Sunday, May 31, 2009

हरियाणा के ग्रामीण अंचल पर मोहित पर्यटक



फ़िरदौस ख़ान
हरियाणा में प्राकृतिक दृष्टि से पर्यटन स्थलों का अभाव रहा है, लेकिन इसके बावजूद यहां ऐसे पर्यटक स्थलों का विस्तार किया गया है, जिसके कारण यह राज्य देश के पर्यटन मानचित्र पर अपनी जगह बनाने में कामयाब रहा है. हरियाणा ने हाईवे टूरिज्म के बाद रूरल टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए फार्म हाउस टूरिज्म को विकसित करने की पहल की है, ताकि देशी और विदेशी पर्यटक राज्य की ग्रामीण जीवन शैली, रीति-रिवाजों और खेत-खलिहानों की झलक पाकर देश के एक अनूठे रंग से वाकिफ हो सकें। हरियाणा पर्यटन निगम ने वर्ष 2003 में विश्व पर्यटन दिवस यानी 27 सितंबर से ‘फार्म हॉलिडे’ और ‘विलेज सफारी’ पर्यटन की योजनाएं शुरू की थीं। इसके साथ ही एक और योजना ‘म्हारा गांव’ भी शुरू की गई है, जो लोगों को हरियाणा की लोक संस्कृति से जोड़ने की बेहतरीन कोशिश है। भारत में अतिथि सत्कार की एक विशेष परंपरा है। ‘अतिथि देवो भव’ इसी परंपरा को इंगित करता है। सुबह पौ फटते ही देहात में चहचहाते परिन्दें की मधुर आवाजें, खेतों में लहलहाती फसलें, सरसों के झूमते पीले फूल, जोहड़ों में तैरती बत्तखें, चौपालों की बैठकें और हवेलियों या महफिलों में सांग-आल्हा की पौराणिक कथाएं मन को मोह लेने के साथ ही मन-मस्तिष्क पर ग्रामीण अंचल की छाप छोड़ जाती हैं।

हरियाणा धार्मिक और ऐतिहासिक इमारतों की दृष्टि से समृध्द है। चाहे मामला कुरुक्षेत्र की पवित्र धरती पर श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को गीता का ज्ञान देने का हो, पानीपत की तीन महत्वपूर्ण लड़ाइयों का हो या फिर फिरोजशाह तुगलक द्वारा अपनी प्रेमिका गूजरी के लिए बीहड़ बयांबान जंगल में हिसारे-फिरोजां का निर्माण कर उसमें गूजरी महल बनवाने का हो। यहां के कण-कण में इतिहास बोलता है। राज्य में रूरल टूरिज्म को बढ़ावा की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी है।

एक किवदंती के मुताबिक देवताओं ने पृथ्वी पर खेती की शुरुआत महाराज कुरु से करवाई थी। उन्होंने सरस्वती नदी द्वारा सिंचित कुरुक्षेत्र जिले के पेहवा कस्बे में स्थित बीड़ बरसवान में पहली बार सोने का हल चलाया था। भगवान विष्णु ने इस भूमि में धान का बीज बोया था। यहां उगी चावल की फसल को बीड़ के नाम पर बासमाती कहा जाने लगा। गौरतलब है कि बासमाती शब्द का अर्थ माटी की सुगंध है। हर साल हरियाणा में करीब 65 लाख पर्यटक आते हैं, जिनमें लगभग एक लाख विदेशी पर्यटक शामिल हैं। संयुक्त परियोजना के तहत पर्यटन विभाग पुराने ऐतिहासिक व पौराणिक गाथाओं को समेटे भवनों के रख-रखाव में भी अहम भूमिका निभा रहा है, जिसमें महेंद्रगढ़ का माधोगढ़ किला और बल्लभगढ़ में राजा नाहर सिंह का किला भी शामिल है। राज्य का कोई भी राष्ट्रीय राजमार्ग या राजमार्ग ऐसा नहीं है, जहां 40 से 50 किलोमीटर की दूरी पर पर्यटन स्थल न हो। राज्य में सरकार ने 44 पर्यटन स्थलों का फैलाव किया गया है, जो हरियाणा पर्यटन विभाग द्वारा संचालित किए जा रहे हैं।

इसके अलावा 28 पर्यटन स्थल निजी क्षेत्र चला रहे हैं। कलेसर राज्य का एकमात्र ऐसा पर्यटन स्थल है जो शिवालिक की पहाड़ियों के साथ-साथ हरे-भरे पेड़-पौधों की छटा से घिरा हुआ है। पिंजौर में मनोरंजक पार्क भी स्थापित किया गया। यह स्थल शिवालिक की पहाड़ियों के समीप है, जिसमें बने मुगल गार्डन, जल महल और मानव निर्मित झरने, लघु चिड़िया घर इसके सौंदर्य को और निखार रहे हैं। पंजौर एक ऐतिहासिक व धार्मिक स्थल है। यहां पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान एक साल का गुप्त समय बिताया था। कालांतर में वही स्थान पिंजौर गार्डन के नाम से जाना जाता है। 17वीं शताब्दी में यह मुगल गार्डन था, जिसकी वास्तुकला का निर्माण बादशाह औरंगजेब के भतीजे नवाब फिदई खान ने कराया था। यह वही नवाब था, जिसने लाहौर में शाही मस्जिद का डिजाइन तैयार किया था। 1775 में पटियाला में महाराज अमर सिंह ने पिंजौर गार्डन को खरीदकर अपनी जमीन में मिला लिया था। वे इसके सौंदर्य को बनाए रखने के लिए नियमित रूप से इस मुगल गार्डन का दौरा किया करते थे। हरियाणा के गठन के वक्त 1966 में इस मुगल गार्डन को हरियाणा को सौंप दिया गया। मुगल गार्डन के शीश महल व रंग महल को भी पर्यटन केंद्र में तबदील कर दिया गया है। फरीदाबाद में मेगपाई पर्यटन स्थल पर सिल्वर जुबली हॉल भी पर्यटन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। निजी उद्यमी बड़े स्तर के समारोहों के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। बड़खल पर्यटन स्थल पर तरनताल व झील पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

पेहवा के अंजन यात्रिका, फरीदाबाद के अरावली गोल्फ क्लब, समालखा के ब्लूजे, सोहना के बाखेट, हिसार के फ्लेमिंगो व ब्लू बर्ड, हांसी के ब्लैक बर्ड, जींद के बुलबुल, उचाना की चक्रवती लेन, सोनीपत के चकोर पर्यटन स्थल, बहादुरगढ़ के डबचीक, यमुनानगर के पेलिकन, नरवाना के हरियाल, पंचकुला के बटायु यात्रिका माता मनसा देवी व रेड विशाप, धारूहेड़ा के जंगल बाबलर, ज्योतिसर के ज्योतिसर कॉम्पलैक्स, पानीपत के काता अम्ब, सैरस दमदमा झील व स्काई लार्क, अम्बाला के किंग फिशर, कैथल के कोयल, रोहतक के मैना व तिलियार झील, महम के नोरंग, कुरुक्षेत्र के नीलकंठी कृष्णा धाम यात्री निवास, उचाना के ओसीस, पिपली के पैराकीट, फतेहाबाद के पपीहा, भिवानी के रेड रोबिन, रेवाड़ी के सैंड पाइपर, गुड़गांव के शमा, आसाखेड़ा के शिकारा, सिरसा के सुरखाव, सुल्तानपुर के बर्ड सैन्यरी, सूरजकुंड के सनबर्ड हर्मीटैज व होटल राजहंस, मोरनी हिल्स के माउंटैन वबैल और पिंजौर के यादविन्द्रा गार्डन में पर्यटन विभाग द्वारा काफी सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं।

खास बात यह है कि सभी पर्यटन स्थलों के नाम पक्षियों के नाम पर रखे गए हैं, जो स्वच्छ पर्यावरण को इंगित करते हैं। सरकार ने सरकारी क्षेत्र के साथ-साथ निजी क्षेत्र में भी पर्यटन को बढ़ावा देने पर भी ख़ासा ध्यान दे रही है, लेकिन कुरुक्षेत्र में पर्यटन का विस्तार सरकार ने अपने अधिकार क्षेत्र में ही रखा है। राज्य में पर्यटन निगम की स्थापना की गई है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और राजस्थान से सटा होने की वजह से हरियाणा का महत्व और भी बढ़ जाता है। राज्य में से छह मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग भी गुंजरते हैं और राज्य का तेंजी से औद्योगिक विकास भी हुआ है, जिससे दूसरे देशों के उद्योगपति भी अकसर यहां आते रहते हैं। पर्यटन स्थलों पर वाहनों में ईंधन भरवाने के लिए पेट्रोल पंप भी स्थापित किए गए हैं। इन स्थलों को और मनोरम बनाने के लिए लघु चिड़िया घर व झीलें में नौकायन की सुविधा भी मुहैया कराई गई है। स्थलों के बाहर खुले हरी-भरी घास से सुसज्जित बड़े लॉन और फलदार पेड़ों व फूलदार पौधों से आकर्षण और ज्यादा बढ़ता है।

दरअसल, अब पर्यटन को स्वच्छ पर्यावरण और भू संरक्षण का एक सशक्त माध्यम मान लिया गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2002 को इको टूरिज्म वर्ष घोषित किया था। हरियाणा पर्यटन निगम भी इस दिशा में काम कर रहा है। हरियाणवी संस्कृति के जरिये पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए राज्य में मेलों का आयोजन किया जाता है। इनमें सूरजकुंड क्राफ्ट मेला बहुत प्रसिध्द है, जो 1986 में शुरू हुआ था। यह मेला हर साल एक से 15 फरवरी तक आयोजित किया जाता है। इस मेले में हरियाणा संस्कृति के अलावा अन्य राज्यों से आए कलाकार भी अपनी संस्कृति व कला के जलवे बिखेरते हैं। मेले में हस्तकला का कमाल देखने को भी मिलता है। दूर-दराज से आए कारीगर हस्तकला की वस्तुएं बेचते हैं। इतना ही नहीं श्रीलंका की स्टॉल भी यहां लगती है। स्पेशल टूरिज्म बोर्ड के चेयरमैन एसके मिश्रा के मुताबिक सूरजकुंड मेले का मुख्य उद्देश्य लोगों को देश की प्राचीन व गौरवशाली से संस्कृति से जोड़ना है। इसके अलावा हस्तकला निर्मित वस्तुओं की बिक्री के लिए कारीगरों को मंच प्रदान करने की भी कोशिश है। इस मेले में विदेशी पर्यटक व व्यापारी भी आते हैं। हस्तकला की वस्तुएं पसंद आने पर वे कारीगरों को ऑर्डर भी देते हैं, जिससे उन्हें रोजगार मिल जाता है। इससे विदेशों में भारतीय कला का प्रचार-प्रसार भी होता है।

हरियाणा की पर्यटन मंत्री किरण चौधरी का कहना है कि आज की महानगरों व शहरों की भाग-दौड़ की जिन्दगी से उकताए लोग अपना कुछ समय प्रकृति के समीप गुजारना चाहते हैं। उनकी यह ख्वाहिश व जरूरत रूरल टूरिज्म पूरी करता है। हरियाणा के रूरल टूरिज्म के महत्व को समझते हुए हिमाचल प्रदेश ने भी हरियाणा के साथ एक समझौता किया है। इसके तहत दोनों राज्यों के पर्यटन विभाग मिलकर काम करेंगे।

गौरतलब है कि देश में 1987 में पर्यटन को उद्योग का दर्जा दिया गया था। भारत विदेशियों के लिए बेहतरीन पर्यटन स्थल रहा है। वैश्विक आर्थिक संकट और गत 26 नवंबर को मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद विदेशी पर्यटकों की संख्या घटन से पर्यटन उद्योग पर बुरा असर पड़ा है। काबिले-गौर है कि 2008 की पहली छमाही में बीते साल की इसी समयावधि के मुकाबले 11।5 फीसदी अधिक पर्यटक भारत आए थे और इस दौरान विदेशी मुद्रा में होने वाली आय में 22।2 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। मगर नवंबर-दिसंबर 2008 के दौरान बीते साल की इसी अवधि के मुकाबले 8 फीसदी कम विदेशी पर्यटक भारत आए और विदेशी मुद्रा से होने वाली आय में 13। फीसद की गिरावट दर्ज की गई। इसका असर हरियाणा के पर्यटन उद्योग पर भी पड़ा है। हालांकि पर्यटन मंत्रालय ने दुनिया के कई देशों में नए सिरे से आक्रामक विज्ञापन अभियान छेड़ा है।

मंत्रालय के अधिकारियों का दावा है कि ‘एड कैम्पेन’ से प्रभावित होकर न सिर्फ ज्यादा विदेशी पर्यटक भारत आएंगे, बल्कि इससे भारतीय पर्यटन उद्योग को भी मजबूती मिलेगी। इस ‘एड कैम्पेन’ के तहत एम्सटर्डम की बसों में ‘नमस्ते इंडिया एड कैम्पन’ आकर्षक कलेवर में पेंट करवाया गया है। पेरिस, ब्यूनस आयर्स और जर्मनी की टैक्सियों पर भारत के पर्यटन स्थलों के चित्र पेंट किए गए हैं। यहां के टैक्सी चालक ‘इंक्रेडिबल शर्ट’ पहन रहे हैं। बीजिंग और शंघाई के सब-वे में प्रमोशनल पोस्टर लगाए गए हैं। कोरिया की सब-वे रेलों में भी भारत के चित्र लगाए गए हैं। इसके अलावा अमेरिका में कई जगहों पर होर्डिंग्स, केबल कारों और बसों में भी भारत के पर्यटन स्थलों के चित्र लगाकर पर्यटकों को आकर्षित करने की कोशिश की गई है।

Tuesday, May 12, 2009

हसन के इंतज़ार में पथराईं मां की आंखें














फ़िरदौस ख़ान
जब घर का चश्मो-चिराग कहीं खो जाता है, तो उसकी याद में किस तरह दिल तड़पता है और आंखें गंगा-जमुना की धारा बन जाती हैं, इसके तसव्वुर से ही रूह कांप उठती है. अगर जाने वाले को इसका अहसास हो तो कभी वह ख्वाब में भी अपने घर-परिवार को छोड़कर जाने की बात नहीं सोचेगा. उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरपुर जिले के कस्बे बुढाना के 10 साल के मोहम्मद हसन की गुमशुदगी को चार साल होने वाले हैं. उसकी मां आयशा का रो-रोकर बुरा हाल है. उन्होंने अपने लाल को हर जगह तलाशा, मगर वो कहीं न मिला. सुबह सूरज की पहली किरण से ही पूरा घर अपने लाडले के इंतज़ार में पलकें बिछा लेता है, उम्मीद की एक लौ कायम रहती है कि कभी कोई तो आएगा, उनके बेटे की खबर लेकर, लेकिन जब रात ढलती है और हसन की कोई ख़बर नहीं आती तो दिल बुझने लगता है.

मोहम्मद हसन के पिता मोहम्मद फुरकान का कहना है कि उन्हें क्या पता था कि उनका बेटा उनसे बिछड़ जाएगा. वे तो बस इतना चाहते थे कि मदरसे से आने के बाद हसन यहां-वहां खेलकर वक्त बर्बाद करने के बजाय उनके काम में हाथ बंटाए, ताकि उसे काम करने की आदत पड़ जाए. वे कहते हैं कि हम तो खेती करने वाले लोग हैं. सुबह पौ फटने से लेकर देर रात तक खेतों में खून-पसीना बहाना पड़ता है तब कहीं जाकर घर-परिवार के गुजारे लायक आमदनी जुटा पाते हैं. हम बचपन से ही बच्चों को काम की आदत डालते हैं, ताकि बड़े होकर वे मेहनत-मजदूरी कर सकें. बस, खेत में काम करने की बात को लेकर ही बेटे पर उनका हाथ उठ गया और वह कहीं चला गया. अपनी इस गलती के लिए वे आज तक पछता रहे हैं. काश, उन्होंने अपने बेटे को मारने के बजाय प्यार से समझाया होता तो आज वह हमारे साथ ही होता. उन्होंने अपने बेटे को आसपास ही नहीं दूर-दराज तक के इलाकों में ढूंढा, मगर वह कहीं नहीं मिला. उन्होंने अपने सब रिश्तेदारों के यहां जाकर भी बेटे को तलाश किया.

बच्चे का मामू जान कारी मोहम्मद आरिफ साहब का कहना है कि मोहम्मद हसन अपने पिता मोहम्मद फुरकान से बहुत डरता था. उसके पिता उससे खेत में काम करने को कहते थे. इसी बात को लेकर कई बार वे अपने बेटे को पीट भी चुके हैं. इससे पहले दो बार वह अपने पिता की मार खाने के बाद अपने मामा के पास बंतीखेड़ा आ गया. बाद में वो उसे समझा-बुझाकर उसके घर छोड़कर आए. वे बताते हैं कि हसन पढ़ने में बहुत होशियार है. उसे पास के ही मदीना-उल-तुलूम मदरसे में कुरआन हिफ्ज यानि मुंह जबानी याद करने के लिए दाखिल कराया गया था. छोटी-सी उम्र में ही उसने तीन पारे अध्याय हिफ्ज कर लिए थे. उसे क्रिकेट खेलने का बहुत शौक है. नम आंखों से वे कहते हैं कि हसन जहां कहीं भी होगा, क्रिकेट जरूर खेलता होगा.

कारी साहब कहते हैं कि आज भी देहात के मुसलमानों में फोटो खिंचवाने का चलन नहीं है. जब कभी दस्तावेजों के लिए जरूरत पड़ती है, तभी लोग फोटो खिंचवाते हैं. एक दिन उन्होंने यूं ही मदरसे में बच्चों के साथ अपने भांजे हसन की फोटो खिंचवा ली थी, वरना आज उसकी तलाश के लिए एक तस्वीर तक उनके पास नहीं होती.

हसन का बड़ा भाई मोहम्मद मुबारक 15 साल का है. पोलियो की वजह से एक पैर से लाचार होने के बावजूद वे भी अपने भाई की तलाश में जगह-जगह भटकता रहता है. उसका कहना है कि बस उसे एक बार उसका भाई मिल जाए, वे उसे कहीं नहीं जाने देगा. हसन का छोटा भाई अब्दुल कादिर, बहनें आरिफा और मंतशा भी अपने भाई को देखने के लिए तरस रही हैं. वे दिन-रात यही दुआ करती हैं कि बस एक बार उनका भाई घर वापस आ जाए.

Saturday, April 18, 2009

हिन्दू धर्म त्याग कर ‘बौद्ध’ बने दलित

छतरपुर. दलित समाज के ढाई सौ से ज़्यादा लोगों ने हिन्दू धर्म को त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया है. धर्म परिवर्तन के साथ ही इन लोगों ने अपने नाम के साथ अपनी मूल जातियों की जगह बौद्ध लिखने का फ़ैसला किया है.

अखिल भारतीय भिक्षु महासंघ के नायक 103 वर्षीय बौद्ध भिक्षु ने कल छतरपुर में लोगों को बौद्ध धर्म की विशेषताओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी थी. साथ ही पिछले 5 हज़ार सालों से दलित के नाम पर इंसान का इंसान के द्वारा शोषण पर अपने विचार व्यक्त किए. उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दू धर्म के अन्दर सभी मनुष्यों को समान नहीं समझा जाता. मनुवादी विचारधारा के मानने वालों ने आर्थिक रूप से पिछड़े और सामाजिक तौर पर कमज़ोर इंसानों को 'दलित' की संज्ञा देकर हजारों सालों तक उनका शोषण किया और यह सिलसिला आज भी जारी है. बौद्ध धर्म सबको एक समान होने का दर्जा देता है. बौद्ध धर्म में छूआछूत के लिए कोई स्थान नहीं है.

हिन्दू धर्म त्यागने और बौद्ध धर्म अपनाने के लिए सामूहिक रूप से दो बौद्ध भिक्षा कार्यक्रमों का आयोजन किया गया. एक कार्यक्रम सन सिटी में हुआ, जहां पर 60 लोगों ने हिन्दू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म की दीक्षा ली. दूसरा कार्यक्रम अम्बेडकर नगर में हुआ. इस कार्यक्रम में बौद्ध भिक्षु आनंद देव ने बौद्ध धर्म के विधि-विधान से 200 लोगों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी. दीक्षा लेने के फ़ौरन बाद ही हिन्दू धर्म त्यागने वालों ने अपने नाम के साथ बौद्ध लिखना शुरू कर दिया.

बौद्ध धर्म अपना चुके लोगों से जब धर्म परिवर्तन की वजह पूछी गई तो उनमें से कुछ लोगों का कहना था कि हमारे पूर्वजों ने हिन्दू होने का खामियाज़ा भुगतते हुए 'दलित' के नाम पर बहुत मानसिक वेदना झेली है और अब हम नहीं चाहते कि हमारी आने वाली पीढियां भी हिन्दू धर्म में रहकर 'दलित' होने का खामियाज़ा भुगतें. हम अपनी इस हज़ारों साल की शोषण की परंपरा को आज ख़त्म कर चुके हैं.

धर्म परिवर्तन के इस मामले में पुलिस के एक आला अफ़सर का कहना है कि इस मामले की जांच करा रहे हैं. किसी तरह की कोई भी गड़बड़ी या साज़िश पाए जाने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी.

Tuesday, February 10, 2009

रिवायतों को खत्म करने की साज़िश

फ़िरदौस ख़ान
पहले मज़हब शिया और सुन्नी तबकों में बंटा था, लेकिन अब मज़हब बंटना शुरू हो गया है, क़ाज़ी साहब की नीयत से. जो रिवायतें पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम के वक्त से चली आ रही हैं, अब उन्हें तोड़-मरोड़कर पेश करने की ही नहीं, बल्कि उन्हें ख़त्म करने की कोशिशें की जा रही हैं. इसकी ताज़ा मिसाल है मध्य प्रदेश के नीमच इलाके के चेहलुम पर होने वाले चालीसवें के खाने को बंद करने का ऐलान. हैरत की बात तो यह है कि यह सब बच्चों को तालीम दिलाने के नाम पर किया जा रहा है. माना बच्चों को शिक्षित करना आज बेहद ज़रूरी है, लेकिन क्या रिवायतों को ख़त्म किए बिना बच्चों को तालीम नहीं दिलाई जा सकती है?

गौरतलब है कि हर साल पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम के नवासे व कर्बला के शहीद हज़रत इमाम हुसैन के चालीसवें पर खाना लोगों को खिलाया जाता रहा है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा. इस परम्परा को ख़त्म किया जा रहा है. नीमच के शहर क़ाज़ी हिदायतुल्लाह ख़ान व हनीफि़या हेल्प सोसायटी के अध्यक्ष मज़हर भाई सदियों से चली आ रही इस परम्परा को ग़लत मानते हैं. उनका कहना है कि पिछले जुम्मे को नमाज़ के बाद उन्होंने शहर के मोज़िज़ लोगों से इस बारे में बात की और इसे बंद करने का फै़सला लिया. अपने फैसले के समर्थन में वह इस बात का हवाला भी देते हैं कि इस भोजन से बचने वाले पैसे को बच्चों की तालीम पर ख़र्च किया जाएगा.

दोस्त फ़ाउंडेशन के चेयरमैन हसन इमाम सख्त लहजे में इस फ़ैसले का विरोध करते हुए कहते हैं कि चेहलुम पर खाना खिलाना तो सवाब का काम है और इस तरह के आयोजनों से लोगों में अपनी रिवायतों के प्रति दिलचस्पी भी बनी रहती है. सामूहिक भोज की शुरुआत पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम ने ही की थी. इस तरह के आयोजनों में आने वाले लोगों को कार्यक्रम के मक़सद के बारे में भी बताया जाता था. हज़रत इमाम हुसैन ने नेकी और सच्चाई के रास्ते पर चलते हुए खुद को कु़र्बान कर दिया था. आज के दौर में ऐसे आयोजनों की ज़्यादा ज़रूरत है, जिनके ज़रिये हज़रत इमाम हुसैन की कु़र्बानी और उनकी शिक्षाओं के बारे में ग़ैर मुस्लिमों को भी जानकारी दी जानी चाहिए.

अफ़ज़ल का कहना है कि बच्चों को तालीम दिलाना अच्छी बात है. आज सबसे ज़्यादा इसी बात की ज़रूरत महसूस की जा रही है कि हर बच्चे को तालीम मिले, लेकिन हज़रत इमाम हुसैन के चालीसवें के खाने को बंद करना का फै़सला सही नहीं है. मुहर्रम और चेहलुम पर उनकी याद में होने वाली दुआओं और नियाज़ वगैरह से ही तो बच्चों को उनकी शिक्षाओं, आदर्शों और कुर्बानियों के बारे में मालूम होता है.

एस.ए. रहमान इस फैसले का विरोध करते हुए कहते हैं कि इस तरह के कार्यक्रमों से ही आने वाली पीढ़ियों को अपने शहीदों के बारे में जानकारी मिलती रहती है. कर्बला के शहीद हज़रत इमाम हुसैन की फ़ातिहा के खाने को बंद करने से ये लोग भला कितनी रक़म बचा लेंगे? बच्चों की तालीम के लिए पैसे जमा करने के और भी बहुत से तरीक़े हो सकते हैं. हम अपने ऐशो-आराम पर ज़्यादा से ज़्यादा पैसा खर्च करते हैं, उसी मद से पैसा बचाकर या यूं कहिए कि फ़िज़ूल ख़र्च को कम करके पैसा बचाया जा सकता है. मगर चालीसवें के खाने को बंद करके पैसा बचाने की बात गले से नीचे नहीं उतर रही है.

दरअसल, इस तरह के लोग उन संगठनों के हाथों की कठपुतलियां बन चुके हैं, जिनका मक़सद ही इस्लाम की रिवायतों को ख़त्म करना है. सवाल यह भी है कि इस तरह के फ़ैसले लेने का हक़ क्या किसी छोटे से क़स्बे के किसी `व्यक्ति विशेष´ को है? हक़ीक़त यही है कि ऐसे लोग सिर्फ सुर्खियां बटोरने के लिए ही इस तरह का ऐलान करते हैं. क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि आम चुनाव क़रीब हैं और सियासत में किस्मत आज़माने के ख्वाहिशमंद लोग ऐसे मौक़ों की फ़िराक़ में रहते हैं. सवाल यह भी है कि मुख्यधारा में शामिल होने के अपनी रिवायतों को ख़त्म करना ही कसौटी है? कट्टरपंथी जमातें उन्हीं मुसलमानों को राष्ट्रवादी मानती हैं जो इस्लाम की रिवायतों को दरकिनार कर उनके इशारों पर चलती हैं. सवाल यह भी है कि भारत जैसे मुल्क में जहां सबको अपनी मजहबी आजादी में जीने का हक़ हासिल है और अपने धार्मिक मान्यताओं पर चलने की पूरी आज़ादी है, ऐसे में किसी ख़ास कट्टरपंथी जमातों को खुश करने के लिए इस तरह के फ़रमान जारी करना कहां तक जायज़ है?

Tuesday, January 13, 2009

देहात में नई इबारत लिखता 'एफ़एम'



फ़िरदौस ख़ान
आदि अदृश्य नदी सरस्वती के तट पर बसे हरित प्रदेश हरियाणा ने हरित क्रांति के क्षेत्र में तो हमेशा से ही अपना लोहा मनवाया है, लेकिन अब सूचना क्रांति के क्षेत्र में भी यह प्रदेश निरंतर विकास की ओर अग्रसर है। हरियाणा में दूरदर्शन केंद्र है, आकाशवाणी केंद्र हैं, अनेक एफ़एम रेडियो धूम मचा रहे हैं। कई राष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्र यहां से प्रकाशित हो रहे हैं और क्षेत्रीय समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं ने भी जनमानस में अपनी पैठ बनाई है।

इस सबके अलावा एक ख़ास बात यह है कि देहात के कम पढे-लिखे लोग भी एफ़एम की तर्ज़ पर घर की चारदीवारी के भीतर रेडियो स्टेशन चलाकर जहां ग्रामीणों का मनोरंजन कर रहे हैं, वहीं उन्हें ज्ञानवर्धक जानकारी मुहैया करा रहे हैं। कार्यक्रमों में अपनी माटी की सौंधी ख़ुशबू होने के कारण ये जनमानस में ख़ासे लोकप्रिय हो रहे हैं।ऐसा ही एक छोटा-सा रेडियो स्टेशन सिरसा ज़िले के गांव अलीका में भी है। रेडिया अली नामक इस रेडियो स्टेशन को गांव के ही चार युवकों ने स्थापित किया है। गांव में इस रेडियो स्टेशन को बनाने की पहल करने वाले सुरेन्द्र सिंह के मुताबिक़ वर्ष 2000 में पहली बार उन्होंने रेडियो पर एम्पलीफ़ायर से रेंज देने की कोशिश की, जिसमें उन्हें कामयाबी मिली। इसके बाद उन्होंने अपने पिता की इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान में सीखे काम के बूते कुछ छोटे उपकरण बनाए और इसके ज़रिये रेडियो पर बोलना शुरू किया। रेडियो पर उनकी आवाज़ सुनाई देने लगी। यहीं से उनके सपनों को पंख लग गए और उन्होंने अपनी कोशिश जारी रखी। पहले उनके रेडियो को केवल 20 मीटर के दायरे तक ही सुना जा सकता था, लेकिन उन्होंने एम्पलीफ़ायर और उच्च क्षमता के अन्य उपकरणों के इस्तेमाल से आसपास के छह गांवों को कवर करने में कामयाबी हासिल कर ली। उनके रेडियो का प्रसारण गांव अलीका के अलावा झिडी, नागोकी, भीमां, थिराज और पंजुआना में हो रहा है।

रेडियो अली पर सुबह सात बजे से कार्यक्रमों का प्रसारण शुरू होता है। सबसे पहले कन्या भ्रूण हत्या, शिक्षा, स्वास्थ्य, संपूर्ण स्वच्छता अभियान, सीएफ़एल के इस्तेमाल और समाज कल्याण आदि सरकारी योजनाओं के बारे में ग्रामीणों से विचार सांझे किए जाते हैं। इसके बाद छात्रों और युवाओं के लिए रोंजगार से संबंधित कार्यक्रम पेश किया जाता है। इस कार्यक्रम के अंत में समस्याओं के समाधान के लिए टेलीफ़ोन कॉल्स को रिसीव किया जाता है और उनके सवालों के जवाब दिए जाते हैं। सुबह साढे सात बजे पंजाबी कलाकारों को समर्पित कार्यक्रम प्रसारित किया जाता है। इलाक़े में पंजाबी भाषी लोग होने के कारण इस कार्यक्रम को ख़ासा पसंद किया जा रहा है। आठ बजे फ़रमाइशी फ़िल्मी गाने सुनाए जाते हैं। प्रसारण के शुरू से लेकर आख़िर तक फ़ोन नंबर बताए जाते हैं, ताकि कोई भी ग्रामीण अपनी बात रेडियो स्टेशन के संचालकों तक पहुंचा सके।

रेडियो स्टेशन में उद्धोषक की भूमिका निभा रहे बलविन्द्र सिंह का कहना है कि कृषि से संबंधित जानकारी के लिए वे कृषि विशेषज्ञों को बुलाने की कोशिश करते हैं, ताकि समय पर खेती के बारे में ज़रूरी जानकारी दी जा सके। रेडियो अली के संचालकों का कहना है कि रेडिया स्टेशन के निर्माण पर क़रीब ढाई हज़ार रुपए की लागत आई है। उन्होंने घर में मौजूद टेलीफ़ोन और डीवीडी प्लेयर का इस्तेमाल किया है, जबकि एम्पलीफ़ायर, माईक व अन्य उपकरण बाज़ार से ख़रीदने पडे।इसी तरह हिसार ज़िले की अग्रोहा तहसील के गांव लालवी के क़रीब 40 वर्षीय चम्पत सिंह भी पिछले छह सालों से गांव में रेडियो स्टेशन चला रहे हैं। उनकी रेडियो और टेप रिकॉर्डर की मरम्मत करने की दुकान है। यहीं पर लंबे समय तक काम करने के कारण उन्हें बिजली के उपकरणों की जानकारी मिली और फिर उन्होंने ख़ुद का रेडियो स्टेशन बनाने का फ़ैसला किया। उनका पुश्तैनी धंधा खेतीबाडी है। इसलिए वे अपने रेडियो स्टेशन के माध्यम से ग्रामीणों को कृषि संबंधी जानकारी देते हैं। इसके अलावा वे गांव में होने धार्मिक, सामाजिक और निजी समारोहों की सूचना भी प्रसारित करते हैं।

हरियाणा के गांवों में इस तरह के रेडियो स्टेशनों की बढ़ती लोकप्रियता की एक वजह यह भी है कि इनके कार्यक्रम जनमानस से जुडे होते हैं। इसके अलावा गांवों के कलाकारों को भी अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए महत्वपूर्ण मंच मिल गया है। युवा ही नहीं बुज़ुर्ग भी, यहां तक कि महिलाएं भी हरियाणवी गीत गाकर इलाक़े में 'स्टार' बन गई हैं।

श्रीनगर में लंबे समय तक ऑल इंडिया रेडियो के वरिष्ठ संवाददाता रहे और हिसार दूरदर्शन केंद्र के पूर्व समाचार निदेशक अजीत सिंह बिना लाइसेंस घरों में शुरू किए गए रेडियो स्टेशनों को अवैध मानते हैं। उनका कहना है कि इनकी फ्रीक्वेंसी सूचना तंत्र को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा इनका ग़लत इस्तेमाल किए जाने की आशंका भी बनी रहती है। साथ ही उनका कहना है कि गांवों में एफ़एम को बढावा दिया जाना चाहिए। गौरतलब है कि सरकार ने हरियाणा में क़रीब 100 एफ़एम रेडियो स्टेशनों के लाइसेंस दिए हैं, जिनमें से छह एफ़एम रेडियो स्टेशन ऑल इंडिया रेडियो से संबध्द हैं। इनमें से चार एफ़एम रेडियो स्टेशन हिसार और दो एफ़एम रेडियो स्टेशन करनाल में हैं। हरियाणा के रोहतक, कुरुक्षेत्र और हिसार स्थित आकाशवाणी केंद्रों के कार्यक्रम दूर-दराज़ के इलाकों में सुनाई नहीं देते। इसके अलावा इनके कार्यक्रमों में संदेश या सूचनाएं भरी होती हैं जिससे ये आम जनता से नहीं जुड पाते।


क़ाबिले-गौर है कि वर्ष 1995 में सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले ने देश में रेडियो के प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभाई, जिसमें कहा गया था कि एयरवेव्स जनता की संपत्ति है। इसलिए इस पर जनता का अधिकार होना चाहिए और इसका इस्तेमाल जनता के हित में होना चाहिए। इसके बाद वर्ष 2002 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने बिना किसी व्यावसायिक हित के सामुदायिक रेडियो चलाने वाले शैक्षिक संस्थानों को लाइसेंस देने का ऐलान किया। इसके तहत एक फ़रवरी 2004 को चेन्नई के अन्ना विश्वविद्यालय और 15 मार्च 2005 को दिल्ली के जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय में परिसर सामुदायिक रेडियो की शुरुआत हुई। हालांकि हरियाणा के गांवों में पिछले कई सालों से इस तरह के रेडियो स्टेशन चल रहे हैं। अगर इन रेडियो स्टेशनों को वाजिब शुल्क में लाइसेंस दे दिए जाएं तो इससे जहां ग्रामीणों को फ़ायदा होगा, वहीं इनके कार्यक्रमों में भी निखार आएगा। टेलीकॉम रेगुलेटर अथॉरिटी ऑंफ इंडिया की ओर से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि रेडियो सिर्फ़ मनोरंजन का साधन ही नहीं, बल्कि लोगों के काम आने वाली रोज़मर्रा की सूचनाओं के लिए भी उतना ही ज़रूरी है।

Saturday, December 20, 2008

ज़िन्दा शख्स के क़त्ल के इल्ज़ाम में काटी उम्रकैद की सज़ा


फ़िरदौस ख़ान
पंजाब के लुधियाना ज़िले के जगराओ में कत्ल के झूठे केस में पांच बेकसूरों ने उम्रकैद की सजा काटी और सजा के दौरान एक की मौत भी हो गई लेकिन 12 साल जेल में गुजारने के बाद जिस व्यक्ति के कत्ल के इल्जाम में सजा काटी वह जिंदा निकला. इस किस्से को सच कर दिखाया है जगसीर सिंह के परिजनों ने. उन्होंने अपने बेटे जगसीर को मृत साबित कर गांव के ही पांच लोगों को उम्रकैद की सजा करवा दी थी.

गौरतलब है कि पुलिस ने 1996 में जगसीर सिंह के कत्ल का मामला दर्ज किया था. 12 साल बाद पुलिस ने जगसीर को एक नाके पर काबू किया और सच सामने आया. जगसीर को पकड़ने की सूचना एसएसपी गुरप्रीत सिंह भुल्लर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दी. उन्होंने बताया कि जगसीर सिंह पुत्र सुखदेव सिंह निवासी गांव टल्लेवाल थाना भरौड (बरनाला) 1996 में गांव में हुए झगड़े के बाद लापता हो गया था.

उसके परिजनों ने गांव के ही नछतर सिंह, सीरा सिंह, सुरजीत, निक्का और अमरजीत सिंह पर जगसीर का अपहरण करने का आरोप लगाया था और परिजनों की शिकायत पर आरोपियों के खिलाफ धारा 364 के तहत मामला दर्ज हुआ था.

सबसे दिलचस्प पहलू यह था कि जगसीर की गुमशुदगी के कुछ दिन बाद ही उसका शव बरामद करवा दिया गया था. पुलिस ने गांव के पास ही एक अज्ञात शव बरामद किया था. जगसीर के परिजनों ने उसे अपना बेटा बताया था.

उन्होंने उसका पोस्टमार्टम करवा अंतिम संस्कार भी करवा दिया. इसके बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ धारा 302 के तहत भी मामला दर्ज किया. पांचों लोगों की झूठी गवाहियों पर उम्रकैद की सजा हो गई. सीरा सिंह की जेल में मौत हो चुकी है बाकि चार लोग सजा काट कर बाहर आ चुके हैं.

कुछ समय बाद जगसीर वापस घर आया तो उसके पिता सुखदेव सिंह, भाई बलविंदर सिंह, मामा गुरुदेव सिंह व जीत सिंह ने उससे कहा कि उसके कत्ल के आरोप में पांच लोगों पर मामला दर्ज है. वह कहीं और जाकर पहचान बदल कर रहे. जगसीर इसके बाद बलदेव सिंह पुत्र प्रेम सिंह निवासी रलेवाल बलाचौर के तौर पर रहने लगा.

बलाचौर में रहते हुए जगसीर ने नकली नाम से प्रमाण पत्र भी बनवा लिए. इसके बाद परिवार वाले उसे रहने के लिए पैसे देते रहे. बुधवार को भी जगसीर किराये की कार में पैसे लेने आ रहा था. गांव सीलोआनी के पास डीएसपी नरिंदर पाल सिंह रूबी व एसएचओ गुरदयाल सिंह की अगुवाई में टीम ने उसे काबू किया. पुलिस ने उससे एक लाख 24 हजार रुपए बरामद किए. पुलिस ने उससे वोटर कार्ड और एक बैंक पास बुक भी बरामद की, दोनों ही डोक्यूमेंट किसी अन्य के नाम से बनाए गए थे. पुलिस ने जगसीर को गिरफ्तार कर उसके खिलाफ धारा 420, 195, 211, 465, 467, 468, 471, 120 के तहत मामला दर्ज किया है.

इसे आप क्या कहेंगे...?


Wednesday, November 5, 2008

बराक हुसैन ओबामा ने रचा इतिहास


अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में करिश्माई डेमोक्रेट बराक हुसैन ओबामा ने जीत हासिल कर एक नया इतिहास रचा है. उन्होंने निर्वाचक मंडल के 338 मत हासिल कर लिए हैं, जबकि उनके रिपब्लिकन प्रतिद्वंद्वी जान मैक्केन को कुल 155 मत हासिल हुए हैं. इस तरह बराक ओबामा अमेरिका के 44वें राष्ट्रपति बन गए हैं. ग़ौरतलब है कि बराक आबोमा अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति चुने गए हैं.

उनकी जीत इस मायने में महत्वपूर्ण है कि 45 साल पहले मानवाधिकार आंदोलन के प्रणेता मार्टिन लूथर किंग ने समानता का जो सपना देखा था वह आज सच हो गया. आमतौर पर भारत समर्थक माने जाने वाले 47 वर्षीय ओबामा अपने नाम और जाति के कारण जानते थे कि व्हाइट हाउस तक पहुंचने का उनका सफ़र कितना मुश्किल होगा. उन्होंने एक बार कहा भी था कि यह एक युगांतकारी परिवर्तन होगा. केन्याई पिता और श्वेत अमेरिकी माता की संतान ओबामा ने यह कर दिखाया. अमेरिकी जनता को उनमें वह सब नज़र आया जिसकी उसे इस कठिन वक्त में दरकार है.

हारवर्ड में पढे़ ओबामा ने 21 माह के कठिन प्रचार अभियान के बाद दुनिया का सबसे ताकतवर ओहदा हासिल किया. पार्टी का उम्मीदवार बनने के लिए उन्होंने पहले अपनी ही पार्टी की हिलेरी क्लिंटन और फिर वियतनाम युद्ध के सेना नायक जान मैक्केन को पीछे छोड़ते हुए अमेरिका में एक बडे़ बदलाव के संकेत के साथ व्हाइट हाउस की गद्दी संभाल ली. ओबामा की जीत ने अमेरिकी इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है. देश सदियों जातीय वैमनस्यता का कोपभाजन बना रहा. आज से 200 साल पहले जिस सामाजिक बुराई का अंत हुआ उसकी सुखद अनुभूति का भी यह जीत प्रतीक है.

शिकागो के एक सामुदायिक कार्यकर्ता ओबामा के लिए व्हाइट हाउस की पहली पायदान इलिओनिस की सीनेट रही. सन 1996 में इस जीत से लोकप्रिय हुए ओबामा सन 2004 में संघीय सीनेट तक जा पहुंचे. अपने सहज व्यक्तित्व से ओबामा जल्द मीडिया की सुर्खियां बनने लगे. उन्होंने इसे बहुआयामी स्वरूप दिया और लेखन में जल्द बुलंदी हासिल की. उनकी दो पुस्तकें द आडेसिटी ऑफ होप तथा ड्रीम फ्राम माई फ़ादर बेहद सराही गई. आठ साल से सत्ता के शीर्ष पद से दूर डेमोक्रेट पार्टी में ओबामा ने एक नई जान फूंक दी. उनका नामांकन वाकई पार्टी के लिए जादुई साबित हुआ.

हवाई में चार अगस्त 1961 को जन्में ओबामा के अरबी मायने ही सौभाग्यशाली है. उन्हें लेकिन इस बात का अफ़सोस रहेगा कि उनके कैरियर में अहम भूमिका निभाने वाली उनकी नानी अपने सपने को साकार होने से कुछ दिन पहले ही चल बसीं. जाति एवं धर्म के विवाद के साथ चुनावी अभियान में अपने को लगातार मज़बूत करते रहे ओबामा ने कई जगह अपनी टिप्पणियों एवं संकेतों में भारत के साथ ठोस सहभागिता की भावना का इजहार किया. यहां तक कि भारत के साथ असैनिक परमाणु समझौते के प्रति समर्थन का, हालांकि पहले वह इसका विरोध करते रहे.

लेकिन कई ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें लेकर भारत में चिंता देखी गई. मसलन उनके आउटसोर्सिग के विरोध वाले रवैये पर. अगर ऐसा हुआ तो यह बेशक भारत के हक़ के ख़िलाफ़ जाएगा. उन्होंने प्रचार अभियान में कहा था कि जान मैक्केन के विपरीत मैं उन कंपनियों को कर में ढील नहीं दूंगा, जो बाहर के लोगों को नौकरियां देते है और वह लाभ उन कंपनियों को देना शुरू करूंगा जो यहां अमेरिका में रोगार सृजित करेंगे. चुनाव के लिए धन एकत्रित करने में रिकार्ड तोड़ चुके ओबामा 200 साल पहले ख़त्म हुए दासता के दर्द को नहीं भूले हैं. उन्होंने बेहिचक कहा कि अभी भी देश जातीय भेदभाव से पाक साफ़ नहीं हुआ है.

अपने प्रतिद्वंद्वी के मुक़ाबले अनुभवहीन कहे जाने वाले ओबामा ने सन 2003 में इराक पर हमले के समय से ही बुश प्रशासन की कड़ी आलोचना करनी शुरू कर दी थी. वह एक मोर्चे पर पूर्ववर्ती प्रशासन से बिल्कुल अलग है जब वह कहते है कि वह बिना शर्त ईरान से बातचीत करेंगे। प्रेरणादायक लफ़्ज़ों तथा बदलाव के नारे से जनता को आकर्षित करने में कामयाब रहे ओबामा बहस में भी मैक्केन पर भारी पड़े. बहस के पहले दौर से ही लगने लगा था कि व्हाइट हाउस उनका इंतज़ार कर रहा है. सवालों के कुशलता से जवाब देने से लेकर भावी प्रस्तावों में उनकी समझबूझ दिखाई दी. चाहे इराक़ का मुद्दा हो या फिर वित्तीय संकट अथवा स्वास्थ्य.

आतंकवाद से लड़ाई के मामले पर उनकी सोच है कि वह इसके लिए नई सहभागिता कायम करेंगे और एक साफ मिशन के साथ ही सैनिकों को लड़ाई के मैदान पर भेजेंगे. उन्होंने प्रचार अभियान में कहा था कि मैं इक्कीसवीं सदी के ख़तरों, आतंकवाद, परमाणु प्रसार, ग़रीबी, नरसंहार, जलवायु परिवर्तन तथा बीमारियों के ख़तरों से निपटने के लिए नई सहभागिता क़ायम करूंगा. शेयर बाजार में गिरावट से देश को उबारने के उनके दृष्टिकोण को पूर्व ज्वाइंट चीफ़ ऑफ स्टाफ्स के अध्यक्ष कोलिन पावेल ने भी ख़ूब सराहा. ओबामा की पत्नी वकील है और उनकी दो बेटियां हैं. दस वर्षीय मालिया और सात वर्षीय साशा.

Friday, October 10, 2008

क्यों सुनाई नहीं देतीं मासूमों की चीख़ें


फ़िरदौस ख़ान
कुपोषण के कारण मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में बच्चों के मौत की खबर के बीच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का कि देश के क़रीब आधे बच्चे कुपोषित हैं, सोचने पर मजबूर करता है क्या हमारा देश वाक़ई तरक़्क़ी कर रहा है... ?

हैरत की बात यह भी है कि जिस देश में धर्म-कर्म के नाम पर इतना कहर बरपा किया जाता है...उन तथाकथित राष्ट्रवादियों को भूख से तड़पते इन मासूमों की चीखें सुनाई नहीं देतीं...क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सभी मज़हबों के लोग मज़हब के नाम पर लड़ने-झगड़ने की बजाय आपस में मिलजुल कर मानवता की सेवा करें...

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश की एक स्वयंसेवी संस्था द्वारा ‘भोजन का अधिकार अभियान’ द्वारा वहां की हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका के मुताबिक़ राज्य में कुपोषण के कारण 159 बच्चों की मौत हो चुकी है. ये मौतें इस साल 8 मई से लेकर 10 सितंबर के बीच हुई हैं.

आयोग का कहना है कि इसकी वजह सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का ज़रूरतमंद बच्चों तक नहीं पहुंचना है. आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एस राजेंद्र बाबू ने कहा कि यह देश के समक्ष सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है. देश में बच्चों के कल्याण के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं. इसके बावजूद कोई भी योजना इतनी अच्छी नहीं है कि उसमें देश के सभी बच्चे शामिल हों. उनका कहना है कि सरकारी कल्याणकारी योजनाओं को जिस तरीके से लागू किया जाना चाहिए था, वे उस तरीके से लागू नहीं हो रही हैं. ये योजनाएं ज़रूरतमंद लोगों तक नहीं पहुंच पा रही हैं, वरना मध्यप्रदेश में इतने बच्चों की मौत नहीं होती.

क़ाबिले-गौर है कि कुछ समय पहले संसद में पेश एक रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में 46 फ़ीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-3), 2005-06 की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में तीन साल से कम उम्र के क़रीब 47 फीसदी बच्चे कम वज़न के हैं. इसके कारण उनका शारीरिक विकास भी रुक गया है. देश की राजधानी दिल्ली में 33.1 फ़ीसदी बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं, जबकि मध्य प्रदेश में 60.3 फ़ीसदी, झारखंड में 59.2 फ़ीसदी, बिहार में 58 फ़ीसदी, छत्तीसगढ़ में 52.2 फ़ीसदी, उड़ीसा में 44 फ़ीसदी, राजस्थान में भी 44 फ़ीसदी, हरियाणा में 41.9 फ़ीसदी, महाराष्ट्र में 39.7 फ़ीसदी, उत्तरांचल में 38 फ़ीसदी, जम्मू कश्मीर में 29.4 फ़ीसदी और पंजाब में 27 फ़ीसदी बच्चे कुपोषणग्रस्त हैं.

यूनिसेफ़ द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया के कुल कुपोषणग्रस्त बच्चों में से एक तिहाई आबादी भारतीय बच्चों की है. भारत में पांच करोड़ 70 लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. विश्व में कुल 14 करोड़ 60 लाख बच्चे कुपोषणग्रस्त हैं. विकास की मौजूदा दर अगर ऐसी ही रही तो 2015 तक कुपोषण दर आधी कर देने का सहस्राब्दी विकास लक्ष्य 'एमडीजी' 2025 तक भी पूरा नहीं हो सकेगा. रिपोर्ट में भारत की कुपोषण दर की तुलना अन्य देशों से करते हुए कहा गया है कि भारत में कुपोषण की दर इथोपिया, नेपाल और बांग्लादेश के बराबर है. इथोपिया में कुपोषण दर 47 फ़ीसदी तथा नेपाल और बांग्लादेश में 48-48 फ़ीसदी है, जो चीन की आठ फ़ीसदी, थाइलैंड की 18 फ़ीसदी और अफगानिस्तान की 39 फ़ीसदी के मुकाबले बहुत ज़्यादा है.

यूनिसेफ़ के एक अधिकारी के मुताबिक़ भारत में हर साल बच्चों की 21 लाख मौतों में से 50 फ़ीसदी का कारण कुपोषण होता है. भारत में खाद्य का नहीं, बल्कि जानकारी की कमी और सरकारी लापरवाही ही कुपोषण का कारण बन रही है. उनका यह भी कहना है कि अगर नवजात शिशु को आहार देने के सही तरीके के साथ सेहत के प्रति कुछ सावधानियां बरती जाएं तो भारत में हर साल पांच साल से कम उम्र के छह लाख से ज्यादा बच्चों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकता है.

1996 में रोम में हुए पहले विश्व खाद्य शिखर सम्मेलन (डब्ल्यूएफएस) के दौरान तक़रीबन सभी देशों के प्रमुखों ने यह वादा दोहराया था कि पर्याप्त स्वच्छ और पोषक आहार पाना सभी का अधिकार होगा.उनका मानना था कि यह अविश्वसनीय है कि दुनिया के 84 करोड़ लोगों को पोषक ज़रूरतें पूरी करने के लिए अनाज उपलब्ध नहीं है. कुपोषण संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए राष्ट्रीय आर्थिक विकास व्यय 20 से 30 अरब डॉलर प्रतिवर्ष है. विकासशील देशों में चार में से एक बच्चा कम वज़न का है. यह संख्या क़रीब एक करोड़ 46 लाख है. नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद अल बरदेई ने इस समस्या की ओर विश्व का ध्यान आकर्षित करते हुआ कहा था कि अगर विश्व में सेना पर खर्च होने वाले बजट का एक फ़ीसदी भी इस मद में खर्च किया जाए तो भुखमरी पर काफ़ी हद तक काबू पाया जा सकता है.

खैर... हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इंसानियत से बढ़कर कोई मज़हब नहीं...और जनसेवा से बढ़कर कोई इबादत नहीं...

Wednesday, October 8, 2008

पाक कश्मीर की आज़ादी के खिलाफ़ नहीं

आख़िर पाकिस्तान ने कश्मीरियों के बारे में अपना रुख़ साफ़ कर ही दिया। ब्रिटेन में पाकिस्तान के उच्चयुक्त वाजिद शम्सुल हसन ने कश्मीर पर कहा है कि पाकिस्तान कश्मीर में 'बाहर के चरमपंथियों के आतंकवाद' के ख़िलाफ़ है। उन्होंने कश्मीरियों के भारत के विरुद्ध बल प्रयोग को उचित ठहराया है. गौरतलब है कि श्री हसन हाल में देश के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के वॉल स्ट्रीट जर्नल को दिए उस इंटरव्यू के बारे में स्पष्टीकरण दे रहे थे, जिसमें उन्होंने भारत प्रशासित कश्मीर में इस्लामी चरमपंथियों को 'आतंकवादी' कहा था.


क़ाबिले-गौर यह भी है कि राष्ट्रपति ज़रदारी के विचारों के बारे में छपी रिपोर्ट के बाद प्रदर्शनकारियों ने भारत प्रशासित कश्मीर में जारी कर्फ़्यू की अवहेलना करते हुए भारतीय प्रशासन और ज़रदारी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किए थे। कश्मीर में ऐसा पहली बार हुआ है जब पाकिस्तान के किसी नेता के पुतले जलाए गए हैं। आमतौर भारत प्रशासित कश्मीर में भारतीय प्रशासन का विरोध करते समय पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगते रहे हैं.


प्रमुख अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने ज़रदारी के बयान की कड़े शब्दों में निंदा की है। उनका कहना है कि " ज़रदारी ने अमरीका को ख़ुश करने के लिए यह बयान दिया है। ज़रदारी भारत से डरते हैं और भारत को ख़ुश करने के लिए पाकिस्तान की प्रतिष्ठा से भी समझौता कर सकते हैं।'' उनका यह भी कहना है कि ''कश्मीरी युवा अपने हक़ के लिए लड़ रहे हैं। सच तो यह है कि कश्मीर की जनता सरकारी आतंकवाद का आतंक का शिकार है। कश्मीरी के विद्रोहियों को आतंकवादी कह देने से कश्मीर की स्वायत्ता और स्वतंत्रता का आंदोलन कमज़ोर पड़ने वाला नहीं है. चरमपंथी संगठन अल-उमर-मुजाहिदीन के प्रमुख कमांडर मुश्ताक़ ज़रगार ने भी ज़रदारी के बयान की आलोचना करते हुए कहा था कि "ज़रदारी ने भारत को कश्मीरी युवाओं को क़त्ल करने का लाइसेंस दे दिया है."


पाक उच्चायुक्त का कहना था कि राष्ट्रपति ज़रदारी 'कश्मीरी बाशिंदों के अपने संघर्ष को और स्वशासन के अधिकार' को नुक़सान पहुंचाने की कोशिश नहीं कर रहे थे। मीडिया को भेजे गए एक ई-मेल में उन्होंने कहा कि 'पाकिस्तान विदेशी चरमपंथियों की ओर से सीमापार घुसपैठ और कश्मीरियों की आज़ादी की मुहिम को नेस्तनाबूद किए जाने' के ख़िलाफ़ है। ई-मेल में यह भी कहा गया है कि- 'इन विदेशी चरमपंथियों ने कश्मीरियों के स्वतंत्रता के संघर्ष की मदद करने की जगह उसे नुक़सान पहुंचाया है।'


गौरतलब है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति बनने के बाद संसद को अपने पहले संबोधन में आसिफ़ अली ज़रदारी ने कश्मीर का ज़िक्र करते हुए कहा था कि- ''मूल अधिकारों की बहाली को लेकर कश्मीरी लोगों के न्यायसंगत संघर्ष के प्रति हम वचनबद्ध हैं।''

Tuesday, October 7, 2008

मासूमों को निगल रहा है कुपोषण


फ़िरदौस ख़ान
बेशक भारत आर्थिक और परमाणु शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, लेकिन बच्चों के स्वास्थ्य के मामले में वह काफ़ी पीछे है. मध्य प्रदेश में कुपोषण से हो रहीं मौतें इस बात को साबित करने के लिए काफ़ी हैं. गौरतलब है कि पिछले क़रीब एक महीने में मध्यप्रदेश के खंडवा, झाबुआ, सतना और शिवपुरी ज़िलों में क़रीब 100 बच्चों की मौत हो चुकी है और दो सौ से ज़्यादा अस्पताल में भर्ती हैं.


कुछ समय पहले संसद में पेश एक रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में 46 फ़ीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-3), 2005-06 की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में तीन साल से कम उम्र के क़रीब 47 फीसदी बच्चे कम वज़न के हैं. इसके कारण उनका शारीरिक विकास भी रुक गया है. देश की राजधानी दिल्ली में 33.1 फ़ीसदी बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं, जबकि मध्य प्रदेश में 60.3 फ़ीसदी, झारखंड में 59.2 फ़ीसदी, बिहार में 58 फ़ीसदी, छत्तीसगढ़ में 52.2 फ़ीसदी, उड़ीसा में 44 फ़ीसदी, राजस्थान में भी 44 फ़ीसदी, हरियाणा में 41.9 फ़ीसदी, महाराष्ट्र में 39.7 फ़ीसदी, उत्तरांचल में 38 फ़ीसदी, जम्मू कश्मीर में 29.4 फ़ीसदी और पंजाब में 27 फ़ीसदी बच्चे कुपोषणग्रस्त हैं.


यूनिसेफ़ द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया के कुल कुपोषणग्रस्त बच्चों में से एक तिहाई आबादी भारतीय बच्चों की है. भारत में पांच करोड़ 70 लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. विश्व में कुल 14 करोड़ 60 लाख बच्चे कुपोषणग्रस्त हैं. विकास की मौजूदा दर अगर ऐसी ही रही तो 2015 तक कुपोषण दर आधी कर देने का सहस्राब्दी विकास लक्ष्य 'एमडीजी' 2025 तक भी पूरा नहीं हो सकेगा. रिपोर्ट में भारत की कुपोषण दर की तुलना अन्य देशों से करते हुए कहा गया है कि भारत में कुपोषण की दर इथोपिया, नेपाल और बांग्लादेश के बराबर है. इथोपिया में कुपोषण दर 47 फ़ीसदी तथा नेपाल और बांग्लादेश में 48-48 फ़ीसदी है, जो चीन की आठ फ़ीसदी, थाइलैंड की 18 फ़ीसदी और अफगानिस्तान की 39 फ़ीसदी के मुकाबले बहुत ज़्यादा है.


यूनिसेफ़ के एक अधिकारी के मुताबिक़ भारत में हर साल बच्चों की 21 लाख मौतों में से 50 फ़ीसदी का कारण कुपोषण होता है. भारत में खाद्य का नहीं, बल्कि जानकारी की कमी और सरकारी लापरवाही ही कुपोषण का कारण बन रही है. उनका यह भी कहना है कि अगर नवजात शिशु को आहार देने के सही तरीके के साथ सेहत के प्रति कुछ सावधानियां बरती जाएं तो भारत में हर साल पांच साल से कम उम्र के छह लाख से ज्यादा बच्चों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकता है.


दरअसल, कुपोषण के कई कारण होते हैं, जिनमें महिला निरक्षरता से लेकर बाल विवाह, प्रसव के समय जननी का उम्र, पारिवारिक खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य की देखभाल, टीकाकरण, स्वच्छ पेयजल आदि मुख्य रूप से शामिल हैं. हालांकि इन समस्याओं से निपटने के लिए सरकार ने कई योजनाएं चलाई हैं, लेकिन इसके बावजूद संतोषजनक नतीजे सामने नहीं आए हैं. देश की लगातार बढ़ती जनसंख्या भी इन सरकारी योजनाओं को धूल चटाने की अहम वजह बनती रही है, क्योंकि जिस तेजी से आबादी बढ़ रही है उसके मुकाबले में उस रफ्तार से सुविधाओं का विस्तार नहीं हो पा रहा है. इसके अलावा उदारीकरण के कारण बढ़ी बेरोज़गारी ने भी भुखमरी की समस्या पैदा की है. आज भी भारत में करोड़ों परिवार ऐसे हैं जिन्हें दो वक़्त की रोटी भी नहीं मिल पाती. ऐसी हालत में वे अपने बच्चों को पौष्टिक भोजन भला कहां से मुहैया करा पाएंगे.


एक कुपोषित शरीर को संपूर्ण और संतुलित भोजन की ज़रूरत होती है. इसलिए सबसे बड़ी चुनौती फ़िलहाल भूखों को भोजन कराना है. हमारे संविधान में कहा गया है कि 'राज्य पोषण स्तर में वृध्दि और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में समझेगा.' मगर आजादी के छह दशक बाद भी 46 फ़ीसदी बच्चे कुपोषण की गिफ्त में हों तो ज़ाहिर है कि राज्य अपने प्राथमिक संवैधानिक कर्तव्यों में नकारा साबित हुए हैं.


1996 में रोम में हुए पहले विश्व खाद्य शिखर सम्मेलन (डब्ल्यूएफएस) के दौरान तक़रीबन सभी देशों के प्रमुखों ने यह वादा दोहराया था कि पर्याप्त स्वच्छ और पोषक आहार पाना सभी का अधिकार होगा.उनका मानना था कि यह अविश्वसनीय है कि दुनिया के 84 करोड़ लोगों को पोषक ज़रूरतें पूरी करने के लिए अनाज उपलब्ध नहीं है. कुपोषण संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए राष्ट्रीय आर्थिक विकास व्यय 20 से 30 अरब डॉलर प्रतिवर्ष है. विकासशील देशों में चार में से एक बच्चा कम वज़न का है. यह संख्या क़रीब एक करोड़ 46 लाख है. नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद अल बरदेई ने इस समस्या की ओर विश्व का ध्यान आकर्षित करते हुआ कहा था कि अगर विश्व में सेना पर खर्च होने वाले बजट का एक फ़ीसदी भी इस मद में खर्च किया जाए तो भुखमरी पर काफ़ी हद तक काबू पाया जा सकता है.


हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो फ़सल काटे जाने के बाद खेत में बचे अनाज और बाजार में पड़ी गली-सड़ी सब्जियां बटोरकर किसी तरह उससे अपनी भूख मिटाने की कोशिश करते हैं. महानगरों में भी भूख से बेहाल लोगों को कूड़ेदानों में से रोटी या ब्रेड के टुकड़ों को उठाते हुए देखा जा सकता है. रोज़गार की कमी और ग़रीबी की मार के चलते कितने ही परिवार चावल के कुछ दानों को पानी में उबालकर पीने को मजबूर हैं. इस हालत में भी सबसे ज़्यादा त्याग महिलाओं को ही करना पड़ता है, क्योंकि वे चाहती हैं कि पहले परिवार के पुरुषों और बच्चों को उनका हिस्सा मिल जाए.


क़ाबिले-गौर यह भी है कि हमारे देश में एक तरफ़ अमीरों के वे बच्चे हैं जिन्हें दूध में भी बोर्नविटा की ज़रूरत होती है तो दूसरी तरफ़ वे बच्चे हैं जिन्हें पेटभर चावल का पानी भी नसीब नहीं हो पाता और वे भूख से तड़पते हुए दम तोड़ देते हैं. यह एक कड़वी सच्चाई है कि हमारे देश में आज़ादी के बाद से अब तक ग़रीबों की भलाई के लिए योजनाएं तो अनेक बनाई गईं, लेकिन लालफ़ीताशाही के चलते वे महज़ कागज़ों तक ही सीमित होकर रह गईं. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तो इसे स्वीकार करते हुए यहां तक कहा था कि सरकार की ओर से चला एक रुपया ग़रीबों तक पहुंचे-पहुंचते पांच पैसे ही रह जाता है. एक तरफ़ गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ता है तो दूसरी तरफ़ भूख और कुपोषण से लोग मर रहे होते हैं. ऐसी हालत के लिए क्या व्यवस्था सीधे तौर पर दोषी नहीं है?
(इस आलेख को आज यानि 7 अक्टूबर 2008 के दैनिक जागरण में भी पढ़ा जा सकता है)

Monday, October 6, 2008

बाढ़ आती ही नहीं, लाई भी जाती है


फ़िरदौस ख़ान
देश के अन्य राज्यों के साथ ही बाढ़ ने इस साल पंजाब में भी कहर बरपाया, लेकिन पंजाब की बाढ़ प्राकृतिक आपदा न होकर मानवीय लापरवाही का नतीजा है. बाढ़ से जहां राज्य के सैकड़ों गांव जलमग्न हो गए, वहीं क़रीब 13 लोग भी बाढ़ की वजह से मौत की आगोश में समा गए. खेतों में खड़ी वे फसलें भी बाढ़ के पानी में बह गईं, जिन्हें किसानों के अपने खून-पसीने से सींचा था.

राज्य के अधिकारियों के मुताबिक़ फिरोज़पुर के 140 गांव, कपूरथला के 106 गांव, मोगा के 40 गांव, तरनतारन के 28 गांव और जालंधर के 14 गांव बाढ़ की चपेट में आए हैं. इन गांवों की क़रीब 66 हज़ार एकड़ भूमि बाढ़ से प्रभावित हुई है. फिरोज़पुर के 100 गांव तो पूरी तरह पानी में डूब गए, जिससे कई दिनों तक वहां की बिजली सप्लाई पूरी तरह बंद कर दी गई.

बाढ़ का कारण धुस्सा बांध का टूटना है. भाखड़ा डैम और सतलुज डैम से सतलुज में पानी छोड़ा गया, जिससे हालात और ज्यादा गंभीर हो गए. सिंचाई विभाग के मुताबिक़ भांखरपुर, धर्मकोट और धालीवाल नहर में भी जरूरत से ज्यादा पानी छोड़ा गया. अधिकारियों का कहना है कि अगर रोजाना एक से डेढ़ घंटा लगातार बारिश पड़ती है तो डैम और नहरों में पानी का स्तर बढ़ जाता है, जिससे भारी नुकसान होने की आशंका बढ़ जाती है. अफ़सोस की बात यह भी है कि सरकार के नुमाइंदे प्रशासनिक खामियों को नकारते हुए बाढ़ के लिए ग्रामीणों को ही क़सूरवार ठहराते हैं.

इसी कड़ी में, बाढ़ प्रभावित इलाकों का जायज़ा लेने के लिए मोगा के गांव संघेड़ा में पहुंचे सिंचाई मंत्री सरदार जनमेजा सिंह सेखों ने लोगों से बातचीत करते हुए धुस्सी बांध टूटने का ठीकरा ग्रामीणों के ही सिर ही फोड़ दिया. इससे ग्रामीण भड़क उठे और उन्होंने बांध प्रबंधों के नाम पर हुई घपलेबाजी की पोल खोलनी शुरू कर दी. अब भड़कने की बारी सिंचाई मंत्री की थी. मामले की नजाकत को भांपते हुए डिप्टी कमिश्नर वीके मीणा और एसडीएम लखमीर सिंह ने दोनों पक्षों को शांत कराया. ग्रामीणों का कहना है कि 1993 के बाद प्रशासन ने बांध पर मिट्टी डलवाने तक की कोशिश नहीं की. गांव के लोग हर साल ख़ुद ही मिट्टी डालते रहे हैं और सिंचाई विभाग फर्जी बिल बनाकर पैसा हड़प करता रहा है. उनका यह भी कहना है कि हर साल बांध पर थोड़ी-थोड़ी मिट्टी भी डलवाई होती तो इतनी तबाही नहीं हुई होती. उनका कहना है कि अधिकारियों और राजनेताओं ने अपने निजी स्वार्थ के लिए हजारों लोगों को बर्बाद कर दिया.

गौरतलब है कि सतलुज में आई बाढ़ से हुई तबाही ने प्रशासनिक प्रबंधों की कलई खोलकर रख दी है. मोगा के गांव बोगेवाल के समीप जिस स्थान पर धुस्सी बांध टूटा है, वहां 1997 में तकनीकी रूप से गलत ढंग से नोज तैयार की गई थी, जिससे बांध में दरारें पड़ गईं. धुस्सी बांध के किनारों पर लगाए गए बबूल के पेड़ों के कटान के चलते भी बांध सुरक्षा संबंधी सवालों के घेरे में था. हर साल मानसून शुरू होने से पहले धुस्सी बांध का जायजा लेने वाले अधिकारियों ने नोज की तकनीकी कमी और पेड़ों के कटान के कारण कमज़ोर होते बांध की तरफ़ ध्यान नहीं दिया. नोज निर्माण में लापरवाही स्वीकार करते हुए सिंचाई मंत्री सरदार जनमेजा सिंह सेखों ने कहा कि मामले की जांच सिंचाई विभाग के मुख्य इंजीनियर को सौंपी गई है.

सिंचाई मंत्री के मुताबिक़ राज्य के 134 गांवों में बाढ़ आई है, जिससे 55 हज़ार प्रभावित हुए हैं. इन गांवों में क़रीब 11080 हेक्टेयर क्षेत्र में खड़ी फ़सलें भी पूरी तरह तबाह हो गई हैं. उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि प्रभावित किसानों के नुक़सान की भरपाई की जाए, क्योंकि केंद्रीय पूल दिए जाने वाले अनाज में पंजाब के किसानों की हिस्सेदारी 60 से 70 फ़ीसदी रहती है. साथ ही उन्होंने किसानों के क़र्ज़ भी माफ़ किए जाने की मांग की. गौरतलब है कि बांग्लादेश के बाद भारत ही दुनिया का दूसरा सर्वाधिक बाढ़ग्रस्त देश है. 1960 से 1980 के बीच दुनिया में बाढ से जो लोग मरे उनमें से 20 फ़ीसदी भारत से ही थे. विडंबना यह भी है कि पिछले क़रीब छह दशकों में बाढ़ से होने वाले नुक़सान में 50 से 90 गुना बढ़ोतरी हुई है. एक अनुमान के मुताबिक़ 1953 में जहां कुल नुक़सान क़रीब 50 करोड़ रुपए था, वहीं 1984 में यह 2500 करोड़, 1985 में 4100 करोड़ और 1988 में 4600 करोड़ रुपए हो गया. 1990 के शुरू में कम नुक़सान हुआ. 1997 में 800 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था, लेकिन 1999 और 2000 में बाढ़ से ज़्यादा तबाही हुई. हर साल बाढ़ से होने वाले जान व माल के नुक़सान में बढ़ोतरी ही हो रही है, जो बेहद चिंताजनक है.

देश में कुल 62 प्रमुख नदी प्रणालियां हैं, जिनमें से 18 ऐसी हैं जो अमूमन बाढ़ग्रस्त रहती हैं. उत्तर-पूर्व में असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश तथा दक्षिण में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु बाढ़ग्रस्त इलाके माने जाते हैं. लेकिन कभी-कभार देश के अन्य राज्य भी बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं. 1996 में हरियाणा में बाढ़ ने कहर बरपाया था.

पिछले करीब छह दशकों में देश में 256 बड़े बांध बनाए गए हैं और 154 निर्माणाधीन हैं. साथ ही पिछले करीब दो दशकों से बाढ़ नियंत्रण में मदद के लिए रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना व्यवस्था का भी इस्तेमाल किया जा रहा है. लेकिन संतोषजनक नतीजे सामने नहीं आ पा रहे हैं.

गौरतलब है कि विकसित देशों में आगजनी, तूफान, भूकंप और बाढ़ के लिए कस्बों का प्रशासन भी पहले से तैयार रहता है. उन्हें पहले से पता होता है कि किस पैमाने पर, किस आपदा की दशा में, उन्हें क्या-क्या करना है. वे बिना विपदा के छोटे पैमाने पर इसका अभ्यास करते रहते हैं. इसमें आम शहरियों के मुखियाओं को भी शामिल किया जाता है. गली-मोहल्ले के हर घर तक यह सूचना मीडिया या डाक के जरिये संक्षेप में पहुंचा दी जाती है कि किस दशा में उन्हें क्या करना है. संचार व्यवस्था के टूटने पर भी वे प्रशासन से क्या उम्मीद रख सकते हैं. पहले तो वे इसकी रोकथाम की कोशिश करते हैं. इसमें विशेषज्ञों की सलाह ली जाती है. इस प्रक्रिया को आपदा प्रबंधन कहते हैं. आग तूफान और भूकंप के दौरान आपदा प्रबंधन एक खर्चीली प्रक्रिया है, लेकिन बाढ़ का आपदा नियंत्रण उतना खर्चीला काम नहीं है. इसे बखूबी बाढ़ आने वाले इलाकों में लागू किया जा सकता है.

विकसित देशों में बाढ़ के आपदा प्रबंधन में सबसे पहले यह ध्यान रखा जाता है कि मिट्टी, कचरे वगैरह के जमा होने से इसकी गहराई कम न हो जाए. इसके लिए नदी के किनारों पर खासतौर से पेड़ लगाए जाते हैं, जिनकी जड़ें मिट्टी को थामकर रखती हैं. नदी किनारे पर घर बसाने वालों के बगीचों में भी अनिवार्य रूप से पेड़ लगवाए जाते हैं. जहां बाढ़ का खतरा ज्यादा हो, वहां नदी को और अधिक गहरा कर दिया जाता है. गांवों तक में पानी का स्तर नापने के लिए स्केल बनी होती है.

भारत में भी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए पहले से ही तैयार रहना होगा. इसके लिए जहां प्रशासन को चाक-चौबंद रहने की ज़रूरत है, वहीं जनमानस को भी प्राकृतिक आपदा से निपटने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए. स्कूल, कॉलेजों के अलावा जगह-जगह शिविर लगाकर लोगों को यह प्रशिक्षण दिया जा सकता है. इसमें स्वयंसेवी संस्थाओं की भी मदद ली जा सकती है. इस तरह प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुक़सान को कम किया जा सकता है.