Wednesday, July 13, 2022

यूरिक एसिड से कैसे निजात पाएं


फ़िरदौस ख़ान  
हर तीसरा व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के दर्द से परेशान है. किसी के पूरे जिस्म में दर्द है, किसी की पीठ में दर्द है, किसी के घुटनों में दर्द है और किसी के हाथ-पैरों में दर्द है. हालांकि दर्द की कई वजहें होती हैं. इनमें से एक वजह यूरिक एसिड भी है.  
दरअसल, यूरिक एसिड एक अपशिष्ट पदार्थ है, जो खाद्य पदार्थों के पाचन से पैदा होता है और इसमें प्यूरिन होता है. जब प्यूरिन टूटता है, तो उससे यूरिक एसिड बनता है. किडनी यूरिक एसिड को फ़िल्टर करके इसे पेशाब के ज़रिये जिस्म से बाहर निकाल देती है. जब कोई व्यक्ति अपने खाने में ज़्यादा मात्रा में प्यूरिक का इस्तेमाल करता है, तो उसका जिस्म यूरिक एसिड को उस तेज़ी से जिस्म से बाहर नहीं निकाल पाता. इस वजह से जिस्म में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ने लगती है. ऐसी हालत में यूरिक एसिड ख़ून के ज़रिये पूरे जिस्म में फैलने लगता है और यूरिक एसिड के क्रिस्टल जोड़ों में जमा हो जाते हैं, जिससे जोड़ों में सूजन आ जाती है. इसकी वजह से गठिया भी हो जाता है. जिस्म में असहनीय दर्द होता है. इससे किडनी में पथरी भी हो जाती है. इसकी वजह से पेशाब संबंधी बीमारियां पैदा हो जाती हैं. मूत्राशय में असहनीय दर्द होता है और पेशाब में जलन होती है. पेशाब बार-बार आता है. यह यूरिक एसिड स्वस्थ व्यक्ति को बीमार कर देता है.    
यूरिक एसिड से बचने के लिए अपने खान-पान पर ख़ास तवज्जो दें. दाल पकाते वक़्त उसमें से झाग निकाल दें. कोशिश करें कि दाल कम इस्तेमाल करें. बिना छिलकों वाली दालों का इस्तेमाल करना बेहतर है. रात के वक़्त दाल, चावल और दही आदि खाने से परहेज़ करें. हो सके तो फ़ाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन करें.  

जौ 
यूरिक एसिड से निजात पाने के लिए जौ का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करें. जौ की ख़ासियत है कि यह यूरिक एसिड को सोख लेता है और उसे जिस्म से बाहर करने में कारगर है. इसलिए जौ को अपने रोज़मर्रा के खाने में ज़रूर शामिल करें. गर्मियों के मौसम में जौ का सत्तू पी सकते हैं, जौ का दलिया बना सकते हैं, जौ के आटे की रोटी बनाई जा सकती है.

ज़ीरा
यूरिक एसिड के मरीज़ों के लिए ज़ीरा भी बहुत फ़ायदेमंद है. ज़ीरे में आयरन, कैल्शियम, ज़िंक और फ़ॉस्फ़ोरस पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं. इसके अलावा इसमें एंटीऑक्सीडेंट उच्च मात्रा में मौजूद होता है, जो यूरिक एसिड की वजह से होने वाले जोड़ों के दर्द और सूजन को कम करता है. यह टॉक्सिंस को जिस्म से बाहर करने में भी मददगार है.

नींबू
नींबू में मौजूद साइट्रिक एसिड शरीर में यूरिक एसिड के स्तर को बढ़ने से रोकता है.  

ज़्यादा परेशानी होने पर चिकित्सक से परामर्श लें. 

#यूरिकएसिड

Saturday, July 9, 2022

ग़ुज़ारिश : ज़रूरतमंदों को गोश्त पहुंचाएं

 

ईद-उल-अज़हा का त्यौहार आ रहा है. जो लोग साहिबे-हैसियत हैं, वो बक़रीद पर क़्रुर्बानी करते हैं. तीन दिन तक एक ही घर में कई-कई क़ुर्बानियां होती हैं. इन घरों में गोश्त भी बहुत होता है. एक-दूसरे के घरों में क़ुर्बानी का गोश्त भेजा जाता है..जब गोश्त ज़्यादा हो जाता है, तो लोग गोश्त लेने से मना करने लगते हैं.
ऐसे भी बहुत से घर होते हैं, जहां क़ुर्बानी नहीं होती. ऐसे भी बहुत से घर होते हैं, जो त्यौहार के दिन भी गोश्त से महरूम रहते हैं..राहे-हक़ से जुड़े साथी गोश्त इकट्ठा करके ऐसे लोगों तक गोश्त पहुंचाते रहे हैं, जो ग़रीबी की वजह से गोश्त से महरूम रहते हैं.
आप सबसे ग़ुज़ारिश है कि आप भी क़ुर्बानी के गोश्त को उन लोगों तक पहुंचाएं, जो त्यौहार के दिन भी गोश्त से महरूम रहते हैं. आपकी ये कोशिश किसी के त्यौहार को ख़ुशनुमा बना सकती है.

Sunday, June 12, 2022

OIC



इन दिनों ख़बरों में OIC का ख़ूब ज़िक्र आ रहा है. OIC का मतलब है- ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन. इसमें 57 इस्लामिक मुल्क शामिल हैं. इनकी फ़ेहरिस्त पेश है-
1 Afghanistan 
2 Albania 
3 Algeria 
4 Azerbaijan 
5 Bahrain 
6 Bangladesh
7 Benin  
8 Brunei  
9 Burkina 
10 Cameroon 
11 Chad 
12 Comoros 
13 Djibouti 
14 Egypt 
15 Gabon 
16 Gambia 
17 Guinea 
18 Guinea-Bissau 
19 Guyana 
20 Indonesia 
21 Iran  
22 Iraq 
23 Ivory 
24 Jordan 
25 Kazakhstan 
26 Kuwait 
27 Kyrgyzstan 
28 Lebanon 
29 Libya  
30 Malaysia
31 Maldives 
32 Mali 
33 Mauritania
34 Morocco
35 Mozambique 
36 Niger 
37 Nigeria 
38 Oman Muscat 
39 Pakistan 
40 Palestine 
41 Qatar 
42 Saudi Arabia
43 Senegal 
44 Sierra Leone
45 Somalia 
46 Sudan 
47 Suriname 
48 Syria 
49 Tajikistan 
50 Togo 
51 Tunisia
52 Turkey 53
Turkmenistan 
54 Uganda 
55 United Arab Emirates 
56 Uzbekistan 
57 Yemen 
#OIC
#organization_of_islamic_cooperation
1

Monday, April 11, 2022

ईश प्रीत की छलकन है यह पुस्तक


सूफ़ी-संतों पर आधारित पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ फ़िरदौस ख़ान की ईश प्रीत की छलकन है. ऋषि सत्ताओं की विस्मृत वाणी को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ को कैसे संत व फ़क़ीर जीते हैं, उसी को पुनः स्मृति में लाने का प्रयास है यह पुस्तक.
जैसे श्रीमद्भगवद्गीता पुनः अर्जुन के बहाने संसार को मिल रहा है, जबकि योगेश्वर कहते हैं कि सबसे पहले यह ज्ञान सूर्य को दिया था, जो काल के खेल में विलुप्त हो गया था.
ऋषि सत्ताओं ने धर्म की जगह विशेष के समूह को जीवन जीने का तरीक़ा दिया और ऋषियों, सूफ़ी, संतों व फ़क़ीरों ने उस जीवन जीने के तरीक़ों के उद्देश्य को जिया अर्थात आध्यात्मिक जीवन को प्राप्त होना, अर्थात उस प्रकाश को पाना है जिससे यह कायनात है. अखिल ब्रह्मांड है, भीड़ और समूह सीढ़ियां छोड़ नहीं पाती हैं, जिससे भेद बना रहता है, बसा रहता है. मंज़िल पानी थी, न कि सिर पर सीढ़ियां लादे घूमना था. फ़क़ीरों-संतों का जीवन चीख़-चीख़ कर घोषणा करता है- ढाई आखर प्रेम का, पढ़या सो पंडित होय.
पहुंचना प्रीत सागर में है. सारी की सारी नदियों का गंतब्य क्या है, समुद्र.

गंगा-जमुनी मेल क्या है, संस्कृति क्या है, चलें सागर की ओर, मिलकर. संगम पाकर और विशाल-विस्तृत होकर. विराट मिलन के पूर्व का मिलन उस महामिलन की मौज की मस्ती के स्वाद का पता दे देता है. इसका बड़ा अच्छा उदाहरण लेखिका व आलिमा फ़िरदौस ख़ान ने प्रस्तुत किया है. सूफ़ी हज़रत इब्राहिम बिन अदहम के जीवन से-
-कौन ?
- तेरा परिचित.
-क्या खोज रहे हो?
- ऊंट.
बकवास... इतने ऊपर हमारे महल में ऊंट कैसे आ सकता है? परिचित बोलते हैं कि जब तू राजमहल में मालिक को ढूंढ सकता है, तो यहां हमारा ऊंट क्यों नहीं आ सकता है?
अर्थात राजस में रहकर सात्विक से भी (त्रिगुण मयी माया) पार की ख़बर का नाटक करना ही है. आज के दौर में कितना प्रासंगिक है. राजस जीवन जीकर धर्म की व्याख्या करना, पतन की पराकाष्ठा ही है.
वहीं जब महल को पुनः सराय कहता है परिचित, तब बादशाह की आंख पूरी खुल जाती है. राजस आने जाने वाली फ़ानी बादशाहत छोड़कर फ़क़ीरी जीवन जीने लगते हैं.

और सूफ़ी, संत, फ़क़ीर ही असली बादशाह हैं. मालिक की गोद में बैठकर असली मौज लेते रामकृष्ण परमहंस भी दिखते हैं और माँ के आशीष से सिंचित कर्मयोगी शहनाई वादक बिस्मिल्लाह ख़ान साहेब भी क्या हज़रत इब्राहिम बिन अदहम की तरह फ़क़ीरी में बादशाह नहीं हैं.
चाहे कबीर हों, रसखान हों, दादू हों सभी उस नूर, उस रौशनी की चर्चा अपनी सधुक्कड़ी भाषा में कर रहे हैं. 
लेखिका फ़िरदौस ख़ान उस ईश्वरीय नूर को जी रही हैं और इस तरह ईश प्रीत की उस छलकन की पहली श्रृंखला है यह पुस्तक, जिसे ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह) ने प्रकाशित किया है.

शुभकामनाएं अपार!
नन्दलाल सिंह

लेखक का परिचय 
नन्दलाल सिंह लेखक एवं अनिभेता हैं. वह रंगमंच, हिन्दी फ़ीचर फ़िल्मों के लिए लेखन करते हैं. उनकी कहानियां, लेख, उपन्यास एवं गांधी दर्शन पर अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. वह महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, बनारस में भी नाट्य विभाग में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रहे हैं. वह महात्मा गांधी के विचार एवं दर्शन पर कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देते हैं. 
संपर्क : गोरेगांव (पश्चिम), मुम्बई- 400104 (महाराष्ट्र)
ईमेल : sundharanandlal@gmail.com

Friday, February 11, 2022

और अल्लाह ने खाना भेज दिया...

 

साल 2005 का वाक़िया है. नवम्बर का महीना था. हम अपनी अम्मी के साथ उत्तर प्रदेश के एक गांव में गए हुए थे. गांव के एक बुज़ुर्ग के साथ हम घूमने निकले. उनके साथ कांग्रेस के एक नेता और उनके चाचा नवाब साहब भी थे. दोपहर हो गई. सबको बहुत भूख लगी थी. बुज़ुर्ग ने कहा कि बहुत भूख लग रही है. घर वापस लौटने में बहुत देर हो जाएगी और यहां दूर-दूर ऐसा कुछ दिखाई नहीं दे रहा, जहां जाकर कुछ खा-पी सकें. उनकी यह बात सुनकर हमारी अम्मी ने कहा- “मैं जहां भी जाती हूं, अल्लाह वहां खाना ज़रूर भेज देता है.” इस पर वे बुज़ुर्ग तंज़िया मुस्कराने लगे. अभी चन्द घड़ियां ही गुज़री थीं कि साईकिल पर सफ़ेद लिबास में एक शख़्स आया. उसने सबको सलाम किया और उन बुज़ुर्ग के हाथ में एक थैली थमाकर चला गया. उन्होंने थैली खोली, तो उसमें गरमा-गरम समौसे थे. नवाब साहब ने बुज़ुर्ग से उस शख़्स के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा कि वे उसे नहीं जानते.
इस पर हमारी अम्मी ने बुज़ुर्ग से कहा- “क्या मैंने आपसे नहीं कहा था कि मैं जहां भी जाती हूं, अल्लाह वहां खाना ज़रूर भेज देता है.”
-फ़िरदौस ख़ान
हमारी अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान उर्फ़ चांदनी
(शेख़ज़ादी का वाक़िया)
#शेख़ज़ादी_का_वाक़िया

Thursday, February 10, 2022

अब्र का साया

 


कई बरस पहले का वाक़िया है. एक रोज़ हमारी छोटी बहन ने अम्मी को फ़ोन किया कि आपसे मिलने का दिल कर रहा है. अम्मी ने उससे मिलने का वादा कर लिया. चुनांचे ज़ुहर की नमाज़ के बाद अम्मी और हम उससे मिलने के लिए घर से निकले. वह शायद जेठ का महीना था. शिद्दत की गर्मी थी. सूरज आग बरसा रहा था. अम्मी कहने लगीं कि काश ! बादल होते. हमने आसमान की तरफ़ रुख़ करके कहा कि आसमान में दूर-दूर तक बादल का कोई नामो निशान तक नहीं है. हमारी बात ख़त्म भी न होने पाई थी कि हमने ज़मीन पर साया देखा. वह साया इतना वसीह था कि अम्मी और हम उसके नीचे थे. यानी हम घर से दस क़दम भी आगे नहीं बढ़े थे कि हम दोनों अब्र के सायेबान में थे. हम यूं ही बातें करते-करते बहन के घर गए. वहां कुछ वक़्त रुके और फिर वापस घर आ गए. जब हम घर आ गए, तो अम्मी ने हमसे पूछा- ये बताओ कि क्या तुम धूप में गई थीं या अब्र के साये में. हमने ग़ौर किया कि वाक़ई हम अब्र के साये में ही गए थे और अब्र के साये में ही घर वापस आए थे. जैसे-जैसे हम आगे क़दम बढ़ा रहे थे, वैसे-वैसे ही अब्र का साया भी आगे बढ़ता जा रहा था.
ये अल्लाह का एक बहुत बड़ा मौजिज़ा था. ऐसे थीं हमारी अम्मी. अल्लाह उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता करे, आमीन   
(शेख़ज़ादी का वाक़िया) 
#शेख़ज़ादी_का_वाक़िया
 

Wednesday, February 9, 2022

काश ! ऐसी औरतों के लिए भी क़ौम की 'ग़ैरत' जागती!

काश ! ऐसी औरतों के लिए भी क़ौम की 'ग़ैरत' जागती!       
हमारी गली में रोज़ न जाने कितनी ही औरतें ऐसी आती हैं, जो रो-रोकर रोटी और आटा मांगती हैं. पूछने पर एक औरत ने बताया कि उसके शौहर ने तीन तलाक़ देकर उसे घर से निकाल दिया और नई बीवी ले आया. उसकी पांच बेटियां हैं. वे किराये के 7x8 फ़ीट के कमरे में रह रही है. काम न मिलने पर भीख मांगनी पड़ती है. 
मुआशरे में ऐसी से औरतों की तादाद लाखों-करोड़ों में होगी. काश ! इनके हक़ के लिए भी कोई आवाज़ बुलन्द करता. इनके लिए भी क़ौम की 'ग़ैरत' जागती! 
#तीन_तलाक़

Monday, February 7, 2022

सूफ़ियाना बसंत पंचमी

 

फ़िरदौस ख़ान
बसंत पंचमी को जश्ने बहारा भी कहा जाता है, क्योंकि बसंत पंचमी बहार के मौसम का पैग़ाम लाती है. सूफ़ियों के लिए बंसत पंचमी का दिन बहुत ख़ास होता है. ख़ानकाहों में बसंत पंचमी मनाई जाती है. बसंत का पीला साफ़ा बांधे मुरीद बसंत के गीत गाते हैं. बसंत पंचमी के दिन मज़ारों पर पीली चादरें चढ़ाई जाती हैं. पीले फूलों की भी चादरें चढ़ाई जाती हैं, पीले फूल चढ़ाए जाते हैं. क़व्वाल पीले साफ़े बांधकर हज़रत अमीर ख़ुसरो के गीत गाते हैं.
आज बसंत मना ले सुहागन
आज बसंत मना ले  
अंजन–मंजन कर पिया मोरी
लंबे नेहर लगाए
तू क्या सोवे नींद की माटी
सो जागे तेरे भाग सुहागन
आज बसंत मना ले
ऊंची नार के ऊंचे चितवन
ऐसो दियो है बनाय
शाहे अमीर तोहे देखन को
नैनों से नैना मिलाय
आज बसंत मना ले, सुहागन
आज बसंत मना ले  

कहा जाता है कि ख़ानकाहों में बसंत पंचमी मनाने की यह रिवायत हज़रत अमीर ख़ुसरो ने शुरू की थी. हुआ यूं कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (रहमतुल्लाह) को अपने भांजे हज़रत सैयद नूह के विसाल से बहुत सदमा पहुंचा और वह उदास रहने लगे. हज़रत अमीर ख़ुसरो से अपने मुर्शिद की यह हालत देखी न गई. वे उन्हें ख़ुश करने के जतन करने लगे, लेकिन कामयाब नहीं हो पाए. एक दिन हज़रत अमीर ख़ुसरो अपने साथियों के साथ कहीं जा रहे थे. नीले आसमान पर सूरज दमक रहा था. उसकी सुनहरी किरनें ज़मीन पर पड़ रही थीं. उन्होंने रास्ते में सरसों के खेत देखे. सरसों के पीले फूल बहती हवा से लहलहा रहे थे. उनकी ख़ूबसूरती हज़रत अमीर ख़ुसरो की निगाहों में बस गई और वे वहीं खड़े होकर फूलों को निहारने लगे. तभी उन्होंने देखा कि एक मंदिर के पास कुछ हिन्दू श्रद्धालु हर्षोल्लास से नाच गा रहे हैं. यह देखकर उन्हें बहुत अच्छा लगा. उन्होंने इस बारे में पूछा तो श्रद्धालुओं ने बताया कि आज बसंत पंचमी है और वे लोग देवी सरस्वती पर पीले फूल चढ़ाने जा रहे हैं, ताकि देवी ख़ुश हो जाए.
इस पर हज़रत अमीर ख़ुसरो ने सोचा कि वे भी अपने पीर मुर्शिद, अपने औलिया को पीले फूल देकर ख़ुश करेंगे. फिर क्या था. उन्होंने पीले फूलों के गुलदस्ते बनाए और कुछ पीले फूल अपने साफ़े में भी लगा लिए. फिर वे अपने पीर भाइयों और क़व्वालों को साथ लेकर नाचते-गाते हुए अपने मुर्शिद के पास पहुंच गए. अपने मुरीदों को इस तरह नाचते-गाते देखकर उनके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई. और इस तरह बसंत पंचमी के दिन हज़रत अमीर ख़ुसरो को उनकी मनचाही मुराद मिल गई. तब से हज़रत अमीर ख़ुसरो हर साल बसंत पंचमी मनाने लगे. 
अमीर ख़ुसरो को सरसों के पीले फूल इतने भाये कि उन्होंने इन पर एक गीत लिखा-   
सगन बिन फूल रही सरसों
अम्बवा फूटे, टेसू फूले, कोयल बोले डार-डार
और गोरी करत सिंगार
मलनियां गेंदवा ले आईं कर सों
सगन बिन फूल रही सरसों
तरह तरह के फूल खिलाए
ले गेंदवा हाथन में आए
निज़ामुद्दीन के दरवज़्ज़े पर
आवन कह गए आशिक़ रंग
और बीत गए बरसों
सगन बिन फूल रही सरसों

ग़ौरतलब है कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (रहमतुल्लाह) चिश्ती सिलसिले के औलिया हैं. उनकी ख़ानकाह में बंसत पंचमी की शुरुआत होने के बाद दूसरी दरगाहों और ख़ानकाहों में भी बंसत पंचमी बड़ी धूमधाम से मनाई जाने लगी. इस दिन मुशायरों का भी आयोजन किया जाता है, जिनमें शायर बंसत पंचमी पर अपना कलाम पढ़ते हैं.
हिन्दुस्तान के अलावा पड़ौसी देशों पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी बंसत पंचमी को जश्ने बहारा के तौर पर ख़ूब धूमधाम से मनाया जाता है. 
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं)    

Tuesday, July 9, 2019

सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं

हमने पत्रकार, संपादक, मीडिया प्राध्यापक और संस्कृति कर्मी, मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक प्रो. संजय द्विवेदी की किताब 'उर्दू पत्रकारिता का भविष्य' की समीक्षा की है.
सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं 
-फ़िरदौस ख़ान
उर्दू पत्रकारिता की अहमियत से किसी भी सूरत में इंकार नहीं किया जा सकता. पत्रकारिता का इतिहास बहुत पुराना है. या यूं कहें कि जब से इंसानी नस्लों ने एक-दूसरे को समझना और जानना शुरू किया, तभी से पत्रकारिता की शुरुआत हो गई थी. उस वक़्त लोग एक-दूसरे से बातचीत के ज़रिये अपनी बात अपने रिश्तेदारों या जान-पहचान वालों तक पहुंचाते थे. बादशाहों के अपने क़ासिद होते थे, जो ख़बरों को दूर-दराज के मुल्कों के बादशाहों तक पहुंचाते थे. गुप्तचर भी बादशाहों के लिए ख़बरें एकत्रित करने का काम करते थे. बादशाहों के शाही फ़रमानों से अवाम में मुनादी के ज़रिये बात पहुंचाई जाती थी. फ़र्क़ बस इतना था कि ये सूचनाएं विशेष लोगों के लिए ही हुआ करती थीं. वक़्त गुज़रता गया, इसके साथ ही सूचनाओं का दायरा बढ़ता गया और तरीक़ा बदलता गया. कबूतरों ने भी संदेश या ख़बरें एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का काम किया. आज यही काम अख़बार, रेडियो, टेलीविज़न, इंटरनेट और मोबाइल के ज़रिये किया जा रहा है.
हाल में भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के प्रोफ़ेसर संजय द्विवेदी की उर्दू पत्रकारिता पर आधारित एक किताब उर्दू पत्रकारिता का भविष्य प्रकाशित हुई है. इसमें तहसीन मुनव्वर, फ़िरोज़ अशऱफ, डॉ. अख्तर आलम, असद रज़ा, शाहिद सिद्दीक़ी, फ़िरदौस ख़ान, रघु ठाकुर, एहतेशाम अहमद ख़ान, डॉ. ए अज़ीज़ अंकुर, डॉ. मरज़िया आरिफ़, डॉ. हिसामुद्दीन फ़ारूक़ी, डॉ. आरिफ़ अज़ीज़, डॉ. राजेश रैना, शारिक नूर, इशरत सग़ीर, एज़ाज़ुर रहमान, संजय कुमार, डॉ. माजिद हुसैन, आऱिफ ख़ान मंसूरी, डॉ. जीए क़ादरी, मासूम मुरादाबादी और धनंजय चोपड़ा आदि के उर्दू की हालत को बयां करते कई लेख शामिल हैं. उर्दू पत्रकारिता के मुद्दे पर हिंदी में किताब प्रकाशित करना, वाक़ई उर्दू की लोकप्रियता को दर्शाता है.
किताब के संपादक संजय द्विवेदी कहते हैं कि इस किताब के बहाने हमने एक छोटी शुरुआत की है, इस भरोसे के साथ कि उर्दू सहाफ़त के मुस्तक़बिल पर बातचीत किसी अंजाम तक पहुंचेगी ज़रूर. वह कहते हैं कि आज की उर्दू पत्रकारिता के मुद्दे देश की भाषाई पत्रकारिता के मुद्दों से अलग नहीं हैं. समूची भारतीय भाषाओं के सामने आज अंग्रेजी और उसके साम्राज्यवाद का ख़तरा मंडरा रहा है. कई भाषाओं में संवाद करता हिंदुस्तान दुनिया और बाज़ार की ताक़तों को चुभ रहा है. उसकी संस्कृति को नष्ट करने के लिए पूरे हिंदुस्तान को एक भाषा (अंग्रेज़ी) में बोलने के लिए विवश करने के प्रयास चल रहे हैं. अपनी मातृभाषा को भूलकर अंग्रेज़ी में गपियाने वाली जमातें तैयार की जा रही हैं, जिनकी भाषा, सोच और सपने सब विदेशी हैं. अमेरिकी और पश्चिमी देशों की तरफ़ उड़ान भरने को तैयार यह पीढ़ी अपनी जड़ों को भूल रही है. उसे ग़ालिब, रहीम, रसखान, सूर, कबीर, तुलसी, मीरा, मलिक मोहम्मद जायसी की बजाय पश्चिमी धुनों पर थिरकाया जा रहा है. जड़ों से विस्मृत होती इस पीढ़ी को मीडिया की ताक़त से बचाया जा सकता है. अपनी भाषाओं, ज़मीन और संस्कृति से प्यार पैदा करके ही देशप्रेम से भरी पीढ़ी तैयार की जा सकती है. उर्दू पत्रकारिता की बुनियाद भी इन्हीं संस्कारों से जुड़ी है. उर्दू और उसकी पत्रकारिता को बचाना दरअसल एक भाषा भर को बचाने का मामला नहीं है, वह प्रतिरोध है बाज़ारवाद के ख़िलाफ़, प्रतिरोध है उस अधिनायकवादी मानसिकता के ख़िलाफ़ जो विविधताओं को, बहुलताओं को, स्वीकारने और आदर देने के लिए तैयार नहीं है. यह प्रतिरोध हिंदुस्तान की सभी भाषाओं का है, जो मरने के लिए तैयार नहीं हैं. वे अंग्रेज़ी के साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ डटकर खड़ी हैं और खड़ी रहेंगी.
उर्दू के भविष्य को लेकर जहां कुछ लोग फ़िक्रमंद नज़र आते हैं, वहीं ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो उर्दू के मुस्तक़बिल को रौशन मानते हैं. वरिष्ठ पत्रकार और शायर तहसीन मुनव्वर कहते हैं कि फ़िल्में हों या टीवी धारावाहिक सब जगह उर्दू की ज़रूरत है. इसलिए यही कहा जा सकता है कि उर्दू पत्रकारिता का भविष्य रौशन है, मगर सवाल इस बात का है कि जिनके हाथ में यह भविष्य है, वह रौशन ज़ेहन और रौशन क़लम और क़लम के धनी हैं कि नहीं? इसी तरह आकाशवाणी केंद्र भोपाल में संवाददाता शारिक नूर कहते हैं कि यदि उर्दू मीडिया के उजले पक्ष को देखा जाए, तो यह पीत पत्रकारिता से काफ़ी हद तक दूर है. केंद्र सरकार और कुछ अन्य मीडिया समूह उर्दू चैनल्स लाए हैं. उर्दू अख़बारों की बेवसाइट्स और ई-संस्करण हैं. हिंदी के कुछ अख़बार भी उर्दू भाषियों को आकर्षित करने के लिए उर्दू पन्ने प्रकाशित कर रहे हैं. भोपाल से प्रकाशित होने वाला एक हिंदी अख़बार उर्दू अदब नाम से हिंदी का पन्ना प्रकाशित करता है, तो एक अन्य मीडिया समूह रविवार के दिन फ़ारसी लिपि में ही उर्दू का एक पृष्ठ दे रहा है. इससे तो यही संकेत मिलता है कि उर्दू पत्रकारिता के लिए माहौल साज़गार है.
हिंदुस्तान में उर्दू मीडिया का भविष्य बहुत उज्जवल है, बशर्ते इस दिशा में गंभीरता से काम किया जाए. मौजूदा दौर में उर्दू अख़बारों के सामने कई मुश्किलें हैं. इस मुल्क में उर्दू के हज़ारों अख़बार हैं, लेकिन ज़्यादातर अख़बारों की माली हालत अच्छी नहीं है. उर्दू के पाठक कम होने की वजह से अख़बारों की प्रसार संख्या भी सीमित है. उर्दू अख़बारों को साल में गिने-चुने दिनों में ही विज्ञापन मिल पाते हैं. उर्दू अख़बारों को यह भी शिकायत रहती है कि सरकारी विज्ञापन भी उन्हें बहुत कम मिलते हैं. इसके अलावा क़ाग़ज़ की बढ़ती क़ीमतों ने अख़बारों के लिए मुश्किलें ही पैदा की हैं.
उर्दू मूल रूप से तुर्की भाषा का शब्द है. इसका मतलब है-शाही शिविर या ख़ेमा. तुर्कों के साथ यह शब्द भी हिंदुस्तान आया. उर्दू भारतीय संघ की 18 भाषाओं में से एक है. उर्दू के लिए फ़ारसी लिपि का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन कुछ ऐसी पत्रिकाएं भी हैं, जिनकी लिपि फ़ारसी न होकर हिंदी है. फ़िलहाल देश में उर्दू की हालत को बयान करने के लिए यह शेअर काफ़ी है-
सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं
मैं भी इस मुल्क में उर्दू की तरह रहता हूं
बहरहाल, यह किताब उर्दू पत्रकारिता पर आधारित एक बेहतर दस्ताव़ेज है. संजय द्विवेदी कहते हैं कि यह किताब देवनागरी में प्रकाशित की जा रही है, ताकि हिंदी भाषी पाठक भी उर्दू पत्रकारिता के स्वर्णिम अतीत और वर्तमान में उसके संघर्ष का आकलन कर सकें. बेशक, इस बेहतरीन कोशिश के लिए संजय द्विवेदी मुबारकबाद के मुस्तहक़ हैं.

समीक्ष्य कृति : उर्दू पत्रकारिता का भविष्य
संपादक : संजय द्विवेदी
प्रकाशक : यश पब्लिकेशंस, दिल्ली
क़ीमत : 295 रुपये


Thursday, March 21, 2019

होलिया में उड़े रे गुलाल...

फ़िरदौस ख़ान
हिन्दुस्तानी त्योहार हमें बचपन से ही आकर्षित करते रहे हैं, क्योंकि ये त्योहार मौसम से जुड़े होते हैं, प्रकृति से जुड़े होते हैं. हर त्योहार का अपना ही रंग है, बिल्कुल मन को रंग देने वाला. बसंत पंचमी के बाद रंगों के त्योहार होली का उल्लास वातावरण को उमंग से भर देता है. होली से कई दिन पहले बाज़ारों, गलियों और हाटों में रंग, पिचकारियां सजने लगती हैं. छोटे क़स्बों और गांवों में होली का उल्लास देखते ही बनता है. महिलाएं कई दिन पहले से ही होलिका दहन के लिए भरभोलिए बनाने लगती हैं. भरभोलिए गाय के गोबर से बने उन उपलों को कहा जाता है, जिनके बीच में छेद होता है. इन भरभेलियों को मूंज की रस्सी में पिरोकर माला बनाई जाती है. हर माला में सात भरभोलिए होते हैं. इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घुमाने के बाद होलिका दहन में डाल दिया जाता है. होली का सबसे पहला काम झंडा लगाना है. यह झंडा उस जगह लगाया जाता है, जहां होलिका दहन होना होता है. मर्द और बच्चों चैराहों पर लकड़िया इकट्ठी करते हैं. होलिका दहन के दिन दोपहर में विधिवत रूप से इसकी पूजा-अर्चना की जाती है. महिलाएं पारंपरिक गीत गाते हुए घरों में पकवानों का भोग लगाती हैं. रात में मुहूर्त के समय होलिका दहन किया जाता है. किसान गेहूं और चने की अपनी फ़सल की बालियों को इस आग में भूनते हैं. देर रात तक होली के गीत गाए जाते हैं और लोग नाचकर अपनी ख़ुशी का इज़हार करते हैं.
होली के अगले दिन को फाग, दुलहंदी और धूलिवंदन आदि नामों से पुकारा जाता है. हर राज्य में इस दिन को अलग नाम से जाना जाता है. बिहार में होली को फगुआ या फागुन पूर्णिमा कहते हैं. फगु का मतलब होता है, लाल रंग और पूरा चांद. पूर्णिमा का चांद पूरा ही होता है. हरित प्रदेश हरियाणा में इसे धुलैंडी कहा जाता है. इस दिन महिलाएं अपने पल्लू में ईंट आदि बांधकर अपने देवरों को पीटती हैं. यह सब हंसी-मज़ाक़ का ही एक हिस्सा होता है. महाराष्ट्र में होली को रंगपंचमी और शिमगो के नाम से जाना जाता है. यहां के आम बाशिंदे जहां रंग खेलकर होली मनाते हैं, वहीं मछुआरे नाच के कार्यक्रमों का आयोजन कर शिमगो मनाते हैं. पश्चिम बंगाल में होली को दोल जात्रा के नाम से पुकारा जाता है. इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधा की मूर्तियों का मनोहारी श्रृंगार कर शोभा यात्रा निकाली जाती है. शोभा यात्रा में शामिल लोग नाचते-गाते और रंग उड़ाते चलते हैं. तमिलनाडु में होली को कामान पंडिगई के नाम से पुकारा जाता है. इस दिन कामदेव की पूजा की जाती है. किवदंती है कि शिवजी के क्रोध के कारण कामदेव जलकर भस्म हो गए थे और उनकी पत्नी रति की प्रार्थना पर उन्हें दोबारा जीवनदान मिला.
इस दिन सुबह से ही लोग रंगों से खेलना शुरू कर देते हैं. बच्चे-बड़े सब अपनी-अपनी टोलियां बनाकर निकल पड़ते हैं. ये टोलियां नाचते-गाते रंग उड़ाते चलती हैं. रास्ते जो मिल जाए, उसे रंग से सराबोर कर दिया जाता है. महिलाएं भी अपने आस पड़ोस की महिलाओं के साथ इस दिन का भरपूर लुत्फ़ उठाती हैं. इस दिन दही की मटकियां ऊंचाई पर लटका दी जाती हैं और मटकी तोड़ने वाले को आकर्षक इनाम दिया जाता है. इसलिए युवक इसमें बढ़-चढ़कर शिरकत करते हैं.
रंग का यह कार्यक्रम सिर्फ़ दोपहर तक ही चलता है. रंग खेलने के बाद लोग नहाते हैं और भोजन आदि के बाद कुछ देर विश्राम करने के बाद शाम को फिर से निकल पड़ते हैं. मगर अब कार्यक्रम होता है, गाने-बजाने का और प्रीति भोज का. अब तो होली से पहले ही स्कूल, कॊलेजों व अन्य संस्थानों में होली के उपलक्ष्य में समारोहों का आयोजन किया जाता है. होली के दिन घरों में कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं, जिनमें खीर, पूरी और गुझिया शामिल है. गुझिया होली का ख़ास पकवान है. पेय में ठंडाई और भांग का विशेष स्थान है.
होली एक ऐसा त्योहार है, जिसने मुग़ल शासकों को भी प्रभावित किया. अकबर और जहांगीर भी होली खेलते थे. शाहजहां के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी और आब-ए-पाशी के नाम से पुकारा जाता था. पानी की बौछार को आब-ए-पाशी कहते हैं. आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र भी होली मनाते थे. इस दिन मंत्री बादशाह को रंग लगाकर होली की शुभकामनाएं देते थे. पर्यटक अलबरूनी ने अपने ऐतिहासिक सफ़रनामे मे होली का ख़ास तौर पर ज़िक्र किया है. हिन्दू साहित्यकारों ही नहीं मुस्लिम सूफ़ियों ने भी होली को लेकर अनेक कालजयी रचनाएं रची हैं. अमीर ख़ुसरो साहब कहते हैं-
मोहे अपने ही रंग में रंग दे
तू तो साहिब मेरा महबूब ऐ इलाही
हमारी चुनरिया पिया की पयरिया वो तो दोनों बसंती रंग दे
जो तो मांगे रंग की रंगाई मोरा जोबन गिरबी रख ले
आन परी दरबार तिहारे
मोरी लाज शर्म सब ले
मोहे अपने ही रंग में रंग दे...
होली के दिन कुछ लोग पक्के रंगों का भी इस्तेमाल करते हैं, जिसके कारण जहां उसे हटाने में कड़ी मशक़्क़त करनी पड़ती है, वहीं इससे एलर्जी होने का ख़तरा भी बना रहता है. हम और हमारे सभी परिचित हर्बल रंगों से ही होली खेलते हैं. इन चटक़ रंगों में गुलाबों की महक भी शामिल होती है. इन दिनों पलाश खिले हैं. इस बार भी इनके फूलों के रंग से ही होली खेलने का मन है.

जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की

फ़िरदौस ख़ान
होली बसंत ऋतु में मनाया जाने वाला रंगों का पावन पर्व है. फाल्गुन माह में मनाए जाने की वजह से इसे फागुनी भी कहा जाता है. देश भर में हर्षोल्लास के साथ यह पर्व मनाया जाता है. म़ुगल शासनकाल में भी होली को पूरे जोश के साथ मनाया जाता था. अलबरूनी ने अपने स़फरनामे में होली का खूबसूरती से ज़िक्र किया है. अकबर द्वारा जोधा बाई और जहांगीर द्वारा नूरजहां के साथ होली खेलने के अनेक क़िस्से प्रसिद्ध हैं. शाहजहां के दौर में होली खेलने का अंदाज़ बदल गया था. उस वक़्त होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी कहा जाता था. आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के बारे में कहा जाता है कि उनके वज़ीर उन्हें गुलाल लगाया करते थे. सूफ़ी कवियों और मुस्लिम साहित्यकारों ने भी अपनी रचनाओं में होली को बड़ी अहमियत दी है.

खड़ी बोली के पहले कवि अमीर ख़ुसरो ने हालात-ए-कन्हैया एवं किशना नामक हिंदवी में एक दीवान लिखा था. इसमें उनके होली के गीत भी हैं, जिनमें वह अपने पीर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के साथ होली खेल रहे हैं. वह कहते हैं-
गंज शकर के लाल निज़ामुद्दीन चिश्त नगर में फाग रचायो
ख्वाजा मुईनुद्दीन, ख्वाजा क़ुतुबुद्दीन प्रेम के रंग में मोहे रंग डारो
सीस मुकुट हाथन पिचकारी, मोरे अंगना होरी खेलन आयो

अपने रंगीले पे हूं मतवारी, जिनने मोहे लाल गुलाल लगायो
धन-धन भाग वाके मोरी सजनी, जिनोने ऐसो सुंदर प्रीतम पायो...

कहा जाता है कि अमीर ख़ुसरो जिस दिन हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के मुरीद बने थे, उस दिन होली थी. फिज़ा में अबीर-गुलाल घुला था. उन्होंने अपने मुरीद होने की ख़बर अपनी मां को देते हुए कहा था-
आज रंग है, ऐ मां रंग है री
मोहे महबूब के घर रंग है री
सजन गिलावरा इस आंगन में
मैं पीर पायो निज़ामुद्दीन औलिया
गंज शकर मोरे संग है री...

पंजाबी के प्रसिद्ध सूफ़ी कवि बाबा बुल्ले शाह अपनी एक रचना में होली का ज़िक्र कुछ इस अंदाज़ में करते हैं-
होरी खेलूंगी कहकर बिस्मिल्लाह
नाम नबी की रतन चढ़ी, बूंद पड़ी इल्लल्लाह
रंग-रंगीली उही खिलावे, जो सखी होवे फ़ना फ़ी  अल्लाह
होरी खेलूंगी कहकर बिस्मिल्लाह...

प्रसिद्ध कृष्ण भक्त रसखान ने भी अपनी रचनाओं में होली का मनोहारी वर्णन किया है. होली पर ब्रज का चित्रण करते हुए वह कहते हैं-
फागुन लाग्यौ सखि जब तें तब तें ब्रजमंडल में धूम मच्यौ है
नारि नवेली बचै नाहिं एक बिसेख मरै सब प्रेम अच्यौ है
सांझ सकारे वही रसखानि सुरंग गुलालन खेल मच्यौ है
को सजनी निलजी न भई अरु कौन भटु जिहिं मान बच्यौ है...

होली पर प्रकृति ख़ुशनुमा होती है. हर तरफ़ हरियाली छा जाती है और फूल भी अपनी भीनी-भीनी महक से माहौल को महका देते हैं. इसी का वर्णन करते हुए प्रसिद्ध लोक कवि नज़ीर अकबराबादी कहते हैं-
जब फागुन रंग झमकते हों
तब देख बहारें होली की
और ढफ के शोर खड़कते हों
तब देख बहारें होली की...

परियों के रंग दमकते हों
तब देख बहारें होली की
खम शीश-ए-जाम छलकते हों
तब देख बहारें होली की...

गुलज़ार खिले हों परियों के
और मजलिस की तैयारी हो
कपड़ों पर रंग के छीटों से
खुश रंग अजब गुलकारी हो
उस रंग भरी पिचकारी को
अंगिया पर तक कर मारी हो
तब देख बहारें होली की…

नज़ीर अकबराबादी की ग्रंथावली में होली से संबंधित 21 रचनाएं हैं. बहादुर शाह ज़फ़र सहित कई मुस्लिम कवियों ने होली पर रचनाएं लिखी हैं. बहरहाल, मुग़लों के दौर में शुरू हुआ होली खेलने का यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. नवाबों के शहर लखनऊ  में तो हिंदू-मुसलमान मिलकर होली बारात निकालते हैं. रंगों का यह त्योहार सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक है.