Friday, June 2, 2017

महिलाओं के हक़ में एक और बेहतरीन फ़ैसला

फ़िरदौस ख़ान
देश में हज़ारों-लाखों ऐसी महिलाएं होंगी, जो अकेले दम पर अपने बच्चों की परवरिश कर रही हैं. इनमें से बहुत सी ऐसी महिलाएं हैं, जिनके पति की मौत हो चुकी है. बहुत सी ऐसी महिलाएं हैं, जिनका तलाक़ हो गया है और बहुत सी ऐसी महिलाएं भी हैं, जिनके पति उन्हें छोड़कर चले गए हैं. ऐसी हालत में बच्चों की अच्छी परवरिश करना, उन्हें शिक्षा दिलाना आसान काम नहीं है. आसान काम इसलिए नहीं है, क्योंकि भारत जैसे पितृ सत्तामक समाज में महिलाओं जो हर क़दम पर पुरुष के नाम की ज़रूरत पड़ती है. शादी से पहले उसे पिता के नाम की ज़रूरत होती है और शादी के बाद पति का नाम उसके लिए अनिवार्य कर दिया जाता है. लेकिन जिनके पिता नहीं हैं, पति नहीं हैं, वे महिलाएं कहां जाएं. क्या महिला का अपना वजूद ही उसके लिए काफ़ी नहीं है. जो महिला जननी है, जो पुरुष को जन्म देकर इस दुनिया में लाती है, समाज ने उसे इतना बेबस और मजबूर क्यों बना दिया है. शायद इसलिए कि पुरुष महिलाओं की शक्ति को जानता है, पहचानता है. उसे डर है कि जिस दिन महिला अपने अस्तित्व को, अपनी शक्ति को जान जाएगी, पहचान जाएगी, उस दिन वह उसकी ग़ुलामी से निकल जाएगी. महिलाओं को बांधने के लिए उसने तरह-तरह के नियम-क़ायदे गढ़े और महिलाओं को उन्हें मानने पर मजबूर किया. इसके लिए उसने महिलाओं का भी सहारा लिया. मगर अब वक़्त बदल रहा है. महिलाओं ने ख़ुद को समझनी शुरू कर दिया है. वे अपने अस्तित्व को जानने लगी हैं, अपनी शक्ति को पहचानने लगी हैं. नतीतजन, समाज में बदलाव की हवा चलने लगी है,  देश की सरकारें महिलाओं के हक़ में फ़ैसले करने लगी हैं. इसकी ताज़ा मिसाल है विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी)  द्वारा डिग्री पर पिता का नाम वैकल्पिक बनाने की दिशा में काम करना.

ग़ौरतलब है कि पिछले महीने महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को पत्र लिखकर छात्रों के डिग्री प्रमाण पत्र पर पिता के नाम की अनिवार्यता संबंधी नियम में बदलाव का आग्रह किया था. अपने पत्र में उन्होंने लिखा था, मेरी मुलाक़ात ऐसी कई महिलाओं से हुई, जो अपने पति को छोड़ चुकी हैं. ऐसी महिलाएं भारी कठिनाइयों का सामना कर रही हैं. उन्हें बच्चों का डिग्री प्रमाण पत्र लेने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. पिता के नाम के बग़ैर प्रमाण पत्र नहीं मिलता है. उन्होंने यह भी लिखा था कि शादी का टूटना अथवा पति से अलग रहना आज के दौर की कटु सच्चाई है. लिहाजा हमें अकेली मां के दर्द को समझना होगा. उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए नियमों में बदलाव करना वक़्त की मांग है. मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कहना है कि छात्र अपनी इच्छा से माता या पिता के नाम का उल्लेख कर सकते हैं. हम इस विचार को पसंद करते हैं और हमें कोई आपत्ति नहीं है. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के मश्विरे पर मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्रालय की सैद्धांतिक सहमति के बाद यूजीसी यह क़दम उठाएगा.

क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि पिछले साल मेनका गांधी की पहल पर विदेश मंत्रालय ने अपना पासपोर्ट आवेदन नियम बदल दिया था. मेनका गांधी ने अकेली मां प्रियंका गुप्ता की उस ऑनलाइन याचिका का संज्ञान लिया था, जिसमें पासपोर्ट आवेदन पत्र से पिता के नाम की अनिवार्यता ख़त्म करने का अनुरोध किया गया था. इस संबंध में मेनका गांधी ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को पत्र लिखकर पासपोर्ट आवेदन पत्र पर पिता के नाम की अनिवार्यता ख़त्म करने का आग्रह किया था. इसके बाद विदेश मंत्रालय ने ऐलान किया था कि पासपोर्ट आवेदन पत्र में माता या पिता में से किसी एक का नाम होना चाहिए. दोनों के नाम की ज़रूरत नहीं है.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि हमारे देश में महिलाओं की हालत अच्छी नहीं है. अच्छी इसलिए नहीं है, क्योंकि आज भी उन्हें पुरुष से कमतर माना जाता है. उनके जन्म पर घर मातम पसर जाता है, जबकि लड़के के जन्म पर लड्डू बांटे जाते हैं. मंगल गीत गाए जाते हैं, उत्सव मनाए जाते हैं. यह बात अलग है कि उन्हें देवी मानकर पूजा जाता है. यही वह समाज है, जो एक तरफ़ मंदिर में रखी देवी की प्रतिमा की पूजा भी करता है, वहीं दूसरी तरफ़ महिलाओं की कोख में क्न्या भ्रूण की हत्या करता है. कभी कन्या भ्रूण की हत्या की जाती है, तो कभी जन्म के बाद उसकी हत्या कर दी जाती है. कभी ससुराल में घर की लक्ष्मी मानी जाने वाली बहू को दहेज के लिए ज़िन्दा जला दिया जाता है. इन सबके बीच अच्छी बात यह है कि अब महिलाओं ने अपने हक़ के लिए आवाज़ उठानी शुरू कर दी है. हालात बदलने लगे हैं. महिलाएं घर की चहारदीवारे से बाहर आकर पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं. सरकार भी महिलाओं के हक़ में लगातार अच्छे फ़ैसले ले रही है, जिससे उनकी ज़िन्दगी की मुश्किलें कम हो सकें.

हाल ही में सरकार ने नई राष्ट्रीय महिला नीति बनाने की भी बात कही है, जिसमें उन्हें कई अधिकार मिल जाएंगे. बहरहाल, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के फ़ैसले से उन महिलाओं को बहुत राहत मिलेगी, जो अकेले अपने बच्चों की परवरिश कर रही हैं. इससे उन बच्चों को भी फ़ायदा होगा, जिनके पिता उनके साथ नहीं हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार आगे भी महिलाओं के अच्छे फ़ैसले करती रहेगी. वैसे अकेली महिलाओं को अधिकार दिए जाने से ज़्यादा ज़रूरी है कि हम उनका सम्मान करना सीखें. अगर समाज में महिलाओं के साथ होने वाले बुरे बर्ताव को ख़त्म कर दिया जाए और हमारी कथनी-करनी में कोई अंतर न रहे, तो किसी भी महिला को अपने पिता या पति से अलग रहना ही नहीं पड़ेगा. इसके लिए ज़रूरी है कि हम अपनी सोच में बदलाव लाएं. देश में महिलाओं के सम्मान से रहने लाय़क माहौल बनाएं.

Monday, May 8, 2017

ठंडा पानी और बर्फ़...

सब इंसानों की बुनियादी ज़रूरतें एक जैसी ही हैं... लेकिन सबके पास अपनी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने के साधन नहीं हैं... दुनिया में कितने ही लोग ऐसे हैं, जिनके पास ज़रूरत से ज़्यादा, यहां तक कि बेहिसाब चीज़ें हैं... बहुत से लोग ऐसे हैं, जिनके पास अपनी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने लाय़क भी चीज़ें नहीं हैं... वे महरूम रह जाते हैं... अगर हम एक-दूसरे की मदद करें, इंसान के नाते... ये मानकर कि ये हम पर फ़र्ज़ है, और सामने वाले का ये हक़ है... तो इसमें कोई दो राय नहीं कि इससे जहां हमें दिली सुकून मिलेगा, वहीं सामने वाले की ज़रूरत पूरी हो जाएगी... ऐसा करके हम किसी पर कोई अहसान नहीं करेंगे, बल्कि ये सामने वाला का ही अपनापन होगा कि वो हमारी मदद को क़ुबूल करके हमें ख़ुशी देगा...

बात किसी को रुपये-पैसे की मदद या कोई क़ीमती चीज़ देने की नहीं है... हम अपनी हैसियत के हिसाब से जो कर सकते हैं, वो हमें करना ही चाहिए... मिसाल के तौर पर...

हमारे घर के पास एक सरकारी स्कूल है... अकसर उसका नल ख़राब रहता है... स्कूल में पीने साफ़ पानी का भी कोई इंतज़ाम नहीं है... पानी की जो टंकी है, उसकी भी सफ़ाई नहीं होती... तपती गरमी के मौसम में बच्चों को बहुत परेशानी होती है... हमने अपने घर के आगे सड़क पर एक नल लगवाया... पहले घर के अंदर नल लगा था, लेकिन उसमें रेत आने लगा था, कई बार ठीक कराने के बावजूद जब रेत आना बंद नहीं हुआ, तो उसे बंद करवाकर बाहर नल लगवा लिया... आसपास से बहुत लोग पानी भरने आते थे...  स्कूल के बच्चे भी यहां आने लगे... मगर कुछ वक़्त बाद यह नल भी खराब हो गया... एक दिन अम्मी ने बच्चों को मायूस लौटते देख, उनसे रुकने को कहा और फ़्रिज से ठंडा पानी लाकर उन्हें पिला दिया... अब हर रोज़ बच्चे आने लगे... स्कूल के अलावा सड़कों पर काग़ज़ बीनने वाले बच्चे भी दरवाज़ा खटखटाकर पानी और खाना मांग लेते हैं...

हमारी चार साल की भतीजी भी जब बच्चों को देखती है, तो पानी की बोतल लेकर दौड़ती है... कहते हैं कि बच्चे अपने बड़ों से ही सीखते हैं... हमारी भी एक आदत रही है, कहीं से आते हैं, तो आटो या रिक्शेवाले से पानी को ज़रूर पूछते हैं...

इलाक़े के एक-दो घरों के लोग बर्फ़ भी ले जाते हैं... हालांकि अब घर-घर फ़्रिज हैं, लेकिन अब भी सब लोगों के पास फ़्रिज नहीं हैं... पहले तो ऐसा बहुत होता था कि एक के घर फ़्रिज आया, तो आसपास के लोग बर्फ़ ले जाते थे...
अम्मी जान कई बर्तनों में बर्फ़ जमाती हैं, ताकि किसी को को ख़ाली हाथ न लौटना पड़े... एक रोज़ अम्मी से एक पड़ौसन ने कहा कि हमारे बस का नहीं ये सब... कौन रोज़-रोज़ अपने दरवाज़े पर भीड़ लगाए... हम तो साफ़ मना कर देते हैं... ख़ैर, ये उनकी अपनी सोच है... ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है...

ये सब लिखने का हमारा मक़सद ये है कि अगर हमारे आसपास ऐसे लोग हैं, जिनकी हम किसी भी तरह कोई मदद कर सकते हैं, तो हमें उनकी मदद करनी चाहिए...

Friday, May 5, 2017

कांग्रेस की संजीवनी सोनिया ने आस बांधी

फ़िरदौस ख़ान
अवाम के दिलों पर राज करने वाली कांग्रेस को इस वक़्त सोनिया गांधी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.  इतिहास गवाह है कि जब भी कांग्रेस पर कोई मुसीबत आई है, तो सोनिया गांधी ढाल बनकर खड़ी हो गईं. देश के लिए, देश की अवाम के लिए, पार्टी के लिए सदैव उन्होंने क़ुर्बानियां दी हैं. देश की हुकूमत उनके हाथ में थी, प्रधानमंत्री का पद उनके पास था, वे चाहतीं, तो प्रधानमंत्री बन सकती थीं. अपने बेटे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा बिल्कुल नहीं किया. उन्होंने डॊ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया और उनकी अगुवाई में भारत दुनिया में एक बड़ी ताक़त बनकर उभरा.

फिर से कांग्रेस को संकट में देखकर पिछले काफ़ी अरसे से पार्टी से दूर रही पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सियासत में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है. फ़िलहाल वे राष्ट्रपति चुनाव को लेकर विपक्ष को एकजुट करने की क़वायद में जुटी हैं.  दरअसल, वह भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ एक मज़बूत गठजोड़ बनाना चाहती हैं. इसके लिए वे विपक्षी दलों के नेताओं से मुलाक़ात कर रही हैं.  क़ाबिले-ग़ौर है कि जब-जब कांग्रेस पर संकट के बादल मंडराये, तब-तब सोनिया गांधी ने आगे आकर पार्टी को संभाला. उन्होंने कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने के लिए देशभर में रोड शो किए. आख़िरकार उनकी अगुवाई में कांग्रेस ने साल 2004 और 2009  का आम चुनाव जीतकर केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की हुकूमत क़ायम की थी. इस दौरान देश के कई राज्यों में कांग्रेस सत्ता में आई. लेकिन जब से अस्वस्थता की वजह से सोनिया गांधी की सियासत में सक्रियता कम हुई है, तब से पार्टी पर संकट के बादल मंडराने लगे. साल 2014 में केंद की हुकुमत गंवाने के बाद कांग्रेस ने कई राज्यों की सत्ता भी खो दी. सोनिया गांधी की सेहत को देखते हुए उनके बेटे राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया और पार्टी की अहम ज़िम्मेदारी उन्हें सौंपी गई. राहुल गांधी ने ख़ूब मेहनत भी की, लेकिन उन्हें वह कामयाबी नहीं मिल पाई, जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही थी. राहुल गांधी अभी कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं बने हैं, लेकिन उनकी कार्यशैली की तुलना सोनिया गांधी की कार्यशैली से की जाने लगी है. जानकारों का मानना है कि जहां सोनिया गांधी अपनी टीम के सदस्यों को उनकी तरह से काम करने की पूरी छूट देती हैं, वही राहुल गांधी ऐसा नहीं करते. दरअसल, काम करने का सबका अपना एक तरीक़ा होता है. फ़िलहाल राहुल गांधी पार्टी के संगठनात्मक चुनाव के मद्देनज़र नई टीम बनाने के काम में लगे हैं. उन पर दोहरी ज़िम्मेदारी है. एक तरफ़ उन्हें पार्टी को मज़बूत बनाना है और दूसरी तरफ़ खोयी हुई हुकूमत को हासिल करना है. इस साल 31 दिसंबर तक कांग्रेस के आंतरिक चुनाव होने हैं. साल 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं. इससे पहले दस राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे, जिनमें हिमाचल प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मेघालय, मिज़ोरम, त्रिपुरा और नगालैंड शामिल हैं. इस वक़्त हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मेघालय और मिज़ोरम में कांग्रेस सत्ता में है. गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है. कांग्रेस गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लंबे अरसे से सत्ता से बाहर है और इन राज्यों में उसे भारतीय जनता पार्टी से कड़ा मुक़ाबला करना है. बहरहाल, राहुल गांधी संगठन को मज़बूत करने में जुटे हैं, तो सोनिया गांधी राष्ट्रपति चुनाव के बहाने विपक्ष को एक मंच पर लाना चाहती हैं.

ग़ौरतलब है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल आगामी 24 जुलाई को ख़त्म हो रहा है और इससे पहले ही चुनाव कराए जाने हैं. राष्ट्रपति के चुनाव के मामले में सियासी समीकरण भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में हैं. इसलिए यह कहना ग़लत न होगा कि अगला राष्ट्रपति वही होगा, जिसे भारतीय जनता पार्टी पसंद करेगी. एक आकलन के मुताबिक़ 23 सियासी दलों वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पास राष्ट्रपति चुनाव से संबंधित निर्वाचक मंडल में तक़रीबन 48.64 फ़ीसद मत हैं. इसके मुक़ाबले में कांग्रेस की अगुवाई वाले विपक्ष के साथ जाने वाले 23 सियासी दलों के संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के पास महज़ 35.47 फ़ीसद मत हैं. इनके अलावा तमिलनाडु की अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके),  ओडिशा की बीजू जनता दल (बीजेडी),  आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी), दिल्ली की आम आदमी पार्टी और हरियाणा के इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) का निर्वाचक मंडल में तक़रीबन 48.64 फ़ीसद मत हैं. इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी पार्टी शिवसेना भी बहुत अहम मानी जा रही है. यह भारतीय जनता पार्टी के लिए परेशानी का सबब बन सकती है, जो कांग्रेस के लिए फ़ायदेमंद है. सनद रहे, शिवसेना ने कांग्रेस की तरफ़ से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल और प्रणब मुखर्जी को अपना समर्थन दिया था.

इसके विपरीत अगर भाजपा इन पार्टियों में से कुछ को भी अपने साथ शामिल करने में सफल होती है उसकी राह आसान हो जाएगी। एनडीए को सिर्फ एक या दो पार्टियों के समर्थन की जरूरत होगी। भाजपा इस समय सत्ता में है इसलिए उसे चुनावी नतीजे अपने पक्ष में करने के लिए ज्यादा परेशानी नहीं होगी। गौरतलब है कि भाजपा की प्रमुख सहयोगी शिवसेना इससे पहले दो बार भाजपा का खेल बिगाड़ चुकी है पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और प्रणव मुखर्जी को शिवसेना ने अपना समर्थन दिया था। हालांकि इस बार बजट सत्र के दौरान एनडीए ने राष्ट्रपति चुनाव से पहले एकता दिखाई।

दरअसल, राष्ट्रपति चुनाव में लोकसभा, राज्यसभा और विधान सभाओं के सभी सदस्य वोट देते हैं. इन सबको मिलाकर ही राष्ट्रपति पद के चुनाव का निर्वाचक मंडल बनता है. इसमें कुल 784 सांसद और 4114 विधायक हैं. इस कॉलेज में मतदाताओं के वोट की वैल्यू अलग-अलग होती है. सांसद के मत की वैल्यू निकालने के लिए सबसे पहले सभी राज्यों की विधानसभा के चुने गए सदस्यों के मतों की वैल्यू जोड़ी जाती है. इसके बाद राज्यसभा और लोकसभा के चुने गए सदस्यों की कुल संख्या से भाग दिया जाता है. इसके बाद जो अंक मिलते हैं, वे एक सांसद के वोट की वैल्यू होते हैं. हर सांसद के मत की वैल्यू 708 है, जबकि विधायक के वोट की वैल्यू संबंधित राज्य की विधानसभा की सदस्य संख्या और उस राज्य की आबादी पर आधारित होती है, यानी जिस प्रदेश का विधायक है, उसकी आबादी देखी जाती है. इसके साथ उस प्रदेश के विधानसभा सदस्यों की संख्या को भी मद्देनज़र रखा जाता है. प्रदेश की आबादी को चुने गए विधायकों की संख्या से बांटा जाता है. इस तरह जो भी अंक मिलते हैं, उसे फिर एक हज़ार से भाग दिया जाता है. फिर जो अंक सामने आता है, वह उस प्रदेश के विधायक के वोट की वैल्यू होता है. एक हज़ार से भाग देने पर अगर बाक़ी पांच सौ से ज़्यादा हों, तो वैल्यू में एक जोड़ दिया जाता है. इस हिसाब से उत्तर प्रदेश के हर विधायक के वोट की वैल्यू सबसे ज़्यादा 208 है, जबकि सिक्किम के हर विधायक के वोट की वैल्यू सबसे कम सात है.

देश में राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल के ज़रिये होता है. इसमें जनता अपना राष्ट्रपति नहीं चुनती, लेकिन जनता के चुने प्रतिनिधि मतदान करते हैं. ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रपति द्वारा संसद में नामित सदस्य वोट तथा राज्यों की विधान परिषदों के सदस्य मतदान नहीं कर सकते, क्योंकि इन्हें जनता ने चुना है. निर्वाचक मंडल के सदस्यों का प्रतिनिधित्व अनुपातिक भी होता है. मतदाता वोट तो एक ही देता है, लेकिन वह राष्ट्रपति चुनाव में हिस्सा ले रहे सभी उम्मीदवारों में से अपनी पसंद तय कर देता है यानी उसकी पहली, दूसरी और तीसरी पसंद कौन है. अगर पहली पसंद वाले उम्मीदवार के मतों से कोई उम्मीदवार नहीं जीतता, तो उम्मीदवार के खाते में मतदाता की दूसरी पसंद को नये सिंगल वोट की तरह ट्रांसफ़र किया जाता है.

अगर सोनिया गांधी इन दलों को कांग्रेस के साथ लाने में कामयाब हो जाती हैं, तो कांग्रेस का मत फ़ीसद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के मुक़ाबले का हो जाएगा. ऐसे में मुक़ाबला रोचक और कांटे का होगा. इसके साथ-साथ पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भी भर जाएगा. साल 2014 के आम चुनाव के बाद से कांग्रेस को कोई ख़ास कामयाबी नहीं मिली. लगातार सत्ता से दूर रहने, विभिन्न चुनावों में हार और पार्टी की आंतरिक कलह की वजह से पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटने लगा था. लेकिन अब सोनिया गांधी के सक्रिय होने से कार्यकर्ताओं में नये जोश का संचार होगा.

Friday, April 21, 2017

ईवीएम : और शक बढ़ता गया

फ़िरदौस ख़ान
लोकतंत्र यानी जनतंत्र. जनतंत्र इसलिए क्योंकि इसे जनता चुनती है. लोकतंत्र में चुनाव का बहुत महत्व है. निष्पक्ष मतदान लोकतंत्र की बुनियाद है. यह बुनियाद जितनी मज़बूत होगी, लोकतंत्र भी उतना ही सशक्त और शक्तिशाली होगा. अगर यह बुनियाद हिल जाए, तो लोकतंत्र की दीवारों को दरकने में देर नहीं लगेगी. फिर लोकतंत्र, राजतंत्र में तब्दील होने लगेगा. नतीजतन, मुट्ठी भर लोग येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतकर लोकतंत्र पर हावी हो जाएंगे.

देश की आज़ादी के बाद निरंतर चुनाव सुधार किए गए. मसलन मतदाता की उम्र घटाकर कम की गई, जन मानस ख़ासकर युवाओं और महिलाओं को मतदान के लिए प्रोत्साहित किया गया. इन सबसे बढ़कर मत-पत्र के इस्तेमाल की बजाय इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) द्वारा मतदान कराया जाने लगा. इससे जहां वक़्त की बचत हुई, श्रम की बचत हुई, वहीं धन की भी बचत हुई. इतना ही नहीं, मत पेटियां लूटे जाने की घटनाओं से भी राहत मिली. सियासी दलों को मलाल है कि ईवीएम की वजह से चुनाव में धांधली कम होने की बजाय और बढ़ गई. चुनाव में ईवीएम से छेड़छाड़ के मामले लगातार सामने आ रहे हैं. इस तरह की ख़बरें देखने-सुनने को मिल रही हैं कि बटन किसी एक पार्टी के पक्ष में दबाया जाता है और वोट किसी दूसरी पार्टी के खाते में चला जाता है. इसके अलावा जितने लोगों ने मतदान किया है, मशीन उससे कई गुना ज़्यादा वोट दिखा रही है.

कांग्रेस की अगुवाई में देश के सियासी दल ईवीएम के ख़िलाफ़ एकजुट हो रहे हैं. तक़रीबन 16 बड़े सियासी दलों ने हाल के चुनावों में मतदान के लिए इस्तेमाल हुईं ईवीएम के साथ छेड़छाड़ होने की बढ़ती शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए इनके प्रति अपना अविश्वास ज़ाहिर किया है. उन्होंने चुनाव आयोग से मांग की है कि आगामी चुनावों में मतदान के लिए ईवीएम की बजाय काग़ज़ के मतपत्रों का इस्तेमाल किया जाए. उनका आरोप है कि केंद्र सरकार ईवीएम को फुलप्रूफ़ बनाने के लिए वोटर वेरीफ़ाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) सुनिश्चित कराने के लिए चुनाव आयोग को ज़रूरी रक़म मुहैया कराने में कोताही बरत रही है.
विपक्षी दलों की तरफ़ से चुनाव आयोग को दिए गए ज्ञापन में कहा गया है कि चुनाव कराने के तौर तरीक़ों को लेकर राजनीतिक दलों के बीच एक राय है, लेकिन वे फ़िलहाल चुनाव के लिए ईवीएम का इस्तेमाल करने के ख़िलाफ़ हैं. वे चाहते हैं कि मतदान के लिए काग़ज़ के मतपत्रों का इस्तेमाल किया जाए. इसलिए जब तक ईवीएम के साथ छेड़छाड़ होने और उसमें गड़बड़ी की समस्या का समाधान नहीं हो जाता और जब तक राजनीतिक दलों की संतुष्टि के लिहाज़ से यह तकनीकी तौर पक्का नहीं हो जाता कि ईवीएम बिना किसी दिक़्क़त के काम करेंगे और इसकी पुष्टि वैश्विक स्तर पर नहीं हो जाती, तब तक मतदान पुराने मतपत्र वाली व्यवस्था के हिसाब से ही हो. मतपत्रों के ज़रिये मतदान की व्यवस्था को दुनियाभर में मान्यता मिली हुई है. सेक्शन 61ए के तहत चुनाव आयोग के विवेक का इस्तेमाल तभी किया जाए, जब सभी राजनीतिक दलों की संतुष्टि के साथ उन दिक़्क़तों का दूर कर लिया जाए.

कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह का कहना है कि अगले चुनाव, भले ही गुजरात में हों या कहीं और, मतपत्र के साथ होने चाहिए और ईवीएम का इस्तेमाल बंद होना चाहिए. उनकी दलील है कि अगर बैंक ऒफ़ बांग्लादेश के खातों को हैक किया जा सकता है और आठ करोड़ डालर चुराए जा सकते हैं, रूसी बैंक से तीन करोड़ डॊलर निकाले जा सकते हैं, तो ईवीएम के साथ छेड़छाड़ क्यों नहीं हो सकती. उन्होंने कहा कि ईवीएम के मामले में वह आडवाणी से लेकर मायावती तथा केजरीवाल तक के साथ हैं. ग़ौरतलब है कि लालकृष्ण आडवाणी ने साल 2009 के आम चुनाव में ईवीएम को लेकर सवाल उठाए थे.

दिल्ली के मुख्यमंत्री व आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल ने चुनाव आयोग को चुनौती दी है कि अगर ईवीएम मशीन उन्‍हें दे दी जाए, तो 72 घंटों के अंदर वह साबित कर देंगे कि इन मशीनों के साथ छेड़छाड़ मुमकिन है. चुनाव आयोग की मंशा पर सवाल खड़े करते हुए उन्होंने चुनाव आयोग की इस दलील को नकार दिया कि ईवीएम में एक बार सॊफ़्टवेयर लगाने के बाद ना तो इसे पढ़ा जा सकता है और ना ही इस पर कुछ लिखा जा सकता है. उन्होंने मध्य प्रदेश के भिंड में गड़बड़ी वाले ईवीएम के सॊफ़्टवेयर से जुड़ा डाटा सार्वजनिक करने की मांग करते हुए कहा है कि अगर चुनाव आयोग के पास डाटा डीकोड करने का तंत्र उपलब्ध नहीं है, तो वह अपने विशेषज्ञों की टीम से गड़बड़ पाई गई मशीनों का सॊफ़्टवेयर 72 घंटे में डीकोड करके आयोग को इसकी रिपोर्ट दे सकते हैं.

बहुजन समाज पार्टी ईवीएम के ख़िलाफ़ सड़क पर उतर आई है. पार्टी के कार्यकर्ताओं ने बीते 11 अप्रैल को ईवीएम के ख़िलाफ़ काला दिवस मनाया और जगह-जगह धरने प्रदर्शन किए. उनका कहना है कि जब तक चुनाव मतपत्र से कराने की उनकी मांग नहीं मानी जाती, उनका आंदोलन जारी रहेगा. पार्टी अध्यक्ष मायावती ने भी राज्यसभा में ईवीएम से मतदान को बंद करने और इसके लिए जारी बजट सत्र में ही विधेयक लाने की मांग की है. उनका कहना है कि इसके लिए क़ानून बनना चाहिए और जारी सत्र में ही इससे संबंधित विधेयक आना चाहिए. पार्टी के महासचिव महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी का आरोप है कि 2017 की जीत बीजेपी की ईमानदारी की जीत नहीं है, ये 2019 को भी ऐसी ही मशीनों का इस्तेमाल कर जीतना चाहते हैं. इन्होंने 2014 के चुनावों में भी धोखा किया था, तब सत्ता में आए थे.
ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों बहुजन समाज पार्टी ने विधानसभा चुनावों में ईवीएम से छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अर्ज़ी दाख़िल की है. पार्टी ने अदालत से उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में हुए विधानसभा चुनावों को रद्द करने की मांग की है.समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक अताउर्रहमान ने भी ईवीएम से छेड़छाड़ की अर्ज़ी सर्वोच्च न्यायालय में दाख़िल की है. इसमें भारतीय जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी की ईवीएम को लेकर दायर याचिका पर फ़ैसले के बाद भी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ईवीएम के साथ वोटर वेरीफ़ाइड पेपर ऑडिट ट्रेल नहीं लगाने की बात कही गई है. उन्होंने ईवीएम में हर पांचवां वोट भारतीय जनता पार्टी को पड़ने और ईवीएम से छेड़छाड़ के सुबूत होने की बात कही है.

हालांकि चुनाव आयोग ईवीएम को सुरक्षित बता रहा है. इतना ही नहीं, विपक्ष में रहते ईवीएम मशीन की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को भी अब ईवीएम पाक-साफ़ नज़र आ रही है.
बहरहाल, ईवीएम से छेड़छाड़ के मामले सामने आने के बाद सियासी दलों में इनके प्रति अविश्वास पैदा हो गया है. इसके साथ-साथ जन मानस में भी चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर भरोसा ख़त्म हुआ है. इतना ही नहीं, इस मामले में चुनाव आयोग जिस तरह का रवैया अख़्तियार किए हुए है, वह भी संतोषजनक नहीं है.

बहरहाल, ईवीएम के साथ छेड़छाड़ लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है. चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि चुनाव निष्पक्ष हों. अगर सियासी दल मतपत्र से चुनाव की मांग कर रहे हैं, तो इसे मंज़ूर किया जाना चाहिए. अगर सरकार और चुनाव आयोग ऐसा नहीं करते हैं, तो फिर लोकतांत्रिक प्रणाली का क्या महत्व रह जाता है.

Saturday, April 15, 2017

कांग्रेस क्षेत्रीय नेताओं को आगे लाए

फ़िरदौस ख़ान
आज़ादी के बाद देश पर सबसे लम्बे अरसे तक एक छत्र शासन करने वाली कांग्रेस प्रदेशों में क्षेत्रीय नेताओं को आगे करके ख़ुद को मज़बूत बना सकती है. सियासत में राष्ट्रीय नेताओं के साथ-साथ क्षेत्रीय नेताओं का भी अपना वजूद हुआ करता है. क्षेत्रीय नेता अपने इलाक़े से जुड़े होते हैं. उन्हें मालूम होता है कि ज़मीनी हक़ीक़त क्या है, जनता की बुनियादी ज़रूरतें क्या हैं, जनता क्या चाहती है, उनकी पार्टी से जनता को क्या उम्मीदें हैं.

दरअसल, क्षेत्रीय नेताओं को नज़रअंदाज़ करना कांग्रेस के लिए काफ़ी नुक़सानदेह साबित हुआ है. हाल-फ़िलहाल की बात करें, तो कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में क्षेत्रीय नेताओं को नज़र अंदाज़ करके राज बब्बर को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया. इसी तरह उत्तर प्रदेश की ज़िम्मेदारी भी दिल्ली की मुख्यमंत्री रही शीली दीक्षित को सौंप दी. बेशक शीला दीक्षित प्रभावशाली नेत्री हैं. वे लगातार तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं. उन्होंने दिल्ली के विकास के लिए बहुत काम किए. उन्हें सियासत में प्रशासन और संसदीय कामों का ख़ासा अनुभव है. वे केंद्र में मंत्री भी रही हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश के लिए वे बाहरी थीं.

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस ने पहली बार क्षेत्रीय नेताओं को नज़र अंदाज़ किया है. इससे पहले भी ऐसा हो चुका है. कांग्रेस से गए कई नेताओं ने बाद में अपने सियासी दल बनाए और कांग्रेस को खुली चुनौती दी. कई नेता दूसरे सियासी दलों में शामिल होकर कांग्रेस के लिए मुसीबत का सबब बने. साल 1982 में तत्कालीन कांग्रेस के महासचिव राजीव गांधी ने आंध्र प्रदेश के क़द्दावर नेता टी अंजैय्याह पर टिप्पणी की थी और बाद में उन्हें पार्टी से निकाल दिया था. उनके बाहर होने से कांग्रेस की हालत लगातार कमज़ोर होती गई. उसी साल वजूद में आई तेलगु देसम पार्टी ने आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के प्रभाव को तक़रीबन ख़त्म कर दिया.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी मतभेद की वजह से कांग्रेस छोड़कर ऒल इंडिया तृणमूल कांग्रेस नाम से अपना नया सियासी दल बना लिया था. कांग्रेस से अपने सियासी सफ़र की शुरुआत करने वाली साल 1984 में कोलकाता के जादवपुर लोकसभा क्षेत्र से साम्यवादी नेता सोमनाथ चटर्जी को हराने वाली ममता बनर्जी अखिल भारतीय युवा कांग्रेस की महासचिव भी रहीं. वे साल 1991 में नरसिम्हाराव की सरकार में वे मानव संसाधन, युवा कल्याण–खेलकूद और महिला-बाल विकास विभाग की राज्यमंत्री भी रहीं. उन्होंने प्रस्तावित खेल–कूद विकास योजना को सरकार से बहाली न मिलने पर इस्तीफ़ा दे दिया. फिर साल 1996 में केन्द्रीय मंत्री रहते हुए उन्होंने अपनी ही सरकार द्वारा पेट्रोल की क़ीमत बढ़ाए जाने का विरोध किया था. इसी तरह महाराष्ट्र के क़द्दावर नेता शरद पवार ने भी अपनी सियासी ज़िन्दगी कांग्रेस से शुरू की थी. साल 1967 में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर बारामती विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतने वाले शरद पवार, तारिक अनवर और पीए संगमा ने सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हुए कहा था कि कांग्रेस पार्टी का प्रधानमंत्री उम्मीदवार भारत में जन्म लिया हुआ चाहिए न कि विदेशी. फिर जून 1999 में ये तीनों कांग्रेस से अलग हो गए और उन्होंने नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी की स्थापना की. मगर जब 1999 के विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, तो उनकी पार्टी ने कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई. इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी के विश्वासपात्र माने जाने वाले हरियाणा के क़द्दावर नेता चौधरी बंसीलाल ने साल भी 1996 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग होकर हरियाणा विकास पार्टी की स्थापना की थी. बंसीलाल सात बार राज्य विधानसभा चुनाव जीते थे. केंद्र में महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियां निभाने वाले बंसीलाल चार बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बने. बाद में उनके बेटे सुरेंद्र सिंह ने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर लिया था.  

क़ाबिले-ग़ौर है कि सियासत में विश्वास पात्रों को साथ रखने का चलन है. इंदिरा गांधी ने हमेशा अपने पास उन लोगों को रखा, जिन्हें वे अपना विश्वासपात्र मानती थीं. इसी तरह राजीव गांधी ने भी अपने विश्वासपात्र अरुण नेहरू, अरुण सिंह, ऑस्कर फर्नांडिस और मणिशंकर अय्यर को अहमियत दी. पार्टी अधय्क्ष बनने के बाद सोनिया गांधी ने भी ऐसा ही किया. उन्होंने अहमद पटेल, जनार्दन द्विवेदी और अंबिका सोनी अपने क़रीब रखा. इस दौरान पार्टी के कई वरिष्ठ नेता हाशिये पर चले गए, जिनमें अर्जुन सिंह, सीताराम केसरी, माखनलाल फोतेदार और नारायण दत्त तिवारी के नाम लिए जा सकते हैं. अब राहुल गांधी भी इसी परंपरा को निभा रहे हैं, लेकिन उनके साथ परेशानी यह है कि उनके चहेते नेता लोकप्रिय नहीं हैं. वे न तो भीड़ जुटा पाते हैं और न ही इस भीड़ को वोटों में तब्दील कर पाते हैं. राहुल गांधी के क़रीबी माने जाने वाले संजय निरुपम, सीपी जोशी, मधुसूदन मिस्त्री, अशोक चव्हाण, पृथ्वीराज चव्हाण और मोहन प्रकाश जैसे नेता जनमानस में कोई असर नहीं छोड़ पाते.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि कांग्रेस दो गुटों में बंटी नज़र आ रही है. एक तबक़ा सोनिया गांधी के साथ और दूसरा राहुल गांधी के साथ खड़ा दिखाई देता है. कांग्रेस के साथ के नेता प्रभावशाली हैं, लेकिन राहुल गांधी के साथ के नेता बिना जनाधार वाले हैं. प्रदेशों में भी कांग्रेस नेताओं के अपने-अपने गुट हैं. ऐसे में ज़रूरत है कि वरिष्ठ नेताओं के सलाह-मशविरे के मार्गदर्शन में क्षेत्रीय नेताओं के हाथों में प्रदेशों की कमान सौंपी जाए. कांग्रेस के पास ऐसे बहुत से युवा चेहरे हैं, जिन्हें आगे करके पार्टी अपनी खोई ज़मीन हासिल कर सकती है. पूर्व केंद्रीय मंत्री व मध्य प्रदेश के गुना से कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया भी प्रदेश में कांग्रेस को मज़बूत करने में अहम किरदार अदा कर सकते हैं. राज घराने से ताल्लुक़ रखने वाले सिंधिया आम लोगों मिलते-जुलते हैं. उन्होंने मंत्री रहते हुए कभी अपनी गाड़ी में लालबत्ती नहीं लगाई. उनमें नेतृत्व क्षमता है. वे जन मुद्दे उठाने में आगे रहते हैं. इतना ही नहीं वे भाजपा नेताओं के हर हमले का उन्हीं के अंदाज़ में जवाब देना भी जानते हैं. मगर मध्य प्रदेश में कांग्रेस दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और सुरेश पचौरी आदि गुटों में बंटी नज़र आती है. केंद्र में मंत्री रहे जितिन प्रसाद को उत्तर प्रदेश में  शांतिप्रिय और विकासवादी राजनीति के लिए जाना जाता है. उनके पिता जितेन्द्र प्रसाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और पीवी नरसिम्हा राव के सियासी सलाहकार रहे हैं. आरपीएन सिंह भी केंद्र में मंत्री रहे हैं.

पिछले दिनों पांच राज्यों में हुए चुनाव इस बात का सबूत हैं कि जहां-जहां क्षेत्रीय नेताओं के हाथ में पार्टी की कमान थी, वहां कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया. कांग्रेस को अपने संगठन को मज़बूत करने और जनाधार बढ़ाने के लिए राज्यों में क्षेत्रीय नेताओं को आगे लाना ही होगा.

भाषाई मर्यादा की दरकार

फ़िरदौस ख़ान
भाषा का दरख़्त दिल में उगता है और ज़ुबान से फल देता है. यानी जिसके दिल में जो होगा, वह शब्दों के ज़रिये बाहर आ जाएगा. किसी व्यक्ति की भाषा से उसके संस्कारों का, उसके विचारों का, उसके आचरण का पता चलता है. माना लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी है, सबको अपनी बात कहने का पूरा हक़ है. लेकिन कहीं अभिव्यक्ति की इस आज़ादी का, इस हक़ का ग़लत इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा है? यह समझना भी ज़रूरी है. भाषा शैली व्यक्ति के व्यक्तित्व का आईना है, समाज की सभ्यता का पैमाना है. आए दिन जिस तरह के बयान सुनने को मिल रहे हैं, क्या वे एक सभ्य समाज की निशानी कहे जा सकते हैं ? ताज़ा मामला पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सिर काटकर लाने वाले को इनाम देने के ऐलान का है.  

ग़ौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में बीरभूम ज़िले के सिवड़ी में हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ता हनुमान जयंती के मौक़े पर जय श्रीराम के नारे लगाते हुए सड़कों पर उतर आए. चूंकि पुलिस ने उन्हें जुलूस निकालने की इजाज़त नहीं दी थी, इसलिए जुलूस को रोकने की कोशिश की गई. इस बार विवाद इतना बढ़ गया कि हाथापाई होने लगी. पुलिस ने ग़ुस्साये कार्यकर्ताओं को क़ाबू करने के लिए लाठीचार्ज कर दिया. इस घटना के बाद इलाक़े में तनाव का माहौल पैदा हो गया. इसके बाद भारतीय जनता युवा मोर्चा के नेता योगेश वार्ष्णेय ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सिर काटकर लाने वाले को इनाम देने का ऐलान कर दिया. उन्होंने कहा कि वह ख़ुद उसे 11 लाख का इनाम देंगे, जो ममता बनर्जी का स‍िर काटकर लाएगा. उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि ऐसा घिनौना कृत्य किसी इंसान द्वारा किया जा सकता है. यह काम किसी हैवान द्वारा ही किया जा सकता है और हैवान को सज़ा मिलना अति आवश्यक है.
मीडिया में इस बयान के आते ही तृणमूल कांग्रेस के ज़िलाध्यक्ष रामफूल उपाध्याय की शिकायत पर योगेश वार्ष्णेय के ख़िलाफ़ सिविल लाइंस थाने में मुक़दमा दर्ज किया गया. ख़ैर, बात यहीं ख़त्म नहीं हुई. कोलकाता की टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम सैयद मोहम्मद नुरूर रहमान बरकती ने एक क़दम आगे बढ़ते हुए योगेश वार्ष्णेय के सिर की क़ीमत दोगुनी कर दी. उन्होंने ऐलान किया कि योगेश वार्ष्णेय का सिर क़लम करने वाले को 22 लाख रुपये दिए जाएंगे. समाजवादी पार्टी के नेता भी कहां पीछे रहने वाले थे. पार्टी के पूर्व विधायक ज़मीरउल्लाह ने कहा कि ऐसा बयान देने वाले की जीभ काट लेनी चाहिए.
किसी का सिर काटकर लाने पर इनाम देने के ऐलान का यह पहला मामला नहीं है. इससे पहले तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के भारतीय जनता पार्टी के विधायक राजा सिंह ने अपने विवादित बयान में कहा था कि जो लोग राम मंदिर बनाए जाने का विरोध करते हैं, हम उनका सिर काट देंगे. उन्होंने आगे कहा कि उनका यह बयान उन लोगों के लिए है, जो यह कहते हैं कि राम मंदिर का निर्माण हुआ, तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. हम उनके इस बात के कहने का इंतज़ार कर रहे हैं, ताकि हम उनका सिर काट सकें. इसी तरह पिछले माह मध्य प्रदेश के उज्जैन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ महानगर प्रचार प्रमुख डॉ. कुंदन चंद्रावत ने एक विवादित बयान देते हुए कहा था कि कोई हत्यारे केरल के सीएम का सिर काटकर ला दे, वह अपनी एक करोड़ स्र्पये की संपत्ति उसके नाम कर देंगे.

दरअसल, आज सहनशीलता कम हो रही है. लोग अपनी आलोचना ज़रा सी भी बर्दाश्त नहीं कर पाते. जहां कोई ऐसी बात हुई, जो उनके मन मुताबिक़ न हुई, या जो उन्हें पसंद नहीं आई, तो वे आग बबूला हो उठते हैं. सारी मान-मर्यादाएं ताख़ पर रख देते हैं और ऐसे बयान दे डालते हैं. सियासत में चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेता इस मामले में सबसे आगे रहते हैं. ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने ही विवादित बयान दिए हैं. इस मामले में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी आदि के नेता भी पीछे नहीं हैं.

भारतीय संस्कृति में महिलाओं का महत्वपूर्ण स्थान है. नारी को नारायणी कहा गया है, देवी कहा गया है. लेकिन हक़ीक़त में देश और समाज के कर्ताधर्ता महिलाओं के ख़िलाफ़ अपशब्द बोलने से बाज़ नहीं आ रहे हैं. हाल के कुछ सालों में सियासत में भाषाई मर्यादा ख़त्म होने लगी है. देश के प्रधानमंत्री से लेकर कार्यकर्ता तक एक ही तरह की भाषा इस्तेमाल करते मिल जाएंगे. केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार में ऐसे बयानवीरों की लंबी फ़ेहरिस्त है, जिनके बयानों ने देश में हंगामा बरपा किया है. यह बेहद अफ़सोस की बात है कि सत्ता के उच्च पदों पर बैठे लोग भाषाई मर्यादा के मामले में बेहद बौने साबित हो रहे हैं. कहते हैं, पहले तोलो, फिर बोलो, यानी बोलने से पहले सौ बार सोच लेना चाहिए कि क्या बोलना है, किस तरह बोलना है. कहा गया है कि तलवार का ज़ख़्म भर जाता है, लेकिन बात का ज़ख़्म कभी नहीं भरता.

बहरहाल, उच्च पदों पर बैठे वाले लोगों ख़ास कर सामाजिक क्षेत्र में काम करने वालों को इस तरह के बयानों से बचना चाहिए. ऐसे बयानों से समाज में कटुता बढ़ती है. ऐसे बयान देश की एकता और अखंडता के साथ-साथ समाज के चैन-अमन के लिए भी ख़तरनाक हैं. देश और समाज में वैमन्य फैलाने वाले इन बयानों में तेज़ी आई है, तो इसके लिए वरिष्ठ नेता भी ज़िम्मेदार कहे जा सकते हैं, जिन पर अपने कार्यकर्ताओं को भाषा की मर्यादा व देश की संस्कृति सिखाने की ज़िम्मेदारी है. किसी भी पार्टी का कोई नेता अगर भड़काऊ बयानबाज़ी करता है, तो उस पर कार्रवाई तक नहीं की जाती. यही दूसरे नेताओं में भी उत्साह का संचार करती है. देश में भाषाई मर्यादा जिस तरह की जिस तरह से धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, उसे देखते हुए सरकार को ही आगे आना पड़ेगा और ऐसी व्यवस्था बनानी पड़ेगी, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी कहने की आज़ादी किसी को न दे. न तो सार्वजनिक मंचों से और न ही चुनावी रैलियों में. लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए यही बेहतर मार्ग है.

Friday, April 14, 2017

बग़ावत से जूझती कांग्रेस

फ़िरदौस ख़ान
पिछले काफ़ी अरसे से कांग्रेस अंदरूनी कलह और बग़ावत से जूझ रही है. इसी अंदरूनी कलह की वजह से कांग्रेस केंद्र और कई राज्यों से सत्ता गंवा चुकी है. उत्तराखंड में भी कांग्रेस अपने ही विधायकों की वजह से सत्ता से बाहर हो गई थी. हालांकि काफ़ी जद्दोजहद के बाद उसे खोयी हुई सत्ता वापस मिल गई. अब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भी पार्टी को छोड़कर जा रहे हैं. अब कांग्रेस को तीन और राज्यों से झटका लगा है. मुंबई में निकाय चुनाव से पहले महाराष्ट्र के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री गुरुदास कामत ने पार्टी से इस्तीफ़ा देते हुए राजनीति से संन्यास का ऐलान कर दिया है. गुरुदास कामत को गांधी परिवार का भरोसेमंद माना जाता है. पार्टी कार्यकर्ताओं को भेजे संदेश में उन्होंने लिखा है, "कई महीनों से मैंने महसूस किया कि मुझे नये लोगों को आगे आने के लिए पीछे हट जाना चाहिए. दस दिन पहले मैं कांग्रेस अध्यक्ष से मिला और इस्तीफ़ा देने की मंशा ज़ाहिर की. इसके बाद मैंने उन्हें और राहुल जी को पत्र लिखकर बता दिया कि मैं पार्टी छोड़ना चाहता हूं. इसके बाद से कोई जवाब नहीं आया. मैंने राजनीति से संन्यास लेने के बारे में बता दिया है." सियासी गलियारे में चर्चा है कि गुरुदास कामत मुंबई इकाई में अपनी उपेक्षा से नाराज़ थे. वह पार्टी में सुधार चाहते थे. इसके लिए उन्होंने पार्टी हाईकमान को कुछ सुझाव भी दिए, जिस पर कोई तवज्जो नहीं दी गई. कहा यह भी जा रहा है राहुल गांधी की मुंबई कांग्रेस प्रमुख संजय निरुपम से नज़दीकी और अपनी अनदेखी ने उन्हें चोट पहुंचाई.

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के क़द्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने पार्टी का साथ छोड़ कर अपनी अलग सियासी पार्टी बना ली है. राज्यसभा का टिकट नहीं मिलने से अजीत जोगी कांग्रेस आलाकमान से नाराज़ थे. बेटे अमित को पार्टी से निकाले जाने पर भी उनमें कांग्रेस के लिए आक्रोश था. ग़ौरतलब है कि अमित जोगी अंतागढ़ टेप कांड में कांग्रेस से निकाले गए थे. उन्होंने अपने पैतृक गांव मरवाही में कांग्रेस पर कांग्रेस छोड़ने का ऐलान करते हुए कहा, "मैं अब कांग्रेस से आज़ाद हूं." इस मौक़े पर कांग्रेस के तीन विधायक और कई पूर्व विधायक भी मौजूद थे. अजीत जोगी का कहना है कि अब राज्य के फ़ैसले दिल्ली से नहीं होंगे. उनका कहना है कि कांग्रेस अब नेहरू, इंदिरा और राजीव-सोनिया गांधी वाली कांग्रेस नहीं रह गई है. इसमें जनाधार वाले नेताओं के लिए कोई जगह नहीं है.

पूर्वोत्तर में भी कांग्रेस एक बार फिर संकट में घिर गई है. अरुणाचल प्रदेश, असम और मेघालय के बाद त्रिपुरा पूर्वोत्तर का चौथा राज्य है, जहां कांग्रेस को बग़ावत का सामना करना पड़ा है.यहां पार्टी के छह बाग़ी विधायक कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. इनमें त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री समीर रंजन बर्मन के पुत्र सुदीप राय बर्मन, बिस्वबंधु सेन, दिबा चंद्र हृंखाव्ल, आशीष साहा, दिलीप सरकार और प्राणजीत सिन्हा रॉय शामिल हैं. समीर रंजन बर्मन पहले ही पार्टी छोड़ चुके हैं.  इससे राज्य की 60 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस की विधायकों की संख्या दस से घटकर तीन रह जाएगी. त्रिपुरा में वाम की सरकार है. विधानसभा की 50 सीटों पर वाम का क़ब्ज़ा है. यहां अब तृणमूल मुख्य विपक्षी पार्टी बन जाएगी. कांग्रेस के बाग़ी नेताओं का कहना है कि पश्चिम बंगाल चुनाव में वाम के साथ भागीदारी करने के पार्टी के फ़ैसले के ख़िलाफ़ उन्होंने इस्तीफ़ा दिया है. पिछले चुनावों में कांग्रेस की तरफ़ से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार समीर रंजन बर्मन ने कहा है, " तृणमूल में शामिल होने का हमारा मक़सद वाम की इस भ्रष्ट, जन विरोधी सरकार को हराना है." उन्होंने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस-वाम गठबंधन के विरोध में नेता विपक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. अब त्रिपुरा कांग्रेस में अध्यक्ष बिरजीत सिन्हा और दो अन्य विधायक हैं. ग़ौरतलब है कि त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव 2018 में होगा. माकपा के प्रदेश सचिव बिजन धर ने दावा किया है कि विधानसभा से इस्तीफ़ा देने वाले कांग्रेस के एक अन्य असंतुष्ट विधायक जितेन सरकार ने सत्तारूढ़ माकपा में शामिल होने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की है. उनका यह भी कहना है कि दिलीप सरकार माकपा के पूर्व सदस्य हैं, जो माकपा के टिकट पर पांच बार विधानसभा पहुंचे और वह नौ साल तक विधानसभा के अध्यक्ष रहे हैं. उन्हें माकपा में वापस लाया जाएगा.

ग़ौरतलब है कि कांग्रेस के लिए चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में नतीजे मायूस करने वाले रहे. सिर्फ़ पुड्डुचेरी में ही कांग्रेस सरकार बना पाने में कामयाब रही है. असम, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा. कांग्रेस में बग़ावत के लिए कौन ज़िम्मेदार है. क्या कांग्रेस नेताओं का पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से विश्वास कम हो रहा है या फिर राज्यों के पार्टी नेताओं का असंतोष बग़ावत के तौर पर सामने आ रहा है.

क़ाबिले-ग़ौर है कि कांग्रेस में बग़ावत के सुर उस वक़्त मुखर हो रहे हैं, जब राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने की बात चल रही है. पार्टी के दिग्गज नेता पार्टी की कमान राहुल गांधी को सौंप देना चाहते हैं. राहुल की टीम में युवा चेहरों को तरजीह दिए जाने की भी पूरी उम्मीद है.

हालांकि कांग्रेस की अंदरूनी दिक़्क़तों को दूर करने के लिए पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने एक 'एडवाइज़र्स ब्लॉक' का गठन करने की सलाह दी है. इसमें दस नेता और उद्योगपतियों को शामिल किया जाएगा, जो पार्टी के अहम मुद्दों पर फ़ैसले लेंगे. बताया जा रहा है कि यह भारतीय जनता पार्टी के पार्लियामेंट्री बोर्ड जैसा होगा. राहुल गांधी इसमें पी. चिदंबरम और ग़ुलाम नबी आज़ाद जैसे वरिष्ठ नेताओं को शामिल करना चाहते हैं.  कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को मलाल है कि पार्टी नेतृत्व उनकी बात नहीं सुनता. राहुल गांधी को चाहिए कि वे अपनी पहुंच पार्टी के आख़िरी कार्यकर्ता तक बनाएं. अगर वे ऐसा पर पाए, तो कांग्रेस को उसका खोया रुतबा वापस दिला पाएंगे.

बहरहाल, कांग्रेस चाहती, तो गुरुदास कामत को उसी वक़्त मना लेती, जब उन्होंने इस्तीफ़ा देने की पेशकश की थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. कांग्रेस को चाहिए कि वह भले ही पार्टी की बागडोर युवा टीम के हवाले कर दे, लेकिन पार्टी के विश्वसनीय और पुराने उन नेताओं की अनदेखी न करे, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी कांग्रेस को समर्पित कर दी. वही दरख़्त फलता-फूलता है, जिसकी जड़ें मज़बूत हों, कांग्रेस को भी अपनी जड़ों की मज़बूती को बरक़रार रखना होगा, वरना पार्टी को बिखरने में देर नहीं लगेगी.



Tuesday, April 4, 2017

लोकतंत्र में बढ़ती हिन्दुत्व विचारधारा

फ़िरदौस ख़ान
उत्तर प्रदेश ने देश की सियासत में एक ऐसी इबारत लिखी है, जिसका आने वाले वक़्त में गहरा असर पड़ेगा. नरेंद्र मोदी ने गुजरात से हिन्दुत्व की जो राजनीति शुरू की थी, वह अब उत्तर प्रदेश से परवान चढ़ेगी. भारतीय जनता पार्टी पहले से ही कहती रही है कि पूर्ण बहुमत मिलने के बाद देश में हिन्दुत्ववादी एजेंडे को लागू किया जाएगा. केंद्र में भी बहुमत की सरकार है और अब उत्तर प्रदेश में भी भाजपा ने बहुमत की सरकार बनाई है. ऐसे में देश-प्रदेश में हिन्दुत्ववादी विचारधारा को ध्यान में रखकर फ़ैसले लिए जाएं, तो हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए.

क़ाबिले-ग़ौर है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा, जबकि अन्य राज्यों में वह क्षेत्रीय नेताओं के नाम पर विधानसभा चुनाव लड़ती है. मध्य प्रदेश में शिवराज चौहान के नाम पर जनता से वोट मांगे जाते हैं. इसी तरह छ्त्तीसगढ़ में रमन सिंह और बिहार में सुशील मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाता है. इन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ से मुख्यमंत्री पद का दावेदार कौन होगा, यह भी पहले से ही तय होता है. फिर उत्तर प्रदेश में ऐसा क्या हो गया कि राज्य में नेताओं की एक बड़ी फ़ौज होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी को मोदी के नाम पर चुनाव लड़ना पड़ा. भारतीय जनता पार्टी के काफ़ी वरिष्ठ नेता उत्तर प्रदेश से ही हैं, जिनमें राजनाथ, कलराज मिश्र, कल्याण सिंह, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती आदि शामिल हैं. इसके बावजूद पार्टी ने इन नेताओं को तरजीह नहीं दी.

विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को उम्मीद से ज़्यादा कामयाबी मिली. अकेले उसके 312 विधायक जीते, जबकि सहयोगियों के साथ यह आंकड़ा 325 है. इसके बावजूद इनमें से कोई मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाया. भाजपा ने सांसद योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाकर सबको चौंका दिया. इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश के सियासी इतिहास में पहली बार बने दो उप-मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा और केशव प्रसाद मौर्य विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं. लोकसभा सांसद केशव मौर्या की भी पहचान एक कट्टर हिन्दुत्ववादी नेता की रही हैं. वह विश्व हिन्दू परिषद से भी जुड़े रहे हैं.

योगी सरकार के इकलौते मुसलमान मंत्री मोहसिन रज़ा भी विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं. वह कुछ वक़्त पहले ही भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए थे. माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग और वक्फ़ बोर्ड समेत कई ऐसे निगम हैं, जिनका अध्यक्ष मुसलमान ही होता है. शायद इसलिए ही रज़ा को यह पद मिल गया, वरना भारतीय जनता 20 करोड़ से ज़्यादा आबादी वाले उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को एक भी मुसलमान ऐसा नहीं मिला था, जिसे वह उम्मीदवार बना पाती. पार्टी के वरिष्ठ नेता शाहनवाज़ ख़ान ने ख़ुद इस बात की तस्दीक की थी.

आख़िर क्या वजह है कि भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में विधायकों को तरजीह देने की बजाय सांसद को मुख्यमंत्री बनाया. जानकारों का मानना है कि इतना बड़ा फ़ैसला भारतीय जनता पार्टी अकेले अपने दम पर नहीं ले सकती. इसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक का एजेंडा काम कर रहा था. ऐसा लगता है कि संघ मोदी का विकल्प तैयार कर रहा है. योगी आदित्यनाथ की छवि कट्टर हिन्दुत्ववादी नेता की रही है. वह गोरखनाथ मंदिर के पूर्व महंत अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी हैं. वह हिन्दू युवाओं के सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी समूह हिन्दू युवा वाहिनी के संस्थापक भी हैं. एक समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ विवादित बयान देने के लिए भी जाने जाते हैं. उनके विवादित बयानों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है. पिछले साल जून में उनके इस बयान पर ख़ूब विवाद हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था, "जब अयोध्या में विवादित ढांचा गिराने से कोई नहीं रोक सका तो मंदिर बनाने से कौन रोकेगा." उससे पहले जून 2015 में योग के विरोध पर उन्होंने कहा था,  "जो लोग योग का विरोध कर रहे हैं उन्‍हें भारत छोड़ देना चाहिए. जो लोग सूर्य नमस्‍कार को नहीं मानते उन्‍हें समुद्र में डूब जाना चाहिए." इसी तरह फ़रवरी 2015 में उनका यह बयान आया, "अगर उन्हें अनुमति मिले तो वो देश के सभी मस्जिदों के अंदर गौरी-गणेश की मूर्ति स्थापित करवा देंगे. आर्यावर्त ने आर्य बनाए, हिंदुस्तान में हम हिंदू बना देंगे. पूरी दुनिया में भगवा झंडा फहरा देंगे. मक्का में ग़ैर मुस्लिम नहीं जा सकता है, वैटिकन में ग़ैर ईसाई नहीं जा सकता है. हमारे यहां हर कोई आ सकता है." प्रदूषण और मुसलमानों की बढ़ती आबादी जैसे मुद्दों पर भी वह कई विवादित बयान दे चुके हैं.

उत्तर प्रदेश के 21वें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ साल 1998 से लगातार भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. चुनाव के दौरान उनके समर्थकों ने 'दिल्ली में मोदी, यूपी में योगी' का नारा दिया था. उत्तर प्रदेश में योगी के मुख्यमंत्री बनने से यह साफ़ है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश के लोकतंत्र में हिन्दुत्ववादी विचारधारा को बढ़ावा दे रहा है. साल 2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के बनने के बाद से देश में सांप्रदायिक घटनाओं में ख़ासी बढ़ोतरी हुई है. उत्तर प्रदेश के दादरी कांड के बाद एक समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ हमले बढ़ गए. गौमांस के नाम पर लोगों का एक झुंड किसी पर भी टूट पड़ता था. इससे एक समुदाय विशेष के मन में असुरक्षा की भावना बढ़ गई. अन्य सियासी दलों ने मुसलमानों के इसी डर का ख़ूब फ़ायदा उठाया. इस तरह की घटनाओं ने वोटों के ध्रुवीकरण का काम किया. भाजपा समर्थित लोगों के वोट इकट्टे हो गए और ग़ैर भाजपाई और मुसलमानों के वोट बंट गए.

मोदी भले ही सबका साथ, सबका विकास का नारा देते रहें, लेकिन सब जानते हैं कि उन्होंने किसका विकास किया और किसे अनदेखा किया. उनके ’जुमले’ तो जगज़ाहिर हैं. संवैधानिक पद पर बैठने के बाद व्यक्ति विशेष की मजबूरी बन जाती है कि उसे सबके हित की बात बोलनी ही पड़ती है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की यह विशेषता रही है कि वे कितने ही बड़े संवैधानिक पद पर क्यों न बैठ जाएं, बात सिर्फ़ अपने मन की ही करते हैं. भले ही इससे किसी को ठेस ही क्यों न पहुंचे.

बहरहाल, उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ योगी का मुख्यमंत्री बनना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बड़ी जीत ज़रूर है, लेकिन यह भारतीय जनता पार्टी की सियासी हार है.

Saturday, March 25, 2017

राहुल गांधी के अपने कितने ’अपने’

फ़िरदौस ख़ान
पिछले के कई बरसों से देश में कोई भी चुनाव हो, राहुल गांधी की जान पर बन आती है. पिछले लोकसभा चुनाव हों, उससे पहले के विधानसभा चुनाव हों या उसके बाद के विधानसभा चुनाव हों, सभी के चुनाव नतीजे राहुल गांधी के सियासी करियर पर गहरा असर डालते हैं. पिछले काफ़ी अरसे से कांग्रेस को लगातार हार का सामना करना पड़ रहा है. और हर हार के साथ राहुल गांधी के हिस्से में एक हार और दर्ज हो जाती है. आख़िर क्या वजह है कि राहुल गांधी के आसपास शुभचिंतकों की बड़ी फ़ौज होने के बावजूद वह कामयाब नहीं हो पा रहे हैं.

हाल ही में पांच राज्यों में चुनाव के नतीजे आने के बाद राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं. भले ही पंजाब में कांग्रेस सरकार बनाने में कामयाब हो गई, लेकिन उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों ने कांग्रेस को ख़ासा मायूस किया है. उत्तराखंड में भी कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा है. हालांकि मणिपुर और गोवा में कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी से बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन सियासी रणनीति सही नहीं होने की वजह से कांग्रेस सरकार बनाने में नाकाम रही.

ग़ौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में साल 2009 के लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस 2004 के मुक़ाबले और ज़्यादा मज़बूत होकर सामने आई, तो उसका श्रेय राहुल गांधी को ही दिया गया. ख़ासकर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के 21 सांसद जीतकर आने को राहुल गांधी की कामयाबी बताया गया. मगर उसके बाद से कांग्रेस को ज़्यादातर नाकामी का ही सामना करना पड़ रहा है. जिस वक़्त केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और उत्तर प्रदेश से कांग्रेस में 21 सांसद थे, तब साल 2012 में वहां हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस महज़ 28 सीटें ही जीत पाई थी. उस वक़्त पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 117 में से 46 सीटें जीत सकी थी. हार की वजह कैप्टन अमरिन्दर सिंह से कांग्रेसियों का नाराज़ होना और पार्टी द्वारा अमरिन्दर सिंह को मुख्यमंत्री पद के लिए पसंद किया जाना बताया गया था. इसी तरह गोवा में भी कांग्रेस को सत्ता से बेदख़्ल होना पड़ा. उत्तराखंड और मणिपुर में कांग्रेस सत्ता हासिल करने में कामयाब रही. गुजरात चुनाव में भले ही कांग्रेस को हार मिली हो, लेकिन देवभूमि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने जीत हासिल की. फिर अगले साल 2013 में दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, त्रिपुरा और नगालैंड में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. मेघालय, मिज़ोरम और कर्नाटक में कांग्रेस को जीत हासिल हुई. पिछले 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को अपनी सत्ता गंवानी पड़ी. एक दशक से सत्ता पर क़ाबिज़ कांग्रेस महज़ 44 सीटों तक ही सिमट कर रह गई. इतना ही नहीं, साल 2014 में हरियाणा और महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस की हार हुई और सत्ता उसके हाथों से निकल गई. इसी तरह झारखंड और जम्मू-कश्मीर में भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. अगले साल 2015 में कांग्रेस बिहार में महागठबंधन में शामिल हुई और उसने जीत का मुंह देखा. साल 2016 में असम कांग्रेस के हाथ से निकल गया. केरल और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को नाकामी ही मिली. पुड्डुचेरी में कांग्रेस को जीत नसीब हुई.
इस साल के आख़िर में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. कुछ दिन बाद दिल्ली नगर निगम में चुनाव होने हैं. कांग्रेस निकाय चुनाव में भी बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पा रही है. पिछले दिनों महाराष्ट्र निकाय चुनाव में कांग्रेस को नाकामी हासिल हुई. कांग्रेस महज़ 31 सीटों तक ही सिमट कर रह गई, जबकि साल 2012 के चुनाव में कांग्रेस के 52 पार्षद जीते थे.

हालत यह है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी कांग्रेस के ख़राब प्रदर्शन पर मायूसी ज़ाहिर करते हुए कांग्रेस को नये सिरे से अपनी रणनीतियों पर विचार करने की सलाह दे डाली. कांग्रेस की लगातार हार से पार्टी के बीच से आवाज़ उठने लगी है. कुछ वक़्त पहले दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री ने राहुल गांधी को अपरिपक्व कह दिया था. अब उनके बेटे संदीप दीक्षित ने पार्टी की रणनीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि देवरिया से दिल्ली तक की यात्रा रोकने से पार्टी को काफ़ी नुक़सान हो गया है. सनद रहे कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले कांग्रेस ने शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर दिया था और बड़े ही जोश से राहुल गांधी अगुवाई में देवरिया से दिल्ली की यात्रा शुरू कर दी थी, लेकिन बाद में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी से समझौता कर लिया.

राहुल गांधी बहुत अच्छे इंसान हैं. वह ख़ुशमिज़ाज, ईमानदार, मेहनती और सकारात्मक सोच वाले हैं और मेहनत भी ख़ूब करते हैं. इसके बावजूद उतने कामयाब नहीं हो पाते, जितने होने चाहिए. आख़िर उनकी नाकामी की वजह क्या है? अगर इस पर गौर क्या जाए, तो कई वजहें सामने आती हैं. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि जो लोग ख़ुद को राहुल गांधी का क़रीबी और शुभचिंतक कहते हैं, वही लोग उनके बारे में दुष्प्रचार करते हैं. यूं तो राहुल गांधी जनसभाएं करते हैं, आम आदमी से सीधे रूबरू होकर बात करते हैं, लेकिन अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं से दूर हैं.
क़ाबिले-ग़ौर है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी बीमारी की वजह से सियासत में सक्रिय नहीं हैं. उनकी ग़ैर हाज़िरी में पार्टी के सभी फ़ैसले राहुल गांधी ही ले रहे हैं. इन फ़ैसलों में उनके सियासी सलाहकारों की भी बड़ी भूमिका रहती है. हर चुनाव में पार्टी की हार के बाद राहुल गांधी को अपनी रणनीतियों में बदलाव लाने की सलाह दी जाती है. पार्टी को अपनी हार का विशलेषण कर ख़ामियों को दूर करना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता. पार्टी हर चुनाव में अपनी पुरानी ख़ामियों को दोहराती है.

कुछ महीनों बाद फिर से दो राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. साल 2019 में लोकसभा चुनाव आ रहा है. कांग्रेस के पास ज़्यादा वक़्त नहीं है. उसे आने वाले चुनावों में जीत हासिल करनी है, तो ईमानदारी से अपनी ख़ामियों पर ग़ौर करना होगा. पार्टी को अपनी चुनावी रणनीति बनाते वक़्त कई बातों को ज़ेहन में रखना होगा. उसे सभी वर्गों का ध्यान रखते हुए अपने पदाधिकारी तक करने होंगे. पार्टी के क्षेत्रीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी विश्वास में लेना होगा, क्योंकि जनता के बीच तो इन्हीं को जाना है. बूथ स्तर तक पार्टी संगठन को मज़बूत करना होगा. राहुल गांधी को चाहिए कि वे पार्टी के आख़िरी कार्यकर्ता तक से संवाद करें. उनकी पहुंच हर कार्यकर्ता तक और कार्यकर्ता की पहुंच राहुल गांधी तक होनी चाहिए. उन्हें पार्टी के मायूस कार्यकर्ताओं में जोश भरना होगा और जनसंपर्क बढ़ाना होगा. अगर वह ऐसा कर पाए, तो फिर कांग्रेस को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक पाएगा.


Wednesday, December 21, 2016

काले धन पर पारदर्शिता बरतनी होगी

फ़िरदौस ख़ान
कालेधन पर रोक लगाने के केंद्र सरकार के नोटबंदी के फ़ैसले के बाद अब सबकी नज़र सियासी दलों के चंदे पर है.  देश की अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता के लिए सामाजिक अंकेक्षण की मांग उठ रही है. जब नोटबंदी, कैश लेस ट्रांजेक्शन, सोना, रियल स्टेट में कैश लेस ख़रीद-बिक्री को लेकर आम जनता प्रभावित है, तो फिर जनता द्वारा भरे गए प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष करों से मिली रक़म का इस्तेमाल करने वाले नेताओं और सियासी दलों को भी पारदर्शिता बरतनी होगी.

इस बाबत चुनाव में काले धन का इस्तेमाल रोकने के लिए चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार को क़ानून में संशोधन की सिफ़ारिश की है. इसके लिए चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार को तीन सुझाव भी दिए हैं. पहला सियासी दलों के दो हज़ार रुपये से ज़्यादा गुप्त चंदा लेने पर रोक लगाई जाए, दूसरा चुनाव न लड़ने वाले सियासी दलों को आयकर से छूट नहीं दी जाए और तीसरा सियासी दल कूपन के ज़रिये चंदा देने वाले लोगों की भी पूरी जानकारी रखें. क़ाबिले-ग़ौर है कि फ़िलहाल गुप्त चंदे पर क़ानूनी रोक नहीं है. जनप्रतिनिधित्व क़ानून 1951 की धारा 29(सी) के तहत 20 हज़ार रुपये से ज़्यादा के चंदे की सूचना चुनाव आयोग को देनी होती है. इससे नीचे की रक़म का कोई ब्यौरा नहीं दिया जाता. आमदनी के मामले में कांग्रेस ने चुनाव आयोग को बताया कि एक दशक में उसे दो-तिहाई रकम 20 हज़ार रुपये से नीचे के चंदे के ज़रिये हुई है, जबकि भारतीय जनता पार्टी ने अपनी 44 फ़ीसद आमदनी को 20 हज़ार रुपये से नीचे की मदद को बताया है. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के मुताबिक़  उन्हें 20 हज़ार रुपये से ज़्यादा चंदा देने वाला कोई नहीं है, इसलिए उनमें यह दर 100 फ़ीसद है. ऐसे में नियामक एजेंसियां यह पता लगाने में नाकाम रहती हैं कि सियासी दलों के पास आख़िर इतनी बड़ी रक़म कहां से आई है. सियासी दलों को आयकर भरने से भी छूट है. आयकर क़ानून की धारा 13ए के तहत  संपत्ति, चंदा, या दूसरे स्रोतों से हुई आमदनी पर कोई कर नहीं देना पड़ता. कूपन या रसीद के ज़रिये चंदा देने वालों का ब्यौरा देना भी ज़रूरी नहीं है. इस तरह छोटी-छोटी रक़म के कूपनों के ज़रिये कितनी भी रक़म दिखाई जा सकती है. सियासी दल चुनाव आयोग को जिस रक़म का ब्यौरा देते हैं, वह पैसा कॊरपोरेट घरानों से चंदे के तौर पर आता है, जो पूरी तरह आयकर से मुक्त है. इसके अलावा सियासी आरटीआई के दायरे में नहीं आते. सियासी दलों की आमदनी और ख़र्च दोनों ही में पारदर्शिता नहीं होती. चुनाव आयोग भी अपने लेखा विभाग से इसकी जांच नहीं करा सकता. ऐसी हालत में कालेधन को बहुत ही आसानी से सफ़ेद किया जा सकता है. सियासी दलों पर आरोप लग रहे हैं कि नोटबंदी के बाद उनके खातों में एक लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा के पुराने नोट जमा हुए हैं. यह भी आरोप है कि बहुत से छोटे सियासी दल 25 फ़ीसद कमीशन पर कालेधन को सफ़ेद बनाने में लगे हैं. साथ ही सियासी गलियारे में चर्चा थी कि नोटबंदी के बाद सियासी दलों के खातों में जमा हुए पुराने नोटों की जांच नहीं होगी. हालांकि विवाद बढ़ने पर राजस्व सचिव हंसमुख अढिया को सफ़ाई देनी पड़ी कि नोटबंदी के बाद कोई भी सियासी दल 500 और 1000 रूपये में चंदा स्वीकार नहीं कर सकता. अगर उन्होंने ऐसा किया, तो उन पर भी कार्रवाई होगी.

ग़ौरतलब है कि चुनावों में कालेधन का ख़ूब इस्तेमाल होता है. चुनाव सुधार के लिए काम करने वाली एजेंसियों का भी यही कहना है कि काला धन सबसे ज़्यादा चुनावों में ही खपता है. क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि सियासी दलों को मिली रियायत का ग़लत फ़ायदा उठाने का मौक़ा मिला रहता है. बड़ी रक़म को ज़्यादा हिस्सों में बांटकर कालेधन को सफ़ेद बनाया जा सकता है. आयकर में छूट हासिल करने के मक़सद से ही ज़्यादतर सियासी दलों का गठन हुआ है. फ़िलहाल देश में 1900 से ज़्यादा सियासी दल हैं, जिनमें से तक़रीबन 1400 सियासी दलों ने किसी भी चुनाव में अपना एक उम्मीदवार भी मैदान में नहीं उतारा. हालत यह है कि पिछले आम चुनाव में महज़ 45 दलों ने ही चुनाव लड़ा. चंदे के कूपन का भी कोई नियम नहीं है. कितने भी कूपन छपवाकर कितनी भी रक़म का चंदा दिखाया जा सकता है.

एसोसिएशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक रिफ़ॊर्म्स (एडीआर) की साल 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक़ सियासी दलों को 75 फ़ीसद से ज़्यादा चंदा अज्ञात स्रोतों से मिला. पिछले दस सालों में सियासी दलों के चंदे में 478 की बढ़ोतरी हुई. साल 2004 के लोकसभा चुनाव में 38 दलों को 253.46 करोड़ रुपये का चंदा मिला, जो साल 2014 में बढ़कर 1463.63 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. पिछले तीन लोकसभा चुनावों में 44 फ़ीसद चंदा नक़दी के तौर पर था. लोकसभा चुनावों के अलावा इस दौरान हुए विधानसभा चुनावों में भी सियासी दलों ने चंदे के तौर पर करोड़ों रुपये जुटाये.  साल 2004 से 2015 के बीच हुए विधानसभा चुनावों में सियासी दलों को 3368.06 करोड़ रुपये मिले. इसमें से 63 फ़ीसद रक़म नक़दी के तौर पर मिली. चुनाव आयोग में जमा किए गए चुनावी ख़र्च के विवरण के मुताबिक़ पिछले तीन लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दलों में समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, अन्नाद्रमुक, बीजू जनता दल और शिरोमणि अकाली दल को सबसे ज़्यादा चंदा मिला है और इन्हीं दलों ने सबसे ज़्यादा रक़म खर्च भी की है. साल 2004 और 2015 के विधानसभा चुनावों के दौरान क्षेत्रीय दलों समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, शिरोमणि अकाली दल, शिवसेना और तृणमूल कांग्रेस को सबसे ज़्यादा चंदा मिला है और इन्हीं दलों ने सबसे ज़्यादा पैसे ख़र्च किए हैं. एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2014-15 में चुनावी ट्रस्टों ने 177.55 करोड़ चंदे के तौर पर जुटाये हैं और उनमें से 177.40 करोड़ अलग-अलग सियासी दलों को चंदे के रूप में दिए गए.

अफ़सोस की बात है कि अपनी आमदनी के मामले में सियासी दल पारदर्शिता नहीं चाहते. सनद रहे कि केंद्रीय चुनाव आयोग ने जब साल 2013 में पार्टियों को सार्वजनिक संस्था घोषित करते हुए उन्हें सूचना का अधिकार (आरटीआई) के दायरे में लाने का आदेश दिया था, तब कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा और वामदलों से लेकर तक़रीबन सभी बड़े-छोटे दलों ने एक सुर में इसका विरोध किया था. पिछले सरकार केंद्र की भाजपा सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में कहा था कि सियासी दलों को आरटीआई के दायरे में लाने से उनके संचालन पर असर पड़ेगा और सियासी विरोधी भी इसका फ़ायदा उठा सकते हैं. सियासी दल भी इस बात को बख़ूबी जानते हैं कि चुनाव के दौरान कालाधन बाहर आ जाता है. कालेधन के मामले में सख़्ती होने से उनकी आमदनी पर भी इसका असर पड़ेगा. सियासी दलों के इसी विरोध की वजह से ही चुनाव आयोग और लॊ कमीशन के सुझावों की तमाम फ़ाइलें दफ़्तरों में पड़ी धूल फांक रही हैं. चुनाव आयोग ने सियासी दलों के लिए कई और भी सिफ़ारिशें की थीं, जिनमें सियासी दलों को आरटीआई का जवाब देने, उनके दान खातों का ऒडिट करने, एक उम्मीदवार के एक ज़्यादा सीटों से चुनाव लड़ने और निर्दलीय उम्मीदवार के चुनाव लड़ने आदि पर रोक लगाना शामिल है.

दरअसल, कालेधन से जुड़ा मुद्दा चुनावी सुधारों से भी जुड़ा हुआ है. अगर सरकार कालेधन के मामले में वाक़ई गंभीर है, तो उसे चुनाव सुधारों की दिशा में भी सख़्त फ़ैसले लेने होंगे. उसे चुनाव में धन-बल के अत्यधिक इस्तेमाल पर भी पाबंदी लगानी होगी. सियासी दलों को चाहिए कि वे भी कैश लेस चंदा लेना शुरू करें और साथ ही अपनी आमदनी को सार्वजनिक करें. विदेशों की तर्ज़ पर भारत को भी इस दिशा में कारगर क़दम उठाने होंगे. अमेरिका, ब्रिटेन्, जर्मनी, फ़्रांस, ऒस्ट्रेलिया और आयरलैंड आदि देशों ने सियासी दलों को मिलने वाले चंदे पर सख़्त नियम बनाए हुए हैं. सियासी दलों को अपनी आमदनी का ब्यौरा देना होता है. फ़्रांस में चुनाव का सारा ख़र्च सरकार ही वहन करती है.

बहरहाल, कालेधन पर पारदर्शिता बरतने की सारी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ जनता की ही नहीं है, सरकार और सियासी दलों को भी अर्थव्यवस्था को पारदर्शी बनाने के अपने दायित्व को पूरी ईमानदारी के साथ निभाना होगा.

Wednesday, December 14, 2016

यह जनता के पैसे का दुरुपयोग है

फ़िरदौस ख़ान
कहते हैं, बुरी घड़ी कहकर नहीं आती. बुरा वक़्त कभी भी आ जाता है. मौत या हादसों का कोई वक़्त मुक़र्रर नहीं होता. जब कोई हादसा होता है, जान या माल का नुक़सान होता है, तो किसी भी व्यक्ति को इसका सदमा लग सकता है. ऐसे में व्यक्ति के जिस्म में ताक़त नहीं रहती और शारीरिक क्रियाएं धीमी पड़ जाती हैं. दिमाग़ रक्त वाहिनियों की पेशियों पर नियंत्रण नहीं रख पाता, जिससे दिमाग़ और जिस्म का तालमेल गड़बड़ा जाता है. दिल की धड़कन भी धीमी हो जाती है. व्यक्ति क चक्कर आने लगते हैं, वह बेहोश हो जाता है, कई बार उसकी मौत भी हो जाती है. मौत कभी पूरा न होने वाला नुक़सान है. मौत के सदमे से उबरना आसान नहीं है. सदमे का ताल्लुक़ भावनाओं से है, संवेदनाओं से है. अगर कोई इन संवेदनाओं के साथ खिलवाड़ करे, तो उसे किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन सियासी हलक़े में मौत और सदमे पर भी सियासत की बिसात बिछा ली जाती है. फिर अपने फ़ायदे के लिए शह और मात का खेल खेला जाता है. इन दिनों तमिलनाडु में भी यही सब देखने को मिल रहा है.
तमिलनाडु में सत्तारूढ़ पार्टी अन्नाद्र्मुक दावा कर रही है कि जयललिता की मौत के सदमे से 470 लोगों की मौत हो चुकी है. पार्टी ने मृतकों के परिवार को तीन लाख रुपये की मदद देने का ऐलान किया है. पार्टी ने ऐसे लोगों की फ़ेहरिस्त जारी की है, जिनकी मौत सदमे की वजह से हुई है. पार्टी का यह भी कहना है कि जयललिता के निधन के बाद अब तक छह लोग ख़ुदकुशी की कोशिश कर चुके हैं. ऐसे चार लोगों का ब्यौरा भी जारी किया गया है. जयललिता की मौत की ख़बर सुनने पर ख़ुदकुशी की कोशिश करने वाले एक व्यक्ति को पार्टी ने 50 हज़ार रुपये देने की घोषणा की है. इतना ही नहीं जयललिता की मौत की ख़बर सुनकर अपनी उंगली काटने वाले व्यक्ति को भी 50 हज़ार रुपये की मदद देने का ऐलान किया जा चुका है.

इसमें कोई शक नहीं है कि ’अम्मा’ के नाम से प्रसिद्ध जयललिता तमिलनाडु की लोकप्रिय नेत्री थीं. उन्होंने राज्य की ग़रीब जनता के कल्याण के लिए कई योजनाएं शुरू की थीं. उन्होंने साल 2013 में चेन्नई में ‘अम्मा कैंटीन’ शुरू की, जहां बहुत कम दाम पर भोजन मुहैया कराया जाता है. अब पूरे राज्य में 300 से ज़्यादा ऐसी कैंटीन हैं, जिनमें एक रुपये में एक इडली और सांभर दिया जाता है, और पांच रुपये में चावल और सांभर परोसा जाता है. ग़रीब तबक़े के लोग इन कैंटीन में नाममात्र के दाम पर भरपेट भोजन करते और ’अम्मा’ के गुण गाते हैं. ये कैंटीन सरकारी अनुदान पर चलती हैं. इसके अलावा ग़रीबी रेखा के नीचे के परिवारों को हर महीने 25 किलो चावल, दालें, मसाले और खाने का अन्य सामान मुफ़्त दिया जाता है. सरकारी अस्पतालों में लोगों का मुफ़्त इलाज किया जाता है. उन्होंने पालना बेबी योजना, अम्मा मिनरल वॉटर, अम्मा सब्ज़ी की दुकान, अम्मा फ़ार्मेसी, बेबी केयर किट, अम्मा मोबाइल जैसी कई योजनाएं भी चलाई. इतना ही नहीं उन्होंने मुफ़्त में भी कई सुविधाएं लोगों को दीं, जिनमें ग़रीब औरतों को मिक्सर ग्राइंडर, लड़कियों को साइकिलें, छात्रों को स्कूल बैग, किताबें, यूनिफॉर्म और मुफ़्त में मास्टर हेल्थ चेकअप आदि शामिल हैं. क़ाबिले-ग़ौर बात यह भी है कि चुनाव के वक़्त लोगों को लुभाने के लिए उन्हें  रोज़मर्रा के काम आने वाली चीज़ें ’तोहफ़े’ में दी जाती हैं, जिनमें टेलीविज़न, एफ़एम रेडियो,  इडली-डोसा बनाने में इस्तेमाल की जाने वाली पिसाई मशीन, साइकिल, लैपटॉप वग़ैरह शामिल हैं. अपने इन्हीं ग़रीब हितैषी कार्यों की वजह से जयललिता जनप्रिय हो गईं. उनकी लोकप्रिय का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बाक़ी राज्यों में भाजपा की लहर चल रही थी, उस वक़्त उनकी पार्टी अन्नाद्रमुक ने तमिलनाडु में 39 में 37 सीटों पर जीत का परचम लहराया था. वह अपने सियासी गुरु एमजी रामचंद्रन के बाद सत्ता में लगातार दूसरी बार आने वाली तमिलनाडु में पहली राजनीतिज्ञ थीं.

ग़ौरतलब है कि 68 वर्षीय जयललिता को 22 सितंबर को अस्पताल में दाख़िल कराया, तो बहुचर्चित सबरीमाला मंदिर ने उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना के साथ तक़रीबन 75 हज़ार श्रद्धालुओं को मुफ़्त भोजन कराना शुरू कर दिया था. लोग उनके लिए दुआएं कर रहे थे. 5 दिसंबर को उनकी मौत के बाद राज्य में शोक की लहर दौड़ गई. जन सैलाब उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुआ. सरकार ने पांच दिन का शोक घोषित कर दिया.  जगह-जगह शोक सभाओं का आयोजन कर उनकी आत्मिक शांति के लिए प्रार्थनाएं होने लगीं. फिर ख़बरें आने लगीं कि जयललिता की मौत के सदमे में फ़लां-फ़लां व्यक्ति की मौत हो गई. अन्नाद्रमुक ने मृतकों के लिए सहायता राशि देने की घोषणा कर डाली. इस काम में राज्य सरकार भी पीछे नहीं रही.  इन मरने वाले लोगों की मौत सदमे से हुई है या नहीं ? ये बात अलग है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस तरह सरकारी ख़ज़ाने पर बोझ डालना सही है, क्या करदाताओं की मेहनत की कमाई, जिसका बड़ा हिस्सा करों के रूप में राज्य को मिलता है, उसका इस्तेमाल इन लोगों के परिजनों को मुआवज़ा देने में होना भी चाहिए था? जयललिता की लोकप्रियता के बाद भी इस सवाल का जवाब ’न’ ही है. तमिलनाडु सरकार को सरकारी ख़ज़ाने के पैसे का इस तरह से दुरुपयोग करने से बचना चाहिए था.

इससे बेहतर यह होता कि अन्नाद्रमुक जन कल्याण की कोई और योजना शुरू करती, जिससे ग़रीबों का भला होता ही, वह योजना जयललिता के प्रशंसकों-समर्थकों के मन में उनकी स्मृतियों को भी तरोताज़ा किए रहती. इसके साथ-साथ उन योजनाओं को जारी रखने का संकल्प भी लिया जाना चाहिए था, जो जयललिता ने अपने कार्यकाल में शुरू की थीं. अन्नाद्रमुक और पन्नीर सेल्वम की सरकार को समझना होगा कि हथकंडे अपनाकर कुछ वक़्त के लिए ही जनता का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा जा सकता है, पर इस तरह खींचा गया ध्यान स्थाई नहीं होता है. यह तो तभी होता है, जब जन कल्याण के कार्य एक संकल्प के तौर पर किए जाएं. जयललिता यही करती थीं, इसीलिए उन्हें ’अम्मा’ कहा जाता है, जबकि पन्नीर सेल्वम सरकारी ख़ज़ाने का दुरुपयोग ही कर रहे हैं. यह उन मौतों को गरिमा प्रदान करनी भी है, जो जयललिता के निधन के बाद सदमा लगने से हुई बताई जा रही हैं. इंसान का जीवन अनमोल होता है. अलबत्ता अल्पकाल में होने वाली मौतों को महिमा-मंडित करना भी प्रकृति और उसके नियमों के ख़िलाफ़ है.