Tuesday, March 6, 2012

मुबारकबाद...

उत्तर प्रदेश में पार्टी की जीत से समाजवादी पार्टी के नेता बहुत ख़ुश हैं... हमारे दोस्त (सपा नेता) चाहते हैं कि हम मुलायम सिंह जी की ताजपोशी के समारोह में शिरकत करें... इसके लिए वे हवाई जहाज़ की टिकटें भी भेज रहे हैं...
इस जीत के लिए उन्हें दिली मुबारकबाद...

Sunday, March 4, 2012

दिग्विजय सिंह ने जो कहा, सही कहा...


फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का यह कहना बिलकुल सही है कि अगर उत्तर प्रदेश में चुनाव  नतीजे पार्टी के पक्ष में नहीं आते हैं, तो इसके लिए राहुल गांधी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता...क्योंकि एक नेता माहौल बनाता है. इस माहौल को वोट और सीटों में तब्दील करना उम्मीदवारों और संगठन का काम है... इस चुनाव में राहुल गांधी ने बहुत मेहनत की है...इसे किसी भी सूरत में झुठलाया नहीं जा सकता है...राहुल के हाथ में कोई जादू की छड़ी तो नहीं है कि वो पल भर में हार को जीत में बदल दें...उत्तर प्रदेश कांग्रेस में जिस तरह से सीटों के बंटवारे को लेकर बवाल हुआ...बाहरी उम्मीदवारों को लेकर सवाल उठे और अपनों  को टिकट दिलाने को लेकर अंदरूनी गुटबाज़ी सामने आई...उसे देखते हुए यह कहना क़तई ग़लत न होगा कि राहुल गांधी ने हालात को बहुत संभाला है...जो हुआ, सो हुआ...कांग्रेस के लिए अब ज़रूरी है कि वो आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र अपने संगठन को और मज़बूत बनाए...और ऐसी किसी भी बात से बचे, जिससे विरोधियों को उसके ख़िलाफ़ आग उगलने का मौक़ा मिले...  

क़ाबिले-गौर है कि  कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रचार में सभी सियासी दलों के नेताओं को पीछे छोड़ दिया... उन्होंने अब तक कुल 211 जनसभाएं कीं... उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन 14 नवम्बर से इलाहाबाद के फूलपुर से चुनाव मुहिम की शुरूआत की थी...हालांकि राहुल 12 नवम्बर को बाराबंकी से चुनाव प्रचार शुरू कर चुके थे... अमेठी के सांसद ने विधानसभा चुनाव में 48 दिन उत्तर प्रदेश में गुज़ारे... दिन और सभाओं के मामले में किसी भी पार्टी के नेता का यह सबसे लंबा दौरा था... अब तक किसी भी विधानसभा चुनावों में किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के नेता ने इतनी सभाएं नहीं कीं...

Saturday, January 28, 2012

राहुल ने दिखाया विकास का सपना


फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार की बागडोर संभाले हुए हैं. अपनी जनसभाओं में वह जिस तरह सांप्रदायिकता, जातिवाद, भ्रष्टाचार और अपराध को लेकर भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी और समाजवादी पार्टी को निशाना बनाए हुए हैं, उससे सभी दलों के होश उड़े हुए हैं. कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी विपक्षियों पर सधे राजनीतिक अंदाज़ में हमले कर रहे हैं. एक संजीदा वक्ता की तरह तार्किक ढंग से वह विरोधी दलों की चुन-चुन कर व्यंग्यात्मक लहजे में जवाब दे रहे हैं. उनके इसी अंदाज़ से विपक्षी दलों में बौखलाहट पैदा हो गई है. वे समझ नहीं पा रहे हैं कि राहुल के ‘आम आदमी’ का कौन सा तोड़ निकालें.

राहुल गांधी भाजपा के 'इंडिया शाइनिंग' और लोकपाल पर उसके चरित्र की जमकर बखिया उधेड़ रहे हैं. वह भाजपा द्वारा बाबू सिंह कुशवाहा जैसे भ्रष्टाचारी नेताओं से हाथ मिलाने पर लोगों से सवाल करते हैं, तो उन्हें भीड़ से खुलकर जवाब भी मिलते हैं. उन्हीं जवाबों को आगे बढ़ाते हुए मंच से राहुल गांधी लोगों को बताते हैं कि ग़रीबों का मसीहा बनने वाले विपक्षी नेता कहते हैं कि राहुल गांधी पागल हो गया है, और इसके बाद वह आक्रामक हो जाते हैं. अपनी आस्तीनें चढ़ाकर हमलावर अंदाज़ में कहते हैं- ‘‘हां, मैं ग़रीबों का दुख-दर्द देखकर, प्रदेश की दुर्दशा देखकर पागल हो गया हूं. कोई कहता है कि राहुल गांधी अभी बच्चा है, वह क्या जाने राजनीति क्या होती है. तो मेरा कहना है कि हां, मुझे उनकी तरह राजनीति करनी नहीं आती. मैं सच्चाई और साफ़ नीयत वाली राजनीति करना चाहता हूं. मुझे उनकी राजनीति सीखने का शौक़ भी नहीं है. मायावती कहती हैं राहुल नौटंकीबाज़ है. तो मेरा कहना है कि अगर ग़रीबों का हाल जानना, उनके दुख-दर्द को समझना, नाटक है तो राहुल गांधी यह नाटक ताउम्र करता रहेगा.’’

राहुल गांधी अपनी पाठशाला में उत्तर प्रदेश को दो दशकों के राजनीतिक पिछड़ेपन, बदहाली से निकालने के लिए युवाओं से साथ का हाथ बढ़ाते हैं. इस दौरान राहुल यह बताना नहीं भूलते कि वह यहां चुनाव जीतने नहीं, उत्तर प्रदेश को  बदलने आए हैं. यह उनकी इस साफ़गोई का सपा, बसपा और भाजपा के पास कोई जवाब नहीं है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि राहुल गांधी की बातों में दम है. उत्तर प्रदेश में अभी तक जितने भी काम हुए मसलन बुनकरों को राहत देने के लिए बुनकर पैकेज का ऐलान हो, बुंदेलखंड को दुर्दशा से निकालने के लिए बुंदेलखंड पैकेज का भारी-भरकम पैसा उपलब्ध कराना हो या फिर उत्तर प्रदेश के युवाओं के लिए राजनीति के दरवाज़े खोलने के लिए एशिया की सर्वोत्तम यूनिवर्सिटी बीएचयू में युवा राजनीति का अखाड़ा छात्र संघ बहाली का प्रयास हो, इन सब में राहुल की कोशिश और उनकी ईमानदारी के कारण ही कामयाबी मिली है.

यह हक़ीक़त है कि पिछले पांच सालों में वह हवाई नेताओं की तरह आसमान में नहीं उड़े और न ही किसी पंचतारा सेलिब्रिटी की तरह रथ पर चढ़कर ज़िलों का दौरा किया. उन्होंने खाटी देसी अंदाज़ में गांवों में रात रात बिताई. पगडंडियों पर कीचड़ की परवाह किए बिना चले और आम आदमी से बेलाग संवाद स्थापित करने की कोशिश की. आम आदमी को नज़दीक से जानने-समझने और अपना हाथ उसके हाथ में देने की पहल की.

राहुल गांधी एक परिपक्व राजनेता हैं. इसके बावजूद उन्हें अमूल बेबी कहना उनके ख़िलाफ़ एक साज़िश का हिस्सा ही कहा जा सकता है. भूमि अधिग्रहण मामले को ही लीजिए. राहुल ने भूमि अधिग्रहण को लेकर जिस तरह पदयात्रा की, वह कोई परिपक्व राजनेता ही कर सकता है. हिंदुस्तान की सियासत में ऐसे बहुत कम नेता रहे हैं, जो सीधे जनता के बीच जाकर उनसे संवाद करते हैं. नब्बे के दशक में बहुजन समाज पार्टी के नेता कांशीराम ने गांव-गांव जाकर पार्टी को मज़बूत करने का काम किया था, जिसका फल बसपा को सत्ता के रूप में मिला. चौधरी देवीलाल ने भी इसी तरह हरियाणा में आम जनता के बीच जाकर अपनी एक अलग पहचान बनाई थी. दक्षिण भारत में भी कई राजनेताओं ने पद यात्रा के ज़रिये जनता में अपनी पैठ बनाई और सत्ता हासिल की.

कुल मिलाकर राहुल गांधी ऐसे क़द्दावर नेताओं की फ़ेहरिस्त में शुमार हो चुके हैं, जिनके तूफ़ान से विपक्षी सियासी दलों के  हौसले  पस्त हो जाते हैं. हालत यह हो गई है कि कोई सियासी दल दाग़ी को ले रहा है, तो कोई दग़ाबाज़ी को सहारा बना रहा है. अब कोई चारा न देखकर कुछ सियासी दल राहुल पर व्यक्तिगत प्रहार करने में जुट गए हैं.  मगर इससे राहुल गांधी को कोई नुक़सान नहीं होगा, क्योंकि राजनीति की विरासत को संभालने वाला यह युवा नेता अब युवाओं, और अन्य वर्गों के साथ-साथ बुजुर्गों का भी चहेता बन चुका है. राहुल गांधी की जनसभाओं में दूर-दूर से आए बुज़ुर्ग यही कहते हैं कि लड़का ठीक ही तो कह रहा है, यही कुछ करेगा. महिलाओं में तो राहुल गांधी लेकर काफ़ी क्रेज है. यह बात तो विरोधी दलों के नेता भी बेहिचक क़ुबूल  करते हैं. वे तो मज़ाक़ के लहजे में यहां तक कहते हैं कि अगर महिलाओं को किसी एक नेता को वोट देने को कहा जाए तो सभी राहुल गांधी को ही देकर आएंगी. राहुल युवाओं ही नहीं बच्चों से भी घुलमिल जाते हैं. कभी किसी मदरसे में जाकर बच्चों से बात करते हैं, तो कभी किसी मैदान में खेल रहे बच्चों के साथ बातचीत शुरू कर देते हैं. यहां तक कि गांव-देहात में मिट्टी में खेल रहे बच्चों तक को गोद में उठाकर उसके साथ बच्चे बन जाते हैं.

जब भ्रष्टाचार और महंगाई के मामले में कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का चौतरफ़ा विरोध हो रहा था, ऐसे वक़्त में राहुल गांव-गांव जाकर जनमानस से एक भावनात्मक रिश्ता क़ायम कर रहे थे. राहुल लोगों से मिलने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते. पिछले साल में वह भट्टा-पारसौल गांव गए. उन्होंने आसपास के गांवों का भी दौरा कर ग्रामीणों से बात की, उनकी समस्याएं सुनीं और उनके समाधान का आश्वासन भी दिया- इससे पहले भी 11 मई की सुबह वह मोटरसाइकिल से भट्टा-पारसौल गांव जा चुके हैं. उस वक़्त मायवती ने उन्हें गिरफ्तार करा दिया था. इस बार भी वह गुपचुप तरीक़े से ही गांव गए. न तो प्रशासन को इसकी ख़बर थी और न ही मीडिया को इसकी भनक लगने दी गई. हालांकि उनके दौरे के बाद प्रशासन सक्रिय हो गया. इसी तरह बीती 29 जून को वह लखीमपुर में पीड़ित परिवार के घर गए और उन्हें इंसाफ़ दिलाने का वादा किया.

भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी द्वारा निकाली गई पदयात्रा से सियासी हलक़ों में चाहे जो प्रतिक्रिया हो रही हो, लेकिन यह हक़ीक़त है कि राहुल गांधी ने ग्रेटर नोएडा के ग्रामीणों के साथ जो वक़्त बिताया, उसे वे कभी नहीं भूल पाएंगे. इन लोगों के लिए यह किसी सौग़ात से कम नहीं है कि उन्हें कांग्रेस के युवराज के साथ वक़्त गुज़ारने का मौक़ा मिला. अपनी पदयात्रा के दौरान पसीने से बेहाल राहुल ने शाम होते ही गांव बांगर के किसान विजय पाल की खुली छत पर स्नान किया. फिर थोड़ी देर आराम करने के बाद उन्होंने घर पर बनी रोटी, दाल और सब्ज़ी खाई. ग्रामीणों ने उन्हें पूड़ी-सब्ज़ी की पेशकश की, लेकिन उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया. गांव में बिजली की क़िल्लत रहती है, इसलिए ग्रामीणों ने जेनरेटर का इंतज़ाम किया, लेकिन राहुल ने पंखा भी बंद करवा दिया. वह एक आम आदमी की तरह ही बांस और बांदों की चारपाई पर सोये. यह कोई पहला मौक़ा नहीं है जब राहुल गांधी इस तरह एक आम आदमी की ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं. इससे पहले भी वह रोड शो कर चुके हैं और उन्हें इस तरह के माहौल में रहने की आदत है. कभी वह किसी दलित के घर भोजन करते हैं तो कभी किसी मज़दूर के  साथ ख़ुद ही परात उठाकर मिट्टी ढोने लगते हैं. राहुल का आम लोगों से मिलने-जुलने का यह जज़्बा उन्हें लोकप्रिय बना रहा है. राहुल जहां भी जाते हैं, उन्हें देखने के लिए, उनसे मिलने के लिए लोगों का हुजूम इकट्ठा हो जाता है. हालत यह है कि लोगों से मिलने के लिए वह अपना सुरक्षा घेरा तक तोड़ देते हैं.

राहुल समझ चुके हैं कि जब तक वह आम आदमी की बात नहीं करेंगे, तब तक वह सियासत में आगे नहीं ब़ढ पाएंगे. इसके लिए उन्होंने वह रास्ता अख्तियार किया, जो बहुत कम लोग चुनते हैं. वह भाजपा की तरह एसी कल्चर की राजनीति नहीं करना चाहते. राहुल का कहना है कि उन्होंने किसानों की असल हालत को जानने के लिए पदयात्रा शुरू की, क्योंकि दिल्ली और लखनऊ के एसी कमरों में बैठकर किसानों की हालत पर सिर्फ़ तरस खाया जा सकता है, उनकी समस्याओं को न तो जाना जा सकता है और न ही उन्हें हल किया जा सकता है. उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता रामकुमार भार्गव कहते हैं कि राहुल गांधी को भारी जनसमर्थन मिल रहा है, जिससे पार्टी कार्यकर्ता बहुत उत्साहित हैं. दरअसल, राहुल गांधी कांग्रेस के स्टार प्रचारक हैं. हर उम्मीदवार यही चाहता है कि वह उसके लिए जनसभा को संबोधित करें. उत्तर प्रदेश के अलावा दूसरे राज्यों में भी वह चुनाव प्रचार कर रहे हैं.  

बहरहाल, उत्तर प्रदेश के सियासी माहौल से तो यही लग रहा है कि जनता अब बदलाव चाहती है. लोग कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के उत्तर प्रदेश के विकास के सपने को सच करने के लिए कितना उनका साथ दे पाते हैं, यह तो चुनाव के नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा. लेकिन इतना ज़रूर है कि इस युवराज ने यहां के बाशिंदों को विकास एक ऐसा सपना ज़रूर दिखा दिया है, जिसमें पलायन के लिए कोई जगह नहीं है.

Wednesday, December 14, 2011

यह लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी का बलॊग है

रजनीश जी...
आपकी पोस्ट (ब्लॉगवाणी : यह लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी का ब्लॉग है) पढ़ी...
इतना कहना चाहेंगे कि हम भी अपने बारे में लिखने बैठते तो इतना अच्छा-अच्छा नहीं लिख पाते, जितना अच्छा-अच्छा आपने लिखा है...
आपके लिखने के अंदाज़ के तो हम पहले से ही क़ायल हैं... 
सच! आपने तो हमसे हमारा ही तअरुफ़ करा दिया...वो भी इतने दिलकश अंदाज़ में...क्या कहने...
तारीफ़ और शुक्रिया के लिए हमें लफ़्ज़ ही नहीं मिल पा रहे हैं...
वाक़ई... ज़र्रे को आफ़ताब बनाना तो कोई आपसे सीखे...
आपका बहुत-बहुत शुक्रिया

यह लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी का बलॊग है
-डॊ. ज़ाकिर अली ’रजनीश’
(जनसंदेश टाइम्स, 14 दिसंबर, 2011 के 'ब्‍लॉगवाणी' कॉलम में प्रकाशित)
एक ज़माना हुआ करता था जब शाम को खाना खाने के बाद बच्‍चे अपने दादा-दादी को घेर कर बैठ जाया करते थे और कहानियां सुना करते थे. राजा-रानी, परी-जादूगरों की वे कहानियां इतनी मज़ेदार हुआ करती थीं कि कब उन्‍हें सुनते-सुनते घंटों बीत जाया करते थे, पता ही नहीं चलता था. समय बदला, लोग बदले और साथ ही बदल गया परिवार का ढांचा. अब न तो परिवार में दादा-दादी के लिए जगह बची है और न ही बचा है कहानियों के लिए स्‍पेस. आज के प्रतिद्व‍न्द्विता के युग में ढली पढ़ाई में न तो बच्‍चों के पास कहानियों के लिए समय बचा है और न ही कहानियों के सुनाने वालों के पास अब बच्‍चे ही पहुंच पाते हैं.
राजा-रानी का दौर ख़त्‍म हुए एक युग बीत चुका है. यही कारण है कि घोड़े पर चढ़कर आते हुए राजकुमार अब कहीं नहीं नज़र आते. राजकुमारियों के क़िस्‍से भी अब पुराने पड़ चुके हैं. लेकिन बावजूद उसके वे कथानक, वे स्‍मृतियां अब भी लोगों के जेहन में ज़िन्दा हैं. यही कारण है कि मां-बाप अपने बच्‍चों की तारीफ़ करते हुए उन्‍हें अक्‍सर ‘राजा बेटा’ और ‘नन्‍हीं राजकुमारी’ जैसे विशेषणों का इस्‍तेमाल करते पाए जाते हैं. ब्‍लॉगजगत में जहां एक ओर ऐसे तमाम नन्‍हें राजकुमार और राजकुमारियां अपनी शैतानियों के कारण चर्चा में रहते हैं, वहीं एक शख्शियत ऐसी भी है, जो यूं तो ब्‍लॉग की दुनिया की चर्चित हस्‍ती है, लेकिन अपने को शब्‍दों के द्वीप की राजकुमारी के रूप में प्रस्‍तुत करती है. उस चर्चित ब्‍लॉगर का नाम है सुश्री फ़िरदौस ख़ान.
फ़िरदौस एक युवा लेखिका हैं. वे पत्रकार के साथ-साथ शायरा और कहानीकार के रूप में भी जानी जाती हैं और उर्दू, हिन्दी तथा पंजाबी साहित्‍य में समान रूप से रूचि रखती हैं. अनेक दैनिक एवं साप्‍ताहिक समाचार पत्रों, रेडियो तथा टेलीविज़न चैनलों के लिए काम कर चुकी फ़िरदौस वर्तमान में 'स्टार न्यूज़ एजेंसी' और 'स्टार वेब मीडिया' में समूह संपादक का दायित्व संभाल रही हैं. वे वर्ष 2007 से ब्‍लॉग जगत में सक्रिय हैं और अपने ब्‍लॉग ‘मेरी डायरी’ (http://firdaus-firdaus.blogspot.com) के लिए जानी जाती हैं.

‘मेरी डायरी’ फ़िरदौस का एक समसामयिक ब्‍लॉग है, जिसमें वे बेबाक शैली में अपने विचार रखती हैं. साहित्‍य और विशेषकर उर्दू साहित्‍य से गहरा जुड़ाव होने के कारण जहां उनके शब्‍दों में उर्दू की मिठास मिलती है, वहीं पत्रकारिता के गहन अनुभव के कारण उनकी भाषा में एक तीखी धार का भी एहसास होता है. यही कारण है कि वे जब किसी ज्‍वलंत मुद्दे पर अपनी बात रखती हैं, तो वह काफ़ी मारक हो जाती है. जब वे अपनी क़लम की ज़द में धार्मिक रीति-रिवाजों को लेकर आती हैं, तो अकसर विवाद की ऊंची-ऊंची लपटें उठने लगती हैं. कभी-कभी इन विषयों पर लिखते समय अपने ख़िलाफ़ उठने वाले विवाद के कारण ऐसा भी होता है कि वे शालीनता की सीमा रेखा के आसपास पहिंच जाती हैं. लेकिन न तो वे इस बात का कोई मलाल रखती हैं और न ही वे इस वजह से होने वाली तीखी आलोचनाओं के कारण अपनी सोच से पीछे हटने के लिए तैयार नज़र आती हैं.
एक विचारवारन मुस्लिम महिला होने के कारण फ़िरदौस कठमुल्‍लावाद की सख्‍़त विरोधी हैं और मुस्लिम महिलाओं को आगे बढ़कर समाज की मुख्‍यधारा में शामिल होने की हिमायती हैं. वे गर्व के साथ अपने को भारतीय नारी कहती हैं और न सिर्फ़ मुस्लिम महिलाओं पर लादी गई ज़्यादतियों का विरोध करती हैं, वरन बड़े ख़ख़्र से बताती हैं कि हमने अम्मी, दादी, नानी, मौसी और भाभी को बुर्क़े की क़ैद से निजात दिलाई है. वे मुस्लिम समाज में व्‍याप्‍त दक़ियानूसी विचारधाराओं की सख़्त आलोचक हैं. यही कारण है कि उन्‍होंने अपने ब्‍लॉग पर सबसे ज़्यादा अगर किसी विषय पर लिखा है, तो वह इस्‍लाम और मुस्लिम समाज ही है.
'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' नामक किताब की लेखिका फ़िरदौस हिन्‍दुस्‍तानी शास्‍त्रीय संगीत की भी जानकार हैं और अपनी साहित्यिक सेवाओं के लिए अनेक संस्‍थाओं द्वारा पुरस्‍कृत एवं सम्‍मानित हो चुकी हैं. उनके साहित्यिक रुझान की झलक उनके ब्‍लॉग ‘फ़िरदौस डायरी’ (http://firdausdiary.blogspot.com) से मिलती है, जिस पर वे अपनी नज़्मों के साथ-साथ साहित्यिक एवं सांस्‍कृतिक महत्‍व के विषयों पर लेखन करती पाई जाती हैं. इसके अतिरिक्‍त वे अपने उर्दू ब्‍लॉग ‘जहांनुमां’, पंजाबी ब्‍लॉग ‘हीर’ एवं अंग्रेजी ब्‍लॉग ‘द पैराडाइज़’ के लिए भी जानी जाती हैं, जिनके लिंक उनके हिन्‍दी ब्‍लॉग ‘मेरी डायरी’ पर देखे जा सकते हैं.
अपनी बरदस्‍त टैग लाइन ‘मेरे अल्फ़ाज़, मेरे जज़्बात और मेरे ख़्यालात की तर्जुमानी करते हैं... क्योंकि मेरे लफ़्ज़ ही मेरी पहचान हैं’ के कारण पहली नजर में पाठकों को आकर्षित करने वाली फ़िरदौस एक गम्‍भीर ब्‍लॉगर के रूप में जानी जाती हैं और अपने विविधतापूर्ण तथा प्रभावी लेखन के कारण ब्‍लॉगरों की बेतहाशा भीड़ में भी दूर से पहचानी जाती हैं.

Monday, November 14, 2011

राहुल को सलाहकार की ज़रूरत है...फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को एक ऐसे सलाहकार की ज़रूरत है, जो उनके लिए समर्पित हो और उन्हें वो सलाह दे सके, जिसकी उन्हें ज़रूरत है... क्योंकि आज उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद के झूंसी में आयोजित जनसभा में जिस तरह राहुल गांधी ने भाषण दिया, उससे तो यही कहा जा सकता है कि सियासत में उनके पास कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो उन्हें कामयाब होते देखना चाहता हो...
राहुल गांधी का एक हल्का बयान उनकी सारी मेहनत पर पानी फेर देता है...कई बार लगता है कि वो ख़ुद अपने ही दुश्मन बन बैठे हैं...आख़िर क्यों वो ऐसे बयान देते हैं, जो उनके विरोधियों को उनके ख़िलाफ़ बोलने का मौक़ा दे देते हैं...बेहतर हो कि वो सार्वजनिक तौर पर कोई भी बयान देने पहले उसके अच्छे-बुरे दोनों पहलुओं पर अच्छे से गौर कर लें... 

Monday, August 8, 2011

राहुल को प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं...


हिन्दुस्तान का शहज़ादा 
फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के लिए देशवासियों की पहली पसंद हैं. सीएनएन-आईबीएन और सीएनबीसी-टीवी 18 टीवी नेटवर्क  के सर्वे के मुताबिक़ ज़्यादातर लोगों की राय है कि राहुल गांधी को देश का अगला प्रधानमंत्री बनना चाहिए. देश के 20 राज्यों में किए गए इस सर्वे के मुताबिक़ कांग्रेस शासित राज्यों के 42 फ़ीसदी लोग चाहते हैं कि राहुल देश की कमान संभालें, जबकि 32 फ़ीसदी लोगों का मानना है कि जल्द ही मनमोहन सिंह की जगह ले लेनी चाहिए. कुल 39 हज़ार लोगों में से महज़ 22 फ़ीसदी लोगों का मानना है कि मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद पर बने रहना चाहिए. वहीं 54 फ़ीसदी लोगों का कहना है कि राहुल ग़रीबों के हितैषी और भरोसेमंद नेता हैं. उनके सामने कांग्रेस पार्टी का कोई नेता नहीं टिक पाया.

जब भ्रष्टाचार और महंगाई के मामले में कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का चौतरफ़ा विरोध हो रहा है, ऐसे वक़्त  में राहुल ने गांव-गांव जाकर जनमानस से एक भावनात्मक रिश्ता क़ायम किया. राहुल ने लोगों से मिलने का कोई मौक़ा नहीं छो़ड़ा. बीती पांच जुलाई को वह भट्टा पारसौल गांव गए. उन्होंने आसपास के गांवों का भी दौरा कर ग्रामीणों से बात की, उनकी समस्याएं सुनीं और उनके समाधान का आश्वासन भी दिया. इससे पहले भी 11 मई की सुबह वह मोटरसाइकिल से भट्टा-पारसौल गांव जा चुके हैं. उस वक़्त मायावती ने उन्हें गिरफ्तार करा दिया था. इस बार भी वह गुपचुप तरीक़े से ही गांव गए. न तो प्रशासन को इसकी ख़बर थी और न ही मीडिया को इसकी भनक लगने दी गई. हालांकि उनके दौरे के बाद प्रशासन सक्रिय हो गया. बीती 29 जून को वह लखीमपुर में पीड़ित  परिवार के घर गए और उन्हें इंसाफ़ दिलाने का वादा किया.

भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी द्वारा निकाली गई पदयात्रा से सियासी हलक़ों में चाहे जो प्रतिक्रिया हुई हो, लेकिन यह हक़ीक़त है कि राहुल ने ग्रामीणों के साथ जो वक़्त बिताया, उसे वे कभी नहीं भूल पाएंगे. इन लोगों के लिए यह किसी सौग़ात से कम नहीं था कि उन्हें युवराज के साथ वक़्त गुज़ारने का मौक़ा मिला. अपनी पदयात्रा के दौरान पसीने से बेहाल राहुल ने शाम होते ही गांव बांगर के किसान विजय पाल की खुली छत पर स्नान किया. फिर थोड़ी देर आराम करने के बाद उन्होंने घर पर बनी रोटी, दाल और सब्ज़ी खाई. ग्रामीणों ने उन्हें पूड़ी-सब्ज़ी की पेशकश की, लेकिन उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया. गांव में बिजली की क़िल्लत रहती है, इसलिए ग्रामीणों ने जेनरेटर का इंतज़ाम किया था, लेकिन राहुल ने पंखा भी बंद करवा दिया. वह एक आम आदमी की तरह ही बांस और बांदों की चारपाई पर सोए. यह कोई पहला मौक़ा नहीं था, जब राहुल गांधी इस तरह एक आम आदमी की ज़िंदगी गुज़ार रहे थे. इससे पहले भी वह रोड शो कर चुके हैं और उन्हें इस तरह के माहौल में रहने की आदत है. कभी वह किसी दलित के घर भोजन करते हैं तो कभी किसी मज़दूर से साथ ख़ुद ही परात उठाकर मिट्टी ढोने लगते हैं. राहुल का आम लोगों से मिलने-जुलने का यह जज़्बा उन्हें लोकप्रिय बना रहा है. राहुल जहां भी जाते हैं, उन्हें देखने के लिए, उनसे मिलने के लिए लोगों का हुजूम इकट्ठा हो जाता है.

फ़िलहाल राहुल अपनी मां सोनिया के साथ विदेश में हैं. पिछले दिनों ही उनकी सर्जरी हुई है. उनके जल्द ठीक होने की दुआ करते हैं. उम्मीद है कि हिन्दुस्तान का शहज़ादा जल्द ही वापस आएगा.  माना जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की ग़ैर मौजूदगी में राहुल को तिरंगा फहराने का अधिकार सौंपा जा सकता है. अगर ऎसा होता है, तो यह पहला मौक़ा होगा जब राहुल कांग्रेस के 24 अकबर रोड स्थित मुख्यालय पर तिरंगा फहराएंगे...

अन्य
राहुल की मेहनत रंग लाएगी... 

Sunday, July 24, 2011

वह तो झांसी वाली रानी थी...


टाइम मैगजीन ने भारतीय वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को पति के बचाव में दीवार बनकर खड़ी होने वाली दुनिया की 10 जांबाज़  पत्नियों की फ़ेहरिस्त में शामिल किया है. लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1828 को  में वाराणसी हुआ था. उनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे और माता का नाम भागीरथी बाई था. उनका बचपन का नाम 'मणिकर्णिका' रखा गया, लेकिन प्यार से मणिकर्णिका को मनु पुकारा जाता था. अपनी मां की मौत के बाद वह पिता के साथ बिठूर आ गई थीं. उसके पिता मोरोपंत तांबे एक साधारण ब्राह्मण और अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के सेवक थे.बाजीराव मनु को प्यार से छबीली कहते थे.पेशवा बाजीराव के बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक आते थे. मनु भी उन्हीं बच्चों के साथ पढ़ने लगी. मनु ने यहां किताबी शिक्षा के साथ-साथ सैन्य शिक्षा हासिल की. उनका विवाह 1842 में झांसी के राजा गंगाधर राव निवालकर के साथ हुआ था. विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया.  सन 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया,लेकिन  चार महीने बाद उसकी मौत हो गई.  सन 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ने पर दरबारियों ने उन्हें पुत्र गोद लेने की सलाह दी. अपने ही परिवार के पांच साल के एक बच्चे को उन्होंने गोद लिया और उसे अपना दत्तक पुत्र बनाया. इस बालक का नाम दामोदर राव रखा गया.  पुत्र गोद लेने के बाद राजा गंगाधर राव की दूसरे ही दिन 21 नवंबर 1853 में मौत हो गई. ईस्ट इंडिया कंपनी झांसी का शासन छीन लेना चाहता थी.
 इसलिए अंग्रेजों ने  दत्तक-पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और रानी के पत्र लिख भेजा कि राजा का अपना कोई पुत्र नहीं है, इसीलिए झांसी पर अब अंग्रेज़ों का अधिकार होगा. लक्ष्मीबाई ने ऐलान कर दिया की वह किसी भी हाल में झांसी पर अंग्रेज़ों का क़ब्ज़ा नहीं होने देंगी. इस पर अंग्रेज़ों झांसी पर हमला कर दिया. झांसी के सेना ने अंग्रेज़ों का मुकाबला किया. अंग्रेज़ सेनापति ह्यूराज ने  कूटनीति का इस्तेमाल कर झांसी के ही एक विश्वासघाती सरदार दूल्हा सिंह को अपने पक्ष में कर लिया. सरदार ने क़िले का दक्षिणी दरवाज़ा खोल दिया, जिससे अंग्रेज़ सेना क़िले में घुस गई और उने क़त्लेआम और लूटपाट शुरू कर दी. यह देख लक्ष्मीबाई ने पुत्र को पीठ से बांधकर क़िले से निकल गई. अंग्रेज़ों ने उसका पीछा किया और उसे ज़ख़्मी कर दिया.  लक्ष्मीबाई के विश्वासपात्र पठान सरदार गौस ख़ान ने रानी को अंग्रेज़ों से बचाया और ग्वालियर स्थित बाबा गंगादास की कुटिया तक ले आया.  18 जून 1858  को रानी ने अंतिम सांस ली. उसी कुटिया में उनका न्तिम संस्कार किया गया. उनके पुत्र दामोदर राव ने मुखाग्नि दी.

रानी लक्ष्मीबाई के अलावा अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष बराक ओबामा की पत्नी मिशेल ओबामा, पूर्व अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट की पत्नी इलानोर रूजवेल्ट, स्पेन की रानी इजाबेल, मिस्र की चर्चित साम्राज्ञी क्लीयोपेट्रा भी इस फ़ेहरिस्त में शामिल हैं. मीडिया मुगल रूपर्ट मडरेक की पत्नी वेंडी डेंग का अपने पति को हमलावर से बचाने के लिए उस पर टूट पड़ने की हाल ही में हुई साहसिक घटना के मद्देनज़र पत्रिका ने 10 ऐसी पत्नियों की फ़ेहरिस्त जारी की है. हालांकि पत्रिका ने इसकी जानकरी नहीं दी है कि किस आधार पर इन महिलायों का चयन किया गया है.

इस फ़ेहरिस्त में झांसी की अरानी लक्ष्मीबाई को  आठवें स्थान पर रखा गया है, जबकि पहले पहले नंबर  पर इलानोर रूजवेल्ट और दूसरे पर स्पेन की रानी इजाबेल हैं. तीसरे पर कार्टर कैश, चौथे पर मिस्र की रानी क्लीयोपेट्रा, पांचवे पर अलास्का की पूर्व गवर्नर साराह पालिन, छठे पर इलेन डी गेनेरेस और पोर्सियो डी रोसी, सातवें पर  मिशेल ओबामा, नौवें पर  मिलिंडा गेट्स बिल गेट्स की पत्नी मिलिंडा गेट्स और दसवें पर वुड्स की पत्नी इलिन नोरड्रेगेन हैं.

Sunday, July 10, 2011

राहुल की मेहनत रंग लाएगी...


फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी एक परिपक्व राजनेता हैं. इसके बावजूद उन्हें अमूल बेबी कहना उनके ख़िलाफ़ एक साज़िश का हिस्सा ही कहा जा सकता है. भूमि अधिग्रहण मामले को ही लीजिए. राहुल ने भूमि अधिग्रहण को लेकर जिस तरह पदयात्रा की, वह कोई परिपक्व राजनेता ही कर सकता है. हिंदुस्तान की सियासत में ऐसे बहुत कम नेता रहे हैं, जो सीधे जनता के बीच जाकर उनसे संवाद करते हैं. नब्बे के दशक में बहुजन समाज पार्टी के नेता कांशीराम ने गांव-गांव जाकर पार्टी को मज़बूत करने का काम किया था, जिसका फल बसपा को सत्ता के रूप में मिला. चौधरी देवीलाल ने भी इसी तरह हरियाणा में आम जनता के बीच जाकर अपनी एक अलग पहचान बनाई थी. दक्षिण भारत में भी कई राजनेताओं ने पद यात्रा के ज़रिये जनता मेंअपनी पैठ बनाई और सत्ता हासिल की.

जब भ्रष्टाचार और महंगाई के मामले में कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का चौतरफ़ा विरोध हो रहा है, ऐसे वक़्त में राहुल गांव-गांव जाकर जनमानस से एक भावनात्मक रिश्ता क़ायम कर रहे हैं. राहुल लोगों से मिलने का कोई मौक़ा नहीं छो़ड रहे हैं. बीती पांच जुलाई को वह भट्टा-पारसौल गांव गए. उन्होंने आसपास के गांवों का भी दौरा कर ग्रामीणों से बात की, उनकी समस्याएं सुनीं और उनके समाधान का आश्वासन भी दिया- इससे पहले भी 11 मई की सुबह वह मोटरसाइकिल से भट्टा-पारसौल गांव जा चुके हैं. उस वक़्त मायवती ने उन्हें गिरफ्तार करा दिया था. इस बार भी वह गुपचुप तरीक़े से ही गांव गए. न तो प्रशासन को इसकी ख़बर थी और न ही मीडिया को इसकी भनक लगने दी गई. हालांकि उनके दौरे के बाद प्रशासन सक्रिय हो गया. बीती 29 जून को वह लखीमपुर में पीड़ित परिवार के घर गए और उन्हें इंसाफ़ दिलाने का वादा किया.

भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी द्वारा निकाली गई पदयात्रा से सियासी हलक़ों में चाहे जो प्रतिक्रिया हो रही हो, लेकिन यह हक़ीक़त है कि राहुल गांधी ने ग्रेटर नोएडा के ग्रामीणों के साथ जो वक़्त बिताया, उसे वे कभी नहीं भूल पाएंगे. इन लोगों के लिए यह किसी सौग़ात से कम नहीं है कि उन्हें कांग्रेस के युवराज के साथ वक़्त गुज़ारने का मौक़ा मिला. अपनी पदयात्रा के दौरान पसीने से बेहाल राहुल ने शाम होते ही गांव बांगर के किसान विजय पाल की खुली छत पर स्नान किया. फिर थोड़ी देर आराम करने के बाद उन्होंने घर पर बनी रोटी, दाल और सब्ज़ी खाई. ग्रामीणों ने उन्हें पूड़ी-सब्ज़ी की पेशकश की, लेकिन उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया. गांव में बिजली की क़िल्लत रहती है, इसलिए ग्रामीणों ने जेनरेटर का इंतज़ाम किया, लेकिन राहुल ने पंखा भी बंद करवा दिया. वह एक आम आदमी की तरह ही बांस और बांदों की चारपाई पर सोये. यह कोई पहला मौक़ा नहीं है जब राहुल गांधी इस तरह एक आम आदमी की ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं. इससे पहले भी वह रोड शो कर चुके हैं और उन्हें इस तरह के माहौल में रहने की आदत है. कभी वह किसी दलित के घर भोजन करते हैं तो कभी किसी मज़दूर के  साथ ख़ुद ही परात उठाकर मिट्टी ढोने लगते हैं. राहुल का आम लोगों से मिलने-जुलने का यह जज़्बा उन्हें लोकप्रिय बना रहा है. राहुल जहां भी जाते हैं, उन्हें देखने के लिए, उनसे मिलने के लिए लोगों का हुजूम इकट्ठा हो जाता है. यह भीड़ वोटों में कितना बदल पाती है, यह तो इस बात पर निर्भर करेगा कि राहुल लोगों की समस्याओं को किस हद तक हल करवा पाते हैं.

राहुल समझ चुके हैं कि जब तक वह आम आदमी की बात नहीं करेंगे, तब तक वह सियासत में आगे नहीं ब़ढ पाएंगे. इसके लिए उन्होंने वह रास्ता अख्तियार किया, जो बहुत कम लोग चुनते हैं. वह भाजपा की तरह एसी कल्चर की राजनीति नहीं करना चाहते. राहुल का कहना है कि उन्होंने किसानों की असल हालत को जानने के लिए पदयात्रा शुरू की, क्योंकि दिल्ली और लखनऊ के एसी कमरों में बैठकर किसानों की हालत पर सिर्फ़ तरस खाया जा सकता है, उनकी समस्याओं को न तो जाना जा सकता है और न ही उन्हें हल किया जा सकता है. 

Saturday, May 21, 2011

हिन्दुस्तान का शहज़ादा


हिन्दुस्तान का शहज़ादा

Wednesday, May 11, 2011

खेत में सिंदूर...



बिहार के भागलपुर ज़िले के गांव कजरैली की महिलाएं खेत में सिन्दूर उगा रही हैं...सिन्दूर के इन पौधों के फलों से बीज निकाल कर उन्हें हथेली पर मसलने पर उनमें से सिन्दूरी रंग निकलता है...इसी प्राकृतिक रंग को महिलाएं अपनी मांग में सजा रही हैं...इन महिलाओं  की देखा-देखी आसपास के गांवों की महिलाओं ने भी घरों में सिंदूर के पौधे लगाने शुरू कर दिए हैं...

भारतीय संस्कृति में सिन्दूर का बड़ा महत्व है...सिन्दूर के बिना सुगागन का श्रृंगार मुकम्मल नहीं होता... बाज़ार में बिकने वाले सिन्दूर में केमिकल होने की वजह से  यह त्वचा के लिए नुक़सानदेह माना जाता है... अमेरिका ने अपने देश में सिन्दूर पर पाबंदी लगाते हुए कहा था कि इसमें काफ़ी मात्र में सीसा होता है...और सीसा सेहत के लिए नुक़सानदेह है...सिंदूर लैड ऑक्साइड यानी पारा युक्त पदार्थ को पीसकर बनाया जाता है... सिंदूर पानी में नहीं घुलता और न किसी चीज पर रंग छोड़ता है... यह 400 से 500 रुपये प्रति किलो की दर से बाज़ार में उपलब्ध है...

दूसरी चीज़ों की ही तरह नक़ली सिंदूर भी धड़ल्ले से बाज़ार में बेचा जा रहा है... अरारोट के पाउडर में गिन्नार और नारंगी रंग मिलाया जाता है. फिर इस मिश्रण को छान लिया जाता है...इसके बाद इस सिंदूरी पाउडर को धूप में सुखाया जाता है...और इस तरह नक़ली या सस्ता सिंदूर बनाया जाता है...इसमें सस्ते रंगों का इस्तेमाल किया जाता है, जो त्वचा को नुक़सान पहुंचाते हैं... यह सिंदूर 50 से 60 रुपये प्रति किलो की दर से मिला जाता है... बाज़ार में इस सिंदूर की भारी मांग है... 

Thursday, May 5, 2011

...तो बात ही कुछ और होती

पिछले शनिवार को दिल्ली के हिंदी भवन में हिंदी साहित्य निकेतन ने अपनी पचास वर्ष की विकास यात्रा के उपलक्ष्य में एक समारोह का आयोजन किया... इस समारोह में ब्लॉगरों को सम्मानित भी किया गया... हमें भी इस समारोह के लिए आमंत्रित किया गया... मसरूफ़ियत की वजह से इस तरह के कार्यक्रमों में जाना नहीं हो पाता... दिन-रात बस ख़बरें और सिर्फ़ ख़बरें...वक़्त का पता ही नहीं चल पाता कि कब दोपहर आई और कब शाम हो गई... और जब कभी वक़्त मिलता है तो परिवार और दोस्तों की ही याद आती है... अरसा हो जाता है अपनों से मिले हुए...यह तो भला हो संचार क्रांति का, जिसकी वजह से दुआ-सलाम हो जाया करती है...ख़ैर, शनिवार की शाम को एक मीटिंग में जाना था...सोचा-सोचा दो-दो निमंत्रण पत्र आए हुए हैं...कुछ देर के लिए हिन्दी भवन जाया जाए, वहां कुछ पत्रकार साथियों से मुलाक़ात हो गई...समारोह में क़रीब दस मिनट गुज़ारने के बाद हम बाहर आ गए... 

यहां मुलाक़ात हुई लेखक लक्ष्मण राव जी से... वह हिंदी भवन के बाहर चाय बनाकर अपनी रोज़ी कमा रहे हैं... महाराष्ट्र के अमरावती ज़िले के गांव तडेगांव दशासर में 22 जुलाई 1954 को जन्मे लक्ष्मण राव किसी के लिए भी प्रेरणा स्त्रोत हो सकते हैं...उन्होंने दिल्ली तिमारपुर पत्राचार विद्यालय से उच्चतर माध्यमिक व दिल्ली विश्वविधालय से बीए किया. उन्होंने दसवीं कक्षा पास करके महाराष्ट्र के अमरावती में सूत मिल में काम किया... कुछ वक़्त बाद मिल बंद हो गई. इसके बाद वह गांव चले गए और वहां खेतीबाड़ी करने लगे... यहां उनका मन नहीं लगा और वह भोपाल आ गए और यहां बेलदार का काम करने लगे... यहां भी उनका मन नहीं रमा और फिर उन्होंने दिल्ली आने का फ़ैसला किया... 30 जुलाई 1975 को वह दिल्ली आ गए और दो वक़्त की रोटी के लिए मेहनत मजदूरी करने लगे... 1977 में दिल्ली के आईटीओ के विष्णु दिगम्बर मार्ग पर वह पान और बीड़ी-सिगरेट बेचने लगे. उन्हें शुरू से ही किताबों से बहुत लगाव था... वह दरियागंज में रविवार को लगने वाले पुस्तक बाज़ार में जाते और कई किताबें ले आते... जब भी उन्हें वक़्त मिलता वह किताबें पढ़ते... किताबों के इसी शौक़ ने उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया... 

उन्होंने लिखना शुरू कर दिया...उनका पहला उपन्यास ' नई दुनिया की नई कहानी' 1979 में प्रकाशित हुआ... इसके बाद वह सुर्ख़ियों में आ गए... लोगों को यक़ीन नहीं हो पा रहा था कि पान और बीड़ी-सिगरेट बेचने वाला व्यक्ति भी उपन्यास लिख सकता है... फ़रवरी 1981 में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संडे रिव्यू में उनका परिचय प्रकाशित हुआ...27 मई, 1984 को तीन मूर्ति भवन में उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलने का मौक़ा मिला... उन्होंने इंदिरा गांधी से उनके जीवन पर किताब लिखने की ख्वाहिश ज़ाहिर की. इस पर इंदिरा गांधी ने उन्हें अपने प्रधानमंत्रित्व काल के बारे में किताब लिखने की सलाह दी... इसके बाद लक्ष्मण राव ने प्रधानमंत्री नामक एक नाटक लिखा. 1982 में उनका उपन्यास रामदास प्रकाशित हुआ... 2001 में नर्मदा (उपन्यास) और 2006 में परंपरा से जुड़ी भारतीय राजनीति नामक किताब प्रकाशित हुई... फिर 2008 में रेणु नामक किताब का प्रकाशन हुआ...

इनके अलावा वह कई और किताबें लिख चुके हैं, जिनमें शिव अरुणा, सर्पदंश, साहिल, पत्तियों की सरसराहट, प्रात: काल, नर्मदा, दृष्टिकोण, अहंकार, समकालीन संविधान, अभिव्यक्ति, मौलिक पत्रकारिता, प्रशासन, राष्ट्रपति (नाटक ) आत्मकथा साहित्य व्यासपीठ और स्वर्गीय राजीव गांधी की जीवनी संयम आदि शामिल है...

भारतीय अनुवाद परिषद सहित क़रीब 11 संस्थाएं उन्हें सम्मानित कर चुकी हैं, जिनमें भारतीय अनुवाद परिषद, कोच लीडरशिप सेंटर, इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती, निष्काम सेवा सोसायटी, अग्निपथ, अखिल भारतीय स्वतंत्र लेखक मंच, शिव रजनी कला कुंज, प्रागैतिक सहजीवन संस्थान, यशपाल जैन स्मृति, चिल्ड्रेन वैली स्कूल, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद शामिल हैं...

वह बताते हैं कि राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने उनका नवीनतम उपन्यास " रेणु" पढ़ने के बाद उन्हें राष्ट्रपति भवन में आमंत्रित किया था...उन्हें इस बात का मलाल है कि उन्हें प्रकाशक नहीं मिला...इसलिए वह ख़ुद ही प्रकाशक बन गए...उन्होंने भारतीय साहित्य कला प्रकाशन शुरू किया... वह यह भी कहते हैं कि प्रकाशक बन्ने के लिए बड़े तामझाम की ज़रूरत नहीं... बस मज़बूत इरादा और लगन होनी चाहिए... वह ख़ुद साइकिल से विभिन्न स्कूलों और कॉलेजों में जाकर अपनी किताबें बेचते हैं... वह अपने नियमित ग्राहकों को हर किताब पर पचास फ़ीसदी की छूट भी देते हैं...

लक्ष्मण जी ने चाय बनाई... हम चाय पी रहे थे...और यहां-वहां की बातें चल रही थीं...कुछ साथी मौजूदा व्यवस्था से परेशान थे...वे एक और बग़ावत पर ज़ोर दे रहे थे...सब अपने-अपने कामों में मसरूफ़ थे...लक्ष्मण जी भी तल्लीनता से आने वालों को चाय बना-बनाकर दे रहे थे... हिन्दी भवन के सभागार से तालियों की आवाज़ें आ रही थीं...उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक पुरस्कार बांट रहे थे... और हम सोच रहे थे कि साहित्य पर भी सियासत और सत्ता ही भारी पड़ती है... काश निशंक की जगह लक्ष्मण राव ब्लॉगरों को सम्मानित कर रहे होते तो बात ही कुछ और होती और तब हम भी हिंदी भवन के बाहर न होकर अंदर रहकर उस खुशनुमा लम्हे को जी रहे होते...