Friday, November 26, 2010

'वो' मासूम लड़कियों का खून मांगती है...

आप सबसे मुआफ़ी चाहते हैं कि इस पोस्ट को पढ़कर आपको कुछ तकलीफ़ ज़रूर होगी... यक़ीन मानिए पोस्ट लिखते हुए हमें भी बहुत तकलीफ़ हो रही है...मानो हमारी रूह भी लहुलुहान हो गई हो... किसी अपने को खोने से बड़ा कोई और दुख नहीं होता...जिसने भी किसी अपने को खोया है, वो इसे शिद्दत से महसूस कर सकता है...

कुछ वक़्त पहले दिल्ली में बचपन की एक सहेली से हमारी मुलाक़ात हुई...वो हमारे दिल के बहुत क़रीब थी...लड़की उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर की थी... हाल ही में उत्तराखंड के एक लड़के से उसका विवाह हुआ था... एक दिन ख़बर मिली कि उस लड़की की मौत हो गई है... वजह..., जिस लड़के के साथ उस लड़की की शादी हुई थी, उस लड़के के अपनी मां की उम्र की एक "आंटी" के साथ नाजायज़ ताल्लुक़ात थे... 'आंटी' के कहने पर लड़के ने अपनी पत्नी को ज़हर देकर मार डाला... 'आंटी' के बच्चे भी उस लड़के की उम्र के ही हैं... अपनी एक पूरी ज़िन्दगी जी चुकी 'महिला' ने अपनी हवस पूरी करने के लिए एक लड़की की सुहाग सेज को उसकी मौत की शय्या बना डाला... जिस लड़की के हाथों की मेहंदी अभी सूखी भी नहीं थी...वो क़ब्र की गहराइयों में दफ़न हो गई... जाने कितने अरमानों को अपने साथ लिए... उस लड़के के साथ अपनी ज़िन्दगी को तसव्वुर करके उसने कितने इंद्रधनुषी सपने बुने होंगे... जो अब कभी पूरे नहीं होंगे...

बेटी के सदमे से लड़की की मां का का बुरा हाल है... वो किसी को पहचान तक नहीं पा रही हैं... लड़की का पिता अपनी बेबसी पर आंसू बहा रहा है... लड़की की छोटी बहन का भी रो-रोकर बुरा हाल है...


हवस...एक ऐसी आग है, जो इंसान को जानवर बना देती है. हवस में अंधे होकर लोग सामाजिक मान-मर्यादा  तक को भूल जाते हैं. वे मां-बेटे और और भाई-बहन जैसे पाक रिश्तों को भी कलंकित कर देते हैं. ऐसे संबंधों में उनको तसल्ली रहती है कि कोई उन पर शक नहीं करेगा. दरअसल 'आधुनिकता' के नाम पर भी नाजायज़ रिश्तों का चलन बढ़ा है. ऐसे मामलों में महिलाएं भी पीछे नहीं हैं. कुछ साल पहले एक न्यूज़ चैनल ने एक स्टिंग ऑपरेशन दिखाया था, जिसमें महिलाएं अपनी बेटों की उम्र के लड़कों से 'सौदा' करती हैं. पुरुष वेश्या का किरदार निभा रहे एक रिपोर्टर ने जब महिला से उसके परिवार के बारे में पूछा तो महिला बताती है कि उसका पति है, जवान बच्चे हैं, जो जॉब करते हैं.रिपोर्टर ने जब महिला से पूछा कि पति के रहते उसे लड़का क्यों चाहिए? तो महिला का जवाब था-'टेस्ट' बदलने के लिए. यह है हमारे समाज का बदलता घिनौना (या यूं कहें कि तथाकथित आधुनिक चेहरा.  

पुलिस थानों में हर रोज़ ऐसे जाने कितने मामले आते हैं...जिन्हें अकसर दहेज प्रताड़ना का मामला कहकर पेश किया जाता है... कुछ साल पहले हरियाणा में एक महिला ने पहले अपने 'साथियों' के साथ मिलकर अपने पति की हत्या की...फिर बाद में अपने एक 'साथी' की पत्नी को जलाकर मार डाला...जब महिला की जवान बेटी ने मां का विरोध करना शुरू किया तो उसे भी ज़हर पिलाकर मौत की नींद सुला दिया... कुछ वक़्त पहले एक एक युवक ने अपनी मां की उम्र की महिला से अवैध संबंध के चलते अपनी पत्नी और दो मासूम बच्चों को जलाकर मौत की नींद सुला दिया...ऐसे कितने ही मामले मिल जाएंगे...कुछ लोगों की हवस कितनी ही ख़ुशहाल ज़िन्दगियों को निग़ल जाती है...

क़ानून किसी को उसके जुर्म की सज़ा तो दे सकता है, लेकिन किसी का चरित्र नहीं बदल सकता...यह तो अपने-अपने संस्कारों की बात होती है...इंसान के जैसे संस्कार होंगे, वो भी वैसा ही बनेगा...अच्छे संस्कार एक मां ही देती है... एक अच्छी बेटी ही एक अच्छी पत्नी साबित होती है...और एक अच्छी पत्नी ही एक अच्छी मां बनती है...लेकिन जो महिला ख़ुद ही किसी मासूम के क़त्ल की वजह हो, उसने अपने बच्चों को क्या संस्कार दिए होंगे कहने की ज़रूरत नहीं.
 
वो कहानी तो सुनी होगी, जिसमें राजकुमारी अपने राज्य में मेहमान के तौर पर आए राजकुमार के से साथ भाज जाना चाहती है...राजकुमार घोड़ा ख़रीदने जाता है...घोड़े वाले उसे घोड़े दिखाते हुए तेज़ दौड़ने वाली घोड़ी की क़ीमत बहुत कम बताता है. राजकुमार जब इसकी वजह पूछता है तो घोड़े वाला कहता है कि यह पानी देखकर रुक जाती है...इसी तरह इसकी मां और नानी भी पानी देखकर रुक जाया करती थी...यह सुनकर राजकुमार सोचता है कि आज राजकुमारी अपने पिता की गरिमा को धूल में मिलाकर मेरे साथ भाग जाना चाहती है...कल इसकी बेटी भी ऐसा ही करेगी...यह ख़्याल आते ही राजकुमार वापस अपने देश लौट जाता है...

उस महिला के शौहर और बच्चों पर क्या गुज़रती होगी...? तसव्वुर करके ही रूह कांप जाती है... क़ाबिले-गौर यह भी है कि यह सब "प्रेम-प्यार" के नाम पर होता है. जबकि ऐसे लोग प्रेम का मतलब तक नहीं जानते... 'वासना' को 'प्रेम' के आवरण से छुपाया नहीं जा सकता...प्यार तो राह दिखाता है, भटकाता नहीं है...मीडिया के लोग बख़ूबी जानते हैं कि हर रोज़ कितने ऐसे मामले आते हैं. यह मामले भी उस वक़्त सामने आते हैं, जब किसी किसी का क़त्ल हो जाता है... 

नाजायज़ रिश्तों को लेकर भारतीय समाज में पुरुषों पर तो सब अंगुलियां उठा देते हैं...मगर हवस की भूखी महिलाओं का क्या...? जिस देश में 'सीता-सावित्री' जैसी देवियां हुई हैं, उस देश में ऐसी महिलाओं की भी कमी नहीं जो अपने बेटे की उम्र के लड़कों के साथ अवैध संबंध रखती हैं...बेशर्मी की हद तो यह कि उन लड़कों से कहती हैं कि उनके लिए 'करवा चौथ' का व्रत रखा है...कभी सावित्री ने यह नहीं सोचा होगा कि इस 'पवित्र व्रत' के नाम पर इतना 'अधर्म' होगा...? 

कहते हैं- वेश्याएं भी मजबूरी में अपना जिस्म बेचती हैं...लेकिन ऐसी महिलाओं को क्या कहेंगे, जो अपनी हवस में अंधी होकर अपने बेटे की उम्र के लड़कों के साथ अवैध संबंध बनाती हैं...?
हवस की भूखी जो महिला अपने बेटे की उम्र के लड़के के साथ नाजायज़ रिश्ता बनाती है, अगर वो अपने सगे बेटे से भी ऐसा रिश्ता बना ले तो हैरानी नहीं... ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जब महिलाओं ने अपने ही सगे बेटों के साथ यौन संबंध बनाकर इंसानियत को शर्मसार किया है...  

पिछले साल जुलाई में अमेरिका के मिशिगन शहर में एक 36 वर्षीय महिला ने मां-बेटे के रिश्ते की सारी मर्यादा तोड़ते हुए अपने ही 14 साल बेटे के साथ यौन संबंध स्थापित किया. ये वो महिला है, जिसने अपने इसी बच्चे को दूसरों की झोली में डालने के प्रयास किए थेअमेरिका की एक अदालत में जब एमी एल स्वॉर्ड नाम की इस महिला को पेश किया गया तो उसने अपना जुर्म स्वीकार किया. उसके वकील ने कोर्ट में कहा, कि जब दो साल पहले जब उसका बेटा 14 साल का था, वे अपने बेटे के संपर्क में आई तो उसे मां-बेटे के बजाय गर्लफ्रेंड-ब्वॉयफ्रेंड जैसा रिश्ता महसूस हुआ. आवेश में आकर उसने यौन संबंध स्थापित किए. यह घटना ग्रांड रैपिड होटल की है. उसके बाद कई बार घर पर भी उसने संबंध स्थापित किए. अदालत ने सभी दलीलें सुनते हुए इसे यौन उत्पीड़न का मामला क़रार  देते हुए एमी को 30 साल की सज़ा सुनाई है. एमी शादीशुदा है और पांच बच्चों की मां भी हैइस बात का पता तब चला जब काउंसलर ने उसके बेटे से पूछताछ की.
 
पिछले साल अक्टूबर में सिडनी की एक अदालत में भी एक ऐसा ही शर्मसार कर देने वाला मामला सामने आया, जिसमें एक दंपत्ति पर साल 2009 में जनवरी से नवंबर के बीच में अपने बेटे यौन शोषण करने के आरोप लगे. दंपति पर बेटे से यौन संबंध का वीडियो बनाकर ऑनलाइन करने का भी आरोप लगा. अदालत में सुनवाई के दौरान  47 वर्षीय आस्ट्रेलियाई महिला और 57 वर्षीय उसके पति ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपने बेटे के साथ यौन संबंध स्थापित किए हैं

नाजायज़ रिश्ते कई ज़िन्दगियों की खुशियों को लील जाते हैं.  सवाल यह भी है कि जो महिला अपने पति और बच्चों की हुई तो उस लड़के कि क्या होगी.? जिस महिला को अपनी और अपने परिवार की मान-मर्यादा का ख़्याल नहीं तो वह किसी और की इज्ज़त का क्या ख़्याल करेगी

नाजायज़ रिश्ते समाज के लिए नासूर हैं. जब तक ऐसे संबंध रहेंगे मासूमों की ज़िंदगियां, उनकी खुशियां तबाह होती रहेंगी. नाजायज़ रिश्तों की शुरुआत भले ही आकर्षण से हो, लेकिन इनका अंजाम बहुत ही घृणित होता है.


आओ दुआ करें कि ईश्वर हमारी बहन-बेटियों कोउनकी ज़िन्दगी को हवस के दरिन्दों (महिला हो या पुरुषसे बचाकर रखे... साथ ही यह भी दुआ करना कि उस दरिन्दे को उसके किए की सज़ा मिले...और हमारी सहेली की रूह को सुकून हासिल हो... आमीन

Thursday, November 25, 2010

किसानों के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं कुशलपाल सिरोही

फ़िरदौस ख़ान
कुछ लोग जिस क्षेत्र में काम करते हैं, उसमें नित-नए प्रयोग कर इतनी कामयाबी हासिल कर लेते हैं कि दूसरों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन जाते हैं। ऐसी ही एक शख्सियत हैं, हरियाणा के कैथल ज़िले के चंदाना गांव के निवासी व कैथल के प्रगतिशील किसान क्लब के प्रधान कुशलपाल सिरोही, जिन्होंने खेतीबाड़ी के कार्य में इतनी प्रगति की है कि आज वह कृषि जगत के लिए जाना माना नाम बन गए हैं।

श्री सिरोही ने अपने तीस साल के अनुभव के आधार पर कृषि को स्वावलंबी और बेहतर आमदनी प्रदान करने वाला व्यवसाय बनाने का प्रयास किया। अपनी इस कोशिश में वह काफी हद तक कामयाब भी हुए और इसके लिए उन्हें कई ऐसे पुरस्कार मिले जिन्हें हासिल करना किसी भी किसान का सपना हो सकता है। उन्हें पूर्व उपप्रधानमंत्री स्व. चौधरी देवीलाल की स्मृति में दिए जाने वाले वर्ष 2001-02 और 2002-03 के राज्यस्तरीय किसान पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें वर्ष 2002 के लिए जगजीवन राम किसान पुरस्कार दिया गया और भारतीय किसान अनुसंधान परिषद ने भी 2002 के लिए चौधरी चरण सिंह कृषक शिरोमणि पुरस्कार से उन्हें नवाजा। इसके अलावा भी उन्हें कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।

श्री सिरोही ने बागवानी, कृषि वानिकी, मछली पालन, मधुमक्खी पालन और पशुपालन को अपनाकर एक-दूसरे के ज़रिये लाभ को बढ़ाया। साथ ही डीप इरीगेशन, ऑर्गेनिक फार्मिंग, रोग व कीट नियंत्रण, मृदा संरक्षण, उन्नत कृषि, फ़सल चक्र, ज़ीरो टिलेज, कार्बनिक खाद, उन्नत बीजों का इस्तेमाल, कृषि यंत्रों का बेहतर उपयोग कर उन्होंने सराहनीय कृषि प्रदर्शन किया। उन्हें औषधीय पौधे, गन्ना, सोयाबीन, गुलाब, अमरूद, नींबू व मशरूम के रिकॉर्ड उत्पादन के लिए कई प्रमाण-पत्र मिल चुके हैं। उन्होंने अपने फ़ार्म पर एक बायोगैस संयंत्र, सौर ऊर्जा संयंत्र, पॉली हाउस और ग्रीन हाउस स्थापित किए हैं।

कैथल से करीब दस किलोमीटर दूरी पर स्थित सिरोही फार्म के मालिक कुशलपाल सिरोही बताते हैं कि उनके द्वारा अपनाई गई कृषि तकनीक न केवल परिस्थितियों के लिए अनूकूल है, बल्कि वातावरण के लिए उपयुक्त और कम खर्चीली होने के साथ-साथ किसानों को अतिरिक्त आमदनी देने वाली है। वह जब भी किसी किस्म को उगाने की प्रक्रिया शुरू करते हें तो एक-एक पौधे पर पैनी नजर रखते हैं और विभिन्न किस्मों व पौधों में तुलनात्मक अनुसंधान से पता लगाते हैं कि कहां क्या कमी है तथा कौन-सी किस्म बेहतरीन है।

देश-विदेश के कृषि विशेषज्ञ उनके फार्म का दौरा कर चुके हैं। सिंगापुर, मलेशिया, हांगकांग और नेपाल में कृषि संबंधी कार्यों का तुलनात्मक अध्ययन कर रहे श्री सिरोही ने अपने फार्म पर गुलाब के फूलों का तेल (अर्क) निकालने का एक यंत्र लगाया है। इसके लिए वह विशेष किस्म के फूल भी खुद ही उगाते हैं, जिनसे पहले गुलाब जल बनाया जाता है। फिर उससे तेल बनाया जाता है। वे कहते हैं कि इसके लिए उपकरण उन्होंने उत्तर प्रदेश के कन्नौज शहर से खरीदे हैं। वैसे ये उपकरण दिल्ली और मुंबई में भी मिलते हैं। उन्होंने कृषि के क्षेत्र में किसानों को जागरूक करने के लिए 12 किसानों के साथ मिलकर 1999 में प्रगतिशील किसान क्लब का गठन किया। वे समय-समय पर बैठकों का आयोजन कर कृषि क्षेत्र में नई संभावनाओं के बारे में विचार-विमर्श करते हैं। साथ ही अपने फार्म पर किसानों को कृषि की नई तकनीकों की जानकारी भी देते हैं। क्लब का दल महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश का दौरा कर वहां के किसानों से मिल चुका है। उनका कहना है कि कृषि का क्षेत्र अत्यधिक गहन क्षेत्र है। यहां निरंतर कुछ न कुछ सीखने को मिलता है और अपेक्षाकृत बेहतर आमदनी का आधार बनता है।

Sunday, November 14, 2010

मधुमेह का बढ़ता ख़तरा

फ़िरदौस ख़ान
दुनियाभर में मधुमेह का ख़तरा लगातार बढ़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ इस समय दुनियाभर में 24 करोड़ 60 लाख लोग मधुमेह से पीड़ित हैं और वर्ष 2025 तक यह तादाद बढ़कर 38 करोड़ को पार कर जाएगी। अकेले भारत में क़रीब चार करोड़ मधुमेह के मरीज़ हैं और 2025 तक सात करोड़ होने की आशंका है। हर दसवें सेकेंड में मधुमेह से एक व्यक्ति की मौत होती है और तीसवें सेकेंड में एक नया व्यक्ति इसकी चपेट में आता है।

गौरतलब है कि हर साल 14 नवंबर को विश्व मधुमेह दिवस मनाया जाता है। 14 नवंबर को फ्रैडरिक बेंटिग का जन्मदिन है, जिन्होंने चार्लीज़ हर्बर्ट बेस्ट के साथ मिलकर 1921 में इंसुलिन की खोज की थी। उनके इस योगदान को याद रखने के लिए इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेषन (आईडीएफ) द्वारा 1991 से हर साल 14 नवंबर को विश्व मधुमेह दिवस मनाने की प्रथा षुरू की गई। इस दिन दुनिया के 140 देशों में कार्यक्रमों का आयोजन कर जनमानस को मधुमेह के प्रति जागरूक किया जाता है। हर साल इसकी थीम अलग रहती है। वर्ष 1991 की थीम इसकी थी-मधुमेह पर जनता को जागरूक करें। वर्ष 1992 में मधुमेह विश्वव्यापी एवं सभी उम्र की समस्या, 1993 में किशोरावस्था में मधुमेह की देखभाल, 1994 में बढ़ती उम्र मधुमेह का रिस्क फैक्टर है, इसे कम कर सकते हैं, 1995 में बिना जानकारी मधुमेह के मरीज़ का भविष्य ख़तरे में होगा, 1996 में इंसुलिन ही जीवन का अमृत है, 1997 में विश्वव्यापी जागरूकता ज़रूरी है, 1998 में मधुमेह मरीज़ों के अधिकार सुरक्षित हैं, 1999 में मधुमेह के कारण राष्ट्रीय बजट पर ख़तरा है, 2000 में सही जीवन शैली से रोकें मधुमेह को, 2001 में मधुमेह में करें हृदय की देखभाल, 2002 में मधुमेह में करें आंखों की देखभाल, 2004 में मोटापा छुड़ाएं, मधुमेह से बचें, 2003 में मधुमेह मरीज़ों को गुर्दे की ख़राबी पर जागरूक करें, 2005 में मधुमेह में पैरों की देखभाल ज़रूरी है, 2006 में बच्चों को मधुमेह से बचाएं, 2007 264 कदम चलें, 2008 में अब कुछ अलग कर दिखाने का समय है। बच्चों व किशोरों को मधुमेह से बचाएं और 2009 से 2010 तक मधुमेह की शिक्षा व रोकथाम से संबंधित है।

चिकित्सकों के मुताबिक़ मधुमेह तीन प्रकार का होता है, टाइप 1 डायबिटीज़, टाइप 2 डायबिटीज़ और गर्भावधि मधुमेह। यह एक असंक्रामक रोग है। इसमें रोग का प्रभाव जब शरीर के लिए लड़ने वाले संक्रमण, प्रतिरक्षा प्रणाली के ख़िलाफ़ होता है तो उसे टाइप 1 डायबिटीज़ कहा जाता है। टाइप 2 डायबिटीज़ सामान्य मधुमेह है। क़रीब 95 फ़ीसदी लोग इससे पीड़ित हैं। यह वृध्दावस्था में पाया जाता है। हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल के मुताबिक़ 80 फ़ीसदी से अधिक टाइप 2 डायबिटीज़ के मामले मोटापे की वजह से होते हैं जो मधुमेह संबंधी मौत का कारण भी बनते हैं। बीएमआई और टाइप 2 डायबिटीज़ के बीच उतार चढ़ाव वाला संबंध है। सबसे कम ख़तरा उनमें होता है जिनका बीएमआई 22 किग्रा/एम2 होता है। अगर बीएमआई 35 किग्रा/एम2 से ज़्यादा होता हो तो उनमें मधुमेह का ख़तरा 61 साल की उम्र तक रहता है। यह ख़तरा बैठकर ज़िन्दगी बिताने वालों में बढ़ सकता है, जबकि व्यायाम करके इसमें कमी लाई जा सकती है। महिलाओं में 18 की उम्र और पुरुषों में 20 के बाद वज़न के बढ़ने से टाइप 2 डायबिटीज का ख़तरा बढ़ जाता है। द नर्सेज हेल्थ स्टडी में 18 की उम्र के बाद जिन महिलाओं का वज़न स्थिर यानी जिन्होंने 5 किग्रा वज़न या इससे कम बढ़ाया या फिर वज़न कहीं  ज़्यादा बढ़ाया, दोनों में तुलना की गई। जिन महिलाओं में वज़न 5 से 7.9 किग्रा बढ़ा उनमें डायबिटीज़ का ख़तरा 1.9 गुना बढ़ा और जिन महिलाओं में 8 से 10.9 किग्रा वज़न बढ़ा उनमें यह ख़तरा 2.7 गुना अधिक हो गया। इसी तरह पुरुषों पर भी अध्ययन किया गया। थोड़े से वज़न बढ़ने पर भी मधुमेह का ख़तरा बढ़ता देखा गया। वज़न बढ़ने का मतलब भविष्य में मधुमेह की समस्या के रूप में देखा गया। टाइप 2 डायबिटीज़ वाले उच्च आशंकित समूह वाले भारतीयों में वज़न धीरे-धीरे 30 किग्रा तक बढ़ जाता है यानी यह 60 से 90 पहुंच जाता है, जिससे सालों तक उन्हें डायबिटीज़ से जूझना होता है। इसके विपरीत वज़न में कमी करने से टाइप 2 डायबिटीज़ का ख़तरा कम होता है। मोटापे के साथ ही इंसुलिन में रुकावट व हाइपर इंसुलिनेमिया मोटापे से होता है और हाइपर ग्लाइसेमिया से पहले ही नज़र आ जाता है। मोटापे की वजह से ग्लूकोज गड़बड़ा जाता है और इंसुलिन रुकावट बढ़ जाती है जिसकी वजह से हाइपर इंसुलिनेमिया की समस्या होती है। हाइपर इंसुलिनेमिया में हीपेटिक वेरी लो डैनसिटी ट्राइग्लाइसराइड सिंथेसिस, प्लासमिनोजेन एक्टिवेटर इनहिबिटर-1 सिंथेसिस, सिम्पैथिक नर्वस सिस्टम एक्टिविटी और सोडियम रीएब्जार्पशन का घनत्व बढ़ने लगता है। इन बदलावों की वजह से मोटे लोगों में हाइपलीपीडेमिया और हाइपर टेंशन की समस्या होती है। कुछ महिलाओं में गर्भावधि मधुमेह गर्भावस्था में देर से विकसित होता है। हालांकि शिशु के जन्म के बाद यह प्रभाव ख़त्म हो जाता है। इस मधुमेह का कारण गर्भावस्था में हार्मोन्स का असंतुलन या इंसुलिन की कमी से होता है।

क़ाबिले-गौर है कि वर्ष 1924 में पहली बार इंसुलिन का इस्तेमाल मधुमेह पीड़ित 14 वर्शीय लोनार्ड थाम्सन के इलाज में किया गया। जिन मरीज़ों में इंसुलिन नहीं बनता, उनमें दवाइयों के ज़रिये इसे बनाया जाता है। जिन मरीज़ों में इंसुलिन बनता है, लेकिन काम नहीं करता, उनमें दवाइयों के ज़रिये इंसुलिन को सक्रिय किया जाता है।

चिकित्सकों का कहना है कि खून में शुगर की मात्रा अगर 126 प्वाइंट या इससे ज़्यादा है तो इसे मधुमेह माना जाता है, जबकि 98 प्वाइंट के नीचे हो तो इसे सामान्य माना जाता है। अगर शुगर की मात्रा 98 प्वाइंट और 126 प्वाइंट के बीच है तो इसे प्री-डायबिटीज़ स्टेज माना जाएगा। मधुमेह एक ऐसा रोग है जिसमें मेटाबॉलिज्म और हारमोन असंतुलित हो जाता है। यह एक कॉम्पलैक्स डिसऑर्डर है। थकावट, वनज बढ़ना या कम होना, बेहद प्यास लगना और चक्कर आना इसके लक्षण हैं। मधुमेह आनुवांशिक हो सकता है, लेकिन खान-पान का विशेष ध्यान रखकर इसे क़ाबू किया जा सकता है। बदलते लाइफ़ स्टाइल और फ़ास्ट फ़ूड की बढ़ती दीवानगी मधुमेह को बढ़ावा दे रही है। खाने में अत्यधिक वसा, कोल्ड ड्रिंक्स और एल्कोहल से मोटापा बढ़ रहा है, जिससे मधुमेह की आशंका बढ़ जाती है। एल्कोहल हारमोन असंतुलन को बढ़ाती है और इससे भी मधुमेह का ख़तरा पैदा हो जाता है।

मधुमेह के खात्मे का अभी तक कोई इलाज नहीं है। जो इलाज है वो सिर्फ़ इसे नियंत्रित करने तक ही सीमित है। इसलिए बेहतर है कि इससे बचा जाए। व्यायाम और खान-पान पर विशेष ध्यान देकर मधुमेह के ख़तरे को कम किया जा सकता है।

Thursday, October 21, 2010

ग़ुलाम प्रथा : दुनिया की हाट में बिकते इंसान

फ़िरदौस ख़ान
दुनियाभर में आज भी अमानवीय ग़ुलाम प्रथा जारी है और जानवरों की तरह इंसानों की ख़रीद-फ़रोख्त की जाती है। इन ग़ुलामों से कारख़ानों और बाग़ानों में काम कराया जाता है। उनसे घरेलू काम भी लिया जाता है। इसके अलावा ग़ुलामों को वेश्यावृति के लिए मजबूर भी किया जाता है। ग़ुलामों में बड़ी तादाद में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ मादक पदार्थ और हथियारों के बाद तीसरे स्थान पर मानव तस्करी है। एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनियाभर में क़रीब पौने तीन करोड़ ग़ुलाम हैं। एंटी स्लेवरी इंटरनेशनल की परिभाषा के मुताबिक़ वस्तुओं की तरह इंसानों का कारोबार, श्रमिक को बेहद कम या बिना मेहनताने के काम करना, उन्हें मानसिक या शारीरिक तौर पर प्रताड़ित कर काम कराना, उनकी गतिविधियो पर हर वक्त नज़र रखना ग़ुलामी माना जाता है। 1857 में संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन ग़ुलामी की चरम अवस्था 'किसी पर मालिकाना हक़ जताने' को मानता है। फ़िलहाल दासता की श्रेणियों में जबरन काम कराना, बंधुआ मज़दूरी, यौन दासता, बच्चों को जबरने सेना में भर्ती करना, कम उम्र में या जबरन होने वाले विवाह और वंशानुगत दासता शामिल है।

अमेरिका में क़रीब 60 देशों से लाए गए करोड़ों लोग ग़ुलाम के तौर पर ज़िन्दगी गुज़ारने को मजबूर हैं। ब्राज़ील में भी लाखों ग़ुलाम हैं। हालांकि वहां के श्रम विभाग के मुताबिक़ इन ग़ुलामों की तादाद क़रीब 50 हज़ार है और हर साल लगभग सात हज़ार ग़ुलाम यहां लाए जाते हैं। पश्चिमी यूरोप में भी गुलामों की तादाद लाखों में है। एक रिपोर्ट के मुताबिक़ वर्ष 2003 में चार लाख लोग अवैध तौर पर लाए गए थे। पश्चिमी अफ्रीका में भी बड़ी तादाद में ग़ुलाम हैं, जिनसे बाग़ानों और उद्योगों में काम कराया जाता है। सोवियत संघ के बिखराव के बाद रूस और पूर्वी यूरोप में ग़ुलामी प्रथा को बढ़ावा मिला।

पूर्वी अफ्रीका के देश सूडान में गुलाम प्रथा को सरकार की मान्यता मिली हुई है। यहां अश्वेत महिलाओं और बच्चों से मज़दूरी कराई जाती है। युगांडा में सरकार विरोधी संगठन और सूडानी सेना में बच्चों की जबरन भर्ती की जाती है। अफ्रीका से दूसरे देशों में ग़ुलामों को ले जाने के लिए जहाज़ों का इस्तेमाल किया जाता था। इन जहाज़ों में ग़ुलामों को जानवरों की तरह ठूंसा जाता था। उन्हें कई-कई दिनों तक भोजन भी नहीं दिया जाता था, ताकि शारीरिक और मानसिक रूप से वे बुरी तरह टूट जाएं और भागने की कोशिश न करें। अमानवीय हालात में कई ग़ुलामों की मौत हो जाती थी और कई समुद्र में कुदकर अपनी जान दे देते थे। चीन और बर्मा में भी गुलामों की हालत बेहद दयनीय है। उनसे जबरन कारख़ानों और खेतों में काम कराया जाता है। इंडोनेशिया, थाइलैंड, मलेशिया और फ़िलीपींस में महिलाओं से वेश्यावृति कराई जाती है। उन्हें खाड़ी देशों में वेश्यावृति के लिए बेचा जाता है।

दक्षिण एशिया ख़ासकर भारत, पाकिस्तान और नेपाल में ग़रीबी से तंग लोग ग़ुलाम बनने पर मजबूर हुए। भारत में भी बंधुआ मज़दूरी के तौर पर ग़ुलाम प्रथा जारी है। हालांकि सरकार ने 1975 में राष्ट्रपति के एक अध्यादेश के ज़रिए बंधुआ मज़दूर प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया था,मगर इसके बावजूद सिलसिला आज भी जारी है। यह कहना गलत न होगा कि औद्योगिकरण के चलते इसमें इज़ाफ़ा ही हुआ है। सरकार भी इस बात को मानती है कि देश में बंधुआ मज़दूरी जारी है। भारत के श्रम व रोज़गार मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में 19 प्रदेशों से 31 मार्च तक देशभर में दो लाख 86 हज़ार 612 बंधुआ मज़दूरों की पहचान की गई और मुक्त उन्हें मुक्त कराया गया। नवंबर तक एकमात्र राज्य उत्तर प्रदेश के 28 हज़ार 385 में से केवल 58 बंधुआ मज़दूरों को पुनर्वासित किया गया, जबकि 18 राज्यों में से एक भी बंधुआ मज़दूर को पुनर्वासित नहीं किया गया। इस रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में सबसे ज्यादा तमिलनाडु में 65 हज़ार 573 बंधुआ मज़दूरों की पहचान कर उन्हें मुक्त कराया गया। कनार्टक में 63 हज़ार 437 और उड़ीसा में 50 हज़ार 29 बंधुआ मज़दूरों को मुक्त कराया गया। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि 19 राज्यों को 68 करोड़ 68 लाख 42 हज़ार रुपए की केंद्रीय सहायता मुहैया कराई गई, जिसमें सबसे ज़्यादा सहायता 16 करोड़ 61 लाख 66 हज़ार 94 रुपए राजस्थान को दिए गए। इसके बाद 15 करोड़ 78 लाख 18 हज़ार रुपए कर्नाटक और नौ कराड़ तीन लाख 34 हज़ार रुपए उड़ीसा को मुहैया कराए गए। इसी समयावधि के दौरान सबसे कम केंद्रीय सहायता उत्तराखंड को मुहैया कराई गई। उत्तर प्रदेश को पांच लाख 80 हज़ार रुपए की केंद्रीय सहायता दी गई। इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली,गुजरात, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को 31 मार्च 2006 तक बंधुआ बच्चों का सर्वेक्षण कराने, मूल्यांकन अध्ययन कराने और जागरूकता सृजन कार्यक्रमों के लिए चार करोड़ 20 लाख रुपए की राशि दी गई।

भारत में सदियों से किसान गांवों के साहूकारों से खाद, बीजए रसायनों और कृषि उपकरणों आदि के लिए क़र्ज़ लेते रहे हैं। इस क़ज़ के बदले उन्हें अपने घर और खेत तक गिरवी रखने पड़ते हैं। क़र्ज़ से कई गुना रक़म चुकाने के बाद भी जब उनका क़र्ज़ नहीं उतर पाता। यहां तक कि उनके घर और खेत तक साहूकारों के पास चले जाते हैं। इसके बाद उन्हें साहूकारों के खेतों पर बंधुआ मज़दूर के तौर पर काम करना पड़ता है। हालत यह है कि किसानों की कई नस्लें तक साहूकारों की बंधुआ बनकर रह जाती हैं।

बिहार के गांव पाईपुरा बरकी में खेतिहर मज़बूर जवाहर मांझी को 40 किलो चावल के बदले अपनी पत्नी और चार बच्चों के साथ 30 साल तक बंधुआ मज़दूरी करनी पड़ी। क़रीब तीन साल पहले यह मामला सरकार की नज़र में आया। मामले के मुताबिक़ 33 साल पहले जवाहर मांझी ने एक विवाह समारोह के लिए ज़मींदार से 40 किलो चावल लिए। उस वक्त तय हुआ कि उसे ज़मींदार के खेत पर काम करना होगा और एक दिन की मज़दूरी एक किलो चावल होंगे। मगर तीन दशक तक मज़दूरी करने के बावजूद ज़मींदार के 40 किलो का क़र्ज़ नहीं उतर पाया। एंटी स्लेवरी इंटरनेशनल के मुताबिक़ भारत में देहात में बंधुआ मज़दूरी का सिलसिला बदस्तूर जारी है। लाखों पुरुष, महिलाएं और बच्चे बंधुआ मज़दूरी करने को मजबूर हैं। पाकिस्तान और दक्षिण एशिया के अन्य देशों में भी यही हालत है।

देश में ऐसे ही कितने भट्ठे व अन्य उद्योग धंधे हैं, जहां मज़दूरों को बंधुआ बनाकर उनसे कड़ी मेहनत कराई जाती है और मज़दूरी की एवज में नाममात्र पैसे दिए जाते हैं, जिससे उन्हें दो वक्त भी भरपेट रोटी नसीब नहीं हो पाती। अफ़सोस की बात तो यह है कि सब कुछ जानते हुए भी प्रशासन इन मामले में मूक दर्शक बना रहता है, लेकिन जब बंधुआ मुक्ति मोर्चा जैसे संगठन मीडिया के ज़रिये प्रशासन पर दबाव बनाते हैं तो अधिकारियों की नींद टूटती है और कुछ जगहों पर छापा मारकर वे रस्म अदायगी कर लेते हैं। श्रमिक सुरेंद्र कहता है कि मज़दूरों को ठेकेदारों की मनमानी सहनी पड़ती है। उन्हें हर रोज़ काम नहीं मिल पाता इसलिए वे काम की तलाश में ईंट भट्ठों का रुख करते हैं, मगर यहां भी उन्हें अमानवीय स्थिति में काम करना पड़ता है। अगर कोई मज़दूर बीमार हो जाए तो उसे दवा दिलाना तो दूर की बात उसे आराम तक करने नहीं दिया जाता।

दास प्रथा की शुरुआत की कई सदी पहले हुई थी। बताया जाता है कि चीन में 18-12वीं शताब्दी ईसा पूर्व ग़ुलामी प्रथा का ज़िक्र मिलता है। भारत के प्राचीन ग्रंथ मनु स्मृति में दास प्रथा का उल्लेख किया गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 650 ईस्वी से 1905 के दौरान पौने दो क़रोड़ से ज्यादा लोगों को इस्लामी साम्राज्य में बेचा गया। 15वीं शताब्दी में अफ्रीका के लोग भी इस अनैतिक व्यापार में शामिल हो गए। 1867 में क़रीब छह करोड़ लोगों को बंधक बनाकर दूसरे देशों में ग़ुलाम के तौर पर बेच दिया गया।

ग़ुलाम प्रथा के ख़िलाफ़ दुनियाभर में आवाज़ें बुलंद होने लगीं। इस पर 1807 में ब्रिटेन ने दास प्रथा उन्मूलन क़ानून के तहत अपने देश में अफ्रीकी ग़ुलामों की ख़रीद-फ़रोख्त पर पाबंदी लगा दी। 1808 में अमेरिकी कांग्रेस ने ग़ुलामी के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया। 1833 तक यह क़ानून पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में लागू कर दिया। कहने को तो भारत में बंधुआ मज़दूरी पर पाबंदी लग चुकी है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि आज भी यह अमानवीय प्रथा जारी है। बढ़ते औद्योगिकरण ने इसे बढ़ावा दिया है। साथ ही श्रम कानूनों के लचीलेपन के कारण मजदूरों के शोषण का सिलसिला जारी है। शिक्षित और जागरूक न होने के कारण इस तबक़े की तरफ़ किसी का ध्यान नहीं गया। संयुक्त राष्ट्र संघ को चाहिए कि वह सरकारों से श्रम क़ानूनों का सख्ती से पालन कराए, ताकि मज़दूरों को शोषण से निजात मिल सके। संयुक्त राष्ट्र संघ और मानवाधिकार जैसे संगठनों को ग़ुलाम प्रथा के ख़िलाफ़ अपनी मुहिम को और तेज़ करना होगा। साथ ही ग़ुलामों को मुक्त कराने के लिए भी सरकारों पर दबाव बनाना होगा। इसमें बात में कोई राय नहीं है कि विभिन्न देशों में अनैतिक धंधे प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत से ही होते हैं, इसलिए प्रशासनिक व्यवस्था को भी दुरुस्त करना होगा, ताकि गुलाम भी आम आदमी की ज़िन्दगी बसर कर सकें।

Wednesday, October 20, 2010

हरियाणा के किसान ने बनाई बहु उद्देशीय प्रसंस्करण मशीन

फ़िरदौस ख़ान
हरित क्रांति के लिए अग्रणी हरियाणा को कृषि के क्षेत्र में सिरमौर बनाने में यहां के किसानों की अहम भूमिका है. यहां के किसानों ने न केवल खेतीबाड़ी में नित नए प्रयोग किए हैं, बल्कि तकनीकी क्षेत्र में भी अपनी योग्यता का परचम लहराया है. ऐसे ही एक किसान हैं यमुनानगर ज़िले के गांव दामला के धर्मवीर, जिन्होंने बहु उद्देशीय प्रसंस्करण मशीन बनाकर इस क्षेत्र में एक नई क्रांति को जन्म दिया है. इस मशीन से जूसर, ग्राइंडर, कुकर और मिक्सर का काम एक साथ लिया जा सकता है.

जड़ी-बूटियों की खेती करने वाले धर्मवीर बताते हैं कि उनका कारोबार जड़ी-बूटियों का है. वह अपने खेतों में उगी औषधियों को तैयार करके बाज़ार में बेचते हैं. औषधियों को पीसना, उनका जूस और अर्क़ निकालना बहुत मेहनत का काम है और इसमें समय भी ज़्यादा लगता है. साथ ही लेबर का ख़र्च बढ़ने से लागत भी ज़्यादा हो जाती है. इसलिए उन्होंने सोचा कि क्यों न ऐसी कोई मशीन बनाई जाए, जिससे उनका काम आसान हो जाए. उन्होंने वर्ष 2006 में बहु उद्देशीय प्रसंस्करण मशीन बनाई. उन्होंने क़रीब एक साल तक इस मशीन से जड़ी-बूटियों, गुलाब, ऐलोवेरा (धूतकुमारी), आंवला, जामुन, केला और टमाटर की प्रोसेसिंग करके विभिन्न उत्पाद तैयार किए. गुलाब का अर्क़, केले के छिलके का अर्क़, जामुन का जूस और जामुन की गुठली का पाउडर भी इससे तैयार किया. मशीन में जड़ी-बूटियों और फल-सब्ज़ियों की प्रोसेसिंग करके पांच-छह उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं. इन मशीन से एलोवेरा और आंवले की जैली, जूस, शैंपू, चूर्ण, तेल और मिठाई बना सकती है.

उनका कहना है कि छह फ़ीट ऊंची इस मशीन की क़ीमत एक लाख 35 हज़ार रुपये रखी गई है. इस मशीन का कुकर, मिक्सर और ग्राइंडर एक घंटे में क़रीब 150 किलोग्राम जड़ी-बूटियों और फल-सब्ज़ियों की प्रोसेसिंग करने में सक्षम है. मशीन में तीन टैंक लगे हैं, एक बड़ा और दो छोटे टैंक. बड़े टैक्स से जुड़े एक छोटे टैंक में अरंडी का तेल भरा होता है. जड़ी-बूटियां और फल-सब्जियां पकाते समय जलते नहीं हैं, क्योंकि अरंडी तेल से भरा टैंक अतिरिक्त ताप को सोख लेता है. मशीन को चलाने के लिए दो एचपी की मोटर लगी है. इस मशीन को चलाने के लिए पांच-छह लोगों की ज़रूरत होती है. यह मशीन छोटी फूड प्रोसेसिंग इकाइयों के लिए बड़ी उपयोगी हो सकती है. यह मशीन हल्की होने के कारण इसे कहीं भी आसानी से ले जाया जा सकता है.

उन्होंने बताया कि वर्ष 2006 में ही उनकी इस मशीन को फूड प्रोडक्ड ऑर्डर (एफपीओ) 1955 के तहत लाइसेंस मिल गया था. इसके अलावा अहमदाबाद के नेशनल इन्नोवेशन फ़ाउंडेशन (एनआईएफ) ने भी इस मशीन को उपयोगी माना है. उन्होंने सबसे पहले करनाल के नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीटयूट (एनडीआरआई) में आयोजित किसान मेले में इस मशीन को प्रदर्शित किया था, जहां इसे बहुत सराहा गया. इसके बाद वह हरियाणा के अलावा अन्य राज्यों में भी इस मशीन का प्रदर्शन करने लगे. वह बताते हैं कि वर्ष 2008 से इस मशीन की कॉमर्शियल बिक्री कर रहे हैं और अब तक 25 मशीनें बेच चुके हैं. उनका कहना है कि यह मशीन हरियाणा, राजस्थान और हिमाचल सरकार के बाग़वानी विभागों ने ख़रीदी है, ताकि फूड प्रोसेसिंग से जुड़े उद्यमियों के सामने इसे प्रदर्शित किया जा सके. वह बताते है कि राज्य में फूड प्रोसेसिंग इकाई संचालित करने वाले एक उद्यमी ने यह मशीन लगाई है.

उन्होंने 20 जून को नई दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित एसोचैम हर्बल इंटरनेशनल एक्सपो मेले में भी इस मशीन को प्रदर्शित किया था. इसमें आयुष विभाग, स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार, विज्ञान एवं तकनीकी मंत्रालय, राष्ट्रीय औषधि पादक विभाग के दिल्ली, छत्तीसगढ़, गुजरात, बिहार, सिक्किम, पंजाब और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों के किसानों व कंपनियों ने अपने-अपने उत्पादों को प्रदर्शित किया. उन्होंने हरियाणा के बाग़वानी विभाग की तरफ़ से मेले का प्रतिनिधित्व किया. इसमें उनके द्वारा निर्मित प्राकृतिक उत्पादनों को प्रदर्शित किया गया. उसके द्वारा निर्मित प्राकृतिक उत्पादनों को देखकर केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री दिनेश त्रिवेदी इतने प्रभावित हुए कि कार्यक्रम का सबसे ज़्यादा समय हरियाणा के इस स्टॉल पर व्यतीत किया. किसान द्वारा तैयार किए गए हर्बल उत्पादों में गहन रुचि दिखाई. उन्होंने कहा कि यह हमारे देश का ही नहीं, बल्कि विश्व का भविष्य है. धर्मवीर ने बताया कि मेले में आने वाले देश-विदेश से प्रतिनिधि, कंपनियों व अधिकारियों ने उसके द्वारा निर्मित प्रोसेसिंग मशीन में ख़ासी दिलचस्पी ली. उन्होंने इस मशीन को किसानों के लिए 'वरदान' बताते हुए कहा कि इससे किसानों की आर्थिक दशा सुधारने में मदद मिलेगी. इस उपलब्धि के लिए धर्मवीर को पिछले साल 18 नवंबर को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने सम्मानित किया था. इसके अलावा कई संस्थाओं ने भी उन्हें सम्मानित किया है.

Thursday, October 7, 2010

जब मुस्लिम वालिद को मिली थी हिन्दू बेटी


फ़िरदौस ख़ान
मज़हब के नाम पर जहां लोग एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे रहते हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सिर्फ़ इंसानियत को ही तरजीह देते हैं. ऐसे लोग ही समाज का आदर्श होते हैं। ऐसा ही एक वाक़िया है, जो किसी फ़िल्मी कहानी जैसा लगता है, मगर है बिल्कुल हक़ीक़त. इसमें एक ग़रीब मुस्लिम व्यक्ति को रास्ते में एक अनाथ हिन्दू बच्ची मिलती है और वह उसे अपनी बेटी की तरह पालता है, उसके युवा होने पर पुलिस को इसकी ख़बर लग जाती है और वे लड़की को ले जाती है. फिर बूढ़ा मुस्लिम पिता अपनी हिन्दू बेटी को पाने के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाता है. सबसे अहम बात यह है कि उसे अदालत से अपनी बेटी मिल जाती है और फिर दोनों ख़ुशी-ख़ुशी साथ रहने लगते हैं.

ग़ौरतलब है कि गुजरात के भड़ूच के समीपवर्ती गांव तनकरिया में रहने वाले क़रीब 60 वर्षीय जादूगर सरफ़राज़ क़ादरी वर्ष 1995 में मध्यप्रदेश के इटारसी शहर में जादू का खेल दिखाने गए थे. वहां से लौटते वक़्त उन्हें रेलवे स्टेशन पर रोती हुई एक बच्ची मिली. जब उन्होंने बच्ची से उसका नाम और पता पूछा तो वह कुछ भी बताने में असमर्थ रही. उन्हें उस बच्ची पर तरह आ गया और वे उसे अपने साथ घर ले आए. बच्ची के मिलने से कुछ साल पहले ही उनकी पत्नी, बच्चों एक बेटी और एक बेटे की मौत हो चुकी थी. उन्हें इस बच्ची में के रूप में अपनी ही बेटी नज़र आई. चुनांचे उन्होंने इस बच्ची को पालने का फ़ैसला ले लिया. बच्ची से मिलने के कुछ साल बाद ही उनके पास जादू का खेल सीखने के लिए एक लड़का और उसकी बहन आए. वे उनके ही घर रहने लगे. मगर दोनों ने अपने परिवार वालों को इसकी जानकारी नहीं दी. बच्चों के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवा दी. इस पर पुलिस क़ादरी के घर पहुंच गई. जांच के दौरान पुलिस को मुन्नी पर भी शक हुआ. पूछताछ में मामला सामने आने के बाद पुलिस मुन्नी को अपने साथ ले गई. इसके बाद क़ादरी ने 25 अगस्त 2008 को अदालत में एक याचिका दायर कर वर्षा पटेल उर्फ़ मुन्नी को वापस दिलाने की मांग की, लेकिन अदालत द्वारा क़ादरी का आवेदन ठुकराए जाने के बाद मुन्नी को महिला संरक्षण गृह में रखा गया.

क़ादरी ने अदालत में कहा था कि उन्होंने मुन्नी को बेटी की तरह पाला है, इसलिए उन्हें ही उसका संरक्षण मिलना चाहिए. अदालत का कहना था कि नाबालिग़ लड़की मिलने पर पुलिस को इसकी सूचना या उसके हवाले किया जाना चाहिए, जो क़ादिर ने नहीं किया. वह लड़की को भले ही अपनी बेटी मानता हो, लेकिन उसके पास इसका कोई सबूत नहीं है.

तमाम परेशानियों के बावजूद क़ादरी ने हार नहीं मानी और आख़िर उनकी मेहनत रंग लाई. 14 दिसंबर 2008 में भड़ूच की एक फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के न्यायाधीश एचके घायल ने मुख्य न्यायायिक मजिस्ट्रेट के फ़ैसले को पलटते हुए क़ादरी को मुन्नी के पालन-पोषण का ज़िम्मा सौंपने का आदेश दिया. अदालत ने पाया कि क़ादरी का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और मुन्नी अपनी मर्ज़ी से ही क़ादरी के साथ ही रह रही है. अदालत में दिए बयान में मुन्नी ने कहा था कि वह अपने पिता क़ादरी के साथ ही रहना चाहती है. उसका यह भी कहना था कि उसके अपने पिता का नाम जगदीश भाई के रूप में याद है, लेकिन मां का नाम उसे याद नहीं है. उसने यह भी कहा कि वह 18 साल की हो चुकी है.

यह वाक़िया उन लोगों के लिए नज़ीर है, जो नफ़रत को बढ़ावा देते हैं. कभी मज़हब के नाम पर, कभी भाषा के नाम पर तो कभी प्रांत विशेष के नाम पर बेक़सूर लोगों का ख़ून बहाकर अपनी जय-जयकार कराते हैं. कुछ भी हो, आख़िर में जीत तो इंसानियत की ही होती है.

Monday, October 4, 2010

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना...


आज राष्ट्रीय अखंडता दिवस  है...

फ़िरदौस ख़ान
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिंदी हैं हम वतन है, हिन्दोस्तां हमारा...
हिंसा किसी भी सभ्य समाज के लिए सबसे बड़ा कलंक हैं, और जब यह दंगों के रूप में सामने आती है तो इसका रूप और भी भयंकर हो जाता है। दंगे सिर्फ जान और माल का ही नुक़सान नहीं करते, बल्कि इससे लोगों की भावनाएं भी आहत होती हैं और उनके सपने बिखर जाते हैं। दंगे अपने पीछे दुख-दर्द, तकलीफ़ें और कड़वाहटें छोड़ जाते हैं. लेकिन कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद इंसानियत की मिसाल पेश करते हैं.

ऐसी ही एक महिला हैं गुजरात के अहमदबाद की गुलशन बानो, जिन्होंने एक हिन्दू लड़के को गोद लिया है. क़रीब 47 साल की गुलशन बानो केलिको कारख़ाने के पास अपने बच्चों के साथ रहती हैं. वर्ष 2002 के मुस्लिम विरोधी दंगों में जब लोग एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे हो रहे थे, उस समय उनके बेटे आसिफ़ ने एक हिन्दू लड़के रमन को आसरा दिया था. बेटे के इस काम ने गुलशन बानो का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया. रमन के आगे-पीछे कोई नहीं था. इसलिए उन्होंने उसे गोद लेने का फ़ैसला कर लिया. इस वाकिये को क़रीब छह साल बीत चुके हैं. रमन गुलशन बानो के परिवार में एक सदस्य की तरह रहता है. उसका कहना है कि गुलशन बानो उसके लिए मां से भी बढ़कर हैं. उन्होंने कभी उसे मां की ममता की कमी महसूस नहीं होने दी. बारहवीं कक्षा तक पढ़ी गुलशन बानो कहती हैं कि उनका जीवन संघर्षों से भरा हुआ है. उन्होंने अपने आठ बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा किया है. जब उन्होंने बिन मां-बाप का बच्चा देखा, तो उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने उसे अपना लिया. उनके घर ईद के साथ-साथ दिवाली भी धूमधाम से मनाई जाती है. अलग-अलग धर्मों से ताल्लुक़ रखने के बावजूद एक ही थाली में भोजन करने वाले मां-बेटे का प्यार इंसानियत का सबक़ सिखाता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ वर्ष 2000 में 16 लाख लोग हिंसा के कारण मौत के मुंह में समा गए थे. इनमें से तक़रीबन तीन लाख लोग युध्द या सामूहिक हिंसा में मारे गए, पांच लाख की हत्या हुई और आठ लाख लोगों ने खुदकुशी की. युध्द, गृहयुध्द या दंगे-फ़साद बहुत विनाशकारी होते हैं, लेकिन इससे भी कई गुना ज़्यादा लोग हत्या या आत्महत्या की वजह से मारे जाते हैं. हिंसा में लोग अपंग भी होते हैं. इनकी तादाद मरने वाले लोगों से क़रीब 25 गुना ज़्यादा होती है. हर साल क़रीब 40 करोड़ लोग हिंसा की चपेट में आते हैं और हिंसा के शिकार हर व्यक्ति के नज़दीकी रिश्तेदारों में कम से कम 10 लोग इससे प्रभावित होते हैं.

इसके अलावा ऐसे भी छोटे-छोटे झगड़े होते हैं, जिनसें जान व माल का नुक़सान तो नहीं होता, लेकिन उसकी वजह से तनाव की स्थिति जरूर पैदा हो जाती है. कई बार यह हालत देश और समाज की एकता, अखंडता और चैन व अमन के लिए भी खतरा बन जाती है. भारत भी हिंसा से अछूता नहीं है. आज़ादी के बाद से ही भारत के विभिन्न हिस्सों में सांप्रदायिक दंगे होते रहे हैं. इनमें 1961 में अलीगढ़, जबलपुर, दमोह और नरसिंहगढ़, 1967 में रांची, हटिया, सुचेतपुर-गोरखपुर, अहमदनगर, शोलापुर, मालेगांव, 1969 में अहमदाबाद, 1970 में भिवंडी, 1971 में तेलीचेरी (केरल), 1984 में सिख विरोधी दंगे, 1992-1993 में मुंबई में भड़के मुस्लिम विरोधी दंगे से लेकर 1999 में उड़ीसा में ग्राहम स्टेन्स की हत्या, 2001 में मालेगांव और 2002 में गुजरात में हुए मुस्लिम विरोधी दंगों सहित करीब 30 ऐसे नरसंहार शामिल हैं, जिनकी कल्पना मात्र से ही रूह कांप जाती है.

दंगों में कितने ही बच्चे अनाथ हो गए, सुहागिनों का सुहाग छिन गया, मांओं की गोदें सूनी हो गईं. बसे-बसाए खुशहाल घर उजड़ गए और लोग बेघर होकर खानाबदोश जिन्दगी जीने को मजबूर हो गए. हालांकि पीड़ितों को राहत देने के लिए सरकारों ने अनेक घोषणाएं कीं और जांच आयोग भी गठित किए, लेकिन नतीजा वही ‘वही ढाक के तीन पात’ रहा. आख़िर दंगा पीड़ितों की आंखें इंसाफ़ की राह देखते-देखते पथरा गईं, लेकिन किसी ने उनकी सुध नहीं ली.

सांप्रदायिक दंगों के बाद इनकी पुनरावृत्ति रोकने और देश में सांप्रदायिक सौहार्द्र और आपसी भाईचारे को बढ़ावा देने के मक़सद से कई सामाजिक संगठन अस्तित्व में आ गए जो देश में सांप्रदायिक सद्भाव की अलख जगाने का काम कर रहे हैंक.

ग़ौरतलब है कि हिंसा के मुख्य कारणों में अन्याय, विषमता, स्वार्थ और आधिपत्य स्थापित करने की भावना शामिल है. हिंसा को रोकने के लिए इसके बुनियादी कारणों को दूर करना होगा. इसके लिए गंभीर रूप से प्रयास होने चाहिएं. इससे जहां रोज़मर्रा के जीवन में हिंसा कम होगी, वही युध्द, गृहयुध्द और दंगे-फ़साद जैसी सामूहिक हिंसा की आशंका भी कम हो जाएगी. अहिंसक जीवन जीने के लिए यह ज़रूरी है कि ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ की प्रवृत्ति को अपनाया जाए. अहिंसक समाज की बुनियाद बनाने में परिवार के अलावा, स्कूल और कॉलेज भी अहम भूमिका निभा सकते हैं. इसके साथ ही विभिन्न धर्मों के धर्म गुरु भी लोगों को धर्म की मूल भावना मानवता का संदेश देकर अहिंसक समाज के निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं. देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए यह भी ज़रूरी है कि सांप्रदायिक मुद्दों को आपसी बातचीत से हल किया जाए.