Showing posts with label फ़िरदौस ख़ान राहुल गांधी. Show all posts
Showing posts with label फ़िरदौस ख़ान राहुल गांधी. Show all posts

Wednesday, June 19, 2024

भीड़ में भी तन्हा हैं राहुल गांधी


जन्मदिन 19 जून पर विशेष
भीड़ में भी तन्हा हैं राहुल गांधी 
-फ़िरदौस ख़ान
राहुल गांधी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. वे देश और राज्यों में सबसे लम्बे अरसे तक हुकूमत करने वाली कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं. हाल के लोकसभा चुनाव में उन्होंने उत्तर प्रदेश के रायबरेली और केरल के वायनाड लोकसभा क्षेत्र से लाखों मतों से जीत हासिल कर इतिहास रचा है. उन्होंने अपने पुराने लोकसभा क्षेत्र वायनाड छोड़कर रायबरेली से सांसद रहने का फ़ैसला किया है. बहरहाल, उनकी ज़िन्दगी कोई आसान नहीं है. इसमें जितने फूल हैं, उससे कहीं ज़्यादा ख़ार हैं जिनकी चुभन उन्हें हमेशा महसूस होती रहती है.
 


राहुल गांधी एक ऐसे ख़ानदान के वारिस हैं, जिसने देश के लिए अपनी जानें तक क़ुर्बान कर दीं. उनके भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में लाखों-करोड़ों चाहने वाले हैं. लेकिन इस सबके बावजूद वे अकेले खड़े नज़र आते हैं. उनके चारों तरफ़ एक ऐसा अनदेखा दायरा है, जिससे वे चाहकर भी बाहर नहीं आ पाते. एक ऐसी दीवार है, जिसे वे तोड़ नहीं पा रहे हैं. वे अपने आसपास बने ख़ोल में घुटन तो महसूस करते हैं, लेकिन उससे निकलने की कोई राह, कोई तरकीब उन्हें नज़र नहीं आती.  

बचपन से ही उन्हें ऐसा माहौल मिला, जहां अपने-पराये और दोस्त-दुश्मन की पहचान करना बड़ा मुश्किल हो गया था. उनकी दादी इंदिरा गांधी और उनके पिता राजीव गांधी का बेरहमी से क़त्ल कर दिया गया. इन हादसों ने उन्हें वह दर्द दिया, जिसकी ज़रा-सी भी याद उनकी आंखें भिगो देती है. उन्होंने कहा था-  "उनकी दादी को उन सुरक्षा गार्डों ने मारा, जिनके साथ वे बैडमिंटन खेला करते थे."
वैसे राहुल गांधी के दुश्मनों की भी कोई कमी नहीं है. कभी उन्हें जान से मार देने की धमकियां मिलती हैं, तो कभी उनकी गाड़ी पर पत्थर फेंके जाते हैं. अप्रैल 2018 में उनका जहाज़ क्रैश होते-होते बचा. कर्नाटक के हुबली में उड़ान के दौरान 41 हज़ार फुट की ऊंचाई पर जहाज़ में तकनीकी ख़राबी आ गई और वह आठ हज़ार फ़ुट तक नीचे आ गया. उस वक़्त उन्हें लगा कि जहाज़ गिर जाएगा और उनकी जान नहीं बचेगी. लेकिन न जाने किनकी दुआएं ढाल बनकर खड़ी हो गईं और हादसा टल गया. कांग्रेस ने राहुल गांधी के ख़िलाफ़ साज़िश रचने का इल्ज़ाम लगाया था. 
  
किसी अनहोनी की आशंका की वजह से ही राहुल गांधी हमेशा सुरक्षाकर्मियों से घिरे रहे हैं, इसलिए उन्हें वह ज़िन्दगी नहीं मिल पाई, जिसे कोई आम इंसान जीता है. बचपन में भी उन्हें गार्डन के एक कोने से दूसरे कोने तक जाने की इजाज़त नहीं थी. खेलते वक़्त भी सुरक्षाकर्मी किसी साये की तरह उनके साथ ही रहा करते थे. वे अपनी ज़िन्दगी जीना चाहते थे, एक आम इंसान की ज़िन्दगी. राहुल गांधी ने एक बार कहा था- "अमेरिका में पढ़ाई के बाद मैंने जोखिम उठाया और अपने सुरक्षा गार्डो से निजात पा ली, ताकि इंग्लैंड में आम ज़िन्दगी जी सकूं." लेकिन ऐसा ज़्यादा वक़्त तक नहीं हो पाया और वे फिर से सुरक्षाकर्मियों के घेरे में क़ैद होकर रह गए. 

हर वक़्त कड़ी सुरक्षा में रहना, किसी भी इंसान को असहज कर देगा, लेकिन उन्होंने इसी माहौल में जीने की आदत डाल ली. ख़ौफ़ के साये में रहने के बावजूद उनका दिल मुहब्बत से सराबोर है. वे एक ऐसे शख़्स हैं, जो अपने दुश्मनों के लिए भी दिल में नफ़रत नहीं रखते. वे कहते हैं- “मेरे पिता ने मुझे सिखाया कि नफ़रत पालने वालों के लिए यह जेल होती है. मैं उनका आभार जताता हूं कि उन्होंने मुझे सभी को प्यार और सम्मान करना सिखाया.” अपने पिता की सीख को उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में ढाला. इसीलिए उन्होंने अपने पिता के क़ातिलों तक को माफ़ कर दिया. उनका कहना है- "वजह जो भी हो, मुझे किसी भी तरह की हिंसा पसंद नहीं है. मुझे पता है कि दूसरी तरफ़ होने का मतलब क्या होता है. ऐसे में जब मैं हिंसा देखता हूं चाहे वो किसी के भी साथ हो रही हो, मुझे पता होता है कि इसके पीछे एक इंसान, उसका परिवार और रोते हुए बच्चे हैं. मैं ये समझने के लिए काफ़ी दर्द से होकर गुज़रा हूं. मुझे सच में किसी से नफ़रत करना बेहद मुश्किल लगता है." 

उन्होंने लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (लिट्टे) के प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण का ज़िक्र करते हुए कहा था- "मुझे याद है जब मैंने टीवी पर प्रभाकरण के मुर्दा जिस्म को ज़मीन पर पड़ा देखा. ये देखकर मेरे मन में दो जज़्बे पैदा हुए. पहला ये कि ये लोग इनकी लाश का इस तरह अपमान क्यों कर रहे हैं और दूसरा मुझे प्रभाकरण और उनके परिवार के लिए बुरा महसूस हुआ."

राहुल गांधी एक ऐसी शख़्सियत के मालिक हैं, जिनसे कोई भी मुतासिर हुए बिना नहीं रह सकता. देश के प्रभावशाली राज घराने से होने के बावजूद उनमें ज़र्रा भर भी ग़ुरूर नहीं है. उनकी भाषा में मिठास और अपनापन है, जो सभी को अपनी तरफ़ आकर्षित करता है. वे विनम्र इतने हैं कि अपने विरोधियों के साथ भी सम्मान से पेश आते हैं, भले ही उनके विरोधी उनके लिए कितनी ही तल्ख़ भाषा का इस्तेमाल क्यों न करते रहें. किसी भी हाल में वे अपनी तहज़ीब से पीछे नहीं हटते. उनके कट्टर विरोधी भी कहते हैं कि राहुल गांधी का विरोध करना उनकी पार्टी की नीति का एक अहम हिस्सा है, लेकिन ज़ाती तौर पर वे राहुल गांधी को बहुत पसंद करते हैं. वे ख़ुशमिज़ाज, ईमानदार, मेहनती, क्षमाशील और सकारात्मक सोच वाले हैं. बुज़ुर्ग उन्हें स्नेह करते हैं, उनके सर पर शफ़क़त का हाथ रखते हैं, उन्हें दुआएं देते हैं. वे युवाओं के चहेते हैं. राहुल गांधी अपने विरोधियों का नाम भी सम्मान के साथ लेते हैं, उनके नाम के साथ जी लगाते हैं. सच है कि संस्कार विरासत में मिलते हैं, संस्कार घर से मिला करते हैं. अपने से बड़ों के लिए उनके दिल में सम्मान है, तो बच्चों के लिए प्यार-दुलार है. वे इंसानियत को सर्वोपरि मानते हैं. अपने पिता की ही तरह अपने कट्टर विरोधियों की मदद करने में भी पीछे नहीं रहते.

राहुल गांधी छल और फ़रेब की राजनीति नहीं करते. वे कहते हैं- ''मैं गांधीजी की सोच से राजनीति करता हूं. अगर कोई मुझसे कहे कि आप झूठ बोल कर राजनीति करो, तो मैं यह नहीं कर सकता. मेरे अंदर ये है ही नहीं. इससे मुझे नुक़सान भी होता है. मैं झूठे वादे नहीं करता."  वे ये भी कहते हैं- “सत्ता और सच्चाई में फ़र्क़ होता है. ज़रूरी नहीं है, जिसके पास सत्ता है उसके पास सच्चाई है.”
 
वे कहते हैं- "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है."  

कहते हैं कि सच के रास्ते में मुश्किले ज़्यादा आती हैं और राहुल गांधी को भी बेहिसाब मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. बचपन से ही उनके विरोधियों ने उनके ख़िलाफ़ साज़िशें रचनी शुरू कर दी थीं. उन पर लगातार ज़ाती हमले किए जाते हैं. इस बात को राहुल गांधी भी बख़ूबी समझते हैं, तभी तो एक बार विदेश जाने से पहले उन्होंने एक्स पर अपने विरोधियों को सम्बोधित करते हुए लिखा था- "कुछ दिन के लिए देश से बाहर रहूंगा. भारतीय जनता पार्टी की सोशल मीडिया ट्रोल आर्मी के दोस्तों, ज़्यादा परेशान मत होना. मैं जल्द ही वापस लौटूंगा."

राहुल गांधी पर हर तरफ़ से हमले होते ही रहते हैं. उनके खिलाफ़ देशभर में इतने मामले दर्ज हैं कि वे आए दिन किसी न किसी अदालत में पेश होते रहते हैं. मोदी सरनेम वाले मामले में सूरत की अदालत से दो साल की सज़ा मिलने के बाद 23 मार्च 2023 से उनकी लोकसभा की सदस्यता रद्द कर दी गई थी. इस पर उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय का रुख़ किया. अदालत ने 4 अगस्त को उन्हें दोषी ठहराए जाने के फ़ैसले पर रोक लगा दी. इसके बाद 7 अगस्त को लोकसभा सचिवालय ने उनकी सदस्यता बहाल कर दी.

राहुल गांधी एक नेता हैं, जो पार्टी संगठन को मज़बूत करने के लिए, पार्टी को हुकूमत में लाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, लेकिन उन्हें वह कामयाबी नहीं मिल पा रही है, जो उन्हें मिलनी चाहिए या ये कहें कि जिसके वे हक़दार हैं. शायद वे सियासत के लिए बने ही नहीं हैं. उन्हें तो सियासत में धकेला गया है. 

बहरहाल वे तमाम अफ़वाहों और अपने ख़िलाफ़ रची जाने वाली तमाम साज़िशों से अकेले ही जूझ रहे है और मुस्कराकर उनका सामना कर रहे हैं.
(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं) 

अख़बारों पर एक नज़र 
 दैनिक हमारा मेट्रो (दिल्ली संस्करण)  
19 जून 2024
दैनिक हमारा मेट्रो (राष्ट्रीय संस्करण)  
19 जून 2024
दैनिक जनवाणी  
19 जून 2024
दैनिक ख़बर मंत्र  
19 जून 2024



Tuesday, March 19, 2019

राहुल हैं, तो राहत है

असलम ख़ान
नारा एक मंत्र है, एक ऐसा मंत्र जो ज़ुबान पर चढ़ जाए, दिलो-दिमाग़ पर छा जाए, तो जीत का प्रतीक बन जाता है. नारे पार्टी को जनमानस से जोड़ने का काम करते हैं. ये नारे ही हैं, जो पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भर देते हैं. वक़्त के साथ नारे बदलते रहते हैं. हर बार सियासी दल नये नारों के साथ चुनावी मैदान में उतरते हैं.
नारे लिखने का काम किसी पेशेवर कंपनी या नामी लेखक को दिया जाता है, लेकिन इस बार कांग्रेस ने नारे लिखने की ज़िम्मेदारी उन लोगों को दी, जो पार्टी के नेता हैं, कार्यकर्ता हैं, पार्टी के समर्थक हैं.
कांग्रेस ने इस आम चुनाव के लिए शक्ति एप के ज़रिये कार्यकर्ताओं से नारों को लेकर सुझाव मांगे थे. इसे लेकर कार्यकर्ताओं में इतना उत्साह देखा गया कि देशभर से विभिन्न भाषाओं में तक़रीबन 15 लाख नारे पार्टी को मिले. पार्टी की प्रचार समिति ने इनमें क़रीब 60 हज़ार नारों को चुना. अब इनमें से प्रदेशों की क्षेत्रीय भाषाओं के हिसाब से पांच-पांच नारे चुनाव में इस्तेमाल किए जाएंगे, जबकि हिन्दी के 0 नारे कांग्रेस की आवाज़ बनेंगे. इसी बीच स्टार न्यूज़ एजेंसी की संपादक फ़िरदौस ख़ान ने एक नारा दिया है- राहुल हैं, तो राहत है.
ग़ौरतलब कि शायरा, कहानीकार व पत्रकार फ़िरदौस ख़ान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर एक ग़ज़ल भी लिख चुकी हैं.
(स्टार न्यूज़ एजेंसी)

Sunday, February 24, 2019

यही तो वक़्त है सूरज तेरे निकलने का

फ़िरदौस ख़ान
लोकसभा चुनाव क़रीब हैं. इस समर को जीतने के लिए कांग्रेस दिन-रात मेहनत कर रही है. इसके मद्देनज़र पार्टी संगठन में भी लगातार बड़े बदलाव किए जा रहे हैं. सियासत के लिहाज़ से देश के सबसे महत्वपूर्ण प्रांत उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल की कमान प्रियंका गांधी को सौंपी गई है. ग़ौरतलब है कि बीती 23 जनवरी को प्रियंका गांधी को कांग्रेस महासचिव बनाया गया था और उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश के 41 लोकसभा क्षेत्रों की ज़िम्मेदारी दी गई थी. ज्योतिरादित्य सिंधिया को महासचिव बनाने के साथ-साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभारी नियुक्त किया गया था. उन्हें 39 लोकसभा क्षेत्रों में कांग्रेस को जिताने का दायित्व दिया गया था. अब इन दोनों नेताओं की मदद के लिए तीन-तीन सचिव नियुक्त किए गए हैं. नव नियुक्त पार्टी सचिव जुबेर ख़ान, कुमार आशीष और बाजीराव खाडे प्रियंका गांधी की मदद करेंगे, जबकि राणा गोस्वामी, धीरज गुर्जर और रोहित चौधरी ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ काम करेंगे. कांग्रेस उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से ज़्यादा से ज़्यादा जीत लेना चाहती है.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के कमज़ोर होने की कई वजहें रही हैं, जिनमें मज़बूत क्षेत्रीय नेतृत्व की कमी सबसे अहम वजह है. हालांकि कांग्रेस के सभी बड़े नेता उत्तर प्रदेश से ही चुनाव लड़ते रहे हैं, जिनमें पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी शामिल हैं. लेकिन इनका दख़ल दिल्ली की सियासत में ज़्यादा रहा. मज़बूत नेतृत्व के अभाव में कांग्रेस कमज़ोर पड़ने लगी और लगातार राज्य की सत्ता से दूर होती गई. इसकी वजह से पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटने लगा. ऐसे में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी मज़बूत हुई. अब कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपनी खोई ज़मीन फिर से पाना चाहती है. इसके लिए वह ख़ासी मशक्क़त कर रही है.

कांग्रेस देश की माटी में रची-बसी है. देश का मिज़ाज हमेशा कांग्रेस के साथ रहा है और आगे भी रहेगा. कांग्रेस जनमानस की पार्टी रही है. कांग्रेस का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है. इस देश की माटी उन कांग्रेस नेताओं की ऋणी है, जिन्होंने अपने ख़ून से इस धरती को सींचा है. देश की आज़ादी में महात्मा गांधी के योगदान को भला कौन भुला पाएगा. देश को आज़ाद कराने के लिए उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी समर्पित कर दी. पंडित जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी ने देश के लिए, जनता के लिए बहुत कुछ किया. पंडित जवाहर लाल नेहरू ने विकास की जो बुनियाद रखी, इंदिरा गांधी ने उसे परवान चढ़ाया. राजीव गांधी ने देश के युवाओं को आगे बढ़ने की राह दिखाई. उन्होंने युवाओं के लिए जो ख़्वाब संजोये, उन्हें साकार करने में सोनिया गांधी ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. अब कांग्रेस की अगली पीढ़ी के नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के कंधों पर ज़िम्मेदारी है कि वे अपनी सियासी विरासत को आगे बढ़ाएं और अवाम को वह हुकूमत दें, जिसमें सभी लोग मिलजुल रहा करते हैं. पिछले कुछ बरसों से लोग ‘अच्छे दिनों’ के लिए तरस रहे हैं. समाज में फैले नफ़रत और अविश्वास के इस दौर में कांग्रेस ही देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने का काम कर सकती है. जनता को कांग्रेस से उम्मीदें हैं, क्योंकि राहुल गांधी किसी ख़ास तबक़े के नेता न होकर जन नेता हैं. वे कहते हैं, "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है."

जनता को ऐसी सरकार चाहिए, जो जनहित की बात करे, जनहित का काम करे. बिना किसी भेदभाव के सभी तबक़ों को साथ लेकर चले. कांग्रेस ने जनहित में बहुत काम किए हैं. ये अलग बात है कि वे अपने जन हितैषी कार्यों का प्रचार नहीं कर पाई, उनसे कोई फ़ायदा नहीं उठा पाई, जबकि भारतीय जनता पार्टी लोक लुभावन नारे देकर सत्ता तक पहुंच गई. बाद में ख़ुद प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी के चुनावी वादों को’ जुमला’ क़रार दे दिया. आज देश को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जैसे नेताओं की ज़रूरत है, जो छल और फ़रेब की राजनीति नहीं करते. राहुल गांधी कहते हैं,  ''मैं गांधीजी की सोच से राजनीति करता हूं. अगर कोई मुझसे कहे कि आप झूठ बोल कर राजनीति करो, तो मैं यह नहीं कर सकता. मेरे अंदर ये है ही नहीं. इससे मुझे नुक़सान भी होता है. 'मैं झूठे वादे नहीं करता. "  क़ाबिले-ग़ौर है कि एक सर्वे में विश्वसनीयता के मामले में दुनिया के बड़े नेताओं में राहुल गांधी को तीसरा दर्जा मिला है, यानी दुनिया भी उनकी विश्वसनीयता का लोहा मानती है.

फ़िलहाल  राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के कंधों पर दोहरी ज़िम्मेदारी है. उन्हें पार्टी को मज़बूत बनाने के साथ-साथ खोई हुई हुकूमत को भी हासिल करना है. उन्हें चाहिए कि वे देश भर के सभी राज्यों में युवा नेतृत्व ख़ड़ा करें. इस बात में कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस की नैया डुबोने में इसके खेवनहारों ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. राहुल गांधी को इस बात को भी समझना होगा और इसी को मद्देनज़र रखते हुए आगामी रणनीति बनानी होगी. वैसे अब राहुल गांधी अंदरूनी कलह, ख़ेमेबाज़ी और बग़ावत को लेकर काफ़ी सख्त़ हुए हैं. प्रियंका गांधी ने तो साफ़ कह दिया है कि जो नेता पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल पाए जाएंगे, उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा.

दरअसल, पार्टी के कुछ नेताओं ने कांग्रेस को अपनी जागीर समझ लिया था और सत्ता के मद में चूर वे कार्यकर्ताओं से भी दूर होते गए. नतीजतन, जनमानस ने कांग्रेस को सबक़ सिखाने की ठान ली और उसे सत्ता से बदख़ल कर दिया. वोटों के बिखराव और सही रणनीति की कमी की वजह से कांग्रेस को ज़्यादा नुक़सान हुआ. लेकिन इसका यह मतलब क़तई नहीं कि कांग्रेस का जनाधार कम हुआ है. पिछले लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का मत प्रतिशत बढ़ा है. पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया और कई राज्यों में सत्ता में वापसी की. इससे पार्टी नेताओं के साथ-साथ कार्यकर्ताओं में भी भारी उत्साह है. भारतीय जनता पार्टी व अन्य सियासी दलों के नेता भी कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं.   

आज़ादी के बाद से देश में सबसे ज़्यादा वक़्त तक हुकूमत करने वाली कांग्रेस के लोकसभा में अब भले ही कम सांसद हैं, लेकिन कई मामलों में वे भारतीय जनता पार्टी की बहुतमत वाली सरकार पर भारी पड़े हैं. सत्ताधारी पार्टी ने कई बार ख़ुद कहा है कि कांग्रेस के सांसद उसे काम नहीं करने दे रहे हैं.

बहरहाल, कांग्रेस के पास अब ज़्यादा वक़्त नहीं बचा है. कांग्रेस को चाहिए कि वह कार्यकर्ताओं के ज़रिये घर-घर तक पहुंचे. उन्हें पार्टी के क्षेत्रीय नेताओं से लेकर पार्टी के आख़िरी कार्यकर्ता तक अपनी पहुंच बनानी होगी. बूथ स्तर पर पार्टी को मज़बूत करना होगा. साफ़ छवि वाले जोशीले युवाओं को ज़्यादा से ज़्यादा पार्टी में शामिल करना होगा. कांग्रेस की मूल नीतियों पर चलना होगा, ताकि पार्टी को उसका खोया हुआ वर्चस्व मिल सके. साथ ही ऐसे बयानों और घोषणाओं से बचना होगा, जिससे वोटों में बिखराव आने के अंदेशा हो.
कांग्रेस को अपनी चुनावी रणनीति बनाते वक़्त कई बातों को ज़ेहन में रखना होगा. उसे सभी वर्गों का ध्यान रखते हुए अपने पदाधिकारी तय करने होंगे. टिकट बंटवारे में भी एहतियात बरतनी होगी. क्षेत्रीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी विश्वास में लेना होगा, क्योंकि जनता के बीच तो इन्हीं को जाना है. कांग्रेस नेताओं को चाहिए कि वे पार्टी के आख़िरी कार्यकर्ता तक से संवाद करें. उनकी पहुंच हर कार्यकर्ता तक और कार्यकर्ता की पहुंच उन तक होनी चाहिए, फिर कांग्रेस को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक पाएगा. अराजकता के इस दौर में अवाम को कांग्रेस की बेहद ज़रूरत है. बक़ौल शहरयार-
सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का
यही तो वक़्त है सूरज तेरे निकलने का

Wednesday, December 12, 2018

अहंकार हार गया और राहुल जीत गए

फ़िरदौस ख़ान 
अहंकार को एक दिन टूटना ही होता है. अहंकार की नियति ही टूटना है. इतिहास गवाह है कि किसी का भी अहंकार कभी ज़्यादा वक़्त तक नहीं रहा. इस अहंकार की वजह से बड़ी-बड़ी सल्तनतें नेस्तनाबूद हो गईं. किसी हुकूमत को बदलते हुए वक़्त नहीं लगता. बस देर होती है अवाम के जागने की. जिस दिन अवाम बेदार हो जाती है, जाग जाती है, उसी दिन से हुक्मरानों के बुरे दिन शुरू हो जाते हैं, उनका ज़वाल (पतन) शुरू हो जाता है. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी यही तो हुआ. यहां अहंकार हार गया और विनम्रता जीत गई. चुनाव नतीजों वाले दिन शाम को हुई प्रेस कॊन्फ़्रेंस में राहुल गांधी ने कहा कि हम किसी को देश से मिटाना नहीं चाहते. हम विचारधारा की लड़ाई लड़ेंगे. मैं मोदी जी का धन्यवाद करता हूं, जिनसे मैंने यह सीखा कि एक पॉलिटिशियन होने के नाते मुझे क्या नहीं कहना या करना चाहिए.

ये राहुल गांधी का धैर्य, विनम्रता और शालीनता ही है कि उन्होंने विपरीत हालात का हिम्मत से मुक़ाबला किया. जब भारतीय जनता पार्टी द्वारा उनके नेतृत्व पर सवाल उठाए गए, चुनावों में नाकामी मिलने पर उनका मज़ाक़ उड़ाया गया, उनके लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया, लेकिन राहुल गांधी ने कभी अपनी तहज़ीब नहीं छोड़ी, अपने संस्कार नहीं छोड़े. उन्होंने अपने विरोधियों के लिए भी कभी अपशब्दों का इस्तेमाल नहीं किया. उन्होंने मिज़ोरम और तेलंगाना में जीतने वाले दलों को मुबारकबाद दी. चुनावों में जीतने वाले सभी उम्मीदवारों को शुभकामनाएं दीं. अहंकार कभी उन पर हावी नहीं हुआ. विधानसभा चुनावों में जीत का श्रेय उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को दिया. उन्होंने कहा कि उनके कार्यकर्ता बब्बर शेर हैं. राहुल गांधी में हार को क़ुबूल करने की हिम्मत भी है. पिछले चुनावों में नाकामी मिलने पर उन्होंने हार का ज़िम्मा ख़ुद लिया. ये सब बातें ही तो हैं, जो उन्हें महान बनाती हैं और ये साबित करती हैं कि उनमें एक महान नेता के सभी गुण मौजूद हैं.


अमूमन देखा जाता है कि जब कोई पार्टी सत्ता में आ जाती है, तो उसे घमंड हो जाता है. राजनेता बेलगाम हो जाते हैं. उन्हें लगता है कि सत्ता उनकी मुट्ठी में है, वे जो चाहें कर सकते हैं. उन्हें टोकने, रोकने वाला कोई नहीं है. साल 2014 के आम चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने जनता से बड़े-बड़े वादे किए थे. उन्हें ख़ूब सब्ज़ बाग़ दिखाए थे, लेकिन सत्ता में आते ही अपने वादों से उलट काम किया. भारतीय जनता पार्टी ने महंगाई कम करने का वादा किया था, लेकिन उसके शासनकाल में महंगाई आसमान छूने लगी. भारतीय जनता पार्टी ने महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों पर रोक लगाने का वादा किया था, लेकिन आए-दिन महिला शोषण के दिल दहला देने वाले मामले सामने आने लगे. भारतीय जनता पार्टी ने किसानों को राहत देने का वादा किया था, लेकिन किसानों के ख़ुदकुशी के मामले थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं. किसानों को अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करने पर मजबूर होना पड़ा. भारतीय जनता पार्टी ने युवाओं को रोज़गार देने का वादा किया था, लेकिन रोज़गार देना तो दूर, नोटबंदी और जीएसटी लागू करके जो उद्योग-धंधे चल रहे थे, उन्हें भी बंद करने का काम किया है. जो लोग काम कर रहे थे, वे भी रोज़ी-रोटी के लिए तरसने लगे. भारतीय जनता पार्टी की सरकार जो भी फ़ैसले ले रही है, उनसे सिर्फ़ बड़े उद्योगपतियों को ही फ़ायदा हो रहा है. ऑक्सफ़ेम सर्वेक्षण के मुताबिक़ पिछले साल यानी 2017 में भारत में सृजित कुल संपदा का 73 फ़ीसद हिस्सा देश की एक फ़ीसद अमीर आबादी के पास है. राहुल गांधी ने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सवाल भी किया था. ग़ौरतलब है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विदेश यात्राओं और उनकी सरकार पर अमीरों के लिए काम करने और उनके कर्ज़ माफ़ करने को लेकर लगातार हमला करते रहे हैं. इतना ही नहीं भारत और फ्रांस सरकार के बीच हुए राफ़ेल लड़ाकू विमान सौदे पर भी राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं.  

दरअसल, एक तरफ़ केन्द्र की मोदी सरकार अमीरों को तमाम सुविधाएं दे रही है, उन्हें करों में छूट दे रही है, उनके कर माफ़ कर रही है, उनके क़र्ज़ माफ़ कर रही है. वहीं दूसरी तरफ़ ग़रीब जनता पर आए दिन नये-नये कर लगाए जा रहे हैं, कभी स्वच्छता के नाम पर, तो कभी जीएसटी के नाम पर उनसे वसूली की जा रही है. खाद्यान्नों और रोज़मर्रा में काम आने वाली चीज़ों के दाम भी लगातार बढ़ाए जा रहे हैं. मरीज़ों के लिए इलाज कराना भी मुश्किल हो गया है. दवाओं यहां तक कि जीवन रक्षक दवाओं और ख़ून के दाम भी बहुत ज़्यादा बढ़ा दिए गए हैं. ऐसे में ग़रीब मरीज़ कैसे अपना इलाज कराएंगे, इसकी सरकार को ज़रा भी फ़िक्र नहीं है. सरकार का सारा ध्यान जनता से कर वसूली पर ही लगा हुआ है. वैसे भी प्रधानमंत्री ख़ुद कह चुके हैं कि उनके ख़ून में व्यापार है.

ऐसे मुश्किल दौर में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अवाम के साथ खड़े हैं. वे लगातार बेरोज़गारी, महंगाई, किसानों की दुर्दशा, महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसक वारदातों और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अलख जगाए हुए हैं. अवाम को भी समझ में आ गया है कि उनसे झूठे वादे करके उन्हें ठगा गया. इसलिए अब जनता उन वादों के बारे में सवाल करने लगी है. जनता पूछने लगी कि कहां हैं, वे अच्छे दिन जिसका इंद्रधनुषी सपना भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें दिखाया था. कहां हैं, वह 15 लाख रुपये, जिन्हें उनके खाते में डालने का वादा किया गया था. कहां है वह विदेशी काला धन, जिसके बारे में वादा किया गया था कि उसके भारत में आने के बाद जनता के हालात सुधर जाएंगे.

अवाम अब जागने लगी है. इसी का नतीजा है कि उसने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी को उखाड़ फेंका और कांग्रेस को हुकूमत सौंप दी. अवाम राहुल गांधी पर यक़ीन करने लगी है. वह समझ चुकी है कि कांग्रेस ही देश की एकता और अखंडता को बनाए रख सकती है. कांग्रेस के राज में ही सब मिलजुल कर चैन-अमन के साथ रह सकते हैं, क्योंकि कांग्रेस विनाश में नहीं, विकास में यक़ीन रखती है. जनता अब बदलाव चाहती है.

Friday, June 22, 2018

सेवा दल को कांग्रेस की तवज्जो मिली

फ़िरदौस ख़ान 
देश में कुछ संगठन ऐसे हैं, जो निस्वार्थ भाव से जन सेवा के काम में जुटे हैं. अखिल भारतीय कांग्रेस सेवा दल भी एक ऐसा ही संगठन है, जो मुश्किल वक़्त में लोगों की मदद करता है. कहीं बाढ़ आए, सूखा पड़े या फिर कोई और मुसीबत आए, संगठन के कार्यकर्ता राहत के कामों में बढ़ चढ़कर शिरकत करते हैं. दरअसल, जंगे-आज़ादी के वक़्त वजूद में आए इस संगठन का मक़सद ही सामाजिक समरसता को बनाए रखना और देश के नवनिर्माण में योगदान देना है. समाज सेवा के साथ-साथ कांग्रेस को मज़बूत करने में भी इसने अपना अहम किरदार अदा किया है.

पिछले कुछ अरसे से कांग्रेस की अनदेखी के शिकार इस संगठन की गतिविधियां फिर से तेज़ हो गई हैं. कांग्रेस ने अब अपने आनुषांगिक संगठन सेवा दल पर तवज्जो देनी शुरू कर दी है. यह संगठन हर महीने के आख़िरी रविवार को देशभर के एक हज़ार क़स्बों, शहरों और महानगरों में ’ध्वज वंदन’ कार्यक्रम करेगा. इन कार्यक्रमों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी आदि के सिद्धांतों और विचारों को जनमानस के सामने रखा जाएगा और उनकी प्रासंगिकता पर चर्चा की जाएगी.

हाल में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने सेवा दल के प्रस्तावों को अपनी मंज़ूरी दी है. उन्होंने सेवा दल के पदाधिकारियों को यक़ीन दिलाया है कि पहले की तरह ही यह संगठन आज़ाद होकर काम करेगा. सेवा दल की कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक में संगठन के पदाधिकारियों ने उनके समक्ष कई प्रस्ताव रखे थे, जिसे उन्होंने मंज़ूर कर लिया.

 सेवा दल के मुख्य संगठक लालजी भाई देसाई का कहना है कि सेवा दल अब पहले की तरह सक्रिय नहीं है. अब तो सेवा दल को कांग्रेस के कार्यक्रमों की ज़िम्मेदारी भी नहीं दी जाती है. मौजूदा हालात को देखते हुए सेवा दल को फिर से खड़ा करने की कोशिश की जा रही है. इसी सिलसिले में कांग्रेस अध्यक्ष के सामने कुछ सुझाव रखे गए.

ग़ौरतलब है कि डॉ. नारायण सुब्बाराव हार्डिकर ने 1 जनवरी, 1924 को आंध्र प्रदेश के काकिनाडा में कांग्रेस सेवा दल की स्थापना की थी. इसके पहले अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू थे. देश को आज़ाद कराने की मुहिम में शामिल कांग्रेस के क़द्दावर नेता इस संगठन से जुड़े हुए थे. सीमाप्रांत और बलूचिस्तान के महान राजनेता ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान के संगठन लाल कुर्ती का विलय भी सेवादल में किया गया था. आज़ादी की मुहिम में सेवा दल के अहम किरदार के मद्देनज़र साल 1931 में इसका आज़ाद वजूद ख़त्म करके इसे कांग्रेस का हिस्सा बना दिया गया. कहा जाता है कि ये फ़ैसला सरदार बल्लभ भाई पटेल की सिफ़ारिश पर किया गया था. उन्हें डर था कि सेवा दल कहीं अपने मातृ संगठन कांग्रेस को ही ख़त्म न कर दे. अपनी इस आशंका का ज़िक्र करते हुए उन्होंने महात्मा गांधी से कहा था कि ‘अगर सेवादल को आज़ाद छोड़ दिया गया, तो वह हम सबको लील जाएगा.’
पहले इसे हिन्दुस्तानी सेवा दल के नाम से जाना जाता था, बाद इसे कांग्रेस सेवा दल का नाम दिया. दरअसल, कांग्रेसियों ने महिला सेना का गठन किया था. इस पर कार्रवाई करते हुए साल 1932 में बिटिश शासकों ने सेवा दल पर पाबंदी लगा दी थी, बाद में कांग्रेस से तो पाबंदी हटा ली गई, लेकिन हिन्दुस्तानी सेवा दल पर पाबंदी जारी रही. बाद में यह संगठन कांग्रेस सेवा दल के नाम से वजूद में आया.

क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि देश को आज़ादी मिलने के बाद कांग्रेस हुकूमत में आ गई. कांग्रेस का सारा ध्यान सत्ता संभालने में लग गया. कांग्रेस के कई नये आनुषांगिक संगठन वजूद में आते गए और बदलते वक़्त के साथ-साथ सेवा दल की अनदेखी होने लगी. सेवा दल के कार्यकर्ताओं को मलाल है कि उन्हें महज़ रवायती बना दिया गया. कांग्रेस के समारोहों में उनकी ज़िम्मेदारी वर्दी पहनकर इंतज़ामों की देखरेख की रह गई.  जिस मक़सद से सेवा दल का गठन किया गया था, वह कहीं पीछे छूटने लगा. लेकिन इस सबके बावजूद सेवा दल के कार्यकर्ता अपने काम में लगे रहे. वे सामाजिक कार्यों में पहले की तरह ही बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते रहे, चाहे प्राकृतिक आपदाओं में पीडि़तों की मदद करनी हो या फिर महाकुंभ जैसे धार्मिक आयोजनों और महोत्सवों में श्रद्धालुओं के रहने और भोजन का इंतज़ाम करना हो. हर जगह इनकी मौजूदगी नज़र आती है.  

कांग्रेस के अग्रिम संगठनों में सेवा दल का अनुशासन और निष्ठा इसे और भी ख़ास बनाती है. बिल्कुल फ़ौज की तरह इसका संचालन किया जाता है. एक दौर वह भी था जब सेवा दल में प्रशिक्षण लेने के बाद ही किसी को कांग्रेस में शामिल किया जाता था. कहा जाता है कि इंदिरा गांधी ने अपने बेटे राजीव गांधी को कांग्रेस में शामिल करने से पहले सेवा दल का प्रशिक्षण दिलाया था, ताकि वे पार्टी की नीतियों को बेहतर तरीक़े से समझ पाएं. निस्वार्थ सेवा और सहयोग भाव की वजह से ही सेवा दल को कांग्रेस का सच्चा सिपाही कहा जाता है.

फ़िलवक़्त देश के 700 ज़िलों और शहरों में सेवा दल की इकाइयां हैं. सेवा दल की एक युवा इकाई शुरू करने की योजना है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा युवाओं को इससे जोड़ा जा सके. आज जब कांग्रेस अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाने और पार्टी को हुकूमत में लाने के लिए जद्दोजहद कर रही है, ऐसे में सेवा दल कांग्रेस के लिए बहुत मददगार साबित हो सकता है, बस इस पर ख़ास तवज्जो देने की ज़रूरत है. देश में फैले अराजकता और अविश्वास के माहौल को देखते हुए भी सेवा दल जैसे संगठनों की बेहद ज़रूरत है, जो सांप्रदायिक सौहार्द्र, सामाजिक समरसता और आपसी भाईचारे को बढ़ावा देने का काम करते हैं.

Monday, June 18, 2018

राहुल गांधी : भीड़ में भी तन्हा...

फ़िरदौस ख़ान
राहुल गांधी देश और राज्यों में सबसे लम्बे अरसे तक हुकूमत करने वाली कांग्रेस के अध्यक्ष हैं. वे एक ऐसे ख़ानदान के वारिस हैं, जिसने देश के लिए अपनी जानें क़ुर्बान की हैं. राहुल गांधी के लाखों-करोड़ों चाहने वाले हैं. देश-दुनिया में उनके प्रशंसकों की कोई कमी नहीं है. लेकिन इस सबके बावजूद वे अकेले खड़े नज़र आते हैं. उनके चारों तरफ़ एक ऐसा अनदेखा दायरा है, जिससे वे चाहकर भी बाहर नहीं आ पाते.  एक ऐसी दीवार है, जिसे वे तोड़ नहीं पा रहे हैं. वे अपने आसपास बने ख़ोल में घुटन तो महसूस करते हैं, लेकिन उससे निकलने की कोई राह, कोई तरकीब उन्हें नज़र नहीं आती.

बचपन से ही उन्हें ऐसा माहौल मिला, जहां अपने-पराये और दोस्त-दुश्मन की पहचान करना बड़ा मुश्किल हो गया था. उनकी दादी इंदिरा गांधी और उनके पिता राजीव गांधी का बेरहमी से क़त्ल कर दिया गया. इन हादसों ने उन्हें वह दर्द दिया, जिसकी ज़रा सी भी याद उनकी आंखें भिगो देती है. उन्होंने कहा था,  "उनकी दादी को उन सुरक्षा गार्डों ने मारा, जिनके साथ वे बैडमिंटन खेला करते थे."
वैसे राहुल गांधी के दुश्मनों की भी कोई कमी नहीं है. कभी उन्हें जान से मार देने की धमकियां मिलती हैं, तो कभी उनकी गाड़ी पर पत्थर फेंके जाते हैं. गुज़शता अप्रैल में उनका जहाज़ क्रैश होते-होते बचा. कर्नाटक के हुबली में उड़ान के दौरान 41 हज़ार फुट की ऊंचाई पर जहाज़ में तकनीकी ख़राबी आ गई और वह आठ हज़ार फ़ुट तक नीचे आ गया. उस वक़्त उन्हें लगा कि जहाज़ गिर जाएगा और उनकी जान नहीं बचेगी.  लेकिन न जाने किनकी दुआएं ढाल बनकर खड़ी हो गईं और हादसा टल गया. कांग्रेस ने राहुल गांधी के ख़िलाफ़ साज़िश रचने का इल्ज़ाम लगाया.
किसी अनहोनी की आशंका की वजह से ही राहुल गांधी हमेशा सुरक्षाकर्मियों से घिरे रहे हैं, इसलिए उन्हें वह ज़िन्दगी नहीं मिल पाई, जिसे कोई आम इंसान जीता है. बचपन में भी उन्हें गार्डन के एक कोने से दूसरे कोने तक जाने की इजाज़त नहीं थी. खेलते वक़्त भी सुरक्षाकर्मी किसी साये की तरह उनके साथ ही रहा करते थे. वे अपनी ज़िन्दगी जीना चाहते थे, एक आम इंसान की ज़िन्दगी. राहुल गांधी ने एक बार कहा था, "अमेरिका में पढ़ाई के बाद मैंने जोखिम उठाया और अपने सुरक्षा गार्डो से निजात पा ली, ताकि इंग्लैंड में आम ज़िन्दगी जी सकूं." लेकिन ऐसा ज़्यादा वक़्त नहीं हो पाया और वे फिर से सुरक्षाकर्मियों के घेरे में क़ैद होकर रह गए.

हर वक़्त कड़ी सुरक्षा में रहना, किसी भी इंसान को असहज कर देगा, लेकिन उन्होंने इसी माहौल में जीने की आदत डाल ली. ख़ौफ़ के साये में रहने के बावजूद उनका दिल मुहब्बत से सराबोर है. वे एक ऐसे शख़्स हैं, जो अपने दुश्मनों के लिए भी दिल में नफ़रत नहीं रखते. वे कहते हैं, “मेरे पिता ने मुझे सिखाया कि नफ़रत पालने वालों के लिए यह जेल होती है. मैं उनका आभार जताता हूं कि उन्होंने मुझे सभी को प्यार और सम्मान करना सिखाया.” अपने पिता की सीख को उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में ढाला. इसीलिए उन्होंने अपने पिता के क़ातिलों तक को माफ़ कर दिया. उनका कहना है, "वजह जो भी हो, मुझे किसी भी तरह की हिंसा पसंद नहीं है. मुझे पता है कि दूसरी तरफ़ होने का मतलब क्या होता है. ऐसे में जब मैं जब हिंसा देखता हूं चाहे वो किसी के भी साथ हो रही हो, मुझे पता होता है कि इसके पीछे एक इंसान, उसका परिवार और रोते हुए बच्चे हैं. मैं ये समझने के लिए काफ़ी दर्द से होकर गुजरा हूं. मुझे सच में किसी से नफ़रत करना बेहद मुश्किल लगता है."
उन्होंने लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (लिट्टे) के प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण का ज़िक्र करते हुए कहा था, "मुझे याद है जब मैंने टीवी पर प्रभाकरण के मुर्दा जिस्म को ज़मीन पर पड़ा देखा. ये देखकर मेरे मन में दो जज़्बे पैदा हुए. पहला ये कि ये लोग इनकी लाश का इस तरह अपमान क्यों कर रहे हैं और दूसरा मुझे प्रभाकरण और उनके परिवार के लिए बुरा महसूस हुआ."

राहुल गांधी एक ऐसी शख़्सियत के मालिक हैं, जिनसे कोई भी मुतासिर हुए बिना नहीं रह सकता. देश के प्रभावशाली राज घराने से होने के बावजूद उनमें ज़र्रा भर भी ग़ुरूर नहीं है.  उनकी भाषा में मिठास और मोहकता है, जो सभी को अपनी तरफ़ आकर्षित करती है. वे विनम्र इतने हैं कि अपने विरोधियों के साथ भी सम्मान से पेश आते हैं, भले ही उनके विरोधी उनके लिए कितनी ही तल्ख़ भाषा का इस्तेमाल क्यों न करते रहें. किसी भी हाल में वे अपनी तहज़ीब से पीछे नहीं हटते. उनके कट्टर विरोधी भी कहते हैं कि राहुल गांधी का विरोध करना उनकी पार्टी की नीति का एक अहम हिस्सा है, लेकिन ज़ाती तौर पर वे राहुल गांधी को बहुत पसंद करते हैं. वे ख़ुशमिज़ाज, ईमानदार, मेहनती और सकारात्मक सोच वाले हैं.  बुज़ुर्ग उन्हें स्नेह करते हैं, उनके सर पर शफ़क़त का हाथ रखते हैं, उन्हें दुआएं देते हैं.  वे युवाओं के चहेते हैं. राहुल गांधी अपने विरोधियों का नाम भी सम्मान के साथ लेते हैं, उनके नाम के साथ जी लगाते हैं.  बड़ों के लिए उनके दिल में सम्मान है. उन्होंने जब सुना कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में दाख़िल कराए गए हैं, तो वे उनका हालचाल जानने के लिए अस्पताल पहुंच गए. वे इंसानियत को सर्वोपरि मानते हैं. अपने पिता की ही तरह अपने कट्टर विरोधियों की मदद करने में भी पीछे नहीं रहते. विभिन्न समारोहों में वे लाल्कृष्ण आडवाणी का भी ख़्याल रखते नज़र आते हैं.

राहुल गांधी छल और फ़रेब की राजनीति नहीं करते. वे कहते हैं,  ''मैं गांधीजी की सोच से राजनीति करता हूं. अगर कोई मुझसे कहे कि आप झूठ बोल कर राजनीति करो, तो मैं यह नहीं कर सकता. मेरे अंदर ये है ही नहीं. इससे मुझे नुक़सान भी होता है. 'मैं झूठे वादे नहीं करता. "  वे कहते हैं, 'सत्ता और सच्चाई में फ़र्क़ होता है. ज़रूरी नहीं है, जिसके पास सत्ता है उसके पास सच्चाई है.
वे कहते हैं, "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है."

कहते हैं कि सच के रास्ते में मुश्किलें ज़्यादा आती हैं और राहुल गांधी को भी बेहिसाब मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. बचपन से ही उनके विरोधियों ने उनके ख़िलाफ़ साज़िशें रचनी शुरू कर दी थीं.   उन पर लगातार ज़ाती हमले किए जाते हैं. इस बात को राहुल गांधी भी बख़ूबी समझते हैं, तभी तो उन्होंने विदेश जाने से पहले ट्वीट करके अपने विरोधियों से कहा था, "कुछ दिन के लिए देश से बाहर रहूंगा. भारतीय जनता पार्टी की सोशल मीडिया ट्रोल आर्मी के दोस्तों, ज़्यादा परेशान मत होना. मैं जल्द ही वापस लौटूंगा."

राहुल गांधी एक नेता हैं, जो पार्टी संगठन को मज़बूत करने के लिए, पार्टी को हुकूमत में लाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, लेकिन उनकी ही पार्टी के लोग ऐन चुनावों के मौक़ों पर ऐसे बयान दे जाते हैं, ऐसे काम कर जाते हैं, जिससे विरोधियों को उनके ख़िलाफ़ बोलने का मौक़ा मिल जाता है. इन लोगों में वे लोग भी शामिल हैं, जो उनकी दादी, उनके पिता के क़रीबी रहे हैं. ताज़ा मिसाल पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की है, जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में शिरकत करके सियासी बवाल पैदा कर दिया.

बहरहाल, राहुल गांधी तमाम अफ़वाहों और अपने ख़िलाफ़ रची जाने वाली तमाम साज़िशों से अकेले ही जूझ रहे है, मुस्कराकर उनका सामना कर रहे हैं.

Friday, June 15, 2018

कब रुकेगा भूख से मौतों का सिलसिला

फ़िरदौस ख़ान
देश में भूख से मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी शासित प्रदेश झारखंड से भूख से मरने की ख़बरें आईं. चतरा ज़िले के इतखोरी में मीना मुसहर नामक एक महिला की मौत हो गई. उसके बेटे का कहना है कि उसकी मां ने चार दिनों से अन्न का एक दाना तक नहीं खाया था. हालत बिगड़ने पर वह अपनी मां को अस्पताल ले गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया. महिला कचरा बीनकर अपना गुज़ारा करती थी. इससे पहले शनिवार को गिरीडीह ज़िले के मनगारगड्डी की सावित्री देवी मौत हो गई थी. ग्रामीणों के मुताबिक़ महिला ने तीन दिनों से कुछ नहीं खाया था. वह भीख मांग कर अपना पेट भरती थी. भूख से मौत के ये पहले मामले नहीं हैं. ऐसे मामले सामने आते रहते हैं और सरकारें इन मामलों को गंभीरता से लेने की बजाय ख़ुद को बचाने के लिए लीपा-पोती में लग जाती हैं, जो बेहद शर्मनाक है.

दरअसल, भूख से मौत की समस्या सिर्फ़ हमारे देश में ही नहीं है, बल्कि यह आज पूरी दुनिया में फैली हुई है. भोजन मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है. इस मुद्दे को सबसे पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति फ़्रेंकलिन रूज़वेल्ट ने अपने एक व्याख्यान में उठाया था. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र ने इस मुद्दे को अपने हाथ में ले लिया और 1948 में आर्टिकल 25 के तहत भोजन के अधिकार के रूप में इसे मंज़ूर किया. साल 1976 में संयुक्त राष्ट्र परिषद ने इस अधिकार को लागू किया, जिसे आज 156 राष्ट्रों की मंज़ूरी हासिल है और कई देश इसे क़ानून का दर्जा भी दे रहे हैं. इस क़ानून के लागू होने से भूख से होने वाली मौतों को रोका जा सकेगा.

लेकिन तमाम कोशिशों और तमाम दावों के बावजूद लोगों को भरपेट भोजन तक नहीं मिल पा रहा है. हालत ये है कि दुनियाभर में भूख से जूझने वाले लोगों की वालों की तादाद  12 करोड़ 40 लाख हो गई. संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एजेंसी के प्रमुख डेविड बीसली के मुताबिक़ भूख से जूझ रहे तक़रीबन तीन करोड़ 20 लाख लोग चार देशों सोमालिया, यमन, दक्षिण सूडान और उत्तर पूर्व नाइजीरिया में हैं. दुनियाभर में भुखमरी का दंश झेल रहे  81 करोड़ 50 लाख लोगों में से 60 फ़ीसद लोग ऐसे संघर्षरत इलाकों में रहते हैं, जहां उन्हें यह तक मालूम नहीं होता कि उन्हें अगली बार खाना कब से मिलेगा.

एक अन्य रिपोर्ट की मानें, तो भूख और ग़रीबी की वजह से रोज़ाना 25 हज़ार लोगों की मौत हो जाती है. 85 करोड़ 40 लाख लोगों के पास पर्याप्त भोजन नहीं है, जो कि संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और यूरोपियन संघ की जनसंख्या से ज़्यादा है. भुखमरी के शिकार लोगों में 60 फ़ीसद महिलाएं हैं. दुनियाभर में भुखमरी के शिकार लोगों में हर साल 40 लाख लोगों का इज़ाफ़ा हो रहा है. हर पांच सेकेंड में एक बच्चा भूख से दम तोड़ता है. 18 साल से कम उम्र के तक़रीबन 35.8 से 45 करोड़ बच्चे कुपोषित हैं. विकासशील देशों में हर साल पांच साल से कम उम्र के औसतन 10 करोड़ 90 लाख बच्चे मौत का शिकार बन जाते हैं. इनमें से ज़्यादातर मौतें कुपोषण और भुखमरी से जनित बीमारियों से होती हैं. कुपोषण संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए सालाना राष्ट्रीय आर्थिक विकास व्यय 20 से 30 अरब डॉलर है. विकासशील देशों में चार में से एक बच्चा कम वज़न का है. यह संख्या तक़रीबन एक करोड़ 46 लाख है.

हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो फ़सल काटे जाने के बाद खेत में बचे अनाज और बाज़ार में पड़ी गली-सड़ी सब्ज़ियां बटोरकर किसी तरह उससे अपनी भूख मिटाने की कोशिश करते हैं. महानगरों में भी भूख से बेहाल लोगों को कूडे़दानों में से रोटी या ब्रेड के टुकड़ों को उठाते हुए देखा जा सकता है. रोज़गार की कमी और ग़रीबी की मार की वजह से कितने ही परिवार चावल के कुछ दानों को पानी में उबालकर पीने को मजबूर हैं. यह एक कड़वी सच्चाई है कि हमारे देश में आज़ादी के बाद से अब तक ग़रीबों की भलाई के लिए योजनाएं तो अनेक बनाई गईं, लेकिन लालफ़ीताशाही की वजह से वे महज़ काग़ज़ों तक ही सिमट कर रह गईं. एक तरफ़ गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ता है, तो दूसरी तरफ़ भूख से लोग मर रहे होते हैं. ऐसी हालत के लिए क्या व्यवस्था सीधे तौर पर दोषी नहीं है? भुखमरी के स्थायी समाधान के लिए लोगों को रोज़गार मुहैया कराना होगा. केंद्र की पिछली यूपीए सरकार ने लोगों को बेहद मामूली दामों में अनाज मुहैया कराने की योजना बनाई थी. इसके तहत परिवार के प्रति सदस्य को सात किलो खाद्यान्न यानी 3 रुपये किलो गेहूं, 2 रुपये किलो चावल और एक रुपये किलो की दर से मोटा अनाज दिया जाना था. इस योजना का फ़ायदा हर ज़रूरतमंद व्यक्ति तक पहुंचे सरकार यह सुनिश्चित करना होगा.

ग़ौरतलब है कि पिछले साल  कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने राज्य को भूखमरी मुक्त बनाने के मक़सद से लोगों को सस्ता भोजन मुहैया कराने की एक सराहनीय योजना शुरू की थी. 16 अगस्त, 2017 को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बेंगलुरु के जयनगर वॉर्ड में इंदिरा कैंटीन का उद्घाटन किया था. तमिलनाडु के अम्मा कैंटीन के तर्ज़ पर बने इस इंदिरा कैंटीन में 5 रुपये में नाश्ता और 10 रुपये में दिन और रात का खाना मिलता है.  राहुल गांधी ने कर्नाटक में कांग्रेस सरकार की इस पहल को ‘सभी को भोजन’ के कांग्रेस के संकल्प की ओर एक और क़दम बताया था.  उन्होंने कहा कि बेंगलुरु में बहुत से लोग बड़े घरों में रहते हैं और महंगी कारों से चलते हैं. उनके लिए खाना बड़ा मुद्दा नहीं है, लेकिन यहां लाखों लोग ऐसे हैं, जिनके पास ज़्यादा पैसा नहीं है. इंदिरा कैंटीन इनकी सेवा करेगी. हम चाहते हैं कि शहर के सबसे ग़रीब और कमज़ोर तबक़े के लोग जानें कि वे भूखे नहीं रहने वाले. कैंटीन के भोजन की गुणवत्ता को परखने के लिए  उद्घाटन के बाद राहुल गांधी ने कैंटीन जाकर खाना भी खाया.

जिस देश में भूख से लोगों की मौतें होती हों, जहां करोड़ों लोग आज भी भूखे पेट सोते हों, ऐसे देश में सस्ता खाना मुहैया कराना बेहद ज़रूरी है. तमिलनाडु के ’अम्मा कैंटीन’ की तर्ज़ पर देश भर में कैंटीन खोले जाने चाहिए, ख़ासकर देश के उन हिस्सों में जो ग़रीबी की मार से बुरी तरह जूझ रहे हैं और जहां से बार-बार भूख और कुपोषण से लोगों के मरने की ख़बरें आती रहती हैं. दरअसल, देशभर में इस तरह की योजनाएं लागू करने की बेहद ज़रूरत है

Thursday, May 31, 2018

जनता बेहाल, सरकार मालामाल

फ़िरदौस ख़ान 
केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने 26 मई को चार साल पूरे कर लिए हैं. इन चार सालों को लेकर भारतीय जनता पार्टी के नेता और सरकार अपनी कामयाबी के कितने ही दावे कर लें, लेकिन हक़ीक़त यही है कि हर मोर्चे पर केंद्र सरकार नाकारा ही साबित हुई है. हालत यह है कि आम आदमी को इंसाफ़ मिलने की बात तो दूर, ख़ुद सर्वोच्च न्यायालय के चार जजों को इंसाफ़ के लिए जनता के बीच आना पड़ा. अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए सरकार ने हमेशा ग़ैर ज़रूरी मुद्दों को हवा दी है.  अवाम ने शिक्षा की बात की, तो शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की बजाय जेएनयू और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में विवाद पैदा किए गए. अवाम ने रोज़गार मांगा, तो नोटबंदी कर उन्हें बैंक के सामने क़तारों में दिन-रात खड़ा रहने पर मजबूर कर दिया गया. स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें, तो गोरखपुर के मृत बच्चों की लाशें सामने आ जाती हैं. ऒक्सीज़न की कमी से किस तरह वे तड़प-तड़प कर मौत की आग़ोश में चले गए. दरअसल, मुट्ठीभर अमीरों को छोड़कर देश की अवाम का बुरा हाल है. आलम ये है कि तीज-त्यौहारों के दिनों में भी लोगों के पास काम नहीं हैं. बाज़ार में भी मंदी छाई हुई है. दुकानदार दिन भर ग्राहकों का इंतज़ार करते है, लेकिन जब लोगों के पैसे होंगे, तभी तो वे कुछ ख़रीद पाएंगे. बड़े उद्योगपतियों को छोड़कर बाक़ी छोटे काम-धंधे करने वालों के काम ठप्प होकर रह गए हैं. बेरोज़गारी कम होने की बजाय दिनोदिन बढ़ रही है.

देश की अवाम त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही है और ऐसे में केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी के नेता अपने चार साल के शासनकाल की उपलब्धियां गिनाते नहीं थक रहे हैं. बेशक इन चार सालों में केंद्र सरकार का काफ़ी भला हुआ है. उसके ख़ज़ाने लगातार भर रहे हैं. पेट्रोल पर भारी एक्साइज़ ड्यूटी से केंद्र को भारी मुनाफ़ा हुआ है. पिछले चार साल के दौरान इससे सरकार को 150 गुना ज़्यादा राजस्व मिला है. ग़ौरतलब है कि पिछली कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार की एक्साइज़ ड्यूटी में मोदी सरकार 126 फ़ीसद बढोतरी कर चुकी है. पेट्रोल पर जहां केंद्र और राज्य सरकारें मालामाल होती हैं, वहीं उपभोक्ताओं को भारी नुक़सान होता है. केंद्र सरकार  पेट्रोल पर एक्साइज़ ड्यूटी लगाती है और राज्य सरकार अपने स्तर से वैट और बिक्री कर लगाती हैं, जिससे इसकी क़ीमत बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है. पिछले साल मार्च में पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने लोकसभा में बताया था कि एक अप्रैल 2014 को मोदी सरकार से पहले पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 9.48 रुपये और डीजल पर 3.56 रुपये थी. महज़ दो साल में एनडीए सरकार ने एक्साइज टैक्स में 126 फ़ीसद का इज़ाफ़ा किया, जिससे एक्साइज ड्यूटी बढ़कर 21.48 रुपये हो गई. डीज़ल पर भी एक्साइज टैक्स की दर ज़्यादा रही. मार्च 2016 तक डीजल पर चार बार एक्साइज़ ड्यूटी में बढ़ोतरी की गई, जिससे 3.56 से बढ़कर टैक्स 17.33 रुपये हो गया. इस दौरान मोदी सरकार ने 144 फ़ीसद ज़्यादा कमाई की. मोदी सरकार ने वित्तीय वर्ष 2014-5 में सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी से 99.184  लाख करोड़, स्टेट वैट और सेल्स टैक्स से 137.157 लाख करोड़, साल 2015-16 में 178.591 और 142.848 और साल 2016-17 में 242.691 और 166.378 लाख करोड़ रुपये वसूले. यानी इससे सरकार जितना ज़्यादा फ़ायदा हुआ, जनता को उतना ही नुक़सान उठाना पड़ा.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी सरकार को तेल के दाम कम करने का चैलेंज देते हुए कहा था कि तेल की क़ीमते कम कीजिए, वरना हम आपको मजबूर कर देंगे. इसके बाद केंद्र सरकार ने डीज़ल और पेट्रोल की क़ीमत में एक पैसे की कमी कर दी. इस पर राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर तंज़ करते हुए कहा है कि आपने पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में एक पैसे की कटौती की है. एक पैसा!!  अगर ये आपका मज़ाक़ करने का तरीक़ा है, तो ये बचकाना और बेहद घटिया है. एक पैसे की कटौती मेरे द्वारा दिया गए फ्युएल चैलेंज का वाजिब जवाब नहीं है.

भारतीय जनता पार्टी  सरकार के शासनकाल में घोटाले भी ख़ूब हुए हैं. सूचना के अधिकार के तहत भारतीय रिज़र्व बैंक से मांगी गई एक जानकारी के मुताबिक़ साल 2014-2015 से 2017-2018 के बीच देश के अलग-अलग बैंकों से 19000 से ज़्यादा धोखाधड़ी के मामले सामने आए हैं, जिनमें 90 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा का घोटाला हुआ है. अप्रैल, 2017 से मार्च, 2018 के बीच बैंक धोखाधड़ी के 5152 मामले दर किए गए, जिनमें 28,459 करोड़ रुपये शामिल हैं.  इससे पहले साल 2016-17 में 5076 बैंक घोटाले हुए, जिनमें 23,933 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी हुई. ग़ौरतलब है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय जैसी कई केंद्रीय जांच एजेंसियां उद्योगपतियों द्वारा किए गए धोखाधड़ी के मामलों की तफ़्तीश कर रही हैं. इनमें नीरव मोदी और मेहुल चोकसी द्वारा किया गया 12 सौ करोड़ से ज़्यादा का पंजाब नेशनल बैंक घोटाला भी शामिल है.

भले ही भारतीय जनता पार्टी जश्न मना रही है, लेकिन विपक्षी दल इसे विश्वासघात के तौर पर देख रहे हैं, वहीं अवाम भी सरकार से हिसाब मांगने लगी है. मोदी सरकार के चार साल पूरे होने पर कांग्रेस ने एक पोस्‍टर जारी किया है. कांग्रेस के राष्‍ट्रीय महासचिव अशोक गहलोत का कहना है कि मोदी सरकार के चार साल जनता से विश्वासघात जैसा है. उन्होंने कहा कि आम आदमी का भरोसा सरकार से उठ चुका है. वामदलों ने भी सरकार पर जनता से विश्वासघात करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि देश के सभी तबक़े सरकार से परेशान हैं.

क़ाबिले-ग़ौर है कि पिछले चार सालों में देश की हालत बद से बदतर हुई है. देश में मज़हब और जाति के नाम पर वैमन्य बढ़ा है, लोगों में अविश्वास बढ़ा है. उनका चैन-अमन प्रभावित हुआ है. उनकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी मुतासिर हुई है. दादरी के अख़्लाक हत्याकांड से समाज में कटुता बढ़ी, जबकि आरक्षण को लेकर चले आंदोलन की वजह से जातिगत वैमन्य बढ़ोतरी हुई है. बढ़ती महंगाई ने लोगों का जीना दुश्वार कर दिया है. तीज-त्यौहारों के रंग फीके पड़ गए हैं, क्योंकि बेरोज़गारी और महंगाई की वजह से लोग ज़रूरत का पूरा सामान तक ख़रीद नहीं पा रहे हैं.

अब जब इस सरकार को चार साल पूरे हो गए हैं, तो ऐसे में लोग उन वादों के बारे में सवाल करने लगे हैं, जो भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता में आने से पहले जनता से किए थे.  तब लोगों को लगा था कि देश में ऐसा शासन आएगा, जिसमें सब मालामाल हो जाएंगे, मगर जब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन गई और महंगाई ने अपना रंग दिखाना शुरू किया, तो लोगों को लगा कि इससे तो पहले ही वे सुख से ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे. ऐसा नहीं है कि अच्छे दिन नहीं आए हैं, अच्छे दिन आए हैं, लेकिन मुट्ठी भर अमीरों के लिए. बहरहाल, प्रधानमंत्री ने उन चुनावी वादों को चुनावी जुमले कहकर टाल चुके हैं, लेकिन जनता टालने के मूड में बिल्कुल नहीं है. 

Thursday, May 17, 2018

सियासत का मौसम बदला-बदला है...

फ़िरदौस ख़ान
सियासत का मौसम कब बदल जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता. ये सियासत की ही ज़मीन है, जो सावन में भी ख़ुश्क रह जाए और सूखे में भी बिन बादल भीग जाए. कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को ही लें. कर्नाटक में पहली बार उन्होंने ख़ुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताकर सबको चौंका दिया है. चौंका इसलिए दिया है, क्योंकि सियासी गलियारे में अभी तक यही माना जा रहा था कि अगर 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस जीत हासिल करती है, तो वे अपने किसी क़रीबी और विश्वसनीय व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाना चाहेंगे. वे ख़ुद अपनी मां सोनिया गांधी की तरह पार्टी संगठन का ही काम देखेंगे और सरकार पर नज़र रखेंगे.  लेकिन राहुल गांधी के एक बयान ने सियासी माहौल को गरमा दिया है.

प्रधानमंत्री बनने के सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, मैं क्यों पीएम नहीं बनूंगा, अगर 2019 का चुनाव जीते तो ज़रूर पीएम बन सकता हूं. अपने इस बयान से उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुली चुनौती दी है कि वे मुक़ाबले के लिए तैयार हैं. ये राहुल गांधी का हौसला और आत्मविश्वास ही है कि पिछले कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में हारने और सत्ता गंवाने के बाद फिर से संघर्ष के लिए खड़े हो जाते हैं. वे जानते हैं कि सियासत में कभी मौसम एक जैसा नहीं रहता. यहां कुछ भी स्थाई नहीं है. सत्ता कब किसके हाथ में आ जाए, कब किसके हाथ से फिसल जाए, कोई नहीं जानता.  वे जानते हैं कि जीत और हार, धूप और छांव की तरह हैं. और वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता. ये हर पल बदलता रहता है. वक़्त कभी उनके साथ रहा है, तो आज उनके विरोधियों के साथ है. कांग्रेस आज भले ही गर्दिश में है, लेकिन उसने कभी अपनी विचारधारा से अपने उसूलों के साथ समझौता नहीं किया. इसीलिए कांग्रेस आज भी इस देश की माटी में रची-बसी है. अवाम का मिज़ाज हमेशा कांग्रेस के साथ रहा है और आगे भी रहेगा. कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी है, जिसे हर कोई अपनी पार्टी मानता है. कांग्रेस जनमानस की पार्टी रही है. कांग्रेस ने हमेशा इस देश की आत्मा और अपनी अनमोल व समृद्ध विरासत का प्रतिनिधित्व किया है. महात्मा गांधी ने कांग्रेस के बारे में कहा है, "कांग्रेस इस देश में रहने वाले सभी भारतीयों की है, चाहे वे हिन्दू हों, मुसलमान हों, ईसाई, सिख या पारसी हों." कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी कहते हैं, "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है." यही कांग्रेस की ख़ासियत है.

कांग्रेस हमेशा जनमानस का सहारा बनी और मुश्किल वक़्त में अवाम को हिम्मत दी. किसी भी देश की तरक़्क़ी के लिए, अवाम की ख़ुशहाली के लिए चैन-अमन सबसे ज़रूरी है. पिछले कुछ बरसों में देश में जो नफ़रत और ग़ैर यक़ीनी का माहौल बना है, उस ख़ौफ़ के माहौल में राहुल गांधी ने अवाम को यक़ीन दिलाया है कि वे उसकी हिफ़ाज़त करेंगे. वे उन लोगों की हिफ़ाज़त करने का भी वादा करते हैं, जो हमेशा उनके ख़िलाफ़ रहते हैं, उनके ख़िलाफ़ दुष्प्रचार करते हैं. ऐसा राहुल गांधी ही कर सकते हैं, क्योंकि वे उस विरासत से ताल्लुक़ रखते हैं, जिसने देश की गरिमा को बढ़ाया. बेशक, कांग्रेस का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है. वे कांग्रेस के नेताओं ने इस देश के लिए अपना जान तक क़ुर्बान कर दी. देश को ग़ुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद कराने में महात्मा गांधी के योगदान को भला कौन भुल पाएगा. उन्होंने अपनी सारी ज़िन्दगी देश के नाम कर दी.  देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत के निर्माताओं में अग्रणी रहे हैं. श्रीमती इंदिरा गांधी ने भारत को विश्व पटल पर चमकाया. श्री राजीव गांधी ने देश को, देश के युवाओं को नई राह दी, जिसकी बदौलत आज देश उन्नति के शिखर तक पहुंचा है. श्रीमती सोनिया गांधी ने भी देश के लिए बहुत कुछ किया है और आज भी कर रही हैं. जब भी देश और पार्टी पर कोई संकट आया, श्रीमती सोनिया गांधी आगे आईं.

क़ाबिले-ग़ौर है कि राहुल गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद श्रीमती सोनिया गांधी ने ख़्वाहिश ज़ाहिर की थी कि वे अब आराम करना चाहती हैं. माना जा रहा था कि वे अब सियासत से दूरी बना लेंगी. उन्होंने ऐसा किया भी. उन्होंने कुछ अरसे के लिए सियासी सरगर्मियों से फ़ासला रखा, लेकिन कांग्रेस को संकट में देख उन्होंने सियासत में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है. कर्नाटक में उन्होंने चुनावी रैलियां करते हुए केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार से चार साल का हिसाब मांगा. उन्होंने  बीजापुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज़ करते हुए कहा कि मोदी जी अच्छा भाषण देते हैं, एक अभिनेता की तरह भाषण देते हैं. लेकिन केवल भाषण से लोगों का पेट नहीं भर सकता, लोगों का कल्याण नहीं हो सकता है. अगर भाषण से पेट भरता, तो मेरी प्रार्थना है कि वह और भी अच्छा भाषण दें.

सोनिया गांधी चुनावी मुहिम में इसीलिए उतरी हैं, ताकि कांग्रेस को मज़बूत बना सकें. एक वक़्त वह था, जब वे न तो खुद सियासत में आना चाहती थीं और न ही अपने बच्चों को इसमें शामिल होने देना चाहती थीं. लेकिन वक़्त जो न कराए, कम है. राहुल गांधी की भी सियासत में इतनी गहरी दिलचस्पी नहीं थी. वह सत्ता के पीछे भी नहीं भागे. एक वह वक़्त था, जब देश में उनकी पार्टी की सरकार थी, तब उनके समर्थक चाहते थे कि वह सरकार में कोई अहम ओहदा लें, कोई मंत्रालय संभालें, लेकिन उन्होंने बता दिया कि वे सरकार में कोई किरदार निभाने की बजाय पार्टी संगठन में काम करना पसंद करते हैं, इसलिए उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री का ओहदा लेने से साफ़ इंकार कर दिया था.

मगर आज हालात जुदा हैं. राहुल गांधी ने ख़ुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार, तो बता दिया है. क्या उनके सहयोगी दल इस पर राज़ी होंगे? उनके सहयोगी दलों के कई नेता न जाने कब से प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोये बैठे हैं.
क्या राहुल गांधी ने बहुत-सोच-समझकर ये ऐलान किया है? सवाल कई हैं, लेकिन जवाब आने वाले वक़्त की तह में छुपे हैं. बहरहाल, कांग्रेसी ख़ासकर राहुल गांधी के चाहने वाले उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में ही देखना चाहते हैं.

Friday, May 4, 2018

कांग्रेस को अवाम की आवाज़ बनना होगा

फ़िरदौस ख़ान
एक ख़ुशहाल देश की पहचान यही है कि उसमें रहने वाले हर व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान हो, उसे बुनियादी ज़रूरत की सभी चीज़ें, सभी सुविधाएं मुहैया हों. जब व्यक्ति ख़ुशहाल होगा, तो परिवार ख़ुशहाल होगा, परिवार ख़ुशहाल होगा, तो समाज ख़ुशहाल होगा. एक ख़ुशहाल समाज ही आने वाली पीढ़ियों को बेहतर समाज, बेहतर परिवेश दे सकता है. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सर्वोदय समाज का सपना देखा था और वे इसे साकार करना चाहते थे. गांधीजी कहते हैं- "समाजवाद का प्रारंभ पहले समाजवादी से होता है. अगर एक भी ऐसा समाजवादी हो, तो उस पर शून्य बढ़ाए जा सकते हैं. हर शून्य से उसकी क़ीमत दस गुना बढ़ जाएगी, लेकिन अगर पहला अंक शून्य हो, तो उसके आगे कितने ही शून्य बढ़ाए जाएं, उसकी क़ीमत फिर भी शून्य ही रहेगी." भूदान आन्दोलन के जनक विनोबा भावे के शब्दों में, सर्वोदय का अर्थ है- सर्वसेवा के माध्यम से समस्त प्राणियो की उन्नति. आज देश को इसी सर्वोदय समाज की ज़रूरत है.

पिछले कुछ बरसों देश एक ऐसे दौर से गुज़र रहा है, जहां सिर्फ़ मुट्ठीभर लोगों का ही भला हो रहा है. बाक़ी जनता की हालत बद से बदतर होती जा रही है. लोगों के काम-धंधे तो पहले ही बर्बाद हो चुके हैं. बढ़ती महंगाई की मार भी लोग झेल ही रहे हैं. ऐसे में अपराधों की बढ़ती वारदातों ने डर का माहौल पैदा कर दिया है. हालत ये है कि चंद महीने की मासूम बच्चियां भी दरिन्दों का शिकार बन रही हैं. क़ानून-व्यवस्था की हालत भी कुछ ऐसी है कि शिकायत करने वाले मज़लूम की हिरासत में मौत तक हो जाती है और आरोपी खुले घूमते रहते हैं. ऐसे में जनता का शासन-प्रशासन से यक़ीन उठने लगा है. बीते मार्च माह में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आरोपी की फ़ौरन गिरफ़्तारी पर रोक लगाने के आदेश के बाद से इन तबक़ों में खौफ़ पैदा हो गया है. उन्हें लगता है कि पहले ही उनके साथ अमानवीय व्यवहार के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं, ऐसे में उन पर दबंगों का ज़ुल्म और ज़्यादा बढ़ जाएगा. अपने अधिकारों के लिए उन्हें सड़क पर उतरना पड़ा. क़ाबिले-गौर है कि देश में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की आबादी तक़रीबन 20 करोड़ है. लोकसभा में इन तबक़ों के 131 सदस्य हैं. हैरानी की बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी में 67 सांसद इसी तबक़े से होने के बावजूद दलितों के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों पर कोई आवाज़ सुनाई नहीं दे रही है. चंद सांसदों के बयान सामने आए, लेकिन जो विरोध होना चाहिए था, वह दिखाई नहीं पड़ा. ग़ौरतलब है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक़, हर 15 मिनट में एक दलित के साथ अपराध होता है. रोज़ाना छह दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है. ये तो सिर्फ़ सरकारी आंकड़े हैं, और उन मामलों के हैं, जो दर्ज हो जाते हैं. जो मामले दर्ज नहीं कराए जाते, या दर्ज नहीं हो पाते, उनकी तादाद कितनी हो सकती है, इसका अंदाज़ा लगाना कोई मुश्किल नहीं है.

बुरे हालात में कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल दलितों के समर्थन में सामने आए. कांग्रेस ने दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में संविधान बचाओ रैली का आयोजन करके जहां भाजपा सरकार को ये चेतावनी दी कि अब और ज़ुल्म बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, वहीं दलितों को भी ये यक़ीन दिलाने की कोशिश की गई कि वे अकेले नहीं हैं. कांग्रेस हमेशा उनके साथ है. रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि  दलितों के ख़िलाफ़ अत्याचार बढ़ रहा है. मोदी के दिल में दलितों के लिए कोई जगह नहीं है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस दलितों, ग़रीबों, किसानों औऱ देश के सभी कमज़ोर तबक़ों की रक्षा के लिए हमेशा लड़ती रहेगी. कांग्रेस ने सत्तर साल में देश की गरिमा बनाई और पिछले चार साल में मोदी सरकार ने इसे धूमिल कर दिया, इसे चोट पहुंचाई. उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने देश को संविधान दिया और ये संविधान दलितों, ग़रीबों और महिलाओं की रक्षा करता है. आज सर्वोच्च न्यायालय को कुचला और दबाया जा रहा है, पहली बार ऐसा हुआ है कि चार जज हिन्दुस्तान की जनता से इंसाफ़ मांग रहे हैं. उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग इस संविधान को कभी नहीं छू पाएंगे, क्योंकि हम ऐसा होने नहीं देंगे. उन्होंने कहा कि आज जनता बेहाल है. देश के प्रधानमंत्री सिर्फ़ अपने मन की बात सुनते हैं. वह किसी को बोलना देना नहीं चाहते. वे कहते हैं कि सिर्फ़ मेरे मन की बात सुनो. मैं कहता हूं कि 2019 के चुनाव में देश की जनता मोदीजी को अपने मन की बात बताएगी.

दरअसल, आपराधिक मामलों में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के नाम सामने आने की वजह से भी अवाम का भाजपा सरकार से यक़ीन ख़त्म हो चला है. भाजपा नेताओं के अश्लील और विवादित बयान भी इस पार्टी के चाल, चरित्र और चेहरे को सामने लाते रहते हैं. ये बेहद अफ़सोस की बात है कि केंद्र सरकार में ज़िम्मेदार पदों पर बैठे लोग पूरी तरह से संवेदनहीन रवैया अपनाये हुए हैं. इसी ही वारदातों की तरफ़ इशारा करते हुए राहुल गांधी ने तंज़ किया, मोदी जी अब नया नारा देंगे- "बेटी बचाओ, बीजेपी के लोगों से बचाओ."

बहरहाल, आज देश को ऐसे रहनुमाओं की ज़रूरत है, जो बिना किसी भेदभाव के अवाम के लिए काम करें. जनता को इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि देश में किस सियासी दल का शासन है, उसे तो बस चैन-अमन चाहिए, बुनियादी सुविधाएं चाहिएं, ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए अच्छा माहौल चाहिए. अवाम की ये ज़रूरतें वही सियासी दल पूरी कर सकते हैं, जो पूर्वाग्रह से ग्रस्त न हों. इसमें कोई दो राय नहीं है कि कांग्रेस ने इस देश के लिए बहुत कुछ किया है. आज भी अवाम को कांग्रेस से बहुत उम्मीदें हैं. राहुल गांधी की ज़िम्मेदारी है कि वे विपक्ष में होने के नाते, एक सियासी दल के अध्यक्ष होने के नाते, जनता को ये यक़ीन दिलाते रहें कि वे हमेशा उसके साथ हैं. महात्मा गांधी के सर्वोदय के सिद्धांत पर अमल करते हुए देश और समाज के लिए काम करना भी उनकी ज़िम्मेदारियों में शामिल हैं. आज जनता को ऐसे नेता की ज़रूरत है, जो उनकी आवाज़ बन सके. कांग्रेस इसमें कितना कामयाब हो पाती है, ये आने वाला वक़्त ही बताएगा. 

Saturday, April 14, 2018

देश को मज़बूत विपक्ष चाहिए

फ़िरदौस ख़ान
किसी भी देश के लिए सिर्फ़ सरकार का मज़बूत होना ही काफ़ी नहीं होता.  देश की ख़ुशहाली के लिए, उसकी तरक़्क़ी के लिए एक मज़बूत विपक्ष की भी ज़रूरत होती है. ये विपक्ष ही होता है, जो सरकार को तानाशाह होने से रोकता है, सरकार को जनविरोधी फ़ैसले लेने से रोकता है. सरकार के हर जन विरोधी क़दम का जमकर विरोध करता है. अगर सदन के अंदर उसकी सुनवाई नहीं होती है, तो वह सड़क पर विरोध ज़ाहिर करता है. जब सरकार में शामिल अवाम के नुमाइंदे सत्ता के मद में चूर हो जाते हैं और उन लोगों की अनदेखी करने लगते हैं, जिन्होंने उन्हें सत्ता की कुर्सी पर बिठाया है, तो उस वक़्त ये विपक्ष ही तो होता है, जो अवाम का प्रतिनिधित्व करता है. अवाम की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाता है. आज देश की यही हालत है. भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार तानाशाही रवैया अख़्तियार किए हुए. सत्ता में आने के बाद जिस तरह से कथित जन विरोधी फ़ैसले लिए गए, उससे अवाम की हालत दिनोदिन बद से बदतर होती जा रही है. यह फ़ैसला नोटबंदी का हो या जीएसटी का, बिजली और रसोई गैस की क़ीमतें बढ़ाने का हो या फिर बात-बात पर कर वसूली का. इस सबने अवाम को महंगाई के बोझ तले इतना दबा दिया है कि अब उसका दम घुटने लगा है. कहीं मिनिमम बैंलेस न होने पर ग्राहकों के खाते से मनमाने पैसे काटे जा रहे हैं, तो कहीं आधार न होने के नाम पर, राशन कार्ड को आधार से न जोड़ने के नाम पर लोगों को राशन से महरूम किया जा रहा है.

देश की अवाम पिछले काफ़ी वक़्त से बुरे दौर से गुज़र रही है. जनमानस ने जिन लोगों को अपना प्रतिनिधि बनाकर संसद में, विधानसभा में भेजा था, वे अब सत्ता के नशे में हैं. उन्हें जनमानस के दुखों से, उनकी तकलीफ़ों से कोई सरोकार नहीं रह गया है. ऐसे में जनता किसके पास जाए, किसे अपने अपने दुख-दर्द बताए. ज़ाहिर है, ऐसे में जनता विपक्ष से ही उम्मीद करेगी. जनता चाहेगी कि विपक्ष उसका नेतृत्व करे. उसे इस मुसीबत से निजात दिलाए. ये विपक्ष का उत्तरदायित्व भी है कि वे जनता की आवाज़ बने, जनता की आवाज़ को मुखर करे.

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की प्रमुख व कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी  देश के हालात को बख़ूबी समझ रहे हैं. सोनिया गांधी अवाम को एक मज़बूत विपक्ष देना चाहती हैं, वे देश को एक जन हितैषी सरकार देना चाहती हैं. इसीलिए उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के ख़िलाफ़ मुहिम शुरू कर दी है. दिल्ली में हुए कांग्रेस के महाधिवेशन में उन्होंने कहा कि पिछले चार साल में कांग्रेस को तबाह करने के लिए अहंकारी और सत्ता के नशे में मदमस्त लोगों ने कोई कसर बाक़ी नहीं रखी. साम-दाम-दंड-भेद का पूरा खेल चल रहा है, लेकिन सत्ता के अहंकार के आगे ना कांग्रेस कभी झुकी है और ना कभी झुकेगी. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के तानाशाही तौर तरीक़ों, संविधान की उपेक्षा, संसद का अनादर, विपक्ष पर फ़ज़्री मुक़दमों और मीडिया पर लगाम लगाने का कांग्रेस विरोध कर रही है.

राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश के उन्नाव और जम्मू कश्मीर के कठुआ में हुई बलात्कार की घटनाओं के विरोध में गुरुवार आधी रात को इंडिया गेट पर कैंडल मार्च निकाला.

ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों सोनिया गांधी ने भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ गठजोड़ बनाने के लिए विपक्षी दलों को रात्रिभोज दिया. सोनिया गांधी के आवास 10 जनपथ पर हुए इस रात्रिभोज में विपक्षी दल के नेता शामिल हुए, जिनमें समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेइटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ़) के नेता बदरुद्दीन अजमल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के शरद पवार और तारिक अनवर, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव और मीसा भारती, जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला, झारखंड मुक्ति मोर्चा के हेमंत सोरेन और बाबूलाल मरांडी, राष्ट्रीय जनता दल के अजित सिंह और जयंत सिंह, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी राजा, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मोहम्मद सलीम, द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम (डीएमके) के कनिमोई, बहुजन समाज पार्टी के सतीश चंद्र मिश्रा, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सुदीप बंदोपाध्याय, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतनराम मांझी, जनता दल-सेक्युलर (जेडी-एस) के कुपेंद्र रेड्डी, रेवलूशनेरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) के रामचंद्रन और केरल कांग्रेस के नेता भी शामिल हुए. कांग्रेस के नेताओं में राहुल गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गु़लाम नबी आज़ाद, अहमद पटेल,  एके एंटोनी, मल्लिकार्जुन खड़गे, रणदीप सुरजेवाला आदि नेताओं ने शिरकत की.

सोनिया गांधी बख़ूबी समझती हैं कि इस वक़्त कांग्रेस को उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. जब भी पार्टी पर कोई मुसीबत आई है, तो सोनिया गांधी ढाल बनकर खड़ी हो गईं. देश के लिए, देश की जनता के लिए, पार्टी के लिए हमेशा उन्होंने क़ुर्बानियां दी हैं. देश का शासन उनके हाथ में था, प्रधानमंत्री का ओहदा उनके पास था, वे चाहतीं, तो प्रधानमंत्री बन सकती थीं या अपने बेटे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने डॊ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया. उनकी अगुवाई में न सिर्फ़ कांग्रेस एक मज़बूत पार्टी बनकर उभरी और सत्ता तक पहुंची, बल्कि भारत विश्व मंच पर एक बड़ी ताक़त बनकर उभरा.

राहुल गांधी को कांग्रेस की बागडौर सौंपने के बाद सोनिया गांधी आराम करना चाहती थीं. अध्यक्ष पद पर रहते हुए ही उन्होंने सियासत से दूरी बना ली थी. राहुल गांधी ही पार्टी के सभी अहम फ़ैसले कर रहे थे. लेकिन पार्टी को मुसीबत में देखकर उन्होंने सियासत में सक्रियता बढ़ा दी है. फ़िलहाल वे विपक्ष को एकजुट करने की क़वायद में जुटी हैं.  वह भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ एक मज़बूत गठजोड़ बनाना चाहती हैं.  क़ाबिले-ग़ौर है कि जब-जब कांग्रेस पर संकट के बादल मंडराये, तब-तब सोनिया गांधी ने आगे आकर पार्टी को संभाला और उसे मज़बूती दी. उन्होंने कांग्रेस की हुकूमत में वापसी के लिए देशभर में रोड शो किए थे. आख़िरकार उनकी अगुवाई में कांग्रेस ने साल 2004 और 2009  का आम चुनाव जीतकर केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार बनाई थी. उस दौरान देश के कई राज्यों में कांग्रेस सत्ता में आई. लेकिन जब से अस्वस्थता की वजह से सोनिया गांधी की सियासत में सक्रियता कम हुई है, तब से पार्टी पर संकट के बादल मंडराने लगे. साल 2014 में केंद की सत्ता से बेदख़ल होने के बाद कांग्रेस ने कई राज्यों में भी शासन खो दिया. हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी ने ख़ूब मेहनत भी की, लेकिन उन्हें वह कामयाबी नहीं मिल पाई, जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही थी.

अगले साल आम चुनाव होने हैं. उससे पहले इसी साल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने हैं. कांग्रेस के पास बहुत ज़्यादा वक़्त नहीं बचा है. सोनिया गांधी ने रात्रिभोज के बहाने विपक्षी द्लों को एकजुट करने की कोशिश की है. अगर सोनिया गांधी इसमें कामयाब हो जाती हैं, तो इससे जहां देश को एक मज़बूत विपक्ष मिलेगा, वहीं आम चुनाव में पार्टी की राह भी आसान हो सकती है. 

Tuesday, April 10, 2018

राहुल गांधी को समर्पित एक ग़ज़ल

भारत की मुहब्बत ही इस दिल का उजाला है
आंखों में मेरी बसता एक ख़्वाब निराला है

बेटा हूं मैं भारत का, इटली का नवासा हूं
रिश्तों को वफ़ाओं ने हर रूप में पाला है

राहों में सियासत की, ज़ंजीर है, कांटें हैं
सुख-दुख में सदा मुझको जनता ने संभाला है

धड़कन में बसा मेरी, इस देश की गरिमा का
मस्जिद कहीं, गिरजा कहीं, गुरुद्वारा, शिवाला है

बचपन से ले के अब तक ख़तरे में जां है, लेकिन
दुरवेशों की शफ़क़त का इस सर पे दुशाला है

नफ़रत, जलन, अदावत दिल में नहीं है मेरे
अख़लाक़ के सांचे में अल्लाह ने ढाला है

पतझड़ में, बहारों में, फ़िरदौस नज़ारों में
हर दौर में देखोगे राहुल ही ज़ियाला है
-फ़िरदौस ख़ान

शब्दार्थ : दुरवेश- संत,  शफ़क़त- सहानुभूति, अदावत- शत्रुता, अख़लाक़- संस्कार,  फ़िरदौस- स्वर्ग, ज़ियाला- उजाला


Sunday, March 18, 2018

राहुल गांधी ने किया सबकी रक्षा का वादा

फ़िरदौस ख़ान
किसी भी देश की तरक़्क़ी के लिए, किसी भी समाज की ख़ुशहाली के लिए चैन-अमन सबसे ज़रूरी है. पिछले चार बरसों में देश में जो नफ़रत का माहौल बना है, कहीं मज़हबी झगड़े, तो कहीं जातिगत ख़ून-ख़राबा. इस ख़ौफ़ के माहौल में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अवाम को यक़ीन दिलाया है कि वे उसकी रक्षा करेंगे. उन्होंने उन लोगों की रक्षा करने की भी बात कही, जो हमेशा उनके ख़िलाफ़ रहते हैं, उनके ख़िलाफ़ दुष्प्रचार करते हैं. सच, ऐसा राहुल गांधी ही कर सकते हैं. राहुल गांधी ही वो शख़्सियत हैं, जो अपने दुश्मनों, अपने विरोधियों के बारे में भी हमेशा अच्छा ही सोचते हैं, अच्छा ही करते हैं.

देश की राजधानी दिल्ली के ताल कटोरा स्टेडियम में आयोजित कांग्रेस के महाधिवेशन को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने पूरे देश में डर का माहौल बना दिया है. प्रेस के लोग भी डरते हैं. जनता इंसाफ़ के लिए अदालत में जाती है. पहली बार ऐसा हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट के चार जज इंसाफ़ के लिए जनता की तरफ़ दौड़े. ये आरएसएस का काम है. कांग्रेस पार्टी और आरएसएस में बहुत फ़र्क़ है. हम हिन्दुस्तान के इंस्टीट्यूशन की इज़्ज़त करते हैं, वो हिन्दुस्तान के इंस्टीट्यूशन को ख़त्म करना चाहते हैं. वो सिर्फ़ एक इंस्टीट्यूशन चाहते हैं, आरएसएस. और वो चाहते हैं कि हिन्दुस्तान के सब इंस्टीट्यूशन आरएसएस के नीचे काम करें. चाहे वो ज्यूडिशरी हो, चाहे वो पार्लियामेंट हो, पुलिस हो, कोई भी इंस्टीट्यूशन हो. ये सच्चाई की लड़ाई है. हम हमारे इंस्टीट्यूशन की रक्षा करेंगे. हम पीछे नहीं हटेंगे.

मीडिया के दुष्प्रचार का ज़िक्र करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि प्रेस वाले हमारे बारे में, कांग्रेस पार्टी के बारे में भी ख़राब लिखते हैं, कभी-कभी ग़लत भी लिखते हैं. लेकिन मैं आपको यक़ीन दिलाता हूं कि हम आपकी भी रक्षा करेंगे. आप जितना भी ख़राब हमारे बारे में लिखना चाहते हो, लिखो. मगर कांग्रेस पार्टी का ये हाथ आपकी रक्षा करेगा. जब आरएसएस आपको मारेगी, दबाएगी, काटेगी, ये हाथ आपकी रक्षा करेगा. हम लोग आपकी रक्षा करेंगे.

उन्होंने कहा कि ये दो विचारधाराओं की लड़ाई है. हमारी विचारधारा जीतेगी. ये गांधी जी का संगठन है. शेरों का संगठन है. हम किसी से नहीं डरेंगे. सच्चाई की लड़ाई लड़ेंगे. उन्होंने कहा कि मैं पंद्रह साल से राजनीति में हूं. ये आसान नहीं है. झटके लगते हैं, ठोकर लगती है, चोट लगती है, दर्द भी होता है. इससे हम सीखते हैं. हमसे ग़लती होती है, तो हम उसे मान लेते हैं और कहते हैं कि फिर से ग़लती नहीं करेंगे, लेकिन आरएसएस और बीजेपी वाले ग़लती मानते नहीं हैं, किसी की सुनते भी नहीं हैं. पूरी दुनिया कह देगी कि ग़लती की, तो मोदी जी आंसू बहा देंगे, लेकिन ये नहीं मानेंगे कि ग़लती की. मोदी सरकार की नीतियों की वजह से देश बर्बाद हो गया, लेकिन वो लोग ये नहीं मानते.

राहुल गांधी ने कहा कि आज देश में ग़ुस्सा फैलाया जा रहा है. देश को बांटा जा रहा है. हिन्दुस्तान के एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से लड़ाया जा रहा है. हमारा काम जोड़ना का काम है. उन्होंने कांग्रेस के निशान का ज़िक्र करते हुए कहा कि ये जो हाथ का निशान है, यही एक निशान है जो हिन्दुस्तान को जोड़ने का काम कर सकता है. यही एक निशान है, जो इस देश को आगे ले जा सकता है.  इस निशान की जो शक्ति है, वो आपके अंदर है. अगर देश को जोड़ने का काम करना है, तो हम सबको मिलकर, देश की जनता को मिलकर काम करना होगा. उन्होंने कहा कि हम भविष्य की बात कर रहे हैं, बदलाव की बात कर रहे हैं. हमारी परम्पराओं में बदलाव किया जाता है, मगर बीते हुए वक़्त को भूला नहीं जाता है. युवाओं की बात होती है, मगर मैं कहना चाहता हूं कि अगर युवा कांग्रेस पार्टी को आगे ले जाएंगे, तो हमारे अनुभवी नेताओं के बिना कांग्रेस पार्टी आगे नहीं जा सकती. मेरा काम वरिष्ठ नेताओं और युवाओं को जोड़ने का काम है. एक नई दिशा दिखाने का काम है. इसके लिए संगठन में कई बदलाव करने होंगे. पार्टी के मेहनतकश कार्यकर्ताओं को आगे लाना होगा. नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच की दीवार को तोड़ना होगा. इस दीवार के अलग-अलग रूप हैं. एक रूप होता है कि पेराशूट की तरह ऊपर से टिकट लेकर कोई व्यक्ति गिरता है. दूसरा रूप होता है, दस-पंद्रह साल कार्यकर्ता ख़ून-पसीना बहाता है और फिर टिकट से पहले उसको कहा जाता है, भईया, तुम कार्यकर्ता हो, तुम्हारे पास पैसा नहीं है, तुम्हें टिकट नहीं मिलेगा. पर मैं कहता हूं- नहीं-नहीं-, तुम कार्यकर्ता हो, तुम्हारे दिल में कांग्रेस की विचारधारा है, तुम्हें टिकट ज़रूर मिलेगा और गुजरात में हमने छोटा-सा उदाहरण दिया, बड़ा नहीं, छोटा-सा, कांग्रेस पार्टी ने कार्यकर्ताओं को टिकट दिया और नतीजा आपने देखा.

दूसरी दीवार और शायद ये और भी बड़ी दीवार है, मगर ये जो पहली दीवार है, उसे तोड़े बिना वो दूसरी दीवार नहीं तोड़ी जा सकती. वो दीवार है- हिन्दुस्तान के युवाओं और राजनीतिक सिस्टम के बीच की दीवार. युवाओं ने मोदी जी में विश्वास किया, लेकिन वे ठगे गए. नीरव मोदी, ललित मोदी और अमित शाह जी का पुत्र अमेरिका भाग गए.

उन्होंने कहा कि अगर इन दीवारों को तोड़ना है, तो इसके लिए आगे आना होगा. उन्होंने ख़ाली स्टेज की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि ये स्टेज मैंने आपके लिए ख़ाली किया है. अगर हिन्दुस्तान को बदलना है, तो हर जात, हर मज़हब के लड़कों को, लड़कियों को समझना पड़ेगा कि आप ही बदल सकते हो और कोई नहीं बदल सकता. जो लोग हिन्दुस्तान के विज़न को समझते हैं, जिनके दिल में हिन्दुस्तान की आग जलती है, मैं उनसे इस स्टेज को भरूंगा.  आपका हाथ पकड़ कर आपको यहां बिठाऊंगा. मैं सत्तर-अस्सी साल पहले वाली,  महात्मा गांधी जी, जवाहरलाल नेहरू जी, सरदार पटेल जी, मौलाना आज़ाद जी, जगजीवन राम जी वाली कांग्रेस को देखना चाहता हूं. जैसे उन दिनों कांग्रेस पार्टी हुआ करती थी, वैसी ही कांग्रेस पार्टी देखना चाहता हूं. वरिष्ठ नेता हैं, आपकी जगह है, कांग्रेस पार्टी में युवा हैं, आपकी जगह है और कांग्रेस पार्टी के बाहर करोड़ों युवा हैं, आपकी भी जगह है.
हमें मिलकर काम करना है. दुनिया में आज दो विज़न दिखाई दे रहे है. एक अमेरिका का विज़न और दूसरा चीन का विज़न है. मैं चाहता हूं कि दस साल के अंदर एक इंडिया का विज़न भी दिखाई दे जाए. पूरी दुनिया ये कहे कि ये तरीक़ा सबसे अच्छा है. भाईचारे का, अहिंसा का, प्यार का. इसके लिए युवाओं को रोज़गार देना होगा. हर ज़िले में कोई न कोई चीज़ है. उत्तर प्रदेश को लीजिए. कानपुर, मिर्ज़ापुर, मुरादाबाद, कोई भी ज़िला देख लीजिए. स्किल की हिन्दुस्तान में कोई कमी नहीं है, इंटेलिजेंस की हिन्दुस्तान में कोई कमी नहीं है ऊर्जा की कोई कमी नहीं है. कमी एक है, जिसके पास स्किल है, जिसके पास ऊर्जा है, उसके पास बैंक लोन नहीं है, उसके पास टैक्नॊलोजी नहीं है. जो हमारा स्किल का ढांचा है, हर ज़िले में, हम उसे बैंकों के पैसे से और टैक्नॊलोजी से जोड़ने का काम करेंगे.
दूसरी बात, किसान अनाज उगाता है, सब्ज़ी उगाता है. उसका ज़्यादा से ज़्यादा उत्पाद ख़राब हो जाता है. उत्तर प्रदेश की सड़कों पर आलू दिखाई देते हैं. किसान उन्हें फेंक देते हैं. कांग्रेस पार्टी पूरे देश में फ़ूड पार्कों का नेटवर्क फैलाएगी. हर ज़िले में किसान अपना अनाज, अपनी सब्ज़ी, अपना फल सीधा फ़ूड प्रोसेसिंग फ़ैक्ट्री में जाकर बेचेगा. उन्होंने किसानों को यक़ीन दिलाया कि हमारी सरकार आने पर हम आपकी रक्षा करेंगे, दिल से आपकी रक्षा करेंगे और जैसे हमने सत्तर हज़ार करोड़ रुपये का क़र्ज़ माफ़ किया था, वैसे ही ज़रूरत पड़ने पर आपकी मदद करेंगे. तीसरा सबसे बड़ा काम शिक्षा का है. आज व्यापम स्कैम पूरे देश में फैलाया जा रहा है. दिल्ली में युवा धरना दे रहे हैं. प्रश्न पत्र बिकता है. इसे ख़रीदकर परीक्षा देने वाले पूरे देश में फैल रहे हैं.  शिक्षा पर सबका हक़ है. हमारी सरकार आने पर हम देश के कोने-कोने में उच्च शिक्षा की व्यवस्था करेंगे.

उन्होंने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच के फ़र्क़ को बताया. उन्होंने कहा कि कांग्रेस और विपक्ष में क्या फ़र्क़ है, एक सबसे बड़ा फ़र्क़ है- वो क्रोध और ग़ुस्से का प्रयोग करते हैं, हम प्यार प्रयोग करते हैं. हम भाईचारे का प्रयोग करते हैं और चाहे कुछ भी हो जाए, मैं फिर से दोहराना चाहता हूं कि ये देश हम सबका है, हर धर्म का है, हर जात का है. हर व्यक्ति का है और जो भी पार्टी करेगी, वो पूरे देश के लिए करेगी, देश के हर व्यक्ति के लिए करेगी और किसी को पीछे नहीं छोड़ेगी.

गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गांधी के मंदिर जाने पर भारतीय जनता पार्टी ने उन पर ख़ूब तंज़ किए थे. इस बारे में राहुल गांधी ने कहा कि गुजरात का चुनाव हुआ और वहां काफ़ी लोगों ने कहा कि मैं मंदिर जाता हूं. अजीब-सी बात है, क्योंकि मैं सालों से गुजरात चुनाव के बहुत पहले से, अपने दौरों पर मंदिर जाता हूं और मैं सिर्फ़ मंदिर में नहीं जाता हूं, मैं मस्जिद में, गुरुद्वारे में, चर्च में भी जाता हूं. मुझे जब भी कोई बुलाता है, मैं जाता हूं. उन्होंने दो मंदिरों का ज़िक्र करते हुए कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच के फ़र्क़ को बताया. उन्होंने कहा कि मैं आपको दो मंदिरों की कहानी बताता हूं. अपने दौरों पर दो अलग-अलग मंदिरों के पुजारी मिले, जिसमें एक कांग्रेस समर्थक थे और दूसरे भारतीय जनता पार्टी से थे. पहले मंदिर गया, शिव का मंदिर था, पूजा हो रही थी, पंडित जी बैठे थे. पूजा ख़त्म हुई, अलग-अलग चीज़ें थीं. सवाल पूछने की आदत है, तो मैंने पंडित जी से पूछा, गुरुजी आप मुझे बताइए आपने किया क्या? आपने दूध डाला, पानी डाला, मंत्र पढ़े, आपने क्या किया ? उन्होंने कहा कि बेटा समझना चाहता हैं, तो इन सिक्योरिटी वालों को परे कर. सिक्योरिटी वालों को परे किया. उन्होंने कहा कि अच्छा इधर आ, पीछे खड़ा हो जा. मंदिर के पीछे दीवार पर माथा लगा. फिर उन्होंने कहा, तू भगवान ढूंढ रहा है न, तो तुझे भगवान कहीं भी मिल जाएगा. जहां तू देखेगा, वहीं मिल जाएगा. मंदिर में ढूंढ रहा है, तो मंदिर में मिलेगा, चर्च में मिलेगा, गुरुद्वारे में मिलेगा, पेड़-पौधों में मिलेगा, आसमान की शून्यता में मिलेगा, जहां तू देखेगा, तुझे भगवान दिखेगा. ये जो हमने किया, ये हम करते हैं, ये हमें करने दे. अगर तू भगवान ढूंढ रहा है, तो जहां भी तू देखेगा, तुझे भगवान दिखेगा. इसके बाद बिल्कुल वही हालात, वैसा ही शिव मंदिर, वही पूजा वही सवाल. मगर पंडित जी ने सवाल का जवाब देने से मना कर दिया, लेकिन मैं अड़ गया. हम बाहर आ चुके थे. पंडित जी ने कहा कि मैंने तेरे लिए पूजा कर दी है. अब तुम प्रधानमंत्री बनने जा रहे हो, वो छत देख रहे हो. ऐसा करना जब तुम प्रधानमंत्री बन जाओ, तो इस पर सोना लगा देना. मतलब एक व्यक्ति सच्चाई कहता है. हमारा भगवान मंदिर में है, मस्जिद में है, चर्च में है, गुरुद्वारे में है, सब जगह है. हम तो पहले पुजारी की तरह सच के सिपाही हैं.  

उन्होंने कहा कि बीजेपी की राजनीति में बीजेपी का जो धर्म है, वो सिर्फ़ सत्ता को पाने के लिए है. लेकिन हम जनता के लिए लड़ते हैं. हमारे लोगों ने देश के लिए अपना ख़ून दिया है. हम नफ़रत नहीं करते, हम ग़ुस्सा नहीं करते. आप हमें मारे-पीटो, हम आपसे नफ़रत नहीं करेंगे.
उन्होंने कहा कि आज देश मुश्किल में है. किसान कहते हैं कि हम जी नहीं सकते. खेती से आमदनी नहीं होती, आत्महत्या करनी पड़ती है. दूसरी तरफ़ करोड़ों युवा बेरोज़गार हैं, उन्हें रास्ता नहीं दिख रहा है. समझ नहीं आ रहा है कि क्या करें. चार साल पहले इन लोगों ने मोदी जी पर भरोसा किया था, जो अब टूट चुका है. ख़त्म हो चुका है. उन्होंने कहा कि देश में करोड़ों युवा, जो आज थके हुए हैं, जब वे मोदी जी की तरफ़ देखते हैं, तो उन्हें रास्ता दिखाई नहीं देता. उन्हें ये बात समझ नहीं आती कि उन्हें रोज़गार कहां से मिलेगा ? किसानों को उनकी फ़सल का सही दाम कब मिलेगा ? देश एक तरह से थका हुआ है, रास्ता ढूंढ रहा है और मैं दिल से कहता हूं कि देश को सिर्फ़ कांग्रेस पार्टी ही रास्ता दिखा सकती है. उन्होंने कहा कि हम साथ मिलकर काम करें, तो कांग्रेस फिर से जीत सकती है.

ग़ौरतलब है कि 16 से 18 मार्च को आयोजित कांग्रेस के 84वें महाधिवेशन में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री  मनमोहन सिंह, मोती लाल वोरा, गु़लाम नबी आज़ाद, मल्लिकार्जुन खड़गे के अलावा स्टीयरिंग कमेटी के सदस्यों, अंतर्राष्ट्रीय डेलिगेट्स, एआईसीसी सदस्यों, पीसीसी सदस्यों और देश भर से आए पार्टी कार्यकर्ताओं ने शिरकत की और अपने विचार रखे. 

Friday, March 16, 2018

अब भी वक़्त है...

फ़िरदौस ख़ान
मुद्दई सुस्त और गवाह चुस्त. ये कहावत इस वक़्त कांग्रेस के नेताओं और रणनीतिकारों पर बिल्कुल सही बैठ रही है.  पार्टी कार्यकर्ता कांग्रेस को वापस सत्ता में लाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं. जनमानस भी कांग्रेस पर यक़ीन करना चाहता है. मेघालय में जनता ने कांग्रेस को 21 सीटें जिताकर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनाया, लेकिन इसके बावजूद महज़ दो सीटें जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी ने सरकार बनाने के लिए दावा पेश कर दिया. यहां कांग्रेस नैतिक रूप से भले ही चुनाव जीत गई हो, लेकिन रणनीति के लिहाज़ से पार्टी की हार हुई है. भारतीय जनता पार्टी के कारनामों को देखा जाए, तो उसके लिए नैतिकता कोई मायने नहीं रखती. वह सिर्फ़ जीतना चाहती है, भले ही उसके लिए उसे तमाम क़ायदे-क़ानून ताक़ पर ही क्यों न रखने पड़ें. एक कहावत भी है कि मुहब्बत और जंग में सब जायज़ है. ये सियासी जंग है, जिसे वही जीत सकता है, जिसमें जीतने की ख़्वाहिश हो, जीतने का जज़्बा हो. और ये ख़्वाहिश और ये जज़्बा इस वक़्त भारतीय जनता पार्टी में कूट-कूट कर भरा हुआ है.

ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी मेहनत नहीं करते हैं. वे भी दिन-रात मेहनत करते हैं. मीलों पैदल चलते हैं, जनसभाएं करते हैं. ट्वीट कर प्रधानमंत्री से सवाल करते हैं. लेकिन उन्हें मालूम होना चाहिए कि चुनाव जीतने के लिए सिर्फ़ यही काफ़ी नहीं होता. इसके लिए जनता का समर्थन जुटाना होता है. जनसभाओं और रैलियों में महज़ भीड़ इकट्ठी करना ही काफ़ी नहीं है. इस भीड़ को वोटों में भी बदले जाने की ज़रूरत होती है. पिछ्ले कुछ सालों में देश के हालात काफ़ी ख़राब हुए हैं. लगातार बढ़ती महंगाई, नोटबंदी और जीएसटी ने लोगों के काम-धंधे चौपट कर दिए. एक तो पहले ही बेरोज़गारी कम नहीं थी, ऊपर से जो लोग काम में लगे थे, वे भी घर बैठ गए. सांप्रदायिक और जातिगत संघर्ष ने भी माहौल को ख़राब करने का काम किया. इतना ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी जिन वादों के बूते सत्ता में आई थी, उसे भी उसने तिलांजली दे दी. ऐसे में कांग्रेस के पास मुद्दों की कमी नहीं है. कांग्रेस को देशभर में एक जन आंदोलन चलाना चाहिए. इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के मामले में भी कांग्रेस ख़ामोशी अख़्तियार किए हुए है.  कांग्रेस जिस तरह घोटालों का विरोध कर रही है, उसे इसी तरह महंगाई व अन्य मुद्दों को लेकर जनता के बीच बने रहना चाहिए.

चुनाव में बहुमत न मिले, तो सरकार बनाने के लिए गठबंधन की ज़रूरत होती है. चुनाव से पहले ही इसके लिए तैयारी कर लेनी चाहिए. सियासत में एक-एक पल बेशक़ीमती हुआ करता है, इसलिए बहुत ही चौकस रहने की ज़रूरत होती है. जब मुक़ाबला किसी भारतीय जनता पार्टी से हो, तो और भी होशियार रहने की ज़रूरत होती है. राहुल गांधी अच्छे से जानते हैं कि उनका मुक़ाबला किससे है. उन्होंने ख़ुद कहा है कि भारतीय जनता पार्टी मणिपुर और गोवा की तरह मेघालय में जनादेश को अनदेखा करते हुए ग़लत तरीक़े से सरकार बना रही है. महज़ दो सीटों के साथ भारतीय जनता पार्टी ने परोक्ष ढंग से मेघालय में सत्ता हथिया ली. भारतीय जनता पार्टी का यह रवैया लोगों के जनादेश के प्रति घोर असम्मान दिखाता है. भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता हथियाने की भूख और अवसरवादी गठबंधन बनाने के लिए धन का इस्तेमाल किया है.

सियासी लिहाज़ से ऐसे नाज़ुक वक़्त में राहुल गांधी अपनी नानी के घर चले गए. बेहतर होता कि वे कुछ दिन बाद इटली जाते. वे यहीं रहकर पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ, पार्टी समर्थकों के साथ होली का त्यौहार मनाते और हर सियासी उठापटक़ पर नज़र रखते. मेघालय में सही रणनीति बनाई गई होती, गठबंधन किया होता, तो पार्टी की सरकार बन सकती थी. कांग्रेस ने जीत के बाद मणिपुर और गोवा की सत्ता गंवाने के बाद भी सबक़ नहीं लिया. ऐसे वक़्त में राहुल गांधी का कार्यकर्ताओं के बीच होना बेहद ज़रूरी था, ताकि कार्यकर्ताओं का मनोबल कमज़ोर न पड़े.

त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय की हार सिर्फ़ राहुल गांधी की ही शिकस्त नहीं है, बल्कि यह पूरी पार्टी की हार है, ख़ासकर कांग्रेस के रणनीतिकारों की हार है. कांग्रेस के पास या यूं कहें कि राहुल गांधी को ऐसे रणनीतिकारों की बेहद ज़रूरत है, जो हालात पर पैनी नज़र रख सकें. जो जनमानस के बीच कांग्रेस को मज़बूत करने का काम कर सकें, जो भीड़ को वोटों में बदलने के फ़न में माहिर हों, जो विरोधियों की हर चाल को समझ सकें और उसे मात दे सकें. लोकसभा चुनाव को बहुत ज़्यादा वक़्त नहीं बचा है. इस साल के आख़िर में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव होने हैं. अगर कांग्रेस अब भी पूरी ताक़त झोंक दे, तो कामयाबी उसके क़दम चूम सकती है.

बेशक, राहुल गांधी एक अच्छे इंसान हैं. वे लोगों से मिलते हैं, उनके सुख-दुख में शरीक होते हैं. मंदिरों में पूजा-पाठ करते हैं, मज़ारों पर चादरें चढ़ाते हैं. वे हर काम चुनावी फ़ायदे के लिए नहीं करते. लोगों से मिलना-जुलना और उनके सुख-दुख में शामिल होना, उसके स्वभाव में शामिल है. ये कांग्रेस के लिए फ़क्र की बात है कि उन्हें एक सच्चा नेता मिला है, लेकिन सियासत में सच्चाई और अच्छाई के साथ सही रणनीति की भी ज़रूरत होती है. ये बात कांग्रेस ख़ासकर राहुल गांधी को समझनी होगी.

Thursday, March 15, 2018

सीलिंग का क़हर बरपा

फ़िरदौस ख़ान
देश की राजधानी दिल्ली में जिस तेज़ी से आबादी बढ़ रही है, उस हिसाब से बुनियादी सुविधाओं को जुटाना कोई आसान काम नहीं है. इस आबादी में देश के अन्य राज्यों से आए लोगों की भी एक बड़ी संख्या है. आबादी को रहने के लिए घर चाहिए, रोज़गार चाहिए, बिजली-पानी चाहिए, शैक्षिक, स्वास्थ्य व परिवहन की सुविधाएं चाहिएं. यानी घर-परिवार के लिए सभी बुनियादी सुविधाएं चाहिएं. जनता को ये सब सुविधाएं मुहैया कराने की ज़िम्मेदारी सरकार की है, प्रशासन की है. इसके लिए एक योजना की ज़रूरत होती है, एक मास्टर प्लान की ज़रूरत होती है. किसी भी शहर के सतत योजनाबद्ध विकास का मार्गदर्शन करने के लिए एक योजना होती है. इस मास्टर प्लान को बनाते वक़्त इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि जिस समयावधि के लिए यह बनाया जा रहा है, उस वक़्त शहर की आबादी कितनी होगी और उसकी ज़रूरतें क्या-क्या होंगी.  मास्टर प्लान 2021 भी एक ऐसी ही योजना है, जिसके मुताबिक़ दिल्ली को एक ऐसा विश्वस्तरीय शहर बनाना है, जिसमें यहां के बाशिन्दों को तमाम सुविधाएं मुहैया हो सकें.

ग़ौरतलब है कि देश की राजधानी दिल्ली पिछले दिसम्बर माह से सीलिंग के साये में है. सुप्रीम कोर्ट की मॉनिटरिंग कमेटी के आदेश पर राजधानी में सीलिंग का काम चल रहा है. इस सीलिंग की वजह यही मास्टर प्लान 2021 है.  ये मास्टर प्लान साल 2001 में आ जाना चाहिए था, लेकिन वह छह साल बाद 2007 में आया. दिल्ली विकास प्राधिकरण के मुताबिक़ हर पांच साल के बाद इस प्लान की समीक्षा की जानी थी. इसके तहत साल 2012 के शुरू माह जनवरी में इसमें बदलाव के लिए जनता से सुझाव मांगे गए थे. इस सुझावों के हिसाब से मैनेजमेंट एक्शन कमेटी का भी गठन किया गया. सुझावों को अमल में लाने के लिहाज़ से इनका विश्लेषण किया गया. इसी के आधार पर मास्टर प्लान में बदलाव किया गया. इसे दिल्ली विकास प्राधिकरण ने पास भी कर दिया. दिल्ली विकास प्राधिकरण के इस मास्टर प्लान में 18 क्षेत्रों पर ध्यान केन्द्रित किया गया है, जिनमें भू-नीति, सार्वजनिक भागीदारी और योजना के कार्यान्वयन, पुनर्विकास, आश्रय, ग़रीबों के लिए आवास, पर्यावरण, अनधिकृत कॉलोनियों, मिश्रित उपयोग विकास, व्यापार और वाणिज्य, अनौपचारिक क्षेत्र, उद्योग, विरासत का संरक्षण, परिवहन, स्वास्थ्य, शैक्षणिक व खेल सुविधाएं, आपदा प्रबंधन आदि शामिल हैं.

दिल्ली विकास प्राधिकरण के मुताबि़क साल 2021 तक दिल्ली की आबादी 225 लाख तक पहुंच जाएगी.  मास्टर प्लान के हिसाब से इसे 220 लाख से कम रखने की कोशिश की जाएगी. यह योजना इस आबादी को घर बनाने के लिए  एक तीन-आयामी रणनीति को अपनाने पर ज़ोर देती है. इसके तहत लोगों को उपनगरों में स्थानांतरित करने के लिए प्रोत्साहित करना, शहर की सीमा का विस्तार और मौजूदा क्षेत्रों की आबादी-धारण क्षमता को बढ़ाकर उनका पुनर्विकास किया जाएगा. इसके अलावा सरकार के मालिकाना हक़ वाली ख़ाली ज़मीनों का इस्तेमाल किया जाएगा. साल साल 2021 तक 60 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों की तादाद 24 लाख से ज़्यादा होने की उम्मीद है और वह कुल आबादी का 10.7 फ़ीसद हिस्सा होगा.  ऐसे में उनके लिए भी विशेष सुविधाओं की ज़रूरत होगी.  ग़ौरतलब है कि जब 2005 में सार्वजनिक सुझावों को आमंत्रित करने के लिए ड्राफ़्ट को अधिसूचित किया गया था, तब उसे सात हज़ार आपत्तियां और सुझाव मिले थे, जबकि 611 लोगों और संगठनों को इस पर व्यक्तिगत सुनवाई दी गई थी. केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने साल 2007 में इस योजना के मौजूदा रूप को मंज़ूरी दे दी थी.  इलाक़ों के विकास के लिए नियम शहर के अन्य इलाक़ों से अलग होंगे. इसके मुताबिक़ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में कोई नया केंद्रीय और सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम कार्यालय नहीं बनाया जाएगा. दिल्ली में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या आबादी में बढ़ोतरी, शहरीकरण, जीवन शैली और उपभोग के तरीक़े और यहां से निकलने वाले कचरे से निपटने के लिए लैंडफ़िल की स्थापना का प्रस्ताव भी किया गया है. आवास के लिए बने इलाक़ों में ग़ैर-रिशायशी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए, योजनाओं में एक मिश्रित उपयोग नीति की परिकल्पना की गई है, जो दिल्ली को बेहतर शहर बनाने में मदद करेगी. हालांकि लुटियन के बंगला ज़ोन, सिविल लाइंस बंगला ज़ोन, सरकारी आवास, सार्वजनिक और निजी एजेंसियों की संस्थागत, स्टाफ़ आवास और विरासत संरक्षण समिति द्वारा सूचीबद्ध इमारतों, परिसरों में मिश्रित उपयोग की अनुमति नहीं दी गई है.

सीलिंग को लेकर राजधानी में क़हर बरपा है. भारतीय जनता पार्टी और सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के नेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं. आम आदमी पार्टी के विधायक सौरभ भारद्वाज का कहना है कि सीलिंग की एक वजह फ़्लोर एरिया रेशियो भी है, जिसे मास्टर प्लान-2021 में संशोधन करके बढ़ाया जा सकता है और सीलिंग को रोका जा सकता है. चूंकि मास्टर प्लान-2021 दिल्ली विकास प्राधिकरण का है, इसीलिए वही इसमें संशोधन कर सकता है. दिल्ली विकास प्राधिकरण भारतीय जनता पार्टी शासित केंद्र सरकार के अधीन आता है और उपराज्यपाल ही इसकी अध्यक्षता करते हैं. इसका दिल्ली सरकार के शहरी विकास विभाग से कोई लेना-देना नहीं है.
दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का आरोप है कि सीलिंग अभियान के ज़रिये भारतीय जनता पार्टी दिल्ली में खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) के लिए रास्ता बनाना चाहती है.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का कहना है कि दिल्ली में सीलिंग के मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप का नाटक बंद कर देना चाहिए. भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी की मिलीभगत और फ़र्ज़ी लड़ाई में व्यापारियों को बहुत नुक़सान हो रहा है. दोनों पार्टियों को राजनीतिक रोटी सेंकने के बजाय इस समस्या का जल्द से जल्द समाधान निकालना चाहिए.

केंद्रीय आवास एवं शहरी विकास मंत्री हरदीप सिंह पुरी का कहना है कि सीलिंग का हल ढूंढ लिया गया है. इस बाबत जल्द ही सर्वोच्च न्यायालय में एक हल्फ़नामा दाख़िल किया जाएगा. इसमें मास्टर प्लान में संशोधन के क़ानूनी अधिकारों का का इस्तेमाल किया गया है. अगर सर्वोच्च न्यायालय मान जाता है, तो सीलिंग का मसला हल हो सकता है. इसके साथ ही दिल्ली सरकार द्वारा मिक्स लैंड यूज़ वाली 351 सड़कें भी जल्द ही अधिसूचित कर दी जाएंगी. ख़ैर, सीलिंग रोकने की नूराकुश्ती जारी है, लेकिन यह इतना आसान नहीं है.

बहरहाल, सीलिंग की वजह से काराबोर ठप होकर रह गया है. बड़े व्यापारियों का तो नुक़सान हो ही रहा है, वहीं सड़क के किनारे बैठकर सामान बेचने वाले लोग भी परेशान हैं. दुकानों पर काम करने वाले लोग भी ख़ाली घूम रहे हैं. उनके समक्ष रोज़ी-रोटी का संकट अपिदा हो गया है. कंफ़ेडरेशन ऑफ़ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने दिल्ली बाज़ार बंद का आह्वान किया था. इसके अलावा एक अन्य कारोबारी संगठन चैंबर ऑफ़ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने भी अलग से बाज़ार बंद की घोषणा की थी.

क़ाबिले-ग़ौर है कि व्यापारियों के सामने सीलिंग की आज जो सबसे बड़ी समस्या पैदा हो गई है, उसके लिए पूरी तरह से सरकार ही ज़िम्मेदार है. साल 1962 में राजधानी के लिए एक मास्टर प्लान बनाया गया था, लेकिन उस पर सहे तरीक़े से अमल नहीं किया गया. इसलिए लोगों को जहां जगह मिली, वे वहां मकान और दुकानें बनाते चले गए. यह काम कोई एक दिन में तो हुआ नहीं है, इसमें बरसों लग गए. दिल्ली नगर निगम और दिल्ली विकास प्राधिकरण की नाकामी की वजह से उतने व्यापारिक परिसर नहीं बन पाए, जितने बनने चाहिए थे. मास्टर प्लान 1962 पूरा हो नहीं पाया था कि उसके बाद मास्टर प्लान 1981 आ गया, जो नौ साल बाद 1990 में अमल में आया. फिर एक लम्बी जद्दो-जहद के बाद मास्टर प्लान 1921 आया. आज इसी मास्टर प्लान की वजह से दिल्ली के व्यापारिक प्रतिष्ठान सीलिंग के साये में हैं.

Sunday, March 11, 2018

ऐसी बानी बोलिए

फ़िरदौस ख़ान
कहते हैं, ज़बान शीरी, तो मुल्कगिरी यानी जिसकी ज़बान में मिठास होती है, वो मुल्क पर हुकूमत करता है. भाषा का दरख़्त दिल में उगता है और ज़ुबान से फल देता है. जैसा दरख़्त होगा, वैसे ही उसके फल होंगे.  इंसान की पहचान ग़ुस्से की हालत में ही होती है यानी ग़ुस्से में वह सब कह देता है, बोल देता है, जो उसके दिल में होता है, ग़ुस्से में इंसान का अपने दिमाग़ पर क़ाबू नहीं होता. किसी भी इंसान की भाषा उसके किरदार का आईना हुआ करती है. उसकी भाषा से, उसके शब्दों से न सिर्फ़ उसके विचारों का पता चलता है, बल्कि उसके संस्कार भी प्रदर्शित हो जाते हैं. अच्छे लोग, संस्कारी लोग ग़ुस्से में भी अपशब्दों को इस्तेमाल नहीं करते. 

दरअसल, भाषा एक आग है. वह सभ्यता की बुनियाद है, तो बर्बादी की जड़ भी है. भाषा बहता शीतल जल भी है, जो वीरानों को आबाद कर देता है, उनमें फूल खिला देता है. भाषा सैलाब भी है, जो अपने साथ न जाने कितनी आबादियां बहा ले जाता है. ख़ुशहाल बस्तियों को वीरानियों में बदल देता है. ये इंसान के अपने हाथ में है कि वह भाषा रूपी इस आग का, इस पानी का किस तरह इस्तेमाल करता है. ये भाषा ही तो है, जो दोस्तों को दुश्मन बना देती है और दुश्मनों को दोस्त बना लेती है. ये भाषा ही तो है, जिसके ज़ख़्म कभी नहीं भरते, हमेशा हरे रहते हैं, जबकि बड़े से बड़े ज़ख़्म भर जाते हैं, तीर-तलवार के ज़ख़्म भी वक़्त के साथ कभी न कभी भर जाया करते हैं.

भारत जैसे देश में जहां पत्थर तक को पूजा जाता है, तिलक लगाकर उसका अभिनंदन किया जाता है,  जहां कण-कण में ईश्वर के अस्तित्व को माना जाता है, वहां अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल हज़ारों बरसों की संस्कृति पर कुठाराघात करता है. बेशक हमारा भारत एक लोकतांत्रिक देश है. और किसी भी लोकतांत्रिक देश में, प्रजातांत्रिक देश में सबको अपनी बात कहने की आज़ादी होती है, अपने विचारों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता होती है. लोकतंत्र के नाम पर, प्रजातंत्र के नाम पर, अभिव्यक्ति के नाम पर क्या किसी व्यक्ति को किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में अपशब्द बोलने की आज़ादी दी जा सकती है ? क़तई नहीं, क्योंकि ऐसा करना सामाजिक अपराध माना जाएगा. अपशब्दों के ज़रिये किसी का चरित्र हनन करना, किसी के मान-सम्मान को चोट पहुंचाना, किसी भी सूरत में सही नहीं कहा जा सकता. इस बारे में कोई भी दलील काम नहीं करेगी. ठीक है, आपको किसी से शिकायत है, किसी से नाराज़गी है, आप किसी से ग़ुस्सा हैं, तो आप सभ्य भाषा में भी अपनी बात रख सकते हैं. 

यह बेहद अफ़सोस और शर्म की बात है कि भारतीय राजनीति में अमर्यादा का समावेश होता जा रहा है. जहां सत्ता हासिल करने के लिए राजनेता साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल कर रहे हैं, वहीं भाषा के मामले भी रसातल में जा रहे हैं. राजनेताओं की भाषा दिनोदिन अमर्यादित होती जा रही है. ताज़ा मिसाल भारतीय जनता पार्टी में देखने को मिली है. हुआ यूं कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जब पंजाब नेशनल बैंक के घोटाले पर सवाल दाग़े, तो भारतीय जनता पार्टी के सांसद ब्रज भूषण शरण ने उनके बारे में विवादित बयान दिया. उन्होंने राहुल गांधी के बारे में न सिर्फ़ विवादित बयान दिया, बल्कि अपशब्दों का इस्तेमाल तक कर डाला. इससे पहले इसी पार्टी की केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल किया था. ख़बरों के मुताबिक़  मेनका गांधी ने बहेड़ी में जनता दरबार लगाया था.  इस दौरान वह आग बबूला हो गईं और उन्होंने अधिकारियों को जनता के सामने ही डांट-फटकार लगाई. वह यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने एक इंस्पेक्टर से उसके मोटापे पर अभद्र टिप्पणी करते हुए कहा कि उसकी कोई इज़्ज़त नहीं है. वह एक बुरा आदमी है और उसकी आमदनी से ज़्यादा संपत्ति की जांच कराई जाएगी.

यह कोई पहला मामला नहीं है, जब चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इस तरह अमर्यादित व्यवहार किया है. ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ़ भारतीय जनता पार्टी के नेता ही अमर्यादित और विवादित बयान देते हैं, इस मामले में इस मामले में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी आदि के नेता भी पीछे नहीं हैं. कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में फ़र्क़ ये है कि कांग्रेस का कोई नेता विवादित बयान देता है, तो पार्टी उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करती है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में विवादित बयान दिया, तो कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया. हालांकि मणिशंकर अय्यर ने इसके लिए माफ़ी भी मांग ली थी और कहा था कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं था. अनुवाद की ग़लती की वजह से ऐसा हुआ. राहुल गांधी कहते हैं कि कांग्रेस के संस्कार ऐसे नहीं हैं कि वह किसी के बारे में अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करे. हम कांग्रेसी हैं और किसी भी हालत में अपने संस्कार नहीं छोड़ सकते. 

इसके बरअक्स भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक हैं, जो आए-दिन विवादित और अमर्यादित बयान देते रहते हैं. बयानों पर हंगामा होने के बाद माफ़ी मांगना तो दूर की बात है, वे कुतर्कों से अपने बयानों को सही ठहराने में जुट जाते हैं. पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भारतीय सेना के बारे में विवादित बयान दिया था. इससे पहले भी वह इस तरह के विवादित बयान देते रहे हैं. विवादित बयानो के मामले में भारतीय जनता पार्टी से जुड़े साधु-संत भी पीछे नहीं हैं. इस मामले में साध्वियां भी कम नहीं हैं. उनके विवादित बयान भी सुर्ख़ियों में रहते हैं.

आख़िर क्यों कोई अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करता है. क्या सहनशीलता नाम की कोई चीज़ बाक़ी नहीं रह गई है कि लोग अपनी ज़रा सी आलोचना भी सहन नहीं कर पाते. जीवन में सबकुछ अपनी मर्ज़ी का तो नहीं हो सकता. सृष्टि की तरह ही जीवन के भी दो पहलू हैं, दो पक्ष हैं. हमारी संस्कृति में तो निंदक नियरे रखने की बात कही गई है. संत कबीर कहते हैं-
निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय 
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय
यानी जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने ज़्यादा से ज़्यादा करीब रखना चाहिए. वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बताकर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है.

यह बेहद चिंता का विषय है कि सियासत में भाषाई मर्यादा ख़त्म होने लगी है. देश के प्रधानमंत्री से लेकर कार्यकर्ता तक सब ऐसी भाषा इस्तेमाल करने लगे हैं, जिसे किसी भी हाल में सभ्य नहीं कहा जा सकता. देश में ऊंचे ओहदों पर बैठे लोगों को कम से कम अपने ओहदे का ही ख़्याल कर लेना चाहिए.  
शायद ऐसे ही लोगों के लिए संत कबीर कह गए हैं-
ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय 
औरन को शीतल करै, आपहु शीतल होय