Thursday, October 30, 2008

राज ठाकरे की नफ़रत की आग ने ली नौ लोगों की 'बलि'

महाराष्ट्र में नवनिर्माण सेना (मनसे) और शिवसेना कार्यकर्ताओं की दहशतगर्दी बदस्तूर जारी है...इसके बावजूद इनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है...यह संगठन खुलेआम देश को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं...क्या यह देशद्रोह नहीं है...? इनके ख़िलाफ़ क्या सिर्फ़ इसलिए कार्रवाई नहीं की जा रही है कि यह बहुसंख्यक वर्ग के संगठन है...धर्म निरपेक्ष देश में यह भेदभाव क्यों...?
गौरतलब है कि महाराष्ट्र में एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे की नफ़रत की आग अब तक नौ लोगों की 'बलि' ले चुकी है...
नफ़रत की इस आग के शिकार हुए लोगों में डोंबिवली (पिसवली गांव) के ओमप्रकाश दुबे, मयूर दुबे, गुरुनाथ भोईर, पवन कुमार महतो (अंधेरी में ट्रेन हादसे का शिकार), लालजी यादव (भांडुप), अंबादास धारराव (नासिक) और राजेंद्र सिंह (नासिक) शामिल हैं। धारराव और राजेंद्र सिंह उत्तर भारतीयों के खिलाफ एमएनएस द्वारा पहले शुरू किए गए आंदोलन के शिकार हुए थे।
मराठी विवाद : चलती ट्रेन में मारा गया उत्तर भारतीय
मुंबई। मुंबई में एक और उत्तर भारतीय मराठी बनाम गैर मराठी विवाद की भेंट चढ़ गया है। दीवाली के दिन मंगलवार दोपहर खपोली से छत्रपति शिवाजी टर्मिनस जा रहे उत्तरप्रदेश के फैजाबाद जिले के धर्मदेव राय (25) को लोकल ट्रेन में इस बेरहमी से पीटा गया कि अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसकी मौत हो गई।
ट्रेन में सवार धर्मदेव के तीन अन्य साथियों की भी भीड़ ने पिटाई की। रेलवे पुलिस ने अब तक करीब 20 लोगों को हिरासत में लिया है। मुख्यमंत्री देशमुख ने मुख्य सचिव को घटना की जांच के आदेश दिए हैं। उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने घटना के लिए केंद्र और महाराष्ट्र सरकार पर निशाना साधा है। धर्मदेव के परिजनों के लिए महाराष्ट्र और यूपी सरकार ने दो-दो लाख के मुआवजे का एलान किया है।
गौरतलब है कि मुंबई के बैलबाजार इलाके में सोमवार को हुए पुलिस शूटआउट में बिहार के राहुल राज की मौत हो गई थी। केंद्र पर कार्रवाई का दबाव बढ़ाने के लिए समाजवादी पार्टी ने रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव और रसायन मंत्री राम विलास पासवान से इस्तीफा देने का आह्वान किया है।
लालू प्रसाद यादव ने महाराष्ट्र में एमएनएस कार्यकर्ताओं द्वारा रेलवे की संपत्ति को नुकसान पहुंचाए जाने को देखते हुए राज्य में रेलों की आवाजाही रोकने की चेतावनी दी है।
रेलवे पुलिस की ढिलाई
कर्जत स्टेशन पर धर्मदेव के साथियों ने जीआरपी को घटना की सूचना दी, लेकिन पुलिस की टुकड़ी ने धर्मदेव को बदलापुर स्टेशन पर गंभीर हालत में ट्रेन से उतारा। धर्मदेव को पास के एक अस्पताल में ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
देर भी, अंधेर भी
एक तो रेलवे पुलिस धर्मदेव और उसके साथियों की मदद के लिए देर से पहुंची, उस पर उसने पूछताछ में ही काफी वक्त गंवा दिया। पुलिस ने दिन में हुई घटना की रिपोर्ट मंगलवार रात दर्ज की।
सरकार पर चौतरफा दबाव
उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर इस घटना पर नाराजगी जाहिर की है। केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटील ने भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख से फोन पर बात की। देशमुख ने उन्हें राज्य में उत्तर भारतीयों की सुरक्षा का आश्वासन देते हुए मामले की जांच राज्य के मुख्य सचिव से कराने की बात कही है। गृह मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि महाराष्ट्र सरकार से मामले की रिपोर्ट मांगी गई है।
राष्ट्रपति शासन की मांग
समाजवादी पार्टी के महासचिव अमर सिंह ने नई दिल्ली में कहा कि महाराष्ट्र में जिस तरह उत्तर भारतीयों पर हमले बढ़ रहे हैं, केंद्र सरकार को फौरन मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर केंद्र पर कार्रवाई का दबाव बनाने के लिए लालू और पासवान को मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दे देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र ने इस मुद्दे पर तत्काल कदम नहीं उठाए तो उसे पांच राज्यों में आसन्न विधानसभा चुनाव और आगामी लोकसभा चुनाव में उत्तर भारतीय वोटरों के गुस्से का सामना करना पड़ सकता है।
राहुल की अंत्येष्टि
मुंबई के बैलबाजार शूटआउट में मारे गए युवक राहुल राज का बुधवार को पटना में अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस मौके पर बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी भी मौजूद थे। अंत्येष्टि स्थल पर मौजूद लोगों ने राज ठाकरे मुर्दाबाद जैसे नारे भी लगाए। बिहार सरकार ने शूटआउट मामले की सीबीआई व न्यायिक जांच की मांग की है।
(साभार दैनिक भास्कर 30 अक्टूबर 2008)

फ़िरदौस जी, पहले जो आपने कहा था, आज पूरा देश कह रहा है...

कल हमसे एक शख्स (जो देश के दूसरे सबसे बड़े सियासी दल (कांग्रेस नहीं...) से ताल्लुक़ रखता है) ने कहा- फ़िरदौस जी कुछ दिन पहले आपने राज ठाकरे को 'देशद्रोही' कहा था, लेकिन आज पूरा देश राज ठाकरे को 'देशद्रोही' कह रहा है... आप वाक़ई काबिल पत्रकार हैं...
आज फिर वही बात दोहराना चाहूंगी कि हमें लगता ही कि हमारे ब्लॉग पर कमेंट्स करने वाले अख़बार नहीं पढ़ते...और न ही न्यूज़ चैनल देखते हैं... जो अख़बारों में शाया होता है...वही हम अपने ब्लॉग में पोस्ट कर रहे हैं...हमारा मक़सद सिर्फ़ ख़बरों को लोगों तक पहुंचाना है...
क्योंकि मैं एक इंसाफ़ पसंद हूं इसलिए यह बात कह रही हूं। 'कुछ' लोग कहा करते थे कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं, लेकिन जो पकड़ा जाता है वो मुसलमान होता है...ऐसा नहीं है...जो आतंकवादी पकड़ा जाता है वो हिन्दू भी होता...प्रज्ञा और उसके साथियों ने यह बात साबित कर दी है...
आज के दैनिक भास्कर में प्रकाशित हिन्दू आतंकवाद से जुड़ी कुछ ख़बरों को पोस्ट कर रही हूं...
इंदौर में ही परिवार के साथ छिपा है रामजी!
इंदौर/शाजापुर. मालेगांव ब्लास्ट मामले में हिरासत में लिए गए रामजी उर्फ रामचंद्र कलसांगरा के परिवार के साथ इंदौर में ही कहीं छिपे होने की आशंका है। छोटे भाई शिवनारायण के पकड़े जाने के बाद उसका व रामजी का परिवार इंदौर का घर छोड़कर किराएदारों को शाजापुर के पास पैतृक गांव जाने का कहकर गया था। भास्कर ने पड़ताल की तो पता चला शिवनारायण व रामजी करीब 15 साल पहले ही गांव छोड़ चुके हैं। वहां रिश्तेदार रहते हैं।
रामजी व शिवनारायण कनाड़िया रोड स्थित शांति विहार कॉलोनी में एक ही मकान के अलग-अलग हिस्सों में रहते थे। 16 अक्टूबर को शिवनारायण को मुंबई एटीएस ने बहाने से बुलाकर पकड़ लिया तो दो-तीन दिन वह परिजन से फोन पर बात करता रहा लेकिन पुलिस द्वारा पकड़े जाने की सूचना मुंबई ले जाने से पहले दी। वहीं रामजी दशहरे के बाद से ही घर नहीं लौटा। इसका खुलासा उसी मकान में किराए से रहने वाली मंजू शर्मा ने किया था। रामजी भी पत्नी लक्ष्मी, बेटे देवव्रत, गुरू व गोविंदा से लगातार बात करता रहा। शिवनारायण के पकड़े जाने के बाद ही रामजी का परिवार व छोटे भाई की पत्नी किरण, बेटा राहुल व बेटी सोनू पड़ोसियों व किराएदारों से यह कहकर चले गए कि वे दीपावाली मनाने शाजापुर के पास गांव जा रहे हैं।
बाबरी का ढांचा ढहाने में टूटी थी टांग?
कुछ ग्रामीणों ने नाम न छपने की शर्त पर बताया रामजी शुरू से कट्टरपंथी रहा है। 90 के दशक में बाबरी मसजिद ढहाने अयोध्या गए लोगों में वह भी शामिल था, जिसमें उसका पैर फ्रैक्चर हो गया था पर इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई।
मौके की सच्चाई
रिश्तेदार ने भी बोला झूठ
शिवनारायण की गिरफ्तारी के बाद उसके पिता गोपालसिंह कुछ दिन रिश्तेदार रामकृष्ण के यहां शांति विहार कॉलोनी के पीछे ही एक कॉलोनी में रहे। भास्कर ने रामकृष्ण से बात की तो उसने शिवनारायण व रामजी को दूर का रिश्तेदार बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की। साथ ही यह भी कहा कि दोनों भाइयों का ब्लास्ट से लेना-देना नहीं है पर न उसने रामजी के गांव का पता नहीं बताया। उसने तो रामजी के पिता के गांव निकल जाने की बात भी कह दी जो उसके ही पड़ोसियों ने झूठी साबित कर दी। मोहल्लेवालों ने बताया रामजी के साथ रामकृष्ण सुबह 6 बजे संगठन के आयोजन में हाफ-पैंट पहनकर जाता था।

किसी को नहीं बताया गांव का पता..- रामकृष्ण व रामजी के किराएदार भी दो दिन बाद ताला लगाकर निकल गए। भास्कर ने लगभग सभी पड़ोसियों व मोहल्लेवालों से रामजी के गांव का पता पूछा तो पता चला उन्होंने सिर्फ शाजापुर में गांव होने की जानकारी दी थी।
आयोजन या गमी में ही शरीक होने जाते थे - भास्कर ने शाजापुर के चिह्न्ति गांवों की पड़ताल की तो पता चला रामजी का गांव शाजापुर से दस किमी दूर गोपीपुर है। वहां सन्नाटा पसरा था। यहां रामजी और शिवनारायण के तार मालेगांव ब्लास्ट से जुड़े होने की सूचना हर ग्रामीण को थी। वे इतने डरे थे कि किसी ने बात तक नहीं की। बमुश्किल से दिलीप पाटीदार ने बताया करीब 15 साल पहले रामजी की मां का देहांत हो गया था। उसके बाद रामजी जमीन-मकान बेचकर इंदौर में बस गया। वह या परिजन गांव में किसी की शादी या किसी गमी में ही आते थे। उनके रिश्तेदार गांव में ही हैं। वे सामने तो नहीं आए पर इतनी पुष्टि जरूर कर दी कि रामजी या उसके परिवार का कोई इंदौर में ही हो सकते हैं। एडीशनल एसपी आरसी पंवार ने भी इसे काफी हद कर सही ठहराते हुए कहा पुलिस गांव पर नजर रखे हुए है और सर्चिग कर रही है।
मंत्री बोले
साध्वी को जानता हूं, साहू मेरा कार्यकर्ता
बम ब्लास्ट में फंसने के बाद जहां कोटिचंडी महायज्ञ की तस्वीरों में साध्वी प्रज्ञा के नजदीक दिखने वालों ने उन्हें पहचानने से ही इंकार कर दिया वहीं लोक निर्माण मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने मंगलवार को भास्कर से कहा- मैं साध्वी प्रज्ञा को जानता हूं और कई बार मिला हूं। श्याम साहू भी मेरा कार्यकर्ता है। हालांकि उन्होंने शिवनारायण और अन्य को पहचानने से इंकार किया।
श्री विजयवर्गीय ने कहा साध्वी से मेरी मुलाकात सिंहस्थ के समय हुई थी। उन्होंने बंदेमातरम कल्याण समिति के नाम से बुजुर्गो की सेवा के लिए कैंप लगाया था। एक बार मैंने साध्वी को स्वामी अवधेशानंद महाराज के आश्रम में देखा। कांग्रेस नेता राहुल सिंह के निवास पर कथा में साध्वी थी और मैं वहां उनसे मिला भी था। मैं जितना उन्हें जानता हूं, उस हिसाब से कह सकता हूं कि वे हिंसक गतिविधियों में लिप्त नहीं हो सकतीं। चुनाव से पहले इसे कांग्रेस का खेल बताते हुए उन्होंने कहा ब्लास्ट की पहली जांच सीबीआई ने की थी और कहा था कि यह अमोनियम नाइट्रेट से हुआ है जबकि मुंबई पुलिस आरडीएक्स बता रही है।
आचार संहिता लगने के बाद अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट आना भी यही साबित करता है। क्यों छिपा रहे हैं सच- श्री विजयवर्गीय के बयानों ने उन संगठन प्रमुखों की परेशानी बढ़ा दी है जिन्होंने श्याम साहू और अन्य लोगों को पहचानने से इंकार कर दिया। विहिप के प्रांत प्रचार प्रसार प्रमुख मुकेश जैन, बजरंग दल के प्रदीप गौर और हिंदू जागरण मंच के प्रांत संयोजक राधेश्याम यादव यही कहते आ रहे हैं कि वे साहू सहित किसी को नहीं जानते।
(साभार दैनिक भास्कर 30 अक्टूबर 2008)

Wednesday, October 22, 2008

राधा-कृष्ण के देश में प्रेम बना गुनाह

शाश्वत और नैसर्गिक प्रेम जिस देश की परम्परा और संस्कृति का अटूट हिस्सा रहा है...मंदिरों में श्रीकृष्ण की मूरत के साथ उनकी प्रेमिका राधा की मूरत राखी जाती है...आज उसी देश में अपनी पसंद से विवाह बंधन में बंधने वाले प्रेमी जोड़े का हुक्का-पानी बंद कर देना, वाक़ई ना इंसाफ़ी है...
मामला इंदौर का है...यहां एक समुदाय की पंचायत ने एक प्रेमी जोड़े को अपनी पसंद से शादी करने पर समुदाय से बाहर निकालने का फ़रमान सुनाया है। लोधा समुदाय की स्थानीय पंचायत के मुखिया सतपाल वर्मा के मुताबिक़ समुदाय के कमलेश जाट और आरती के ख़िलाफ़ यह फ़रमान सुनाया गया है।
उनका कहना है कि इन दोनों की सगाई कहीं और तय हो चुकी थी। लेकिन उन्होंने घर वालों के फ़ैसले के ख़िलाफ़ प्रेम संबंध बनाए। बाद में दोनों ने घर छोड़ दिया और शादी कर ली। युवक-युवती बालिग बताए जा रहे हैं।इस बीच, कमलेश की मंगेतर के पिता को उसके इस क़दम की भनक लगी। उन्होंने समुदाय की पंचायत में अपनी बेटी के भविष्य की दुहाई देते हुए इंसाफ़ की गुहार लगाई। उनका कहना है कि लोधा समुदाय की पंचायत ने हाल में समुदाय के बड़े-बुजुर्गों की मौजूदगी में मामले पर सुनवाई की। इस दौरान पंचायत ने प्रेमी जोड़े को समुदाय के रस्मों के ख़िलाफ़ क़दम उठाने पर कुसूरवार ठहराते हुए उनका हुक्का-पानी बंद करने का फ़ैसला सुनाया।
बहरहाल, शहर के छत्रीपुरा थाना क्षेत्र में मामले पर कल एक बार फिर समुदाय की पंचायत बैठी। बताया जाता है कि समुदाय के लोगों ने प्रेमी जोड़े के मुंह पर कालिख पोतकर इनका जुलूस निकालने का मन तक बना लिया था, लेकिन पुलिस और मीडिया वालों को यह ख़बर मिल गई तथा वह फ़ौरन पंचायत स्थल पर पहुंच गए। नतीजतन पंचायत को फ़िलहाल अपना फ़ैसला टालना पड़ा।
पंचायत के बाद वर्मा ने कहा, ’लड़के-लड़की ने अपने घरवालों को धोखा दिया है। हम चाहते हैं कि इस ग़लती को दोहराया न जाए। इसलिए फ़िलहाल दोनों को समाज से बाहर निकाल दिया गया है।’ उनका कहना है कि इस मामले को लेकर एक-दो महीने के भीतर समुदाय की ’बड़ी पंचायत’ होगी...जिसमें आखिरी फ़ैसला किया जाएगा...

Tuesday, October 21, 2008

राज ठाकरे पागल नहीं, देशद्रोही है

महाराष्ट्र में नवनिर्माण सेना (मनसे) और शिवसेना के दहशतगर्दों ने बांद्रा कोर्ट की इमारत पर भी आज जमकर पथराव किया। गौरतलब है कि मुंबई में बांद्रा कोर्ट में राज ठाकरे की पेशी से ठीक पहले एमएनएस के दहशतगर्दों ने राज ठाकरे की गिरफ्तारी के विरोध में मुलुंड टोल नाका फूंका। इस दौरान पुलिस और एमएनएस के दहशतगर्दों के बीच हिंसक झड़प हुई।
दहशतगर्दी का आलम तो देखिए... चिपलूण में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए ठाकरे ने धमकी देते हुए कहा था, ' मुझे गिरफ्तार करो और इसके नतीजे भुगतने के लिये तैयार रहो, आपको इसके प्रति खेद प्रकट करना होगा। ' उन्होंने कहा, ' राज गिरफ्तार होता है तो पूरे महाराष्ट्र में आग लग जाएगी।' और ऐसा ही हुआ भी...
दरअसल राज ठाकरे को पागल कहना ग़लत है...क्योंकि यह मामला पागलपन का नहीं देशद्रोह का है...उस पर देशद्रोह का मामला दर्ज किया जन चाहिए...आरजेडी ने यही मांग की है...
राज ठाकरे ने मुंबई के उपनगरों में मंगलवार एमएनएस कार्यकर्ताओं द्वारा उत्तर भारतीयों पर किए गए हमले को जायज़ ठहराया। गौरतलब है कि हाल ही में रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षा देने महाराष्ट्र आए परीक्षार्थी कई केंद्रों पर मनसे-शिवसेना की दहशतगर्दी के शिकार बने थे। उत्तर भारतीय परीक्षार्थियों पर पहला हमला शनिवार देर रात ठाणो और कल्याण स्टेशनों पर हुआ। स्टेशन परिसर के पास सो रहे परीक्षार्थियों पर एकाएक मनसे कार्यकर्ताओं ने लाठी, डंडों से हमला बोल दिया। इसके बाद रविवार को मुंबई, ठाणो, कल्याण, डोंबिवली, नवी मुंबई, भायंदर, नालासोपारा, पुणो सहित महाराष्ट्र के कई शहरों में उत्तर भारतीय परीक्षार्थियों पर हमले किए गए।
कई स्थानों पर परीक्षा के पर्चे फाड़े गए और परीक्षार्थियों के हॉल टिकट भी छीन लिए गए। मनसे और शिवसेना कार्यकर्ताओं ने जहां उत्तर भारतीय परीक्षार्थियों को भागने पर मजबूर किया, वहीं मराठी परीक्षार्थियों को कोई नुक़सान नहीं पहुंचाया गया। गौरतलब है कि रेलवे भर्ती बोर्ड ने रविवार को निरीक्षक, गार्ड और सहायक स्टेशन मास्टर के पदों के लिए कुल 82 केंद्रों पर परीक्षा आयोजित की थी।
समाजवादी पार्टी महाराष्ट्र अध्यक्ष एवं राज्यसभा सदस्य अबू आसिम आज़मी का कहना है कि ‘परीक्षार्थियों पर हमले की घटना देशद्रोही हरकत के समान है। मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे को हथकड़ी लगाकर जेल में ठूंस देना चाहिए।’
उत्तर भारतीय विकास परिषद के अध्यक्ष मुन्ना त्रिपाठी ने कहा है कि अगर ‘परीक्षार्थियों पर हमले के मामले में राज ठाकरे को 24 घंटे के अंदर गिरफ्तार नहीं किया गया तो एनसीपी के सभी उत्तर भारतीय नेता इस्तीफ़ा दे देंगे।’ कांग्रेस नेता संजय निरुपम का भी कहना है कि ‘हमले के लिए दोषी मनसे कार्यकर्ताओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।’

Monday, October 20, 2008

महाराष्ट्र में राज ठाकरे की दहशतगर्दी जारी, मनसे पर प्रतिबंध लगे

महाराष्ट्र में नवनिर्माण सेना (मनसे) और शिवसेना कार्यकर्ताओं की दहशतगर्दी बदस्तूर जारी है...इसके बावजूद इनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है...यह संगठन खुलेआम देश को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं...क्या यह देशद्रोह नहीं है...? इनके ख़िलाफ़ क्या सिर्फ़ इसलिए कार्रवाई नहीं की जा रही है कि यह बहुसंख्यक वर्ग के संगठन है...धर्म निरपेक्ष देश में यह भेदभाव क्यों...?
मुंबई मुंबई में राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्मन सेना (मनसे) और शिवसेना कार्यकर्ताओं ने एक बार फिर उत्तर भारतीयों को निशाना बनाया है। इस बार रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षा देने महाराष्ट्र आए परीक्षार्थी कई केंद्रों पर मनसे-शिवसेना कार्यकर्ताओं की दहशतगर्दी के शिकार बने। उत्तर भारतीय परीक्षार्थियों पर पहला हमला शनिवार देर रात ठाणो और कल्याण स्टेशनों पर हुआ। स्टेशन परिसर के पास सो रहे परीक्षार्थियों पर एकाएक मनसे कार्यकर्ताओं ने लाठी, डंडों से हमला बोल दिया। इसके बाद रविवार को मुंबई, ठाणो, कल्याण, डोंबिवली, नवी मुंबई, भायंदर, नालासोपारा, पुणो सहित महाराष्ट्र के कई शहरों में उत्तर भारतीय परीक्षार्थियों पर हमले किए गए।
कई स्थानों पर परीक्षा के पर्चे फाड़े गए और परीक्षार्थियों के हॉल टिकट भी छीन लिए गए। मनसे और शिवसेना कार्यकर्ताओं ने जहां उत्तर भारतीय परीक्षार्थियों को भागने पर मजबूर किया, वहीं मराठी परीक्षार्थियों को कोई नुक़सान नहीं पहुंचाया गया। गौरतलब है कि रेलवे भर्ती बोर्ड ने रविवार को निरीक्षक, गार्ड और सहायक स्टेशन मास्टर के पदों के लिए कुल 82 केंद्रों पर परीक्षा आयोजित की थी।
समाजवादी पार्टी महाराष्ट्र अध्यक्ष एवं राज्यसभा सदस्य अबू आसिम आज़मी का कहना है कि ‘परीक्षार्थियों पर हमले की घटना देशद्रोही हरकत के समान है। मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे को हथकड़ी लगाकर जेल में ठूंस देना चाहिए।’
उत्तर भारतीय विकास परिषद के अध्यक्ष मुन्ना त्रिपाठी ने कहा है कि अगर ‘परीक्षार्थियों पर हमले के मामले में राज ठाकरे को 24 घंटे के अंदर गिरफ्तार नहीं किया गया तो एनसीपी के सभी उत्तर भारतीय नेता इस्तीफ़ा दे देंगे।’ कांग्रेस नेता संजय निरुपम का भी कहना है कि ‘हमले के लिए दोषी मनसे कार्यकर्ताओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।’
रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने तो राज ठाकरे को बाकायदा पागल क़रार दिया है। उनका कहना था कि दरअसल राज पगला गया है। अब उसका इलाज ज़रूरी है। लालू ने मनसे पर पाबंदी लगाने की मांग करते हुए कहा कि यह लुटेरों का झुंड है। सियासत से इसका कोई लेना-देना नहीं। राज ठाकरे के प्रति नरमी बरतने के लिए उन्होंने महाराष्ट्र सरकार को भी आड़े हाथ लिया। रेल मंत्री ने कहा कि मनसे जैसे संगठन देश बांटने की कोशिश कर रहे हैं। लालू ने कहा कि ठाकरे परिवार महाराष्ट्र के लिए वैसे ही एक लाइलाज बीमारी है और अब राज ठाकरे पूरा मेंटल हो गया है।

Saturday, October 18, 2008

जब महिला ने कामांध का सिर क़लम किया

एक युवक की अश्लील हरकतें जब बर्दाश्त से बाहर हो गईं तो पीड़ित महिला ने उसका सिर क़लम कर दिया और बाद में ख़ुद को पुलिस के हवाले कर दिया। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर ज़िले की यह वारदात हमारे समाज और क़ानून व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाती है...साथ ही यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि हम किस तरफ़ जा रहे हैं...? महिलाएं आज कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं...यौन उत्पीड़न, बलात्कार और हत्या की वारदातें आए-दिन सुनने को मिलती रहती हैं...इनके लिए कौन ज़िम्मेदार है...क्या हर पीड़ित महिला को फूलकुमारी की ही तरह अत्याचारी का सिर क़लम करना होगा...अगर महिला उत्पीड़न को न रोका गया तो वो दिन दूर नहीं जब हमारे आसपास न जाने कितनी ही फूलकुमारियां पैदा हो जाएंगी...

मैं यह नहीं कहूंगी कि महिला ने जो किया वो बिल्कुल ठीक था...लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अगर वो ऐसा न करती तो ज़रूर उस कामांध की हवस का शिकार हो जाती... आख़िर यह नौबत आई ही क्यों कि उस महिला को इतना खौफ़नाक क़दम उठाना पड़ा. इस मामले में पुलिस ने सराहनीय काम किया है...पुलिस ने इस महिला को पीड़ित मानते हुए उसे सम्मानपूर्वक घर भेज दिया. पुलिस के मुताबिक़ महिला ने आत्म रक्षा के किए पलटवार किया था...गौरतलब है कि गांव हसनपुर कटौली के मजरा मक्कापुरवा का अन्नू जुलाहा अपने ही पड़ोस में रहने वाले राजकुमार पत्नी फूलकुमारी को अकसर छेड़ता था. मगर दलित वर्ग का राजकुमार उसका विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया...जिससे अन्नू की हरकतें बढ़ती गईं...

गुरुवार को फूलकुमारी पशुओं के चारे के लिए गन्ने के खेत में पत्ते तोड़ रही थी. तभी अन्नू वहां आ गया और उसके साथ ज़बर्दस्ती करने लगा. ख़ुद को बचाने के लिए महिला ने उसका बांका छें लिया और उस पर वार कर दिया... इससे युवक का सिर धड़ से अलग हो गया... बाद में महिला ने ख़ुद थाने में जाकर पुलिस को सारे मामले की जानकारी दी...


पुलिस ने फूलकुमारी की शिकायत पर मृत युवक के ख़िलाफ़ बलात्कार, हत्या के प्रयास और उत्पीड़न का मामला दर्ज कर लिया. ज़िले के पुलिस कप्तान राम भरोसे के मुताबिक़ महिला पीड़ित है और उसने अपने बचाव में ऐसा किया. इसलिए उसने कोई ज़ुर्म नहीं किया.

Thursday, October 16, 2008

''बुराई को भलाई से दूर करो'' : क़ुरान

जमीयत अहले-हदीस ने दहशतगर्दी को इस्लाम के ख़िलाफ़ क़रार देते हुए है कि इस्लाम में दहशतगर्दी के लिए कोई जगह नहीं है...कल नई देहली में हुई एक कांफ्रेंस को खिताब करते हुए उन्होंने इस बात पर भी अफ़सोस जताया कि आज दहशतगर्दी को इस्लाम से जोड़ा जा रहा है...

दरअसल दहशतगर्दी को इस्लाम से जोड़ना एक सोची-समझी सांजिश है जिसकी शुरुआत पश्चिमी देशों ने की थी। आतंकवाद की निंदा करनी चाहिए, भले ही वो कोई इंसान करे, संगठन करे या फिर कोई सरकार करे, लेकिन इसे मजहब से जोड़े जाने को किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता। गौरतलब है कि 'इस्लाम' शब्द अरबी भाषा के 'सलाम' शब्द से निकला है, जिसका मतलब है सलामती, अमन। ऐसी हालत में आखिर किस बिनाह पर कहा जा सकता है कि इस्लाम दहशतगर्दों को पनाह देता है।

क़ुरान में कहा गया है कि ''वह (अल्लाह) ऐसा माबूद है कि उसके अलावा कोई दूसरा माबूद नहीं है, वह शहंशाह है, पाक है, सलामती और अमन देने वाला निगरां है।'' (क़ुरान: 59:23)

क़ाबिले-गौर यह भी है कि मुसलमानों को हुक्म दिया गया है कि जब किसी पैगम्बर का नाम सुनो तो उसके साथ 'अलैहिस्सलाम' कहो। इसका मतलब है उन (पैगम्बर) पर सलामती और अमन हो। जब मुसलमान आपस में मिलते हैं तो एक-दूसरे को सलाम करते हैं, जिसका मतलब भी अमन और सलामती ही है।

जन्नत में भी लोगों को सलामती के ही शब्दों से पुकारा जाएगा। इस बारे में कहा गया है कि ''और उनका परस्पर सलाम यह होगा कि अमन और सलामती हो तुम पर।'' (क़ुरान:10:10)

जन्नत की तारीफ में कहा गया है कि ''वहां हर तरफ से अमनो-सलामती ही अमनो-सलामती की आवाज आएगी।'' (क़ुरान 56:26)

पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल0 को संबोधित करते हुए कहा गया है कि ''ऐ मुहम्मद! हमने तुम्हें दुनिया के लिए दयालुता ही बनाकर भेजा है।'' (क़ुरान 21:07)

क़ुरान में जगह-जगह लोगों को सब्र करने और माफ़ करने की ताकीद की गई है। क़ुरान में 85 जगह अल्लाह को माफ़ करने वाला कहा गया है। अल्लाह ने अपने नबी से कहा है कि ''ऐ पैगम्बर! ईमान वालों से कह दो कि वे उनको भी माफ कर दिया करें जो अल्लाह के कर्म परिणामों की उम्मीद नहीं रखते, ताकि लोगों को उनकी करतूतों का बदला मिले। जो कोई अच्छा काम करता है तो अपने लिए ही करेगा और जो कोई बुरा काम करता है तो उसका बवाल उसी पर होगा। फिर तुम अपने रब की तरफ लौटाए जाओगे।'' (क़ुरान 45 : 14-15)

''बुराई को भलाई से दूर करो'' (क़ुरान 28 :54)

''और जो शख्स सब्र से काम ले और दूसरे के कसूर को माफ कर दे तो बेशक यह बड़ी हिम्मत का काम है।'' (क़ुरान 42 :43)

''बेशक अल्लाह तुम्हें इंसाफ़ और नेक काम करने का हुक्म देता है।'' (क़ुरान 16 :90)

''तुम में जो श्रेष्ठ और सामर्थ्यवान हैं, वे नातेदारों, मुहताजों और अल्लाह के रास्ते में घरबार छोड़ने वालों को कुछ न देने की कसम न खा बैठें। उन्हें चाहिए कि माफ़ कर दें और उनसे दरगुज़र करें। क्या तुम नहीं चाहते कि अल्लाह बड़ा माफ़ करने वाला और रहम करने वाले है।'' (क़ुरान 24 :22)

''भलाई और बुराई बराबर नहीं है। अगर कोई बुराई करे तो उसका जवाब भलाई से दो। फिर तुम देखोगे कि तुम्हारा दुश्मन ही तुम्हारा गहरा दोस्त बन गया है। और यह गुण उन्हीं को मिलता है जो सब्र करने वाले हैं और जो बेहद खुशनसीबहैं। अगर इस बाबत शैतान के उकसाने से तुम्हारे अंदर कोई उकसाहट पैदा हो जाए तो अल्लाह की पनाह तलाश करो। बेशक वही सब कुछ सुनने वाला और जानने वाला है।'' (क़ुरान 41 : 34-36)

पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल0 ने अपनी बेटी के क़ातिल को माफ़ करते हुए बस यही कहा था कि मेरी नज़रों के सामने से हट जाओ...यही है मेरा इस्लाम...

Wednesday, October 15, 2008

मुस्लिम क़ौम को अनपढ़ रखने की साज़िश

कुछ अफ़राद का कहना है कि हम इस तहरीर का हिन्दी में दें...फ़िलहाल वक़्त की कमी के चलते ऐसा मुमकिन नहीं...लेकिन हमारी कोशिश रहेगी कि मुस्तक़बिल में इस तहरीर का हिन्दी तर्जुमा दे पाएं...यह तहरीर देने का हमारा मक़सद सिर्फ़ यही है कि अवाम को इल्म हो जाए कि दहशतगर्दी के नाम पर किस तरह मुसलमानों पर ज़ुल्म ढहाए जा रहे हैं...ज़ुल्म मुसलमान पर हो, ईसाई पर हो, हिंदू पर हो या किसी और मज़हब को मानने वाले पर...ग़लत है...अफ़सोस की बात यह है कि 'कुछ लोग' नहीं चाहते कि मुसलमान तरक़्क़ी करें...मुसलमान बच्चे मदरसे में पढ़ें तो आतंकवादी हैं...अगर कॉलेज में पढ़ें तो और भी बड़े आतंकवादी हैं...यानि साज़िश यह कि मुस्लिम क़ौम हमेशा अनपढ़ और जाहिल बनी रहे...जहां तक बंटवारे की बात है उसके लिए मुसलमानों को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता...हिन्दू नेताओं के सत्ता के लालच की वजह से बंटवारा हुआ था...इस फिर कभी तफ़सील से लिखूंगी...
हिन्दू भाइयों से अनुरोध है कि वो हमारी बात को समझने की कोशिश करें...यह अच्छी बात है कि इस देश के बहुसंख्यक वर्ग का एक बड़ा तबका सेकुलर है...मैं भी सेकुलर हूं...अगर किसी हिन्दू या किसी और मज़हब के साथ शख्स पर ज़ुल्म होता है तब भी मुझे इतनी ही तकलीफ़ होती है...मेरी तहरीरें इस बात कि गवाह हैं... अब एक सवाल- क्या अपनी क़ौम पर होने वाले ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना ग़लत है...?

Friday, October 10, 2008

क्यों सुनाई नहीं देतीं मासूमों की चीखें

फ़िरदौस ख़ान
कुपोषण के कारण मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में बच्चों के मौत की खबर के बीच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का कि देश के क़रीब आधे बच्चे कुपोषित हैं, सोचने पर मजबूर करता है क्या हमारा देश वाक़ई तरक़्क़ी कर रहा है... ?

हैरत की बात यह भी है कि जिस देश में धर्म-कर्म के नाम पर इतना कहर बरपा किया जाता है...उन तथाकथित राष्ट्रवादियों को भूख से तड़पते इन मासूमों की चीखें सुनाई नहीं देतीं...क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सभी मज़हबों के लोग मज़हब के नाम पर लड़ने-झगड़ने की बजाय आपस में मिलजुल कर मानवता की सेवा करें...

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश की एक स्वयंसेवी संस्था द्वारा ‘भोजन का अधिकार अभियान’ द्वारा वहां की हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका के मुताबिक़ राज्य में कुपोषण के कारण 159 बच्चों की मौत हो चुकी है। ये मौतें इस साल 8 मई से लेकर 10 सितंबर के बीच हुई हैं।

आयोग का कहना है कि इसकी वजह सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का ज़रूरतमंद बच्चों तक नहीं पहुंचना है। आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एस राजेंद्र बाबू ने कहा कि यह देश के समक्ष सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है। देश में बच्चों के कल्याण के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इसके बावजूद कोई भी योजना इतनी अच्छी नहीं है कि उसमें देश के सभी बच्चे शामिल हों। उनका कहना है कि सरकारी कल्याणकारी योजनाओं को जिस तरीके से लागू किया जाना चाहिए था, वे उस तरीके से लागू नहीं हो रही हैं। ये योजनाएं ज़रूरतमंद लोगों तक नहीं पहुंच पा रही हैं, वरना मध्यप्रदेश में इतने बच्चों की मौत नहीं होती।

क़ाबिले-गौर है कि कुछ समय पहले संसद में पेश एक रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में 46 फ़ीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-3), 2005-06 की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में तीन साल से कम उम्र के क़रीब 47 फीसदी बच्चे कम वज़न के हैं। इसके कारण उनका शारीरिक विकास भी रुक गया है। देश की राजधानी दिल्ली में 33।1 फ़ीसदी बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं, जबकि मध्य प्रदेश में 60।3 फ़ीसदी, झारखंड में 59.2 फ़ीसदी, बिहार में 58 फ़ीसदी, छत्तीसगढ़ में 52.2 फ़ीसदी, उड़ीसा में 44 फ़ीसदी, राजस्थान में भी 44 फ़ीसदी, हरियाणा में 41.9 फ़ीसदी, महाराष्ट्र में 39.7 फ़ीसदी, उत्तरांचल में 38 फ़ीसदी, जम्मू कश्मीर में 29.4 फ़ीसदी और पंजाब में 27 फ़ीसदी बच्चे कुपोषणग्रस्त हैं।

यूनिसेफ़ द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया के कुल कुपोषणग्रस्त बच्चों में से एक तिहाई आबादी भारतीय बच्चों की है। भारत में पांच करोड़ 70 लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। विश्व में कुल 14 करोड़ 60 लाख बच्चे कुपोषणग्रस्त हैं। विकास की मौजूदा दर अगर ऐसी ही रही तो 2015 तक कुपोषण दर आधी कर देने का सहस्राब्दी विकास लक्ष्य 'एमडीजी' 2025 तक भी पूरा नहीं हो सकेगा। रिपोर्ट में भारत की कुपोषण दर की तुलना अन्य देशों से करते हुए कहा गया है कि भारत में कुपोषण की दर इथोपिया, नेपाल और बांग्लादेश के बराबर है। इथोपिया में कुपोषण दर 47 फ़ीसदी तथा नेपाल और बांग्लादेश में 48-48 फ़ीसदी है, जो चीन की आठ फ़ीसदी, थाइलैंड की 18 फ़ीसदी और अफगानिस्तान की 39 फ़ीसदी के मुकाबले बहुत ज़्यादा है।

यूनिसेफ़ के एक अधिकारी के मुताबिक़ भारत में हर साल बच्चों की 21 लाख मौतों में से 50 फ़ीसदी का कारण कुपोषण होता है। भारत में खाद्य का नहीं, बल्कि जानकारी की कमी और सरकारी लापरवाही ही कुपोषण का कारण बन रही है। उनका यह भी कहना है कि अगर नवजात शिशु को आहार देने के सही तरीके के साथ सेहत के प्रति कुछ सावधानियां बरती जाएं तो भारत में हर साल पांच साल से कम उम्र के छह लाख से ज्यादा बच्चों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकता है।

1996 में रोम में हुए पहले विश्व खाद्य शिखर सम्मेलन (डब्ल्यूएफएस) के दौरान तक़रीबन सभी देशों के प्रमुखों ने यह वादा दोहराया था कि पर्याप्त स्वच्छ और पोषक आहार पाना सभी का अधिकार होगा।उनका मानना था कि यह अविश्वसनीय है कि दुनिया के 84 करोड़ लोगों को पोषक ज़रूरतें पूरी करने के लिए अनाज उपलब्ध नहीं है। कुपोषण संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए राष्ट्रीय आर्थिक विकास व्यय 20 से 30 अरब डॉलर प्रतिवर्ष है। विकासशील देशों में चार में से एक बच्चा कम वज़न का है। यह संख्या क़रीब एक करोड़ 46 लाख है। नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद अल बरदेई ने इस समस्या की ओर विश्व का ध्यान आकर्षित करते हुआ कहा था कि अगर विश्व में सेना पर खर्च होने वाले बजट का एक फ़ीसदी भी इस मद में खर्च किया जाए तो भुखमरी पर काफ़ी हद तक काबू पाया जा सकता है।

खैर... हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इंसानियत से बढ़कर कोई मज़हब नहीं...और जनसेवा से बढ़कर कोई इबादत नहीं...

Wednesday, October 8, 2008

पाक कश्मीर की आज़ादी के खिलाफ़ नहीं

आख़िर पाकिस्तान ने कश्मीरियों के बारे में अपना रुख़ साफ़ कर ही दिया। ब्रिटेन में पाकिस्तान के उच्चयुक्त वाजिद शम्सुल हसन ने कश्मीर पर कहा है कि पाकिस्तान कश्मीर में 'बाहर के चरमपंथियों के आतंकवाद' के ख़िलाफ़ है। उन्होंने कश्मीरियों के भारत के विरुद्ध बल प्रयोग को उचित ठहराया है. गौरतलब है कि श्री हसन हाल में देश के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के वॉल स्ट्रीट जर्नल को दिए उस इंटरव्यू के बारे में स्पष्टीकरण दे रहे थे, जिसमें उन्होंने भारत प्रशासित कश्मीर में इस्लामी चरमपंथियों को 'आतंकवादी' कहा था.


क़ाबिले-गौर यह भी है कि राष्ट्रपति ज़रदारी के विचारों के बारे में छपी रिपोर्ट के बाद प्रदर्शनकारियों ने भारत प्रशासित कश्मीर में जारी कर्फ़्यू की अवहेलना करते हुए भारतीय प्रशासन और ज़रदारी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किए थे। कश्मीर में ऐसा पहली बार हुआ है जब पाकिस्तान के किसी नेता के पुतले जलाए गए हैं। आमतौर भारत प्रशासित कश्मीर में भारतीय प्रशासन का विरोध करते समय पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगते रहे हैं.


प्रमुख अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने ज़रदारी के बयान की कड़े शब्दों में निंदा की है। उनका कहना है कि " ज़रदारी ने अमरीका को ख़ुश करने के लिए यह बयान दिया है। ज़रदारी भारत से डरते हैं और भारत को ख़ुश करने के लिए पाकिस्तान की प्रतिष्ठा से भी समझौता कर सकते हैं।'' उनका यह भी कहना है कि ''कश्मीरी युवा अपने हक़ के लिए लड़ रहे हैं। सच तो यह है कि कश्मीर की जनता सरकारी आतंकवाद का आतंक का शिकार है। कश्मीरी के विद्रोहियों को आतंकवादी कह देने से कश्मीर की स्वायत्ता और स्वतंत्रता का आंदोलन कमज़ोर पड़ने वाला नहीं है. चरमपंथी संगठन अल-उमर-मुजाहिदीन के प्रमुख कमांडर मुश्ताक़ ज़रगार ने भी ज़रदारी के बयान की आलोचना करते हुए कहा था कि "ज़रदारी ने भारत को कश्मीरी युवाओं को क़त्ल करने का लाइसेंस दे दिया है."


पाक उच्चायुक्त का कहना था कि राष्ट्रपति ज़रदारी 'कश्मीरी बाशिंदों के अपने संघर्ष को और स्वशासन के अधिकार' को नुक़सान पहुंचाने की कोशिश नहीं कर रहे थे। मीडिया को भेजे गए एक ई-मेल में उन्होंने कहा कि 'पाकिस्तान विदेशी चरमपंथियों की ओर से सीमापार घुसपैठ और कश्मीरियों की आज़ादी की मुहिम को नेस्तनाबूद किए जाने' के ख़िलाफ़ है। ई-मेल में यह भी कहा गया है कि- 'इन विदेशी चरमपंथियों ने कश्मीरियों के स्वतंत्रता के संघर्ष की मदद करने की जगह उसे नुक़सान पहुंचाया है।'


गौरतलब है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति बनने के बाद संसद को अपने पहले संबोधन में आसिफ़ अली ज़रदारी ने कश्मीर का ज़िक्र करते हुए कहा था कि- ''मूल अधिकारों की बहाली को लेकर कश्मीरी लोगों के न्यायसंगत संघर्ष के प्रति हम वचनबद्ध हैं।''

Tuesday, October 7, 2008

मासूमों को निगल रहा है कुपोषण

फ़िरदौस ख़ान

बेशक भारत आर्थिक और परमाणु शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, लेकिन बच्चों के स्वास्थ्य के मामले में वह काफ़ी पीछे है। मध्य प्रदेश में कुपोषण से हो रहीं मौतें इस बात को साबित करने के लिए काफ़ी हैं। गौरतलब है कि पिछले क़रीब एक महीने में मध्यप्रदेश के खंडवा, झाबुआ, सतना और शिवपुरी ज़िलों में क़रीब 100 बच्चों की मौत हो चुकी है और दो सौ से ज़्यादा अस्पताल में भर्ती हैं।


कुछ समय पहले संसद में पेश एक रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में 46 फ़ीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-3), 2005-06 की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में तीन साल से कम उम्र के क़रीब 47 फीसदी बच्चे कम वज़न के हैं। इसके कारण उनका शारीरिक विकास भी रुक गया है। देश की राजधानी दिल्ली में 33।1 फ़ीसदी बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं, जबकि मध्य प्रदेश में 60.3 फ़ीसदी, झारखंड में 59.2 फ़ीसदी, बिहार में 58 फ़ीसदी, छत्तीसगढ़ में 52.2 फ़ीसदी, उड़ीसा में 44 फ़ीसदी, राजस्थान में भी 44 फ़ीसदी, हरियाणा में 41.9 फ़ीसदी, महाराष्ट्र में 39.7 फ़ीसदी, उत्तरांचल में 38 फ़ीसदी, जम्मू कश्मीर में 29.4 फ़ीसदी और पंजाब में 27 फ़ीसदी बच्चे कुपोषणग्रस्त हैं।


यूनिसेफ़ द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया के कुल कुपोषणग्रस्त बच्चों में से एक तिहाई आबादी भारतीय बच्चों की है। भारत में पांच करोड़ 70 लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। विश्व में कुल 14 करोड़ 60 लाख बच्चे कुपोषणग्रस्त हैं। विकास की मौजूदा दर अगर ऐसी ही रही तो 2015 तक कुपोषण दर आधी कर देने का सहस्राब्दी विकास लक्ष्य 'एमडीजी' 2025 तक भी पूरा नहीं हो सकेगा। रिपोर्ट में भारत की कुपोषण दर की तुलना अन्य देशों से करते हुए कहा गया है कि भारत में कुपोषण की दर इथोपिया, नेपाल और बांग्लादेश के बराबर है। इथोपिया में कुपोषण दर 47 फ़ीसदी तथा नेपाल और बांग्लादेश में 48-48 फ़ीसदी है, जो चीन की आठ फ़ीसदी, थाइलैंड की 18 फ़ीसदी और अफगानिस्तान की 39 फ़ीसदी के मुकाबले बहुत ज़्यादा है।


यूनिसेफ़ के एक अधिकारी के मुताबिक़ भारत में हर साल बच्चों की 21 लाख मौतों में से 50 फ़ीसदी का कारण कुपोषण होता है। भारत में खाद्य का नहीं, बल्कि जानकारी की कमी और सरकारी लापरवाही ही कुपोषण का कारण बन रही है। उनका यह भी कहना है कि अगर नवजात शिशु को आहार देने के सही तरीके के साथ सेहत के प्रति कुछ सावधानियां बरती जाएं तो भारत में हर साल पांच साल से कम उम्र के छह लाख से ज्यादा बच्चों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकता है।


दरअसल, कुपोषण के कई कारण होते हैं, जिनमें महिला निरक्षरता से लेकर बाल विवाह, प्रसव के समय जननी का उम्र, पारिवारिक खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य की देखभाल, टीकाकरण, स्वच्छ पेयजल आदि मुख्य रूप से शामिल हैं। हालांकि इन समस्याओं से निपटने के लिए सरकार ने कई योजनाएं चलाई हैं, लेकिन इसके बावजूद संतोषजनक नतीजे सामने नहीं आए हैं। देश की लगातार बढ़ती जनसंख्या भी इन सरकारी योजनाओं को धूल चटाने की अहम वजह बनती रही है, क्योंकि जिस तेजी से आबादी बढ़ रही है उसके मुकाबले में उस रफ्तार से सुविधाओं का विस्तार नहीं हो पा रहा है। इसके अलावा उदारीकरण के कारण बढ़ी बेरोज़गारी ने भी भुखमरी की समस्या पैदा की है। आज भी भारत में करोड़ों परिवार ऐसे हैं जिन्हें दो वक़्त की रोटी भी नहीं मिल पाती। ऐसी हालत में वे अपने बच्चों को पौष्टिक भोजन भला कहां से मुहैया करा पाएंगे।


एक कुपोषित शरीर को संपूर्ण और संतुलित भोजन की ज़रूरत होती है। इसलिए सबसे बड़ी चुनौती फ़िलहाल भूखों को भोजन कराना है। हमारे संविधान में कहा गया है कि 'राज्य पोषण स्तर में वृध्दि और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में समझेगा।' मगर आजादी के छह दशक बाद भी 46 फ़ीसदी बच्चे कुपोषण की गिफ्त में हों तो ज़ाहिर है कि राज्य अपने प्राथमिक संवैधानिक कर्तव्यों में नकारा साबित हुए हैं।


1996 में रोम में हुए पहले विश्व खाद्य शिखर सम्मेलन (डब्ल्यूएफएस) के दौरान तक़रीबन सभी देशों के प्रमुखों ने यह वादा दोहराया था कि पर्याप्त स्वच्छ और पोषक आहार पाना सभी का अधिकार होगा।उनका मानना था कि यह अविश्वसनीय है कि दुनिया के 84 करोड़ लोगों को पोषक ज़रूरतें पूरी करने के लिए अनाज उपलब्ध नहीं है। कुपोषण संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए राष्ट्रीय आर्थिक विकास व्यय 20 से 30 अरब डॉलर प्रतिवर्ष है। विकासशील देशों में चार में से एक बच्चा कम वज़न का है। यह संख्या क़रीब एक करोड़ 46 लाख है। नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद अल बरदेई ने इस समस्या की ओर विश्व का ध्यान आकर्षित करते हुआ कहा था कि अगर विश्व में सेना पर खर्च होने वाले बजट का एक फ़ीसदी भी इस मद में खर्च किया जाए तो भुखमरी पर काफ़ी हद तक काबू पाया जा सकता है।


हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो फ़सल काटे जाने के बाद खेत में बचे अनाज और बाजार में पड़ी गली-सड़ी सब्जियां बटोरकर किसी तरह उससे अपनी भूख मिटाने की कोशिश करते हैं। महानगरों में भी भूख से बेहाल लोगों को कूड़ेदानों में से रोटी या ब्रेड के टुकड़ों को उठाते हुए देखा जा सकता है। रोज़गार की कमी और ग़रीबी की मार के चलते कितने ही परिवार चावल के कुछ दानों को पानी में उबालकर पीने को मजबूर हैं। इस हालत में भी सबसे ज़्यादा त्याग महिलाओं को ही करना पड़ता है, क्योंकि वे चाहती हैं कि पहले परिवार के पुरुषों और बच्चों को उनका हिस्सा मिल जाए।


क़ाबिले-गौर यह भी है कि हमारे देश में एक तरफ़ अमीरों के वे बच्चे हैं जिन्हें दूध में भी बोर्नविटा की ज़रूरत होती है तो दूसरी तरफ़ वे बच्चे हैं जिन्हें पेटभर चावल का पानी भी नसीब नहीं हो पाता और वे भूख से तड़पते हुए दम तोड़ देते हैं। यह एक कड़वी सच्चाई है कि हमारे देश में आज़ादी के बाद से अब तक ग़रीबों की भलाई के लिए योजनाएं तो अनेक बनाई गईं, लेकिन लालफ़ीताशाही के चलते वे महज़ कागज़ों तक ही सीमित होकर रह गईं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तो इसे स्वीकार करते हुए यहां तक कहा था कि सरकार की ओर से चला एक रुपया ग़रीबों तक पहुंचे-पहुंचते पांच पैसे ही रह जाता है। एक तरफ़ गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ता है तो दूसरी तरफ़ भूख और कुपोषण से लोग मर रहे होते हैं। ऐसी हालत के लिए क्या व्यवस्था सीधे तौर पर दोषी नहीं है?



(इस आलेख को आज यानि 7 अक्टूबर 2008 के दैनिक जागरण में भी पढ़ा जा सकता है)

Monday, October 6, 2008

बाढ़ आती ही नहीं, लाई भी जाती है


फ़िरदौस ख़ान
देश के अन्य राज्यों के साथ ही बाढ़ ने इस साल पंजाब में भी कहर बरपाया, लेकिन पंजाब की बाढ़ प्राकृतिक आपदा न होकर मानवीय लापरवाही का नतीजा है। बाढ़ से जहां राज्य के सैकड़ों गांव जलमग्न हो गए, वहीं क़रीब 13 लोग भी बाढ़ की वजह से मौत की आगोश में समा गए। खेतों में खड़ी वे फसलें भी बाढ़ के पानी में बह गईं, जिन्हें किसानों के अपने खून-पसीने से सींचा था।

राज्य के अधिकारियों के मुताबिक़ फिरोज़पुर के 140 गांव, कपूरथला के 106 गांव, मोगा के 40 गांव, तरनतारन के 28 गांव और जालंधर के 14 गांव बाढ़ की चपेट में आए हैं। इन गांवों की क़रीब 66 हज़ार एकड़ भूमि बाढ़ से प्रभावित हुई है। फिरोज़पुर के 100 गांव तो पूरी तरह पानी में डूब गए, जिससे कई दिनों तक वहां की बिजली सप्लाई पूरी तरह बंद कर दी गई।

बाढ़ का कारण धुस्सा बांध का टूटना है। भाखड़ा डैम और सतलुज डैम से सतलुज में पानी छोड़ा गया, जिससे हालात और ज्यादा गंभीर हो गए। सिंचाई विभाग के मुताबिक़ भांखरपुर, धर्मकोट और धालीवाल नहर में भी जरूरत से ज्यादा पानी छोड़ा गया। अधिकारियों का कहना है कि अगर रोजाना एक से डेढ़ घंटा लगातार बारिश पड़ती है तो डैम और नहरों में पानी का स्तर बढ़ जाता है, जिससे भारी नुकसान होने की आशंका बढ़ जाती है। अफ़सोस की बात यह भी है कि सरकार के नुमाइंदे प्रशासनिक खामियों को नकारते हुए बाढ़ के लिए ग्रामीणों को ही क़सूरवार ठहराते हैं।


इसी कड़ी में, बाढ़ प्रभावित इलाकों का जायज़ा लेने के लिए मोगा के गांव संघेड़ा में पहुंचे सिंचाई मंत्री सरदार जनमेजा सिंह सेखों ने लोगों से बातचीत करते हुए धुस्सी बांध टूटने का ठीकरा ग्रामीणों के ही सिर ही फोड़ दिया। इससे ग्रामीण भड़क उठे और उन्होंने बांध प्रबंधों के नाम पर हुई घपलेबाजी की पोल खोलनी शुरू कर दी। अब भड़कने की बारी सिंचाई मंत्री की थी। मामले की नजाकत को भांपते हुए डिप्टी कमिश्नर वीके मीणा और एसडीएम लखमीर सिंह ने दोनों पक्षों को शांत कराया। ग्रामीणों का कहना है कि 1993 के बाद प्रशासन ने बांध पर मिट्टी डलवाने तक की कोशिश नहीं की। गांव के लोग हर साल ख़ुद ही मिट्टी डालते रहे हैं और सिंचाई विभाग फर्जी बिल बनाकर पैसा हड़प करता रहा है। उनका यह भी कहना है कि हर साल बांध पर थोड़ी-थोड़ी मिट्टी भी डलवाई होती तो इतनी तबाही नहीं हुई होती। उनका कहना है कि अधिकारियों और राजनेताओं ने अपने निजी स्वार्थ के लिए हजारों लोगों को बर्बाद कर दिया।


गौरतलब है कि सतलुज में आई बाढ़ से हुई तबाही ने प्रशासनिक प्रबंधों की कलई खोलकर रख दी है। मोगा के गांव बोगेवाल के समीप जिस स्थान पर धुस्सी बांध टूटा है, वहां 1997 में तकनीकी रूप से गलत ढंग से नोज तैयार की गई थी, जिससे बांध में दरारें पड़ गईं। धुस्सी बांध के किनारों पर लगाए गए बबूल के पेड़ों के कटान के चलते भी बांध सुरक्षा संबंधी सवालों के घेरे में था। हर साल मानसून शुरू होने से पहले धुस्सी बांध का जायजा लेने वाले अधिकारियों ने नोज की तकनीकी कमी और पेड़ों के कटान के कारण कमज़ोर होते बांध की तरफ़ ध्यान नहीं दिया। नोज निर्माण में लापरवाही स्वीकार करते हुए सिंचाई मंत्री सरदार जनमेजा सिंह सेखों ने कहा कि मामले की जांच सिंचाई विभाग के मुख्य इंजीनियर को सौंपी गई है।


सिंचाई मंत्री के मुताबिक़ राज्य के 134 गांवों में बाढ़ आई है, जिससे 55 हज़ार प्रभावित हुए हैं। इन गांवों में क़रीब 11080 हेक्टेयर क्षेत्र में खड़ी फ़सलें भी पूरी तरह तबाह हो गई हैं। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि प्रभावित किसानों के नुक़सान की भरपाई की जाए, क्योंकि केंद्रीय पूल दिए जाने वाले अनाज में पंजाब के किसानों की हिस्सेदारी 60 से 70 फ़ीसदी रहती है। साथ ही उन्होंने किसानों के क़र्ज़ भी माफ़ किए जाने की मांग की। गौरतलब है कि बांग्लादेश के बाद भारत ही दुनिया का दूसरा सर्वाधिक बाढ़ग्रस्त देश है। 1960 से 1980 के बीच दुनिया में बाढ से जो लोग मरे उनमें से 20 फ़ीसदी भारत से ही थे। विडंबना यह भी है कि पिछले क़रीब छह दशकों में बाढ़ से होने वाले नुक़सान में 50 से 90 गुना बढ़ोतरी हुई है। एक अनुमान के मुताबिक़ 1953 में जहां कुल नुक़सान क़रीब 50 करोड़ रुपए था, वहीं 1984 में यह 2500 करोड़, 1985 में 4100 करोड़ और 1988 में 4600 करोड़ रुपए हो गया। 1990 के शुरू में कम नुक़सान हुआ। 1997 में 800 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था, लेकिन 1999 और 2000 में बाढ़ से ज़्यादा तबाही हुई। हर साल बाढ़ से होने वाले जान व माल के नुक़सान में बढ़ोतरी ही हो रही है, जो बेहद चिंताजनक है।


देश में कुल 62 प्रमुख नदी प्रणालियां हैं, जिनमें से 18 ऐसी हैं जो अमूमन बाढ़ग्रस्त रहती हैं। उत्तर-पूर्व में असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश तथा दक्षिण में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु बाढ़ग्रस्त इलाके माने जाते हैं। लेकिन कभी-कभार देश के अन्य राज्य भी बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं। 1996 में हरियाणा में बाढ़ ने कहर बरपाया था।


पिछले करीब छह दशकों में देश में 256 बड़े बांध बनाए गए हैं और 154 निर्माणाधीन हैं। साथ ही पिछले करीब दो दशकों से बाढ़ नियंत्रण में मदद के लिए रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना व्यवस्था का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन संतोषजनक नतीजे सामने नहीं आ पा रहे हैं।


गौरतलब है कि विकसित देशों में आगजनी, तूफान, भूकंप और बाढ़ के लिए कस्बों का प्रशासन भी पहले से तैयार रहता है। उन्हें पहले से पता होता है कि किस पैमाने पर, किस आपदा की दशा में, उन्हें क्या-क्या करना है। वे बिना विपदा के छोटे पैमाने पर इसका अभ्यास करते रहते हैं। इसमें आम शहरियों के मुखियाओं को भी शामिल किया जाता है। गली-मोहल्ले के हर घर तक यह सूचना मीडिया या डाक के जरिये संक्षेप में पहुंचा दी जाती है कि किस दशा में उन्हें क्या करना है। संचार व्यवस्था के टूटने पर भी वे प्रशासन से क्या उम्मीद रख सकते हैं। पहले तो वे इसकी रोकथाम की कोशिश करते हैं। इसमें विशेषज्ञों की सलाह ली जाती है। इस प्रक्रिया को आपदा प्रबंधन कहते हैं। आग तूफान और भूकंप के दौरान आपदा प्रबंधन एक खर्चीली प्रक्रिया है, लेकिन बाढ़ का आपदा नियंत्रण उतना खर्चीला काम नहीं है। इसे बखूबी बाढ़ आने वाले इलाकों में लागू किया जा सकता है।


विकसित देशों में बाढ़ के आपदा प्रबंधन में सबसे पहले यह ध्यान रखा जाता है कि मिट्टी, कचरे वगैरह के जमा होने से इसकी गहराई कम न हो जाए। इसके लिए नदी के किनारों पर खासतौर से पेड़ लगाए जाते हैं, जिनकी जड़ें मिट्टी को थामकर रखती हैं। नदी किनारे पर घर बसाने वालों के बगीचों में भी अनिवार्य रूप से पेड़ लगवाए जाते हैं। जहां बाढ़ का खतरा ज्यादा हो, वहां नदी को और अधिक गहरा कर दिया जाता है। गांवों तक में पानी का स्तर नापने के लिए स्केल बनी होती है।


भारत में भी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए पहले से ही तैयार रहना होगा। इसके लिए जहां प्रशासन को चाक-चौबंद रहने की ज़रूरत है, वहीं जनमानस को भी प्राकृतिक आपदा से निपटने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। स्कूल, कॉलेजों के अलावा जगह-जगह शिविर लगाकर लोगों को यह प्रशिक्षण दिया जा सकता है। इसमें स्वयंसेवी संस्थाओं की भी मदद ली जा सकती है। इस तरह प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुक़सान को कम किया जा सकता है।

(सोपानStep के नए अंक में प्रकाशित)