Sunday, December 27, 2015

मुस्लिम सियासी दलों की हक़ीक़त...


फ़िरदौस ख़ान
मुस्लिम सियासी दलों की हक़ीक़त... देश में चुनाव के क़रीब आते ही मुस्लिम सियासी दल और मुस्लिम संगठन हरकत में आ जाते हैं... इनके कर्ताधर्ता पहले तो देश के तक़रीबन सियासी दलों को पानी पी-पीकर कोसते हैं और बाद में कुछ संगठन इन्हीं सियासी दलों की गोद में जाकर बैठ जाते हैं... पर्दे के पीछे की हक़ीक़त यही रहती है कि इन दलों का मक़सद बड़े सियासी दलों से सैटिंग करके रक़म ऐंठना ही होता है... जो दल खुलेआम किसी सियासी दल को समर्थन नहीं देते, वे भी मुसलमानों के वोट बांटने का काम करते हुए सांप्रदायिक सियासी दलों को फ़ायदा पहुंचाते हैं... मुसलमानों को चाहिए कि वे ऐसे मुस्लिम सियासी दलों से परहेज़ करें, जो उनकी भलाई के नाम पर अपना उल्लू सीधा करते हैं... आज देश में हालात हैं, उन्हें देखते हुए यह बेहद ज़रूरी है कि मुसलमान ऐसे सियासी दल को वोट करें, जो देश की एकता और अखंडता में यक़ीन रखता है... ख़ास बात यह है कि अगर मुसलमान अपना और अपने बच्चों का सुरक्षित भविष्य चाहते हैं, तो उन्हें सांप्रदायिक ताक़तों के ख़िलाफ़ एकजुट होना ही होगा...

गर्म कपड़े


हम सब बाज़ार से नये-नये कपड़े-कपड़े ख़रीदते रहते हैं... हर मौसम में मौसम के हिसाब से कपड़े आते हैं... सर्दियों के मौसम में स्वेटर, जैकेट, गरम कोट, कंबल, रज़ाइयां और भी न जाने क्या-क्या... बाज़ार जाते हैं, जो अच्छा लगा ख़रीद लिया... हालांकि घर में कपड़ों की कमी नहीं होती... लेकिन नया दिख गया, तो अब नया ही चाहिए... इस सर्दी में कुछ नया ही पहनना है... पिछली बार जो ख़रीदा था, अब वो पुराना लगने लगा... वार्डरोब में नये कपड़े आते रहते हैं और पुराने कपड़े स्टोर में पटख़ दिए जाते हैं...
ये घर-घर की कहानी है... जो कपड़े हम इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं और वो पहनने लायक़ हैं, तो क्यों न उन्हें ऐसे लोगों को दे दिया जाए, जिन्हें इनकी ज़रूरत है...

कुछ लोग इस्तेमाल न होने वाली चीज़ें दूसरों को इसलिए भी नहीं देते कि किसे दें, कौन देने जाए... किसके पास इतना वक़्त है... अगर हम अपना थोड़ा-सा वक़्त निकाल कर इन चीज़ों को उन हाथों तक पहुंचा दें, जिन्हें इनकी बेहद ज़रूरत है, तो कितना अच्छा हो...

चीज़ वहीं अच्छी लगती है, जहां उसकी ज़रूरत होती है...

Thursday, December 10, 2015

मज़हब


ज़्यादातर लोग किसी मज़हब को सिर्फ़ इसलिए मानते हैं, क्योंकि वे उस मज़हब को मानने वाले परिवार में पैदा हुए हैं... बहुत कम लोग ही ऐसे होते हैं, जो अपना मज़हब बदलते हैं... कई बार ऐसा भी होता है कि लोग अपना मज़हब नहीं बदलते, लेकिन उनकी अक़ीदत दूसरे मज़हब में होती है...
दरअसल, इबादत बहुत ज़ाती चीज़ है... कौन अपने ख़ुदा को किस तरह याद करता है... यह उसका ज़ाती मामला है...

अपने मज़हब को जबरन किसी पर थोपना अच्छी बात नहीं... अमूमन हर इंसान को अपना मज़हब ही सही लगता है... इसके लिए वह कुतर्क करने से भी बाज़ नहीं आता... अच्छा तो यही है कि हमें सभी मज़हबों की इज़्ज़त करनी चाहिए... जब हम दूसरों के मज़हब की इज़्ज़त करेंगे, तभी वो हमारे मज़हब की भी इज़्ज़त करेंगे...
-फ़िरदौस ख़ान

Tuesday, November 24, 2015

विज्ञापन डराते हैं


टीवी पर दिनभर में जितने भी विज्ञापन आते हैं, उनमें ऐसे विज्ञापनों की भरमार रहती है, जिनमें लोगों को इतनी बुरी तरह डराया जाता है कि वे विज्ञापन ख़त्म होते ही उनके उत्पाद ख़रीदने के लिए दौड़ पड़ें... हाथ धोने से लेकर नहाने तक और बर्तन धोने से लेकर फ़र्श साफ़ करने तक के उत्पादों के विज्ञापनों में कीटाणुओं का डर दिखाया जाता है कि अगर फ़लां उत्पाद इस्तेमाल न किया, तो उनका बच्चा बीमार हो जाएगा...
शुक्र है कि ये विज्ञापन कीटाणुओं के संपूर्ण नाश के लिए कोई कीटनाशक पीने की सलाह नहीं देते...


यह हिंदुस्तान है, जहां धरती को मां कहकर पुकारा जाता है... गांव-देहात में आज भी चोट लगने पर बच्चे और बड़े अपने ज़ख़्म पर मिट्टी डाल लेते हैं...

Saturday, November 14, 2015

अवाम को क्या चाहिए


अवाम को क्या चाहिए, बुनियादी ज़रूरत की चीज़ें... मुल्क में चैन-अमन हो, लोगों के पास रोज़गार हो, पेट भरने के लिए खाना हो, रहने को घर हो, बिजली हो, पानी हो, यातायात के साधन हों, बच्चों के लिए स्कूल-कॊलेज हों  और स्वास्थ्य सुविधाएं हों...

अवाम यही सब तो चाहती है, लेकिन सरकार... सरकार उन्हें ये सब देने की बजाय फ़िज़ूल की बयानबाज़ी में उलझाये रखना चाहती है, ताकि वे अपने हक़ के लिए बग़ावत शुरू न कर दें...
और सरकार अपनी इस साज़िश में काफ़ी हद तक कामयाब भी हुई है... अवाम को चाहिए कि वे बेजा बयानबाज़ी के फेर में न पड़ कर अपने हक़ के लिए आवाज़ बुलंद करें...
-फ़िरदौस ख़ान

Friday, November 6, 2015

विज्ञापन गुमराह करते हैं



सोच रहे हैं, क्या ख़ाला ने ये ख़बर सुनी होगी... अगर सुनी होगी, तो उन्होंने ये ज़रूर सोचा होगा कि ठगी तो वह भी गई हैं, उन करोड़ों लोगों की तरह, जो विज्ञापनों के झूठे दावों पर भरोसा करके कुछ अच्छे की उम्मीद बांध लेते हैं...
ज़्यादातर विज्ञापन गुमराह करते हैं... फिर भी लोग विज्ञापनों के झूठे दावों के दांव में फंस जाते हैं... बचपन की बात है... हमारी रिश्ते की एक ख़ाला हैं... उनका रंग ज़्यादा सांवला है... वो फ़ेयरनेस क्रीम लगाती थीं, शायद उस वक़्त आठ हफ़्तों में गोरा होने का दावा किया जाता था... वो अपनी अम्मी से क्रीम छुपाकर रखती थीं, ताकि वो देख न लें... क्रीम लगाने की सख़्त मनाही थी... बस काजल या सुरमा लगाने की इजाज़त थी... बरसों उन्होंने क्रीम लगाई, लेकिन गोरी नहीं हुईं... चार साल पहले जयपुर में उनसे मुलाक़ात हुई... हमने उनसे पूछा कि क्या अब भी फ़ेयरनेस क्रीम लगाती हैं... वो मुस्करा कर रह गईं...
दिल्‍ली की ज़िला उपभोक्‍ता अदालत ने फ़ेयरनेस क्रीम बनाने वाली कंपनी इमामी पर 15 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है. कोर्ट ने यह फ़ैसला निखिल जैन की याचिका पर सुनाया है. तीन साल पहले दायर अर्ज़ी में निखिल ने आरोप लगाया था कि इमामी ने प्रचार में जो दावा किया था, क्रीम के इस्‍तेमाल से सच में वैसा कोई नतीजा नहीं आया. इमामी स्किन क्रीम के इस्‍तेमाल के बाद ख़ुद को छला हुआ महसूस करने के बाद निखिल ने कंपनी के ख़िलाफ़ अनफ़ेयर ट्रेड प्रैक्टिसेस का आरोप लगाया था. उसने जो क्रीम ख़रीदा थी, उसके प्रचार में चार हफ़्ते में गोरापन लाने का वादा किया गया था. उन्‍हें प्रचार में शाहरुख़ ख़ान यह दावा करते दिखे थे.
अदालत में कंपनी ने कहा कि उसका उत्पाद त्‍वचा की सेहत और गुणवत्‍ता सुधारने के लिए है. इस पर अदालत ने विज्ञापन को भ्रामक बताते हुए ने कहा, ‘पहली बात तो विज्ञापन में गोरापन शब्‍द का इस्तेमाल किया गया है, जिसका मतलब है त्‍वचा का रंग साफ़ करना. दूसरी बात, इसमें वादा किया गया है कि चार हफ़्ते के इस्‍तेमाल के बाद गोरी त्‍वचा मिलेगी.’

Wednesday, October 21, 2015

भूत वाली फ़िल्मों की कहानी सच्ची होती...


काश ! भूत वाली फ़िल्मों की कहानी सच्ची होती...
भूत वाली डरावनी फ़िल्मों में अकसर दिखाया जाता है कि एक ताक़तवर ज़ालिम किसी कमज़ोर औरत पर ज़ुल्म करता है और उसका क़त्ल कर देता है... फिर वो औरत भूत बनकर उससे अपने क़त्ल का बदला लेती है...
आज कितने की लोगों पर ज़ुल्म किए जा रहे हैं, उन्हें ख़ुदकुशी के लिए मजबूर किया जा रहा है... उन्हें बेरहमी से क़त्ल किया जा रहा है... ज़ालिम मासूम बच्चों तक को नहीं बख़्श रहे हैं...
अगर डरावनी फ़िल्मों की तरह इन लोगों की रूहें भी ज़ालिमों से इंतक़ाम लेतीं, तो कितना अच्छा होता... कितने ही मज़लूम इंसाफ़ हासिल कर पाते और ज़ालिमों का भी सफ़ाया हो जाता...

Tuesday, October 20, 2015

मुहर्रम


मुहर्रम के दस दिनों तक हमारे घरों में बाज़ार जाकर ख़रीदारी नहीं करते और न ही कोई नया काम शुरू करते हैं... आठ तारीख़ को खीर पर कर्बला के शहीदों की नियाज़ दिलाई जाती है... इसी तरह नौ तारीख़ को बिरयानी और दस तारीख़ को हलीम पर नियाज़ होती है... दस तारीख़ की सुबह शर्बत पर भी नियाज़ दिलाई जाती है...
मुहर्रम को लेकर शिया और सुन्नियों की अपनी-अपनी अक़ीदत है... शिया इस दौरान मातक करते हैं, ताज़िये निकालते हैं... जबकि सुन्नी इसके ख़िलाफ़ हैं...
इस बारे में सबकी अपनी-अपनी दलीलें हैं, अपनी-अपनी अक़ीदत है...
अल्लामा इक़बाल साहब ने ग़म-ए-शब्बीर के बारे में कहा है-
कह दो ग़म-ए- हुसैन मनाने वालों को
मुसलमान कभी शोहदा का मातम नहीं करते
है इश्क़ अपनी जान से ज़्यादा आले-रसूल (सल्ल) से
यूं सरेआम उनका तमाशा नहीं करते
रोयें वो जो मुनकिर हैं शहादत-ए-हुसैन के
हम ज़िन्दा-ओ-जावेद का मातम नहीं करते...
मरहूम अली नक़ी साहब ने इसका जवाब कुछ इस तरह दिया है-
गिरया किया याक़ूब ने उनको भी तो टोको
यूसुफ़ तो अभी ज़िंदा हैं यूं ग़म नहीं करते
आदम ने तो हव्वा के लिए पीटा है सीना
समझाओ उन्हें ज़िन्दों का मातम नहीं करते
हमज़ा तो शहीदों के भी सरदार हैं लेकिन
करते ना मुहम्मद तो चलो हम नहीं करते
हक़ बात है बस बुग़्ज़-ए-अली का ये चक्कर
तुम इसलिए शब्बीर का मातम नहीं करते
अपना कोई मरता है तो रोते हो तड़प कर
पर सिब्ते-पयम्बर का कभी ग़म नहीं करते
हिम्मत है तो महशर में पयम्बर से ये कहना
हम ज़िन्दा-ओ-जावेद का मातम नहीं करते
बस एक रिवायत रही है रोज़-ए-अज़ल से
क़ातिल कभी मक़तूल का मातम नहीं करते...
कर्बला के शहीद हमारे अपने हैं... कौन उन्हें किस तरह याद करता है, ये उसकी अपनी अक़ीदत है... वैसे भी हर इंसान को अपनी अक़ीदत के साथ जीने का पूरा हक़ है. हम अपनी अक़ीदत के साथ जियें और दूसरों को उनकी अक़ीदत के साथ जीने दें...

Monday, October 12, 2015

क़ुदरत और इंसान


कु़दरत किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करती... सूरज, चांद, सितारे, हवा, पानी, ज़मीन, आसमान, पेड़-पौधे मज़हब के नाम पर किसी के साथ किसी भी तरह का कोई भेदभाव नहीं करते... जब कायनात की हर शय सबको बराबर मानती है, तो फिर ये इंसान क्यों इतना नीचे गिर गया कि इसके गिरने की कोई हद ही न रही... इंसान को ख़ुदा ने अशरफ़ुल मख़लूक़ात बनाकर इस दुनिया में भेजा था... लेकिन इसने अपनी ग़र्ज़ के लिए इंसानों को मज़हबों में तक़सीम करके रख दिया... फिर ख़ुद को आला समझना शुरू कर दिया और दूसरों को कमतर मानने लगा... उनसे नफ़रत करने लगा, उनका ख़ून बहाने लगा...
ऐसे इंसानों से क्या जानवर कहीं बेहतर नहीं हैं, जो मज़हब के नाम पर किसी से नफ़रत नहीं करते, मज़हब के नाम पर किसी का ख़ून नहीं बहाते...
-फ़िरदौस ख़ान




हर तरफ़ वर्चस्व की लड़ाई है, चाहे सियासत हो या मज़हब... दहशतगर्दी की सबसे बड़ी वजह भी यही है कि दहशतगर्द दुनिया पर अपना वर्चस्व क़ायम करना चाहते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

Tuesday, October 6, 2015

मुसलमानों की बदहाली


फ़िरदौस खान
दुनिया में एक क़ौम ऐसी भी है, जिसके दुनियाभर में तक़रीबन 54 मुल्क हैं... इसके बावजूद क़ौम की हालत बद से बदतर होती जा रही है... हालत ये है कि कहीं उन्हें मस्जिदों में क़त्ल किया जा रहा है, तो कहीं उन्हीं के घर में घुसकर उन्हें मारा जा रहा है... न उनकी जान महफ़ूज़ और न ही कोई उनके माल का रखवाला है... वे बेबसी के आलम में अपना घर, अपना मुहल्ला, अपना शहर और अपना मुल्क छोड़कर ईसाई देशों में पनाह मांग रहे हैं... उनके रहमो-करम पर ज़िन्दा रहने के वसीले तलाश रहे हैं...
क्योंकि-
इस क़ौम के मानने वालों में इत्तेहाद नहीं है... इस क़ौम के फ़िरक़ापरस्त लोग ख़ुद को ’सच्चा’ और दूसरों को ’बुरा’ साबित करने में ही लगे रहते हैं... आपस में ही एक-दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं... इनकी बदहाली की सबसे बड़ी वजह यही है... 

Thursday, October 1, 2015

नफ़रत


इस दुनिया में जितनी नफ़रत मज़हब के नाम पर देखने को मिलती है, उतनी कहीं और दिखाई नहीं देती... मज़हब का नाम आते ही इंसान के अंदर का वहशी दरिन्दा जाग उठता है... वह इसी फ़िराक में रहता है कि कब उसे बहाना मिले और वो दूसरे मज़हब वाले इंसान का ख़ून पिये... हिन्दुस्तान समेत दुनिया भर में आज यही सब तो हो रहा है...
बेशक, मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना...
फिर मज़हब के नाम पर ये ख़ून-ख़राबा क्यों ?