Friday, June 18, 2010

दो जून की रोटी को मोहताज सांस्कृतिक दूत ये सपेरे




-फ़िरदौस ख़ान
भारत विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं का देश है. प्राचीन संस्कृति के इन्हीं रंगों को देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में बिखेरने में सपेरा जाति की अहम भूमिका रही है, लेकिन सांस्कृतिक दूत ये सपेरे सरकार, प्रशासन और समाज के उपेक्षित रवैये की वजह से दो जून की रोटी तक को मोहताज हैं.

देश के सभी हिस्सों में सपेरा जाति के लोग रहते हैं. सपेरों के नाम से पहचाने जाने वाले इस वर्ग में अनेक जातियां शामिल हैं. भुवनेश्वर के समीपवर्ती गांव पद्मकेश्वरपुर एशिया का सबसे बड़ा सपेरों का गांव माना जाता है. इस गांव में सपेरों के क़रीब साढ़े पांच सौ परिवार रहते हैं और हर परिवार के पास कम से कम दस सांप तो होते ही हैं. सपेरों ने लोक संस्कृति को न केवल पूरे देश में फैलाया, बल्कि विदेशों में भी इनकी मधुर धुनों के आगे लोगों को नाचने के लिए मजबूर कर दिया. सपेरों द्वारा बजाई जाने वाली मधुर तान किसी को भी अपने मोहपाश में बांधने की क्षमता रखती है.

डफली, तुंबा और बीन जैसे पारंगत वाद्य यंत्रों के जरिये ये किसी को भी सम्मोहित कर देते हैं. प्राचीन कथनानुसार भारतवर्ष के उत्तरी भाग पर नागवंश के राजा वासुकी का शासन था. उसके शत्रु राजा जन्मेजय ने उसे मिटाने का प्रण ले रखा था. दोनों राजाओं के बीच युध्द शुरू हुआ, लेकिन ऋषि आस्तिक की सूझबूझ पूर्ण नीति से दोनों के बीच समझौता हो गया और नागवंशज भारत छोड़कर भागवती (वर्तमान में दक्षिण अमेरिका) जाने पर राजी हो गए. गौरतलब है कि यहां आज भी पुरातन नागवंशजों के मंदिरों के दुर्लभ प्रमाण मौजूद हैं.

स्पेरा परिवार की कस्तूरी कहती हैं कि इनके बच्चे बचपन से ही सांप और बीन से खेलकर निडर हो जाते हैं. आम बच्चों की तरह इनके बच्चों को खिलौने तो नहीं मिल पाते, इसलिए उनके प्रिय खिलौने सांप और बीन ही होते हैं. बचपन से ही सांपों के सानिंध्य में रहने वाले इन बच्चों के लिए सांप से खेलना और उन्हें क़ाबू कर लेना ख़ास शग़ल बन जाता है.

सिर पर पगड़ी, देह पर भगवा कुर्ता, साथ में गोल तहमद, कानों में मोटे कुंडल, पैरों में लंबी नुकीली जूतियां और गले में ढेरों मनकों की माला और ताबीज़ पहने ये लोग कंधे पर दुर्लभ सांप और तुंबे को डाल कर्णप्रिय धुन के साथ गली-कूचों में घूमते रहते हैं. ये नागपंचमी, होली, दशहरा और दिवाली के मौक़ों पर अपने घरों को लौटते हैं. इन दिनों इनके अपने मेले आयोजित होते हैं.

मंगतराव कहते हैं कि सभी सपेरे इकट्ठे होकर सामूहिक भोज 'रोटड़ा' का आयोजन करते हैं. ये आपसी झगड़ों का निपटारा कचहरी में न करके अपनी पंचायत में करते हैं, जो सर्वमान्य होता है. सपेरे नेपाल, असम, कश्मीर, मणिपुर, नागालैंड और महाराष्ट्र के दुर्गम इलाकों से बिछुड़िया, कटैल, धामन, डोमनी, दूधनाग, तक्षकए पदम, दो मुंहा, घोड़ा पछाड़, चित्तकोडिया, जलेबिया, किंग कोबरा और अजगर जैसे भयानक विषधरों को अपनी जान की बाजी लगाकर पकड़ते हैं. बरसात के दिन सांप पकड़ने के लिए सबसे अच्छे माने जाते हैं, क्योंकि इस मौसम में सांप बिलों से बाहर कम ही निकलते हैं.

हरदेव सिंह बताते हैं कि भारत में महज 15 से 20 फीसदी सांप ही विषैले होते हैं. कई सांपों की लंबाई 10 से 30 फीट तक होती है. सांप पूर्णतया मांसाहारी जीव है. इसका दूध से कुछ लेना-देना नहीं है, लेकिन नागपंचमी पर कुछ सपेरे सांप को दूध पिलाने के नाम पर लोगों को धोखा देकर दूध बटोरते हैं. सांप रोजाना भोजन नहीं करता. अगर वह एक मेंढक निगल जाए तो चार-पांच महीने तक उसे भोजन की ज़रूरत नहीं होती. इससे एकत्रित चर्बी से उसका काम चल जाता है. सांप निहायत ही संवेदनशील और डरपोक प्राणी है. वह ख़ुद कभी नहीं काटता. वह अपनी सुरक्षा और बचाव की प्रवृत्ति की वजह से फन उठाकर फुंफारता और डराता है. किसी के पांव से अनायास दब जाने पर काट भी लेता है, लेकिन बिना कारण वह ऐसा नहीं करता.

सांप को लेकर समाज में बहुत से भ्रम हैं, मसलन सांप के जोड़े द्वारा बदला लेना, इच्छाधारी सांप का होना, दुग्धपान करना, धन संपत्ति की पहरेदारी करना, मणि निकालकर उसकी रौशनी में नाचना, यह सब असत्य और काल्पनिक हैं. सांप की उम्र के बारे में सपेरों का कहना है कि उनके पास बहुत से सांप ऐसे हैं जो उनके पिता, दादा और पड़दादा के जमाने के हैं. कई सांप तो ढाई सौ से तीन सौ साल तक भी ज़िन्दा रहते हैं. पौ फटते ही सपेरे अपने सिर पर सांप की पिटारियां लादकर दूर-दराज के इलाक़ों में निकल पड़ते हैं. ये सांपों के करतब दिखाने के साथ-साथ कुछ जड़ी-बूटियों और रत्न भी बेचते हैं. अतिरिक्त आमदनी के लिए सांप का विष मेडिकल इंस्टीटयूट को बेच देते हैं. किंग कोबरा और कौंज के विष के दो सौ से पांच सौ रुपये तक मिल जाते हैं, जबकि आम सांप का विष 25 से 30 रुपये में बिकता है।

आधुनिक चकाचौंध में इनकी प्राचीन कला लुप्त होती जा रही है. बच्चे भी सांप का तमाशा देखने की बजाय टीवी देख या वीडियो गेम खेलना पसंद करते हैं. ऐसे में इनको दो जून की रोटी जुगाड़ कर पानी मुश्किल हो रहा है. मेहर सिंह और सुरजा ठाकुर को सरकार और प्रशासन से शिकायत है कि इन्होंने कभी भी सपेरों की सुध नहीं ली. काम की तलाश में इन्हें दर-ब-दर भटकना पड़ता है. इनकी आर्थिक स्थिति दयनीय है. बच्चों को शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं. सरकार की किसी भी योजना का इन्हें कोई लाभ नहीं मिल सका, जबकि क़बीले के मुखिया केशव इसके लिए सपेरा समाज में फैली अज्ञानता को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. वह कहते हैं कि सरकार की योजनाओं का लाभ वही लोग उठा पाते हैं, जो पढ़े-लिखे हैं और जिन्हें इनके बारे में जानकारी है. मगर निरक्षर लोगों को इनकी जानकारी नहीं होती, इसलिए वे पीछे रह जाते हैं. वह चाहते हैं कि बेशक वह नहीं पढ़ पाए, लेकिन उनकी भावी पीढ़ी को शिक्षा मिले. वह बताते हैं कि उनके परिवारों के कई बच्चों ने स्कूल जाना शुरू किया है.

निहाल सिंह बताते हैं कि सपेरा जाति के अनेक लोगों ने यह काम छोड़ दिया है. वे अब मज़दूरी या कोई और काम करने लगे हैं. इस काम में उन्हें दिन में 100-150 रुपये कमाना पहाड़ से दूध की नदी निकालने से कम नहीं है, लेकिन अपने पुश्तैनी पेशे से लगाव होने की वजह से वह आज तक सांपों को लेकर घूमते हैं.

Sunday, June 13, 2010

मदरसे में गूंजती हैं, गायत्री मंत्र की स्वर लहरियां... फ़िरदौस ख़ान

ॐ भूर्भुव: स्वः तत् सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥
जी हां, यह बिलकुल सच है... उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर ज़िले के सतासीपुर स्थित नियामत-उलूम मदरसे में गायत्री मंत्र का पाठ होता है... ख़ास बात यह है कि मदरसे में सबसे पहले वन्दे मातरम् गाया जाता है...उसके बाद क़ुरआन की तिलावत होती है...  इसके साथ ही गीता और रामायण का भी पाठ होता है...

संस्कृत के शिक्षक अब्दुल कलाम कहते हैं कि हमारा मक़सद बच्चों को क़ुरआन, गीता और रामायण की तालीम देकर बेहतर इंसान बनाना है... मज़हब के नाम पर दंगे-फ़साद फैलाने वालों को इससे सबक़ लेना चाहिए...

क़रीब तीन दशक पहले 1976 में मौलवी मेहराब हासिम ने इस मदरसे की स्थापना की थी. इस मदरसे में लगभग 200 छात्र तालीम हासिल कर रहे हैं, जिनमें हिन्दू बच्चे भी शामिल हैं...

मदरसे के संस्थापक व प्राधानाचार्य मौलवी मेहराब हासिम का कहना है कि राष्ट्रहित से ऊंचा कोई नहीं है और वंदे मातरम् तो हमारे देश का गुणगान है. ऐसे में यह समझ में नहीं आता कि वंदे मातरम् गाने पर कुछ मज़हब के ठेकेदार क्यों ऐतराज़ जताते हैं. ये शर्मनाक, गंभीर और सोचनीय है...

एक तरफ़ जहां हिन्दुस्तान में मज़हब के नाम पर नफ़रत फैलाने का काम किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ ऐसे लोग भी हैं जो गंगा-जमुनी तहज़ीब को बढ़ावा दे रहे हैं... यक़ीनन ऐसे लोग ही इंसानियत को ज़िंदा रखे हुए हैं...

Monday, May 17, 2010

कुमार ज़लज़ला जी के नाम एक खुला पत्र

कुमार ज़लज़ला जी,
आपको हमारे लेख पसंद हैं तो पढ़िए... पसंद नहीं है तो मत पढ़िए...

आख़िर आप यह श्रेष्ठ ब्लॉगरिन (अजूबा शब्द) के तथाकथित चुनाव के लिए विकल्प में हमारा नाम अव्वल दर्जे पर रखकर क्या साबित करना चाहते हैं...? यह समझ से परे है...

क्या ऐसा करना 'शिष्टाचार' के दायरे में आता है...?

यह तो हद ही हो गई... पहले 'एक गृहणी' हमारे लेख से मजबूर होकर 'लिखने' को 'मजबूर' हो गई... ख़ैर, इस बहाने उसका कुछ भला तो हुआ...

कोई हमारे ईमान को दुरुस्त करने के फेर में दुबला हुआ जा रहा है... कोई दुआ कर रहा है कि हम भी 'राहे-हक़' (भले ही वो ख़ुद राहे-हक़ की परिभाषा तक न जानता हो) पर आ जाएं...
और अब आपकी ब्लॉग-दर-ब्लॉग घूमती टिप्पणियां....

आप भी कोई सार्थक काम कीजिए... ज़िन्दगी के फिर न लौटने वाले लम्हात बेकार की टिप्पणियों में क्यों ज़ाया करते हैं...
एक बात और... सभी ब्लॉगर श्रेष्ठ हैं... हमें नहीं लगता... इसके लिए आपको चुनाव के लिए मशक्क़त करने की ज़रूरत है...

जिन टिप्पणियों ने ब्लॉग जगत में ज़लज़ला ला दिया...
Kumar Jaljala said...
कौन है श्रेष्ठ ब्लागरिन
पुरूषों की कैटेगिरी में श्रेष्ठ ब्लागर का चयन हो चुका है। हालांकि अनूप शुक्ला पैनल यह मानने को तैयार ही नहीं था कि उनका सुपड़ा साफ हो चुका है लेकिन फिर भी देशभर के ब्लागरों ने एकमत से जिसे श्रेष्ठ ब्लागर घोषित किया है वह है- समीरलाल समीर। चुनाव अधिकारी थे ज्ञानदत्त पांडे। श्री पांडे पर काफी गंभीर आरोप लगे फलस्वरूप वे समीरलाल समीर को प्रमाण पत्र दिए बगैर अज्ञातवाश में चले गए हैं। अब श्रेष्ठ ब्लागरिन का चुनाव होना है। आपको पांच विकल्प दिए जा रहे हैं। कृपया अपनी पसन्द के हिसाब से इनका चयन करें। महिला वोटरों को सबसे पहले वोट डालने का अवसर मिलेगा। पुरूष वोटर भी अपने कीमती मत का उपयोग कर सकेंगे.
1-फिरदौस
2- रचना
3 वंदना
4. संगीता पुरी
5.अल्पना वर्मा
6 शैल मंजूषा

Kumar Jaljala said...

महिलाओं में श्रेष्ठ ब्लागर कौन- जीतिए 21 हजार के इनाम
पोस्ट लिखने वाले को भी मिलेगी 11 हजार की नगद राशि
आप सबने श्रेष्ठ महिला ब्लागर कौन है, जैसे विषय को लेकर गंभीरता दिखाई है. उसका शुक्रिया. आप सबको जलजला की तरफ से एक फिर आदाब. नमस्कार.
मैं अपने बारे में बता दूं कि मैं कुमार जलजला के नाम से लिखता-पढ़ता हूं. खुदा की इनायत है कि शायरी का शौक है. यह प्रतियोगिता इसलिए नहीं रखी जा रही है कि किसी की अवमानना हो. इसका मुख्य लक्ष्य ही यही है कि किसी भी श्रेष्ठ ब्लागर का चयन उसकी रचना के आधार पर ही हो. पुऱूषों की कैटेगिरी में यह चयन हो चुका है. आप सबने मिलकर समीरलाल समीर को श्रेष्ठ पुरूष ब्लागर घोषित कर दिया है. अब महिला ब्लागरों की बारी है. यदि आपको यह प्रतियोगिता ठीक नहीं लगती है तो किसी भी क्षण इसे बंद किया जा सकता है. और यदि आपमें से कुछ लोग इसमें रूचि दिखाते हैं तो यह प्रतियोगिता प्रारंभ रहेगी.
सुश्री शैल मंजूषा अदा जी ने इस प्रतियोगिता को लेकर एक पोस्ट लगाई है. उन्होंने कुछ नाम भी सुझाए हैं। वयोवृद्ध अवस्था की वजह से उन्होंने अपने आपको प्रतियोगिता से दूर रखना भी चाहा है. उनके आग्रह को मानते हुए सभी नाम शामिल कर लिए हैं। जो नाम शामिल किए गए हैं उनकी सूची नीचे दी गई है.
आपको सिर्फ इतना करना है कि अपने-अपने ब्लाग पर निम्नलिखित महिला ब्लागरों किसी एक पोस्ट पर लगभग ढाई सौ शब्दों में अपने विचार प्रकट करने हैं। रचना के गुण क्या है। रचना क्यों अच्छी लगी और उसकी शैली-कसावट कैसी है जैसा उल्लेख करें तो सोने में सुहागा.
नियम व शर्ते-
1 प्रतियोगिता में किसी भी महिला ब्लागर की कविता-कहानी, लेख, गीत, गजल पर संक्षिप्त विचार प्रकट किए जा सकते हैं
2- कोई भी विचार किसी की अवमानना के नजरिए से लिखा जाएगा तो उसे प्रतियोगिता में शामिल नहीं किया जाएगा
3- प्रतियोगिता में पुरूष एवं महिला ब्लागर सामान रूप से हिस्सा ले सकते हैं
4-किस महिला ब्लागर ने श्रेष्ठ लेखन किया है इसका आंकलन करने के लिए ब्लागरों की एक कमेटी का गठन किया जा चुका है. नियमों व शर्तों के कारण नाम फिलहाल गोपनीय रखा गया है.
5-जिस ब्लागर पर अच्छी पोस्ट लिखी जाएगी, पोस्ट लिखने वाले को 11 हजार रूपए का नगद इनाम दिया जाएगा
6-निर्णायकों की राय व पोस्ट लेखकों की राय को महत्व देने के बाद श्रेष्ठ महिला ब्लागर को 21 हजार का नगद इनाम व शाल श्रीफल दिया जाएगा.
7-निर्णायकों का निर्णय अंतिम होगा.
8-किसी भी विवाद की दशा में न्याय क्षेत्र कानपुर होगा.
9- सर्वश्रेष्ठ महिला ब्लागर एवं पोस्ट लेखक को आयोजित समारोह में भाग लेने के लिए आने-जाने का मार्ग व्यय भी दिया जाएगा.
10-पोस्ट लेखकों को अपनी पोस्ट के ऊपर- मेरी नजर में सर्वश्रेष्ठ ब्लागर अनिवार्य रूप से लिखना होगा
ब्लागरों की सुविधा के लिए जिन महिला ब्लागरों का नाम शामिल किया गया है उनके नाम इस प्रकार है-
1-फिरदौस 2- रचना 3-वंदना 4-संगीता पुरी 5-अल्पना वर्मा- 6 –सुजाता चोखेर 7- पूर्णिमा बर्मन 8-कविता वाचक्वनी 9-रशिम प्रभा 10- घुघूती बासूती 11-कंचनबाला 12-शेफाली पांडेय 13- रंजना भाटिया 14 श्रद्धा जैन 15- रंजना 16- लावण्यम 17- पारूल 18- निर्मला कपिला 19 शोभना चौरे 20- सीमा गुप्ता 21-वाणी गीत 21- संगीता स्वरूप 22-शिखाजी 23 –रशिम रविजा 24- पारूल पुखराज 25- अर्चना 26- डिम्पल मल्होत्रा, 27-अजीत गुप्ता 28-श्रीमती कुमार.
तो फिर देर किस बात की. प्रतियोगिता में हिस्सेदारी दर्ज कीजिए और बता दीजिए नारी किसी से कम नहीं है। प्रतियोगिता में भाग लेने की अंतिम तारीख 30 मई तय की गई है.
और हां निर्णायकों की घोषणा आयोजन के एक दिन पहले कर दी जाएगी.
इसी दिन कुमार जलजला का नया ब्लाग भी प्रकट होगा. भाले की नोंक पर.
आप सबको शुभकामनाएं.
आशा है आप सब विषय को सकारात्मक रूप देते हुए अपनी ऊर्जा सही दिशा में लगाएंगे.
सबका हमदर्द
कुमार जलजला

Saturday, May 15, 2010

रेत के धोरों में सब्ज़ियों की खेती...


फ़िरदौस ख़ान
आज जहां बंजर भूमि के क्षेत्र में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने पर्यावरण और कृषि विशेषज्ञों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं, वहीं अरावली पर्वत की तलहटी में बसे गांवों के बालू के धोरों में उगती सब्ज़ियां मन में एक ख़ुशनुमा अहसास जगाती हैं. हरियाणा के मेवात ज़िले के गांव नांदल, खेडी बलई, शहजादपुर, वाजिदपुर, शकरपुरी और सारावडी आदि गांवों की बेकार पड़ी रेतीली ज़मीन पर उत्तर प्रदेश के किसान सब्ज़ियों की काश्त कर रहे हैं. अपने इस सराहनीय कार्य के चलते ये किसान हरियाणा के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बने हुए हैं.

सिंचाई जल की कमी और बालू होने के कारण कभी यहां के किसान अपनी इस ज़मीन की तरफ़ नज़र उठाकर भी नहीं देखते थे. मगर अब यही ज़मीन उनकी आमदनी का एक बेहतर ज़रिया बन गई है. इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश से आए भूमिहीन किसान भी इस रेतीली ज़मीन पर सब्ज़ियों की काश्त कर जीविकोपार्जन कर रहे हैं. नांगल गांव में खेती कर रहे अब्दुल हमीद क़रीब पांच साल पहले यहां आए हैं. उत्तर प्रदेश के फ़र्रूख़ाबाद के बाशिंदे अब्दुल हमीद बताते हैं कि इससे पहले वे राजस्थान के अलवर में खेतीबाड़ी क़ा काम करते थे, मगर जब वहां के ज़मींदारों ने उनसे ज़मीन के ज़्यादा पैसे वसूलने शुरू कर दिए, तो वे हरियाणा आ गए. उनका सब्ज़ियों की काश्त करने का अपना विशेष तरीक़ा है.

वे कहते हैं कि इस विधि में मेहनत तो ज़्यादा लगती है, लेकिन पैदावार अच्छी होती है. इन किसानों को मेवात में ज़मींदार से नौ से दस हज़ार रुपये प्रति एकड़ क़े हिसाब से छह महीने के लिए ज़मीन मिल जाती है. इस रेतीली ज़मीन पर कांटेदार झाड़ियां उगी होती हैं. किसानों का आगे का काम इस ज़मीन की साफ़-सफ़ाई से ही शुरू होता है. पहले इस ज़मीन को समतल बनाया जाता है और फिर इसके बाद खेत में तीन गुना तीस फुट के आकार की डेढ़ से दो फुट गहरी बड़ी-बड़ी नालियां बनाई जाती हैं. इन नालियों में एक तरफ़ बीज बो दिए जाते हैं. नन्हे पौधों को तेज़ धूप या पाले से बचाने के लिए बीजों की तरफ़ वाली नालियों की दिशा में पूलें लगा दी जाती हैं.

जब बेलें बड़ी हो जाती हैं तो इन्हें पूलों के ऊपर फैला दिया जाता है. बेलों में फल लगने के समय पूलों को जमीन में बिछाकर उन पर करीने से बेलों को फैलाया जाता है, ताकि फल को कोई नुकसान न पहुंचे। ऐसा करने से फल साफ भी रहते हैं. इस विधि में सिंचाई के पानी की कम खपत होती है, क्योंकि सिंचाई पूरे खेत की न करके केवल पौधों की ही की जाती है. इसके अलावा खाद और कीटनाशक भी अपेक्षाकृत कम ख़र्च होते हैं, जिससे कृषि लागत घटती है और किसानों को ज़्यादा मुनाफ़ा होता है.

शुरू से ही उचित देखरेख होने की वजह से पैदावार अच्छी होती है. एक पौधे से 50 से 100 फल तक मिल जाते हैं. हर पौधे से तीन दिन के बाद फल तोडे ज़ाते हैं. उत्तर प्रदेश के ये किसान तरबूज, खरबूजा, लौकी, तोरई और करेला जैसी बेल वाली सब्जियों की ही काश्त करते हैं. इसके बारे में उनका कहना है कि गाजर, मूली या इसी तरह की अन्य सब्ज़ियों के मुक़ाबले बेल वाली सब्ज़ियों में उन्हें ज़्यादा फ़ायदा होता है. इसलिए वे इन्हीं की काश्त करते हैं. खेतीबाड़ी क़े काम में परिवार के सभी सदस्य हाथ बंटाते हैं. यहां तक कि महिलाएं भी दिनभर खेत में काम करती हैं.

अनवारुन्निसा, शमीम बानो और आमना कहतीं हैं कि वे सुबह घर का काम निपटाकर खेतों में आ जाती हैं और फिर दिनभर खेतीबाड़ी क़े काम में जुटी रहती हैं. ये महिलाएं खेत में बीज बोने, पूलें लगाने और फल तोड़ने आदि के कार्य को बेहतर तरीक़े से करतीं हैं. मेवात के इन गांवों की सब्ज़ियों को गुडग़ांव, फ़रीदाबाद और देश की राजधानी दिल्ली में ले जाकर बेचा जाता है. दिल्ली में सब्ज़ियों की ज़्यादा मांग होने के कारण किसानों को फ़सल के यहां वाजिब दाम मिल जाते हैं. इस्माईल, हमीदुर्रहमान और जलालुद्दीन बताते हैं कि उनकी देखादेखी अब मेवात के किसानों ने भी उन्हीं की तरह खेती करनी शुरू कर दी है.

उत्तर प्रदेश के बरेली, शहजादपुर, पीलीभीत और फ़र्रूख़ाबाद के क़रीब 70 परिवार अकेले नगीना तहसील में आकर बस गए हैं. उत्तर प्रदेश के किसान, पंजाब, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में जाकर भी सब्ज़ियों की काश्त करते हैं. इन किसानों का कहना है कि अगर सरकार बेकार पड़ी ज़मीन उन्हें कम दामों पर काश्त करने के लिए दे दे, तो इससे जहां उन्हें ज़्यादा कीमत देकर भूमि नहीं लेनी पडेग़ी, वहीं रेतीली सरकारी ज़मीन भी कृषि क्षेत्र में शामिल हो सकेगी.

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बालू रेत में इस तरह सब्जियों की काश्त करना वाक़ई सराहनीय कार्य है. उपजाऊ क्षमता के लगातार ह्रास से ज़मीन के बंजर होने की समस्या आज देश ही नहीं विश्व के सामने चुनौती बनकर उभरी है. ग़ौरतलब है कि अकेले भारत में हर साल छह सौ करोड़ टन मिट्टी कटाव के कारण बह जाती है, जबकि अच्छी पैदावार योग्य मिट्टी की एक सेंटीमीटर मोटी परत बनने में तीन सौ साल लगते हैं. उपजाऊ मिट्टी की बर्बादी का अंदाज़ा इसी बात से ही लगाया जा सकता है कि हर साल 84 लाख टन पोषक तत्व बाढ़ आदि के कारण बह जाते हैं.

इसके अलावा कीटनाशकों के अंधाधुध इस्तेमाल के कारण हर साल एक करोड़ चार लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की उपजाऊ शक्ति नष्ट हो रही है. बाढ, लवणीयता और क्षारपन आदि के कारण भी हर साल 270 हज़ार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का बंजर होना भी निश्चित ही गंभीर चिंता का विषय है. अत्यधिक दोहन के कारण भी भू-जल स्तर में गिरावट आने से भी बंजर भूमि के क्षेत्र में बढ़ोतरी हो रही है. विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में पिछले पांच दशकों में भू-जल स्तर के इस्तेमाल में 125 गुना बढ़ोतरी हुई है. पहले एक तिहाई खेतों की सिंचाई भू-जल से होती थी, लेकिन अब क़रीब आधी कृषि भूमि की सिंचाई के लिए किसान भू-जल पर ही निर्भर है.

वर्ष 1947 में देश में एक हज़ार ट्यूबवेल थे, जो 1960 में बढ़कर एक लाख हो गए थे. समय के साथ-साथ इनकी संख्या में में वृध्दि होती गई. नतीजतन देश के देश के विभिन्न प्रदेशों के 360 ज़िलों के भू-जल स्तर में ख़तरनाक गिरावट आई है. हालत यह है कि 7928 जल मूल्यांकन इकाइयों में से 425 काली सूची में आ चुकी हैं और 673 मूल्यांकन इकाइयां अति संवेदनशील घोषित की गई हैं

लिहाज़ा, बंजर भूमि को खेती के लिए इस्तेमाल करने वाले किसानों को पर्याप्य प्रोत्साहन मिलना और भी ज़रूरी हो जाता है.

Saturday, April 24, 2010

आख़िर बच्ची को बूढ़े से निजात मिल ही गई...

दुनियाभर में शादी के नाम पर लड़कियों की ख़रीद-फ़रोख्त का सिलसिला जारी है... हालत यह है कि पूरी दुनिया में 'सभ्य' होने का ढोल पीटने वाले सऊदी अरब में भी लड़कियों को जानवरों की तरह बेचा और ख़रीदा जाता है.

सऊदी अरब में पिछले साल 12 साल की एक लड़की की मर्ज़ी के खिलाफ़ उसके परिवार वालों ने उसकी शादी उसके पिता के 80 वर्षीय चचेरे भाई से कर दी गई थी. बदले में उसके परिवारवालों को क़रीब साढ़े 14 हज़ार डालर मिले थे. इस ज़ुल्म के खिलाफ़ लड़की ने आवाज़ उठाई और रियाद के बुराइधा क़स्बे की एक अदालत में तलाक़ के लिए अर्ज़ी दाख़िल कर दी. लड़की की क़िस्मत अच्छी थी उसे तलाक़ मिल गई. राहत की बात यह भी है कि अब वहां की सरकार इस मसले पर पहली बार लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र तय करने पर गौर कर रही है.

मानवाधिकारों संगठनों ने भी लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 16 साल निश्चित करने की सिफ़ारिश की है. अब सरकार ने इस बारे में फ़ैसला लेने के लिए तीन समितियों का गठन किया है.

भारत में भी यह सिलसिला जारी है...

Monday, February 8, 2010

विश्व पुस्तक मेले में हमारी किताब


विश्व पुस्तक मेले में प्रभात प्रकाशन के स्टॉल पर हमारी किताब
यूं तो पुस्तक प्रेमियों को हमेशा ही विश्व पुस्तक मेले का बेसब्री से इंतज़ार रहता है...लेकिन इस बार बात अलग थी...क्योंकि हमारी किताब भी विश्व पुस्तक मेले में प्रदर्शित होने वाली थी...वो दिन भी आया जब राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान में लगे पुस्तक मेले में हमारी किताब 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' भी छाई रही... इसे ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह) ने शाया किया है. अपनी किताब को यहां देखकर बेहद ख़ुशी हुई...जैसा नाम से ही ज़ाहिर होता है...हमारी किताब गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ में 55 संतों और फ़क़ीरों  की वाणी एवं जीवन-दर्शन को प्रस्‍तुत किया गया है...

नेशलन बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित 19वां विश्व पुस्तक मेला राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान में 30 जनवरी को शुरू हुआ. सात फ़रवरी तक चले इस पुस्तक मेले का उदघाटन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने किया. इस मौक़े पर उन्होंने कहा कि विश्व पुस्तक मेला एक संवृद्ध विरासत है. इस पुस्तक मेले का मक़सद हज़ारों किताबों  को ज़्यादा से ज़्यादा  लोगों तक पहुंचाना है. अपने एक संदेश में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल  ने कहा कि किताबें मानव ज्ञान का भंडार हैं और यह महत्वपूर्ण है कि देश के पाठकों के लिए सभी क्षेत्र से जुड़ी पुस्तकें उपलब्ध हों.
देश-विदेश के तक़रीबन 1,200 प्रकाशकों ने पुस्तक मेले में अपनी किताबों की प्रदर्शनी लगाई. तक़रीबन  4,200 वर्गमीटर में फैले इस मेला क्षेत्र में 2,400 बुक स्टॉल लगाए गए.  इस साल पिछले साल से ज़्यादा स्टॉल लगे.  हालत यह रही कि हॉल के बाहर भी काफ़ी जगह प्रकाशकों को दी गई . मेले में तक़रीबन 90  फ़ीसदी अंग्रेजी की किताबें थीं.  अमेरिका और ब्रिटेन के बाद हिन्दुस्तान अंग्रेजी किताबों के प्रकाशन का तीसरा सबसे बड़ा देश है. हिन्दुस्तान दुनिया के बड़े पुस्तक बाजारों में एक है और इसी वजह से दुनियाभर के प्रकाशकों ने हिन्दुस्तान का रुख़ किया है. साल 2006 के फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेले में दूसरी बार अथिति देश होना, साल 2009 के लंदन पुस्तक मेले का ‘मार्केट फोकस’ होना और 2009 के मास्को पुस्तक मेले में अथिति देश होना पुस्तक बाज़ार में हिन्दुस्तान के महत्व को रेखांकित करता है. अन्य भाषाओं का ज़िक्र करें तो यहां 18 से ज़्यादा भाषाओं में किताबें प्रकाशित होती हैं.  यहां विभिन्न भाषाओं के 12 हज़ार से ज़्यादा प्रकाशक हैं, जो हर साल तक़रीबन एक लाख किताबें प्रकाशित करते हैं. यहां सबसे ज़्यादा किताबें क्षेत्रीय भाषाओं में छपती हैं. इनमें हिंदी पहले स्थान पर है.

इस बार का मेला राष्ट्रकुल खेल को समर्पित किया गया था. इस पुस्तक मेले की विषय वस्तु ‘रीडिंग अवर कॉमनवेल्थ’ यानी ‘हमारे साझा वैभव का अध्ययन’ थी. राष्ट्रकुल खेल के नाम एक पूरा पवेलियन था, जिसमें खेल से जुड़ी दुनियाभर की किताबें थीं.  इसके लिए कैटलॉग भी बनाया गया था, ताकि बाद में भी उन किताबों के बारे में विस्तृत जानकारी हासिल की जा सके. देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू पर अलग से किताबें प्रदर्शित की गईं . इनमें नेहरू पर लिखी दुनियाभर की किताबों को शामिल किया गया. मेले में एक बाल पवेलियन भी था, जिसमें अनेक एनजीओ द्वारा बच्चों की रचनात्मकता को प्रोत्साहित करने वाली गतिविधियां शामिल थीं.

ग़ौरतलब है कि मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय पुस्तक ट्रस्ट द्वारा हर दूसरे साल विश्व पुस्तक मेले का आयोजन किया जाता है. यह एक स्वायत्त संगठन है और इसका काम किताबों को बढ़ावा देना है. इसके अलावाब भारतीय व्यापार संवर्धन संगठन सह-संयोजक के तौर पर इस मेले में शामिल रहता है. यह भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के तत्वावधान में काम करता है. यह देश के व्यापार और उद्योगों के विकास के लिए काम करता है. विश्व  पुस्तक मेले के आयोजन का मक़सद जनमानस में किताबों के लिए दिलचस्पी  पैदा करना है.

नेशलन बुक ट्रस्ट द्वारा  द्विवार्षिक विश्व पुस्तक मेला पहली बार 1972 में दिल्ली के विंडसर पैलेस इलाक़े में लगा था. तक़रीबन 7780 वर्ग मीटर क्षेत्र में आयोजित इस मेले में 200 प्रकाशकों ने हिस्सा लिया था. अगली बार यानी 1976 में लगे दूसरे विश्व पुस्तक मेले में प्रकाशकों की तादाद बढ़कर 266 हो गई थी.  इस साल 42,839 वर्ग मीटर क्षेत्र में आयोजित 19वें विश्व पुस्तक मेले में 1234 प्रकाशकों ने शिरकत की. 2006 में आयोजित पुस्तक मेले में 10 लाख से ज़्यादा लोग आए थे, जबकि इस साल इनकी तादाद तक़रीबन 20 लाख तक पहुंच गई थी.

दुनियाभर के प्रकाशक सैकड़ों नई किताबें लेकर आए. प्रभात प्रकाशन के प्रमुख प्रभात कुमार ने बताया कि वे पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृषण आडवाणी की मेरा देश मेरा जीवन और फ़िरदौस ख़ान की किताब गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत के सहित कई अच्छी किताबें लेकर आए, जिन्हें बहुत सराहा गया. राजकमल प्रकाशन की किताबें भी मेले में छाई रहीं. किताब घर प्रकाशन के प्रमुख सत्यव्रत का कहना है कि वे 35 नईं किताबें लेकर आए. इनमें साहित्यिक पुस्तकों के अलावा ज्ञान-विज्ञान से संबंधित किताबें भी शामिल थीं. ओशियन बुक्स के निदेशक डॉ. पीयूष कुमार भी हिंदी और अंग्रेजी की सौ से ज़्यादा नई किताबें लाए., जिनमें हिंदी की किताबें ज़्यादा थीं. रॉली बुक्स और डायमंड बुक्स ने भी कई नई किताबें प्रदर्शित कीं.

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार कहते हैं- लेखिका चिन्तक है, सुधारवादी है, परिश्रमी है, निर्भय होकर सच्चाई के नेक मार्ग पर चलने की हिम्मत रखती है. विभिन्न समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में नानाविध विषयों पर उसके लेख छपते रहते हैं. ज़िंदगी में यह पुस्तक लेखिका को एवं समाज को ठीक मिशन के साथ मंज़िल की ओर बढ़ने का अवसर प्रदान करेगी. सफलताओं की शुभकामनाओं के साथ मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा उस पर उसकी कृपा सदैव बरसती रहे. मुझे विश्वास है कि प्रकाश स्तंभ जैसी यह पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ सभी देशवासियों को इस सच्ची राह पर चलने की हिम्मत प्रदान करेगी.



किताब का नाम : गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत 
लेखिका : फ़िरदौस ख़ान
पेज : 172
क़ीमत : 200 रुपये

प्रकाशक
ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह)
205 -सी, चावड़ी बाज़ार
दिल्ली-110006

प्रभात प्रकाशन 
4/19, आसफ़  अली रोड, दरियागंज
नई दिल्ली-110002
फ़ोन : 011 23289555

Ganga jamuni sanskriti ke agradoot written by Firdaus Khan


Saturday, January 30, 2010

सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी

फ़िरदौस ख़ान
सुप्रीम कोर्ट की उस ऐतिहासिक टिप्पणी से मुस्लिम महिलाओं को काफ़ी राहत मिलेगी, जिसमें कोर्ट ने कहा है कि पहली पत्नी के रहते कोई भी सरकारी कर्मचारी दूसरा विवाह नहीं कर सकता. दरअसल, कोर्ट ने राजस्थान सरकार के उस फ़ैसले को सही क़रार दिया है, जिसमें एक मुस्लिम कर्मचारी लियाक़त अली को दूसरी शादी करने की वजह से नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि पहली पत्नी के रहते कोई भी सरकारी कर्मचारी दूसरा विवाह नहीं कर सकता. अगर कोई सरकारी कर्मचारी ऐसा करता है तो उसे सरकारी नौकरी से बर्ख़ास्त करना सही है.

क़ाबिले-गौर है कि राजस्थान सरकार की ओर से जारी बयान के मुताबिक़ सुप्रीम कोर्ट ने यह फ़ैसला राज्य सरकार के ख़िलाफ़ पुलिस कांस्टेबल लियाक़त अली की विशेष अनुमति याचिका पर दिया है. इससे पहले जस्टिस वी.एस.सिरपुरकर और जस्टिस आफ़ताब आलम की पीठ ने राजस्थान सरकार की इस दलील को मंज़ूर कर लिया कि राजस्थान सिविल सर्विसेज (कंडक्ट) रूल 1971 के नियम 25 (1) के अनुसार सरकारी कर्मचारी पहली पत्नी के जीवित होते दूसरा विवाह नहीं कर सकता. इस मामले में लियाक़त अली ने दलील दी थी कि उसने अपनी पहली पत्नी फ़रीदा खातून से मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक़ लेने के बाद मकसूदा खातून से दूसरा निकाह किया है, जबकि जांच में पाया गया कि उसने पहली पत्नी से तलाक़ लिए बिना मकसूदा से दूसरा निकाह किया है.

सुप्रीम कोर्ट ने 1986 के इस प्रकरण में गत 25 जनवरी को विशेष अनुमति याचिका की सुनवाई की. शीर्ष कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट की डबल बैंच के 2008 के लियाकत अली के ख़िलाफ़ दिए फैसले को बरक़रार रखा और राजस्थान सिविल सर्विसेज 1971 का संदर्भ देते हुए याचिका को ख़ारिज कर दिया. राजस्थान हाईकोर्ट ने भी लियाक़त अली की बर्ख़ास्तगी को सही ठहराया था. राजस्थान के कर्मचारियों के संबंध में बने सेवा नियमों में स्पष्ट है कि सरकारी कर्मचारी पहली पत्नी के जीवित होते हुए दूसरा विवाह नहीं कर सकता. इन नियमों में विवाह के मामले को धर्म से संबंधित नहीं माना गया. यही वजह थी कि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के नीति निर्देशक तत्वों के संदर्भ में कामन सिविल राइट के मामले में सरकार को कॉमन सिविल कोड बनाने का निर्देश दिया था.

मुस्लिम समाज में महिलाओं की हालत बेहद बदतर है। सच्चर समिति की रिपोर्ट के आंकड़े भी इस बात को साबित करते हैं कि अन्य समुदायों के मुक़ाबले मुस्लिम महिलाएं आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से ख़ासी पिछड़ी हुई हैं. यह एक कड़वी सच्चाई है कि मुस्लिम महिलाओं की बदहाली के लिए 'धार्मिक कारण' काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं। इनमें बहुपत्नी विवाह और तलाक़ के मामले मुख्य रूप से शामिल हैं।

बहरहाल, यही कहा जा सकता है कि राजस्थान सरकार का यही नियम अगर देशभर में लागू कर दिया जाए तो मुस्लिम महिलाओं की सामजिक हालत कुछ बेहतर होने की उम्मीद की जा सकती है.

Thursday, December 3, 2009

भोपाल गैस कांड : अब सरकारी और प्रशासनिक अवहेलना का दंश झेल रहे हैं पीड़ित


फ़िरदौस ख़ान
इतिहास की सबसे बुरी औद्योगिक त्रासदी कहे जाने वाले भोपाल गैस कांड को आज 25 साल पूरे हो गए हैं. इंसाफ़ की राह तकते-तकते पीड़ितों की आंखें पथरा गई हैं, लेकिन ढाई दशक बीतने के बाद भी उन्हें केवल कोरे आश्वासन ही मिल रहे हैं. इस कांड के इतने लंबे अरसे बाद भी भोपाल गैस कांड के पीड़ित सरकारी और प्रशासनिक अवहेलना के दंश को झेलने को मजबूर हैं.

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश के भोपाल शहर में 2 दिसम्बर 1984 की रात को एक खौफनाक औद्योगिक हादसा हुआ, जिसे भोपाल गैस कांड के नाम से जाना जाता है. भोपाल स्थित यूनियन कार्बाईड नामक कम्पनी के कारखाने से बेहद ज़हरीली मिथाइल आइसोनेट गैस का रिसाव हुआ जिससे हज़ारों लोगों की मौत हो गई थी और बेतादाद लोग अंधे हो गए थे. यह हादसा इतना खतरनाक था कि इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर भी देखने को मिला. बच्चे अपंग पैदा हुए और कितने ही महिला-पुरुषों की प्रजनन क्षमता पर भी विपरीत असर पड़ा.

सरकार पर पीड़ितों की अनदेखी के आरोप लगते रहे हैं. आरोप यह भी है कि इतने भीषण हादसे के बावजूद दोषियों के खिलाफ कारवाई नहीं की गई. बताया जाता है कि हादसे के वक़्त एंडरसन यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन (यूसीसी) का मुख्य कार्यकारी अधिकारी था. इस हादसे में 3,500 लोगों की मौत उसी वक़्त मौत हो गई थी. स्वयंसेवी संगठनों के मुताबिक़ दुर्घटना के 72 घंटों के भीतर 10,000 लोग मौत का शिकार हो गए थे और अब तक क़रीब 25,000 इस हादसे की वजह से अपनी जान गंवा चुके हैं. सनद रहे कि यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड की स्थापना वर्ष 1969 में हुई थी. इसकी 50.9 फ़ीसद हिस्सेदारी यूनियन कार्बाइड के पास और 49.1 प्रतिशत हिस्सेदारी भारतीय निवेशकों के पास थी. इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थान भी शामिल थे.

हालांकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कल संसद में गैस कांड के पीड़ितों को प्रति संवेदना जताते हुए दिलासा दिया कि सरकार उनसे जुड़े हर पहलू पर ध्यान देगी. लेकिन सवाल यह है कि जब तक भोपाल गैस कांड के दोषियों को सज़ा नहीं मिल पाती, क्या पीड़ितों के परिजनों को सुकून मिल पाएगा, जो इस हादसे में अपने प्रियजनों को गंवा चुके हैं. कोरे आश्वासन पीड़ितों के ज़ख्मों पर मरहम का काम करेंगे या उनके ज़ख्मों को और हरा करेंगे. इसे सहज ही महसूस किया जा सकता है.

इस हादसे की 25वीं बरसी पर आज देशभर में प्रदर्शन निकाले जा रहे हैं और रैलियां की जा रही हैं.

Thursday, October 8, 2009

फ्रांस की टूरिज़्म कंपनी ने ख़रीदा बापू का अफ़्रीकी घर

फ़िरदौस ख़ान
दक्षिण अफ्रीका के जोहांसबर्ग में स्थित महात्मा गांधी के ऐतिहासिक घर को फ्रांस की एक टूरिज़्म कंपनी ने खरीद लिया है...भारत सरकार ने महात्मा गांधी के जोहानिसबर्ग मकान के सूथेबी नीलामी घर के ज़रिये एक फ्रांसीसी कंपनी के हाथ में चले जाने पर अफ़सोस ज़ाहिर किया है. साथ ही कहा है कि सरकार एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के ज़रिये इस विरासत को हासिल करने की कवायद जारी रखेगी.

कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा है कि यह राष्ट्रीय भावनाओं से जुड़ा मामला है और इस ऐतिहासिक संपत्ति को हासिल करने और इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित करवाने के लिए हरसंभव प्रयास किया जाएगा. कोयला मंत्रालय के तहत आने वाले कोल इंडिया लि. ने इस मकान को हासिल करने के लिए इसके मालिक से संपर्क किया था और मंत्रालय इसके लिए कोई भी क़ीमत चुकाने को तैयार था. इसके लिए बातचीत जारी थी, लेकिन एक महीने की मोहलत दिए जाने के बावजूद उन्होंने सीआईएल से संपर्क नहीं किया. उन्होंने कहा कि सीआईएल निदेशक मंडल ने यह तय किया है कि इस बापू की इस विरासत को हासिल करने के लिए इसके कर्मचारी अपने एक दिन का वेतन देंगे, जबकि वे एक माह का वेतन देंगे, साथ ही अन्य स्रोतों से धन इकट्ठा करेंगे. जायसवाल ने बताया कि इस साल अगस्त में दक्षिण अफ्रीका की यात्रा के दौरान उन्होंने इस मकान का मुआयना किया था.

गौरतलब है कि पुरानी शैली के खपरैल की छत वाले इस मकान में गांधी जी 1908 से 1910 तक रहे थे. उन्होंने यहां से सत्याग्रह आंदोलन का नेतृत्व किया था. इस घर को उस वक़्त के मशहूर आर्किटेक्ट हरमन क्लेनबाक ने डिज़ाइन किया था. जोहांसबर्ग में बापू जुड़े कई अन्य यादगार स्थल भी हैं. इनमें मध्य जोहांसबर्ग में स्थित गांधी स्क्वायर, जोहांसबर्ग जेल, जहां बापू को एक बार कैद किया गया था, द विक्ट्री हाउस जहां वह वकालत किया करते थे. यहां हिंदुओं का अंतिम संस्कार गृह भी है, जिसे बापू ने बनवाया था. इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका के डरबन और पीटरमारित्जबर्ग में भी बापू जुड़े कई अन्य स्थल भी हैं, जो भारतीयों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र हैं.

बताया जाता है कि पेरिस स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध कंपनी वायजेयू द मांड ने जोहानिसबर्ग के उपनगरीय क्षेत्र स्थित द कराल नामक इस मकान को बिक्री के लिए मांगे गए तीन लाख 77029 डॉलर की क़ीमत से दोगुनी रक़म चुकाकर इसे हासिल किया है.

बापू की इस विरासत को हासिल करने की सरकार की कवायद का क्या नतीजा निकलेगा, यह तो आने वाले वाला वक़्त ही बताएगा...फ़िलहाल तो यह विरासत सरकार के हाथ से निकल ही चुकी है...

Friday, October 2, 2009

भारत के खिलाफ़ चीन की नई साज़िश

फ़िरदौस ख़ान
यह ख़बर वाक़ई हैरतअंगेज़ है कि चीनी दूतावास ने हाल ही में कुछ कश्मीरियों को वीज़ा देने के लिए अलग पन्नों का इस्तेमाल किया है. यह पासपोर्ट के ही पन्नों पर वीज़ा की मोहर लगाने की आम प्रक्रिया के बिलकुल अलग है. हालांकि भारत ने इस पर सख्त ऐतराज़ जताते हुए चीन से शिकायत भी की है...क़ाबिले-गौर है कि इससे पहले चीन ने ऐसी हरकतें अरुणाचल प्रदेश के लोगों वीज़ा देने में भी की हैं. पूर्वोत्तर के इस सूबे पर अपना दावा जताने वाला चीन इस इलाक़े के लोगों के भारतीय पासपोर्ट मंज़ूर करने से कतराता रहा है. इस मुद्दे पर भी भारत लगातार चीन से विरोध दर्ज कराता रहा है, लेकिन नतीजा हमेशा सिफ़र ही रहा.

बहरहाल, दिल्ली स्थित चीनी दूतावास ने कश्मीरियों को वीज़ा देने में जो नई नीति अपनाई है, उसे देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि सीमापार से विघटनकारी कारनामों के ज़रिये भारत की परेशानी का सबब बने चीन ने अब यह काम देश के भीतर से भी शुरू कर दिया है. चीन के इस क़दम से सुरक्षा के लिए ख़तरा पैदा हो सकता है, क्योंकि पासपोर्ट पर लगे वीज़ा के बगैर पासपोर्ट धारकों की यात्रा के सही रिकार्ड का पता नहीं चलेगा.

भारतीय खेमा मान रहा है कि चीन ने इस तरह से कश्मीर को भारत का हिस्सा होने पर सवालिया निशान लगाने की कोशिश की है. बताया जा रहा कि आब्रजन ब्यूरो को भी यह कह दिया गया है कि इस तरह से दिए गए वीज़ा को फ़ौरन ही नामंज़ूर कर दिया जाए.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विष्णु प्रकाश का कहना है कि 'यह हमेशा से हमारा रुख रहा है कि वीज़ा चाह रहे भारतीय नागरिकों के साथ उनके निवास प्रदेश या जातीय आधार पर कोई भी भेदभाव न हो.' इस मामले को चीनी दूतावास और बीजिंग में विदेश मंत्रालय के सामने उठाया गया है. इस बारे में चीनी दूतावास के एक प्रवक्ता ने इन सभी वीज़ों को वैध क़रार दिया है. समझा जाता है कि विदेश मंत्री एसएम कृष्णा चीन के विदेश मंत्री यांग जेइची के 26-27 अक्टूबर के भारतीय दौरे के दौरान इस मुद्दे को उठा सकते हैं. गौरतलब है कि जेइची बेंगलुरू में होने वाली भारत, चीन और रूस के विदेश मंत्रियों की त्रिपक्षीय बैठक में शिरकत के लिए यहां आएंगे.

फ़िलहाल तो यही कहा जा सकता है कि सीमा में घुसपैठ की खबरों के बाद चीन द्वारा हाल ही में जम्मू एवं कश्मीर राज्य के निवासियों को अलग वीज़ा देने की कार्रवाई से दोनों देशों के बीच अविश्वास पैदा होने का ख़तरा बढ़ गया है...

Thursday, October 1, 2009

चीन लोक गणराज्य की स्थापना की 60वीं वर्षगांठ आज


फ़िरदौस ख़ान
आज चीन लोक गणराज्य की स्थापना की 60वीं वर्षगांठ हैं और नए चीन के राजनयिक कार्य चलाने की 60वीं वर्षगांठ भी...पहली अक्टूबर 1949 में सर्वगीय अध्यक्ष माओ च्ये तुंग ने पेइचिंग में चीन लोक गणराज्य की स्थापना का ऐलान किया था. साथ ही घोषणा की कि चीन समानता, आपसी लाभ व दूसरों के देशों की प्रादेशिक अखंडता का सम्मान करने वाले सभी देशों की सरकारों के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करना चाहता है. पिछले 60 बरसों में चीन के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने वाले देशों की संख्या पहले के 18 से बढ़कर 171 हो गई है.

यह अफ़सोस की बात है कि... भारत और चीन के बीच जंग हुए क़रीब 47 साल बीतने के बावजूद वहां के बाशिंदे आज भी भारत को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं...हालांकि इन तल्खियों का का दावा करते हुए ब्रिटिश अखबार संडे टाइम्स ने यह भी बताया है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) में शामिल लोगों की अपने मुल्क के प्रति निष्ठा कम हो रही है...

हाल ही में चीन के राष्ट्रीय दिवस के मौके पर लिखे अखबार के एक लेख में कहा गया है, ‘बीजिंग में हर कोई अपने विदेश मंत्रालय की तरह रेशमी जुबान नहीं बोलता है. वहां ज्यादातर जिस दुश्मन की बात होती है, वह भारत ही होता है.’ रिपोर्ट के मुताबिक चीन में सेंसर के बावजूद तिब्बत के पठार को बचाने के लिए भारत के साथ जंग के मुद्दे के नफ़ा-नुक़सान के मुख्तलिफ को लेकर इंटरनेट पर बेबाक चर्चा की इजाज़त दी जा रही है.

चीन में गणराज्य की स्थापना की 60वीं वर्षगांठ के मौके पर अखबार ने अपने लेख में लिखा है कि इस मौके पर आधुनिक चीन के इतिहास की सबसे भव्य परेड देखी जा सकती है. परेड में नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों, बैलिस्टिक मिसाइलों, टैंकों और राइफलों के प्रदर्शन का दर्शन होगा. अलबत्ता, इसे चीन का शक्ति प्रदर्शन कहना ग़लत न होगा...

चीनी विदेश मंत्री यांग च्ये छी ने कहा कि पिछले 60 सालों में चीन विभिन्न देशों के साथ घनिष्ठ सहयोग व जिम्मेदाराना रूख से विभिन्न अन्तरराष्ट्रीय विवादों को हल करने में भाग लेता आया है, चीन ने विश्व शान्ति, विकास व सहयोग कार्य के लिए महत्वपूर्ण योगदान किया है. चीन का राजनयिक कार्य चीन के शक्तिशाली होने के चलते निरंतर आगे कदम बढ़ा रहा है.

गौरतलब है कि जनवादी गणराज्य चीन जिसको प्रायः चीन से जाना जाता है, दुनिया में सबसे ज़्यादा आबादी वाला देश है और क्षेत्रफल की दृष्टि से इसका स्थान तीसरा है. इतने बड़े भूखंड पर स्थित होने के कारण इसके पड़ोसियों की संख्या भी अधिक है. उत्तर में रूस, कोरिया तथा मंगोलिया, पश्चिम में कजाकस्तान, भारतीय और पाकिस्तानी कश्मीर, अफ़ग़ानिस्तान तथा उत्तरी भारत दक्षिण में भारत, नेपाल तथा बर्मा तथा दक्षिण पश्चिम में थाईलैंड, कम्बोडिया तथा वियतनाम है. उत्तर-पूर्व में जापान मुख्य भूमि से दूर स्थित है. चीन ताईवान को अपना स्वायत्त क्षेत्र कहता है, जबकि ताईवान का प्रशासन खुद को स्वतंत्र राष्ट्र कहता है. 1949 के गृहयुद्ध में जीत मिलने के बाद समाजवादियों ने चीन की सत्ता पर अधिकार किया और ताईवान तथा उससे सटे क्षेत्रों पर पुराने शासकों का अधिपत्य हुआ. इसके बाद से मुख्य चीन को चीन का जनवादी गणराज्य तथा ताईवान को चीनी गणराज्य कहा जाता है. यहां की मुख्य भाषा चीनी है जिसका पांपरिक तथा आधुनिक रूप दोनों प्रयुक्त होता है. प्रमुख नगरों में पेइचिंग तथा शंगहाई का नाम आता है.

चीन की सभ्यता विश्व की पुरातनतम सभ्यताओं में से एक है. इसका चार हज़ार वर्ष पुराना लिखित इतिहास है. यहां तरह-तरह के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक ग्रन्थ और पुरातन संस्कृति के अवशेष पाए गए हैं. दुनिया के अन्य राष्ट्रों की तरह चीनी राष्ट्र भी अपने विकास के दौरान आदिम समाज, दास समाज और सामन्ती समाज की मंजिलों से गुजरा था. ऐतिहासिक विकास के इस लम्बे दौर में, चीनी राष्ट्र की विभिन्न जातियों की परिश्रमी, साहसी और बुद्धिमान जनता ने अपने संयुक्त प्रयासों से एक शानदार और ज्योतिर्मय संस्कृति का सृजन किया, तथा समूची मानवजाति के लिये भारी योगदान भी किया. यह उन गिने चुने सभ्यताओं में एक है जिन्होंने प्राचीन काल में अपनी स्वतंत्र लेखन पद्धति का विकास किया. अन्य सभ्यताओं के नाम हैं- प्राचीन भारत (सिंधु घाटी सभ्यता), मेसोपोटामिया की सभ्यता, मिस्र और माया सभ्यता. चीनी लिपि अब भी चीन, जापान के साथ साथ आंशिक रूप से कोरिया तथा वियतनाम में प्रयुक्त होती है. पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर चीन में मानव बसाव लगभग साढ़े बाईस लाख (22.5 लाख) साल पुराना है.