Friday, January 29, 2016

राहुल गांधी ने ज़ियारत की

फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कल रात हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की ज़ियारत की. राहुल गांधी सबसे पहले उर्स महल गए, जहां उन्होंने क़व्वाली सुनी.
उर्स में राहुल गांधी के सिर पर हरे रंग का साफ़ा बांधा गया और गले में गुलाबी रंग का दुपट्टा डाला गया. इसके बाद वह हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर गए. उन्होंने उन्होंने मज़ार पर चादर चढ़ाई और फूल चढ़ाकर दुआ मांगी.
ग़ौरतलब है कि 30 जनवरी तक चलने वाले 712वें उर्स 27 जनवरी शुरू को हुआ था. दुनियाभर से ज़ायरीन उर्स में शिरकत के लिए आते हैं.

Wednesday, January 27, 2016

हक़


इंसान सोचता है कि वह दुखी है, परेशान है, तकलीफ़ में है... अगर वो उन लोगों को देख ले, जिनके सर पर छत होना तो दूर की बात है, उनके पास पेटभर खाना तक नहीं है, पीने के लिए साफ़ पानी तक नहीं है... य़क़ीनन उसे लगेगा कि वाक़ई वो बहुत ख़ुशहाल है...
इस दुनिया में जब तक एक भी इंसान भूखा है, बेघर है, हक़ीक़त में तब तक हम इंसान कहलाने के लायक़ नहीं हुए हैं...हमें इंसान बनना है अभी... हमारे खाने में, हमारी चीज़ों में उन लोगों का भी हक़ बनता है, जो बुनियादी ज़रूरत की चीज़ों से महरूम हैं... हमें उनक़ा हक़ देना ही चाहिए...
फ़िरदौस ख़ान

Sunday, January 17, 2016

जान हमने भी गंवाई है वतन की ख़ातिर...


फ़िरदौस ख़ान
'कुछ लोगों' की वजह से पूरी मुस्लिम क़ौम को शक की नज़र से देखा जाने लगा है... इसके लिए जागरूक मुसलमानों को आगे आना होगा... और उन बातों से परहेज़ करना होगा जो मुसलमानों के प्रति 'संदेह' पैदा करती हैं... कोई कितना ही झुठला ले, लेकिन यह हक़ीक़त है कि हिन्दुस्तान के मुसलमानों ने भी देश के लिए अपना खू़न और पसीना बहाया है. हिन्दुस्तान मुसलमानों को भी उतना ही अज़ीज़ है, जितना किसी और को... यही पहला और आख़िरी सच है... अब यह मुसलमानों का फ़र्ज़ है कि वो इस सच को 'सच' रहने देते हैं... या फिर 'झूठा' साबित करते हैं...

इस देश के लिए मुसलमानों ने अपना जो योगदान दिया है, उसे किसी भी हालत में नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता. कितने ही शहीद ऐसे हैं, जिन्होंने देश के लिए अपनी जान तक कु़र्बान कर दी, लेकिन उन्हें कोई याद तक नहीं करता. हैरत की बात यह है कि सरकार भी उनका नाम तक नहीं लेती. इस हालात के लिए मुस्लिम संगठन भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं. वे भी अपनी क़ौम और वतन से शहीदों को याद नहीं करते.

हमारा इतिहास मुसलमान शहीदों की कु़र्बानियों से भरा पड़ा है. मसलन, बाबर और राणा सांगा की लड़ाई में हसन मेवाती ने राणा की ओर से अपने अनेक सैनिकों के साथ युध्द में हिस्सा लिया था. झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की दो मुस्लिम सहेलियों मोतीबाई और जूही ने आख़िरी सांस तक उनका साथ निभाया था. रानी के तोपची कुंवर गु़लाम गोंसाई ख़ान ने झांसी की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहूति दी थी. कश्मीर के राजा जैनुल आबदीन ने अपने राज्य से पलायन कर गए हिन्दुओं को वापस बुलाया और उपनिषदों के कुछ भाग का फ़ारसी में अनुवाद कराया. दक्षिण भारत के शासक इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय ने सरस्वती वंदना के गीत लिखे. सुल्तान नाज़िर शाह और सुल्तान हुसैन शाह ने महाभारत और भागवत पुराण का बंगाली में अनुवाद कराया. शाहजहां के बड़े बेटे दारा शिकोह ने श्रीमद्भागवत और गीता का फ़ारसी में अनुवाद कराया और गीता के संदेश को दुनियाभर में फैलाया.

गोस्वामी तुलसीदास को रामचरित् मानस लिखने की प्रेरणा कृष्णभक्त अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना से मिली. तुलसीदास रात को मस्जिद में ही सोते थे. 'जय हिन्द' का नारा सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज के कप्तान आबिद हसन ने 1942 में दिया था, जो आज तक भारतीयों के लिए एक मंत्र के समान है. यह नारा नेताजी को फ़ौज में सर्वअभिनंदन भी था.

छत्रपति शिवाजी की सेना और नौसेना के बेड़े में एडमिरल दौलत ख़ान और उनके निजी सचिव भी मुसलमान थे. शिवाजी को आगरे के क़िले से कांवड़ के ज़रिये क़ैद से आज़ाद कराने वाला व्यक्ति भी मुसलमान ही था. भारत की आज़ादी के लिए 1857 में हुए प्रथम गृहयुध्द में रानी लक्ष्मीबाई की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उनके पठान सेनापतियों जनरल गुलाम ग़ौस ख़ान और ख़ुदादा ख़ान की थी. इन दोनों ही शूरवीरों ने झांसी के क़िले की हिफ़ाज़त करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए. गुरु गोबिन्द सिंह के गहरे दोस्त सूफ़ी बाबा बदरुद्दीन थे, जिन्होंने अपने बेटों और 700 शिष्यों की जान गुरु गोबिन्द सिंह की रक्षा करने के लिए औरंगंज़ेब के साथ हुए युध्दों में कु़र्बान कर दी थी, लेकिन कोई उनकी क़ुर्बानी को याद नहीं करता. बाबा बदरुद्दीन का कहना था कि अधर्म को मिटाने के लिए यही सच्चे इस्लाम की लड़ाई है.

अवध के नवाब तेरह दिन होली का उत्सव मनाते थे. नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में श्रीकृष्ण के सम्मान में रासलीला का आयोजन किया जाता था. नवाब वाजिद शाह अली ने ही अवध में कत्थक की शुरुआत की थी, जो राधा और कृष्ण के प्रेम पर आधारित है. प्रख्यात नाटक 'इंद्र सभा' का सृजन भी नवाब के दरबार के एक मुस्लिम लेखक ने किया था. भारत में सूफ़ी पिछले आठ सौ बरसों से बसंत पंचमी पर 'सरस्वती वंदना' को श्रध्दापूर्वक गाते आए हैं. इसमें सरसों के फूल और पीली चादर होली पर चढ़ाते हैं, जो उनका प्रिय पर्व है. महान कवि अमीर ख़ुसरो ने सौ से भी ज़्यादा गीत राधा और कृष्ण को समर्पित किए थे. अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की बुनियाद मियां मीर ने रखी थी. इसी तरह गुरु नानकदेव के प्रिय शिष्य व साथी मियां मरदाना थे, जो हमेशा उनके साथ रहा करते थे. वह रबाब के संगीतकार थे. उन्हें गुरुबानी का प्रथम गायक होने का श्रेय हासिल है. बाबा मियां मीर गुरु रामदास के परम मित्र थे. उन्होंने बचपन में रामदास की जान बचाई थी. वह दारा शिकोह के उस्ताद थे. रसखान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्तों में से एक थे जैसे भिकान, मलिक मोहम्मद जायसी आदि. रसखान अपना सब कुछ त्याग कर श्रीकृष्ण के प्रेम में लीन हो गए. श्रीकृष्ण की अति सुंदर रासलीला रसखान ने ही लिखी. श्रीकृष्ण के हज़ारों भजन सूफ़ियों ने ही लिखे, जिनमें भिकान, मलिक मोहम्मद जायसी, अमीर ख़ुसरो, रहीम, हज़रत सरमाद, दादू और बाबा फरीद शामिल हैं. बाबा फ़रीद की लिखी रचनाएं बाद में गुरु ग्रंथ साहिब का हिस्सा बनीं.

बहरहाल, मुसलमानों को ऐसी बातों से परहेज़ करना चाहिए, जो उनकी पूरी क़ौम को कठघरे में खड़ा करती हैं...
जान हमने भी गंवाई है वतन की ख़ातिर
फूल सिर्फ़ अपने शहीदों पे चढ़ाते क्यों हो...

Saturday, January 16, 2016

इंसान जो बोता है, वही काटता है


इंसान जो बोता है, वही काटता है... कुछ अरसा पहले एक परेशान हाल लड़की ने हमसे कहा था कि उसके वालिद और उसके भाई ने न जाने कितनी लड़कियों की ज़िन्दगी बर्बाद की है... ये उनकी बददुआओं का ही नतीजा है कि आज उसकी और उसकी बहनें तकलीफ़ में हैं, उनकी ज़िन्दगी बर्बाद है...
काश ! लोग दूसरों की बहन-बेटियों के साथ बुरा बर्ताव करने से पहले एक नज़र अपनी बहन-बेटियों पर भी डाल लिया करें... आज वो जो बर्ताव दूसरों की बहन-बेटियों के साथ कर रहे हैं, कल को कोई दूसरा वही सुलूक उनकी बहन-बेटियों के साथ भी कर सकता है...
फ़िरदौस ख़ान

Friday, January 1, 2016

सुनने की फ़ुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में...

फ़िरदौस ख़ान
ये कहानी है दिल्ली के ’शहज़ादे’ और हिसार की ’शहज़ादी’ की. उनकी मुहब्बत की. गूजरी महल की तामीर का तसव्वुर सुलतान फ़िरोज़शाह तुगलक़ ने अपनी महबूबा के रहने के लिए किया था...शायद यह किसी भी महबूब का अपनी महबूबा को परिस्तान में बसाने का ख़्वाब ही हो सकता था और जब गूहरी महल की तामीर की गई होगी...तब इसकी बनावट, इसकी नक्क़ाशी और इसकी ख़ूबसूरती को देखकर ख़ुद भी इस पर मोहित हुए बिना न रह सका होगा...
हरियाणा के हिसार क़िले में स्थित गूजरी महल आज भी सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की अमर प्रेमकथा की गवाही दे रहा है. गूजरी महल भले ही आगरा के ताजमहल जैसी भव्य इमारत न हो, लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि प्रेम पर आधारित है. ताजमहल मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज़ की याद में 1631 में बनवाना शुरू किया था, जो 22 साल बाद बनकर तैयार हो सका. हिसार का गूजरी महल 1354 में फ़िरोज़शाह तुग़लक ने अपनी प्रेमिका गूजरी के प्रेम में बनवाना शुरू किया, जो महज़ दो साल में बनकर तैयार हो गया. गूजरी महल में काला पत्थर इस्तेमाल किया गया है, जबकि ताजमहल बेशक़ीमती सफ़ेद संगमरमर से बनाया गया है. इन दोनों ऐतिहासिक इमारतों में एक और बड़ी असमानता यह है कि ताजमहल शाहजहां ने मुमताज़ की याद में बनवाया था. ताज एक मक़बरा है, जबकि गूजरी महल फ़िरोज़शाह तुग़लक ने गूजरी के रहने के लिए बनवाया था, जो महल ही है.
गूजरी महल की स्थापना के लिए बादशाह फ़िरोज़शाह तुग़लक ने क़िला बनवाया. यमुना नदी से हिसार तक नहर लाया और एक नगर बसाया. क़िले में आज भी दीवान-ए-आम, बारादरी और गूजरी महल मौजूद हैं. दीवान-ए-आम के पूर्वी हिस्से में स्थित कोठी फ़िरोज़शाह तुग़लक का महल बताई जाती है. इस इमारत का निचला हिस्सा अब भी महल-सा दिखता है. फ़िरोज़शाह तुग़लक के महल की बंगल में लाट की मस्जिद है. अस्सी फ़ीट लंबे और 29 फ़ीट चौड़े इस दीवान-ए-आम में सुल्तान कचहरी लगाता था. गूजरी महल के खंडहर इस बात की निशानदेही करते हैं कि कभी यह विशाल और भव्य इमारत रही होगी.
सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की प्रेमगाथा बड़ी रोचक है. हिसार जनपद के ग्रामीण इस प्रेमकथा को इकतारे पर सुनते नहीं थकते. यह प्रेम कहानी लोकगीतों में मुखरित हुई है. फ़िरोज़शाह तुग़लक दिल्ली का सम्राट बनने से पहले शहज़ादा फ़िरोज़ मलिक के नाम से जाने जाते थे. शहज़ादा अकसर हिसार इलाक़े के जंगल में शिकार खेलने आते थे. उस वक्त यहां गूजर जाति के लोग रहते थे. दुधारू पशु पालन ही उनका मुख्य व्यवसाय था. उस काल में हिसार क्षेत्र की भूमि रेतीली और ऊबड़-खाबड़ थी. चारों तरफ़ घना जंगल था. गूजरों की कच्ची बस्ती के समीप पीर का डेरा था. आने-जाने वाले यात्री और भूले-भटके मुसाफ़िरों की यह शरणस्थली थी. इस डेरे पर एक गूजरी दूध देने आती थी. डेरे के कुएं से ही आबादी के लोग पानी लेते थे. डेरा इस आबादी का सांस्कृतिक केंद्र था.
एक दिन शहज़ादा फ़िरोज़ शिकार खेलते-खेलते अपने घोड़े के साथ यहां आ पहुंचा. उसने गूजर कन्या को डेरे से बाहर निकलते देखा तो उस पर मोहित हो गया. गूजर कन्या भी शहज़ादा फ़िरोज़ से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. अब तो फ़िरोज़ का शिकार के बहाने डेरे पर आना एक सिलसिला बन गया. फिरोज़ ने गूजरी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा तो उस गूजर कन्या ने विवाह की मंजरी तो दे दी, लेकिन दिल्ली जाने से यह कहकर इंकार कर दिया कि वह अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़कर नहीं जा सकती. फ़िरोज़ ने गूजरी को यह कहकर मना लिया कि वह उसे दिल्ली नहीं ले जाएगा.
1309 में दयालपुल में जन्मा फ़िरोज़ 23 मार्च 1351 को दिल्ली का सम्राट बना. फ़िरोज़ की मां हिन्दू थी और पिता तुर्क मुसलमान था. सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक ने इस देश पर साढ़े 37 साल शासन किया. उसने लगभग पूरे उत्तर भारत में कलात्मक भवनों, किलों, शहरों और नहरों का जाल बिछाने में ख्याति हासिल की. उसने लोगों के लिए अनेक कल्याणकारी काम किए. उसके दरबार में साहित्यकार, कलाकार और विद्वान सम्मान पाते थे.
दिल्ली का सम्राट बनते ही फ़िरोज़शाह तुग़लक ने महल हिसार इलांके में महल बनवाने की योजना बनाई. महल क़िले में होना चाहिए, जहां सुविधा के सब सामान मौजूद हों. यह सोचकर उसने क़िला बनवाने का फ़ैसला किया. बादशाह ने ख़ुद ही करनाल में यमुना नदी से हिसार के क़िले तक नहरी मार्ग की घोड़े पर चढ़कर निशानदेही की थी. दूसरी नहर सतलुज नदी से हिमालय की उपत्यका से क़िले में लाई गई थी. तब जाकर कहीं अमीर उमराओं ने हिसार में बसना शुरू किया था.
किवदंती है कि गूजरी दिल्ली आई थी, लेकिन कुछ दिनों बाद अपने घर लौट आई. दिल्ली के कोटला फिरोज़शाह में गाईड एक भूल-भूलैया के पास गूजरी रानी के ठिकाने का भी ज़िक्र करते हैं. तभी हिसार के गूजरी महल में अद्भुत भूल-भूलैया आज भी देखी जा सकती है.
क़ाबिले-गौर है कि हिसार को फ़िरोज़शाह तुग़लक के वक्त से हिसार कहा जाने लगा, क्योंकि उसने यहां हिसार-ए-फिरोज़ा नामक क़िला बनवाया था. 'हिसार' फ़ारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'क़िला'. इससे पहले इस जगह को 'इसुयार' कहा जाता था. अब गूजरी महल खंडहर हो चुका है. इसके बारे में अब शायद यही कहा जा सकता है-
सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में


उजड़ी हुई बस्तियों में आबादियां बोलती हैं...

Sunday, December 27, 2015

ऐसे में अवाम कहां जाए...?


फ़िरदौस ख़ान
देश की राजधानी दिल्ली में विकास के प्रतीक लंबे-चौ़डे पुलों के नीचे ठंड से सिकु़ड़ते लोग आती जाती गाड़ियों से बेख़बर ख़ुद में ही सिमटे नज़र आते हैं. इन दिनों पूरा उत्तर भारत ठंड की चपेट में है. घने कोहरे और शीत लहर के थपे़डे ख़ून को जमा देने के लिए काफ़ी होते हैं. तभी तो हर साल सैक़डों लोग ठंड में कांपते हुए मौत की नींद सो जाते हैं. हालांकि सरकार की तरफ़ से बेघरों को ठंड से बचाने के लिए पुख्ता इंतज़ाम किए जाने के तमाम दावे हर साल किए जाते रहे हैं, लेकिन सर्दी के कारण हुई मौतें इन दावों की क़लई खोलकर रख देती हैं, और यह सिलसिला साल दर साल बदस्तूर जारी रहता है.

पिछले दिनों ठंड से हो रही मौतों के मामले में सुप्रीम कोर्ट से सरकार को सख़्त हिदायत दी. अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि ठंड की वजह से देश में किसी ग़रीब की मौत न हो. बक़ौल अदालत, हमारा दिल दुख से भर जाता है, जब हम कड़ाके की इस ठंड में बेघर लोगों को बिना छत के सोता हुआ देखते हैं. जस्टिस दलवीर भंडारी व जस्टिस दीपक मिश्रा की पीठ ने दिल्ली सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल मोहन पराशरन से कहा कि आप अपने बच्चे को ठंड में जान गंवाने के लिए नहीं छोड़ सकते. ठीक उसी तरह बेघर लोगों को भी सहारा दिया जाना चाहिए. हमें बड़ा दुख होता है जब हम देखते हैं कि इतनी ठंड में बेघर लोग खुले आसमान के नीचे रहते हैं. अदालत ने यह टिप्पणी एम्स के बाहर फुटपाथ पर पड़े लोगों की अ़खबारों में छपी तस्वीरों और ख़बरों पर संज्ञान लेते हुए की. इन लोगों को इलाज के लिए अस्पताल में जगह नहीं दी गई और वहां से रैन बसेरे भी हटा दिए गए. इसकी वजह से मरीज़ों और उनके परिवारजनों को कड़ाके की ठंड में फुटपाथ पर खुले में रहना पड़ा . ग़ौरतलब है कि सुरक्षा के नाम पर यहां बने रैन बसेरों को गिरा दिया गया है. हालांकि पराशरन ने सरकार को दिलासा दिया कि यहां अस्थायी तौर पर रैन बसेरे बनाए जाएंगे. दिल्ली सरकार का दावा है कि उसने 64 स्थायी रैन बसेरे बनवाए हैं. याचिकाकर्ता पीपल्स यूनियन फोर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) के वकील कॉलिन गोंजालविस का कहना है कि जहां रैन बसेरे बनाए गए हैं, वहां कोई रहता ही नहीं. दूरी ज़्यादा होने की वजह से सरकार के बनाए रैन बसेरों में एक भी व्यक्ति नहीं रह रहा है.
सरकार को ऐसे स्थानों पर रैन बसेरे बनाने चाहिए, जिससे कि बेघर लोग उनका फ़ायदा उठा सकें. सिर्फ़ ख़ानापूर्ति के लिए रैन बसेरे बनाने का कोई औचित्य नहीं है. मीडिया के दबाव के कारण सरकार जब तक रैन बसेरों का इंतज़ाम करती है, मौसम बदल जाता है.

देश के कई राज्यों में रैन बसेरे संचालित किए जाते हैं, ताकि बेघरों को सड़क पर रात न गुज़ारनी पड़े. ठिठुराने वाली सर्दी में लोगों को एक अदद छत नसीब हो सके, इस लिहाज़ से रैन बसेरे बेहद ज़रूरी हैं. लेकिन इनकी तादाद काम रहती है. अकेले उत्तर प्रदेश में जहां शीतलहर के कारण अब तक कई लोगों की मौत हो चुकी है, वहां अलाव जलाने और कंबल बांटने के लिए राज्य सरकार ने सात करोड़ रुपये की राशि जारी की है. इसके बावजूद लोगों के लिए सर्दी से राहत के इंतज़ाम नहीं हो पा रहे हैं. ऐसे में यह पैसा कहां जा रहा है, बताने की ज़रूरत नहीं. हालांकि ग़ैर सरकारी संगठनों और सामाजिक संगठनों के कारण बेघरों को सर्दी में थोड़ी बहुत राहत मिल जाती है, लेकिन यह काफ़ी नहीं है. यह बेहद अफ़सोस की बात है कि ऐसे मामलों में भी अदालत को ही सरकार को आदेश देना पड़ता है, और इससे बड़े दुख की बात यह है कि इसके बावजूद भी सरकार कुछ नहीं करती. ऐसे में जनता कहां जाए...?

मुस्लिम सियासी दलों की हक़ीक़त...


फ़िरदौस ख़ान
मुस्लिम सियासी दलों की हक़ीक़त... देश में चुनाव के क़रीब आते ही मुस्लिम सियासी दल और मुस्लिम संगठन हरकत में आ जाते हैं... इनके कर्ताधर्ता पहले तो देश के तक़रीबन सियासी दलों को पानी पी-पीकर कोसते हैं और बाद में कुछ संगठन इन्हीं सियासी दलों की गोद में जाकर बैठ जाते हैं... पर्दे के पीछे की हक़ीक़त यही रहती है कि इन दलों का मक़सद बड़े सियासी दलों से सैटिंग करके रक़म ऐंठना ही होता है... जो दल खुलेआम किसी सियासी दल को समर्थन नहीं देते, वे भी मुसलमानों के वोट बांटने का काम करते हुए सांप्रदायिक सियासी दलों को फ़ायदा पहुंचाते हैं... मुसलमानों को चाहिए कि वे ऐसे मुस्लिम सियासी दलों से परहेज़ करें, जो उनकी भलाई के नाम पर अपना उल्लू सीधा करते हैं... आज देश में हालात हैं, उन्हें देखते हुए यह बेहद ज़रूरी है कि मुसलमान ऐसे सियासी दल को वोट करें, जो देश की एकता और अखंडता में यक़ीन रखता है... ख़ास बात यह है कि अगर मुसलमान अपना और अपने बच्चों का सुरक्षित भविष्य चाहते हैं, तो उन्हें सांप्रदायिक ताक़तों के ख़िलाफ़ एकजुट होना ही होगा...

गर्म कपड़े


हम सब बाज़ार से नये-नये कपड़े-कपड़े ख़रीदते रहते हैं... हर मौसम में मौसम के हिसाब से कपड़े आते हैं... सर्दियों के मौसम में स्वेटर, जैकेट, गरम कोट, कंबल, रज़ाइयां और भी न जाने क्या-क्या... बाज़ार जाते हैं, जो अच्छा लगा ख़रीद लिया... हालांकि घर में कपड़ों की कमी नहीं होती... लेकिन नया दिख गया, तो अब नया ही चाहिए... इस सर्दी में कुछ नया ही पहनना है... पिछली बार जो ख़रीदा था, अब वो पुराना लगने लगा... वार्डरोब में नये कपड़े आते रहते हैं और पुराने कपड़े स्टोर में पटख़ दिए जाते हैं...
ये घर-घर की कहानी है... जो कपड़े हम इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं और वो पहनने लायक़ हैं, तो क्यों न उन्हें ऐसे लोगों को दे दिया जाए, जिन्हें इनकी ज़रूरत है...

कुछ लोग इस्तेमाल न होने वाली चीज़ें दूसरों को इसलिए भी नहीं देते कि किसे दें, कौन देने जाए... किसके पास इतना वक़्त है... अगर हम अपना थोड़ा-सा वक़्त निकाल कर इन चीज़ों को उन हाथों तक पहुंचा दें, जिन्हें इनकी बेहद ज़रूरत है, तो कितना अच्छा हो...

चीज़ वहीं अच्छी लगती है, जहां उसकी ज़रूरत होती है...

Thursday, December 10, 2015

मज़हब


ज़्यादातर लोग किसी मज़हब को सिर्फ़ इसलिए मानते हैं, क्योंकि वे उस मज़हब को मानने वाले परिवार में पैदा हुए हैं... बहुत कम लोग ही ऐसे होते हैं, जो अपना मज़हब बदलते हैं... कई बार ऐसा भी होता है कि लोग अपना मज़हब नहीं बदलते, लेकिन उनकी अक़ीदत दूसरे मज़हब में होती है...
दरअसल, इबादत बहुत ज़ाती चीज़ है... कौन अपने ख़ुदा को किस तरह याद करता है... यह उसका ज़ाती मामला है...

अपने मज़हब को जबरन किसी पर थोपना अच्छी बात नहीं... अमूमन हर इंसान को अपना मज़हब ही सही लगता है... इसके लिए वह कुतर्क करने से भी बाज़ नहीं आता... अच्छा तो यही है कि हमें सभी मज़हबों की इज़्ज़त करनी चाहिए... जब हम दूसरों के मज़हब की इज़्ज़त करेंगे, तभी वो हमारे मज़हब की भी इज़्ज़त करेंगे...
-फ़िरदौस ख़ान

Tuesday, November 24, 2015

विज्ञापन डराते हैं


टीवी पर दिनभर में जितने भी विज्ञापन आते हैं, उनमें ऐसे विज्ञापनों की भरमार रहती है, जिनमें लोगों को इतनी बुरी तरह डराया जाता है कि वे विज्ञापन ख़त्म होते ही उनके उत्पाद ख़रीदने के लिए दौड़ पड़ें... हाथ धोने से लेकर नहाने तक और बर्तन धोने से लेकर फ़र्श साफ़ करने तक के उत्पादों के विज्ञापनों में कीटाणुओं का डर दिखाया जाता है कि अगर फ़लां उत्पाद इस्तेमाल न किया, तो उनका बच्चा बीमार हो जाएगा...
शुक्र है कि ये विज्ञापन कीटाणुओं के संपूर्ण नाश के लिए कोई कीटनाशक पीने की सलाह नहीं देते...


यह हिंदुस्तान है, जहां धरती को मां कहकर पुकारा जाता है... गांव-देहात में आज भी चोट लगने पर बच्चे और बड़े अपने ज़ख़्म पर मिट्टी डाल लेते हैं...

Saturday, November 14, 2015

अवाम को क्या चाहिए


अवाम को क्या चाहिए, बुनियादी ज़रूरत की चीज़ें... मुल्क में चैन-अमन हो, लोगों के पास रोज़गार हो, पेट भरने के लिए खाना हो, रहने को घर हो, बिजली हो, पानी हो, यातायात के साधन हों, बच्चों के लिए स्कूल-कॊलेज हों  और स्वास्थ्य सुविधाएं हों...

अवाम यही सब तो चाहती है, लेकिन सरकार... सरकार उन्हें ये सब देने की बजाय फ़िज़ूल की बयानबाज़ी में उलझाये रखना चाहती है, ताकि वे अपने हक़ के लिए बग़ावत शुरू न कर दें...
और सरकार अपनी इस साज़िश में काफ़ी हद तक कामयाब भी हुई है... अवाम को चाहिए कि वे बेजा बयानबाज़ी के फेर में न पड़ कर अपने हक़ के लिए आवाज़ बुलंद करें...
-फ़िरदौस ख़ान