Monday, May 19, 2014

ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल



क्या आपका वोट उसी उम्मीदवार के खाते में गया है, जिसे आपने वोट डाला था...?
इलेक्ट्रॊनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं. सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी के मुताबिक़ ख़ुद चुनाव आयोग ने ईवीएम हैकिंग को पकड़ा है, जहां किसी भी बटन को दबाने पर वोट भाजपा के खाते में ही गया था, लेकिन इसके बावजूद कोई कार्रवाई नहीं गई. उन्होंने एक फ़िल्म के ज़रिये समझाया था कि कैसे ईवीएम की मॉस हैकिंग की जा सकती है, मतलब एक साथ हज़ारों मशीनों से मनपसंद वोट डलवाए जा सकते हैं. उन्होंने बैलेट पेपर्स से चुनाव कराए जाने की मांग की थी, जिससे वोट करने वाले को पता रहे कि उसका वोट किस उम्मीदवार को पड़ा है.
ईवीएम में धांधली की कई ख़बरें सामने आ रही हैं. इसकी निष्पक्ष जांच होनी ही चाहिए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके...



Indian voting machines Hacked

Sunday, May 11, 2014

ज़मीं पर ईश्वर का प्रतिरूप है मां...

फ़िरदौस ख़ान
क़दमों को मां के इश्क़ ने सर पे उठा लिया
साअत सईद दोश पे फ़िरदौस आ गई...
ईश्वर ने जब कायनात की तामीर कर इंसान को ज़मीं पर बसाने का तसव्वुर किया होगा...यक़ीनन उस वक़्त मां का अक्स भी उसके ज़हन में उभर आया होगा... जिस तरह सूरज से यह कायनात रौशन है...ठीक उसी तरह मां से इंसान की ज़िन्दगी में उजाला बिखरा है...तपती-झुलसा देने वाली गर्मी में दरख़्त की शीतल छांव है मां...तो बर्फ़ीली सर्दियों में गुनगुनी धूप का अहसास है मां...एक ऐसी दुआ है मां, जो अपने बच्चों को हर मुसीबत से बचाती है... मां, जिसकी कोख से इंसानियत जनमी...जिसके आंचल में कायनात समा जाए...जिसकी छुअन से दुख-दर्द दूर हो जाएं...जिसके होठों पर दुआएं हों... जिसके दिल में ममता हो और आंखों में औलाद के लिए इंद्रधनुषी सपने सजे हों...ऐसी ही होती है मां...बिल्कुल ईश्वर के प्रतिरूप जैसी...ईष्वर के बाद मां ही इंसान के सबसे क़रीब होती है...

सभी नस्लों में मां को बहुत अहमियत दी गई है. इस्लाम में मां का बहुत ऊंचा दर्जा है. क़ुरआन की सूरह अल अहक़ाफ़ में अल्लाह फ़रमाता है-"हमने मनुश्य को अपने मां-बाप के साथ अच्छा बर्ताव करने की ताक़ीद की. उसकी मां ने उसे (पेट में) तकलीफ़ के साथ उठाए रखा और उसे तकलीफ़ के साथ जन्म भी दिया। उसके गर्भ में पलने और दूध छुड़ाने में तीस माह लग गए." हज़रत मुहम्मद सलल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि "‘मां के क़दमों के नीचे जन्नत है." आपने एक हदीस में फ़रमाया है-"‘मैं वसीयत करता हूं कि इंसान को मां के बारे में कि वह उसके साथ नेक बर्ताव करे." एक हदीस के मुताबिक़ एक व्यक्ति ने हज़रत मुहम्मद साहब से सवाल किया कि- इंसानों में सबसे ज़्यादा अच्छे बर्ताव का हक़दार कौन है? इस पर आपने जवाब दिया-तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने दोबारा वही सवाल किया. आपने फ़रमाया-तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने तीसरी बार फिर वही सवाल किया. इस बार भी आपने फ़रमाया कि तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने चौथी बार फिर भी यही सवाल किया. आपने कहा कि तुम्हारा पिता. यानी इस्लाम में मां को पिता से तीन गुना ज़्यादा अहमियत दी गई है. इस्लाम में जन्म देने वाली मां के साथ-साथ दूध पिलाने और परवरिश करने वाली मां को भी ऊंचा दर्जा दिया गया है. इस्लाम में इबादत के साथ ही अपनी मां के साथ नेक बर्ताव करने और उसकी ख़िदमत करने का भी हुक्म दिया गया है. कहा जाता है कि जब तक मां अपने बच्चों को दूध नहीं बख़्शती तब तक उनके गुनाह भी माफ़ नहीं होते.

भारत में मां को शक्ति का रूप माना गया है. हिन्दू धर्म में देवियों को मां कहकर पुकारा जाता है. धन की देवी लक्ष्मी, ज्ञान की देवी सरस्वती और शक्ति की देवी दुर्गा को माना जाता है. नवरात्रों में मां के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना का विधान है. वेदों में मां को पूजनीय कहा गया है. महर्षि मनु कहते हैं-दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्या होता है, सौ आचार्यों के बराबर एक पिता होता है और एक हज़ार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण मां होती है। तैतृयोपनिशद्‌ में कहा गया है-मातृ देवो भव:. इसी तरह जब यक्ष ने युधिष्ठर से सवाल किया कि भूमि से भारी कौन है तो उन्होंने जवाब दिया कि माता गुरुतरा भूमे: यानी मां इस भूमि से भी कहीं अधिक भारी होती है. रामायण में श्रीराम कहते हैं- जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी यानी जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. बौद्ध धर्म में महात्मा बुद्ध के स्त्री रूप में देवी तारा की महिमा का गुणगान किया जाता है.

यहूदियों में भी मां को सम्मान की दृश्टि से देखा जाता है. उनकी धार्मिक मान्यता के मुताबिक़ कुल 55 पैग़म्बर हुए हैं, जिनमें सात महिलाएं थीं. ईसाइयों में मां को उच्च स्थान हासिल है. इस मज़हब में यीशु की मां मदर मैरी को सर्वोपरि माना जाता है. गिरजाघरों में ईसा मसीह के अलावा मदर मैरी की प्रतिमाएं भी विराजमान रहती हैं. यूरोपीय देशों में मदरिंग संडे मनाया जाता है. दुनिया के अन्य देशों में भी मदर डे यानी मातृ दिवस मनाने की परंपरा है. भारत में मई के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाया जाता है. चीन में दार्शनिक मेंग जाई की मां के जन्मदिन को मातृ दिवस के तौर पर मनाया जाता है, तो इज़राईल में हेनेरिता जोल के जन्मदिवस को मातृ दिवस के रूप में मनाकर मां के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है. हेनेरिता ने जर्मन नाज़ियों से यहूदियों की रक्षा की थी. नेपाल में वैशाख के कृष्ण पक्ष में माता तीर्थ उत्सव मनाया जाता है. अमेरिका में मई के दूसरे रविवार को मदर डे मनाया जाता है. इस दिन मदर डे के लिए संघर्ष करने वाली अन्ना जार्विस को अपनी मुहिम में कामयाबी मिली थी. इंडोनेशिया में 22 दिसंबर को मातृ दिवस मनाया जाता है. भारत में भी मदर डे पर उत्साह देखा जाता है.

मां बच्चे को नौ माह अपनी कोख में रखती है. प्रसव पीड़ा सहकर उसे इस संसार में लाती है. सारी-सारी रात जागकर उसे सुख की नींद सुलाती है. हम अनेक जनम लेकर भी मां की कृतज्ञता प्रकट नहीं कर सकते. मां की ममता असीम है, अनंत है और अपरंपार है. मां और उसके बच्चों का रिश्ता अटूट है. मां बच्चे की पहली गुरु होती है. उसकी छांव तले पलकर ही बच्चा एक ताक़तवर इंसान बनता है. हर व्यक्ति अपनी मां से भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है. वो कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए, लेकिन अपनी मां के लिए वो हमेशा उसका छोटा-सा बच्चा ही रहता है. मां अपना सर्वस्व अपने बच्चों पर न्यौछावर करने के लिए हमेशा तत्पर रहती है. मां बनकर ही हर महिला ख़ुद को पूर्ण मानती है.

कहते हैं कि एक व्यक्ति बहुत तेज़ घुड़सवारी करता था. एक दिन ईश्वर ने उस व्यक्ति से कहा कि अब ध्यान से घुड़सवारी किया करो. जब उस व्यक्ति ने इसकी वजह पूछी तो ईश्वर ने कहा कि अब तुम्हारे लिए दुआ मांगने वाली तुम्हारी ज़िन्दा नहीं है. जब तक वो ज़िन्दा रही उसकी दुआएं तुम्हें बचाती रहीं, मगर उन दुआओं का साया तुम्हारे सर से उठ चुका है. सच, मां इस दुनिया में बच्चों के लिए ईश्वर का ही प्रतिरूप है, जिसकी दुआएं उसे हर बला से महफ़ूज़ रखती हैं. मातृ शक्ति को शत-शत नमन...

Friday, April 25, 2014

मीडिया...


फ़िलहाल हिन्दुस्तानी मीडिया ख़ासकर इलेक्ट्रॊनिक मीडिया का जो चेहरा सामने आया है, उसे देखते हुए यह कहना ग़लत न होगा कि अगर आतंकवादी संगठन भी हिन्दुस्तान में दस करोड़ रुपये ख़र्च कर दें, तो ये देश में उनकी भी लहर बनवा देंगे... हिन्दुस्तानी मीडिया आज देश-दुनिया को यही संदेश दे रहा है...
वाक़ई देश के लिए यह बहुत शर्म की बात है...
  • इस चुनाव के नतीजे जो भी रहें, लेकिन हिन्दुस्तानी मीडिया ख़ासकर इलेक्ट्रॊनिक मीडिया की साख ज़रूर गिर गई है... पहले लोग आंख मूंद कर मीडिया पर भरोसा करते थे, लेकिन अब वह भरोसा ख़त्म हो गया है... 

Thursday, April 24, 2014

अपनी पृथ्वी को बचाएं...


पृथ्वी हमारे जीवन का मूल आधार है... जल, जंगल और ज़मीन के बिना जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती... पृथ्वी है, तो हम हैं... इसलिए अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए हमें अपनी पृथ्वी को बचाना ही होगा... पृथ्वी को बचाने के लिए हमें जल, जंगल और ज़मीन को बचाना होगा... और यह तभी मुमकिन है, जब बढ़ती आबादी पर रोक लगाई जाए... क्योंकि यह लगातार बढ़ती आबादी ही है, जो जल, जंगल और ज़मीन को निग़लती जा रही है...

आओ !
अपनी पृथ्वी को बचाएं...
कुछ पेड़ लगाएं...
थोड़ा पानी बचाएं...
बढ़ती आबादी प रोक लगाएं
अपनी पृथ्वी को बचाएं...

Monday, March 3, 2014

हमारे लेख फिर चोरी हुए...


एक महान (?) व्यक्ति है. उसका एक ब्लॊग Behind The Curtains - Bollywood है, जो उसने अपने माता-पिता को समर्पित किया है... ख़ास बात यह है कि उसने अपने ब्लॊग में चोरी के लेख पोस्ट किए हैं... अपने दो लेखों (मीना कुमारी और प्रिया राजवंश पर लिखे) पर अभी हमारी नज़र पड़ी...
इस व्यक्ति ने हमारे लेख अपने ब्लॊग पर पोस्ट करने से पहले इजाज़त लेनी लेना तो दूर, हमारे लेखों
चांद तन्हा, आसमां तन्हा और प्रिया राजवंश : परी कथा सी ज़िंदगी )
से हमारा नाम तक ग़ायब कर दिया... साथ ही लेख के शीर्षक भी बदल दिए, शायद इस व्यक्ति ने सोचा होगा कि लेखों के शीर्षक बदलने से वे पकड़ में नहीं आएंगे...

पता नहीं इस महान (?) व्यक्ति ने कितने लोगों के लेख चोरी करके अपने माता-पिता को समर्पित किए होंगे...?
उसके माता-पिता को अगर यह बात पता चले, तो उन्हें कैसा लगेगा...?

हम इस चोरी के ख़िलाफ़ अपना ऐतराज़ दर्ज करते हैं...

तस्वीर : गूगल से साभार

Tuesday, January 7, 2014

छवि...


सियासी दल चुनाव के क़रीब आते ही अपने नेताओं की छवि सुधारने के लिए विदेशी कंपनियों को अरबों रुपये देते हैं... ज़ाहिर है, जो पार्टियां ऐसा करती हैं, जनता के बीच उनके नेताओं की छवि अच्छी नहीं होती... अब जनता जागरूक हो चुकी है, वह किसी विदेशी कंपनी के झांसे में आने वाली नहीं है...
कितना अच्छा होता, अगर इन सियासी दलों के नेता विदेशी कंपनियों पर अरबों रुपये लुटाने की बजाय ये पैसा अपने ही देश की ग़रीब जनता की भलाई के लिए ख़र्च कर देते...
फिर उन्हें अपनी छवि (फ़र्ज़ी) बनाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती... काश! इस मुल्क के नेताओं में इतनी समझ आ जाती... 

Friday, January 3, 2014

सबक़


कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सियासत में आम आदमी के दख़ल की बात कही... वे जनता के बीच भी गए... अपने स्तर पर वे जो कर सकते थे, कुछ हद तक उन्होंने किया... लेकिन उनके साथी कांग्रेसियों ने इसे संजीदगी से नहीं लिया... वे हमेशा चमचमाते कपड़ों, महंगी गाड़ियों और एसी कमरों तक ही सीमित रहे...  नतीजतन, केजरीवाल ने आम आदमी की बात करके दिल्ली की सत्ता हासिल कर ली... विधानसभा चुनाव के नतीजों से कांग्रेस नेताओं ने अब भी सबक़ नहीं लिया, तो आने वाला वक़्त उनके और उनकी पार्टी के लिए और भी बुरा हो सकता है...
फ़िरदौस ख़ान

Wednesday, November 27, 2013

क्या सैफ़ की समाज के प्रति कोई ज़िम्मेदारी नहीं...


फ़िरदौस ख़ान
पिछले हफ़्ते की बात है, हम अपनी एक रिश्तेदार के घर गए. सोचा बच्चों के लिए चॊकलेट ले चलें. उसकी गली में एक दुकान पर LAYS चिप्स के पैकेट देखकर हैरानी हुई.  हैरानी इस बात कि दुकानदार मुस्लिम हैं. सफ़ेद कुर्ता पायजामा पहने, हमेशा सर पर टोपी पहनने वाले नमाज़ी बुज़ुर्ग. हमने उनसे पूछा कि क्या आप जानते हैं कि  LAYS चिप्स में सूअर की चर्बी होती है? वह हैरानी से हमें देखने लगे, जैसे हमने कोई अनोखी बात पूछ ली हो. दरअसल, उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी. हमारे बताने पर वह कहने लगे कि वह अब कभी अपनी दुकान पर LAYS चिप्स नहीं रखेंगे, और ये पैकेट भी हटा देंगे. हमने उनसे कहा कि आप अपने साथी दुकानदारों को भी इस बारे में जानकारी दीजिएगा. और हां, जो बच्चे और बड़े LAYS चिप्स ख़रीदने आएं, उन्हें भी ये जानकारी ज़रूर दीजिएगा.

कुछ अरसा पहले जब Maggi और LAYS चिप्स में सूअर की चर्बी पाए जाने पर हंगामा हुआ था और कुछ मुस्लिम देशों में Maggi और LAYS चिप्स जैसे उत्पादों पर रोक लगाई गई थी. तब भी हमने अपने फ़्लैट्स की इमारत में बनी दुकानें चलाने वालों को इस बारे में बताया था और उन्होंने  Maggi और LAYS चिप्स रखना बंद कर दिया था.

जिन पदार्थों पर  E100, E110, E120, E 140, E141, E153, E210, E213, E214, E216, E234, E252,E270, E280, E325, E326, E327, E334, E335, E336, E337, E422, E430, E431, E432, E433, E434, E435, E436, E440, E470, E471, E472, E473, E474, E475,E476, E477, E478, E481, E482, E483, E491, E492, E493, E494, E495, E542,E570, E572, E631, E635, E904 लिखा दिखे, तो समझ लीजिए कि इसमें सूअर की चर्बी है.

हमें यह देखकर हैरानी होती है कि छोटे नवाब यानी सैफ़ अली ख़ान LAYS चिप्स का विज्ञापन बड़ी शान से करते हैं. LAYS चिप्स में सूअर की चर्बी होती है.  इसके पैकेट पर इस बारे में संकेत भी दिया गया है, यानी  E631 लिखा गया है, जिसका मतलब है सूअर की चर्बी. इसके बावजूद सैफ़ अली ख़ान  LAYS चिप्स बेचते हैं.
हो सकता है कि उन्हें सूअर की चर्बी खाने में कोई बुराई नज़र नहीं आती हो, लेकिन जो लोग इसे हराम समझते हैं, उनका ईमान क्यों ख़राब किया जाए?
जो इंसान, जो चीज़ नहीं खाता, उसे धोखे से वह चीज़ खिलाना ग़लत है, बिल्कुल ग़लत.

हिंदुस्तान में करोड़ों लोग ऐसे होंगे, जिन्हें यह मालूम नहीं होगा कि LAYS चिप्स में सूअर की चर्बी होती है, और बच्चे...?  बच्चे तो मासूम होते हैं, उन्हें क्या पता कि उनका हीरो सैफ़ अली ख़ान जिस LAYS चिप्स खाने के लिए उन्हें ललचा रहे है, उसमें सूअर की चर्बी है.

क्या सैफ़ अली ख़ान जैसे लोगों की समाज के प्रति कोई ज़िम्मेदारी नहीं है? 

Thursday, November 21, 2013

मीडिया का स्याह चेहरा...

जिस मीडिया पर समाज को जागृत करने की ज़िम्मेदारी है, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता... उसका भी एक स्याह चेहरा है... वहां भी कई तरह का शोषण है... मीडिया कर्मियों को वक़्त पर तनख़्वाह देने के मामले भी अकसर सामने आते रहते हैं... महिलाओं के शोषण की ख़बरें भी आती हैं, लेकिन इन्हें दबा दिया जाता है...
दूसरी तरफ़ मीडिया में ऐसी ’महान’ लड़कियों की भी कमी नहीं है, जो सिर्फ़ ’टाइम पास’ और ’नाम’ के लिए ही दफ़्तर आती हैं, ताकि पास-पड़ौस और रिश्तेदारों को बता सकें कि फ़लां मीडिया हाऊस में काम करती हैं. ऐसी ’महान’ लड़कियों का दफ़्तर का काम दूसरी लड़कियों को करना पड़ता है. इन 'महान' लड़कियों को दफ़्तर से कई सुविधाएं मिलती हैं, छुट्टी करने पर तनख़्वाह नहीं कटती. इन्हें देर से आकर जल्दी जाने की छूट भी होती है. जब चाहें दस-बीस दिन के लिए अपने घर (दूसरे प्रदेश) जा सकती हैं. तनख़्वाह भी इन्हीं की ज़्यादा बढ़ती है. एक महिला ने हमें बताया कि काम का ज़्यादा बोझ होने से परेशान होकर जब उसने अपने सीनियर से शिकायत की, तो उसके सीनियर ने कहा- दफ़्तर में दस लोग काम करते हैं और दो लड़कियां काम न करने के लिए भी होती हैं.
इन ’महान’ लड़कियों की वजह से भी मीडिया का माहौल ख़राब हो रहा है. इनकी वजह से ही वाहियात लोग हर लड़की को इन्हीं ’महान’ लड़कियों की तरह ट्रीट करना चाहते हैं. ऐसे में अच्छे घरों की लड़कियों के लिए मुश्किलें पैदा हो रही हैं.

Wednesday, November 20, 2013

अछूत...


फ़िरदौस ख़ान
बात स्कूल के वक़्त की है. हमारी एक सहेली थी गीता. एक रोज़ वह हमारे घर आई. लेकिन बाहर दालान में ही खड़ी रही. हमने उसे अंदर कमरे में आने के लिए कहा, तो पूछने लगी- क्या सचमुच अंदर आ जाऊं ? हमें उसकी बात पर हैरानी हुई. हमने इसकी वजह पूछी, तो उसने बताया कि वह वाल्मीकि है, यानी अछूत है. उसके अंदर आने से कहीं हमारी दादी जान नाराज़ तो नहीं होंगी? हमने कहा- नहीं. वह अंदर आ गई. हमारे कहने पर कुर्सी पर बैठ भी गई, लेकिन बहुत सिमटी-सिमटी रही. हमें लग ही नहीं रहा था कि वह वही गीता है, जो स्कूल में हमारे साथ हर वक़्त चहकती रहती है. उसके जाने के बाद हमने अपनी दादी जान से पूछा कि अछूत कौन होते हैं?  उस वक़्त इतनी समझ नहीं थी. उन्होंने बताया कि जो लोग मैला ढोने के काम में लगे होते हैं, मोची का काम करते हैं उन्हें अछूत माना जाता है. उन्होंने ऐसे ही कुछ और काम भी गिनाए. बहुत अजीब लगा था उस वक़्त, क्योंकि जो लोग वह काम करते हैं, जिसे कुछ लोग बहुत-से पैसे लेकर भी नहीं करेंगे, वे इतने बुरे यानी अछूत कैसे हो सकते हैं? लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ी दुनिया की बातें समझ में आने लगीं और पता चला कि पढ़े-लिखे लोग भी छुआछूत जैसी कुप्रथाओं के मकड़जाल में फंसे हुए हैं.

दुख की बात है कि भारत जैसे विकासशील देश में आज़ादी के तक़रीबन साढ़े छह दशक बाद भी सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा जारी है. इस काम से जुड़े लोग अब आगे बढ़ना चाहते हैं, लेकिन सामाजिक और आर्थिक कारण उन्हें इस दलदल से बाहर नहीं निकलने दे रहे हैं. दरअसल, देश में जाति प्रथा की वजह से भी मैला ढोने की प्रथा का अभी तक ख़ात्मा नहीं हो पाया है. यहां महिलाओं, पुरुषों और यहां तक कि बच्चों को भी सिर्फ़ इसी वजह से मैला ढोने का काम करना पड़ता है, क्योंकि उनका जन्म एक जाति विशेष में हुआ है. इसलिए इस तबक़े के लोग शुष्क शौचालयों से मैला साफ़ करके उसे किसी दूसरे स्थान पर फेंकने जैसा अमानवीय काम करने को मजबूर हैं. यह एक घृणित कार्य है. देश के विभिन्न हिस्सों में शुष्क शौचालयों की मौजूदगी मानव प्रतिष्ठा और सम्मान के हनन के साथ-साथ संविधान के तहत क़ानून और अनुच्छेद 14, 17, 21 और 23  का उल्लंघन है. साल 1993  में संसद ने सफ़ाई कर्मचारी नियोजन एवं शुष्क शौचालय निर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम- 1993 पारित किया, जिसमें यह कहा गया है कि हाथ से मैला साफ़ करने वालों को रोज़गार पर रखना और शुष्क शौचालयों का निर्माण करना एक क़ानूनी अपराध है, जिसके लिए एक साल तक की क़ैद की सज़ा और दो हज़ार रुपये के जुर्माने का प्रावधान है. इस क़ानून के तहत इस प्रथा को ख़त्म करने की बात कही गई. केंद्र सरकार ने इसके ख़ात्मे के लिए कई बार समय सीमाएं भी तय कीं. पहले समय सीमा 31 दिसंबर, 2007 थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 31 मार्च, 2009 कर दिया गया. केंद्र सरकार द्वारा अप्रैल 2007 से लागू मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए स्वरोज़गार योजना ( एसआरएमएस) के तहत 735.60 करोड़ रुपये का प्रावधान करते हुए दावा किया गया था कि 31 मार्च, 2009  तक इस प्रथा को समाप्त कर सभी का पुनर्वास कर दिया जाएगा. ग़ौरतलब है कि उस वक़्त राज्यों ने भी खुले में शौच को पूरी तरह ख़त्म करने के लिए अपनी समय सीमा दर्शाई थी. बिहार ने इसके लिए साल 2069 का लक्ष्य रखा है. इसी तरह असम ने 2044, झारखंड ने 2035, राजस्थान ने 2029, छत्तीसगढ़  ने 2022, मध्य प्रदेश ने 2021, गुजरात ने 2015, महाराष्ट्र ने 2014 और उत्तर प्रदेश ने 2013 का लक्ष्य तय किया था. कुछ साल पहले पश्चिम बंगाल ने मैला ढोने की प्रथा को ख़त्म करने के लिए धनराशि लेने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि राज्य में मैला ढोने की प्रथा का उन्मूलन हो चुका है. हालांकि पश्चिम बंगाल को 7.23 करोड़ रुपये दिए गए थे, लेकिन इसके बावजूद अभी तक राज्य में मैला ढोने की प्रथा जारी है. सच तो यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस क़ानून को लागू करने में काफ़ी ढिलाई बरत रही हैं. क़ानून पास हुए तक़रीबन 20 साल हो चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद देश में मैला ढोने की अमानवीय प्रथा बेरोकटोक जारी है.

देश की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने भी स्वीकार किया है कि स्थानीय निकाय भी नियमित रूप से शुष्क शौचालय चलाते हैं और इन शौचालयों की हाथ से सफ़ाई के लिए जाति विशेष के लोगों को रोज़गार पर लगाते हैं. क़ाबिले-ग़ौर बात यह भी है कि मैला ढोने की प्रथा को सिर्फ़ स्वच्छता के नज़रिये से देखा जाता है, जबकि इसे मानव सम्मान के रूप में भी देखा जाना चाहिए. लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार का कहना है कि जब तक लोग जाति प्रथा की कुरीति से नाता नहीं तोड़ेंगे, तब तक मैला ढोने की प्रथा से मुक्ति मिलना मुश्किल है, क्योंकि छुआछूत और जातिप्रथा की वजह से ही यह व्यवस्था क़ायम है. उन्होंने कहा कि ग़ुलामी की प्रथा में दास मुक्त हो जाता था, लेकिन जाति प्रथा की जकड़न से हम अब तक आज़ाद नहीं हो पाए हैं. सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री मुकुल वासनिक ने कहा था कि यह काफ़ी दुखद है कि आज़ादी के छह दशक बाद भी एक वर्ग हाथों से मैला ढोने का काम करता है. सरकार मैला ढोने की प्रथा को ख़त्म करने के लिए क़ानून बनाएगी और इस काम में लगे लोगों की नए सिरे से गिनती की जाएगी. ग़ौरतलब है कि इस प्रथा को रोकने के लिए एक विधेयक तैयार है, जिसे संसद में पारित करवाया जाना बाक़ी है. साल 2008 के संसद के शीतकालीन सत्र में तत्कालीन सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री सुब्बूलक्ष्मी जगदीसन ने लोकसभा में बताया था कि मैला उठाने की प्रथा को जड़ मूल से ख़त्म करने के लिए एक योजना बनाई गई है. उस वक़्त उन्होंने बताया कि मैला उठाने वाले लोगों के पुनर्वास और स्वरोज़गार की नई योजना को जनवरी 2007 में शुरू किया गया था. उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, इस योजना के तहत देश के 1 लाख 23 हज़ार मैला उठाने वालों और उनके आश्रितों का पुनर्वास किया जाना प्रस्तावित था. एक रिपोर्ट के मुताबिक़ आज भी देश में 12 लाख 91 हज़ार 600 शुष्क शौचालय हैं. 

आज भी देश के ज़्यादातर गांव शौचालय और जल निकासी की समस्या से जूझ रहे हैं. विकास की रोशनी आज भी गांव की तंग गलियों तक नहीं पहुंच पाई है. इतिहास गवाह है कि सदियों पहले देश के गांव आज के भारत के मुक़ाबले कहीं बेहतर हालत में थे. हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई में मिले शौचालय के अवशेष इस बात के सबूत हैं कि उस वक़्त जो सुविधाएं लोगों के पास थीं, उन्हें हम आज भी अपने गांवों के घरों तक नहीं पहुंचा पाए हैं. यह कैसा विकास है कि हम आज भी अपने देश के लाखों लोगों को सम्मान से जीना का हक़ नहीं दे पाए हैं.

तस्वीर गूगल से साभार 
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Thursday, October 24, 2013

फ़ेसबुक प्रबंधन से अपील


फ़िरदौस ख़ान
यह देख कर बहुत दुख होता है कि इंसान ने शक्ल-सूरत तो इंसान वाली पाई है, लेकिन आज भी उसके अंदर ख़ूंख़ार जानवर बसा हुआ है... आज हमने फ़ेसबुक पर एक तस्वीर देखी, जो पाकिस्तान की मस्जिद में हुए बम विस्फ़ोट की है... फ़ेसबुक पर इस तस्वीर को मंदिर बताया जा रहा है... और बम विस्फ़ोट में मरने वाले मुसलमानों को हिंदू... साथ ही कहा जा रहा है कि मुसलमानों ने हिदुओं को काटा है...

हैरानी इस बात पर भी है कि पढ़े-लिखे समझदार हिंदू भाई इसे शेयर कर रहे हैं... क्या आपने तस्वीर को ध्यान से देखा कि यह मंदिर या मस्जिद...? दरअसल, ऐसे मामलों में कुछ लोग बिना-सोचे समझे अपने दिलों की भड़ास निकाल लेते हैं... बिना सच को जानें... क़ाबिले-ग़ौर है कि बांग्लादेश में हुए दंगों से दौरान कुछ मुसलमानों से भी ऐसा ही क्या था... बुद्धों की लाशों को मुसलमानों की लाशें बताया था... इसी तरह अन्य़ मुस्लिम देशों में मरने वाले मुसलमानों को बांग्लादेश में मारे गए मुसलमान कहकर नफ़रत फैलाने की कोशिश की थी...

सभी हिंदू भाइयों से हमारा अनुरोध है कि भाई इस तस्वीर में मरने वाले भी ’मुसलमान’ हैं... और ’मारने वाले’ भी... इस वक़्त तो दुनिया भर में मुसलमान ही मुसलमानों के ख़ून के प्यासे हो रहे हैं...

मुसलमान भाइयों से भी इल्तिजा है कि वो भी ऐसी झूठी अफ़वाहों को सच मानकर, नफ़रत को हवा न दें...

मुसलमान, मुसलमान को मारे... हिंदू को मारे या किसी और को... या फिर हिंदू मुसलमान को मारे... इस सबके बीच मौत तो सिर्फ़ इंसान और इंसानियत की ही होती है... क्या हम मिलजुल कर नफ़रत की इस खाई को पाट नहीं सकते हैं...? क्या हम खु़दा के बनाए इंसान और उसकी आने वाली नस्लों के लिए कोई बेहतरीन मिसाल पेश नहीं कर सकते...?
आप सबसे ग़ुज़ारिश है कि जवाब ज़रूर दें...

फ़ेसबुक प्रबंधन से अपील 
फ़ेसबुक को ऐसे पेजों पर पाबंदी लगानी चाहिए, जो नफ़रत फैलाने का काम करते हैं... चाहे ये पेज मुसलमानों के हों या फिर हिंदुओं के...