने की छूट नही होगी. अधिकतम गति सीमा तोड़ने पर कैमरे से जुड़ा अलार्म बज उठेगा. इसकी जानकारी टोल प्लाज़ा पर भी दी जाएगी और टोल प्लाज़ा से पहले ही वाहन को रोक कर जुर्माना वसूला जाएगा. एक्सप्रेस वे पर वाहनों की रफ़्तार की सीमा तय कर दी गई है. यहां पर हल्के वाहनों की अधिकतम गति 100 और भारी वाहनों की 60 किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित की गई है. इससे तेज़ रफ़्तार में वाहन चलाने पर चालकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी. एक्सप्रेस वे पर अत्याधुनिक नाइट विज़न कैमरे लगाए जा रहे हैं, जो वाहनों की रफ़्तार पर नज़र रखेंगे. दरअसल, सड़क हादसों के मद्देनज़र ऐसा करना बेहद ज़रूरी था. इस एक्सप्रेस पर पर अकसर हादसे होते रहते हैं, जिनमें जान और माल दोनों का ही नुक़सान होता है.

एक्सप्रेस-वे को हवाई पट्टी के तौर पर इस्तेमाल किए जाना वक़्त की ज़रूरत है. आज जब पड़ौसी देश आए-दिन आंखें दिखाते रहते हों, तो ये और भी ज़रूरी हो जाता है. पाकिस्तान की गतिविधियां किसी से छुपी नहीं हैं. चीन से भी अकसर विवाद ही रहता है. ऐसे हालात में देश के सबसे लंबे एक्सप्रेस-वे पर हवाई पट्टी का निर्माण किया जाना एक सराहनीय क़दम है. इससे आने वाले वक़्त में निर्माण कार्यों को लेकर नये आयाम भी स्थापित होंगे.  फ़िलहाल इसे एक अच्छी शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है. जल्द ही देश में ऐसे और एक्सप्रेस-वे बनाने का काम शुरू होगा.

Saturday, September 3, 2016

साहित्य चोरी


आख़िर ग़ैरत नाम की भी कोई चीज़ होती है... लोग इतने बेग़ैरत भी हो सकते हैं, नहीं जानते थे... फ़ेसबुक पर ऐसे लोगों को देखकर बेज़ारी होती है... इन लोगों को किसी का कोई भी लेख या गीत, ग़ज़ल या नज़्म अच्छी लगती है, फ़ौरन उसे अपनी दीवार, अपने ग्रुप या अपने पेज पर पोस्ट कर देते हैं, बिना लेखक का नाम शामिल किए... कुछ महाचोर या महा डकैत रचना के नीचे अपना नाम भी लिख देते हैं... इसे चोरी कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि ये तो सरासर डकैती है... एक साहित्यिक डकैती... कोई बेग़ैरत और कमज़र्फ़ ही ऐसा कर सकता है... जो लोग फ़ेसबुक पर दूसरों की रचनाएं चुराते हैं, फ़ेसबुक से बाहर ये लोग न जाने क्या-क्या चुराते होंगे... इसलिए ऐसे लोगों से सावधान रहें...
फ़ेसबुक में पोस्ट शेयर करने का भी विकल्प है... किसी की कोई पोस्ट अच्छी लगी है, तो उसे शेयर भी किया जा सकता है...

नोट : जिन लोगों की रचनाओं की चोरी हुई है. उनसे ग़ुज़ारिश है कि अपनी रचनाओं और उन्हें चोरी करने वालों के बारे में कमेंट बॊक्स में ज़रूर लिखें...
(जनहित में जारी)

Saturday, August 27, 2016

इंसानियत इसे कहते हैं...

ख़िदमते-ख़ल्क का जज़्बा ही इंसान को इंसान बनाता है... वरना अपने लिए तो जानवर भी जीते हैं... जो दूसरों के दर्द को महसूस करे, उन्हें ख़ुशी देने के लिए ख़ुद को फ़ना करने से भी पीछे न रहे, सही मायनों में वही ’इंसान’ कहलाने लायक़ है... एक ऐसा इंसान जिस पर मालिके-आदम को भी फ़ख़्र हो...

पोलैंड के चक्का फेंक खिलाड़ी पिओत्र मालाचोवस्की ने कैंसर से पीड़ित तीन साल के बच्चे के इलाज के लिए अपना ओलंपिक पदक दान कर दिया... 33 साल के मालाचोवस्की ने रियो में चक्का फेंक मुक़ाबले में रजत पदक जीता था. उनके इस पदक से मिली रक़म से आंख के कैंसर से जूझ रहे बच्चे ओलेक सिमनास्की का इलाज किया जाएगा.

मालाचोवस्की का कहना है कि उन्होंने मेडल नीलाम करने का फ़ैसला तीन साल के कैंसर पीड़ित बच्चे की मां की जानिब से मदद के लिए मिले एक ख़त को पढ़ने के बाद किया... ख़त में बच्चे की मां ने उन्हें लिखा कि उनका बच्चा ओलेक आंख के कैंसर से बीते दो साल से पीड़ित है... साथ ही लिखा कि बच्चे के बचने की आख़िरी उम्मीद उसके न्यूयॉर्क अस्पताल में इलाज पर टिकी हुई है...
मालाचोवस्की का कहना है, "मेरा रजत पदक एक हफ़्ते पहले तक मेरे लिए बहुत मायने रखता था. ओलेक की सेहत के लिए इसकी ज़्यादा ज़रूरत है."

Saturday, August 20, 2016

लोकप्रिय नेता थे राजीव गांधी

फ़िरदौस ख़ान
कुछ लोग ज़मीन पर राज करते हैं और कु्छ लोग दिलों पर. मरहूम राजीव गांधी एक ऐसी शख़्सियत थे, जिन्होंने ज़मीन पर ही नहीं, बल्कि दिलों पर भी हुकूमत की. वह भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हमारे दिलों में आज भी ज़िंदा हैं.
श्री राजीव गांधी ने उन्नीसवीं सदी में इक्कीसवीं सदी के भारत का सपना देखा था.  स्वभाव से गंभीर लेकिन आधुनिक सोच और निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले श्री राजीव गांधी देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे. वे बार-बार कहते थे कि भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के साथ ही उनका अन्य बड़ा मक़सद इक्कीसवीं सदी के भारत का निर्माण है. अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने देश में कई क्षेत्रों में नई पहल की, जिनमें संचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति, शिक्षा का प्रसार, 18 साल के युवाओं को मताधिकार, पंचायती राज आदि शामिल हैं. वे देश की कंप्यूटर क्रांति के जनक के रूप में भी जाने जाते हैं. वे युवाओं के लोकप्रिय नेता थे. उनका भाषण सुनने के लिए लोग घंटों इंतज़ार किया करते थे. उन्‍होंने अपने प्रधानमंत्री काल में कई ऐसे महत्वपूर्ण फ़ैसले लिए, जिसका असर देश के विकास में देखने को मिल रहा है. आज हर हाथ में दिखने वाला मोबाइल उन्हीं फ़ैसलों का नतीजा है.

चालीस साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले श्री राजीव गांधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे और दुनिया के उन युवा राजनेताओं में से एक हैं, जिन्होंने सरकार की अगुवाई की है. उनकी मां श्रीमती इंदिरा गांधी 1966 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं, तब वह उनसे उम्र में आठ साल बड़ी थीं. उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू 58 साल के थे, जब उन्होंने आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर शपथ ली. देश में पीढ़ीगत बदलाव के अग्रदूत श्री राजीव गांधी को देश के इतिहास में सबसे बड़ा जनादेश हासिल हुआ था. अपनी मां के क़त्ल के बाद 31 अक्टूबर 1984 को वे कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने थे. अपनी मां की मौत के सदमे से उबरने के बाद उन्होंने लोकसभा के लिए चुनाव कराने का आदेश दिया. दुखी होने के बावजूद उन्होंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया. महीने भर की लंबी चुनावी मुहिम के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के तक़रीबन सभी हिस्सों में जाकर 250 से ज़्यादा जनसभाएं कीं और लाखों लोगों से रूबरू हुए. उस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और पार्टी ने रिकॉर्ड 401 सीटें हासिल कीं. सात सौ करोड़ भारतीयों के नेता के तौर पर इस तरह की शानदार शुरुआत किसी भी हालत में क़ाबिले-तारीफ़ मानी जाती है. यह इसलिए भी बेहद ख़ास है, क्योंकि वे उस सियासी ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे, जिसकी चार पीढ़ियों ने जंगे-आज़ादी के दौरान और इसके बाद हिन्दुस्तान की ख़िदमत की थी. इसके बावजूद श्री राजीव गांधी सियासत में नहीं आना चाहते थे. इसीलिए वे सियासत में देर से आए.

श्री राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था. वे सिर्फ़ तीन साल के थे, जब देश आज़ाद हुआ और उनके नाना आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. उनके माता-पिता लखनऊ से नई दिल्ली आकर बस गए. उनके पिता फ़िरोज़ गांधी सांसद बने, जिन्होंने एक निडर तथा मेहनती सांसद के रूप में ख्याति अर्जित की.
राजीव गांधी ने अपना बचपन अपने नाना के साथ तीन मूर्ति हाउस में बिताया, जहां इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में काम किया. वे कुछ वक़्त के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल गए, लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया. वहां उनके कई दोस्त बने, जिनके साथ उनकी ताउम्र दोस्ती बनी रही. बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया, जहां दोनों साथ रहे. स्कूल से निकलने के बाद श्री राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, लेकिन जल्द ही वे वहां से हटकर लंदन के इम्पीरियल कॉलेज चले गए. उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.
उनके सहपाठियों के मुताबिक़ उनके पास दर्शन, राजनीति या इतिहास से संबंधित पुस्तकें न होकर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की कई पुस्तकें हुआ करती थीं. हालांकि संगीत में उनकी बहुत दिलचस्पी थी. उन्हें पश्चिमी और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय और आधुनिक संगीत पसंद था. उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी और रेडियो सुनने का भी ख़ासा शौक़ था. हवाई उड़ान उनका सबसे बड़ा जुनून था. इंग्लैंड से घर लौटने के बाद उन्होंने दिल्ली फ़्लाइंग क्लब की प्रवेश परीक्षा पास की और व्यावसायिक पायलट का लाइसेंस हासिल किया. इसके बाद वे  1968 में घरेलू राष्ट्रीय जहाज़ कंपनी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए.
कैम्ब्रिज में उनकी मुलाक़ात इतालवी सोनिया मैनो से हुई थी, जो उस वक़्त वहां अंग्रेज़ी की पढ़ाई कर रही थीं. उन्होंने 1968 में नई दिल्ली में शादी कर ली. वे अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ नई दिल्ली में श्रीमती इंदिरा गांधी के निवास पर रहे. वे ख़ुशी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, लेकिन  23 जून 1980 को एक जहाज़ हादसे में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने सारे हालात बदल कर रख दिए. उन पर सियासत में आकर अपनी मां की मदद करने का दबाव बन गया. फिर कई अंदरूनी और बाहरी चुनौतियां भी सामने आईं. पहले उन्होंने इन सबका काफ़ी विरोध किया, लेकिन बाद में उन्हें अपनी मां की बात माननी पड़ी और इस तरह वे न चाहते हुए भी सियासत में आ गए. उन्होंने जून 1981 में अपने भाई की मौत की वजह से ख़ाली हुए उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई.  इसी महीने वे युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन गए. उन्हें नवंबर 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों से संबंधित महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई, जिसे उन्होंने बख़ूबी अंजाम दिया. साथ ही कांग्रेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने उसी लगन से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित और सक्रिय किया.

अपने प्रधानमंत्री काल में राजीव गांधी ने नौकरशाही में सुधार लाने और देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए कारगर क़दम उठाए, लेकिन पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को नाकाम करने की उनकी कोशिश का बुरा असर हुआ. वे सियासत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन यह विडंबना है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से ही सबसे ज़्यादा आलोचना का सामना करना पड़ा.  उन्होंने कई साहसिक क़दम उठाए, जिनमें श्रीलंका में शांति सेना का भेजा जाना, असम समझौता, पंजाब समझौता, मिज़ोरम समझौता आदि शामिल हैं. इसकी वजह से चरमपंथी उनके दुश्मन बन गए. नतीजतन, श्रीलंका में सलामी गारद के निरीक्षण के वक़्त उन पर हमला किया गया, लेकिन वे बाल-बाल बच गए. साल 1989 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वह कांग्रेस के नेता पद पर बने रहे. वे आगामी आम चुनाव के प्रचार के लिए 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर गए, जहां एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई. देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी.
राजीव गांधी की देश सेवा को राष्ट्र ने उनके दुनिया से विदा होने के बाद स्वीकार करते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, जिसे श्रीमती सोनिया गांधी ने 6 जुलाई, 1991 को अपने पति की ओर से ग्रहण किया. कांग्रेस स्वर्गीय राजीव गांधी की पुण्यतिथि 21 मई को ’बलिदान दिवस’ के रूप में मनाती है.
राजीव गांधी अपने विरोधियों की मदद के लिए भी हमेशा तैयार रहते थे. साल 1991 में जब राजीव गांधी की हत्या कर दी गई, तो एक पत्रकार ने भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी से संपर्क किया. उन्होंने पत्रकार को अपने घर बुलाया और कहा कि अगर वह विपक्ष के नेता के नाते उनसे राजीव गांधी के ख़िलाफ़ कुछ सुनना चाहते हैं, तो मैं एक भी शब्द राजीव गांधी के ख़िलाफ़ नहीं कहेंगे, क्योंकि राजीव गांधी की मदद की वजह से ही ज़िन्दा हैं. उन्होंने भावुक होकर कहा कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तो उन्हें पता नहीं कैसे पता चल गया कि मेरी किडनी में समस्या है और इलाज के लिए मुझे विदेश जाना है. उन्होंने मुझे अपने दफ़्तर में बुलाया और कहा कि वह उन्हें आपको संयुक्त राष्ट्र में न्यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं और उम्मीद है कि इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर आप अपना इलाज करा लेंगे. मैं न्यूयॉर्क गया और आज इसी वजह से मैं जीवित हूं. फिर वाजपेयी बहुत भावविह्वल होकर बोले कि मैं विपक्ष का नेता हूं, तो लोग उम्मीद करते हैं कि में विरोध में ही कुछ बोलूंगा. लेकिन ऐसा मैं नहीं कर सकता. मैं राजीव गांधी के बारे में वही कह सकता हूं, जो उन्होंने मेरे लिए किया.

आज़ाद भारत स्वर्गीय राजीव महत्वपूर्ण योगदान के लिए हमेशा उनका ऋणी रहेगा.