Thursday, October 24, 2013

फ़ेसबुक प्रबंधन से अपील


फ़िरदौस ख़ान
यह देख कर बहुत दुख होता है कि इंसान ने शक्ल-सूरत तो इंसान वाली पाई है, लेकिन आज भी उसके अंदर ख़ूंख़ार जानवर बसा हुआ है... आज हमने फ़ेसबुक पर एक तस्वीर देखी, जो पाकिस्तान की मस्जिद में हुए बम विस्फ़ोट की है... फ़ेसबुक पर इस तस्वीर को मंदिर बताया जा रहा है... और बम विस्फ़ोट में मरने वाले मुसलमानों को हिंदू... साथ ही कहा जा रहा है कि मुसलमानों ने हिदुओं को काटा है...

हैरानी इस बात पर भी है कि पढ़े-लिखे समझदार हिंदू भाई इसे शेयर कर रहे हैं... क्या आपने तस्वीर को ध्यान से देखा कि यह मंदिर या मस्जिद...? दरअसल, ऐसे मामलों में कुछ लोग बिना-सोचे समझे अपने दिलों की भड़ास निकाल लेते हैं... बिना सच को जानें... क़ाबिले-ग़ौर है कि बांग्लादेश में हुए दंगों से दौरान कुछ मुसलमानों से भी ऐसा ही क्या था... बुद्धों की लाशों को मुसलमानों की लाशें बताया था... इसी तरह अन्य़ मुस्लिम देशों में मरने वाले मुसलमानों को बांग्लादेश में मारे गए मुसलमान कहकर नफ़रत फैलाने की कोशिश की थी...

सभी हिंदू भाइयों से हमारा अनुरोध है कि भाई इस तस्वीर में मरने वाले भी ’मुसलमान’ हैं... और ’मारने वाले’ भी... इस वक़्त तो दुनिया भर में मुसलमान ही मुसलमानों के ख़ून के प्यासे हो रहे हैं...

मुसलमान भाइयों से भी इल्तिजा है कि वो भी ऐसी झूठी अफ़वाहों को सच मानकर, नफ़रत को हवा न दें...

मुसलमान, मुसलमान को मारे... हिंदू को मारे या किसी और को... या फिर हिंदू मुसलमान को मारे... इस सबके बीच मौत तो सिर्फ़ इंसान और इंसानियत की ही होती है... क्या हम मिलजुल कर नफ़रत की इस खाई को पाट नहीं सकते हैं...? क्या हम खु़दा के बनाए इंसान और उसकी आने वाली नस्लों के लिए कोई बेहतरीन मिसाल पेश नहीं कर सकते...?
आप सबसे ग़ुज़ारिश है कि जवाब ज़रूर दें...

फ़ेसबुक प्रबंधन से अपील 
फ़ेसबुक को ऐसे पेजों पर पाबंदी लगानी चाहिए, जो नफ़रत फैलाने का काम करते हैं... चाहे ये पेज मुसलमानों के हों या फिर हिंदुओं के...

Saturday, August 24, 2013

दहेज प्रथा की शिकार हव्वा की बेटियां


फ़िरदौस ख़ान
हिंदुस्तानी मुसलमानों में दहेज का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है. हालत यह है कि बेटे के लिए दुल्हन तलाशने वाले मुस्लिम अभिभावक लड़की के गुणों से ज़्यादा दहेज को तरजीह दे रहे हैं. एक तरफ़ जहां बहुसंख्यक तबक़ा दहेज के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रहा है, वहीं मुस्लिम समाज में दहेज का दानव महिलाओं को निग़ल रहा है. दहेज के लिए महिलाओं के साथ मारपीट करने, उन्हें घर से निकालने और जलाकर मारने तक के संगीन मामले सामने आ रहे हैं. बीती एक जुलाई को हरियाणा के कुरुक्षेत्र ज़िले के गांव गुआवा निवासी नसीमा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई. करनाल ज़िले के गांव मुरादनगर निवासी नज़ीर की बेटी नसीमा का विवाह क़रीब छह साल पहले गांव गुआवा के सुल्तान के साथ हुआ था. 26 वर्षीय नसीमा की तीन बेटियां हुईं. उसके परिवार के लोगों का आरोप है कि नसीमा को दहेज के लिए परेशान किया जाता था. इतना ही नहीं, बेटियों को लेकर भी उसे दिन-रात ताने सुनने को मिलते थे. उनका यह भी कहना है कि उसके पति सुल्तान ने दहेज न मिलने की वजह से उसे फांसी दे दी. पुलिस ने सुल्तान के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 304 बी के तहत दहेज हत्या का मामला दर्ज किया है.

हरियाणा के करनाल ज़िले के गांव जैनपुर के मुस्लिम परिवार की सुनीता के साथ की गई दरिंदगी को देखकर रूह कांप उठती है. उसका निकाह 23 फ़रवरी, 2003 को हरियाणा के ही जींद ज़िले के गांव शंबो निवासी शेर सिंह के साथ हुआ था. उसने अपनी ज़िंदगी को लेकर कई इंद्रधनुषी सपने देखे थे, लेकिन उसके पति शेर सिंह की दहेज की मांग ने उसके सारे सपने बिखेर दिए. उसका पति बार-बार उससे अपने मायके से मोटरसाइकिल लाने की मांग करता. इस बात को लेकर उनके बीच लड़ाई-झगड़े होते. उसके पिता की इतनी हैसियत नहीं थी कि वह दहेज में अपनी बेटी को मोटरसाइकिल दे सकें. सुनीता की एक बेटी हुई, जिसका नाम सोनिया रखा गया. उसने सोचा कि औलाद होने के बाद शायद शेर सिंह सुधर जाए, लेकिन दहेज की मांग को लेकर उसने पत्नी को और ज़्यादा प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. 5 नवंबर, 2005 को शाम तक़रीबन सात बजे जब सुनीता खाना बना रही थी, तब शेर सिंह आया और उससे मोटरसाइकिल की बात करने लगा. सुनीता ने मायके से मोटरसाइकिल लाने से इंकार कर दिया. इस पर शेर सिंह ने जलती लालटेन उस पर फेंक दी, जिससे उसके कपड़ों में आग लग गई. वह बुरी तरह झुलस चुकी थी. उसे अस्पताल में दाख़िल कराया गया. शेर सिंह के ख़िलाफ़ पत्नी की हत्या की कोशिश के आरोप में धारा-307 के तहत मामला दर्ज किया गया. जींद के अतिरिक्त ज़िला न्यायाधीश जे एस जांग़डा ने 8 अगस्त, 2007 को शेर सिंह को पांच साल की सज़ा सुनाई. सुनीता को इंसाफ़ तो मिल गया, लेकिन उसके पूरे जिस्म पर आग से झुलस जाने के दाग़ हैं, जो उसके ज़ख़्म को ताज़ा बनाए रखते हैं. ऐसे मामले आए दिन सामने आ रहे हैं. इंडियन स्कूल ऑफ़ वुमेंस स्टडीज एंड डेवलपमेंट के सर्वे के मुताबिक़, शादी के सात साल के भीतर मुस्लिम महिलाओं की अप्राकृतिक मौतें सबसे ज़्यादा गुजरात में हुईं. उनमें से ज़्यादातर महिलाओं की मौत का कारण दहेज उत्पीड़न रहा.

क़ाबिले-ग़ौर है कि दहेज की वजह से लड़कियों को पैतृक संपत्ति के हिस्से से भी अलग रखा जा रहा है. इसके लिए तर्क दिया जा रहा है कि उनके विवाह और दहेज में काफ़ी रक़म ख़र्च की गई है, इसलिए अब जायदाद में उनका कोई हिस्सा नहीं रह जाता. ख़ास बात यह भी है कि लड़की के मेहर की रक़म तय करते वक़्त सैकड़ों साल पुरानी रिवायतों का वास्ता दिया जाता है, जबकि दहेज लेने के लिए शरीयत को ताख़ पर रखकर बेशर्मी से मुंह खोला जाता है. हालत यह है कि शादी की बातचीत शुरू होने के साथ ही लड़की के परिजनों की जेब कटनी शुरू हो जाती है. जब लड़के वाले लड़की के घर जाते हैं तो सबसे पहले यह देखा जाता है कि नाश्ते में कितनी प्लेटें रखी गई हैं यानी कितने तरह की मिठाई, सूखे मेवे और फल रखे गए हैं. इतना ही नहीं, दावतें भी मुर्ग़े की ही चल रही हैं यानी चिकन बिरयानी, चिकन क़ोरमा वग़ैरह. फ़िलहाल 15 से लेकर 20 प्लेटें रखना आम हो गया है और यह सिलसिला शादी तक जारी रहता है. शादी में दहेज के तौर पर ज़ेवरात, फ़र्नीचर, टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन, क़ीमती कपड़े और ताम्बे-पीतल के भारी बर्तन दिए जा रहे हैं. इसके बावजूद दहेज में कारें और मोटरसाइकिलें भी मांगी जा रही हैं, भले ही लड़के की इतनी हैसियत न हो कि वह इन वाहनों के तेल का ख़र्च भी उठा सके. जो अभिभावक अपनी बेटी को दहेज देने की हैसियत नहीं रखते, उनकी बेटियां कुंवारी बैठी हैं. मुरादाबाद की किश्वरी जीवन के 47 बसंत देख चुकी हैं, लेकिन अभी तक उनकी हथेलियों पर सुहाग की मेहंदी नहीं सजी. वह कहती हैं कि मुसलमानों में लड़के वाले ही रिश्ता लेकर आते हैं, इसलिए उनके अभिभावक रिश्ते का इंतज़ार करते रहे. वे बेहद ग़रीब हैं, इसलिए रिश्तेदार भी बाहर से ही दुल्हनें लाए. अगर उनके अभिभावक दहेज देने की हैसियत रखते, तो शायद आज वह अपनी ससुराल में होतीं और उनका अपना घर-परिवार होता. उनके अब्बू कई साल पहले अल्लाह को प्यारे हो गए. घर में तीन शादीशुदा भाई, उनकी बीवियां और उनके बच्चे हैं. सबकी अपनी ख़ुशहाल ज़िंदगी है. किश्वरी दिन भर बीड़ियां बनाती हैं और घर का कामकाज करती हैं. अब बस यही उनकी ज़िंदगी है. उनकी अम्मी को हर वक़्त यही फ़िक्र सताती है कि उनके बाद बेटी का क्या होगा? यह अकेली किश्वरी का क़िस्सा नहीं है. मुस्लिम समाज में ऐसी हज़ारों लड़कियां हैं, जिनकी खु़शियां दहेज रूपी लालच निग़ल चुका है.

राजस्थान के बाड़मेर निवासी आमना के शौहर की मौत के बाद 15 नवंबर, 2009 को उसका दूसरा निकाह बीकानेर के शादीशुदा उस्मान के साथ हुआ था, जिसके पहली पत्नी से तीन बच्चे भी हैं. आमना का कहना है कि उसके अभिभावकों ने दहेज के तौर पर उस्मान को 10 तोला सोना, एक किलो चांदी के ज़ेवर, कपड़े और घरेलू सामान दिया था. निकाह के कुछ दिनों बाद ही उसके शौहर और उसकी दूसरी बीवी ज़ेबुन्निसा कम दहेज के लिए उसे तंग करने लगे. यहां तक कि उसके साथ मारपीट भी की जाने लगी. वे उससे एक स्कॉर्पियो गाड़ी और दो लाख रुपये मांग रहे थे. आमना कहती हैं कि उनके अभिभावक इतनी महंगी गाड़ी और इतनी बड़ी रक़म देने के क़ाबिल नहीं हैं. आख़िर ज़ुल्मो-सितम से तंग आकर आमना को पुलिस की शरण लेनी पड़ी. राजस्थान के गोटन की रहने वाली गुड्डी का क़रीब तीन साल पहले सद्दाम से निकाह हुआ था. शादी के वक़्त दहेज भी दिया गया था. इसके बावजूद शौहर और ससुराल के अन्य सदस्य दहेज के लिए उसे तंग करने लगे. उसके साथ मारपीट की जाती. जब उसने और दहेज लाने से इंकार कर दिया तो 18 अक्टूबर, 2009 को ससुराल वालों ने मारपीट कर उसे घर से निकाल दिया. अब वह अपने मायके में है. मुस्लिम समाज में आमना और गुड्डी जैसी हज़ारों महिलाएं हैं, जिनका परिवार दहेज की मांग की वजह से उजड़ चुका है. यूनिसेफ़ के सहयोग से जनवादी महिला समिति द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक़, दहेज के बढ़ रहे मामलों की वजह से मध्य प्रदेश में 60 फ़ीसद, गुजरात में 50 फ़ीसद और आंध्र प्रदेश में 40 फ़ीसद लड़कियों ने माना कि दहेज के बिना उनकी शादी होना मुश्किल हो गया है. दिल्ली की छात्रा परवीन का कहना है कि दहेज बहुत ज़रूरी है, क्योंकि लड़की जितना ज़्यादा दहेज लेकर जाती है, ससुराल में उसे उतनी ही ज़्यादा इज्ज़त मिलती है. वह कहती हैं कि उसके परिवार की माली हालत अच्छी नहीं है और अभिभावक उसे ज़्यादा दहेज नहीं दे पाएंगे, इसलिए वह खु़द ही नौकरी करके अपने दहेज के लिए रक़म इकट्ठा करना चाहती है. ऐसी लड़कियों की भी कमी नहीं है, जो दहेज लेना चाहती हैं. इन लड़कियों का मानना है कि इस तरह उन्हें उनकी पुश्तैनी जायदाद से कुछ हिस्सा मिल जाता है. उनका कहना है कि इस्लाम में बेटियों को उनके पिता की जायदाद में से कुछ हिस्सा देने की बात कही गई है, लेकिन कितने अभिभावक ऐसा करते हैं? अगर दहेज के बहाने लड़कियों को कुछ मिल जाता है तो इसमें ग़लत क्या है? मगर जो माता-पिता ग़रीब हैं, वे अपनी बेटियों के लिए दहेज कहां से लाएंगे, इसका जवाब इन लड़कियों के पास नहीं है.

दहेज को लेकर मुसलमान एकमत नहीं हैं. जहां कुछ मुसलमान दहेज को ग़ैर इस्लामी क़रार देते हैं, वहीं कुछ मुसलमान दहेज को जायज़ मानते हैं. उनका तर्क है कि हज़रत मुहम्मद साहब ने भी तो अपनी बेटी फ़ातिमा को दहेज दिया था. ख़ास बात यह है कि दहेज की हिमायत करने वाले मुसलमान भूल जाते हैं कि पैग़ंबर ने अपनी बेटी को विवाह में बेशक़ीमती चीज़ें नहीं दी थीं. इसलिए उन चीज़ों की दहेज से तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि उनकी मांग नहीं की गई थी. अब तो लड़के वाले मुंह खोलकर दहेज मांगते हैं और लड़की के अभिभावक अपनी बेटी का घर बसाने के लिए हैसियत से बढ़कर दहेज देते हैं, भले ही इसके लिए उन्हें कितनी ही परेशानियों का सामना क्यों न करना पड़े. अमरोहा के परवेज़ आलम बताते हैं कि उन्होंने अपनी पुश्तैनी जायदाद में मिले घर के आधे हिस्से को बेचकर बड़ी बेटी की शादी कर दी थी, लेकिन यह देखकर दिल रो प़डता है कि वह अब भी सुखी नहीं है. उसके ससुराल वाले दहेज की मांग करते हैं. अगर बाक़ी बचा घर बेचकर उसे दहेज दे दूं तो अपने अन्य बच्चों को लेकर कहां जाऊंगा. छोटी बेटी के भी हाथ पीले करने हैं, कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं. अगर अल्लाह बेटियां दे तो उनके नसीब भी अच्छे करे और उनके माता-पिता को दौलत भी दे, साथ ही दहेज के लालचियों को तौफ़ीक़ दे कि वे ऐसी नाजायज़ मांगें न रखें. हैरत की बात यह भी है कि बात-बात पर फ़तवे जारी करने वाले मज़हब के नुमाइंदों को समाज में फैल रही दहेज जैसी बुराइयां दिखाई नहीं देतीं. शायद उनका मक़सद सिर्फ़ बेतुके फ़तवे जारी कर सुर्ख़ियां बटोरना या फिर मुस्लिम महिलाओं के दायरों को और मज़बूत करना होता है. इस बात में कोई दो राय नहीं कि पिछले काफ़ी अरसे से आ रहे ज़्यादातर फ़तवे महज़ मनोरंजन का साधन साबित हो रहे हैं, वह चाहे मिस्र में जारी मुस्लिम महिलाओं द्वारा कुंवारे पुरुष सहकर्मियों को अपना दूध पिलाने का फ़तवा हो या फिर महिलाओं के नौकरी करने के ख़िलाफ़ जारी फ़तवा. अफ़सोस इस बात का है कि मज़हब की नुमाइंदगी करने वाले लोग समाज से जुड़ी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेते. हालांकि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुस्लिम समाज में बढ़ती दहेज की कुप्रथा पर चिंता ज़ाहिर करते हुए इसे रोकने के लिए मुहिम शुरू करने की बात कही थी. बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य ज़फ़रयाब जिलानी के मुताबिक़, मुस्लिम समाज में शादियों में फ़िज़ूलख़र्ची रोकने के लिए इस बात पर भी सहमति जताई गई थी कि निकाह सिर्फ़ मस्जिदों में ही कराया जाए और लड़के वाले अपनी हैसियत के हिसाब से वलीमें करें. साथ ही इस बात का भी ख़्याल रखा जाए कि लड़की वालों पर ख़र्च का ज़्यादा बोझ न पड़े, जिससे ग़रीब परिवारों की लड़कियों की शादी आसानी से हो सके. इस्लाह-ए-मुआशिरा (समाज सुधार) की मुहिम पर चर्चा के दौरान बोर्ड की बैठक में यह भी कहा गया कि निकाह पढ़ाने से पहले उलेमा वहां मौजूद लोगों को बताएं कि निकाह का सुन्नत तरीक़ा क्या है और इस्लाम में यह कहा गया है कि सबसे अच्छा निकाह वही है, जिसमें सबसे कम ख़र्च हो. साथ ही इस मामले में मस्जिदों के इमामों को भी प्रशिक्षित किए जाने पर ज़ोर दिया गया था.

हरियाणा ख़िदमत सभा के मुख्य संयोजक मोहम्मद रफ़ीक़ चौहान का कहना है कि दहेज लेना ग़ैर इस्लामी है. यह एक सामाजिक बुराई है, जो धीरे-धीरे समाज को खोखला कर रही है. अभिभावकों को चाहिए कि वे दहेज मांगने वाले परिवार में अपनी बेटी की शादी न करें और ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस में शिकायत दर्ज कराएं, क्योंकि लालच की कोई सीमा नहीं होती. साथ ही वे ऐसे व्यक्ति के साथ भी अपनी बेटी की शादी न करें, जिसकी पत्नी की दहेज की वजह से मौत हुई हो या उसे तलाक़ दे दिया गया हो. तभी इस बुराई को बढ़ने से रोका जा सकता है. सरकार ने क़ानून बनाया है, पीड़ितों को उसका इस्तेमाल करना चाहिए.

बहरहाल, मुस्लिम समाज में बढ़ती दहेज की कुप्रथा रोकने के लिए कारगर क़दम उठाने की ज़रूरत है. इस मामले में मस्जिदों के इमाम अहम किरदार अदा कर सकते हैं. वे नमाज़ के बाद लोगों से दहेज न लेने की अपील करें और उन्हें बताएं कि यह कुप्रथा किस तरह समाज के लिए नासूर बनती जा रही है. इसके अलावा महिलाओं को भी जागरूक करने की ज़रूरत है, क्योंकि देखने में आया है कि दहेज का लालच पुरुषों से ज़्यादा महिलाओं को होता है. अफ़सोस की बात यह भी है कि मुस्लिम समाज अनेक फ़िरक़ों में बंट गया है. अमूमन सभी तबक़े ख़ुद को असली मुसलमान साबित करने में जुटे रहते हैं और मौजूदा समस्याओं पर उनका ध्यान नहीं जाता है. जब तक सामाजिक बुराइयों पर खुलकर चर्चा नहीं होगी, तब तक उनके उन्मूलन के लिए भी माहौल तैयार नहीं किया जा सकता है. इसलिए यह बेहद ज़रूरी है कि समाज में फैली दहेज प्रथा जैसी बुराइयों के विरुद्ध विभिन्न मंचों से ज़ोरदार आवाज़ उठाई जाए. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

Monday, July 29, 2013

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्यादेश एक ऐतिहासिक पहल


फ़िरदौस ख़ान 
रोटी, कपड़ा और मकान आम आदमी की बुनियादी ज़रूरतें हैं. हमारे देश में आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं हैं, जिन्हें दिन में एक बार भी भरपेट भोजन नहीं मिल पाता है. यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी का कहना है कि देश के हर नागरिक को भरपेट अन्न मुहैया कराना यूपीए सरकार का सपना रहा है. राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्‍यादेश इस दिशा में एक महत्वपूर्ण क़दम साबित होगा. प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह कहते हैं कि उनकी पहली प्राथमिकता भारत की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं से निपटना है, ताकि ग़रीबी और कुपोषण का कम से कम समय में उन्मूलन किया जा सके. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने खाद्य सुरक्षा को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि हमने शिक्षा का अधिकार दिया, सूचना का अधिकार दिया, मनरेगा और पहचान का अधिकार आधार दिया. अब भोजना का अधिकार दे रहे हैं.

क़ाबिले-गौर है कि राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्‍यादेश (एनएफएसओ) का मक़सद देश की तक़रीबन 67 फ़ीसद आबादी को तीन रुपये और दो रुपये की रि‍यायती दरों पर गेहूं और चावल मुहैया कराना है. इस अध्‍यादेश का ऐलान 5 जुलाई, 2013 को किया गया था. यह अध्‍यादेश लाभार्थि‍यों को खाद्यान्‍न प्राप्‍त करने का क़ानूनी अधि‍कार मुहैया कराता है. खाद्यान्‍न की आपूर्ति‍ नहीं होने पर वे आर्थि‍क मुआवज़े का दावा कर सकते हैं. ‍
खाद्य सुरक्षा अध्‍यादेश के बारे में  अकसर पूछे जाने वाले कुछ सवाल और उनके जवाब इस प्रकार हैं-

अध्यादेश के अनुसार, टीपीडीएस के तहत सिर्फ़ 67 फ़ीसद आबादी को इसको लाभ मिलेगा. इसका लाभ सभी लोगों को क्यों नहीं दिया जा सकता?
अध्‍यादेश में प्रस्तावित पात्रता हाल ही में हुए खाद्यान्नों के उत्पादन और इसकी सरकारी ख़रीद पर आधारित है. साल 2007-08 से 2011-12 तक औसतन हर साल तक़रीबन 60.24 मिलियन टन खाद्यान्न की सरकारी ख़रीद की गई है. इसकी तुलना में टीपीडीएस के तहत हर व्यक्ति को हर माह 5 किलो खाद्यान्न प्रदान करने के लिए 72.6 मिलियन टन खाद्यान्न की ज़रूरत होगी. इसके अलावा ओडब्ल्यूएस के लिए भी अतिरिक्त आवश्यकता है. खाद्यान्नों के वर्तमान स्‍तर पर उत्पादन और सरकारी ख़रीद को ध्यान में रखते हुए खाद्यान्नों की इस मांग को पूरा कर पाना मुमकिन नहीं होगा.
   
ग़रीबी रेखा से नीचे वाले परिवारों को 5 किलो अनाज देने से उनको वर्तमान में टीपीडीएस के अंतर्गत मिलने वाले अनाज में कटौती होगी. इससे उनको नुक़सान नहीं होगा?
वर्तमान में टीपीडीएस के अंतर्गत गरीबी रेखा से नीचे के 6.52 करोड़ परिवारों को अनाज दिया जाता है, जिसमें 2.50 करोड़ परिवार अंतोदय अन्न योजना (एएवाई) के परिवार भी शामिल हैं. इसके लिए भारत के महा रजिस्ट्रार के 1999-2000 के लिए आबादी के अनुमानों और योजना आयोग के साल 1993-94 के आधार  पर निर्धन लोगों के 36 प्रतिशत होने को आधार माना गया है. शेष परिवारों को ग़रीबी रेखा से ऊपर (एपीएल) के अंतर्गत अनाज दिया जाता है. एएवाई और बीपीएल परिवारों को प्रति माह 35 किलो अनाज दिया जाता है. एपीएल परिवारों को अनाज उपलब्धता के आधार पर दिया जाता है. केंद्रीय वितरण मूल्य (सीआईपी) गेंहू/चावल प्रति किलो एएवाई को रुपये 2/3, बीपीएल परिवारों को 4.15/5.65 रुपये और एपीएल परिवारो को 6.10/8.30 रुपये की दर से दिया जाता है.

गौरतलब है कि वर्तमान में कुल प्रस्तावित परिवारों में से एक-चौथाई को ही 35 किलो प्रति परिवार के आधार पर नियत खाद्यान्न दिया जा रहा है. वहीं एनएफएसबी में अखिल भारतीय स्तर पर कुल आबादी के 67 फ़ीसद हिस्से को 5 किलो खाद्यान्न देने का प्रस्ताव किया गया है. इसमें एएवाई परिवारों को जो निर्धन में निधर्नतम हैं, को 35 किलो प्रति परिवार प्रति माह खाद्यान्न सुनिश्चित किया गया है. इसके साथ ही टीपीडीएस में अध्यादेश के तहत सभी परिवारों को वर्तमान के एएवाई मूल्यों के समान गेंहू 3 रुपये और  चावल 2 रुपये की दर से दिया जाएगा. नतीजतन, वर्तमान में बीपीएल श्रेणी में आने वाले परिवार जिन्हें खाद्यान्न की मात्रा कम मिलेगी, उन्हें सब्सिडी दरों पर अनाज मिलने का फ़ायदा मिलेगा.

सभी को खाद्यान्न देने की योजना को केवल अनाजों तक ही सीमित क्यों रखा गया है और इसमें दालों और खाद्य तेलों आदि को क्यों शामिल नहीं किया गया है?
दालों और खाद्य तेलों की घरेलू मांगो को पूरा करने के लिए हम मुख्यत आयात पर निर्भर हैं. इसके साथ ही इस समय दालों और तिलहनों की ख़रीद के लिए आधारभूत ढांचा और संचालन प्रक्रिया भी मज़बूत नहीं है. घरेलू स्तर पर इसकी उपलबध्ता के सुनिश्चित न होने और ख़रीद प्रकिया के कमज़ोर होने के कारण इनकी क़ानूनी अधिकार के रूप में आपूर्ति कर पाना मुमकिन नहीं होगा. हांलाकि सरकार सस्ती दरों पर लक्षित लोगों को दालों और खाद्य तेल देने की योजना चला रही है, साथ ही साथ दालों और तिलहनों की ख़रीद को बढ़ाने के प्रयास भी किए जा रहे हैं.

ऐसा लगता होता है कि विधेयक में केवल खाद्यान्नों को ज़रूरत पूरी करने पर ध्यान केंद्रित किया है और इसमें पोषकता पर कम ध्यान दिया है. इसलिए इसे खाद्य सुरक्षा प्रदान के लिए व्‍यापक कैसे कहा जा सकता है?
कुपोषणता एक गंभीर समस्या है जिसका पूरा देश सामना कर रहा है, लेकिन यह कहना ग़लत होगा कि विधेयक में इसे पूरी तरह से नकारा गया है. इसमें गर्भवती महिलाओं और बच्चों के बीच कुपोषण की समस्या पर ध्यान केंद्रित किया है, जो हमारी इस समस्या से सामने करने में केंद्रबिंदु होगा. महिलाओं और बच्चों को पोषण प्रदान करने पर विधेयक में ख़ास ध्यान दिया गया है. गर्भवती महिलाओं ओर दूध पिलाने वाली माताओं को निर्धारित पोषकता मानकों के तहत पौष्टिक भोजन का अधिकार देने के साथ-साथ कम से कम 6000 रुपये के मातृत्व लाभ भी मिलेंगे. 6 माह से 6 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों को घर भोजन ले जाने या निर्धारित पोषकता मानकों के तहत गर्म पका हुआ भोजन पाने का अधिकार होगा. इसी आयु वर्ग के कुपोषण के शिकार बच्चों के लिए उच्च पोषकता मानक निर्धारित किए गए हैं. निचली और उच्च प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों को निर्धारित पोषकता मानकों के तहत विद्यालयों में पोषक आहार दिया जाएगा.

क्या सरकार के पास विधेयक के नियमों के अंतर्गत पर्याप्त खाद्यान्न है?
हर साल अन्य लाभकारी योजनाओं के लिए खाद्यान्न की आवश्यकता जोड़कर कुल 612.3 लाख टन खाद्यान्न की ज़रूरत होगी. खाद्यान्नों की ख़रीद (गेंहू और चावल) जिसमें कुल मात्रा और उत्पादन का प्रतिशत शामिल है, उसमें हाल के हाल के वर्षों में प्रगति हुई है. खाद्यान्न की औसतन वार्षिक ख़रीद जो साल 2000-2001 से 2006-07 के दौरान कुल औसतन वार्षिक उत्पादन के 24.30 फ़ीसद के आधार पर 382.2 लाख टन थी, साल 2011-12 के दौरान औसतन वार्षिक उत्पादन 33.24 प्रतिशत होकर 602.4 लाख टन पर पंहुच गई. इसलिए वर्तमान में खाद्यान्नों के उत्पादन और इसकी ख़रीद के आधार पर ज़रूरत पूरी की जा सकेगी. यहां तक कि साल 2012-13 के दौरान खाद्यान्न के उत्पादन में हल्की कमी होने के अनुमान के बावजूद विधेयक की ज़रूरतों को पूरा किया जा सकेगा.

ऐसा कहा जा रहा है कि इस विधेयक से किसानों, ख़ास तौर पर छोटे और सीमांत किसानों की खेती करने में  कम रूचि कम होगी, क्योंकि उन्हें अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सस्ती दरों पर अनाज का आश्वासन दिया जाएगा. इस संबध में आपका क्या कहना है?
खाद्यान्नों का उत्पादन किसानों के लिए आजीविका का एक माध्यम हैं, जिसके लिए उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाता है. न्यूनतम समर्थन मूल्य की पहुंच हर साल बढ़ रही है और विधेयक के लागू होने के फलस्वरूप आवश्यकता बढ़ने के कारण ज़्यादा से ज़्यादा किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य के दायरे में आएंगे. इसलिए किसानों को हतोत्साहित करने के बजाय विधेयक किसानों को अधिक उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करेगा. सस्ती दरों पर खाद्यान्न मिलने से छोटे किसानों की सीमित आमदनी पर बोझ कम होगा और वे बचाई हुई रक़म को अन्य आवश्यकताओं पर ख़र्च कर अपने जीवनस्तर में सुधार कर सकेंगे.

राज्य खाद्य सुरक्षा विधेयक के कारण उन पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ को लेकर शिकायत कर रहे हैं? केंद्र सरकार इस बारे में राज्य सरकारों को अपने साथ कैसे जोड़ेगी, क्योंकि राज्यों को ही इस विधेयक को लागू करना है?
विधेयक का मुख्य वित्तीय प्रभाव खाद्य सब्सिडी पर पड़ेगा. प्रस्तावित क्षेत्र और पात्रता के अधिकार पर सालाना 612.3 लाख टन खाद्यान्न की ज़रूरत होने और साल 2013-14 आधार पर खाद्य सब्सिडी की लागत 1,24,747 करोड़ रुपये होने का अनुमान है. वर्तमान की टीपीडीएस और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए खाद्य सब्सिडी से तुलना करने पर सालाना 23,800 करोड़ रुपये की ज़्यादा ज़रूरत होगी. इस अतिरिक्त आवश्यकता को केंद्र सरकार पूर्ण रूप से वहन करेगी.
राज्यों ने ख़ुद पर पड़ने वाले बोझ ख़ास तौर पर शिकायतें दूर करने की प्रणाली, खाद्यान्नों की ढुलाई पर होने वाले व्यय और उचित मूल्य की दुकानों के डीलरों को दी जाने वाली अतिरिक्त राशि आदि मुद्दों पर अपनी शंकाए व्यक्त की हैं. ये शंकाए दिसंबर 2011 में लोकसभा में पेश किए गए मूल विधेयक के प्रावधानों पर आधारित हैं. हांलाकि स्थायी समिति की सिफ़ारिशों और राज्य सरकारों के विचारों को ध्यान में रखने के बाद विधेयक में अब केंद्र सरकार दवारा राज्यों को एक राज्य के भीतर खाद्यान्न की ढुलाई में होने वाले व्यय में सहायता देने, इसको संभालने और एफपीएस डीलरों को दिए जाने वाली अतिरिक्त राशि के संबध में नियमों के अनुसार देने के नियम निर्धारित किए गए हैं. इसके अलावा शिकायतें दूर करने के संबध में विधेयक में इस बारे में अलग से प्रणाली बनाने या वर्तमान में लागू प्रणाली को जारी करने के विकल्प राज्य सरकारों को दिए गए हैं.

एक केंद्रीय क़ानून में, राज्यों के ऊपर खाद्य सुरक्षा भत्ता देने की ज़िम्मेदारी डालना कितना जायज़ है?
यह कहना ग़लत है कि यह ज़िम्मेदारी सिर्फ़ राज्य सरकारों पर डाली गई है. इस संबध में राज्यों पर ज़िम्मेदारी केवल केंद्र सरकार द्वारा दिए गए खाद्यान्न या भोजन का वितरण ना कर पाने की स्थिति में ही होगी.
विधेयक के खंड 22 के तहत केंद्रीय भाग से राज्यों को खाद्यान्न की कम आपूर्ति होने पर केंद्र सरकार विधेयक के प्रावधानों के पूरा करने के लिए राज्य सरकारों को आर्थिक सहायता देगी. हांलाकि खंड 8 के तहत लाभकर्ताओं कों खाद्य सुरक्षा भत्ता देने की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों की होगी, क्योंकि खाद्यान्न और भोजन की वितरण की ज़िम्मेदारी उनकी है.

इस विधेयक को राज्य सरकारों द्वारा कब लागू किया जाएगा?
विधेयक को कार्यान्वित करने से पहले कुछ शुरुआती काम किया जाना ज़रूरी है. मिसाल के लिए नियमावली के तहत टीपीडीएस के अंतर्गत प्रत्येक राज्य और संघ शासित प्रदेशों में घरों की वास्तविक पहचान की जानी है. इसलिए राज्य सरकारों को इनकी पहचान के लिए उचित मानक बनाने और उसके बाद पहचान का वास्तविक कार्य करने की आवश्यकता है. विधेयक के तहत लाभकर्ता घरों की पहचान पूरी होने के बाद ही खाद्यान्न का आवंटन और वितरण किया जा सकता है. इसलिए विधेयक में पहचान के कार्य के शुरू होने के बाद इसे 180 दिनों में पूरा किए जाने का प्रावधान किया गया है. यह अवधि हर राज्य में अलग-अलग हो सकती है और यदि कोई राज्य इसे पहले लागू करना चाहता है, तो उसे इसके लिए प्रोत्साहित किया जाएगा. विधेयक को जारी करने के लिए इसमें वर्तमान में राज्य में लागू योजना और दिशा-निर्देश आदि के जारी रहने के अस्थायी प्रावधान किए गए हैं.

कोई भी विधेयक तभी कामयाब हो सकता है जब इसमें शिकायतें दूर करने के लिए स्वतंत्र शिकायत निवारण दूर करने की व्यवस्था हो. विधेयक में इस संबध में क्या प्रावधान किए गए हैं?
विधेयक में शिकायतें दूर करने के लिए ज़िला और राज्य स्तर पर एक प्रभावी और स्वतंत्र शिकायत निवारण प्रणाली का प्रावधान किया गया है. इसमें हर जिले के लिए पात्रता लागू करने और शिकायतों की जांच करने और दूर करने के लिए ज़िला शिकायत निवारण अधिकारी शामिल है. इसके अतिरिक्त पात्रता के उल्लंघन होने संबधी शिकायत प्राप्त होने या स्वंय से जांच करने के लिए राज्य खाद्य आयोग की स्थापना करने का भी प्रावधान है. आयोग डीजीआरओ के आदेशों के विरुद्ध सुनवाई करेगा और उसे दंड लगाने की शक्ति भी दी जाएगी. कोई भी शिकायतकर्ता इनसे मिल सकता है.

घरों की पहचान किए जाने का कार्य राज्यों से कराने का प्रावधान है. हर राज्य अलग-अलग मानदंड अपनाएगा और इससे एक राज्य में सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर लाभ पाने वाले परिवार को दूसरे राज्य में इसका लाभ नहीं मिलेगा, इसे कैसे रोका जाएगा?
लोकसभा में दिसंबर 2011 में विधेयक को प्रस्तुत करते समय पहचान के लिए दिशा-निर्देश राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित करने का प्रावधान किया गया था. राज्य सरकारों ने इस संबध में विचार-विमर्श के दौरान पहचान के मानदंड निर्धारित करने में अधिक भूमिका होने संबधी विचार प्रस्तुत किया था. इस संबध में स्थायी समिति ने भी राज्य सरकारों से परामर्श के बाद मानदंड निर्धारित करने की सिफ़ारिश की थी. इन विचारों और सिफ़ारिशों पर ध्यानपूर्वक विचार किया गया. सामाजिक-आर्थिक कारणों के संबध में अलग-अलग राज्यों में अंतर होने के कारण इस संबध में केंद्र सरकार द्वारा मानदंड बनाए के उचित न होने और इसकी आलोचना होने की शंका थी. इसके साथ ही मानदंड के मुददे पर राज्य सरकारों के साथ आम सहमति बनाना भी कठिन था. पहचान का कार्य अब राज्य सरकारों पर छोड़ दिया है, जो इसके लिए ख़ुद अपने मानदंड बनाएंगे.    
   
क्‍या राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्‍यादेश से ख़र्च बढ़कर सकल घरेलू उत्‍पाद के लगभग 3 फ़ीसद के बराबर हो जाएगा?
मीडिया में कुछ इस तरह की ख़बरें आई हैं कि राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्‍यादेश के लागू होने पर 3 लाख करोड़ से भी अधिक यानी सकल घरेलू उत्‍पाद के 3 फ़ीसद जितना ख़र्च आएगा. ये अनुमान ग़लत तुलना और अतिरंजित गणना पर आधारित हैं. अध्‍यादेश के प्रभाव के सही मूल्‍यांकन के लिए ख़र्च की तुलना सब्सिडी पर अनाज देने की सरकार की मौजूदा वचनबद्धता से की जानी चाहिए.
सरकार सब्सिडी मूल्‍य के आधार पर अनाज का आवंटन करती है. सरकार कर ख़र्च अनाज उठाने पर और सब्सिडी देने पर होता है. इस समय 2.43 करोड़ अन्‍त्‍योदय अन्‍न योजना (एएवाई) के लाभार्थियों सहित 6.5 करोड़ ग़रीबी रेखा से नीचे के (बीपीएल) परिवारों को और लगभग 11.5 करोड़ (ग़रीबी रेखा से ऊपर के (एपीएल) परिवारों को सब्सिडी मूल्‍य पर सरकार अनाज दे रही है. बीपीएल और एएवाई के परिवारों को हर महीने 35 किलोग्राम अनाज दिया जाता है, जबकि एपीएल परिवारों को उपलब्‍धता के आधार पर अनाज मिलता है. इस समय 22 राज्‍यों में 15 किलोग्राम प्रति महीने के हिसाब से और 13 विशेष श्रेणी वाले राज्‍यों में 35 किलोग्राम हर महीने के हिसाब से अनाज दिया जा रहा है. मौजूदा लाभार्थियों की संख्‍या के आधार पर लक्षित सार्वजनिक‍ वितरण प्रणाली के अंतर्गत अनाज की कुल ज़रूरत तक़रीबन 498.7 लाख टन है. अगर इसमें समन्वित बाल विकास योजना (आईसीडीएस), मिड डे‍ मील आदि जैसी कल्‍याण योजनाओं की 65 लाख टन अनाज की ज़रूरत को जोड़ा जाएं, तो कुल 563.7 लाख टन अनाज की ज़रूरत होगी और इस पर सब्सिडी तक़रीबन 1,00,953 करोड़ वार्षिक की होगी. राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्‍यादेश लागू करने के लिए क़रीब 612 लाख टन अनाज की ज़रूरत होगी, जिस पर सब्सिडी का मूल्‍य 1,24,747 करोड़ रुपये होगा, यानी सब्सिडी पर 23,794 करोड़ रुपये का अतिरिक्‍त ख़र्च होगा.

एक नमूना सर्वेक्षण के निष्‍कर्षो के आधार पर सब्सिडी के लाभार्थियों की कुल संख्‍या और दिए जाने वाले अनाज की मात्रा पर सब्सिडी के ख़र्च का आकलन करना और इसे राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्‍यादेश के अंतर्गत होने वाले ख़र्च की अतिरंजित गणना के लिए आधार बनाना उचित नहीं होगा. सब्सिडी पर ख़र्च का आकलन केंद्र सरकार द्वारा आवंटित अनाज की मात्रा और राज्‍यों/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा उठाए गए अनाज के आधार पर होगा, न कि परिवारों की संख्‍या और प्रत्‍येक परिवार के लिए अनाज वितरण की मात्रा के आधार पर, जैसा कि नमूना सर्वेक्षण के ज़रिये आकलन लगाया गया है. हद से हद नमूना सर्वेक्षण सार्वजनिक वितरण प्रणाली से होने वाली अनाज की चोरी और दूसरी जगह बेचे जाने वाले अनाज की और इशारा करता है. इस तरह की चोरी को रोकने के उपाय किए जा रहे हैं और इस व्‍यवस्‍था को सूचना संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) उपकरणों और अन्‍य साधनों के बेहतर इस्‍तेमाल से सुदृढ़ बनाया जाएगा.

आमतौर पर कहा जाता है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में बड़े सुधार की ज़रूरत है. राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्‍यादेश इस मुद्दे को कैसे हल करेगा?
सार्वजनिक वितरण प्रणाली का संचालन केंद्र और राज्य सरकारों की संयुक्त ज़िम्मेदारी है, जबकि केंद्र सरकार अनाज की ख़रीद और भंडारण तथा राज्यों को अनाजों के बड़ी मात्रा में आवंटन के लिए ज़िम्मेदार है. राज्यों में आवंटन सहित प्रणाली के संचालन, पात्र परिवारों की पहचान, राशन कार्ड जारी करना, उचित दर दुकानों आदि के संचालन और निगरानी की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों की है. इसके अनुसार राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्‍यादेश में व्यवस्था है कि केंद्र और राज्य सरकारें लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आवश्यक सुधारों के लिए क़दम उठाएंगी, जैसे कि अनाज को उचित दर दुकानों तक पहुंचाना, अनाज के कहीं और इस्तेमाल को रोकने के लिए पूरी तरह कम्प्यूटर रिकॉर्ड रखना, पारदर्शिता, उचित दर दुकानों के लिए लाइसेंस देने में पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों, सहकारी समितियों को प्राथमिकता देना, महिलाओं,उनके समूहों को प्रंबधन सौंपना आदि.

वितरण प्रणाली विभाग ने लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुचारू और मज़बूत बनाने के लिए कई उपाय शुरू किए हैं. इनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली का पूरी तरह कंप्यूटर से संचालनः
राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को आवश्यक ढांचागत और वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए सरकार सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के संचालन के लिए पूरी तरह कम्प्यूटर के प्रयोग की योजना लागू कर रही है, जिसके ख़र्च में सरकार हिस्सा देगी. इस योजना के पहले भाग पर अनुमानतः884.07  करोड़ रुपये ख़र्च आएगा. इसमें राशन कार्डों/लाभार्थियों और डाटाबेसों का डिजिटीकरण, आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन का कम्प्यूटरीकरण, पारदर्शिता पोर्टल की स्थापना और शिकायत निवारण व्यवस्था जैसे उपाय शामिल हैं.

लाभार्थियों का डाटाबेस बनने से राशन कार्डों के दोबारा बनने पर रोक लगाने में, जाली राशन कार्डों को समाप्त करने में और सब्सिडी राशि सही लोगों को दिलाने में मदद मिलेगी. आपूर्ति श्रृंखला के कम्प्यूटरीकरण से उचित दर दुकानों तक अनाज की आपूर्ति पर नज़र रखी जा सकती है और अनाज की चोरी तथा कहीं और भेजे जाने की समस्या से निपटा जा सकता है. पारदर्शिता पोर्टल से उचित दर दुकानों का कामकाज सुचारू रूप से चलेगा और विभिन्न स्तरों पर जवाबदेही सुनिश्चित होगी. लाभार्थी अपनी शिकायतें टॉल फ्री नम्बर के ज़रिये दर्ज करा सकते हैं और समाधान पा सकते हैं.

राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा किए जा रहे अन्य उपाय
     जाली राशन कार्डों को समाप्त करने के लिए राज्यों द्वारा बीपीएल/एएवाई सूचियों की समीक्षा का अभियानः 31-3-2013 तक 28 राज्यों में कुल 364.01 लाख जाली/ग़लत राशन कार्डों को रद्द किया गया.
उचित दर दुकानों तक अनाज की आपूर्तिः  उचित दर दुकानों तक अनाजों की आपूर्ति शुरू की गई, ताकि कोई चोरी न हो और अनाज कहीं और न भेजा जा सके.

उचित दर दुकानों के लाइसेंस स्वयं सहायता समूहों, ग्राम पंचायतों, सहकारी समितियों आदि को देनाः कुल संचालित लगभग 5.16 लाख उचित दर दुकानों में से करीब 1.21 उचित दर दुकानें 30 राज्यों में इन संगठनों द्वारा चलाई जा रही हैं.

उचित दर दुकानों के व्यापारियों के कमीशन की व्यवहार्यताः राज्यों से कहा गया है कि उचित दर दुकानों के व्यापारियों को दिए जा रहे कमीशन का पुनर्मूल्यांकन करें और उसे बढ़ाएं. 14 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों ने पुष्टि की है कि इन राज्यों में उचित दर दुकानें सार्वजनिक वितरण प्रणाली से अलग खाद्य तेल दालें, दूध, पाउडर, साबुन आदि भी बेच रही हैं.

भंडारण सुविधाओं के अभाव के कारण खाद्यान्‍नों के सड़ने के तमाम मामले सामने आए हैं. अधिक भंडार गृहों के निर्माण के लिए राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्‍यादेश में क्‍या प्रावधान किए गए हैं?
     राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्‍यादेश में प्रावधान किया गया है कि केंद्र और राज्‍य सरकारें केंद्रीय और राज्‍य स्‍तर पर वैज्ञानिक भंडारण सुविधाओं के निर्माण और रख-रखाव के लिए क़दम उठाएंगी. एक तरफ़ केंद्र सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह केंद्रीय पूल में खाद्यान्‍नों के भंडारण के लिए सुरक्षित सुविधाएं तैयार करेगी, वहीं राज्‍य/केंद्र शासित प्रदेश के लिए यह ज़रूरी होगा कि वे वितरण आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए विभिन्‍न स्‍थानों पर खाद्यान्‍नों के भंडारण संबंधी सुविधाएं प्रदान करेगी.

अ. उपलब्‍ध भंडारण क्षमता और उसको बढ़ाने की पहलें

  • 31 मई, 2013 तक भारतीय खाद्य निगम के पास ढंकी हुई तथा फ़र्श और छत वाली भंडारण क्षमता 397.02 लाख मीट्रिक टन है. खाद्यान्‍नों के केंद्रीय भंडारण संबंधी राज्‍य एजेंसियों के पास ढंकी हुई तथा फ़र्श और छत वाली भंडारण क्षमता तक़रीबन 431.35 लाख मीट्रिक टन है. इस तरह खाद्यान्‍नों के केंद्रीय भंडारण संबंधी क्षमता तक़रीबन 738 लाख मीट्रिक टन उपलब्‍ध थी, जो 30 जून, 2013 को 739 लाख मीट्रिक टन रही.
  • सरकार ढंकी हुई भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए निजी उद्यम गांरटी योजना को कामयाबी के साथ क्रियान्वित कर रही है. इस योजना के तहत गोदामों के निर्माण के लिए निजी निवेश को आकर्षित किया जा रहा है. इसके संबंध में इस योजना के तहत निर्मित किए जाने वाले गोदामों को दस साल की अवधि के लिए किराये पर लिए जाने की गांरटी दी जाएगी. इस तरह निवेशकों को निवेश पर बेहतर लाभ सुनिश्चित किया जाएगा.
  • 31 मई, 2013 तक तक़रीबन 203 लाख मीट्रिक टन क्षमता वाले गोदामों का निर्माण 19 राज्‍यों में किए जाने के प्रस्‍ताव को मंज़ूरी दे दी गई है, जिनमें से 145.06 मीट्रिक टन क्षमता वाले गोदामों के निर्माण का अनुमोदन कर दिया गया है. योजना के तहत 31 मई, 2013 तक 71.08 लाख मीट्रिक टन की क्षमता पूरी कर ली गई है.
  • दीर्घकालीन वैज्ञानिक भंडारण को सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने 20 लाख मीट्रिक टन की भंडारण क्षमता तैयार करने की मंज़ूरी दे दी है, जो पीईजी योजना की कुल स्‍वीकृत क्षमता के दायरे में है.
  • सरकार ने भारतीय खाद्य निगम के माध्‍यम से अगले तीन से चार वर्षों के दौरान ख़ास तौर से पूर्वोत्‍तर में 5.40 लाख मीट्रिक टन की अतिरिक्‍त भंडारण क्षमता के निर्माण के लिए एक योजना को अंतिम रूप दिया है. पूर्वोत्‍तर क्षेत्र में इस तरह की क्षमता के निर्माण के बाद वहां क़रीब तीन से चार महीनों तक भंडारण आवश्‍यकताएं पूरी हो सकेंगी.

ब    अनाजों का सड़ना
      भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के गोदामों में अनाजों को जमा करने तथा रखने के दौरान नुक़सान को टालने के लिए गोदामों में अनाजों को वैज्ञानिक तरीके से स्‍टोर करके रखने और अनाजों की गुणवत्‍ता बनाए रखने की स्‍थापित व्‍यवस्‍था है. खाद्य और जन वितरण विभाग समय-समय पर सभी राज्‍य सरकारों/केंद्र शासित शासनों को उगाही, भंडारीकरण और वितरण के दौरान गुणवत्‍ता नियंत्रण व्‍यवस्‍था को उचित तरीक़े से लागू करने के लिए निर्देश जारी करता है. अनेक कारणों से कुछ मात्रा में अनाज नुक़सान हो सकते हैं. इन कारणों में भंडारों में कीटाणुओं का हमला, गोदामों में रिसाव, ख़राब स्‍टॉक की उगाही तथा भंडारण के लिए जगह की कमी, बाढ़ और संबद्ध अधिकारी की लापरवाही शामिल हैं.

गोदामों की पूरी श्रृंखला में डिलीवरी प्रणाली में लीकेज देखी जाती है. राष्‍ट्रीय खाद्य     सुरक्षा अध्‍यादेश कैसे भ्रष्‍टाचार मुक्‍त प्रणाली सुनिश्चित करेगा?
अनाजों की लीकेज और अनाजों को इधर-उधर करने जैसे काम पर काबू पाने के लिए निम्‍न उपाय कारगर साबित हो सकते हैं:-

  • राज्‍यों/केंद्र शासित प्रदेशों को घरों की पहचान करने के लिए पारदर्शी तौर-तरीक़े विकसित करने होंगे. वर्तमान सार्वजनिक वितरण प्रणाली में नाम शामिल होने और नाम हटाये जाने की समस्‍या का हल अधिकार आधारित व्‍यवस्‍था में हक़दारों को अनाज देने के लिए पारदर्शी तरीक़े से लाभार्थियों की पहचान करने से होगा.
  • अनाजों की लीकेज और अनाजों को इधर-उधर करने के काम पर नियंत्रण पाने के लिए पूरी सार्वजनिक वितरण प्रणाली के संचालन को प्रारंभ से अंत तक कम्‍प्‍यूटरीकृत करना होगा.
  • राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्‍यादेश में ‍लाभार्थी को उचित मात्रा में अनाज देने तथा लाभार्थियों की शिकायत की जांच और निवारण के लिए ‍राज्‍य और जिला स्‍तर पर शिकायत निवारण अधिकारियों का प्रावधान है.

 
एहतियाती क़दम उठाने आदि-
निरंतर निगरानी और जानकारी के कारण भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में अनाज नुक़सान मात्रा और प्रतिशत की दृष्टि से कम हुआ है और अब यह बहुत कम है. इसे नीचे दी गई तालिका से समझा जा सकता है-

साल
एफसीआई स्‍टॉक से अनाज उठान
(लाख टन)
नुक़सान की मात्रा
(लाख टन)
नुक़सान हुए अनाज का प्रतिशत
2007-08
324.50
0.34
0.10
2008-09
306.20
0.20
0.07
2009-10
371.06
0.07
0.02
2010-11
432.10
0.06
0.014
2011-12
473.59
0.03
0.006
2012-13
552.60
0.03
0.005

Saturday, July 27, 2013

मुसलमान ही मुसलमान का सबसे बड़ा दुश्मन है


यह एक कड़वीसच्चाईहैकि मुसलमान ही मुसलमान का सबसे बड़ा दुश्मन है... रमज़ान के मुबारक माह में भी इस क़ौम के लोग एक-दूसरे का ख़ून बहा रहे हैं... पाकिस्तान के अशांत क़बायली इलाक़े में हुए दो बम विस्फोट इसकी ताज़ा मिसालें हैं, जिनमें 45 लोग मारे गए और 100 से ज़्यादा ज़ख़्मी हो गए... पहला विस्फोट एक व्यस्त बाज़ार में हुआ और दूसरा स्कूल रोड पर... ये दोनों इलाक़े शिया मस्जिद के पास हैं...
अफ़सोस की बात यह भी है मुसलमान इस तरह के मामलों में ख़ामोशी अख्तियार कर लेते हैं... अगर यह हमला हिंदुस्तान या बर्मा के मुस्लिम बहुल इलाक़े में हो जाता, तो अब देश भर के मुसलमान हो-हल्ला मचा लेते... क्या पाकिस्तान या किसी और मुस्लिम देश में मरने वाले मुसलमान, मुसलमान नहीं हैं...
कहा जाता है कि रमज़ान के महीने में अल्लाह शैतान को क़ैद कर देता है, लेकिन इंसान के भेस में घूम रहे शैतान असल शैतान से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक हैं... काश! इन्हें भी क़ैद किया जा सकता...

Tuesday, April 9, 2013

हमारा लेख फिर चोरी हुआ...



अभी-अभी हमने मेल देखा... हमारे एक शुभचिंतक ने हमें मेल के ज़रिये हमारा लेख 'पत्रकारिता बनाम स्टिंग ऑपरेशन' चोरी होने की ख़बर दी... यह आलेख जनवरी 2008 में बहुभाषी संवाद समिति 'हिन्दुस्थान समाचार' की स्वर्ण जयंती पर प्रकाशित स्मारिका में शाया हुआ था... इससे पहले भी हमारे लेख चोरी करके अख़बारों तक में प्रकाशित करा दिए गए... जब अख़बार के संपादक से बात की तो उन्होंने चोर लेखकों को प्रतिबंधित कर दिया...  
   
"फिरदौस जी, 
आपका आलेख "पत्रकारिता और स्टिंग ऑपरेशन" पढ़ा. आपके आलेख को पढते समय ऐसा महसूस हुआ कि मैंने इसे कहीं पढ़ा है. तब मैंने एक किताब 'वेब मीडिया और हिंदी का वैश्विक परिदृश', जोकि हिंद युग्म प्रकाशन से निकली है देखी. उस किताब में डॉ. राम लखन मीणा का एक लेख जो कि स्टिंग ऑपरेशन पर है, उसमें आपके लेख को पूरा का पूरा चोरी करके लिखा गया है.  आप चाहें तो इस लेख को हिंद युग्म प्रकाशन की इस किताब में देख सकती हैं. कृपया इस बारे में मेरे विषय में किसी से न कहें. मेरा फ़र्ज़ था इसलिए आपको बता दिया. "

हम अपने इस शुभचिंतक का दिल से शुक्रिया अदा करते हैं... 

हमारे ब्लॉग मेरी डायरी में सोमवार, 11 अगस्त 2008 को प्रकाशित हमारे लेख  'पत्रकारिता बनाम स्टिंग ऑपरेशन' को चोरी करके  इलेक्ट्रोनिक मीडिया और स्टिंग ऑपरेशन:डॉ.राम लखन मीणा
शीर्षक से प्रकाशित किया गया है...  

तस्वीर : गूगल से साभार 

Monday, January 21, 2013

अतीत की यादें, वर्तमान की चुनौतियां और भविष्य के सपने...

फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस के चिंतन शिविर के आख़िरी दिन पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बेहद जज़्बाती तक़रीर दी... उन्होंने अपने भाषण में अतीत की यादें, वर्तमान की चुनौतियां और भविष्य के सपने थे. उन्होंने कहा-
कभी-कभी सोचता हूं कि यह संगठन चलता कैसे है? पता नहीं क्या होता है कि चुनाव से पहले सब खड़े हो जाते हैं और जीत जाते हैं. दरअसल, यह गांधीजी का संगठन है. इसमें हिंदुस्तान का डीएनए है. कल रात देशभर से बधाइयां आ रही थीं. पिछली रात मेरी मां मेरे कमरे में आईं, उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा कि मैं जानती हूं कि सत्ता ज़हर होती है. इसके बाद वो रोने लगीं.

आज सुबह मैं चार बजे ही उठ गया और बालकनी में गया. सोचा कि मेरे कंधों पर बड़ी ज़िम्मेदारी आ गई है. मैंने सोचा कि मैं वो नहीं कहूंगा जो लोग सुनना चाहेंगे. मैं वो कहूंगा जो मैं महसूस करता हूं. मैं बचपन में दादी के पास रहता था, पढ़ता था. मैं बैडमिंटन खेलना पसंद करता था, क्योंकि यह मुझे बैलेंस करता था.

दो सिपाही मुझे यह सिखाते थे. एक दिन उन्होंने ही मेरी दादी को गोली मार दी. मेरे पिता उस वक़्त बंगाल में थे. अस्पताल में दादी का शव था, वहां अंधेरा था, बाहर भारी भीड़ थी. मैंने देखा मेरे पिता रो रहे थे, जिन्हें मैं मज़बूत आदमी मानता था. बाद में मैंने देखा कि मेरे पिता नेशनल टेलीविज़न पर देश को संबोधित कर रहे हैं.

उस अंधेरे के बाद बदलाव आया. हम टिकट की बात करते हैं. चुनाव में टिकट के वक़्त ज़िला कमेटी, संगठन से नहीं पूछा जाता है. होता क्या है? दूसरे दलों से लोग आते हैं. चुनाव में खड़े होते हैं, हार जाते हैं, फिर चले जाते हैं.

जब राहुल गांधी भाषण दे रहे थे, तब वहां मौजूद उनकी मां सोनिया गांधी, शीला दीक्षित, राजीव गांधी के मित्र सैम पित्रौदा समेत कई बड़े नेता अपनी आंखें पोंछते नज़र आए. सैम पित्रौदा ने कहा-राहुल के भाषण में मां का दर्द, परिवार की यादें और कुछ डर भी था.
भाषण ख़त्म करने के बाद राहुल गांधी मां के पास पहुंचे और उन्हें गले लगा लिया और उनकी भीगी आंखें पोंछी.यह मां के लिए एक बेटे की मुहब्बत थी.

Wednesday, August 1, 2012

राहुल गांधी निभाएंगे बड़ी भूमिका




-फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जल्द ही पार्टी संगठन  और सरकार में एक बड़ी भूमिका में नज़र आएंगे. पार्टी  संगठन  में उनकी बड़ी  भूमिका पर काम शुरू हो चुका  है.  अब तक राहुल ने सिर्फ़ उत्तर प्रदेश तक ही ख़ुद को सीमित रखा था, लेकिन अब वह इस साल होने वाले तीन राज्यों गुजरात, हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरा के विधानसभा चुनावों में सक्रिय भूमिका निभाएंगे. उन्होंने इन राज्यों में टिकटों के वितरण से लेकर चुनावी रणनीति तय करने में अपनी युवा टीम को ज़िम्मेदारी सौंप कर इसके साफ़ संकेत दे दिए हैं कि इन राज्यों के विधानसभा चुनावों में उनका पूरा दख़ल रहेगा. हिमाचल प्रदेश के लिए बनी स्क्रीनिंग कमेटी में शीला दीक्षित को अध्यक्ष बनाया गया है, जबकि लंबे वक़्त तक राहुल के साथ संबद्ध सचिव रहे गृह राज्यमंत्री भंवर जितेंद्र सिंह को सदस्य के तौर पर रखा गया  है. इसी  तरह त्रिपुरा में केंद्रीय सड़क परिवहन व राजमार्ग राज्यमंत्री जितिन प्रसाद टिकट बटवारे का काम देखेंगे. गुजरात में स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष केंद्रीय सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्री डॉ. सीपी जोशी को बनाया गया है, जबकि टीम राहुल के प्रमुख सदस्य पेट्रोलियम राज्यमंत्री आरपीएन सिंह इसमें सदस्य के तौर पर रहेंगे.

वहीं, सरकार में सोनिया गांधी की ख्वाहिश के मुताबिक़ राहुल के प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री के नए किरदार को मंज़ूर करने पर फ़िलहाल मंथन जारी है. पार्टी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी चाहती हैं कि राहुल अब सरकार में प्रशासनिक अनुभव भी लें. राहुल संगठन में पिछले आठ साल से सक्रिय हैं. आगामी लोकसभा चुनाव से पहले वह प्रशासनिक स्तर पर भी अनुभवी हो जाएं तो बेहतर है.  इस नज़रिये से सोनिया और उनके सलाहकार चाहते हैं कि राहुल को प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री के तौर पर भूमिका निभानी चाहिए. इससे उन्हें सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय की कार्यप्रणाली और उनकी ज़िम्मेदारियों का अनुभव होगा. प्रधानमंत्री कार्यालय के अलावा उनके लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय और मानव संसाधन विकास मंत्रालय का विकल्प भी तलाशा गया है,  मगर राहुल सरकार में किस स्वरूप में शामिल होंगे, इस पर अभी फ़ैसला नहीं हो सका है.

कांग्रेस कार्यकर्ताओं के अलावा अब पार्टी के वरिष्ठ नेता भी यह चाहते हैं कि राहुल गांधी जल्द ही सरकार और संगठन में बड़ी भूमिका निभाएं. पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी तो पहले ही साफ़ कह चुकी हैं कि यह फ़ैसला राहुल को करना है. सोनिया गांधी के इस बयान के बाद राहुल ने भी कह दिया कि वह कोई भी बड़ी ज़िम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हैं. अब यह फ़ैसला पार्टी और सरकार को करना है कि वे राहुल को क्या ज़िम्मेदारी देना चाहते हैं. केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी को लोकसभा में पार्टी का नेता बनाए जाने की मांग का समर्थन किया है. चिदंबरम ने कहा है कि वह राहुल गांधी को किसी भी पद पर आसीन किए जाने का स्वागत करेंगे. उन्होंने केरल के एक प्रमुख समाचार चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा है कि राहुल गांधी सरकार, पार्टी या सदन में कोई भी पद स्वीकार कर सकते हैं.  मुझे यक़ीन है कि वह इनमें से किसी भी पद पर अच्छा काम करेंगे. चिदंबरम ने  कहा कि गांधी को किस पद पर नियुक्त किया जाएगा, इसका फ़ैसला कांग्रेस अध्यक्ष को प्रधानमंत्री की सलाह से करना है. उधर, राहुल गांधी को बड़ी भूमिका देने बढ़ती मांग के बीच पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह का कहना है कि 2014 लोकसभा चुनाव की तैयारी के लिए उन्हें संगठन में आना चाहिए. उन्होंने कहा कि इस वक़्त हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती आम चुनाव है. इसलिए राहुल को सरकार की बजाय चुनाव की तैयारी के लिए पार्टी संगठन में आना चाहिए.

गौरतलब है कि हाल में कांग्रेस के दस सांसदों ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर राहुल गांधी को लोकसभा का नेता बनाए जाने की मांग की है. सांसदों ने पत्र में लिखा है कि यह वक़्त की ज़रुरत है, क्योंकि मौजूदा मुद्दों पर राहुल सबसे अधिक प्रभावी तरीक़े से बोल सकते हैं. सदन के बाहर और भीतर उनकी बेहद ज़रूरत है. सांसदों ने कहा है कि देश की पचास फ़ीसदी से ज़्यादा युवा आबादी किसी युवा को ही अपना नेता देखना चाहती है. हाल के वर्षों में राहुल सबसे अधिक स्वीकार्य नेता के रूप में उभरे हैं. ऐसे में पार्टी अध्यक्ष को फ़ौरन फ़ैसला करना चाहिए. चिट्ठी में कहा गया है कि प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने के बाद राहुल को नेतृत्व सौंपना और ज़रूरी हो गया है.

सीएनएन-आईबीएन और सीएनबीसी-टीवी 18 टीवी नेटवर्क  के सर्वे के मुताबिक़ ज़्यादातर लोगों की राय है कि राहुल गांधी को देश का अगला प्रधानमंत्री बनना चाहिए. देश के 20 राज्यों में किए गए इस सर्वे के मुताबिक़ कांग्रेस शासित राज्यों के 42 फ़ीसदी लोग चाहते हैं कि राहुल देश की कमान संभालें, जबकि 32 फ़ीसदी लोगों का मानना है कि जल्द ही मनमोहन सिंह की जगह ले लेनी चाहिए. कुल 39 हज़ार लोगों में से महज़ 22 फ़ीसदी लोगों का मानना है कि मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद पर बने रहना चाहिए. वहीं 54 फ़ीसदी लोगों का कहना है कि राहुल ग़रीबों के हितैषी और भरोसेमंद नेता हैं. उनके सामने कांग्रेस पार्टी का कोई नेता नहीं टिक पाया. दरअसल, राहुल की सादगी ही उन्हें लोकप्रिय और ख़ास बनाती है. महलों में रहकर भी वह आम आदमी के बीच घुलमिल जाते हैं. जब भ्रष्टाचार और महंगाई के मामले में कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का चौतरफ़ा विरोध हो रहा था, ऐसे वक़्त  में राहुल ने गांव-गांव जाकर जनमानस से एक भावनात्मक रिश्ता क़ायम किया. राहुल ने लोगों से मिलने का कोई मौक़ा नहीं छो़ड़ा.  भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर राहुल गांधी द्वारा निकाली गई पदयात्रा से सियासी हलक़ों में चाहे जो प्रतिक्रिया हुई हो, लेकिन यह हक़ीक़त है कि राहुल ने ग्रामीणों के साथ जो वक़्त बिताया, उसे वे कभी नहीं भूल पाएंगे. इन लोगों के लिए यह किसी सौग़ात से कम नहीं था कि उन्हें युवराज के साथ वक़्त गुज़ारने का मौक़ा मिला.

अपनी पदयात्रा के दौरान पसीने से बेहाल राहुल ने शाम होते ही गांव बांगर के किसान विजय पाल की खुली छत पर स्नान किया. फिर थोड़ी देर आराम करने के बाद उन्होंने घर पर बनी रोटी, दाल और सब्ज़ी खाई. ग्रामीणों ने उन्हें पूड़ी-सब्ज़ी की पेशकश की, लेकिन उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया. गांव में बिजली की क़िल्लत रहती है, इसलिए ग्रामीणों ने जेनरेटर का इंतज़ाम किया था, लेकिन राहुल ने पंखा भी बंद करवा दिया. वह एक आम आदमी की तरह ही बांस और बांदों की चारपाई पर सोए. यह कोई पहला मौक़ा नहीं था, जब राहुल गांधी इस तरह एक आम आदमी की ज़िंदगी गुज़ार रहे थे. इससे पहले भी वह रोड शो कर चुके हैं और उन्हें इस तरह के माहौल में रहने की आदत है. कभी वह किसी दलित के घर भोजन करते हैं तो कभी किसी मज़दूर से साथ ख़ुद ही परात उठाकर मिट्टी ढोने लगते हैं. राहुल का आम लोगों से मिलने-जुलने का यह जज़्बा उन्हें लोकप्रिय बना रहा है. राहुल जहां भी जाते हैं, उन्हें देखने के लिए, उनसे मिलने के लिए लोगों का हुजूम इकट्ठा हो जाता है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि "हां, मैं ग़रीबों का दुख-दर्द देखकर, प्रदेश की दुर्दशा देखकर पागल हो गया हूं. कोई कहता है कि राहुल गांधी अभी बच्चा है, वह क्या जाने राजनीति क्या होती है. तो मेरा कहना है कि हां, मुझे उनकी तरह राजनीति करनी नहीं आती. मैं सच्चाई और साफ़ नीयत वाली राजनीति करना चाहता हूं. मुझे उनकी राजनीति सीखने का शौक़ भी नहीं है. मायावती कहती हैं राहुल नौटंकीबाज़ है. तो मेरा कहना है कि अगर ग़रीबों का हाल जानना, उनके दुख-दर्द को समझना, नाटक है तो राहुल गांधी यह नाटक ताउम्र करता रहेगा.’’

राहुल के विरोधी तर्क देते हैं कि वह उत्तर प्रदेश विधानसभा में कोई करिश्मा नहीं कर पाए. इनका ऐसा सोचना सही नहीं है. उत्तर प्रदेश कांग्रेस की जो हालत है, उसे देखते यह कहना क़तई ग़लत न होगा कि अगर यहां राहुल ने प्रचार न किया होता तो, कांग्रेस के लिए खाता खोलना भी मुश्किल हो जाता. उन्होंने 48 दिन उत्तर प्रदेश में गुज़ारे और 211 जनसभाएं कीं. अगर राहुल हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाते तो कहा जा सकता था कि कांग्रेस के स्टार प्रचारक होने के बावजूद उन्होंने पार्टी उम्मीदवारों के लिए कुछ नहीं किया. कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का यह कहना बिलकुल सही था कि अगर उत्तर प्रदेश में चुनाव नतीजे पार्टी के पक्ष में नहीं आते हैं, तो इसके लिए राहुल गांधी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि एक नेता माहौल बनाता है. इस माहौल को वोट और सीटों में तब्दील करना उम्मीदवारों और संगठन का काम है. इस चुनाव में राहुल गांधी ने बहुत मेहनत की है. इसे किसी भी सूरत में झुठलाया नहीं जा सकता है. राहुल के हाथ में कोई जादू की छड़ी तो नहीं है कि वह पल भर में हार को जीत में बदल दें. उत्तर प्रदेश कांग्रेस में जिस तरह से सीटों के बंटवारे को लेकर बवाल हुआ. बाहरी उम्मीदवारों को लेकर सवाल उठे और अपनों को टिकट दिलाने को लेकर अंदरूनी गुटबाज़ी सामने आई. हालांकि राहुल ने हालात को बहुत संभाला. राहुल ही बदौलत ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का जनाधार बढ़ा. पार्टी के वोट बैंक में इज़ाफ़ा हुआ. क़ाबिले-गौर यह भी है कि कांग्रेस नेताओं की फ़िज़ूल की बयानबाज़ी और अति आत्मविश्वास ने भी पार्टी को नुक़सान पहुंचाया. तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि अगर कांग्रेस को उम्मीद के मुताबिक़ कामयाबी मिल जाती तो पार्टी नेता और ज़्यादा मगरूर हो जाते. ऐसे में 2014 के लोकसभा में कांग्रेस को इसका खामियाज़ा भुगतना पड़ता.

बहरहाल, कांग्रेस को इस हार से सबक़ लेते हुए पार्टी संगठन को मज़बूत बनाना चाहिए. राहुल को यह नहीं भूलना चाहिए कि जंग जांबाज़ सिपाहियों के  दम पर जीती जाती है, मौक़ापरस्तों के सहारे नहीं. कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को कांग्रेस की बुनियाद मज़बूत करनी होगी. उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि हर कांग्रेसी बिना किसी परेशानी के उनसे मिल सके. उनके सामने अपनी बात रख सकें. उन्हें उन कार्यकर्ताओं का विश्वास जीतना होगा, जो किसी भी वजह से पार्टी से दूर होते जा रहे हैं... अगर राहुल गांधी कांग्रेस संगठन को मज़बूत करने में कामयाब हो गए तो फिर कांग्रेस के लिए आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनाव जीतना मुश्किल नहीं है.

Tuesday, July 31, 2012

राहुल गांधी के ख़िलाफ़ साज़िश का पर्दाफ़ाश




-फ़िरदौस ख़ान
पिछले माह हमने लिखा था- लगता है कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के ख़िलाफ़ एक बड़ी साज़िश की जा रही है. इसी के तहत उन पर संगीन आरोप लगाए जा रहे हैं. अब यह हक़ीक़त सामने आ गई है कि राहुल गांधी को बदनाम करने के लिए साज़िश रची गई थी और इसी साज़िश के तहत ही उन पर बलात्कार का संगीन आरोप लगाया गया था. समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक किशोर समरीते ने सुप्रीम कोर्ट में बताया है कि उसकी पार्टी के आलाकमान ने कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के ख़िलाफ़ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर करने के लिए उकसाया था.

राहुल गांधी उभरते हुए नेता हैं और देश का युवा उन्हें प्रधानमंत्री देखना चाहता है. ऐसे में उनके ख़िलाफ़ साज़िशें रचे जाने से इनकार नहीं किया जा सकता है. उन पर लगे बलात्कार के आरोप की भी साज़िश से जोड़कर देखा जा रहा है. बहरहाल, इलाहाबाद उच्च न्यायलय ने तो पहली ही सुनवाई में राहुल ख़िलाफ़ दाख़िल की गई याचिका को ख़ारिज कर दिया था. साथ ही याचिकाकर्ता पर 50 लाख रुपये का जुर्माना लगाते हुए उसके ख़िलाफ़ सीबीआई जांच की भी सिफ़ारिश की थी. अब मामला सर्वोच्च न्यायालय में है.  

बहरहाल, कांग्रेस महासचिव और अमेठी के सांसद राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में एक लड़की और उसके माता-पिता को से बंधक बनाकर रखने और लड़की से बलात्कार के आरोपों से इनकार करते हुए उच्चतम न्यायालय में एक हलफ़नामा दाख़िल किया है. हलफ़नामे में उन्होंने कहा, "ख़ुद पर लगाए गए बलात्कार और अपहरण के आरोपों से मैं पूरी तरह इनकार करता हूं. ये दोनों आरोप पूरी तरह ग़लत, तुच्छ, परेशान करने वाले और छवि को ख़राब करने के लिए सुनियोजित ढंग से लगाए गए हैं."

सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले साल छह अप्रैल को राहुल गांधी, उत्तर प्रदेश सरकार और चार अन्य लोगों को नोटिस जारी किया था. हलफ़नामे में कहा गया है, "हम आदरपूर्वक कहना चाहते हैं कि इस तरह के आरोपों के मामले गंभीरता से देखे जाने चाहिए." उसी के जवाब में राहुल गांधी ने यह हलफ़नामे दाख़िल किया. इलाहबाद उच्च न्यायालय ने समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक किशोर समरीते के ख़िलाफ़ सीबीआई जांच की भी सिफ़ारिश की थी, जिस पर न्यायमूर्ति वीएस सिरपुरकर और टीएस ठाकुर की खंड पीठ ने रोक लगा दी थी और सभी पक्षों से चार हफ़्तों में जवाब दाख़िल करने के लिए कहा था. राहुल गांधी ने न्यायमूर्ति एचएल दत्तू और सीके प्रसाद की खंडपीठ के सामने दायर हलफ़नामे में ये सारी बातें कही हैं.

गौरतलब है कि कि मध्य प्रदेश से समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक किशोर समरीते और गजेंद्र पाल सिंह ने  पिछले साल एक मार्च को राहुल गांधी के ख़िलाफ़ दो अलग-अलग बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थीं, जिनमें कहा गया था कि साल 2006 में राहुल गांधी अपने कुछ विदेशी मित्रों के साथ पार्टी के कार्यकर्ता बलराम सिंह के घर में रुके. उसी दिन से बलराम सिंह, उनकी पत्नी सावित्री और पुत्री सुकन्या ग़ायब हैं. याचिका में आरोप लगाया गया था कि राहुल गांधी ने सभी का अपहरण करके उन्हें बंदी बनाकर रखा है.

अदालत के 4 मार्च, 2011 के आदेश के तहत उत्तर प्रदेश के डीजीपी करमवीर सिंह ने कथित सुकन्या और उसके माता-पिता को अदालत में पेश किया और उन्होंने अदालत को बताया कि उन्हें किसी ने बंधक नहीं बनाया था. सुकन्या बताई जा रही ल़डकी ने अदालत को अपना असली नाम कीर्ति सिंह बताया, जबकि अपने पिता का नाम बलराम सिंह, मां का नाम सुशीला उर्फ़ मोहिनी होने की पुष्टि की. अमेठी थाना प्रभारी ने इन तीनों कथित बंदियों की शिनाख्त की.

इस पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने राहुल गांधी के ख़िलाफ़ दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को ख़ारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर ही 50 लाख रूपये का जुर्माना लगा दिया. इसके साथ ही खंडपीठ ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि जुर्माने की रक़म एक महीने में जमा की जाए. इसके अलावा अदालत ने याचिकाकर्ताओं की सीबीआई जांच कराने का भी आदेश दिया. जस्टिस उमानाथ सिंह और जस्टिस सतीश चंद्र की बेंच ने कथित रूप से अमेठी में रहने वाली सुकन्या और उसके माता-पिता को राहुल द्वारा बंदी बना लिए जाने की खबर देने वाली एक वेबसाइट पर भी प्रतिबंध लगाने के आदेश दिए.

Wednesday, June 6, 2012

हिन्दुस्तान में कौन सा क़ानून लागू है...?



हमारे मुल्क हिन्दुस्तान में कौन सा क़ानून लागू है...भारतीय संविधान या शरीयत....? हम यह सवाल इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि हाल में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि अगर किसी मुस्लिम लड़की ने 15 साल की उम्र में प्यूबर्टी हासिल कर ली है, तो उसकी शादी ग़ैर क़ानूनी नहीं है. हाईकोर्ट के जस्टिस एस रवींद्र भट्ट और जस्टिस एसपी गर्ग की बेंच ने अपने फ़ैसले में कहा, 'इस्लामिक क़ानून के मुताबिक़ कोई भी मुस्लिम लड़की बिना अपने माता-पिता की इजाज़त के शादी कर सकती है, बशर्ते उसने प्यूबर्टी हासिल कर ली हो. अगर उसकी उम्र 18 साल से कम भी है तो उसे अपने पति के साथ रहने का हक़ है.'

मुस्लिम नाबालिग़ लड़कियों की शादी पर सुप्रीम कोर्ट के कई फ़ैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा, ऐसे फ़ैसलों की रौशनी में यह साफ़ है कि तरुणाई की उम्र (अमूमन 15 साल) में शादी करने पर शादी अवैध नहीं ठहराई जा सकती है. हालांकि ऐसी लड़की के पास यह विकल्प है कि बालिग़ (18 साल) होने पर वह अपनी शादी को ख़ारिज कर सकती है.

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फ़ैसला ऐतिहासिक माना जा रहा है. क़ाबिले गौर है कि  हिन्दुस्तानी क़ानून के मुताबिक़ शादी के वक़्त  लड़की की उम्र 18 साल और लड़के की 21 साल होनी चाहिए...

Saturday, May 19, 2012

राहुल गांधी की आम ज़िन्दगी की चाह...




कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी एक ऐसी शख़्सियत के मालिक हैं, जिनसे शायद ही कोई मुतासिर हुए बिना रह सके... मुल्क की एक बड़ी सियासी पार्टी के एक नेता ने हमसे कहा था कि राहुल का विरोध करना उनकी पार्टी की नीति का एक अहम हिस्सा है, लेकिन ज़ाती तौर पर वो राहुल को बहुत पसंद करते हैं...पिछले विधानसभा चुनाव में राहुल ने जितनी मेहनत की, शायद ही किसी और पार्टी के नेता ने की हो...लेकिन कांग्रेस के उन नेताओं ने ही राहुल की मेहनत पर पानी फेर दिया, जिन्हें राहुल ने अपना समझा...
बहरहाल, कुछ अरसा पहले दैनिक भास्कर में राहुल के बारे में एक लेख शाया हुआ था, पेश है वही तहरीर...
साल 2008 की गर्मियों में भारत के बेहतरीन बॉक्सिंग कोच और द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित ओमप्रकाश भारद्वाज के फोन की घंटी बजी. फोन भारतीय खेल प्राधिकरण से आया था. उन्हें बताया गया कि 10 जनपथ से कोई उनसे संपर्क करेगा. कुछ समय बाद नेहरू-गांधी परिवार के निजी स्टाफ में दो दशकों से ज़्यादा समय से कार्यरत पी माधवन ने उन्हें फ़ोन किया और एक असामान्य-सी गुज़ारिश की- राहुल गांधी बॉक्सिंग सीखना चाहते हैं. क्या भारद्वाज उन्हें सिखाएंगे? ‘मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ.’ तब 70 की उम्र को छू रहे भारद्वाज बताते हैं. ‘राहुल बॉक्सिंग रिंग में उतरने की योजना तो नहीं ही बना रहे होंगे. मैंने सोचा वह शायद आत्मरक्षा के गुर सीखना चाहते होंगे.’ हाथ आया मौक़ा गंवाने से पहले ही भारद्वाज फ़ौरन राज़ी हो गए. फ़ीस के तौर पर वह कुल इतना चाहते थे कि उन्हें घर से लाने-ले जाने की व्यवस्था करवा दी जाए. कक्षाएं 12 तुगलक लेन में होनी थीं, जहां राहुल रहते थे. भारद्वाज के लिए यह राहुल को क़रीब से जानने-समझने का भी मौक़ा था. न सिर्फ़ बॉक्सिंग सीख रहे छात्र के रूप में, बल्कि उस शख्स के रूप में भी जिसे भारत का भावी प्रधानमंत्री कहा जा रहा था. ‘वह हमेशा ज़्यादा के लिए तैयार रहते थे. वार्म अप के लिए अगर मैंने लॉन का एक चक्कर लगाने को कहा, तो वे तीन चक्कर लगा लेते.’

बॉक्सिंग सत्र 12 तुगलक लेन के लॉन पर हफ्ते में तीन दिन होते. कभी-कभी प्रियंका और उनके बच्चे भी राहुल को मुक्केबाज़ी के हुनर सीखते देखने आते. कई बार सोनिया भी वहां बैठकर देखतीं. ‘एक दिन प्रियंका ने मुझसे कहा कि मुझे भी सिखाइए.’ भारद्वाज बताते हैं. उन्होंने उतनी ही चुस्त-दुरुस्त छोटी बहन को भी मुक्केबाज़ी  की कुछ चालें समझाईं और उनके एक पंच पर दंग रह गए. ‘यह बहुत ख़ूबसूरत पंच था, उस शख़्स से तो इसकी उम्मीद ही नहीं की जा सकती थी, जो पहली बार मुक्केबाज़ी  में हाथ आज़मा रहा था.

जिस दिन इंदिरा गांधी की हत्या हुई, वह आख़िरी दिन जब राहुल और प्रियंका स्कूल गए. अगले पांच वर्ष उनकी पढ़ाई-लिखाई घर पर ही हुई. राजीव गांधी के शब्दों में ‘घूमने-फिरने और खेलकूद के शौक़ीन व्यक्ति होने के नाते राहुल ने खेलकूद में अपनी अभिरुचि को आगे बढ़ाने के रास्ते खोज लिए. उन्होंने तैराकी, साईलिंग और स्कूबा-डायविंग की और स्वैश खेला. अपने पिता की तरह उन्होंने दिल्ली के नज़दीक अरावली की पहाड़ियों पर एक शूटिंग रेंज में निशानेबाज़ी का प्रशिक्षण लिया और हवाई जहाज़ उड़ाना भी सीखा. खेलों में अभिरुचि की वजह से ही 1989 में उन्हें दिल्ली के बेहतरीन सेंट स्टीफेंस कॉलेज में दाख़िला मिला. नंबरों के बल पर तो उन्हें इस कॉलेज में प्रवेश नहीं मिल सका, अलबत्ता पिस्टल शूटिंग में अपने हुनर की बदौलत स्पोर्ट्स कोटे में प्रवेश मिल गया. उन्होंने इतिहास ऑनर्स में नाम लिखवाया. वह सुरक्षा गार्डो के साथ कॉलेज आते और अक्सर क्लास में पीछे बैठते. रैगिंग के दौरान वह काफ़ी मज़े लेते, लेकिन कॉलेज में बाक़ी समय बहुत कम मौक़ों पर ही बोलते. एक साल और तीन महीने बाद उन्होंने सेंट स्टीफेंस कॉलेज छोड़ दिया. कॉलेज के प्रिंसीपल डॉ. अनिल विल्सन भी राहुल के अधबीच में कोर्स छोड़ देने के कारणों के बारे में अन्य लोगों की तरह सिर्फ़ अनुमान ही लगा पाते हैं.

उन्होंने पाया कि राहुल ज़मीन से जुड़े व्यक्ति थे और गांधी परिवार का सदस्य होने के नाज़-नख़रों से मुक्त थे. उन्हें लगा कि राहुल हर कहीं साये की तरह साथ चलती कड़ी सुरक्षा से असहज महसूस करते थे और संभवत: इसी वजह से उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी. सेंट स्टीफेंस कॉलेज छोड़ने के फ़ौरन बाद राहुल अमेरिका चले गए और इकॉनोमिक्स के छात्र के तौर पर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में प्रवेश लिया. वह बीस साल के थे. हार्वर्ड में अभी मुश्किल से एक साल ही बिताया था कि उनके पिता की हत्या हो गई. त्रासदी का असर उनकी पढ़ाई पर पड़ा. राहुल हार्वर्ड छोड़कर लिबरल आर्ट्स के एक निजी संस्थान रॉलिन्स कॉलेज में पढ़ने के लिए विंटर पार्क, लोरिडा आ गए. इसकी वजह भी एक बार फिर सुरक्षा चिंताओं को ही बताया गया. अब तक सुरक्षा गार्डो की सतत पहरेदारी में ज़िन्दगी बिताते आ रहे नौजवान को इस उपनगरीय शहर ने, जिसे अमीर उद्योगपतियों ने प्रारंभ में रिसॉर्ट डेस्टिनेशन की तौर पर बसाया था, आदर्श माहौल मुहैया किया. यहां राहुल ने वह कोर्स पूरा किया, जिसमें दाख़िला लिया था और 1994 में कॉलेज में पढ़ाए जाने वाले छह मुख्य विषयों में से एक, इंटरनेशनल रिलेशंस में डिग्री के साथ ग्रेजुएट किया.

इसके बाद राहुल कैंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में पढ़ने गए. उनके परदादा जवाहरलाल नेहरू भी 1907 से 1910 तक इसी कॉलेज में पढ़े थे और क़ानून की डिग्री ली थी. राजीव गांधी ने भी ट्रिनिटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी. राहुल ने डेवलपमेंट स्टडीज़ में एम फिल करने का विकल्प चुना, जिसे 1995 में पूरा किया.

ट्रिनिटी कॉलेज से उत्तीर्ण होकर राहुल फ़ौरन भारत नहीं लौटे. वह लंदन चले गए, जहां उन्होंने एक ग्लोबल मैनेजमेंट एंड स्ट्रैटजी कंसल्टेंसी फर्म, मॉनीटर ग्रुप, में काम किया. इसके सह-संस्थापक थे हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के प्रोफ़ेसर माइकल यूजीन पोर्टर, जिन्हें ब्रैंड स्ट्रैटजी का अग्रणी आधिकारिक विद्वान माना जाता है. राहुल ने वहां तीन साल काम किया, लेकिन फ़र्ज़ी नाम से. उनके सहयोगियों को अंदाज़ तक नहीं था कि इंदिरा गांधी का पौत्र उनके बीच काम कर रहा है. प्रायवेसी की ज़रूरत के बारे में, जिससे वह हमेशा वंचित रहे, राहुल ने कहा, ‘अमेरिका में पढ़ाई के बाद मैंने जोखिम उठाया और अपने सुरक्षा गार्डो से छुटकारा पा लिया, ताकि इंग्लैंड में सामान्य ज़िन्दगी बिता सकूं.’ उनके पिता ने भी कभी ऐसी ही ज़रूरत महसूस की थी. प्रधानमंत्री बनने के बाद जब अपने और परिवार के लिए वक़्त निकालना मुश्किल हो गया और राजनीति की रफ़्तार ने उड़ान के जज़्बे को नेपथ्य में धकेल दिया, तब उन्होंने कहा था, ‘कभी-कभी मैं कॉकपिट में चला जाता हूं, बिल्कुल अकेला, और दरवाज़ा  बंद कर लेता हूं. मैं उड़ भले न सकूं, कम से कम कुछ देर के लिए दुनिया से अपने को अलग तो कर पाता हूं.’

उधर, राहुल इंग्लैंड में सामान्य जीवन जीने की कोशिश कर रहे थे, इधर भारत में उनकी मां सोनिया गांधी राजनीति में गहरे और गहरे उतरती जा रही थीं. 1997 में राजनीति में प्रवेश के बाद अब वह कांग्रेस का नेतृत्व कर रही थीं. इस दौरान प्रियंका उनके साथ खड़ी थीं, शक्तिस्रोत बनकर. कांग्रेस के भीतर शोर-शराबा बढ़ रहा था कि प्रियंका पार्टी में शामिल हों. राहुल को देश से बाहर रहते दस साल से ज़्यादा हो चुके थे, लेकिन राजनीति उन्हें पुकार रही थी और यह संकेत था कि उनके लौटने का वक़्त आ गया है. वह लौटे, 2002 में. भारत में आउटसोर्सिग इंडस्ट्री उछाल पर थी. पश्चिम की मल्टीनेशनल कंपनियां भारत का रुख़ कर रही थीं, ताकि काम तेज़ी से और सस्ते में करवाए जा सके. राहुल ने देश की व्यावसायिक राजधानी मुंबई में एक इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी आउटसोर्सिग फर्म, बेकॉप्स सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड बनाई. इस बीपीओ उद्यम में सिर्फ़ आठ लोग काम करते थे और रजिस्ट्रार ऑफ़ कंपनीज में दर्ज आवेदन के मुताबिक़ इसका लक्ष्य था घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को सलाह व सहायता मुहैया करना, सूचना प्रौद्योगिकी में परामर्शदाता और सलाहकार की भूमिका निभाना और वेब सॉल्यूशन देना. राहुल, अपने पारिवारिक मित्र मनोज मट्टू के साथ, इसके निदेशकों में से एक थे. अन्य दो निदेशक थे - कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामेश्वर ठाकुर के बेटे अनिल ठाकुर और दिल्ली में रहने वाले रणवीर सिन्हा. दोनों ने 2006 में ‘निजी कारणों’ का हवाला देते हुए इस्तीफ़ा दे दिया. 2004 के आम चुनाव से पहले चुनाव आयोग को दिए हलफ़नामे के मुताबिक़ बेकॉप्स सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड में राहुल की हिस्सेदारी 83 फ़ीसद थी. कंपनी की बैलेंस शीट से पता चलता था कि यह एक छोटा व्यावसायिक उद्यम था.

2004 में राहुल के राजनीति में प्रवेश के कुछ समय बाद उनकी कंपनी ने सीईओ की तलाश के लिए विज्ञापन निकाला. ‘हम एक सीईओ की खोज में हैं, हालांकि मैं समय-समय पर कर्मचारियों के साथ मीटिंग करता हूं और बड़े मुद्दे सुलझाता हूं.’ जून 2004 में राहुल ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा था. उस वक़्त कंपनी के पास तीन विदेशी ग्राहक थे और राहुल ने माना कि पहले साल कोई रेवन्यू नहीं आया. 2009 में, लोकसभा चुनाव से कुछ पहले, राहुल ने अपने को इस उद्यम से बाहर कर लिया. कांग्रेसियों के मुताबिक़ राजनीति के तक़ाज़ों में उन्हें बिजनेस चलाने के लिए वक़्त ही नहीं मिलता था.

राहुल की पढ़ाई-लिखाई में जैसे अवरोध आए, वैसे ही उनके कॅरियर में भी. लेकिन शारीरिक चुस्ती और रोमांचक खेलों को लेकर उनके जज़्बे में कभी कमी नहीं आई. दिन में कितनी भी व्यस्तता क्यों न हो, वह व्यायाम के लिए वक़्त निकाल ही लेते. जिस साल उन्होंने बॉक्सिंग में क्रैश कोर्स किया, उसी साल पैराग्लाइडिंग में भी हाथ आज़माया.  अपनी मैनेजमेंट ट्रेनिंग का अच्छा इस्तेमाल करते हुए वह अमेठी से सात-आठ लोगों की एक टीम को महाराष्ट्र के कामशेट स्थित निर्वाणा एडवेंचर्स नामक एक लाइंग क्लब में ले गए. यह तीन दिनों का पैराग्लाइडिंग कोर्स था, जो 28 से 30 जनवरी 2008 तक चला. इसने टीम बिल्डिंग का भी काम किया. पश्चिमी घाट में पुणो से 85 किलोमीटर दूर कामशेट ऐसी जगह नहीं थी, जहां कोई राजनीतिज्ञ अपने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ एकत्र हो और काम पर चर्चा करे. लेकिन राजनीतिज्ञों की बंधी-बधाई लीक से हटकर चलने वाले राहुल के लिए असामान्य बात नहीं थी. सरसों के खेतों, शांत झीलों और प्राचीन बौद्घ गुफ़ा मंदिरों से सजी-धजी पहाड़ियों के बीच राहुल की अमेठी टीम सुबह पैराग्लाइडिंग के पाठ सीखती और शामें धुआंधार बहसों में बीततीं. कामशेट में उन्हें देखने वाले बताते हैं कि चर्चाएं हरेक के साथ सीधे होतीं. कौन छोटा है और कौन बड़ा यह सिर्फ़ तब पता चलता जब टीम राहुल को संबोधित करती. सभी उन्हें राहुल भैया कहते. राहुल और उनकी टीम के कामशेट पहुंचने से पहले उनकी मेज़बान एस्ट्रिड राव अपने इस शांत और मनोरम अंचल में एक हाईप्रोफाइल राजनेता के आगमन को लेकर ख़ासी आशंकित थीं. अपने शौहर संजय राव के साथ मिलकर निर्वाणा एडवेंचर्स की स्थापना करने वाली एस्ट्रिड मुतमईन थीं कि इस आगमन से इलाक़े की शांति भंग हो जाएगी. उन्होंने कहा, ‘मुझे यक़ीन था कि राहुल के साथ आने वाली कड़ी सुरक्षा व्यवस्था पूरे इलाक़े की घेराबंदी कर देगी.’ ऐसा कुछ नहीं हुआ. ‘हमारे कहे बग़ैर राहुल ने सुनिश्चित कर दिया कि गेस्ट हाउस के आसपास कोई भी वर्दीधारी या बंदूक़ धारी दिखाई न दे.

उनकी मौजूदगी से एक बार भी हमारी दिनचर्या में ख़लल नहीं पड़ा.’वे किसी भी दूसरे मेहमान की तरह वहां रहे. पहली रात राव दंपती ने आगंतुकों के लिए मेमना पकाया. बुफ़े सजा दिया गया. एस्ट्रिड बताती हैं, ‘मुझे देखकर ताज्जुब हुआ कि राहुल अपने साथियों को प्लेटें दे रहे थे. अपनी प्लेट भी वह ख़ुद किचन में रखकर आए.’ अगले दिन खाने के वक़्त राहुल रसोइये के पास गए और पूछा कि क्या कल रात का मेमना बचा हुआ है. कोच भारद्वाज भी राहुल को ग़ुरूर से मुक्त बताते हैं. ‘जब मैंने उन्हें सिखाना शुरू किया, मैं उन्हें सर या राहुल जी कहता.’ लेकिन दो दिन बाद राहुल ने अपने कोच से गुज़ारिश की, ‘मुझे सर मत कहिए. राहुल कहिए. मैं आपका शिष्य हूं.’ भारद्वाज बताते हैं, एक बार उन्होंने राहुल से कहा कि वह पानी पीना चाहते हैं. ‘पास ही सेवक खड़े थे, लेकिन उन्हें बुलाने की बजाय राहुल ख़ुद किचन में गए और गिलास में मुझे पानी लाकर दिया.’ और सीखने के बाद वह अपने गुरु को गेट तक छोड़ने आते.

कामशेट के पैराग्लाइडिंग स्कूल में राहुल ने पहला दिन लाइट ट्रैनर संजय राव के साथ बिताया, जिन्होंने उन्हें मैदानी प्रशिक्षण दिया. असली लाइट बाद के दो दिनों में सिखाई गई. ‘राहुल का परफॉर्मेस बहुत अच्छा था. उन्होंने ग्लाइडर उठाया और बस उड़ गए.’ संजय ने बताया. वह राहुल को अपने टॉप 10 फ़ीसदी छात्रों में शुमार करते हैं. ‘वह बहुत ध्यान से सुनते हैं, इसीलिए तेज़ी से सीखते हैं.’ जिन्होंने उन्हें देखा है, वे उन्हें ऐसा शख्स बताते हैं जो ‘हमेशा अपना एंटीना खुला रखता है.’ कामशेट में रहने के दौरान राहुल पड़ोस की झील में तैरने जाना चाहते थे, लेकिन उनके सुरक्षा गार्डो ने उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी. उन्होंने उनकी बात मानी. ‘यह बड़े दुख की बात थी, ख़ासकर जब वह बहुत एथलेटिक शख्स हैं और रोज़ 10 किलोमीटर जॉगिंग करते हैं.’ एस्ट्रिड बताती हैं. वह ऐसे शख्स भी नहीं हैं, जो वादा करके भूल जाएं. एस्ट्रिड को यह बात राहुल और उनकी टीम के कामशेट से जाने के एक महीने बाद पता चली. जब वह उन्हें अपना बगीचा दिखा रही थीं, राहुल ने उनसे कहा कि उनकी मां को भी बाग़वानी बहुत प्रिय है. उन्होंने बताया कि सोनिया के पास एक ख़ास किताब है जिसका वह अकसर  ज़िक्र करती हैं, लेकिन उस वक़्त वह उसका नाम याद नहीं कर सके. उन्होंने वादा किया कि दिल्ली जाकर वह किताब भेजेंगे. एक महीने बाद एस्ट्रिड को एक अप्रत्याशित पार्सल मिला. इसमें बाग़वानी की वही किताब थी, जिसकी राहुल ने चर्चा की थी. राहुल न तो भूलते नहीं हैं और न ही वह माफ़ करते हैं.

यह बात कुछ पत्रकारों को ख़ासी क़ीमत चुकाकर समझ आई. 22 जनवरी 2009 को एनएसयूआई ने राहुल के कहने पर पुलिस में एक शिकायत दर्ज की. दरअसल एक सभा स्थल से लंच ब्रेक के दौरान राहुल के भाषण और प्रेजेंटेशन के लिए तैयार नोट्स ग़ायब हो गए थे. घटना दिल्ली के कॉंस्टिट्यूशन क्लब में घटी, जहां पार्टी की एक वर्कशॉप आयोजित की गई थी. शक एक टीवी क्रू के सदस्यों पर था जो उस वक़्त हॉल में दाख़िल हुए थे, जब बाक़ी सब लोग खाना खाने चले गए थे. वहां क़रीब पच्चीस पत्रकार मौजूद थे. एनएसयूआई प्रमुख हिबी ईडन ने पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज की. कहा जाता है कि यह क़दम  तभी उठाया गया जब राहुल ने ज़ोर डाला कि मामला पुलिस में दिया जाए. पत्रकार ज़्यादा से ज़्यादा सूचनाएं जुटाने के लिए अक्सर किसी भी हद तक चले जाते हैं, लेकिन सार्वजनिक नहीं की गई जानकारी हासिल करने की ग़रज़ से किसी के काग़ज़ उठा लेना, राहुल के लिए यह चोरी से कम नहीं था. दो दिनों तक पुलिस ने अलग-अलग चैनलों के तीन पत्रकारों को बुलाकर ग़ायब काग़ज़ों  के बारे में पूछताछ की. हालांकि राहुल की टीम के सदस्यों ने भी उन्हें समझाने की कोशिश की कि आख़िरकार ये प्रेजेंटेशन के काग़ज़ात कागजात ही थे और उनमें कोई गोपनीय जानकारी नहीं थी, लेकिन वह पत्रकारों के ख़िलाफ़ कार्रवाई पर ज़ोर देते रहे.

19 जून 2011 को राहुल इकतालीस साल के हो गए. राजनेता की व्यस्त ज़िन्दगी जीने के बावजूद वह अपने शौक़ पूरे करते हैं और अपने माता-पिता की तरह सामान्य जीवन बिताने के रास्तों की तलाश में रहते हैं. जब उनके पति पायलट थे और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं, तब सोनिया को अक्सर दिल्ली की खान मार्केट में सब्ज़ियां ख़रीदते देखा जाता था. उन्हें खाना पकाना बहुत प्रिय था. प्रियंका भी इसी बाज़ार से अपनी ख़रीदारी करना पसंद करती हैं. दुनिया की सबसे महंगी खुदरा हाई स्ट्रीट में शुमार खान मार्केट दिल्ली में राहुल का भी सबसे प्रिय हैंगआउट है. उन्हें बरिस्ता में कॉफी पीते या बाज़ार की बाहरी तरफ़ बुक शोप्स में किताबें पलटते देखा जा सकता है. उन्हें अपनी भांजी, मिराया और भांजे रेहान के साथ वक़्त बिताना भी बहुत अच्छा लगता है. 'ज़ाहिर तौर पर वह प्रियंका के बच्चों को बहुत स्नेह करते हैं.' कामशेट में उनके मेज़बान बताते हैं. पैराग्लाइडिंग यात्रा के दौरान वह हमेशा उनके और प्रियंका के बारे में बात करते थे. एस्ट्रिड बताती हैं, ‘वह अक्सर कहते थे कि प्रियंका को यहां आना चाहिए, लेकिन वह आलसी है.’

ख़ामोश शामें राहुल को जितनी अपील करती हैं, उतना ही फास्ट ट्रैक जीवन. यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में मनमोहन सिंह के साथ घनिष्ठ रूप से काम कर चुके एक अधिकारी ने कहा कि हाई-ऑ टेन ग्रां प्री सीजन के दौरान जब सिंगापुर की सड़कें फॉर्मूला वन रेसिंग ट्रैक में बदल जातीं, तब राहुल चुपचाप वहां के लिए उड़ जाते. वे दिनभर संगीत सभाओं और पार्टियों में शिरकत करते. उत्सुक बाइकर होने के साथ-साथ राहुल को अपने क़रीबी दोस्तों के समूह के साथ गो-कार्टिंग में भी बहुत आनंद आता है. अप्रैल 2011 में मुंबई में वर्ल्ड कप क्रिकेट मैच के दौरान एक दोपहर 1.30 बजे के आसपास राहुल पिज्जा, पास्ता और मैकिसकन  तोस्तादा सलाद की दावत के लिए चौपाटी बीच पर न्यू यॉर्कर रेस्त्रां पहुंच गए. उन्होंने वेटर से गपशप की और खाने का ख़र्च वहन करने के मैनेजर के आग्रह को ठुकरा दिया. फिर राहुल और उनके दोस्तों ने 2,233 रुपये का बिल आपस में बांट लिया.

Tuesday, May 8, 2012

वर्चुअल दोस्ती के ख़तरे...




-फ़िरदौस ख़ान
झूठ की बुनियाद पर बनाए गए रिश्तों की उम्र बस उस वक़्त तक ही होती है, जब तक झूठ पर पर्दा पड़ा रहता है. जैसे ही सच सामने आता है, वो रिश्ता भी दम तोड़ देता है. अगर किसी इंसान को कोई अच्छा लगता है और वो उससे उम्रभर का रिश्ता रखना चाहता है तो उसे सामने वाले व्यक्ति से झूठ नहीं बोलना चाहिए. जिस दिन उसका झूठ सामने आ जाएगा. उस वक़्त उसका रिश्ता तो टूट ही जाएगा, साथ ही वह हमेशा के लिए नज़रों से भी गिर जाएगा. कहते हैं- इंसान पहाड़ से गिरकर तो उठ सकता है, लेकिन नज़रों से गिरकर कभी नहीं उठ सकता. ऐसा भी देखने में आया है कि कुछ अपराधी प्रवृति के लोग ख़ुद को अति सभ्य व्यक्ति बताते हुए महिलाओं से दोस्ती गांठते हैं, फिर प्यार के दावे करते हैं. बाद में पता चलता है कि वो शादीशुदा हैं और कई बच्चों के बाप हैं. दरअसल, ऐसे बाप टाईप लोग हीन भावना का शिकार होते हैं. अपराधी प्रवृति के कारण उनकी न घर में इज्ज़त होती है और न ही बाहर. उनकी हालत धोबी के कुत्ते जैसी होकर रह जाती है यानी धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का. ऐसे में वे सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपना अच्छा सा प्रोफाइल बनाकर ख़ुद को महान साबित करने की कोशिश करते हैं. वह ख़ुद को अति बुद्धिमान, अमीर और न जाने क्या-क्या बताते हैं, जबकि हक़ीक़त में उनकी कोई औक़ात नहीं होती. ऐसे लोगों की सबसे बड़ी 'उपलब्धि' यही होती है कि ये अपने मित्रों की सूची में ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं को शामिल करते हैं. कोई महिला अपने स्टेट्स में  कुछ भी लिख दे, फ़ौरन उसे 'लाइक' करेंगे, कमेंट्स करेंगे और उसे चने के झाड़ पर चढ़ा देंगे. ऐसे लोग समय-समय पर महिलाएं बदलते रहते हैं, यानी आज इसकी प्रशंसा की जा रही है, तो कल किसी और की. लेकिन कहते हैं न कि काठ की हांडी बार-बर नहीं चढ़ती. 

वक़्त दर वक़्त ऐसे मामले सामने आते रहते हैं. ब्रिटेन में हुए एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि ऑनलाइन रोमांस के चक्कर में तक़रीबन दो लाख लोग धोखा खा चुके हैं. धोखा देने वाले लोग अपनी असली पहचान छुपाकर रखते थे और आकर्षक मॉडल और सेना अधिकारी की तस्वीर अपनी प्रोफाइल पर लगाकर लोगों को आकर्षित किया करते थे. ऐसे में सोशल नेटवर्किंग साइटों का इस्तेमाल करने वाले लोगों का उनके प्रति जुड़ाव रखना स्वाभाविक ही था, लेकिन जब उन्होंने झूठे प्रोफाइल वाले लोगों से मिलने की कोशिश की तो उन्हें सारी असलियत पता चल गई. कई लोग अपनी तस्वीर तो असली लगाते हैं, लेकिन बाक़ी जानकारी झूठी देते हैं. झूठी प्रोफाइल बनाने वाले या अपनी प्रोफ़ाइल में झूठी जानकारी देने वाले लोग महिलाओं को फांसकर उनसे विवाह तक कर लेते हैं. सच सामने आने पर उससे जुड़ी महिलाओं की ज़िन्दगी बर्बाद होती है. एक तरफ़ तो उसकी अपनी पत्नी की और दूसरी उस महिला की जिससे उसने दूसरी शादी की है.

बीते माह मार्च में एक ख़बर आई थी कि अमेरिका में एक महिला ने सोशल नेटवर्किंग साइट फ़ेसबुक पर अपने पति की दूसरी पत्नी को खोज निकाला. फ़ेसबुक पर बैठी इस महिला ने साइड में आने वाले पॉपअप ‘पीपुल यू मे नो’ में एक महिला को दोस्त बनाया. उसकी फ़ेसबुक पर गई तो देखा कि उसके पति की वेडिंग केक काटते हुए फोटो थी. समझ में नहीं आया कि उसका पति किसी और के घर में वेडिंग केक क्यों काट रहा है? उसने अपने पति की मां को बुलाया, पति को बुलाया. दोनों से पूछा, माजरा क्या है? पति ने पहली पत्नी को समझाया कि ज़्यादा शोर न मचाये, हम इस मामले को सुलझा लेंगे. मगर इतने बड़े धोखे से आहत महिला ने घर वालों को इसकी जानकारी दी. उसने अधिकारियों से इस मामले की शिकायत की. अदालत में पेश दस्तावेज़ के मुताबिक़  दोनों अभी भी पति-पत्नी हैं. उन्होंने तलाक़ के लिए भी आवेदन नहीं किया. अब दोषी पाए जाने पर पति को एक साल की जेल हो सकती है. पियर्स काउंटी के एक अधिकारी के मुताबिक़, एलन ओनील नाम के इस व्यक्ति ने 2001 में एलन फल्क के अपने पुराने नाम से शादी की. फिर 2009 में पति ओनील ने नाम बदलकर एलन करवा लिया था और किसी दूसरी महिला से शादी कर ली थी. उसने  पहली पत्नी को तलाक़ नहीं दिया था.

दरअसल, सोशल नेटवर्किंग साइट्स के कारण रिश्ते तेज़ी से टूट रहे हैं. अमेरिकन एकेडमी ऑफ मैट्रीमोनियल लॉयर्स के एक सर्वे में भी यह बात सामने आई है. सर्वे के मुताबिक़ तलाक़ दिलाने वाले क़रीब 80 फ़ीसद वकीलों ने माना कि उन्होंने तलाक़ के लिए सोशल नेटवर्किंग पर की गई बेवफ़ाई वाली टिप्पणियों को अदालत में एक साक्ष्य के रूप में पेश किया है. तलाक़ के सबसे ज़्यादा मामले फ़ेसबुक से जुड़े हैं. 66 फ़ीसद मामले फ़ेसबुक से, 15 फ़ीसद माईस्पेस से, ट्विटर से पांच फ़ीसद और बाक़ी दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइट्स से 14 फ़ीसद मामले जुड़े हैं. इन डिजिटल फुटप्रिंट्स को अदालत में तलाक़ के एविडेंस के रूप में पेश किया गया. पिछले दिनों अभिनेत्री इवा लांगोरिया ने बास्केट बाल  खिलाड़ी अपने पति टोनी पार्कर का तलाक़ दे दिया. इवा का आरोप है कि फ़ेसबुक पर उसके पति टोनी और एक महिला की नज़दीकी ज़ाहिर हो रही थी. ब्रिटेन में भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स की वजह से तलाक़ के मामले तेज़ी से बढ़े हैं. अपने साथी को धोखा देकर ऑनलाइन बात करते हुए पकड़े जाने के कारण तलाक़ के मामलों में इज़ाफ़ा हुआ है. ब्रिटिश न्यूज पेपर 'द सन' के मुताबिक़, पिछले एक साल में फ़ेसबुक पर की गईं आपत्तिजनक टिप्पणियां तलाक़ की सबसे बड़ी वजह बनीं. रिश्ते ख़राब होने और टूटने के बाद लोग अपने साथी के संदेश और तस्वीरों को तलाक़ की सुनवाई के दौरान इस्तेमाल कर रहे हैं.

सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जहां कुछ फ़ायदें हैं, वहीं नुक़सान भी हैं. इसलिए सोच-समझ कर ही इनका इस्तेमाल करें. अपने आसपास के लोगों को वक़्त दें, उनके साथ रिश्ते निभाएं. सोशल नेटवर्किंग साइट्स के आभासी मित्रों से परस्पर दूरी बनाकर रखें.  कहीं ऐसा न हो कि आभासी फ़र्ज़ी दोस्तों के चक्कर में आप अपने उन दोस्तों को खो बैठें, जो आपके सच्चे हितैषी हैं.  (स्टार न्यूज़  एजेंसी)